रविवार, 29 नवंबर 2009

यह नायिका अन्यसंभोगदु:खिता है! (नायिका भेद -११)











यह नायिका अन्यसंभोगदु:खिता है!


"अरी ,दुष्ट मैंने तो तुम पर विश्वास कर  प्रिय तक बस एक सन्देश ले जाने को भेजा था  ,मगर यह तो सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम उनसे ही रासरंग  रचा  बैठोगी! अरी विश्वासघातिनी ,यह तेरा अस्त व्यस्त श्रृंगार ही सारी बाते बता दे रहा है ,रति चिह्न सारी पोल खोल रहे हैं  ,यह खुली वेणी ,लम्बी निःश्वास -उच्छ्वास और पसीने से तर बतर तुमारा ये  बदन -रे कलमुही,  क्या महज यह सब मुझे दिखाने मेरे पास आई हो -चल दूर हट जा मेरी नजरो से अब!" 

यह भी तो हो सकती है आज की दुखिता


 







                                                                                                               
..डांट खाकर !


  यह नायिका अन्यसंभोगदु:खिता है जो अपनी दूती /सखी पर प्रिय के रति चिह्नों को देख विस्मित और सहसा दुखी हो गयी है !



       ..और यह  भी कहीं न हो जाय? किमाश्चर्यम?? 
  
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी ऐसी नायिकाएं क्यों नहीं हो सकतीं? युग दृश्य और पात्र बदल गए तो क्या हुआ मानव मन  तो अभी भी बहुत कुछ वैसा ही तो है ना ? अथवा नहीं?                                                                             


और कल की दुनिया में भी क्या नहीं रहेगी यह नायिका?



                                                              

चित्र साभार:स्वप्न मंजूषा शैल

शनिवार, 28 नवंबर 2009

एक और व्यथित नायिका है -विप्रलब्धा!(नायिका भेद-१०)


अनूढ़ा और परकीया के अधीन ही एक और व्यथित नायिका है -विप्रलब्धा !नायक को पूर्व निश्चित किये गए समय पर संकेत स्थल पर न पाने वाली व्यथित  नायिका ही विप्रलब्धा है .


राकेश गुप्त की यह कविता विप्रलब्धा की व्यथा को चित्रित करती है-


प्रिय से था अनुबंध मिलन का ,
खुशी खुशी थी चली गयी मैं ;
पर अभिथल पर नहीं मिले वे ,
मर्माहत थी ,भली  गयी मैं ;
चार घड़ी की व्यर्थ प्रतीक्षा ,
समय चक्र में दली  गयी मैं ;
वंचक का विश्वास किया था,
इसीलिये तो छ्ली   गयी मैं 






चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

कवि को श्रद्धा सुमन!

आज मेरे प्रिय कवि हरिवंशराय बच्चन जी की १०१वी जयंती है -इस अवसर पर उन्हें उन्हें उनकी ही कविताओं को पढ़ते हुए,गुनगुनाते हुए  श्रद्धा सुमन अर्पित करने का मन है - निशा निमंत्रण उनका एक कालजयी गीत संग्रह है जो मानव मन  के कितने ही आवर्त विवर्तों को समेटे हुए है .सच बताऊँ इस महान कवि की कविताओं ने मुझे अनेक उन अवसरों पर राहत दी है जब मैंने खुद को  क्लांत ,अकेला ,असहाय और छला हुआ पाया है .ये मेरी पीडाओं से साझा तो करती रही हैं मगर जीवन के उज्जवल पक्षों की ओर भी निरंतर प्रेरित करती रही हैं .
निशा -निमंत्रण से एक गीत आपके लिए भी -बाकी तो हम आज दिन रात कई स्वरान्जलियाँ कवि को अर्पित करते रहेगें -

दिन जल्दी जल्दी ढलता है!

हो जाय न पथ में रात  कहीं ,
मंजिल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी जल्दी चलता है !
दिन जल्दी जल्दी ढलता है !


बच्चे प्रत्याशा में होगें 
नीड़ों से झाँक रहे होगें -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
दिन जल्दी जल्दी ढलता है !


मुझसे मिलने को कौन विकल ?
मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
यह प्रश्न शिथिल करता  पद को ,भरता उर में  विह्वलता है !
दिन जल्दी जल्दी ढलता है !



इसे सुनते भी तो जाईये !




