रविवार, 29 दिसंबर 2013

क्या करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट था वह (सेवा संस्मरण -१६)

कहते हैं न कि याददाश्त बड़ी खराब दोस्त है ऐन मौके पर साथ छोड़ देती है। झांसी की यादों के साथ भी ऐसा ही कुछ है। कोई भी एक मुकम्मल याद नहीं सब बिखरी बिखरी सी यादे हैं कोलाजनुमा और आज आपसे उन्हीं में से कुछ साझा करूँगा। मैंने अर्थशास्त्र का विधिवत अध्ययन नहीं किया मगर मुझे अपने आचरण में हमेशा यह देखकर संतोष होता आया है कि मैं खुद और परिवार पर हमेशा अर्थशास्त्र के इस सुनहले सिद्धांत के अनुसार ही व्यय करता रहा हूँ कि "संसाधन हमेशा सीमित रहते हैं और रोजमर्रा के खर्च को अनेक विकल्पों में से चुनना और सीमित करना होता है " .मैं शायद बचपन  से ही  एक संतोषी जीव रहा और अब तो जीवन के सुदीर्घ अनुभवों ने परम संतोषी बना दिया है -मुझे भौतिक चमक दमक और सुविधाओं की कभी शौक नहीं रहा। और न कभी इसका कोई गिल्ट ही। झान्सी के आफिसर होस्टल में भी वैसी ही सन्यासी ज़िंदगी,साधारण सी कुर्सियां एक मेज और हाँ तब चूंकि ऐक्वेरियम रखना एक विभागीय 'ट्रेडमार्क' सा था तो एक बड़ा सा रंगीन मछलियों का ऐक्वेरियम भी।  

श्रीमती जी को जो भी लगता रहा हो मगर मेरे स्वभाव से उन्होंने जल्दी ही अनुकूलन बना लिया था।  आफिसर होस्टल के दूसरे अधिकारियों जिसमें सेल्स टैक्स ,इंजीनियर ,प्रशासनिक अधिकारी आदि थे के लिविंग रूम वैभवपूर्ण और सुसज्जित होते थे और साथ ही उनके पास आधुनिक सुख सुविधा और मनोरंजन के साजो सामान भी  और कुछ की खुद की अपनी गाड़ियां भी। मगर मुझे यह सब देखकर किंचित भी हीन भावना नहीं होती थी. उस समय (1987 -89) तक मेरे पास न तो टी वी थी और न ही फ्रिज आदि। मगर मुझे यही लगता था कि कि ये फालतू चीजें हैं।  पत्नी ने कम से कम एक टी वी खरीद लेने का प्रस्ताव रखा।  मगर मुझे अपनी एक वचनवद्धता याद थी। जो मैं अपनी बहन के विवाह के वक्त ऐसा परिजनों का दावा था कि  मैंने दूल्हेराजा को एक रंगीन टीवी देने का वादा खिचड़ी खाने के मान मनौवल वाली रस्म के दौरान किया था।  अब बिना बहन को दिए खुद अपनी टीवी कैसे खरीद सकता था?  

उन दिनों अपट्रान के रंगीन टीवी बाज़ार में आये थे।  दाम पता किया तो 6 हजार -हिम्मत जवाब दे गयी. इतनी तो मेरी तीन महीनों की तनखाह  थी।  अब क्या किया जाय।  मेरे एक स्टाफ ने तुरंत सुझाव दिया कि मैं अपने जी पी एफ से लोन ले सकता हूँ। बात सुलझ गयी. मुझे कई आसान किश्तों की वापसी के आधार पर छह हजार रूपये मिल गए और मैंने रंगीन टीवी खरीद लिया और उसे सीधे बहन को भिजवा दिया।  अब जब तक यह लोन था दूसरी टीवी खरीदने की हिम्मत ही नहीं थी। मैंने टीवी अपने इलाहाबाद पोस्टिंग में १९९० में ली और वह भी मित्र  मुक्तेश्वर मिश्र की पहल पर।  और  फ्रिज तो 1997  में देवरिया में! 

झांसी  के आफिसर्स होस्टल में मेरे बगल के कक्ष संख्या 17 में ही उन दिनों एक नए आई ए  एस आफिसर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट की पहली पोस्टिंग पर आये।  उनमें एक बात विलक्षण थी ,उनके आई  ए  एस के पेपर्स में एक सांख्यिकी था और दूसरा उर्दू। एक साहित्य तो दूसरा एकदम नीरस विषय।  मेरी उनके साथ खूब जमी। साहित्य की बैठकें होती मगर एक ऐंटी क्लाइमेक्स तब आया जब उनकी एक गोपनीय जांच मुझे डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने सौंप दी और कहा कि मैं जांच करके रिपोर्ट  उसी दिन भले ही रात हो जाय मैं उन्हें सौंप दूं -अब मुझे तो काटो तो खून नहीं , दोनों आई ए  एस एक बॉस एक नया नया बना मित्र।  क्या  करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट।

बहरहाल मैंने जांच पूरी की जिसके लिए मुझे दिन भर मुख्यालय से बाहर कोई सत्तर पचहत्तर किलोमीटर दूर जाना पड़ा था -वापस लौटा तो जाड़े की रात के ग्यारह बज चुके थे. सीधे डी एम रेजिडेंस पर पहुंचा।  चौकीदार ने कहा साहब सो चुके हैं।  मिल नहीं सकते।   मैंने उसे खुद डी एम साहब का आदेश सुनाया और कहा कि यदि तुमने उन्हें बताया नहीं तो वे तुमसे नाराज हो जायेगें।  उसने बड़ी हिम्मत कर टेलीफोन के बेडरूम कनेक्शन का बज़र बजाया।  डी एम  साहब नाईट सूट में बाहर आये और मैंने उन्हें जाँच का लिफाफा सौंपा -उन्होंने जिज्ञासा से कुछ पूछा तो मैंने कहा सर सब कुछ रिपोर्ट में है।  और गुड नाईट कर वापस हो लिया।  उनके अपने ऊपर के विश्वास और एक मित्र के विरुद्ध की गयी जांच की एक अजीब सी मानसिक स्थिति से उबरने का प्रयास कर रह था मैं -ओह यह कैसा धर्म संकट था आज भी वह घटना याद आती है तो दिल में एक हूक सी उठ जाती हैं। 

झांसी प्रवास ने मुझे बेटे कौस्तुभ और बेटी प्रियेषा  के जन्म की सौगात भी दी। यद्यपि कौस्तुभ का जन्म स्वरुप रानी मेडिकल कालेज में और प्रियेषा का जन्म कमला नेहरू हास्पिटल इलाहाबाद में हुआ। कौस्तुभ के पहले जन्म दिन पर सेलेस्टियल रांडीवू यानि आफिसर्स होस्टल के कक्ष संख्या 18 में एक उत्साहपूर्ण जन्मदिन का आयोजन हुआ-उन दिनों वाल्ट डिस्ने के मिकी माऊस के जन्म जयन्ती की धूम थी तो कौस्तुभ के जन्म पर भी वही थीम था, वही रंग छाया हुआ था। कौस्तुभ के  घर का नाम मिकी रखा गया।  
अभी झांसी में एक और बड़ी जिम्मेदारी निभानी थी। .... जारी!

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना!

भरा था स्नेह में उसके कभी जो

बेसुधी रहती थी  हर रोज छाई

बेरुखी से अब उसी के संतप्त होना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना  

 

संयोग होगा न ऐसी अब आस कोई

मौन हैं वसंत के स्वर न उजास कोई

उसी की टेर में अब क्यों वक्त खोना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना

 

सुधि न ली मेरी कभी भी लौटकर
था मुग्ध मैं सर्वस्व जिसको सौंपकर
अब उसी पाषाण की क्या चाहना
ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना  

 

है प्रतीक्षा अब नए इक मीत की

इंद्रधनुषी कामना, नई इक प्रीति की

लौट के ना आयेगी वह क्रूर छलना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

चोरी और सीनाजोरी एक साथ? सेवा संस्मरण -15

एक दिन मैंने एक दूरस्थ जलाशय जिसका नाम पहाड़ी है का निरीक्षण करना चाहा। वहाँ के विशाल पहाड़ी उपत्यकाओं से घिरे जलाशय के निरीक्षण के बाद उसी दिन लौटना सम्भव नहीं था।  इसलिए हमने रात वहीं रुकने को ठानी।  उस समय एक मेटाडोर थी जिससे हम  मैदानी भ्रमण करते थे।  मुझे बताया गया कि पिछले कई वर्षों से किसी ने वहाँ रात्रि निवास नहीं किया है।  और जगह  भी निरापद नहीं है। मुझे अब याद नहीं है कि  वहाँ सिचाई विभाग का डाक बंगला हुआ करता था या खुद मत्स्य विभाग का  आवास मगर रात वहीं रुकने का तय हुआ। रात रुकने का सुनकर मेरे साथ  चलने वाले एक दो कन्नी काट गए।  एक अपने ही जिले के टी एन तिवारी जी इंस्पेकटर थे, जो मेरी रिश्तेदारी भी जोड़ लिए लिए थे।  भारत में हर जाति का व्यक्ति चाहे तो आसानी से अपनी जाति के किसी दूसरे दूर -निकट के व्यक्ति से अपनी  कोई न कोई रिश्तेदारी ढूंढ और साबित कर सकता है!  

 अपने एक तेज तर्रार बाबू  को भी मैंने आदेश कर  अपने साथ कर लिया और अपने उच्च कार्यालय के एक खुर्राट बाबू जो मत्स्य भोजी भी थे साथ लटक लिए।  वे मछली खाने के मामले में सदा चिर प्रवंचित ही  अपने को व्यक्त करते थे यद्यपि कोई भी शायद ही ऐसा दिन होता हो जब उनका मत्स्याहार न होता हो। अब झांसी जलाशयों का समुद्र है तो उनकी अभिलाषा सहज ही पूरी होती रहती थी। मगर मछली की उनकी चिर  बुभुक्षिता  बनी ही रहती थी।  मैंने कहा बड़े बाबू आप को तो घर बैठे ही मछली मिल जाती है तो काहें इतनी दूर जाने का कष्ट उठा रहे हैं -"साहब, पहाड़ी की मछली कभी नहीं खायी।" उनके चेहरे पर उग आयी एक अजब बेचारगी पर मैंने उन्हें भी चलने की अनुमति दे दी।  वैसे वे बिना अनुमति के भी रुकने वाले नहीं थे। 

आखिर हमारा  कारवां औचक निरीक्षण के लिए चल पड़ा।  उन दिनों मोबाईल तो थे नहीं और फोन सेवायें भी सहज नहीं थी तो औचक निरीक्षण अपनी पूरी शुचिता और प्रभाव लिए ही होते थे। पहाड़ी सेंटर पर पहुँचने पर वहाँ अपेक्षानुसार हलचल मची।  प्रभारी नागेश पाण्डेय (वही महाशय जो लखनऊ के पिकनिक  स्पॉट घटना के पात्र थे ) प्रगटे।  विस्मित से।  साहब और उनके साथ चार  पांच लोगों की टोली देख उनका माथा ठनका।  मैंने कहा, "चलिए जलाशय के लैंडिंग सेंटर (जहाँ ठेकेदार द्वारा जलाशय की पकड़ी मछलियां लायी जाती हैं और तौल होती है ) आप यहाँ आफिस में क्या कर रहे हैं।  आपको तो वहीं लैंडिंग सेंटर पर होना चाहिए था अभी।" वे बहानेबाजी पर उतर आये। मैंने कहा चलिए अब मेरे साथ। अब वे मुझे समझाने लगे कि साहब आप वहाँ तक नहीं पहुँच सकते बहुत दुर्गम रास्ता है , पैदल जाना होगा।  गाड़ी नहीं जा सकती।  मैंने पूछा  कितनी दूर है तो ठीक से बता नहीं पाये।  मेरा ड्राइवर भी मछली की आस लगाये बैठा था।  कह पड़ा चलिए साहब मैं ले चलता हूँ बहुत पहले के साहब के साथ मैं आया था।   मुझे रास्ता पता है।  मुझमें नयी नौकरी का जोश और साथ मत्स्य प्रेमियों का दल तो फिर कारवां कहाँ रुकता ? हम  चल पड़े।  

अभी कालोनी से निकल कर हम थोड़ी दूर ही मुख्य सड़क पर आगे बढे थे कि सामने से एक ट्रैक्टर ट्राली के साथ  आता दिखा। पीछे बैठे मत्स्य भोजी बोल पड़े, "साहब साहब सामने के ट्रैक्टर से मछली की ढुलाई हो रही है। " जलाशय परिसर में मछली के परिवहन को अनुबंध के मुताबिक़ चेक  किया जाना चाहिए था।  सो मैंने ट्रैक्टर रुकवा दिया।  पूरी ट्राली में मछली भरी हुयी थी। मेरे सिपहसालारों ने उसे चारो ओर  से घेर लिया।  मैंने चालान माँगा। अब चालान काटने वाले पाण्डेय तो मेरे साथ ही बैठे थे।  बिना तौल और बिना चालान मछली का मुख्य मार्ग पर परिवहन अनुबंध का खुला उल्लंघन था।  अब मुझे जब्ती की कार्यवाही करनी थी।  फिर मछलियों का  नीलाम कर प्राप्त  पैसा सरकारी खजाने में जमा करने की जिम्मेदारी। एक बड़ा टास्क! मेरे डांटने के  बावजूद मेरे साथ के स्टाफ ने अपनी मछली का इंतजाम कर लिया।  और मुझसे अगली कार्यवाही के लिए उत्कंठित हो प्रतीक्षा करने लगे।  उनका लक्ष्य पूरा हो गया था।  मगर वे अब पूरी स्वामिभक्त के साथ अधिकारी के अगले आदेश के अनुपालन में मुस्तैद और तत्पर लगे यह मुझे अच्छा लगा।  अब मुश्किल यह थी कि मछली की तौल कहाँ हो? पहली बार मुझे पता लगा कि मुख्य मार्गों पर धर्मकांटे भी होते हैं।  

 संयोग से एक धर्मकांटा पास ही था।  इन धर्मकांटों पर पूरी ट्रक /ट्रैक्टर ही तौल उठती है।  एक बार माल के साथ और एक बार माल उतार कर तो माल की सही तौल हो जाती है।  इस तरीके से मछली की तौल हो गयी।  अब बी क्लास (डेढ़  किलो से कम वजन की मेजर कार्प मछलियां जिन्हे प्रजनन का पहला  मौका नहीं मिला हो )  की मछलियां अलग की गयीं क्योकि इन पर अलग से फाईन थी।  यहीं मैंने पहली बार बड़ी बड़ी छिलकों (स्केल्स) वाली महाशेर मछली देखी।  यह मूलतः ठन्डे -पहाड़ी क्षेत्रों की मछली है और आखटकों की पहली पसंद (स्पोर्ट फिश)  है मगर नर्मदा में अपवाद तौर पर इनकी कुछ प्रजातियां मिलती हैं. पहाड़ी मध्य पदेश की सीमा पर है और महाशेर नर्मदा से पहाड़ी जलाशय तक पहुँच आती हैं। 

 महाशेर के प्रथम दर्शन पर मैं अभिभूत था मगर मुझे बहुत देर तक उसके आकर्षण में नहीं  रहना था -एक बडा काम आगे था।  मैंने नागेश पांडे को बी क्लास का पूरा विवरण बनाने को कहा।  एक एक मछली का ब्यौरा क्योकि प्रति मछली उन दिनों पांच रुपये जुर्माना   था. और वजन का मूल्य अलग. ठेकदार के चेहरे पर  हवाईयां उड़ रही थी।  वह हतप्रभ था कि यह क्या अनहोनी हो रही है -ऐसा तो  कभी हुआ ही नहीं।  अब तक उसे लग गया था कि यह नौसिखिया अधिकारी मानेगा नहीं और उसका भट्ठा बैठाये बिना नहीं छोड़ेगा।  उसने मेरे साथ के स्टाफ से खुसर पुसर शुरू की।  थोड़ी देर  बाद तिवारी जी आये और अपनी रिश्तेदारी के  दमखम   पर मुझसे बोले साहब पांच हजार रुपये दे रहा है।  (उस समय पांच हजार एक अच्छी रकम थी ) मैंने तिवारी जी से पूरी दृढ़ता से कह दिया  कि आप लोगों का टारगेट तो पूरा हो गया अब मुझे अपना टारगेट पूरा करने दीजिये।  अब मैं उन्हें यह कैसे समझा सकता था कि इतने आगे आने के बाद पीछे नहीं लौटा जा सकता था. और मुझे तब और आज भी बदनामी से बहुत डर लगता है। 

बहरहाल ठीकेदार ने भी कुछ समय बाद समर्पण कर दिया था।  उसे नोटिस सर्व की गई। जुर्माने की रसीद काटी गयी।  मछली की  नीलामी हुयी। अब तक रात हो गयी थी। हमें कालोनी में ही रुकना पड़ा।  स्टाफ ने वहीं मछली बनायी खायी और जश्न किया। बची मछलियां बर्फ में सुरक्षित कर ली गयीं।   मैं सो गया।  सुबह आँखे खुली तो कुछ उत्तेजित सी मगर फुसफुसाहट सी आवाजे सुनायी दीं।  पता लगा कि रात  में कुछ गुंडे आये थे और स्टाफ से कुछ झगड़ा झंझट हुआ और गोलियों का फायर भी हुआ था।  गोलियों के निशान दीवालों पर दिख रहे थे।  मुझे कुछ पटाखों जैसी आवाजे सुनायी तो दी थीं मगर दीवाली बिल्कुल नजदीक थी तो मैंने उसे पटाखेबाजी ही समझी। समझ में आ गया कि यह मुझे और स्टाफ को डराने की जुगत थी कि कहीं मैं आज भी न  लैंडिंग सेंटर पर जाऊं।  मगर मैं गया।   रास्ता बहुत दुर्गम  था मगर मेरी वाहन लैंडिंग सेंटर तक पहुँच ही गयी।  मगर आज वहाँ कुछ नहीं था. होना भी नहीं था।  एक बेकायदा उद्धत अधिकारी से कौन निपटता।  आज सोचता हूँ तो आश्चर्य होता है कि मैं ऐसा कदम कैसे उठा पाया था। वो अंगरेजी की एक मशहूर कहावत है न कि मूर्ख वहाँ तक  चले जाते हैं जहाँ बुद्धिमान कम से कम दो बार सोच कर जाते हैं।  

विजयी  टीम दूसरे दिन रात तक वापस झांसी पहुँची और स्टाफ के परिवार भी मत्स्य भोज से आनंदित हुए।
मगर दूसरे दिन अल्ल सुबह बड़े साहब (डिप्टी डाईरेकटर ) का बुलावा आ पहुंचा।  मैं कुछ चिंतन मग्न उनके पास पहुंचा।  "यह क्या कर डाला आपने? उनकी तीखी आँखें भी मुझसे जवाब मांग रही थी।  आप समझते नहीं , इन लोगों की पहुँच कहाँ तक है " लम्बा डिस्कसन हुआ , मैंने पूरी दृढ़ता से आख़िरी जवाब दिया था कि "सर चोरी सीनाजोरी की तरह नहीं की जानी चाहिए , लबे सड़क चोरी का माल ले जाया जाना पूरे विभाग की बदनामी है " और इस बात पर वे निरुत्तर हो गए थे.

 

रविवार, 15 दिसंबर 2013

अथ चापलूसी महात्म्य


मनुष्य की अनेक प्रतिभाओं में एक है चमचागीरी/चापलूसी। वैसे तो इस क्षमता में दक्ष लोगों में यह प्रकृति प्रदत्त यानी जन्मजात है मगर कुछ लोग इस कला को सीखकर भी पारंगत हो लेते हैं। चारण और चमचागीरी में बारीक फर्क है।चारण एक पेशागत कार्य रहा है जिसमें भांटगण मध्ययुगीन राजा महराजाओं की विरुदावली गाते रहते थे -उनका गुणगान करते रहना एक पेशा था। मगर मध्ययुगीन भांट लड़ाईयों में भी राजाओं के साथ साथ रणक्षेत्र में जाते थे और इसलिए भट्ट कहलाते थे -भट्ट अर्थात वीर! लगता है भट्ट से ही भांट शब्द वजूद में आया हो। आज भी जो ज्यादा भोजन उदरस्थ करने का प्रताप दिखाता है भोजन भट्ट कहा जाता है। 

अब वैसे तो चारण का  हुनर एक पेशागत कर्म नहीं रहा मगर आज भी  लोग बेमिसाल उदाहरण अपने स्वामी/ आका को खुश करने के लिए देते ही रहते हैं. ताजा उदाहरण एक राजनेता का है जिसमें उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को सारे राष्ट्र की माता का अयाचित, अनाहूत दर्जा दे दिया। लोगबाग़ विस्मित और उल्लसित भी हो गए चलो चिर प्रतीक्षित राष्ट्रपिता की कोई जोड़ी तो बनी।

चापलूसी थोडा अधिक बारीक काम है। यह प्रत्युत्पन्न बुद्धि, हाजिरजवाबी या वाग विदग्धता(एलोक्वेन्स )  की मांग करता है।वक्तृत्व क्षमता (रेटरिक )  के धनी ही बढियां चापलूस हो सकते हैं। परवर्ती भारत में बीरबल को इस विधा का पितामह कह सकते हैं। वे अपने इसी वक्तृता के बल पर बादशाह को खुश करते रहते थे। पूर्ववर्ती भारत में तो यह विधा सिखायी जाती थी। महाभारत में ऐसे संकेत हैं।आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चापलूसी के उदाहरण मिलते ही रहते हैं मगर उनका स्तर घटिया सा हो चला है। 

बॉस को खुश करने के लिए ऐसे बेशर्मी से भरे खुले जुमले इस्तेमाल में आते हैं कि आस पास सुनने वाले को भी शर्मिदगी उठानी पड़ जाती है -अब चापलूसी में वक्तृता का पूरा अभाव हो गया है। और वैसे ही आज के  बॉस हैं, जो चाहे राजनीति में  हों या प्रशासनिक सेवा में बिना दिमाग के इस्तेमाल के कहे गए "सर आप बहुत बुद्धिमान हैं " जैसे वाक्य पर भी  लहालोट हो जाते हैं. मतलब गिरावट दोनों ओर है -चापलूसी करने वाले और चापलूसी सुनने वाले दोनों का स्तर काफी गिर गया है।


वैसे शायद ही कोई होगा जिसे अपनी प्रशंसा अच्छी न लगती हो। मगर वह सलीके से की तो जाय। बेशर्म होकर केवल चापलूसी के लिए चापलूसी तो कोई बात नहीं हुयी। यह एक कला है तो कला का कुछ स्तर तो बना रहना चाहिए। कभी कभी मुझे कुछ लोग कह बैठते हैं 'मिश्रा जी आप बहुत विद्वान् आदमी हैं' मैं तुरंत आगाह हो उठता हूँ कि ऐसी निर्लज्ज प्रशंसा का आखिर असली मकसद क्या है? कोई न कोई स्वार्थ जरुर छिपा होता है इस तरह की स्तरहीन चापलूसी में। मगर मैं हैरान हो रहता हूँ जब मैं पाता हूँ कि कई ऐसे सहकर्मी अधिकारी हैं जिन्हे अपने मातहत से  चापलूसी सुने बिना खाना ही हजम नहीं होता। उन्हें चापलूसी करवाते रहने की आदत सी पडी हुयी हैं। कुछ तो चापलूसी करने वाले स्टाफ को अपने साथ ही लगाए रहते हैं और उसे अवकाश पर भी जाने देने में हीला हवाली करते हैं। बिना चापलूसी के दो शब्द सुने उनका दिन ही नहीं कटता। 
चापलूसी सुनने का ऐसा व्यसन भी तो ठीक नहीं !

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

झांसी में कबूतरों का आतंक और मछलियों का क्लोज सीजन - (सेवाकाल संस्मरण -14 )

झांसी में तनहा रहते हुए कुछ समय ही बीता था कि पत्नी को  साथ रखने का कर्त्तव्यबोध/इंस्टिंक्ट  तीव्र हो उठा। संयोग से एक इलाहाबादी मित्र के सम्पर्क सहयोग से सीपरी के पास आवास विकास कालोनी में तीन कमरे का आवास मिल गया  और मैंने  घर से पत्नी को लाकर अपनी दिनचर्या नियमित कर ली। मगर तब वहाँ चोरियां बहुत होती थीं और चोरों का डर हमेशा बना रहता।  पास में ही पहुंज जलाशय था जिसमें  मछली मारने का ठेका मत्स्य विभाग देता था।  लोग बताते कि वहाँ 'कबूतरों' का अड्डा है जो रात  बिरात कालोनी तक भी धावा बोल देते हैं .आये दिन अख़बारों में भी  छपता कि कबूतरे ये ले उड़े, वे ले उड़े। 

एक दिन सुबह सुबह पहुंज जलाशय का एक मछुआ भागता हुआ आया और हाँफते हाँफते बोला साहब कबूतरे जाल (मछली का जाल ) उड़ा  ले गए. मुझे सहसा तो माजरा ही समझ में  नहीं आया और वो चित्रमय कहानी याद आ गई जिसमें एक बहेलिये के पूरे जाल को कबूतर ले उड़े थे। मगर  बाद में बात समझ आयी कि झांसी में कबूतरे दरअसल लूट मार कर जीविका  चलाने वाले आदिवासी समूह हैं जिनका उस समय आतंक रहता था। पता नहीं अब भी वे हैं या नहीं। मगर उनका एक आभार है मुझ पर। 

 एक दिन मैंने  जिलाधिकारी महोदय से बड़े ही अनुरोधपूर्वक कबूतरों के करतूतों का हवाला देते हुए  अपने लिए सरकारी आवास ऐलाट करने की दुबारा गुहार लगायी। इस बार सुनवाई आखिर हो ही गई।  और मुझे आफिसर्स होस्टल एलाट हो गया -कक्ष संख्या अट्ठारह, द्वितीय तल जिसका मैंने नाम रखा था -"द सेलेस्टियल राण्डिवू (आकाशीय मिलन -स्थल ) . आफिसर्स होस्टल की लोकेशन बहुत अच्छी है। बगल में जिलाधिकारी आवास और सर्किट हाऊस यानि वी वी आइ पी लोकेलिटी। सरकारी आवासों की एक अच्छी बात है कि वहाँ सरकारी कर्मियों का एक 'मर्यादित' और निःशंक परिवेश मिलता है।  जबकि अन्यत्र रहने पर न  जाने कैसे कैसे लोगों की आवाजाही आस पास बनी रहती है। आप तब ईजिली अप्रोचेबल होते हैं. पत्नी भी अब काफी खुश थीं -उनका महिला साम्राज्य अब विकसित होने लगा था और अब वे  आवास विकास कालोनी के नीरस परिवेश से मुक्त हो गयी थीं।  पड़ोसनों का दैनिक 'बात व्योहार' आरम्भ हो गया था। एक दो की याद तो पत्नी को अभी भी है और मुझे भी ।
झांसी संस्मरणों के लिहाज से मेरे लिए आज भी बहुत समृद्ध है।  मगर दुविधा यही है कि क्या छोडूं क्या जिक्र करूं? और बहुत सम्भव है कि बहुत कुछ भूला भी हो जो महत्वपूर्ण हो और कम जरूरी बातें याद हों।  याद आता है कि तब कांग्रेस की सरकार सूूबे में थी और हमारी कैबिनेट मंत्री थीं श्रीमती बेनी बाई जी जो वहीं झांसी शहर की ही रहने वाली थीं।  मुझे कोई ऐसा वाकया याद नहीं पड़ता जिसमें उनके नगरागमन पर हमें कोई असहजता या समस्या झेलनी पडी हो।  वे प्रायः घर आतीं मगर उनका यह दौरा निजी ही होता था और सरकारी अमला जामा बस प्रोटोकाल में आते जाते  बस उन्हें नमस्कार करने की ही जहमत उठाता। यह नहीं कि अनावश्यक भीड़ भाड़ और उसे सम्भालने, खाने पीने की जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों की रहती ।  तब सरकारी सेवायें एक हद तक अनेक आडम्बर और अनुचित आग्रहों से मुक्त थीं -कम से कम मत्स्य विभाग तो उनके आने पर चैन की वंशी बजाता  रहता।  

हाँ एक बार मैं तलब किया गया था. बात यूं थी कि उत्तर प्रदेश मत्स्य अधिनियम 1948 में उन प्रजननकारी  मेजर कार्प मछलियों के शिकार पर माह जुलाई और अगस्त में प्रतिबन्ध था जो डेढ़ किलो से नीचे थीं और जिन्हे एक बार भी पहले प्रजनन का मौका न मिला हो।  यह मत्स्य संरक्षण के लिए एक जरूरी प्रावधान था और अपने अकादमीय रूचि के कारण मैं इस प्रावधान को कड़ाई से लागू करने के लिए सक्रियक की भूमिका में आ गया।  जबकि अनुभव ने  बार बार यह सिखाया है कि सरकारी नौकर को अपने दायरे का अनावश्यक अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।  मैंने ऐसी मछलियों की बाजार में भी बिक्री पर कड़ाई से प्रतिबन्ध लागू किया।  औचक छापे मारे।  जुर्माने लगाये और रसीदें दीं - पहली बार झांसी के मछली बाजार में हड़कम्प मच गया।  मेरे मंडलीय अधिकारी वीरेंद्र कुमार जी ने मेरी  अति सक्रियता पर थोडा लगाम लगाना चाहा -मगर तब तो नया जोश और कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। 

 मेरा अभियान चलता गया।  मेरे पास आकर्षक आफर आने लगे।  मत्स्य व्यवसायियों ने 'प्रिवी पर्स' का प्रस्ताव दिया।  कई बार मन भी डिगा।  मगर नैतिकता कचोटती -क्या इसी के लिए इतना आगे बढे थे।  मैंने दृढ हो सभी प्रलोभनों को ठुकराया। और तब थक हार कर मछुआ समुदाय के लोग माननीय मंत्री जी के पास फ़रियाद लिए जा पहुंचे और उन्हें मछली के मुसलमान व्यवसायियों ने भी सपोर्ट किया।  मेरी पेशी हुयी।  मैं  किंचित घबराते हुए मंत्री जी के पास गया  मगर उन्होंने बहुत ही सहज आत्मीय तरीके से कहा कि " ऐ डी एफ (असिस्टेंट डाइरेक्टर फिशरीज ) साहब, आप गरीबों को क्यों सता रहे हैं? उन बिचारे लोगों के पेट पर लात मत मारिये "  अब मैं उन्हें कैसे समझाता कि कि अगर इसी  तरह प्रजनन काल में मछलियों को मारा जाता रहा तो एक दिन इन मछुआ परिवार के वंशजों को नदियों में मछली ही नहीं मिलेगी  और उनका जीवन निर्वाह मुश्किल हो जाएगा -पर्यावरण की कोई भी क्षति आखिरकार मनुष्य को ही प्रभावित करती है।  मगर इतना तो विवेक मुझे था कि यह बात लोकतंत्र के चुने प्रतिनिधियों को न तब और न अब भी समझा पाना मुश्किल है।बहरहाल मैंने कोशिश तो की मगर शायद सफल नहीं हुआ और यह मामला डी एम  साहब के छोर पर जा पहुंचा।  और मेरी पेशी वहाँ भी हुई। 

अब तक नए डी एम  साहब पी उमाशंकर जी आ चुके थे तो आंध्र प्रदेश मूल के आइ ए  एस थे और उन्हें  वस्तुस्थिति से अवगत कराना मुझे आसान सा लगा।  मैं ऐक्ट की प्रति उनके सामने ले गया था और प्रावधानों को उन्हें दिखाया और तब उन्होंने जिले के पुलिस अधीक्षक को भी यह कह दिया कि प्रजननकारी मछलियों को पकड़ने बेंचने में अगर मत्स्य विभाग का कोई कर्मी मदद मांगता है तो पर्याप्त आवश्यक पुलिस बल भी दिया जाय। मेरा मनोबल बढ़ा। मेरी शिकायत तत्कालीन निदेशक वीरेंद्र कुमार जौहरी साहब के यहाँ भी हुयी और उन्होंने जिलाधिकारी से जांच की अपेक्षा की और जिलाधिकारी महोदय ने मुझे क्लीन चिट  दे दिया।  यह तब की बात थी जब ज्यादातर उच्च अधिकारी अपने मातहतों के मनोबल  को ऊँचा बनाये रखने का यत्न करते थे।  मुझे याद है इसी आपाधापी में अगस्त बीत गया। और प्रतिबंधित काल(क्लोज सीजन ) ख़त्म हो गया. मगर इस घटना की गूँज बनी रही और मैंने जिलाधिकारी का विश्वास जीतने में कामयाबी पायी 
जारी ...।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान

विगत लगभग एक साल से नारी अस्मिता और सम्मान को तारतार करने के ऐसे अप्रिय और शर्मनाक मामले मीडिया के जरिये चर्चित हुए हैं कि हमें खुद के सभ्य  होने पर शंका होने लगी है।  सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि कठोर दंड के प्रावधानों के बावजूद भी इन घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है। ऐसा नहीं  है कि ये मामले अशिक्षित, गंवार और जाहिल लोगों के बीच के हैं बल्कि नारी की अस्मिता से खिलवाड़ का आरोप लोकतंत्र के लगभग सभी स्तम्भों के नुमाइंदों पर लगा है -जज ,विधायक-सांसद  ,अधिकारी और पत्रकार सभी इस के दायरे में है जो खासे पढ़े लिखे और शिक्षित हैं। आखिर सामजिक स्थापनाओं की एक अहम् कड़ी बल्कि कर्णधारों  पर ऐसे आरोपों  का सबब क्या है ?

.... और आधी दुनिया पर भारत में यह क़यामत क्यों बरपा हुयी है। इस अत्यंत ही विषम समस्या के  पहलुओं पर गहन विचार विमर्श और उनके कारणों और निवारण पर उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यवाही समय की मांग है।  मात्र  कानूनी प्रावधान -दंड व्यवस्था के बल पर इससे निजात मिलना मुश्किल लगता है।  इस समस्या के मूल कारणों के सभी सामाजिक ,आर्थिक और जैवीय पहलुओं को गम्भीरता से समझना होगा।  मीडिया ट्रायल या नारी समर्थकों की अति सक्रियता भी इसे प्रकारांतर से उभार ही रही हैं ऐसा लगता है। 

 मुझ पर अपनी बातों की बार बार पुनरावृत्ति के आरोप की कीमत पर भी जैवीय पहलुओं को यहाँ इंगित करना मैं जरूरी समझता हूँ -नारी का प्राचीन मानवीय सभ्यता में घर के भीतर तक सीमित रहने का रोल सभ्यता की प्रगति के साथ तेजी से बदला है।  अब नारी का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित न रहकर उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत हो चला है -डेजमांड मोरिस जैसे विश्व प्रसिद्ध जैव व्यवहार विद के शब्दों में कहें तो नारी अब पुरुष के बाहरी विस्तृत  "आखेट के मैदान " में उसकी बराबर की सहभागी बन रही है।  यह एक बड़ा रोल रिवर्जल है। उसका नित एक्सपोजर अब एक बड़े " आखेट के मैदान" में हो रहा है।  और यहाँ उसका सामना विभिन्न हैसियत के पुरुषों से हो रहा है। 

मनुष्य का विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। पुरुष ऐसे जैवीय आकर्षणों या यूं कहिये "जैव कांपों" (बायो ट्रैप ) से बच नहीं पाता, सहज ही फंसता है ।  इस मामले में उसका आचरण ज्यादा मुखर  होता है।  प्रकृति ने उसे सम्भवतः ऐसा ही बनाया है क्योंकि ऐसा होने में उसके सामने कोई जैवीय या सामाजिक रिस्क नहीं है।जबकि नारी का लम्बा प्रसव काल और  शिशु के लम्बे समय तक पालन पोषण उसके लिए सबसे बड़ा बंधन है , इसलिए प्रकृति ने उसे विपरीत सेक्स के प्रति जब तक कि उसकी संतति के लालन पालन के लिए एक जिम्मेदार सहचर न मिल जाय प्रायः उदासीन ही बना रखा है।  मगर पुरुष की ऐसी  किसी बाध्यता के न होने से उसके यौनिक आग्रह प्रायः ज्यादा मुखर होते हैं।  यह एक बड़ी असहज स्थिति है.  जानवरों में तो मादा के चयन के लिए बाकायदा भयंकर शक्ति का प्रदर्शन होता है और जो सबसे बलिष्ठ होता है वही मादा को हासिल करता है।  वहाँ  पूरी तरह जैवीय -कुदरती व्यवस्था लागू है। मगर मनुष्य ने शादी विवाह के कई सामाजिक पद्धतियों को वजूद में ला दिया है।   वह आज भी एक तरह से अपनी उसी आदि आखेटक की भूमिका और बलिष्ठ नर होने का गाहे बगाहे प्रदर्शन का 'कु -प्रयास' कर बैठता है। 
 