                                                                       

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

प्रेमातुर नायिका है अभिसारिका!(नायिका भेद -९)

किसी निश्चित समय और स्थान पर प्रियतम से मिलने के लिए जाने वाली प्रेमातुर नायिका अभिसारिका है !चित्रकारी के संदर्भ में  एक प्रासंगिक विवरण जो नेट पर भी मौजूद है इस प्रकार  है -
"अभिसारिका ऐसी नायिका है जो किसी भी जोखिम की परवाह न करते हुए अपने प्रेमी से मिलने निकल पड़ती है। उसे विभिन्न कवियों ने अलग-अलग नाम दिया है। पहाड़ी (हिमाचली) कलाकारों का वह प्रिय विषय रही है। कृष्ण अभिसारिका और शुक्ल अभिसारिका दो तरह की नायिकाएँ हैं जो चांद की स्थिति के अनुसार कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष के दौरान अपन प्रेमी से मिलने निकलती हैं। एक आकर्षक चित्रकारी में कृष्ण अभिसारिका ने नीला दुपट्टा ओढ़ रखा है और वह रात में अकेली जा रही है। अंधेरी रात है और बादल छाए हुए हैं और रुक रुककर बिजली चमक रही है। जंगल में सांप हैं और भूत-पिशाच तथा डाइनें घूम रही हैं। जंगल के भय से बेखौफ- तूफान, सांपों, अंधेरों के आतंक की तनिक भी परवाह न करते हुए नायिका प्रेमी के प्रति जनून लिए उसकी तलाश में निकल पड़ी है।" 




-वाह ,ऐसी नायिका की हिम्मत के क्या  कहने !निर्भय ,सापो से भी घिरी मगर  कितना समर्पित है वह अपने प्रेम और प्रियतम के प्रति ! राकेश गुप्त ने ऐसी नायिका की तारीफ में कुछ पंक्तियाँ यूं लिखी हैं ...
दो उन्नत उरोज आतुर थे
आलिंगन में कस जाने को ;
फड़क रहे अधरोष्ठ पिया के 
प्रियतम के चुम्बन पाने को ;
चंचल थे पद चक्र  कामिनी -
अभिथल तक पहुचाने  को  ;
तन से आगे भाग रहा मन 
मनमोहन में रम जाने को 


अभिसारिका जैसी  स्थितियां सामन्यतः अनूढा और परकीया में ही दृष्टव्य हैं .राधा का कृष्ण प्रेम  परकीया ही है!
चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल  

 


सोमवार, 23 नवंबर 2009

......और यह है कलहान्तरिता नायिका ! (नायिका भेद -8 )

वह नायिका जो क्रोधवश दोषी नायक  को अपने से दूर करने के बाद फिर पश्चाताप करने लगती है वही कलहान्तरिता  है -जरा यह   विवरण तो देखिये -




"सखी ,भले ही उन्होंने 'वो ' गलती कर दी थी  मगर वे अपने किये पर लज्जित भी तो थे ,और वे कितना पछता भी तो रहे थे .मगर सौत से डाह के चलते मेरी चिढ और जिद के आगे उनकी कहाँ कुछ चल पायी थी -उनकी सारी मान मनुहारों निष्फल ही तो हुयी  थी ....और तो और वे मेरे पैरों पर भी गिर पड़े थे और बोल उठे थे ,"मेरी जान मुझे बस  इस बार माफ़ कर दो "लेकिन मैं  तो निष्ठुर हो गयी थी और फिर हताश से वे चले गए थे -आह अब मैं कितना पछता रही हूँ ..यह मैं ही जानती  हूँ ! "


                                                                           पश्चाताप! 

चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल
कल चर्चा होगी अभिसारिका की ....

रविवार, 22 नवंबर 2009

एक शाम गिरिजेश ने की मेरे नाम!

अभी अभी तो गिरिजेश गए हैं ! थोड़ी रिक्तता तिर आई है ! सपरिवार आये थे किसी सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने ! ब्लॉगर स्नेह सौजन्य ऐसा कि मुझसे मिलने आ गये ! उनकी सदाशयता ,विनम्रता ने मेरी एक शाम को सुखानुभूतियों से भर दिया ! रहे तो वे महज एक घंटे मगर इसी में हमने मानो एक युग जी लिया ! वो कहते हैं न कि मिलन की दीर्घावधि की तुलना  में उसकी गहनता ज्यादे मायने रखती है ! हम खूब हँसे ,खिलखिलाए ,नाश्ता पानी किया ,थोड़ी ब्लागरी पर बतियाया ,एक फार्मल फोटो सेशन किया !