 मनुष्य ने विकास क्रम में अपनी एक सामाजिक व्यवस्था  विकसित की है और कई कायदे क़ानून बनाये हैं।  स्त्री पुरुष के ऐसे ही जैवीय लिहाज से भी अनुचित संसर्गों से बचने के लिए धर्म में  स्त्री के पर्देदारी ,यौनिक दृष्टि से परिपक्व विपरीत लिंगियों यहाँ तक कि पिता पुत्री तक के एकांतवास पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं।  धार्मिक साहित्य में स्त्री से दूर रहने के लिए ऐसे तमाम निषेध हैं और उसे जानबूझकर कर दुखों और अपयश की खान तक कह  डाला गया है।  कहा गया है कि नारी संसर्ग/प्रसंग पुरुष के ज्ञान -बुद्धि सभी को नष्ट भ्रष्ट कर देने वाला है।  इसका अभिप्राय केवल यही लगता है कि विज्ञ जन नारी से दूर रहें -उनके आकर्षण से बचें।  

पूरी दुनिया में नारी के पुरुष से कंधे से कंधा मिलाकर चलने के चलन ने हमें 'सभ्य युग' के  कई शिष्टाचार के पाठ भी पढ़ाये हैं।  कंधा से कंधा मिलाना महज एक अलंकारिक उक्ति है जबकि सामाजिक रहन सहन में उंगली भी छू जाय तो शिष्टाचार का तकाजा है कि तुरंत सारी बोला जाय।  मगर बायोट्रैप का क्या कहिये, बसों रेलों में ईव टीजिंग की घटनाएं होती रहती हैं।  जाहिर है पुरुषों के लिए जैव कांपों से खुद को बचने का सलीका अभी आया नहीं है।  बहुत प्रशिक्षण और कठोर पारिवारिक संस्कारीकरण की जरुरत बनी हुयी है. ऐसे में कार्य स्थल जो मनुष्य के आदिम आखेट स्थलों के नए स्वरुप हैं में नारियों को भी कई सुरक्षा और सावधानियों का अपनाना जरूरी है। यहाँ मैं नारीवादियों की उन्मुक्त रहन सहन के बड़े दावों से सहमत नहीं हूँ।  अनेक दुखद घटनाएं हमें बार बार चेता रही हैं कि आज कार्यस्थलों पर नारी के भी आचरण को मर्यादित रखने के प्रति सजग होना होगा। अनावश्यक प्रदर्शनों जिसके कि अनजाने ही गलत अर्थ -जैवीय संकेत निकलते हों के प्रति सावधानी अपेक्षित है।  

पुरुषों के लिए तो खैर कार्यस्थलों पर आचार विचार के लिए कठोर दण्ड के कानूनी प्रावधान लागू हो ही गए हैं मगर साफ़ दिख रहा है कि इससे भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।  इस समस्या की जड़ें कही और है और हम  कहीं और समाधान के प्रयास कर रहे हैं।  भारत में कार्यस्थलों पर विशाखा प्रावधानों के लागू होने के बाद तो स्थिति पुरुष सहकर्मियों के लिए काफी निषेधात्मक और चेतावनीपूर्ण हो गए हैं।महिला सहकर्मी के किस हाव भाव या उपक्रम को गलत समझ कर प्रतिवाद हो जाय यह भी असहज सम्भावना बनी हुयी है।  इसलिए आज पुरुष सहकर्मियों को भी कार्यस्थलों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरुरत है। बस काम से काम उनका मंतव्य हो, जैवीय 'काम' से बस दूर से ही नमस्कार! अन्यथा बस फजीहत ही फजीहत है। नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान! 

रविवार, 1 दिसंबर 2013

कोई अधिकारी ऐसा तो है जो मुझसे बहस करने की हिम्मत रखता है( सेवाकाल संस्मरण -13)

यादों के वातायन में वापस लौटता हूँ वर्ष 1988 में,झांसी। मैं इस मामले में शायद अतिरिक्त रूप से सजग था कि "झांसी गले की फांसी" है, मगर इस बारे में आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह  कहावत है क्यों?   जिस किसी से पूछता वह अपनी अलग व्याख्या देता।  कोई कहता कि बुंदेल खंड में ट्रांसफर होने के बाद पूरे सर्विस पीरियड में वहीं रह जाना पड़ता है।  मेरे सामने ऐसे मामले आये जिसमें 14 साल यानी एक पूरी  वनवास  अवधि कई स्टाफ वहीं गुजार चुके थे जबकि वे रहने वाले पूर्वांचल के थे।  पूर्वांचल का मैं भी था तो मुझे भी आशंका होती कि कहीं मैं भी वहीं का न होकर रह जाऊं।  मुझे वहाँ सहायक निदेशक का प्रभार मिला था जिसके आहरण और वितरण का दायित्व उप निदेशक मत्स्य को था -एक तरह से यह  अनुचित आदेश था क्योकि मैं खुद एक राजपत्रित अधिकारी था।  मगर मौलिक पद व्याख्याता का होने के कारण उच्च अधिकारी मुझे आहरण वितरण का दायित्व देने से कतराते थे जबकि वित्तीय नियमों के अधीन यह एक स्पष्ट व्यवस्था है कि आप जिस पद का काम करेगें आपको उस पद का वित्तीय अधिकार भी होना चाहिए। 

 उन दिनों और अब भी लगभग सभी जनपदों में वर्ल्ड बैंक के सहयोग से एक और योजना आरम्भ हुयी थी -मत्स्य पालक विकास अभिकरण जिसके अध्यक्ष जिलाधिकारी (अब जिला पंचायत अध्यक्ष ) होते थे और मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक सचिव होते हुए इस स्वयं शासी संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी ई ओ ) होते थे /हैं।  मुझे तब इस पद यानि सी ई ओ का पूरा वित्तीय अधिकार दिया गया था।  तब किसी भी संस्थान का सी ई ओ एक तोप  माना जाता था।  मैंने ठाठ से इस पदनाम से एक विजिटिंग कार्ड भी छपवा लिया था।  तब तो कई साध और शौक और भी थे  और साथ थी पूरी  अपरिपक्वता :-) ।  लोग बाग़ सुनते कि मैं कहीं का सी ई ओ हूँ तो ज्यादा तवज्जो देते और व्याख्याता कहने पर कोई ख़ास तवज्जो नहीं देते।  धन्य है हमारा परिवेश और समाज! 
हलाँकि तब मेरे मंडलीय अधिकारी /उप निदेशक मत्स्य वी कुमार साहब जो आगे चलकर निदेशक मत्स्य उत्तर प्रदेश हुए,  मीठी झिड़की देते हुए  कहते कि मुझे सहायक निदेशक मत्स्य ही लिखना और प्रगट करना चाहिए मगर  मेरा  जवाब रहता कि उस  पद का पूरा अधिकार ही मेरे पास कहाँ था।  वे कहते कि नहीं पूरे जनपद का प्रभार आपके पास ही है।  और मुझे इस द्वंद्व में नहीं रहना चाहिए अन्यथा मेरी कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।   मगर कहने से क्या होता था, मुझे असलियत तो पता ही थी।  मेरे बाबुओं ने आखिर एक दिन इस मामले में एक असहज स्थिति उत्पन्न कर ही  दी.  उन्होंने मुझे पता नहीं कैसे यह कन्विंस कर लिया कि सहायक निदेशक मत्स्य के रूप में मैं चतुर्थ श्रेणी यानि  मछुआ के पदों पर कार्यरत कर्मियों का ट्रांसफर कर सकता हूँ और मुझसे एक दो नहीं कोई आधा दर्जन मछुओं का ट्रांसफर करा दिया।  हड़कम्प मचना ही था सो मचा।  बाबूओ ने ट्रांसफर हुए स्टाफ पर अपनी खुन्नस मेरे जरिये निकाली थी।  आदेश के एक दो दिन बाद ही वी कुमार साहब ने मुझे तलब कर लिया।
आपने यह क्या कर डाला? मैंने दृढ़ता से उत्तर दिया 'सर, जनपदीय अधिकारी के अधिकार से मैंने वे ट्रांसफर किये हैं ,अब क्या जनपदीय अधिकारी को यह भी अधिकार नहीं है ? " वे कन्विंस नहीं थे ," यह अधिकार केवल उप निदेशक और उच्च अधिकारियों को है, सहायक निदेशक को नहीं " अब मैं असहज सा हुआ, "यानि कि सहायक निदेशक को जिस पर पूरे जनपद की जिम्मेदारी है को अपने चतुर्थ श्रेणी के कर्मियों को एक जगहं से दूसरी जगह पदस्थ करने का अधिकार नहीं है ? " "बिलकुल नहीं है और यह करके आपने अधिकार सीमा का ऊल्लंघन किया है और यह दंडनीय है " अब मुझे काटो तो खून नहीं और विस्मित सा अलग।  "चलिए मैं इसे अनदेखा करता हूँ मगर आईन्दा आप अपने अधिकारों के ऊपर जाकर काम नहीं करेगें और बाबुओं के प्रस्ताव पर सजगता से और विभागीय निर्देशों की पूरी जानकारी करके ही निर्णय लिया करिये।" मेरी नयी नौकरी पर यह उनका उदार निर्णय था।  वे अभी भी हैं हालांकि सेवा निवृत्त और कभी कभी फोन पर मेरी हाल चाल लेते रहते हैं।
उनसे कई बार बहस भी हो जाती थी क्योकि मत्स्य विभाग में सहायक निदेशक यानि जनपदीय अधिकारी को जिम्मेदारी तो बहुत दी गयी है मगर कोई भी प्रशासनिक अधिकार नहीं है -न तो किसी भी तरह दंड देने का और न ही ट्रांसफर करने का।  उस पर अपेक्षा यह की जाती है कि वह अपने अधीनस्थ पर यथेष्ट नियंत्रण रखे।  और यह व्यवस्था विगत तीस वर्षों में जस की तस है, जो प्रशासनिक समस्या मेरे सामने तीस वर्ष पहले थी वही आज भी है।  इन्ही मुद्दों को लेकर मेरी तत्कालीन उप निदेशक वी कुमार साहब से तल्ख़ बहसें भी हो जाती थीं मगर वे एक परिपक्व और बड़े विजन के अधिकारी थे और मुझे डांटने के बजाय दूसरों से मेरी बड़ाई ही करते और कहते ," कम से कम कोई अधिकारी ऐसा तो है जो मुझसे बहस करने की हिम्मत रखता है " और मैं जब यह सुनता तो लज्जित सा हो उठता।

उनके साथ मेरे संबंध उत्तरोत्तर अच्छे बनते गए थे और जब वे निदेशक बने तो भी उनका वही स्नेह मुझे मिलता। एक बार तो लखनऊ जाने पर मुझे अपनी राजकीय कार में बिठा कर हजरतगंज ले गए और जनपथ की तब एक निर्जन  सी  चाट के दुकान  पर मुझे गोलगप्पे खिलाये और खूब बतकही की -मैं तब बनारस  जनपद में सी ई ओ था मगर उनके हाव भाव में कहीं भी निदेशक होने का भाव नहीं था -एक गाइड एक अभिभावक के रूप में ही वे दिखे बल्कि  मित्रवत भी।  ऐसे अधिकारी अब कितने कम से कमतर होते गए हैं।
जारी ……

रविवार, 24 नवंबर 2013

मोक्ष का मार्ग मछलियां (सेवाकाल संस्मरण- 12 )

लगता है चिनहट ,लखनऊ तक की याददाश्त तो अभी भी  तरो ताजा है मगर झाँसी प्रवास की यादें कुछ धुंधलाई हुयी सी हैं। फील्ड में मेरी यह पहली पोस्टिंग थी तो काफी रोमांच भी था और एक चुनौती भी।  झांसी में   सिंचाई विभाग के बड़े बड़े जलाशय/बांध हैं जिनसे  मछली पकड़ने का काम ठीके पर देने का काम मत्स्य विभाग का  है और उनकी नीलामी होती रहती है।  अगर आप से पूंछे कि झील(लेक ) और जलाशय (रिजर्वायर) में क्या अंतर है तो आप क्या बतायेगें? चलिए मैं स्पष्ट करता चलूँ? झीलें बहुत पारम्परिक और अमूमन कुदरती होती हैं जबकि जलाशय/बांध सिचाई के लिए मानव निर्मित। अगर पूरे प्रदेश की बात करें तो सबसे अधिक जलाशय झाँसी में हैं -मतलब मत्स्य सम्पदा भी यहाँ सबसे अधिक है। 

 मैंने झांसी मंडल को जलाशयों का समुद्र माना है -जनपद के जलाशयों के नाम मुझे आज भी याद हैं जो मेरी देखरेख के अधीन थे -पहुंज ,बड़वार ,पहाड़ी ,लहचूरा,  माताटीला ,पारीक्षा आदि। और ख़ास बात है कि मत्स्य सम्पदा के मामले में हर जलाशय की अपनी एक विशेषता थी  -जैसे पहुँज  में कुर्सा नामकी मछली की बहुतायत थी ,पारीक्षा में सादे पानी के जल दैत्य गोंछ की जो सड़ी गली लाशों की भी शौक़ीन है। मेरा एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था जो पारीक्षा से अपना ट्रांसफर नहीं चाहता था और उसकी अंतिम इच्छा थी कि उसे मरने के बाद पारीक्षा जलाशय में फेंक दिया जाय और गोंछ मछलियां उसे खा खा कर शव का निपटान करें -अपनी अंतिम इच्छा बताते वक्त वह बहुत ईमानदार दिखता था।  उससे मैं पूंछता कि वह ऐसा क्यों चाहता था तो वह जो कुछ बताता और मैं समझ पाता उसके मुताबिक़ यह उसके मोक्ष का सहज मार्ग था।  मछलियों के माध्यम से मोक्ष! अब तक न कहीं पढ़ा और न सुना था।  

इसी तरह पहाड़ी जलाशय जो मध्य प्रदेश के बार्डर पर था में सबसे पहले मैंने महाशेर मछली देखी जिसे अब तक केवल पहाड़ों पर मिलने वाली मछली मैं जानता था। इसके शल्क (स्केल ) काफी बड़े होते हैं और यह एक नायाब स्पोर्ट फिश है और भारत में एंगलर की पहली पसंद। इसमें चर्बी कंटेंट अधिक होता है इसलिए यह अन्य मछलियों की तुलना में स्वाद ग्रंथियों को ज्यादा संवेदित करती है।  अभी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में वाईस चांसलर वी एन राय साहब से मैं जब मिला तो उन्होंने मुझे याद दिलाई कि किस तरह मेरी आगे की इलाहाबाद पदस्थता में मेरे हस्तक्षेप के बाद  यह रहस्योद्घाटन हुआ  था कि उनके कुछ इलाहाबादी मित्र उन्हें डिनर पर महाशेर के नाम पर सूअर का मांस परोसते आये थे :-) बहरहाल महाशेर से मेरी पहली मुलाकात सनसनीखेज थी जिसका जिक्र आगे होगा।  

लहचूरा जलाशय झांसी जनपद का दूरस्थ का जलाशय है और वहाँ कतला मछली ख़ास थी।  जलाशयों के ठीकेदार तब ही काफी धनाढ्य लोग थे और एक माफिया सा था उनका जो जलाशयों से मछली का अच्छा ख़ासा व्यवसाय करता था।  तब मछली निकालने का कोटा फिक्स था और उसके ऊपर मछली अनुबंध के मुताबिक़ नहीं निकाली जा सकती थी.  अनुबंध के मुताबिक़  प्रमुख मछलियों जैसे रोहू कतला  और नैन को भी बिना एक बार बच्चा दिए (प्रजनन ) नहीं पकड़ा जा सकता था।  यह बी क्लास कहलाता था/है ।  मैंने झाँसी पहुँचने के पहले यह सब थोडा अध्ययन कर लिया था मगर यह ज्ञान मेरी मुसीबत भी बना।ज्ञान पापतुल्य भी बनता है कभी कभी सचमुच (नालेज इज सिन :-) ।  

  कभी कभी लगता है अधिकारी के पद पर चयन के बाद अधिकारी को पठन पाठन से क्या मतलब? उसे तो आफिस के बड़े बाबू जहाँ कहें चिड़िया (हस्ताक्षर ) बना /बैठा देना चाहिए -आखिर वह उस आफिस में अधिकारी से ज्यादा अनुभवी ,व्यावहारिक ज्ञान वाला होता है।  मैंने देखा है कि मेरे कई साथियों और प्रशासनिक सेवाओं के बहुत से अधिकारी भी बड़े बाबू के सहारे ही सेवाकाल  की वैतरिणी पार करने में लगे रहते हैं।  

मैंने जब ज्वाइन किया तो जनपद में हमारे मंडलीय अधिकारी वी कुमार साहब थे और जिलाधिकारी श्रीमती मजुलिका गौतम जी थीं। मेरे सेवाकाल की पहली जिलाधिकारी।  मैंने पहुँचते ही उनसे सरकारी आवास की फ़रियाद की।  उन्होंने आश्वस्त किया कि देखते हैं खाली होने पर मिल जाएगा।  पत्नी पैतृक घर जौनपुर में थीं तो बिना  आवास की सुविधा के उन्हें लाया नहीं जा सकता था. आज तक भी प्रदेश सरकार में सभी कार्मिकों के लिए सरकारी आवास का न होना खटकता है।  यह एक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर है जिसकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए।  मजबूरी में सरकारी मुलाजिम को इधर उधर जाकर रहना पड़ता है जो उसके कार्यक्षमता और माहौल के अनुकूल नहीं होता।  मगर मजबूरी -मैंने फिलहाल एक कमरे का टेम्पररी आवासीय प्रबंध कर लिया।  जो महारानी लक्ष्मीबाई  के किले के आस पास ही था।  और बनावट ऐसी कि मुझे लगता था  कि इससे अच्छा तो किले के ऊपर ही किसी गुहा गह्वर को खोज कर रह  लिया जाय।  

शहर कोई ख़ास विस्तारित नहीं था तब। मुख्य बाजारों में सीपरी , मानिक चौक और मिलटरी क्षेत्र का सदर बाज़ार तो मुझे हजरतगंज की याद दिलाता था ,. बेहद साफ़ सुथरा और चमाचम।  शाम को घूमने जाते तो लगता था कि  हजरत गंज अपने  एक लघुरूप में साकार हो गया हो और मिलटरी की मेम साहिबाओं का ठाठ बात देखकर तो आँखें चुंधिया जाती थीं -एक तरह के वैभव और ऐश्वर्य का आभास भी होता था।   अब पता नहीं सदर क्षेत्र कैसा है? झाँसी के कोई ब्लॉगर मित्र बतायेगें क्या? मेरा आफिस मध्य में एलाईट चौराहे पर था. और मजे की बात यह कि झांसी में रिक्शे नहीं दीखते थे -पहाड़ी का ऊँचा नीचा क्षेत्र होने के कारण वहाँ ऑटो रिक्शा ही चलता  था भले ही कितनी कम दूरी तक ही जाना हो।  यह मुझे बड़ा ही कौतूहल पूर्ण लगता था।  जारी … 

बुधवार, 20 नवंबर 2013

सभी पुरुष एक जैसे ही होते हैं..... ललित निबंध

सभी पुरुष एक जैसे ही होते हैं..... यह एक ऐसी बात है जिससे  महिलायें ख़ास तौर पर नारीवादी सक्रियक  झट से सहमत हो लेती हैं। उनके लिए यह सार्वभौमिक सत्य है। वे फरेबी होते हैं, झूठे होते हैं वादा करके मुकर जाते हैं।  रूहानी लगाव के बजाय बस रूप सौंदर्य के दीवाने होते हैं।  उनकी चाहतें यकसाँ  ही होती हैं। हर मायनों में सभी समान होते हैं और उनमें भी कुछ और भी ज्यादा समान होते हैं।  यहाँ तक कि अलग से दिखने वाले (नारीवादी पुरुष) भी अंततः आखिर पुरुष ही साबित होते हैं।  मुझे भी यह वाक्य गाहे बगाहे सुनना ही पड़ता रहा है।  अब लाख समझाईये कि नहीं अपुन तो भीड़ से बिल्कुल अलग हैं.एक नायाब पुरुष पीस हैं मगर उनके चेहरे का अविश्वास इतना अटल रहता है कि कभी कभी और अब तो अक्सर ही खुद भी अपने बारे में शक होने लगता है कि कहीं हम भी वाकई 'सभी पुरुषों' की ही श्रेणी में तो नहीं आते -सोचते हैं खुद को कहीं आजमा के देख ही लिया जाय कि अपनी असलियत आखिर है क्या ? वालंटियर्स चाहिए।  

मैंने कभी ,मतलब अंतर्जाल में पहला कदम रखने के दरमियान ही एक मित्र से तब इस जुमले की हकीकत को गहराई से समझने का प्रयास किया था।  इसके पहले वे इस गूढ़ रहस्य को उजागर करतीं अंतर्जाल छोड़कर ही कहीं लुप्त हो गयीं और मेरा प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया।एक आधी दुनिया के मित्र ने जब फिर इस जुमले को उछाला तो मैं जैसे इसकी मीमांसा के लिए तैयार ही बैठा  था।  मैंने अनुनय किया कि कृपा कर इसे व्याख्यायित किया जाय और बिना व्याख्या अंतर्जाल न छोड़ा जाय।उन्होंने एक चिढाऊ स्माईली बनाकर कहा कि मैं सब जानता हूँ -मैंने जवाब दिया कि मैं क्या जानता हूँ यही बता दिया जाय ताकि सत्यापित कर सकूं कि वह  सही या गलत हैं। उन्होंने बात का एक आखिरी छोर पकड़ा दिया कि आप सभी पुरुष बड़े वो होते हैं। और एक शातिराना स्माईली छोड़कर चल दी हैं -लगता है अभी बात की तह तक पहुँचने में कई चैट सेशन बीत जायेगें।  

मैं तो विज्ञान और उसमें भी जैव विज्ञान  का एक अदना सा अध्येता रहा हूँ -चार्ल्स डार्विन को अपना ईश्वर पैगम्बर सब कुछ मानता हूँ -उनके अनुसार तो विभिन्नता प्रकृति का नियम है -तो पुरुष एक जैसे तभी हो सकते हैं जब वे जुड़वां हों और वह भी एक ही निषेचित अंड की उत्पत्ति हों।  तो सभी पुरुष एक जैसे कैसे हो सकते हैं। इसलिए मेरी तो वैज्ञानिक मान्यता यह है कि सभी  पुरुष और न ही नारी एक जैसे होते हैं।  नारियां तो बिल्कुल ही एक जैसी नहीं होतीं।  बहुत फर्क होता है उनमें, यह मेरा स्वयं का सुदीर्घ अनुसन्धान है।  एक अंग्रेजी कहावत के जनक ने भी यही कहा है कि नारी नारी में बहुत फर्क होता है -" सम वीमेन ब्लश व्हेन दे आर किस्ड ,सम स्वेयर , सम काल फार पोलिस बट वर्स्ट आर दोज हू लाफ " देखिये न यह कहावत यह सिद्ध कर देती है कि नारियां अलग अलग होती हैं। मेरी इस बात से आप निश्चय ही झट से सहमत हो जायेगें :-) 
मगर मेरे एक फेसबुकिये मित्र हैं जो इससे असहमत हैं।  वे कहते हैं कि सभी नारियां भी एक जैसी होती हैं , उन्होंने अपनी पीड़ा सरे आम फेसबुक पर साझा की थी , जो याद है उसके मुताबिक़ वे अपने पुरुष दोस्तों से घनिष्ठ होते होते सहसा ही पलट जाती हैं। 

 वे कहती हैं -
१ -मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ मगर मैंने कभी उस निग़ाह से आपको देखा ही नहीं। 
2 -आप मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं मगर उसके आगे नहीं 
३- मेरे लिए मित्रता से बढ़कर दुनिया में और कुछ नहीं है मगर मित्र से मैं शादी नहीं कर सकती।  
४-दोस्ती मित्रता अपनी जगह  विवाह शादी अपनी जगह 
5 -आपने तो कभी पहले बताया ही नहीं। मैं तो किसी और के हाथों महफूज हो गयी हूँ। .

मित्र का मानना है सभी एक सा ही सोचती हैं।  एक जैसी ही हैं। तो चलिए यह मानने में क्या गुरेज कि सभी पुरुष या नारी एक जैसे ही होते हैं :-) आपकी भी तो अपनी कोई राय होगी इस मुद्दे पर या निजी अनुभव होगा तो क्यों नहीं साझा करते यहाँ? मानवता का मार्ग दर्शन होगा! 

रविवार, 17 नवंबर 2013

चिनहट से विदाई (सेवा संस्मरण -11)

चिनहट से विदाई का वक्त आ गया था।  झांसी जल्दी ज्वाइन करना था।  चिनहट के दो ढाई साल के प्रवास में कोई सामान वगैरह तो था नहीं इसलिए एक ट्रेलर वाली जीप पर पलंग रजाई गद्दा बर्तन आदि लाद  फांद और उसी पर खुद बैठ हम अपने जौनपुर के पैतृक गाँव आ गए। सामान व पत्नी को वहीं छोड़ा। और खाली हाथ झाँसी को चल पड़े। मगर रुकिए अभी कुछ बची खुंची यादें चिनहट की रह गयीं हैं, उन्हें निबटा लूं। चिनहट से बस कुछ किलोमीटर की दूरी पर कुकरैल का वन था/है।  वहाँ घड़ियालों की सैंक्चुअरी तब स्थापित हो रही थी। वन्य जीव अधिनियम 1972 के अधीन घड़ियाल और मगरमच्छ अबध्य प्राणी हैं।  इनकी तेजी से घटती संख्या को देखकर इनकी प्रजाति को बढ़ावा देने के उद्येश्य से कुकरैल में उनके प्रजनन स्थल की स्थापना की गयी. भारत में एलीगैटर नहीं मिलते।  मगरमच्छ और घड़ियाल मिलते हैं।  घड़ियाल तो गंगा और सहायक नदियों का एक मुख्य निवासी है। मैंने जब इन विशाल सरीसृपों के पुनरुद्धार की परियोजना कुकरैल में देखी थी तो सहज ही रोमांच हो आया था।  आप भी जब लखनऊ जाएँ तो कुकरैल जाकर इनका साक्षात्कार कर सकते हैं। 

चिनहट में ही पर्यटन विभाग ने एक 'पिकनिक स्पाट ' बना  रखा था।  यह शहर से काफी दूर निर्जन में होने के कारण प्रेमी जोड़ों की पहली पसंद था।  यहाँ अब तो पर्यटन विभाग ने मान्यवर काशीराम इंस्टीच्यूट आफ टूरिज्म मैनेजमेंट खोल दिया  है, मगर तब पर्यटन के नाम  पर एक कमरा था बस।  हमारे प्राचार्य महोदय ने उधर जाने की  प्रशिक्षुओं को मनाही कर रखी थी. और इसकी सूचना मुझे भी मेरे ज्वायनिंग के समय ही दे दी गयी थी।  मैं विस्मित  कि पब्लिक प्लेस पर जाने की आखिर मनाही क्यों ?कारण पूछा तो एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट और यह कहकर टाल दिया गया था कि मैं खुद जान जाऊँगा।  मगर उत्कंठा भी तो कोई चीज है। शाम होते होते मुझे पता लग गया था।  दरसअल वहाँ जोड़े एक ख़ास मकसद से आते थे और घंटे आधे घंटे कमरे में रहकर चल देते थे।  कई बार उम्र की कई बेमेल जोड़ियां भी आती थीं।  उन्हें सामने सड़क से प्रायः स्कूटर से आते और जाते हुए मैं खुद भी देखता था।  वहाँ पर्यटन विभाग का एक चौकीदार भर था।  अब आपसी सहमति से प्रगाढ़ संबंध पर किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए यह बात मेरे दिमाग में आती तो थी मगर खुद भी उधर जाने की इच्छा ही नहीं रहती थी। मेरे प्रिसिपल साहब का आदेश मेरे लिए काफी था -उनके निर्देश से वह एक प्रतिबंधित स्थान था तो था -मंजूर।  और फिर उस अंगने में मेरा क्या काम था? 

मगर घर से तीन माहों या अधिक की ट्रेनिंग पर आये युवा या अधेड़ प्रशिक्षुओं के लिए यह स्थल आकर्षण का केंद्र था। वे गाहे बगाहे उधर हो आते और प्रिंसिपल साहब की डांट  भी खाते। एक दो बार मैंने वहाँ के सेट अप ,इंतजाम आदि के लिए सरकारी शिष्टता के साथ मुआइना भी किया तो यही पाया कि लोगों की जैवीय प्रवृत्ति के शमन के बहाने से वहाँ का चौकीदार अवैध कमाई में लिप्त था।  बाद में चिनहट थाने के एक  सिपाही को भी अपना हिस्सा लेने की लत पड़  गयी तो वह अक्सर उधर ही मंडराता रहता और कमाई की फिराक में रहता।  आने वाले जोड़ों को डराता धमकाता और रकम वसूलता।  एक बार वही सिपाही  हमारे  एक प्रशिक्षु को पकड़े लगभग घसीटते प्रिंसिपल के पास ले आया।  और कहा इन्हे संभालिये।  माजरा समझने में वक्त तो नहीं लगना था मगर मेरे हस्तक्षेप पर प्राचार्य साहब ने सुनवाई शुरू की।  

गलती हमारे प्रशिक्षु की यह थी कि सिपाही अपने स्टीरियोटाइप के अनुसार जब जोड़े को डांट धमकाकर यह सुना  रहा था कि अगर उसकी (महिला ) साथी को इतना ही शौक है तो ट्रेनिंग संस्थान के सारे ट्रेनीज को वह बुला देगा -तब अपने वे अपने  प्रशिक्षु  महाशय न जाने  किस आशा और उत्साह से यह सुनते ही दूर से भाग कर वहाँ पहुँच कर व्यग्र हो उठे थे। और सिपाही हतप्रभ।  बहरहाल प्रिंसिपल साहब ने प्रशिक्षु को तो डांटा फटकारा ही मगर सिपाही को धमकाया कि अगर वह फिर इधर दिखा तो जिले के एस पी साहब से लिखित शिकायत कर दी जायेगी।इसका असर हुआ और सिपाही का दिखना बंद हो गया।  मेरे चिनहट से प्रस्थान तक वह पर्यटन स्थल बदस्तूर जीवंत था।  मगर अभी कुछ माह पहले जब मैं वहाँ गया  तो वहाँ एक विशाल बिल्डिंग वजूद में थी और  मान्यवर काशीराम इंस्टीच्यूट आफ टूरिज्म मैनेजमेंट  स्थापित हो गया है। प्रणयोत्सुक जोड़ों के प्रणय  स्थल का नामो निशान मिट गया था।

चिनहट की इन कुछ भूली बिसरी यादें आपसे साझा कर अब आपको हम  लिए चलते हैं झांसी जहाँ से मेरे नौकरी का एक नया फेज शुरू होने जा रहा था। … जारी ... 

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार.......(सेवा -संस्मरण जारी-10)

चिनहट पोस्टिंग के ही दौरान 1986 में हेली के प्रसिद्ध धूमकेतु का दर्शन मैंने वहीं के प्रदूषण और शहरी चकाचौंध से रहित ग्राम्य परिवेश से किया था।  मुझे मेरे बड़े चाचा  डॉ सरोज कुमार  मिश्रा जो नासा में वैज्ञानिक रह चुके हैं ने  पक्षी निहारण  और व्योम विहार की मेरी तब की अम्येच्योर रुचियों के चलते एक सात गुणे पचास मैग्नीफिकेशन का बाइनाक्यूलर गिफ्ट कर रखा था।  मैंने इसी से लखनऊ क्षेत्र में सबसे पहले हेली का कमेट  ढूँढा था यद्यपि  उम्मीदों के विपरीत वह बहुत धुंधला धब्बा सा लग रहा था -मैंने अखबारों में यही रिपोर्ट भेजी थी कि 'ईद का चाँद हो गया हेली" … मेरे चिनहट प्रवास के दौरान यह यादगार घटना रही इसलिए यहाँ जिक्र कर रहा हूँ। हेली कमेट फिर 75 -76 वर्ष बाद लौटेगा यानि 2061 में और तब मैं धरती पर नहीं रहूँगा -हाँ बच्चे नाती पोते अगर इस संस्मरण को कभी पढ़ेगें तो वे शायद गौरवान्वित हों ले कि उनके एक बाप दादा ने हेली के कमेट को देखा था। मगर  पता नहीं विज्ञान की मेरी अभिरुचि का मेरे वंशजों तक में संवहन होता रहेगा या नहीं।  प्रसंगवश यह बता दूं कि कुछ ऐसी भी विश्व -हस्तियाँ हुयी हैं जिन्होंने अपने जीवन काल में ही हेली कमेट को दुबारा देखा -जैसे महान लेखक  मार्क ट्वेन (November 30, 1835 – April 21, 1910)।  

जैसे ही हेली दर्शन का  रोमांच या नशा उतरा मुझे इत्तिला दी गई कि निदेशक मत्स्य से मुझे तुरंत जाकर मिलना है।  दिल की धड़कने बढ़ीं मगर जल्दी ही संयत हो गईं क्योंकि अब अज्ञात का  भय सहने की आदत सी पड़ती गई थी।अगले दिन मैं निदेशक मत्स्य से उनके चैंबर में जाकर मिला। उस समय निदेशक थे वीरेंद्र कुमार जौहरी साहब जो विभागीय सेवा से ही प्रोन्नत हुए थे।  मुझे देखते ही बोले, " झांसी जाओगे? सहायक निदेशक का पद खाली है " मेरे सामने सीमित विकल्प थे ,केंद्र सरकार में मुझे लिए जाने का मामला खटाई में पड़  गया लगता था।  मैंने एक आज्ञाकारी मातहत की तरह  हामी दे दी और उन्होंने मुझे ट्रांसफर आर्डर  पकड़ा दिया।  आर्डर लेकर मैं कुछ और शुभ चिंतकों से औपचारिकता वश मिलने गया जिनमें तो पहले जिक्र में चुके  चुके के डी पाण्डेय साहब ही थे जो अब संयुक्त निदेशक मत्स्य पद पर प्रोन्नत हो चुके थे।  

उन्होंने राज की बात यह बतायी कि मुझे झांसी भेजने की राय उनके ही द्वारा निदेशक को दी गयी थी क्योकि उनके मुताबिक़ मेरी सेवाओं का कोई लाभ विभाग को नहीं मिल पा  रहा था।  मगर उन्होंने सचेत किया कि मैं 
झांसी  पहुँच कर अपनी स्पीड वहाँ के रिटायर्ड पूर्वाधिकारी की तुलना में काफी कम रखूँ।  मैं तत्काल उस वाक्य का निहितार्थ नहीं समझ पाया -हाँ झांसी पहुँचने पर इस 'महावाक्य' को  समझने का प्रयास करता रहा और पूरी तरह आज भी नहीं समझ पाया -एक जन सेवक का प्राथमिक काम जनता की सेवा है।  और कोई भी स्पीड गौण है, और गैर उल्लेखनीय है।  मगर मुझे फिर पांडे जी ने ऐसा क्यों कहा था? क्या उन्हें मुझ पर भरोसा नहीं था? हाँ ,पाण्डेय जी की ईमानदारी के किस्से कहे जाते थे मगर शायद उन्हें अपनी ईमानदारी का काफी फख्र था और उसके मुकाबले वे दुनियां के  हर  आदमी को कमतर ईमानदार मानते थे।  ऐसी ईमानदारी का एक नशा सा होता है।  

ईमानदारी निश्चय ही एक नियामत है ,सबसे अच्छी नीति है मगर ढिंढोरा पीटने का बायस नहीं। यह व्यक्ति विशेष का  एक निजी जीवन मूल्य है। मगर वो है क्या कि एक जुमला काफी बहुश्रुत हो चला है कि "ईमानदारी होनी ही नहीं दिखनी भी चाहिए" … लो कर लो बात और ढिंढोरा पीटो।  मैं तो मानता हूँ कि आप ईमानदार हैं तो यह दिख ही जाएगा स्वयमेव ही, उसे सायास दिखाने की जरुरत ही नहीं।  और कोई व्यक्ति , सरकारी मुलाजिम सहसा ही ईमानदार नहीं हो जाता  -यह एक वह जीवन मूल्य है जो संस्कार , पारिवारिक परिवेश और खुद की वंशाणुवीय संरचना (जेनेटिक मेक अप ) के मेलजोल से उपजता है. 

बहरहाल मैं झांसी जाने को उत्कंठावश तैयार था।  मेरी नौकरी के पहले  फील्ड अनुभव का रोमांच सा था मुझे। यद्यपि एक दो लोगों ने डराया भी। एक और जुमला तब और आज भी बड़ा मशहूर है -झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार ललितपुर न छोड़िये जब तक मिले उधार " तो मैं मंत्रमुग्ध सा फील्ड की दुश्वारियों से बेखबर आंनदित फांसी के फंदे की और बढ़ चला था। .... जारी। … 

रविवार, 3 नवंबर 2013

देहाती औरत!