   आगे कौस्तुभ और अरिदम ,पीछे दायें से गिरिजेश राव  ,बिटिया अलका ,श्रीमती गिरिजेश राव ,संध्या मिश्रा और मैं  (फोटो की खराब क्वालिटी  के लिए खेद है )



मैंने दो कथा संग्रह उन्हें भेट किये -'एक और क्रौंच वध  ' और अभी सद्य प्रकाशित और लोकार्पित 'राहुल की मंगल यात्रा ' ख़ास तौर पर बच्चों,बिटिया अलका और बेटे अरिदम  को भेट किया !अब इतने सरल चित्त और विज्ञ पाठक मिलें तो  यह फायदा कौन उठाना नहीं चाहेगा ! कोई बमुश्किल एक घंटे गुजार कर वे अभी कुछ पल पहले ही सपरिवार लखनऊ कूच कर गए हैं -रोका पर रुके नहीं ! अभी अभी रास्ते से ही उनका फोन भी आ गया -बाऊ के पुनरागमन पर कतिपय  प्रिच्छायें कर रहे थे....पूरी तरह ब्लॉगर चरित्र पर उतर आये हैं बन्धु !

                             बेटे अरिदम के साथ एक पोज 

 अब उनसे यह मुलाकात सार्वजनिक की जाय या नहीं इसे लेकर भी कुछ असमंजस की स्थिति रही ....मगर ब्लॉगर क्या चाहे बस एक पोस्ट की जुगाड़ -के फलसफे पर मैं कायम था मगर पत्नी को गंवारा नहीं था हर पल ब्लागिंग को समर्पित करते रहना!  फिर मैंने कुछ तार्किक चिंतन मनन किया -ब्लागर की  स्वतंत्रता (के तर्क ) का पल्लू थामा ,यह भी कि आखिर घोडा घास से यारी करेगा तो खायेगा  क्या ? और यह भी सोचकर कि जिस तेजी से गिरिजेश एक ब्लॉगर सेलिब्रिटी होने को उद्यत हैं आज यह मुलाक़ात सार्वजनिक कर आप लोगों की गवाही भी ले ले -न जाने आगे वे कहीं  पहचानने से ही इनकार न  कर दें -प्रभुता पाई काह न मद होई


ब्लागरी वर्ल्ड ने सचमुच दुनिया को एक परिवार का रूप दे दिया है -जो काम रीयल जगत नहीं कर पाया अब यह रायल जगत कर रहा है -नए नए नेह सम्बन्ध बन रहे हैं ! एक नया उत्साह जीवन को नए अर्थ दे रहा है -हम तो बहुत आशान्वित हैं !  क्या आप भी ?

शनिवार, 21 नवंबर 2009

नहीं भूलेगी वो कैटिल क्लास की मानवता !(यात्रा वृत्तांत -अंतिम भाग)

पुष्पक एक्सप्रेस से एक आशा तो थी ही कि काश यह मिथकीय पुष्पक विमान की तरह एक अतिरिक्त जगह भी दिला दे तो इसके नाम के अनुरूप काम भी हो जाय ! मगर डिब्बे मे घुसते ही थरूर क्लास की जनता की भेडिया धसान देख होश फाख्ता हो गए ! जाकिर को खुद अपनी आरक्षित बर्थ ढूंढें नहीं मिल रही थी -आखिर बर्थ नंबर १७ तक हम किसी तरह ठेल ठाल कर पहुंचे भी तो उस पर पूरा एक कुनबा विराजमान था ! पति पत्नी बंच्चे सभी पूरे अधिकार से वहां जमे थे! मुझे खुद आत्मग्लानि हो रही थी कि बिना वाजिब टिकट के मैं भी एक आक्रान्ता की तरह उसी डिब्बे में घुस आया था ! पता नही ऐसे मौकों पर मैं क्यूं अतिशय विनम्रता का शिकार हो जाता हूँ ! मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं  फूट पा रहे थे! हाँ ज़ाकिर का हड़काना जारी था -फलतः १७ तो नहीं हाँ सामने वाली बर्थ  पूरी खाली कर के दे दी गयी -हुकुम आप सब तो बैठो सामने ! मैं या तो खुद बैठ गया धम से या रिक्त बर्थ ने ही तेज गुरुत्व बल से मुझे बिठा लिया था ! वे  अच्छे विनम्र लोग थे! जौनपुरी ही थे ,मेरी ही तरह ! मुम्बई से शादी व्याह के चक्कर मे साले बहनोई अपने भरे  पूरे परिवार के साथ यात्रा कर रहे थे! उनकी भी समस्या यह थी कि उनके पास सीटें तो थी कुल चार मगर वे थे पॉँच अदद ,रेजगारिया अलग ! मतलब थरूर क्लास अपने चरित्र का पूरा निर्वहन कर रहा था !  मेरा स्कोप अब कमतर होता दीख  रहा था !