कहते हैं कुछ दिनों पहले नवाज शरीफ ने अपने प्रधान मंत्री को देहाती औरत कह दिया जो कथित तौर पर रोज रोज पाकिस्तान को लेकर ओबामा के पास जाकर रोना रोते रहते हैं। इस पर तरह तरह की समीक्षायें ,टीका टिप्प्णियां और भाष्य हुए . मोदी ने इस बात की निंदा की . बात आयी गयी हो गयी . मगर अभी कल ही एक बिहारी नेता ने अपने मुख्यमंत्री नितीश जी को भी देहाती औरत कह दिया जो मोदी को लेकर निंदा पुराण बाँचते रहते हैं . कहा गया कि नितीश मोदी से इर्ष्या रखते हैं . आखिर देहाती औरत से अभिप्राय क्या है ? बिहार से लेकर पाकिस्तान तक के एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में यदि देहाती औरत से कोई समान अभिप्राय निकलता हो तो यह एक महत्वपूर्ण विवेचन का विषय निश्चित ही है .

मेरा लालन पालन और एक उम्र तक निवास भी ग्रामीण परिवेश में ही हुआ है . अब भी छठे छमासे गाँव आना जाना होता रहता है और सेवा निवृत्ति के बाद गाँव में ही बस जाने का प्लान है . देहाती औरत का विशेषण मेरे भी समझ में बिल्कुल बेजा ही नहीं है . सभी नहीं मगर गाँव की ज्यादातर औरतों में मैंने सहजता का ज्यादा आग्रह देखा है .शहरों का मिथ्याचरण (सोफिस्टिकेशन) उनमें नहीं होता . सभी मानवीय आवेग -गुस्सा, प्रेम,घृणा और द्वेष और उनका प्रगटीकरण उनमें अपने मौलिक रूप में देखे जा सकते हैं . वे जबर्दस्त झगड़ालू ,स्नेहमयी ,प्रेममयी सब हैं . गालियां देने में भी उनकी कोई सानी नहीं है . बहुत सहज होकर वे 'सुभाषितम' का धड़ल्ले से आपसी विनिमय करती हैं . जैसे कोई अनुष्ठान का धाराप्रवाह मंत्रोंच्चार हो रहा हो . मैं तो आज भी इस अनुष्ठानिक कलरव से लज्जावश नेपथ्य में हो लेता हूँ . कहीं कोई यह न देख ले कि मैं इस नारी -निनाद का रससिक्त श्रवण कर रहा हूँ .

देहात की औरतों की इस सम्भाषण स्पर्धा में लैंगिक विशेषणों का धड़ल्ले से प्रयोग होता है जो कभी कभी मुझे उनकी यौन विषयक कुंठाओं का आभास सा देता है और बहुत सम्भव है कि उनके दैनिक सम्भाषण से उनकी कतिपय कुंठाओं का कुछ शमन भी हो जाता हो . इसके अलावा गाँव की ज़िंदगी अभावों की और काफी श्रम साध्य होती आयी है तो  उनसे मनोमुक्ति के लिए भी कोई मनोरंजन और टाईम पास चाहिए सो एक गाली गलौज के संवाद का सेशन भी क्यों न हो? मेरी एक अंतर्जालीय घनिष्ठ मित्र ने उत्कंठा वश मुझसे कभी उन लैंगिक विशिष्टियों युक्त गालियों को बताने को  कहा था जो प्रायः ग्राम्य वधुओं द्वारा इस्तेमाल में आती हैं -मैं उन्हें संकोचवश बता नहीं सका था . आपके मन में कौतुहल हो तो मुझे अलग से मेसेज कर सकते हैं -एक और कोशिश कर सकता हूँ . अब तो टेलीविजन आदि के बढ़ते प्रभाव में गाँव की औरतें भी मिथ्याचरण अपनाने लगी हैं -तथाकथित 'सभ्य' होने लग गयी हैं . और गालियों आदि के विनिमय के बजाय शिष्टाचरण से काम लेने लगी हैं . अब तो मुझे यह लगने लग गया है कि गाँव की औरतें 'तो शिष्ट' होने लग गयी हैं मगर शहर की औरतें अब आदिम होने लगी  हैं .

तो गावं की औरतों में लगाने बुझाने(झगड़ा ) ,चुगली करने , ईर्ष्या करने के आदिम मानवीय भावों के भी होने के आरोपण हैं -मंथरा आदि के चरित्र यूँ ही वजूद में नहीं आये। मगर मैं यह मानता आया हूँ कि गाँव की औरतें बहुत भोली होती हैं ,मुंहफट तो होती हैं मगर दिल की साफ़ होती हैं . जीभ भले कलुषित हो, ह्रदय निष्कपट होता है . निहायत भोली ऐसी कि कोई भी चंट आदमी उन्हें छल सकता है . चंटों के सामने वे कत्तई भी महफूज नहीं रह पातीं . यह ग्राम्य भोलापन मैंने कई शहरी नारियों में भी देखा है -भले वे शहरी हो गयी हों मगर मन उनका ग्राम्य बोध लिए ही होता है . कैलाश गौतम जी की एक कविता की पंक्ति अकस्मात याद हो आयी है जो गाँव की औरतों के भोलेपन को इंगित करता है -

उसको शायद पता नहीं वह गाँव की औरत है
इस रस्ते पर आगे चल के थाने पड़ते हैं .......

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

एक थे निगम साहब! (सेवा संस्मरण -9)

राज्य सरकार के अधीन मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र चिनहट का वजूद समाप्त होने का असहज इंतज़ार हमें था किन्तु लीज डीड फाइनल न होने के कारण आगरा स्थित केंद्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान की रीजनल इकाई द्वारा टेक ओवर नहीं किया जा पा रहा था . इसी उहापोह में दिन बीत रहे थे . मुझे लगता था कि केद्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान द्वारा चिनहट केंद्र का अधिग्रहण कर लेने के बाद मेरा पद केंद्र सरकार के किसी बराबर के पद और वेतनमान में समायोजित हो जाएगा .ऐसा लोग आश्वस्त करते . फिर भी अज्ञात का भय बना रहता था .इसी बीच एक अनहोनी घट गई . रीजनल ट्रेनिंग सेंटर आगरा के प्रिंसिपल कोई चौधरी जी काफी स्मार्ट निकले और एक तार उन्होंने प्रदेश सरकार और उसकी प्रतियां हमारे चिनहट स्थित कार्यालय को रवाना किया -ऐसा चालाकी और सावधानी भरे शब्दों के मजमून का तार मैंने कम ही देखा है -आज तक उसके शब्द मुझे याद हैं-"पेंडिंग फाइनैलाईजेशन ऑफ़ द लीज डीड वी आर मूविंग टू टेक ओवर चिनहट ट्रेनिंग सेंटर विदिन अ वीक ." निश्चय ही यह राजनीतिक पहल का परिणाम था और केंद्र सरकार के तत्कालीन कृषि मंत्री से इसके लिए हरी झंडी मिल चुकी थी . उत्तर प्रदेश शासन के मत्स्य अनुभाग में हलचल बढ़ी और आनन फानन में प्रदेश सरकार का एक आदेश जारी हो गया .


विशेष सचिव मत्स्य के स्तर से जारी होने वाले आदेश में मुझे छोड़कर बाकी सभी स्टाफ को अन्यत्र पदों पर स्थानांतरित कर दिया गया था और स्पष्ट आदेश था कि चिनहट प्रशिक्षण संस्थान के प्राचार्य/ सहायक निदेशक प्रशिक्षण पद का प्रभार लोक सेवा आयोग से चयनित व्याख्याता के पास अग्रिम आदेशों तक रहेगा . प्राचार्य और व्याख्याता दोनों पद राजपत्रित (समूह ख ) का था किन्तु प्राचार्य का पद मुझसे उच्च वेतनमान का था . इस आदेश को लेकर मेरे उच्च विभागीय अधिकारियों और उनके सलाहकारों के बीच एक लम्बी मंत्रणा की जानकारी मुझे हुयी . और फलस्वरूप जो आदेश मत्स्य निदेशालय से निर्गत हुआ उसमें प्राचार्य पद का दायित्व मंडलीय अधिकारी को दिए जाने का निर्देश था -मुझे जानकारी हुई कि विभागीय अधिकारियों को मुझे एक उच्च पद का प्रभार दिया जाना गंवारा नहीं था . जबकि शासन का आदेश इस संबंध में स्पष्ट था . मैंने प्रतिवेदन भी दिया मगर किसी के कान पर जूं नहीं रेगीं . यह मेरे कैरियर का एक बड़ा सेट बैक था -मुझे व्याख्याता के पद पर दो से भी अधिक वर्ष कार्य करने का अनुभव भी हो गया था और मुझे प्राचार्य के पद का प्रभार देने का पूरा औचित्य था . मगर विभागीय लोगों की परपीड़नात्मक मनोवृत्ति के चलते यह सम्भव नहीं हुआ . कमीशन से आने के कारण विभागीय प्रोन्नति पाये लोग मुझसे एक द्वेष सा रखते थे। अब मैं कमीशन से चुन कर आया था तो मेरा इसमें क्या दोष था भला ? उनकी कोफ़्त थी कि उनकी विभागीय प्रोन्नति समय से नहीं हुयी तो इसका प्रतिशोध वे शायद अपने तरीके से ले रहे थे . .


केंद्र सरकार का रीजनल सेंटर मय माल असबाब के चिनहट आ पहुंचा . प्रदेश सरकार का सारा साजो सामान मंडलीय कार्यालय ,मत्स्य निदेशालय जहाँ भी जगहं मिली ले जाया गया और प्रादेशिक सरकार का अब चिनहट में कोई अधिपत्य नहीं रह गया . मुझे भी जनपदीय कार्यालय से संबद्ध कर दिया और अब मुझे सप्ताह में तीन दिन के बजाय हर रोज स्कूटर से लखनऊ के जनपदीय मत्स्य कार्यालय में आना जाना पड़ता . घर पर पत्नी सुबह से गए गए मेरा शाम के छह बजे तक व्यग्र इंतज़ार करतीं . यह सिलसिला यही कोई पांच छह माह चला . इसी बीच मैंने फील्ड के कर्मचारियों के कार्य कलाप और दायित्व को निकट से देखा . एक रोचक व्यक्तित्व की याद भूले नहीं भूलती -वे थे निगम साहब ,सुपरवाइजर। वे पूरे लखनऊ शहर को अपनी एक बाबा आदम के ज़माने की साईकिल से खांचते रहते . और बहुत कम समय के लिए आफिस में दिखते . एक दिन उनकी डायरी स्टाफ के हाथ लग गयी तो उसमें तहसील सदर के किस बाबू को कब कब चाय पिलाई, कब कलेक्ट्रेट के किस अर्दली को कितनी बख्शीश दी आदि आदि का पूरा रोजनामचा लिखा मिला और सारा स्टाफ निगम साहब की डायरी पर परिचर्चा में मशगूल हो गया था . मैंने निगम साहब से इसकी चर्चा की तो उन्होंने कहा कि "साहब आप नए हैं, सब जान जायेगें धीरे धीरे .... और यह सब व्यवस्था है " वे अपनी बात चीत में व्यवस्था शब्द का प्रायः उल्लेख करते . वे किस व्यवस्था की बात करते इसका एक असहज अहसास मुझे होने लग गया था .


मुझे पता लगा कि मेरे विश्वविद्यालय के जान पहचान के एक मेधावी छात्र प्रेम नारायण जी
(जी एन झा छात्रावास) उन्ही दिनों मलीहाबाद के उप जिला मजिस्ट्रेट(एस डी एम ) थे . एक दिन मैं सपत्नीक उनसे मिलने गया .तब वे डालीबाग में रहते थे .बड़े उत्साह से वे मिले .उनकी पत्नी भी बड़ी ही मितभाषी और सहृदय थी। हम अक्सर मिलते रहते .मलीहाबाद के असली दशहरी आम जैसे उनके यहाँ खाये और झोले में  भरकर लाये गए वे फिर कभी खाने को नहीं मिले,साईज और स्वाद दोनों में। इस परिवार की आत्मीयता की यादें आज भी मुझे एवं पत्नी को है .आज प्रेम नारायण जी प्रदेश शासन में उच्च पद पर हैं .वे संस्कृत के भी अच्छे ज्ञाता है और शकुंतला के सौंदर्य की चर्चा उन्होंने कालिदास के एक श्लोक ( अनाघ्रतम पुष्पम ......अनाबिद्धं रत्नम ....) से की थी जिसे मैंने उनके सौजन्य से ही तभी कंठस्थ कर लिया था।उनके यहाँ एक एक्वेरियम था जिसे इस पोस्ट के मेरे हीरो निगम साहब द्वारा ही लगाया गया था।  


अभी तक मेरी नौकरी का भविष्य स्पष्ट नहीं था।।केंद्र सरकार में जाना था या प्रदेश सरकार में ही बने रहना था -यह सब बहुत धुंधला धुंधला सा था . मगर अब प्रदेश में मत्स्य व्याख्याता की तो कोई पोस्ट ही नहीं रह गयी थी .शासन के आदेश में चूंकि मेरी पोस्ट समाप्त करने का निर्णय नहीं था इसलिए विभागीय अधिकारी मेरा वेतन देते जा रहे थे . अगर शासन के उक्त आदेश का सहारा न होता तो मेरे विभाग ने तो कब का नोटिस मुझे पकड़ा दिया होता . काश पकड़ा भी दिया होता! मगर मुझे तो अभी आगामी कई दशकों तक मछली के जाल में ही फंस के रह जाना था :-) जारी ....

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

चिनहट का चना सचमुच लोहे का चना बन गया था :-) (सेवा संस्मरण -8)

मेरी  चिनहट पोस्टिंग के दौरान ही कुछ मजेदार वाकये हुए थे जो जब भी याद आते हैं बरबस ही होठों  पर मुस्कराहट आ जाती है।  उन दिनों ही मत्स्य मुख्यालय /निदेशालय पर एक सीनियर  अधिकारी थे -एस  एन सिंह जो अपनी ओर  के ही, बनारस के थे. उन्हें मैंने या किसी और ने यह जानकारी दे दी थी कि तत्कालीन कांग्रेस पार्टी जो उन दिनों उत्तर प्रदेश में सत्ता में थी के  प्रदेश महासचिवों में इंदिरा जी के बड़े विश्वासपात्र और स्वतंत्रता सेनानी देवराज मिश्र जी थे जो पत्नी की ओर से हमारे सगे मामा थे  -सिंह साहब ने मुझे चिनहट से बुलाया -बहुत स्नेह से हालचाल पूछा और खुद को एक मेरे बड़े हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया।  इस अहैतुक स्नेह सम्मान की वजह मेरे मामा जी ही थे यह मुझे जल्दी ही समझ में आ गया।  और एक  अवसर भी आ गया जब  उन्होंने मुझसे अपने स्नेह -दुलार का प्रतिदान मांग लिया। 

 उनका अचानक  ट्रांसफर हुआ तो उन्होंने मुझसे मामा जी से हस्तक्षेप के लिए प्रबल आग्रह किया।  मेरे मामा जी (अब दिवंगत ) बहुत धीर गंभीर और एक सहज ही सम्माननीय व्यक्ति थे। मैंने खुद कभी अपनी नौकरी की विसंगतियां उन्हें नहीं बतायी थी जबकि वे अपने लालबाग के निवास से मुझसे और अपनी भांजी (पत्नी) से मिलने सपरिवार आते थे और हम लोग भी छुट्टियों में उनसे मिलने जाते थे।  मुझे उनसे ट्रांसफर जैसे विषय  और वह भी किसी और के, पर बात करने की हिम्मत ही नहीं पड़  रही थी।  सिंह साहब ने जब बहुत आग्रह किया तो मैं  विवश हुआ मगर मामा जी के घर जाने के बजाय उनसे कहा कि चलिए उनसे कांग्रेस पार्टी(पी सी सी आई)  के मुख्यालय पर ही मिल लिया जाय।  वे खुद अपने सरकारी वाहन पर मुझे बिठा कर ले गए मगर खुद  दूर रहे और मुझे मुहिम पर लगा दिया।  

मैं घबराते हुए मामा जी के चैंबर में घुसा मगर वे वहां नहीं थे।  कोई और बैठा था।  मैंने उनसे मामा जी के बारे में दरियाफ्त किया मगर यह जानकारी नहीं मिल सकी कि वे कहाँ हैं? हाँ उन सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय पूछा और काम पूछा।  मैंने जैसे ही अपना परिचय उन्हें दिया मेरी  कद्र सहसा ही बढ़ गई ।  उन्होंने कहा कि छोटा सा काम है वे खुद ही विभागीय मंत्री से सिफारिश कर देगें। मामा जी से कहने की क्या जरुरत है। मैं थोड़ा अविश्वास और संकोच से विदा हुआ और रिपोर्ट सिंह साहब को दे दी -उन्हें तो चैन ही नहीं था।  मैं मामा जी से मिल लूं उनका यह आग्रह बराबर बना ही हुआ था। बहरहाल उन्हें यह आश्वस्त कर कि मैं उनसे घर पर मिल लूँगा मैंने उनसे छुट्टी पायी मगर मामा जी के घर गया ही नहीं -चिनहट  लौट आया।  मगर आश्चर्यों का आश्चर्य उनका ट्रांसफर रुक गया था।  

बात आयी गयी हो गयी थी।  सिंह साहब की नज़रों में मैंने अपना और भी बढ़ा हुआ सम्मान देखा था।  एक हप्ते  बाद मैं मामा जी के पास गया।  वे बड़े संयत और मितभाषी थे -मुझे प्यार से बुलाया और जताया कि मैंने उनके मित्र को ट्रांसफर का जो काम सौंपा था वह ठीक नहीं था क्योंकि भले ही विभागीय मंत्र्री के हस्तक्षेप से वह ट्रांसफर  रुका था मगर मंत्री  द्वारा उसका पूरा  अहसान मामा जी पर डाल  दिया गया था।  जबकि मामा जी को तो पूरा प्रकरण ही बाद में पता चला -साफ़ था कि इस ट्रांसफर में मामा जी की अनभिज्ञता में ही उनके रसूख का इस्तेमाल कर लिया गया था।  मुझे बड़ी शर्मिन्दगी सी महसूस हुयी थी और आगे से  ऐसे पचड़े में न पड़ने का संकल्प लिया।  काश मैंने उन दिनों मामा जी के रसूख का इस्तेमाल खुद अपनी सेवा की बेहतरी के लिए किया होता -मगर क्या करूं अपने स्वभाव से मजबूर रहा हूँ! कष्ट सह लो मगर जहाँ तक संभव हो किसी की मदद न लेनी पड़े।  और मेरा यह स्वभाव यह आज भी बना हुआ है - मैं बेहयाई पर उतर ही नहीं पाता :-) 

एक और मजेदार पर घटना घटी। उन्ही दिनों सचिवालय में मत्स्य अनुभाग में सेक्शन आफिसर कोई डी के सिंह थे.. मुझे एस एन  सिंह साहब बिना मतलब सचिवालय भी खींचे  ले जाते और मैंने देखा कि वे तथा अन्य विभागीय अधिकारी तो सेक्शन आफिसर को देवता तुल्य मानते थे।  मेरा ताजा विश्वविद्यालीय खून यहाँ विद्रोही हो उठता।  इस सेक्शन आफिसर में ऐसी कौन सी खूबी थी जो मेरे कुछ  विभागीय अधिकारी उसे देवता सा सम्मान देते थे -हुंह! और मैंने यह देखा था कि सेक्शन आफिसर महोदय बातूनी और गपबाज थे तथा किसी लखनऊ के नवाब से कम रोब  नहीं गांठते थे। मेरे सामने भी जब उन्होंने रोब गांठना शुरू किया तो मेरे चेहरे पर आते अप्रसन्नता के बढ़ते भाव को सिंह साहब ने ताड़ लिया और तुरंत बीच बचाव की मुद्रा अपनाई -"सिंह साहब ये अभी अभी विभाग में आये हैं, इन्हें कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं है " किस पद पर हैं ? "अरे वही चिनहट में व्याख्याता के पद पर.."   … "हाँ हाँ पता है मुझे, मगर हम तो इनकी पोस्ट ही खत्म कर रहे हैं " उसने मूझ पर रॉब गांठा। मैं घबराया तो मगर मैंने कहा कि मुझे तो केंद्र में लेने का प्रावधान लीज डीड में है। …. " लीज डीड फाईनल होगी तब न '' एक कुटिल और विकृत हंसी के साथ उन्होंने  जवाब दिया  और तुरंत विषय बदलते हुए सिंह साहब की और मुखातिब होकर कहा कि सिंह साहब चिनहट में बहुत अच्छा चना मिलता है।  मुझे दस किलो चना चाहिए।  मैं निरुत्तर रहा।
सेक्शन आफीसर के कक्ष से बाहर आते ही सिंह साहब ने मेरा मन टटोलना चाहा -अरे यार देख लो चिनहट में चना मिलता हो तो मेरे यहाँ पहुंचा दो मैं उसे  भिजवा दूंगा। परन्तु  मेरे चेहरे के खिचाव को देखकर उन्होंने तुरंत कहा चलो मैं पैसे  दे दूंगा " मैं उबल ही तो पड़ा- "नहीं सर, यह सब अपेक्षा मुझसे मत करिए।"   और इतना क्षुब्ध हुआ कि उस दिन चिनहट न जाकर मामा जी के घर पहुंचा और चने की बात उन्हें बता दी।  वे चुप रहे केवल एक बार पूछा क्या नाम है सेक्शन आफीसर का -मैंने बता दिया।  उस दिन मैं चिनहट देर से  लौटा -देर से लौटने का कारण पत्नी को बताया।  इस घटना के तीसरे रोज हम फिर मामा जी के यहाँ गए।  उन्होने ताजी जानकारी दी कि विभागीय मंत्री ने सचिवालय प्रशासन के सचिव को उस सेक्शन आफीसर को हटाने का निर्देश दे दिया है।  मेरे लिए यह मजेदार खबर थी। चिनहट के चने सेक्शन आफिसर के लिए लोहे के चने बन चुके थे। :-)  
अब इस खबर को साझा करने को मैं व्यग्र था।  सुबह सीधे निदेशालय पहुंचा, सिंह साहब के कक्ष में. आव न ताव मैंने उन्हें  यह खबर सुना ही तो दी।  पैरो तलें जमीन खिसकना मुहावरा तो सुना था मगर उसे साक्षात पहली बार व्यवहार में आते देखा। सिंह साहब उछल कर खड़े हो गए।  मेज की घंटी बजायी। गाडी लगवाई और मुझे लगभग खींचते हुए सचिवालय ले जा पहुंचे -मैं बार बार कहता रहा कि मुझे  क्यों ले जा रहे हैं मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी।  ले जाकर सेक्शन आफीसर के सामने मुझे खड़ा कर दिया।  और कहा ये मिश्रा जी कह रहे हैं, तुम्हारा ट्रांसफर होने वाला है।  यह सुनकर उनके चेहरे की रंगत उड़ गयी मगर तुरंत संभल कर लगे  अनाप शनाप बोलने ,ट्रांसफर कराने वाले की ऐसी तैसी कर देगें,कब्र में गाड़ देंगे। ..   आदि आदि। उन्हें तो विश्वास ही नहीं था उस खबर पर।  और तभी ट्रांसफर आर्डर भी  हम लोगों के सामने ही आ पहुंचा -अब जनाब  भीगी बिल्ली  बन चुके थे -वहीं लगे सिंह साहब के सामने गिडगिडाने। कुछ कीजिये, कुछ कीजिये।  तभी किसी ने खबर दी कि सिंह साहब का भी  ट्रांसफर फिर से हो गया था।  अब वे दोनों एक ही नाव में सवार हो गए थे और डूबती नैया को बचाने की जुगत में लग गए और मैं मौका देखकर वहां से खिसक लिया। इस बार सिंह साहब और सेक्शन आफिसर का ट्रांसफर नहीं रुका था। .चिनहट का चना सचमुच लोहे का चना बन गया था :-) … जारी! 

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

क्या सचमुच भाग्य से अधिक और समय से पहले कुछ नहीं मिलता?( सेवा संस्मरण-7)

चिनहट में नौकरी के दिन मेरे जीवन के सबसे सृजनात्मक दिन थे . अपनी पहली विज्ञान कथा  गुरु दक्षिणा मैंने यहीं  लिखी जिसमें एक रोबोट में मानवीय संवेदना का प्रस्फुटन सहसा हो जाता है . उन दिनों मेरे चिनहट आवास पर सृजनकर्मियों का आना जाना लगा रहता था . कुछ मीन भोजी लोग भी आते . घर पर तो मीन -व्यंजन बन नहीं पाते थे तो उनकी व्यवस्था अलग से की जाती . तभी मैंने यह जान लिया था कि किसी मत्स्य प्रेमी को मत्स्य भोज पर आमंत्रित कर उसका दिल जीता जा सकता है . हो सकता है "आमाशय से दिल तक पहुँचने'' की कहावत मत्स्याहार -व्यंजनों के चलते ही वजूद में आयी हो :-) . और कोई बंगाली मोशाय हों तो फिर पूछिए ही मत -उनका तो मत्स्य प्रेम जग विख्यात है .

मेरे क्लासफेलो और कभी रूम मेट रहे तब किंग्स जार्ज में एम डी कर रहे डॉ राम अशीष वर्मा अक्सर अपने डाक्टर मित्रों के साथ मीन भोज पर आते और तृप्त होकर जाते . दोस्त की यह तृप्ति मुझे संतृप्त करती . देवेन्द्र मेवाड़ी जैसे जाने माने विज्ञान लेखक ने मेरे चिनहट आवास को आकर धन्य किया . उन्ही दिनों ज्ञानी जैल सिंह जी राष्ट्रपति थे और वे लखनऊ में राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करने आये . अमृत प्रभात ने मुझे इस कार्यक्रम को कवरेज के लिए मानदेय का एक आकर्षक 'पैकेज' भी आफर किया था . मैंने अपने कई विश्वविद्यालय मित्रों को इस अवसर पर बुलाया और भव्य उद्घाटन के अलावा अन्य सेशन में उनका प्रतिभाग सुनिश्चित कराया . क्या दिन थे वे? .नौकरी पर तलवार भले लटक रही थी मगर दिन बहुत सुनहले थे और ख्वाहिशों को पंख लग गए थे . नैतिक उत्साह का पारावार नहीं था . 
उन्ही दिनों ही मुझे अपनी पी एच डी सबमिट करने हेतु इलाहाबाद विश्वविद्यालय जाना पड़ा -दो माह का अवकाश लिया और विश्वविद्यालय जीवन में फिर लौटा . एक दिन मुझे इन्डियन कौंसिल आम मेडिकल सायिन्सेज (आई सी ऍम आर ) के प्रकाशन विभाग से सहायक सम्पादक/वैज्ञानिक अधिकारी पद का इंटरव्यू पत्र मिला तब याद आया कि इस पद हेतु भी मैंने आवेदन किया था . मेरे कई लोकप्रिय विज्ञान लेख तब तक प्रकाशित हो चुके थे . इसी पद के लिए मेरे एक सीनियर डॉ विजय कुमार श्रीवास्तव जी को भी साक्षात्कार का बुलावा आया था . इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणि शास्त्र विभाग में 1 9 78 से 1 9 8 2 के कालखंड में विज्ञान के लोकप्रियकरण की एक अलख मैंने जगायी थी और मात्र संयोग नहीं है कि आज दिल्ली में विज्ञानं लेखन की कई नामचीन हस्तियाँ इसी कालखंड में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणी शास्त्र विभाग में अध्ययनरत थीं .

डॉ विजय कुमार श्रीवास्तव जी यह आश्वस्त होना चाह रहे थे कि मैं इस इंटरव्यू में जाऊँगा या नहीं और इसके उपरान्त ही वे खुद अपने प्रतिभाग के बारे में निर्णय ले पाते .उन्होंने अपने बैच मेट डॉ. जगदीप सक्सेना जो मेरे गुरु भाई थे और एक साल के सीनियर थे को यह दायित्व दिया कि वे मुझसे यह पुख्ता जानकारी लेकर उन्हें दें -मैं चूँकि साक्षात्कार में उनके बैचमेट और मित्र का एक पोटेंशिअल कम्पटीटर था तो  इस मामले में डॉ विजय कुमार श्रीवास्तव जी पूरी तरह मुतमईन हो जाना चाहते थे .  डॉ जगदीप सक्सेना जी  खुद मुझसे प्रेरित हो उन दिनो विज्ञान लेखन में छिट पुट हाथ आजमा रहे थे।  उन्होंने  मेरा मन टटोला कि क्या मैं उक्त इंटरव्यू में जाऊंगा . मैंने पता नहीं किस खयामख्याली में आकर उस इंटरव्यू में न जाने का फरमान सुना कर उनके मित्र को अभयदान दे दिया-डॉ विजय जी निर्द्वन्द्व होकर साक्षात्कार के लिए गए और चुने भी  गये. आज वे पब्लिकेशन डिवीजन के सर्वे सर्वा हैं -डाईरेक्टर जनरल, पब्लिकेशन डिवीजन,आयी सी एम आर . कभी कभी सोचता हूँ आखिर क्यों मैंने उस इंटरव्यू में न जाने का मूर्खतापूर्ण निर्णय लिया था?
दो स्पष्ट कारण थे -कई मित्रों ने बरगलाया था कि पब्लिक सर्विस कमीशन से राजपत्रित पद पर चयन के फलस्वरूप मेरी प्रोन्नति की काफी संभावनाएं थीं . दूसरा कारण मेरा खुद का ईजाद किया हुआ एक दिमागी फितूर था . वह यह कि मुझे ऐसा आभास होता था कि एक मनुष्य को जीवन के दौरान कई समझौते करने पड़ सकते हैं . तो मैं अपने शौक-लोकप्रिय विज्ञान  लेखन के साथ समझौते न करने का दृढ निश्चय किया और इस निर्णय पर जा पहुंचा कि अगर मैं विज्ञान लेखन को अपनी जीविका का साधन बनता हूँ तो बहुत संभव है मुझे कई समझौते ऐसे करने पड़े जो मेरे जमीर (? ) को गंवारा न हों . हाँ जीविकोपार्जन के लिए कोई अन्य नौकरी हुयी तो समझौते किये भी जा सकेगें . सो मैंने मोहकमाये मछलियान को जीविकोपार्जन के लिए चुना और लोकप्रिय विज्ञान लेखन के शौक को बोले तो अपना जीवन आधार। मगर यह मेरी एक नासमझी  ही थी-हाबी में भी समझौते करने पड़ते हैं और जीविकोपार्जन के लिए नौकरी में  भी . तब विज्ञान लेखन का ही कैरियर क्या बुरा था?
मैं यह मानता हूँ कि मुझमें सही वक्त पर सही निर्णय लेने की क्षमता कभी नहीं रही . और इस अक्षमता का परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है . मैं भाग्य और भवितव्यता में कतई विश्वास नहीं करता मगर हाँ सही मौके पर सही निर्णय न लेने से उत्पन्न दुर्संयोगों की संभावना से इनकार कैसे किया जा सकता है? .और लोगों के जीवन में ऐसे ही दुर्संयोगों के चलते ही "भाग्य से अधिक और समय से पहले  कुछ नहीं मिलता" जैसी चतुरता भरी उक्ति का बोलबाला बना हुआ है . देखिये भाग्य और भवितव्यता से मेरी आँख मिचौली कब तक चलती है! :-) जारी ....

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

' क्या सर, पैसा ही सब कुछ होता है जीवन में? " - सेवाकाल के तीन दशक (संस्मरण -6)

मेरे मीडिया मित्र ने अशोक मार्ग के अमर उजाला दफ्तर के सामने रुकने का इशारा किया और स्कूटर से उतरते ही मुझे गेट पर रोकते हुए खुद तीर की तरह अंदर घुस गए . माजरा मेरे समझ में ही नहीं आ रहा था . बहरहाल कुछ पलों के ही बाद वे एक विजेता की मुद्रा में बाहर निकले और हाथ में लिए कागज़ के टुकड़ों को श्रेडर मशीन से भी अधिक बारीक फाड़ते रहे -बुदबुदाए, लीजिये आपकी रिपोर्ट का काम तमाम ! मैंने प्रश्नवाचक की निगाह से देखा। मुझे समझाते हुए बोले कि ये वही कागज़ थे जिन्हें मैंने उन्हें सौंपा था . "..रिकार्ड रूम से जाकर निकाल लाया हूँ और इसके महीन टुकडे मेरी हाथ में हैं और कूड़े में चले जायेगें . अब आप बेफिक्र होकर जाईये और अपने निदेशक से कहिये कि जो खबर छपी उससे आपका कुछ लेना देना नहीं है . मैं इसलिए घबरा रहा था कि आपकी हैण्डराइटिंग में पूरी रिपोर्ट अखबार के रिकार्ड रूम में थी और अब मामला तूल पकड़ता जा रहा है तो आपका नुकसान हो सकता था .अब कोई चिंता की बात नहीं बेफिक्र होकर जाईये . " मैं अब जाकर उनकी बात के मर्म को समझ रहा था . बहरहाल मैंने उने शुक्रिया कहा और निदेशक मत्स्य से मिलने के पहले मैं उनसे नीचे के अधिकारी उप निदेशक मत्स्य आर एन वहल के पास पहुंचा . आर एन वहल साहब ने देखते ही पूछा कि अखबार में छपी रिपोर्ट का मसला क्या है और क्या तुमने वह खबर छपवाई है ? मैंने उनसे ऊपर की दास्तान सच सच बता दी और अनुरोध किया कि सर यह तो मैंने आपसे अनौपचारिक रूप से सच सच बता दिया मगर आप लिखित मांगेंगे तो मेरा जवाब यही रहेगा कि कथित खबर से मेरा कोई सरोकार नहीं है . वे किंचित दुविधा में दिखे मगर फिर मुझे अभयदान दे दिया और कहा कि अब किसी से भी यही कहना कि तुमसे उस खबर का कोई सम्बन्ध नहीं है .उन्होंने ऐसा ही तत्कालीन निदेशक से भी सम्भवतः बता दिया था क्योंकि फिर मुझसे कोई पूछताछ नहीं हुयी . ..
हाँ उस खबर से लीज डीड को फाईनल कराने की गतिविधियाँ तेज हो गयीं . मगर केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान मुम्बई के पदाधिकारी कुछ मीन मेख निकालते जाते और लीज डीड को अंतिम रूप देना टलता रहा . उन्ही दिनों जैसा कि मुझे याद है बलराम जाखड जी कृषि के केन्द्रीय मंत्री थे और उन्हें केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान मुम्बई वालों ने पकड़ा और जो कुछ भी कहा हो उनके द्वारा उत्तर प्रदेश में मत्स्य विकास की एक भव्य गोष्ठी रखवाई गयी और उस समय के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी से उदघाटन करवाया गया -अपने लिखित भाषण में मुख्यमंत्री जी ने चिनहट मत्स्य प्रक्षेत्र को केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान मुम्बई के रीजनल सेंटर को देने की उद्घोषणा कर दी . तब तो नहीं, नौकरी के कई वर्षों बाद मुझे मुख्यमंत्री जी द्वारा की गयी घोषणाओं के महत्व का पता चला .उनका उच्च स्तर पर बाकायदा अनुश्रवण किया जाता है और अनुपालन सर्वोच्च प्राथमिकता पर सुनिश्चित किया जाता है .
लोग मुझे बधाईयाँ दे रहे थे कि चलिए मेरा पिंड राज्य सरकार से छूटा और मैं अब केन्द्रीय सरकार का कर्मी बन जाऊँगा . मुख्यालय के मेरे अधिकारी के डी पाण्डेय जी जिनका जिक्र पहले आ गया है ने भी कहा चलो तुम्हारा वेतन भी अब बढ़ जायेगा। मुझे अच्छी तरह याद है मैंने इस बात पर अपनी अप्रसन्नता को छुपाते हुए उनसे एक मासूम सा सवाल कर डाला था, ' क्या सर पैसा ही सब कुछ होता है जीवन में " मुझे याद है उनके चेहरे पर एक खिसियाहट उभर आयी थी और तिक्त स्वरों में उनका जवाब था 'हां पैसा ही होता है, यह तुम आज नहीं तो कभी समझ जाओगे " .सच कहिये तो मैं आज तक श्री पाण्डेय जी की बात के मर्म को समझने में लगा हुआ हूँ और कोई फैसला नहीं कर पाया हूँ ,. कभी लगता है हाँ पैसा ही सब कुछ है मगर तभी कुछ ऐसा घट जाता है कि पैसा एकदम से महत्वहीन लगने लगता है . हाँ, अब तक के जीवन में इस द्वंद्व ने मुझमें पैसे के प्रति एक विक्षोभ सा उत्पन्न कर रखा है .और यह स्थाई भाव मेरे जीवन को कई तरह से प्रभावित करता रहा है . मुझे अतिशय मुद्रा प्रेमी मनुष्य होमो सेपियेंस से कोई हेय प्रजाति के से लगते हैं . संभव है यह लक्ष्मी कृपा से चिर वंचित होने का मेरा छुपा नैराश्य भी हो सकता है . कह नहीं सकता!
मैं सच कहता हूँ मुझे केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान में जाने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी और इसका एक बड़ा कारण था मेरी होम सिकनेस . अपने पैतृक प्रदेश में नौकरी और मूल वास स्थान तक छठे छमासे होते रहना मुझे बेहतर लगता था न कि केन्द्रीय सेवा में जाकर भारत के किसी कोने में दुबक जाना . एक केन्द्रीय सेवा के इंटरव्यू काल में मैं एक अन्य कारण से भी नहीं गया था . इसकी चर्चा अगली बार ......