मैंने थोडा सांस संभलने पर डिब्बे के अन्तःपुर का सजग निरीक्षण किया ! विंडो बर्थ पर दाहिनी ओर एक भद्र मुस्लिम परिवार का पूरा कुनबा महज दो बर्थों पर समाया हुआ था - आठ सीटों के इस जन संकुल  स्पेस में कुल आठ बच्चे थे-पूरा वातावरण एक जबरदस्त ऊर्जा के प्रवाह ,किलकारियों से गुलजार हो रहा था ! बायीं ओर की  मोहतरमा इतनी बढियां ठेठ अवधी बोल रही थी कि मैं मंत्रमुग्ध  हुआ जा रहा था - कोई खाटी अग्रेज भी क्या इतनी धाराप्रवाह अंगरेजी बोलेगा ! रहा न गया तो मैंने भी ठेठ में पूंछ लिया कि आखिर यह नारी प्रतिभा कहाँ से बिलांग करती हैं -जवाब मिला गोंडा ! और प्रश्न के जवाब देने के एवज में उन्होंने अपने लगातार रोये जा रहे बच्चे को डांट कर चुप करते रहने का जिम्मा मुझे पकड़ा दिया ! किसी अजनबी पर इतना भरोसा या अधिकार ? सहसा मैं असहज होते हुए भी इस नए मिले काम को अंजाम देने में लग गया !

जाकिर तब तक कुछ और रोबदाब  दिखा कर ऊर्ध्वगामित यानि सबसे ऊपर के बर्थ पर लम्ब लेट चुके थे! और कमाल देखिये मैं इधर थरूर क्लास की मानवता की सेवा में जुटा/जुता खुद मानवीय होता रहा  - पूरे ६-7 साथ घंटे और जाकिर ऊपर सोते रहे -बाद में मासूमी से बोले थे कि वे बस पलक ही मूदे थे-भला चिल्ल पो में किसी को नीद भी आती है ! बहरहाल उनकी साफगोई किसी को भी कन्विंस नहीं कर पाई थी ! सब मन ही मन सोच बैठे थे कि चलो किसी एक ने तो अपना नीद का कोटा पूरा कर लिया है -सभी को रात में सोने की रणनीति तंग कर रही थी ,खास तौर पर मुझे !

इसी बीच टी टी भी आ कर जा चुका था -मुझसे उसने बिना वाजिब टिकट के यात्रा करने पर लगने वाली फाईन २५० रूपये और साधारण तथा स्लीपर क्लास के टिकट का डिफ़रेंस किराया कुल ४५० रूपये वसूल कर लिए थे -मगर कुछ अतिरिक्त शुल्क  में पूरी ट्रेन में किसी भी श्रेणी में बर्थ दिला पाने के मेरे प्रस्ताव को पूरी ईमानदारी से उसने ख़ारिज कर दिया था ! आखिर ईमानदारी दिखने का मौका बार बार थोड़े ही आता है ! जब ट्रेन पुष्पक हो और खचाखच भरी हो ,फिर तो ईमानदारी छलक ही पड़ती है ! बहरहाल मैं अब तक काफ़ी विनम्र हो चुका था और कोई जो भी कुछ कहता था फौरन ही मान  लेता था ! तभी जानकारी हुई कि ट्रेन तो भोपाल  से होकर जायेगी ! मुझे कई ब्लॉगर बन्धु याद आ गये ! एकबारगी तो घोर इच्छा हुई कि किसी/कुछ  को फोन कर स्टेशन पर ही बुला लूं मगर फिर लगा कि वे यहाँ ब्लॉग पर तो आते नहीं स्टेशन तक क्या आयेगें ! वैसे आज पाबला जी से कोई ब्लॉगर  बन्धु आकर मुरैना स्टेशन पर मिल लिए हैं ! अब अपना अपना नसीब है भाई! फिर मन  हुआ कंचन जी को फोन करुँ और भोपाल में ही इस विपदा से मुक्त हो लूं ! मगर फिर घर जल्दी पहुँच जाने का सहज बोध जोर मारने लगा ! हरिवंश राय  जी की कविता बदस्तूर याद हो आई.....बच्चे प्रत्याशा में होंगे ,नीड़ों से झाँक रहे होंगे -यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है ...दिन जल्दी जल्दी ढलता है ! ट्रेन तेज गति से भागती जा रही थी!