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या.....(तीन दशकीय सेवा संस्मरण- 5)

मुबई से लौटा तो एक अच्छी खबर मेरा इंतज़ार कर रही थी .प्रदेश शासन ने एक अनंतिम लीज डीड (अनुबंध ) तैयार कर लिया था जिस पर उभय पक्षों यानि राज्य और केंद्र सरकारों के सम्बन्धित नुमाइन्दों के दस्तखत के बाद ही चिनहट के राज्य मत्स्य प्रशिक्षण संस्थान का हस्तांतरण होना था . मुझे केंद्र सरकार के प्रशिक्षण केंद्र में आमेलित करने की भी शर्त रख दी गई थी . बड़ी राहत हुई -नौकरी पर लटकती तलवार हटती दिखी . मैंने लीज डीड जो आज तक अंतिम नहीं हो पाई है को गहराई से देखा जिसमें चिनहट प्रशिक्षण संस्थान के कई हेक्टेयर क्षेत्र जिसमें एक खूबसूरत झील (कठौता ताल)भी शामिल थी को भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद(आई सी ऐ आर ) के अधीन केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान (सी आई ऍफ़ ई ) के क्षेत्रीय प्रशिक्षण संस्थान(आर टी आई) आगरा को कुछ हलके फुल्के प्रतिबंधों/ शर्तों के अधीन देने का प्रावधान था . इसके पीछे का इतिहास यह था कि सेवा निवृत्त होने वाले एक मत्स्य निदेशक ने अपनी प्रदेश सेवा के उपरान्त भी नौकरी करने की लालसा से एक भले पूरे प्रशिक्षण संस्थान के वजूद को मिटा कर इसे केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान को देकर वहां प्रोफ़ेसर का पद हथियाना चाहा था और ऐसा प्रस्ताव कर डाला था . उनके प्रस्ताव को मूर्त रूप लेने में विलम्ब होने से उनकी मनोकामना तो पूरी नहीं हुयी मगर चिनहट प्रशिक्षण संस्थान की स्थिति तो डावांडोल हो ही गई . मुझे भीतर भीतर तो यह सब बहुत बुरा लग रहा था मगर करता भी तो क्या? कौन सुनता अरण्य रोदन?
आखिर एक दिन मेरी क्रिएटिव लेखकीय क्षमता ने जोर मारा और मैंने अपना प्रतिवाद कुछ पन्नों पर उकेर लिया . एक साँस में ही मानो मैंने अपने आक्रोश को व्यक्त कर डाला हो . मन हल्का हुआ . और वह कच्चा चिटठा मैंने अपने स्टडी मेज पर रख दिया -लिख तो डाला था मगर यह अभी रफ आलेख्य के रूप में था और समझ में नहीं आ रहा था कि इसका क्या करूँ ? सो वह मेरी मेज के एक हिस्से में पड़ा रह गया . उन्ही दिनों मेरे एक मीडिया मित्र ( उफ़ नाम याद नहीं रहा ) चिनहट की चाय के बहाने मुझसे मिलने आये . मीडिया के मित्रों से तब मेरी बड़ी घनिष्ठता हुआ करती थी . सरकारी नौकरी की आचार संहिता के चलते अब उनसे एक अनचाही दूरी हो गयी है .मगर फिर भी अभी कुछ मित्र मुझे मौके बेमौके पत्रकार ही कह देते हैं . एक दिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विख्यात प्रोफ़ेसर डॉ दीनानाथ शुक्ल ने ही कई लोगों के सामने मुझे पत्रकार कह ही दिया .बड़ी असहज स्थिति हो गयी थी .बहरहाल चिनहट पर लौटते हैं . मैंने चाय के दौरान अपने मित्र को स्टडी मेज पर उपेक्षित पड़े चिनहट वृत्तान्त को उन्हें सौंप दिया और कहा कि इसे इत्मीनान से पढ़ लीजियेगा और बताईयेगा . मेरा यह सोचना था कि वे महानुभाव उसे पढ़कर मुझसे कुछ विचार विमर्श करेगें और तब आगे की कोई कार्ययोजना बनेगी . मगर होना तो कुछ बहुत ही अप्रत्याशित था ...
सुबह उठते ही लखनऊ के एक तत्कालीन प्रमुख समाचार पत्र अमर उजाला के मुख्य पृष्ठ पर ही "मत्स्य विभाग में बह रही है उल्टी गंगा " शीर्षक समाचार देख मैं चौक पड़ा . अरे यह तो सब मेरे ही लिखे शब्द दर शब्द थे . मुझे काटो तो खून नहीं . मीडिया मित्र ने विश्वास का धोखा दे दिया था . तब न तो घर पर फोन था और न मोबाईल . मुझे उनके इस हरकत पर क्रोध था और डर भी लग रहा था कि अब क्या होगा . तब खबरे जंगल में आग की तरह ही हुआ करती थीं . लपट मुझ तक बस पहुँचने ही वाली थी . और आफिस पहुंचते पहुंचते प्राचार्य का सन्देश मिल ही गया कि मुझे निदेशक मत्स्य ने बुलाया है . मगर उनसे मिल ने के पहले मैंने पत्रकार मित्र से मिलकर उन्हें उलाहना देने का निर्णय लिया . स्कूटर उठायी और उनके इंदिरा आवास स्थित घर पूछते पाछते पहुंचा . मुझे देखते ही उनके चेहरे पर कुछ आवाभगत तो कुछ प्रतिकार के मिले जुले विचित्र से भाव उभरे -दुआ सलाम के बाद मैंने अपनी अप्रसन्नता उनसे व्यक्त की और कहा कि मेरी रिपोर्ट को खबर के रूप में छापने के पहले महराज कम से कम मुझसे पूछ तो लिया होता . उनका जवाब था -''मिश्रा जी वह एक इतनी मुकम्मल रिपोर्ट थी ,कामा फुलस्टाप दुरुस्त कि बस मैंने केवल शीर्षक बदला और अपने मुख्य संपादक को दे दिया . और उन्होंने भी तुरंत उसे छपने की अनुमति दे दी . अब घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या ? मैंने तो अखबार देखा नहीं ..तो आज छप गयी वह खबर .......'? " हाँ महराज और वह भी मुख्यपृष्ठ पर ....और मैं निदेशक महोदय द्वारा तलब कर लिया गया हूँ . मेरा वाक्य पूरा होते ही वे स्प्रिंग की तरह उछले और तुरंत घर में घुस गए . मैं कुछ समझ पाता तब तक वे पैंट शर्ट पहने निकले और बोले तुरंत अमर उजाला दफ्तर चलिए . आखिर क्यों ? बस चलते रहिये उनका कमांड था .....जारी .....

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

नौकरी के तीन दशक -संस्मरण श्रृंखला

विश्वविद्यालय से तुरंत निकलने वाले को पढ़ने पढ़ाने का काम मिल जाय तो क्या कहने . वैसे भी मेरी अकादमीय रूचि भी थी तो जब प्रशिक्षण संस्थान के छात्रों को मत्स्य विज्ञान पढ़ाने का मौका मिला तो मन रम गया . उन्हें पढ़ाने के पहले मैं भी विषयों का गहन अध्ययन करता और फिर यथा संभव विषय को रोचक और सरल बनाने का प्रयत्न करता . फिर भी मैं देखता था कि कुछ प्रशिक्षार्थी पढने में तनिक भी रूचि नहीं लेते थे और वे ऐसे लोग थे जिन्हें विभागीय प्रशिक्षण के लिए तब भेजा गया था जब वे रिटायर्मेंट के करीब पहुँच चुके थे . मुझे नहीं लगता कि ऐसे उम्र वाले विभागीय लोगों को प्रशिक्षण देने का कोई लाभ भी है . 
बहरहाल सप्ताह में तीन व्याख्यान का मेरा कार्य समुचित तरीके से चल रहा था . एक दिन प्राचार्य ऐ .के . राय ने बुलाया और जो कुछ भी कहा उससे मैं स्तब्ध रह गया . उन्होंने कहा कि संस्थान को केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान मुम्बई जो आयी सी ऐ आर का उपक्रम है के द्वारा अधिगृहीत किया जाने वाला है . मैंने छूटते ही पूछा फिर यहाँ के स्टाफ का क्या होगा? उन्होंने कहा कि हम लोगों की तैनाती तो फील्ड में कर दी जायेगी मगर आपकी तो कोई पोस्ट ही मैदान में नहीं है आपकी सेवाएँ समाप्त भी हो सकती हैं . मेरा दिल धक से रह गया .
मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि कमीशन से नियुक्ति पाए व्यक्ति को इतनी आसानी से सेवा मुक्त कैसे किया जा सकता है .
 लोगों ने कहा कि अपना नियुक्ति पत्र देखिये। हाँ, मेरे नियुक्ति पत्र में यह था कि उभयपक्ष (मैं या सरकार) तीन महीने की नोटिस देकर नौकरी से अलग हो सकते हैं . बैठे बिठाये एक मुसीबत आ खडी हुई थी . मैंने इस बिंदु पर विद्वानों और वकीलों की राय लेना शुरू कर दिया और अपने विभाग के तत्कालीन सचिव को संभावित स्थिति में मुझे भी केंद्र सरकार में आमेलित कर लेने की प्रार्थना आवेदित की और अपने तत्कालीन निदेशक ऐ के सिंह से मिला . उन्हें मेरी नौकरी छिनने की समस्या का अहसास था . उन्होंने कहा कि केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान मुम्बई के निदेशक से वे बात करेगें .
एक नौकरी  मिली भी तो दुनिया भर की फजीहत शुरू हो गयी थी . और  नौकरी भी ऐसे ही मिल गयी थी .  कोई संघर्ष तो किया नहीं था मैंने. मगर नौकरी जाने की सोच मन दुखी हो जाता . पढ़ने पढ़ाने की मेरे मन की नौकरी थी .और वैसे भी मेरी हाबी थी आम आदमी के लिए /लायक विज्ञान विषयक लेख लिखना . तो इस नौकरी से जो कुछ भी मिलता  वह मंजूर था . मुझे अपनी हाबी बनाए / बचाए रखने का भी यहाँ मौका था . लोकप्रिय विज्ञान लेखन में उस समय मेरा नाम लोग जानने लग गए थे . सोचा तो यह था कि एक अदद नौकरी  होगी और मेरी हाबी भी चलती रहेगी। मगर अब ये सारे हवाई किले ध्वस्त होने जा रहे थे . 
ऐसे ही उहापोह के  दिन कट रहे थे तभी एक दिन मुझे निदेशक मत्स्य का सन्देश मिला कि तुरंत मिलो । लगा कि फैसले की घड़ी आ गयी। दुश्चिन्ताग्रस्त मैं भागा भागा निदेशालय पहुंचा। निदेशक के कक्ष में पहुंचते ही उन्होंने मुझे कहा कि अमुक तारीख को मुम्बई के केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान में मेरे समतुल्य एक पद का इंटरव्यू है और उनकी बात संस्थान के निदेशक श्री एस एन द्विवेदी से हो गयी है और वे तुम्हे साक्षात्कार में शामिल कर लेगें . मैंने कहा कि उक्त पद के लिए मैंने तो अप्लाई ही नहीं किया है , उन्होंने घुड़कते हुए कहा कि कह तो दिया कि उनसे मेरी बात हो गयी है .
कोई आशा की किरण तो दिखी .मैंने मुबई(तब बम्बई) जाने का फैसला किया . किसी महानगर में जाने का यह मेरा पहला अवसर था . और वह भी मुम्बई . मैं रोमांचित भी था और आशंकित भी कि पता नहीं क्या होगा . उस समय मेरे डिप्टी डाइरेक्टर थे श्री आर एन वहल . उन्होंने मुझे मुम्बई जाने की पूरी ट्रेनिंग दी -दादर माने जानते हो? दादर माने सीढी . तुम दादर में ही उतर कर सीढी से बिल्कुल विपरीत दिशा में लौटना और तब तुम्हे अंधेरी के लिए लोकल ट्रेन मिलेगी -लोकल ट्रेनें दनादन छूटती हैं इसलिए कोई छूट जाय तो परेशान मत होना दूसरी आ जायेगी मगर वहां ट्रेने एक मिनट भी नहीं रुकतीं इसलिए फुर्ती मगर सावधानी से चढ़ना . अंधेरी उतर कर ऑटो कर सेवेन बंगलो पहुंचना जो वर्सोवा में है और वहीं केन्द्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान पूछ लेना . एक अभिवावक की तरह उन्होंने मुझे यह पाठ अच्छी तरह पढ़ा दिया . ट्रेन में ही मेरे डिब्बे में एक और आवेदक उसी पद के लिए मिल गए .एक से भले भले दो! यहाँ मैं मुम्बई की अपनी पहली यात्रा की दास्तान को मुलतवी कर आगे बढ़ता हूँ .
संस्थान में पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं हुयी . मैं उसी दिन पहुंचा जब इंटरव्यू था . मैंने निदेशक को अर्जी दी . थोड़ी देर में उन्होंने बुलाया . आने का हेतु पूछा . मैंने तन कर जवाब दिया , आपकी निदेशक मत्स्य उत्तर प्रदेश से बात हुयी थी उसी सिलसिले में आया हुआ हूँ . उन्होंने चेहरे को भावशून्य रख फिर पूछा कि मकसद क्या है . मैंने चिनहट के प्रादेशिक संस्थान के टेक ओवर की स्थिति में खुद को आमेलित करने की बात का हवाला दिया और कहा कि आपने आज होने वाले इंटरव्यू में मुझे निदेशक मत्स्य उत्तर प्रदेश से कहकर बुलवाया है . इतना सुनते ही वे आग बबूला हो उठे-कहा कि क्या मैंने  इस पद के लिए अप्लाई किया है? . मैंने कहा नहीं, मगर निदेशक से आपकी बात .....वे फिर झुझलाये - बिना आवेदन के आपका साक्षात्कार कैसे हो सकता है . मैंने स्पष्ट जवाब दिया यह आप जानें और मेरे निदेशक।। मुझे क्रोध आ रहा था (मेरी कमजोरी) -कि इतनी दूर बुलवा लिया और अब यह कन्फ्यूजन . मेरे निदेशक और इनमें कोई न कोई फाऊल प्ले तो कर रहा था . उन्होंने कहा वेटिंग लाउंज में जाकर बैठिये .
आश्चर्य, इंटरव्यू के लिए मेरा नाम पुकारा गया . इंटरव्यू में सरल सरल सवाल पूछे गए . मसलन मुम्बई में कौन सागर है अदि आदि . मुझे याद है मैं अपने तमाम रिश्तेदारों के आग्रह के बाद भी वहां रुका नहीं था . हाँ चौपाटी, जुहू घूमा . तारापोरवाला  का विशाल ऐक्वेरियम देखा और रात की गाडी से घर वापस हो चला . मेरे साथ इंटरव्यू देने वाले सहयात्री भी बिना रिजर्वेशन मेरे भरोसे साथ हो लिए थे . और रास्ते भर दायाँ बाजू बायाँ बाजू बोलते आ रहे थे -हद है केवल एक दिन में ही वे बंबईया बोली बोलने लगे थे . हममें से ज्यादातर लोगों के सांस्कृतिक संस्कार ऐसे ही हैं -अपनी भाषा बोली भी चमक दमक के आगे फीकी पड़ जाती है . मैंने उन्हें बम्बईया बोलने से टोका भी मगर उनका दायाँ बाजू बायाँ बाजू बदस्तूर जारी रहा जैसे यह उनकी जुबान पर चढ़ गया हो ...
जारी .....

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

और ज़िंदगी चल पडी .....(नौकरी के तीस वर्ष-श्रृंखला )

चिनहट में 'सादा जीवन उच्च विचार' का सिद्धांत परिस्थितियोंवश ही सही व्यवहार में आ गया था। पत्नी भी खुश थीं . रोटी कपडा और रहने को एक मकान - इस दुनियां में भला और क्या चाहिए? ज़िंदगी चल पड़ी थी . मेरे एक रिश्तेदार जो इंजीनियर थे और ज़ाहिर है समाज में उनका मान सम्मान मुझसे कहीं ज्यादा रहा है -यह सुनकर कि मुझे रहने को सरकारी मकान मिल गया है और हम चैन की वंशी बजा रहे हैं तो अगली लखनऊ मीटिंग के बाद असलियत जानने ही आ पहुंचे -उन्हें किंचित  भरोसा न था . हमने उनकी प्रथम अतिथि के रूप में देवोपम आवाभगत की -अब वे जब भी लखनऊ आते तो सीधे चिनहट आ जाते और यह अवसर महीने में एक बार तो आता ही कभी कभी दो बार भी. वे पता नहीं एक लम्बी सांस लेकर क्यों कहते अब तो आपका सब काम ही फिट हो गया . . अब यहीं आप जमीन ले लेगें और मकान बन जाएगा और यही आराम से रहते एक दिन आप इस संस्थान के प्राचार्य भी बन जायेगें - मैं इस दुनियादारी की बात समझ न पाता और जमीन जायदाद के पचड़े में तो मैं पड़ा ही नहीं कभी .
हर सप्ताह केवल तीन लेक्चर लेने होते थे . दूसरे व्याख्याता आर सी श्रीवास्तव जी थे जो रिटायरमेंट के कगार पर थे और अनुभवों का बड़ा जखीरा उनके पास था . मैं बुजुर्ग होने के नाते और उनके व्यावहारिक ज्ञान के कारण उनकी बड़ी कद्र करता था .संस्थान के प्राचार्य ऐ के राय साहब बंगाली भद्र पुरुष थे और ईमानदार थे. मुझे सरकारी नौकरी की तमाम बातों को बताते . अब चूँकि चिकित्सा के पुश्तैनी धंधे वाले परिवार से पहले सदस्य के रूप में मैं सरकारी नौकरी में आया था तो मुझे इन सीखों की बड़ी आवश्यकता सी लगती थी . जबकि खुद के अनुभव ने सिखाया कि कोई नौकरी हो सरकार की या किसी की भी -नौकरी चाकरी ही है -आप स्वतंत्र नहीं है और फन्ने खां नहीं बनना चाहिए . सबते सेवक धरम कठोरा! सेवक तो सेवक ! उसे मालिक बंनने के उपक्रम नहीं करने चाहिए . और अगर सेवकाई रास नहीं आ रही है तो सरकारी सुख सुविधाओं का त्याग कर सार्वजनिक जीवन में आकर अपनी किस्मत आजमानी चाहिए . यह मैं आज कह रहा हूँ -जबकि मैंने भी सेवा के दौरान कई बार इस विवेक को खोया और हर बार यही सीख पाया हूँ .
मुझमें भौतिकता के प्रति कोई लगाव नहीं रहा है -ऐसा बचपन से नहीं है बल्कि किशोरावस्था से ही मुझे चमक दमक, गाडी घोडा, वैभव भरी जिन्दगी से अरुचि रही है -मैंने कभी किसी से अपनी सुख सुविधा के लिए कुछ नहीं माँगा है -आज तक उधार तो किसी से लिया ही नहीं भले ही मुसीबतें झेल ली हैं . यह अकारण नहीं है बल्कि एक समृद्ध परिवार में परवरिश ने मुझमें किसी भी चीज की 'हाही' उत्पन्न नहीं होने दी थी ...चेतक स्कूटर था हमारे पास और उस पर नवविवाहिता पत्नी को बिठा चिनहट से पंद्रह किलोमीटर दूर लखनऊ शहर -हजरतगंज ,अमीनाबाद हर हप्ते के दो तीन दिन तो जरुर ही घूमता था -अनगनित फिल्म देखता रहा . कभी कभी तो रात नौ दस बजे लौट पाता -मुझे आश्चर्य है कि तब इतना अपराध भी नहीं था . रात होते ही लखनऊ से बाराबंकी रोड तब वीरान सी होने लगती थी . लखनऊ -चिनहट के मध्य में हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड का कारखाना (एच ऐ एल ) पड़ता था -यहाँ तक तो कुछ प्रकाश भी रहता मगर आगे बढ़ते ही घुप अँधेरा और हमारी हिमाकत देखिये कि ऐसे हालत में पत्नी को बिठाये हम चिनहट और वहां से तीन किलोमीटर और दूर मत्स्य प्रशिक्षण संस्थान की निपट वीरान सड़क और घर पहुँचने के ठीक पहले के कब्रिस्तान से गुजरते थे -सच है मूर्खता में अतिशय वीरता भी छुपी होती है ! :-)
एक रात अप्रत्याशित घटना हो ही गयी . अभी हम आधे रास्ते यानि गंतव्य से आठ नौ किलोमीटर दूर ही रहे होंगे कि ऐकसीलेरेटर का तार टूट गया . घुप अँधेरा! स्कूटर खडी हो गयी -अब क्या करें ?बुद्धि ने जवाब दे दिया -दूर दूर तक अँधियारा . अब डर लगने लगा -अकेला होता तो कोई बात नहीं, नयी उम्र थी स्कूटर खींच लाता मगर साथ में पत्नी थीं और सहज बुद्धि ने कहा कि उन्हें साथ लेकर इतनी दूर की चहलकदमी तो समस्याओं का आमंत्रण ही थी . बुद्धि तेजी से रास्ता तलाश रही थी और वह रास्ता सूझा भी -स्कूटर की लाईट ठीक थी . उससे रोशनी मिली तो देखा तार ऊपर से टूटा था और उसका आख़िरी छोर उसकी कवरिंग के नीचे दिख रहा था . अब उपाय सूझा . मैंने पत्नी को समझाया कि एकिसेलेरेटर के इस तार को अच्छी तरह पकड़ के वे बस थोडा तनाव उस पर बनाएं रखें .तार  खीच कर उन्हें थमा स्कूटर स्टार्ट कर क्लच के सहारे नियंत्रण बनाकर हम आगे बढे . अब कुछ मत पूछिए कि वह आठ नौ किमी की दूरी कैसे पूरी हुयी मगर यह युक्ति कारगर रही और यह दूरी करीब एक घंटे में पूरी कर रुकते रुकाते हम रात यही कोई साढ़े दस बजे आवास पर पहुँचे . कुछ ऐसी ही कथा देवासुर  संग्राम   में  लड़ते हुए चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ की नहीं  थी?.. जब रथ के पहिये की धुरी टूटी और कैकेयी ने अपना  हाथ धुरी की जगहं दे दिया ....वह मिथक था मगर यह सच :-) .... यह घटना मुझे और पत्नी को आज तक याद है और वह खौफ भी जिससे हमें गुजरना पड़ा था . हमने अब आगे जल्दी ही गंजिंग (हजरतगंज विहार आज भी गंजिंग कहलाती है वैसे यह टर्म मेडिकल स्टूडेंट में ज्यादा पापुलर है ) पूरा कर लौटने का कार्यक्रम बना लिया था . और अपना लेक्चर लेने के बाद अपराह्न ही हजरतगंज पहुँच यदि फिल्म भी देखनी हो तो साहू, मेफेयर से शो छह बजे ख़त्म होते ही चल पड़ते थे . चौधरी या मोतीमहल से खाने वाने को कुछ पैक करा लेते थे .. एक शानदार ज़िंदगी थी वो, अच्छे बॉस और अच्छे लोग . मगर हालात बदलने वाले थे ...

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

नौकरी के वर्ष तीस! (श्रृंखला-2)

पहला भाग
नौकरी मिल गई थी -स्थानापन्न थी मगर कमीशन से थी . व्याख्याता का राजपत्रित पद, मगर यह समझ में ही न आये कि स्थानापन्न का मतलब क्या होता है . कई महीनों बाद जाकर सटीक अर्थबोध हुआ कि कोई  मेरे पद पर था मगर कहीं अन्यत्र चला गया है ,मगर उसका 'धारणाधिकार' इस पद पर बना हुआ है . मतलब उसके आते ही मेरा पत्ता गोल। यह सुनकर मेरा दिल बैठने लगता और मैं सोचता कि फिर लोक सेवा आयोग से चुन कर आने का मतलब ही क्या रह गया। अब नए नए शासकीय शब्द मेरे शब्द कोष में जुड़ने लग गए थे -संतोष यह था कि पद स्थायी था। जानकारी यह भी मिली कि जिस सज्जन के पास इस पद का मूल धारणाधिकार था वे फील्ड में थे और जल्दी रिटायर हो जाने वाले थे .कोई 'सरस' पद छोड़कर आखिर यहाँ क्यों आएगा भला -लोग मुझे आश्वस्त करते! मुझे यह भी बाद में पता लगा कि इन्ही सज्जन ने मेरी पोस्टिंग भी इस पद पर जोड़ तोड़ से रुकवाई हुयी थी और  एक साथ फील्ड का और प्रशिक्षण संस्थान दोनों पद को फंसाए हुए थे . यह तो ताराचंद छात्रावास के मेरे सहवासी बी पी सिंह (अब स्वर्गवासी ) जिन्हें अंग्रेजी में कमांड हासिल था द्वारा ड्राफ्ट किया हुआ विशेष सचिव महोदय .के नाम एक पत्र था जिसने संभवतः कमाल किया -जिसमें मेरे कमीशन से चयन के बाद भी छह माह तक नियुक्ति लटकाए जाने की बात तो थी ही ,एक वाक्य यह भी था 
" मैडम कैसे कोई आपके अंडर का अधिकारी आपकी सुपरमैसी को दरकिनार कर हीला हवाली करता जा रहा है' पता नहीं उस पत्र के प्रभाव में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का विभागीय निदेशक मत्स्य पर एक  धौन्स थी या कुछ और बात एक दिन एक हरकारा मुझे ढूँढता मेरे होस्टल में पहुंचा और तुरंत निदेशक मत्स्य से मिलने के लिए फरमान सुनाया . दोस्तों ने मुझे उत्साहपूर्वक प्रयाग स्टेशन से लखनऊ रवाना किया और मत्स्य निदेशालय पहुँचने पर तत्कालीन निदेशक श्री ऐ के सिंह ने मुझ पर रौब जमाते हुए आखिर नियुक्ति पत्र थमा दिया और फिर अपराह्न में मैंने चिनहट जाकर आपनी योगदान सूचना उसी दिन, तेरह सितम्बर 1983 को दे भी दिया .
जब मैंने ताराचंद छोड़ा तो मेरे कमरे 6 /50 में विज्ञान के वैश्विक साहित्य की चुनिन्दा और महंगी किताबे थीं जिन्हें अपने एक ऐसे मित्र के भरोसे छोड़ आया जो अपने जिले जवार के थे और अपेक्षाकृत ज्यादा भरोसेमंद थे . इन पुस्तकों को मैंने उस समय पत्र पत्रिकाओं में छप रहे अपने लोकप्रिय विज्ञान साहित्य के पारिश्रमिक से खरीदा था . एक अच्छा ख़ासा संग्रह था . मगर जब मैं अपना कमरा खाली करने पहुंचा तो पाया कि इक्का दुक्का फालतू समझ कर छोड़ी गयी किताबों के अलावां सारी किताबें गायब हो चुकी थीं . मित्र सफ़ेद झूंठ बोलने में लग गए- एक गढ़ी कहानी सुनाई . मैं हतप्रभ! यह दुनियां कैसे मक्कारों से भरी पडी है यह मेरा जीवन का सबसे कटु अनुभव था -मेरा सबसे प्रिय खजाना लुट चुका था -साईनटीफिक अमेरिकन की कई जिल्दें ,डेज्मांड मोरिस की पुस्तकें ,हिन्दू धर्म दर्शन पर पेंगुइन से प्रकाशित पुस्तकें -अब तो उन्हें याद करके भी मन भारी हो जाता है . बहरहाल जी कड़ा कर इस सदमें को बर्दाश्त किया . अभी तो कितने  सदमें बर्दाश्त करने बाकी थे -तब यह कहाँ पता था .
उन दिनों मेरे संयुक्त निदेशक के डी पाण्डेय साहब थे जो बस्ती के एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे .  .ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे, अब भी वे हैं . उनसे पहली ही मुलाक़ात अनवेलकम सी रही -उन्होंने कहा कि मैं कहीं और क्यों ट्राई नहीं करता . जाहिर है वे मेरी नियुक्ति से खुश नहीं थे . मुझे यह अच्छा नहीं लगा था क्योंकि तब शासकीय सेवाओं की 'हाईआर्कि' और उसमें भी मछली विभाग की हैसियत से मैं वाकिफ नहीं था। उनकी अनवेलकम टिप्पणी दरअसल एक हितैषी के रूप में की गयी थी मगर मैं उसे उस संदर्भ में ले नहीं सका -लेता भी कैसे, मुझे दुनियादारी का कतई ज्ञान न था . मगर यह तो एक जलालत भरी नौकरी की शुरुआत भर थी . अब एक ख्यात विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और "किताबी" ज्ञान लेकर मैं अपने को पता नहीं कौन सा फन्ने खां समझ रहा था -व्यावहारिक सच्चाई कुछ और ही थी . मेरे कई रिश्तेदार भी मैं किस नौकरी और पद पर हूँ बताने पर हैरत से मुझे देखते और कहते यह भी कोई विभाग हुआ भला . और शुद्ध परम्परावादी ब्राह्मण के घर में पैदा होकर मछली विभाग में नौकरी ..छिः छिः .....मगर मुझे विषय और काम में सदैव पूरी रूचि रही है और इस विषय से नहीं मगर सिस्टम की बुराईयों ने मेरे हौसले को कई बार पस्त किया मगर कुछ ऐसे लोक सेवक भी मिले जिनके चलते मेरा हौसला फिर फिर कायम हुआ जिनकी चर्चा आगे आयेगी .
जारी ....

शनिवार, 28 सितंबर 2013

वर्धा सम्मलेन:कुछ बचा खुचा ,द लास्ट सपर और क्वचिदन्यतोपि! (समापन किश्त )

 किश्तें -पहली ,दूसरी ,तीसरी ,चौथी , पांचवीं और अब आगे पढ़िए आख़िरी किश्त..........
अब सिद्धार्थ शंकर जी का अनुरोध कि जो कुछ बचा खुचा  है उसे भी मैं पूरा कर दूं को आखिर कैसे अनदेखा कर सकता हूँ ? इनके बारे में कवि गोष्ठी में मैंने कहा था " तात जनक तनया यह सोई धनुष जज्ञ जेहिं कारण होई " :-) चलिए कुछ और यादगार बातें आपसे साझा कर लेता हूँ . कुलपति महोदय -विभूति नारायण राय जी के स्नेहिल सानिध्य ने मन को गहरे छुआ .उनके बारे में थोड़ी चर्चा पहले भी हो चुकी है। एक व्यक्ति के रूप में वे बहुत सहज हैं और प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करते रहते हैं .भारतीय पुलिस सेवा ने इन्हें एक वह दृष्टि भी दी है जिससे एक नज़र में ही लोगों को पहचान लेते हैं . मैंने इनकी इस क्षमता का साक्षात किया है और चकित हुआ हूँ! इस बार मिलते ही इन्होने मुझसे एक शख्स के बारे में पूछा और मैंने बता दिया कि वे उस शख्स के बारे में बिलकुल सही थे. मैं चूँकि इस मामले में बचपन से ही बड़ा बोदा हूँ -बहुत ही जल्दी लोगों का विश्वास कर लेता हूँ , प्रभावित हो जाता हूँ और धोखे खाता हूँ . काश मुझे भी राय साहब जैसी दृष्टि मिली होती तो जीवन के कितने कटु अनुभवों से बच गया होता .
 सूत्रधार  सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
सम्मलेन की दूसरे दिन राय साहब हम लोगों को नजीर हाट ले गए .वर्धा विश्वविद्यालय परिसर के भीतर हर जगहं एक विशिष्ट सा सौन्दर्य बोध और कलात्मकता बिखरी हुई है . हर्षवर्धन की निगाह ने भी इसे कैद किया है . नजीर हाट में कुलपति जी के सौजन्य से लोगों ने -संतोष त्रिवेदी ,अन्ना भाई , सिद्धार्थ जी सभी ने कुछ खाया पीया - मुझे एक मिठाई जिसे वहां गोरस कहा जा रहा था और हम लोगों की तरफ बनारस में नान खटाई कहते हैं पसंद आयी . मनीषा को काली चाय की तलब थी मगर वो मिली नहीं -याद नहीं उन्होंने कुछ खाया भी या नहीं . कुछ मित्रों ने दूध भी छक के पिया मगर मैंने मना कर दिया कि अब दूध पीने की मेरी उम्र न रही . सबके खा पी लेने के बाद कुलपति महोदय ने दुकानदार से कहा कि अभी तो मेरी जेब में पैसे ही नहीं हैं -तुम हिसाब भेज देना कल भिजवा देगें . दुकानदार बहुत कातर भाव में आ गया -"नाथ आज मैं काह न पावा" की भाव भंगिमा बन गयी उसकी -मैंने कहा कि ऐसे दानिशमंद तुम्हारी दुकान पर बार बार आयें और उधार करें तो तुम्हारा सचमुच उद्धार हो जाय .
राय साहब ने अपने आवास पर एक रात्रि भोज पंचायत आख़िरी दिन को आमंत्रित किया उसमें सिद्धार्थ एवं रचना त्रिपाठी जी ,इष्टदेव सांकृत्यायन , मनीषा पाण्डेय और यह खाकसार भी था . यह वर्धा का हमारा आख़िरी सपर ( दिन का आख़िरी खाना) था . भोजन के पूर्व लैंगिक भेद विमर्श के साथ तुलसी की भी अनाहूत चर्चा शुरू हो गयी . मनीषा को इस बात पर आश्चर्य था कि आज भी क्यों हिन्दी के विभागों में अन्य कितने विषयों के बजाय (अब जैसे लैंगिक विभेद ही ) तुलसी पर शोध जारी है . मैं तो तुलसी भक्त हूँ तो हठात अपनी उग्र प्रतिक्रिया को रोका -मनीषा, अब मैं आपको कैसे समझाऊँ राम चरित मानस एक अनुपम विश्व साहित्य है, मगर इसका भान बिना पढ़े नहीं हो सकता -आज के अनेक युवा अपने देशज समृद्ध साहित्य की उपेक्षा कर पश्चिमी साहित्य पर लहालोट होते रहते हैं . गांधी जी ने अपने देशज साहित्य का विपुल अध्ययन किया था और पश्चिमी साहित्य का भी खूब अनुशीलन किया था . मुझे लगता है पश्चिमी जीवन दृष्टि और भारतीय जीवन दर्शन के बीच का एक संतुलन अधिक उपयुक्त है .
फिर वी सी साहब का वह बहुश्रुत छिनाल प्रसंग छिड़ गया -हिम्मती मनीषा ने सपाट और बेबाक पूछ लिया कि कोई नारी अगर सौ पुरुषों के साथ हम बिस्तर होती भी है तो किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? वातावरण तनिक असहज सा हुआ . राय साहब ने पूरे प्रसंग को स्पष्ट किया -यह बात भी आई कि छिनार शब्द का अंग्रेजी में गलत अनुवाद "वैश्या' हो गया और व्यर्थ का हो हल्ला मचा -एक बार फिर सबने छिनार/छिनाल शब्द की सोदाहरण व्याख्याएं की -मैंने कहा यहाँ जेंडर भेद नहीं है क्योंकि पुरुष के लिए भी समानार्थी शब्द छिनार है . बहरहाल गर्मागर्म चर्चाओं के बाद गर्मागर्म और घर के बने सुस्वादु भोजन ने सभी को संतृप्त किया -चिकेन का प्रेपरेशन मनीषा का ख़ास पसंद था . बीती रात चेले संतोष ने इसका रसास्वादन किया था तो गुरु का भी इसे चखने का फर्ज बनता था , शाकाहारी व्यंजन भी बहुत सुस्वादु बने थे . खान पान को लेकर मेरा कोई विशेषाग्रह नहीं मगर सार्वजनिक तौर पर शाकाहार पसंद करता हूँ ! त्रिपाठी दंपत्ति तो गांधियन शाकाहारी/अन्नाहारी हैं। मुझे याद नहीं सांकृत्यायन जी ने क्या खाया था? मगर जब रात साढ़े दस बजे हम सभी को कुलपति महोदय ने विदा किया तो सभी के चेहरे पर एक चिर संतृप्ति का भाव था . विचारों के साथ ही पेट को भी पर्याप्त और रुचिकर भोजन मिल गया था .
अब बस!

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