लगता है जाकिर ने रात्रि शयन की एक रणनीति पहले ही बना रखी थी ! मुझे पूरी बर्थ दे दी, खुद नीचे अख़बारों पर चद्दर बिछा और दोहर में मुंह छुपा अव्यक्त हो गए -और मुझे अपनी अव्यक्त कृतज्ञता की असहज अनुभूति के साथ रात बिताने की सौगात दे दी ! कहने को ही कैटिल क्लास है ,यहाँ तो मानवता के कूट कूट के दर्शन हुए ! सुबह लखनऊ समय से आ गये थे! फिर  उच्च दर्जे का बनारस तक का टिकट ३३४ रूपये मे लेकर अमृतसर हावड़ा मेल की ३ ऐ सी में जा विराजा ....मात्र ६१ रूपये का अंतर अदा किया और शाम तक वाराणसी पहुंचा तो खूब  उत्फुल्ल ,प्रफुल्लित था !

खंडिता है यह नायिका :(षोडश नायिका -७)

वह नायिका खण्डिता  हो रहती है  जब  अचानक यह प्रामाणिक तौर पर मालूम हो जाता है  कि उसके  प्रेमी /पति ने उससे बेवफाई कर किसी और से प्रणय सम्बन्ध स्थापित कर लिए हैं - उसकी घोर व्यथा ,संताप/प्राण  पीड़ा और तद्जनित आक्रोश  की मनोदशा उसे जो भाव भंगिमा प्रदान करती है वह साहित्यकारों की दृष्टि में खण्डिता नायिका की है!


 ऐसे नहीं घर में घुसने दूगीं ,पहले बताओ यह सब क्या करके आ  रहे हो ?
"रात बीत बीत गयी अपलक  प्रिय की प्रतीक्षा में ...वे नहीं आये और अब सुबह लौटे भी हैं तो यह क्या हालत  बना रखी है - होठो पर काजल और गालों पर किसी के होठों की लाली और माथे पर पैरों का आलता ? आँखें भी उनीदीं ! ओह समझ गयी मैं  ,अभी मैं इनकी गत बनाती हूँ ! " 


( नायक ने बीती रात अपनी दूसरी प्रेयसी के साथ गुजारी है ,प्रणय संसर्ग के चिह्न शेष सब गोपन उजागर कर दे रहे हैं -क्या क्या गुल नहीं  खिले हैं  ... दोनों जन में पारस्परिक प्रेम व्यापार  का खूब आदान प्रदान हुआ है -होठो पर काजल होने का अर्थ है  सौत की आँखों का चुम्बन ,गाल पर लिपस्टिक प्रत्युत्तर  है उस चुम्बन का ,हद है धोखेबाज  ने सौत के पैरों पर शायद उसकी मान मनौअल में सर भी रख दिया है ,तभी तो पैरों का आलता माथे पर तिलक सरीखा जा लगा है ! और फिर यह होने में रात यूं ही बीत गयीं -उनीदीं आँखों का यही सबब है. ) .

 जीवन शैली बदली मगर क्या जीवन भी ?
आखिर कैसे बर्दाश्त हो नायिका को साजन की यह सब ज्यादतियां -खण्डिता नायिका अब मानवती बन बैठती है ! उलाहना -भाव प्रबल हो उठता है -"तुम जाओ जाओ मोसे  न बोलो सौतन के संग रहो ....अब होत प्रात आये हो द्वारे यह दुःख कौन सहे ...या फिर... कहवाँ बिताई सारी रतिया ....साँच कहो मोसे बतिया ....पिया रे साच कहो मोसे बतिया ! (यादगार ठुमरियों  के अमर बोल हैं ये ) 

मानवती नायिका, नायिका का एक उपभेद है जिकी चर्चा हम आगे करेगें !

चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

......आखिर कैसे छूटी ट्रेन और फिर शुरू हुआ 'कैटिल क्लास' का सफ़र ! (यात्रा वृत्तांत -२)

आखिर बनारस सुपर फास्ट ट्रेन छूट गयी ...और हम खड़े खड़े ,प्लेटफार्म पर जड़े जड़े गुजर गयी ट्रेन का हिसाब जोड़ते रहे ! मुझे जो समय ट्रेन के छूटने  का मालूम था ,वह था ११.४० और ट्रेन ठीक दो घंटे पहले बिलकुल सुई की नोक के ९.४० पर पहुँचते ही छूट चुकी थी ! आखिर यह गफलत हुई कैसे ? बहुत सी स्थितियां जिम्मेदार रहीं इसकी ! बल्कि सारी परिस्थितियाँ ट्रेन के छूट जाने की ही ओर अग्रसर होती रहीं और मैं उनसे बेखबर सम्मलेन और अन्य बातों की ओर बकलोल सा ध्यान केन्द्रित किये रहा !  एक वार्षिक त्रासदी या जश्न  के रूप में रेल विभाग द्वारा इस बिना पर कि ट्रेन के समय बदले जा रहे हैं  सम्बन्धित  स्टेशन से ट्रेन का प्रस्थान का समय टिकट पर न लिखा होना ,मेरे द्वारा स्वयं ट्रेन का  प्रस्थान का समय फिर से चैक न किया जाना ,औरों के इन्फार्मेशन पर ही निर्भर रह जाना-ये सब घातक कारण एकजुट हो लिए  थे    ! (नसीहत -३,खासकर नवम्बर माह में  यात्रा से जुडी ट्रेनों का निर्धारित स्टेशन पर आगमन और प्रस्थान  यात्रा आरंभ के ठीक पहले खुद अवश्य  चैक कर लें ! जाकिर ने तो नेट से अपनी ट्रेंन पुष्पक के टाईम टेबल का पूरा चार्ट ही प्रिंट आउट कर रखा था ) .पता नहीं अभी भी टाईम टेबल छपा कर आया या नहीं ! शायद ज्ञानदत्त जी प्रामाणिक जानकारी दे सकें !

 मेरी वापसी की यात्रा तो उसी दिन ही शंकाओं के घेरे में आ गयी थी जब लोकमान्य तिलक टर्मिनस -वाराणसी एक्सप्रेस २१६५ में आरक्षण के समय ही यानि २० अक्टोबर ०९ को  २ ऐ सी में वेटिंग १ की  असहज स्थिति उत्पन्न हुए  थी . लोग बार बार आश्वस्त   करते रहे कि अरे एक ही तो वेटिंग है , शर्तिया कन्फर्म हो जायेगा -मगर मुझे पहले का  एक और दृष्टांत याद आ  जाता रहा जब शिमला यात्रा के समय ऐसी ही स्थति में ज्ञानदत्त जी के आश्वासन के बावजूद भी यात्रा के एक दिन पहले ही मैंने टिकट निरस्त करा कर दूसरी कम महत्वपूर्ण ट्रेन में आरक्षण करा लिया था  ! मगर इस बार कई व्यस्तताओं और अन्य किसी ट्रेन के उपलब्ध न होने के कारण (हाय रे मुम्बई- बनारस रूट !) मैं हाथ ही मलता रह गया और वापसी का दिन भी अ पहुंचा  ! जब यात्रा का केवल एक दिन ही रह गया तो मेरा धैर्य जवाब देने लगा -उधर कांफ्रेंस अपने उरूज पर थी और इधर  मेरा मन आरक्षण की अनिश्चिता से उद्विग्न था !

उधर जाकिर को भी लौटने का आरक्षण पुष्पक में, ऐ सी में नहीं मिल  सका था मगर  उन्होंने न जाने कहाँ कहाँ से फोन वोन  कर स्लीपर में एक बर्थ का जुगाड़ कर ही लिया ! और मुझे आमंत्रित किया कि अगर आपका टिकट कन्फर्म नहीं होता तो आप भी एक ई टिकट लेकर मेरे साथ ही लखनऊ चले और वहां से वाराणसी चले जाईयेगा ! कोई विकल्प भी नहीं सूझ रहा था ,मेरा ऐ सी टू का वेटिंग अभी भी बरकरार था ,मानो मेरा मुंह चिढा रहा हो !  हजार किलोमीटर से भी दूर का सफर बिना आरक्षण कैसे संभव होगा ,सोच सोच कर दिल बैठा जा रहा था ! ज़ाकिर के सुझाव में दम दिखा और मैंने  उनके ट्रेन यात्रा ज्ञान पर मुग्ध होते हुए बगल के साईबर कैफे से  स्लीपर का का एक ई टिकट हथिया ही तो लिया ! वेटिंग १९७ ! जाकिर बोले फिकर नाट मेरे ही बर्थ पर डबलिया लीजियेगा ! टिकट तो रहेगा ही ! बहरहाल ,ई टिकट लेने के बाद कुछ राहत तो हुई ! मगर सबसे बड़ी राहत तब मिली जब अगले ही घंटे मोबाईल से सूचना मिल गयी कि पहले का वेटिंग लिस्ट आखिरकार कन्फर्म हो गया और १७ अंम्बर सीट भी अलाट हो गयी ! हो सकता है  यह मेरे मित्र और कभी रेलवे विजिलेंस में रहे देवमणि को sos भेजने का असर रहा हो !

अब मन फिर एक बार गंगा यमुना तीर हो गया था ! स्थानीय चीजों में सहसा ही फिर से एक नवीन रूचि उत्पन्न हो  गयी थी -वगैरा वगैरा ! अरे हाँ याद आया वह ई टिकट तो वापस कर देना था अब कुछ पैसे ही जु(ग )ड़  जायेगें !  ! हाँ हाँ क्यों नहीं जाकिर  ने भी हामी भरी  ! शातिर साईबर कैफे वाले ने चुपचाप  टिकट लिया ,की बोर्ड पर कुछ टिपियाया और कहा इसे जरा पढ़िए तो !वहां प्रदर्शित सूचना   में साफ़ साफ लिखा था कि चूंकि अब चार्ट तैयार हो गया है अतः रिफंड नहीं हो सकता ! जाकिर उग्र हुए ,मैंने रोका और कहा कि जाकिर यह ऐसा ही है -अब कुछ  नहीं हो सकता ! ४३० रूपये डूब चुके थे! साईबर कैफे वाले को सब पता था ,उसने चीट किया था !( नसीहत-४ ,ई टिकट को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतें और चार्ट तैयार होने के काफी समय पहले ही  अगर ऐसी स्थिति आये तो निरस्त करा लें  !नहीं तो जैसे मेरे डूबे आपके भी डूबेंगें-रेल विभाग इन्ही हराम की कमायियों से धन्ना सेठ बना बैठा है !  )

बहरहाल यह तो एक दिन पहले का चूना लगने का वृत्तांत रहा ! हाय कन्फर्म ऐ सी आरक्षण होने और वहीं  स्टेशन तक समय से पहुँच जाने के बावजूद भी मेरी ट्रेन आखिर छूट गयी ! अब क्या किया जाय !अगले तीस मिनट में पुष्पक यानि जाकिर की ट्रेन भी आने वाली थी और अब बस वही डूबने  वाले का  एकमात्र तिनका  सहारा  थी -मगर टिकट ? हम स्ट्राली वाली खींचते खांचते स्टेशन के बाहर भागे -एक लाईन में मैं जा चुकी ट्रेन का टिकट रद्द कराने और दूसरी में ज़ाकिर मनमाड से चारबाग लखनऊ का चालू टिकट लेने लग ही तो लिए ! मुझे विंडो  बाबू ने कुल ७२८ रूपये काट के थमाए रूपये ७२७ और मैंने यंत्रवत  नए टिकट के लिए उसी  में से ज़ाकिर को थमाए ३३४ रूपये ! अभी भी ओवर ब्रिजों को क्रास कर आने  से सांसे धौकनी की तरह चल  ही रही थीं और फिर पुष्पक भी न छूट जाये इसलिए हमने फिर एक दौड़ लगाई और गिरते पड़ते आखिर ट्रेन के आगमन तक प्लेटफार्म पर जा ही पहुंचे ! इस बार कोई चूक नहीं होनी थी -अभी अभी तो दूध के जले थे हम !

धडधडाती हुई पुष्पक आ गयी और हम बकौल शशि थरूर के कैटिल क्लास में लद लिए ! मरता क्या न करता ......
जारी .......

इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं -आज की नायिका है विरहोत्कंठिता

चलिए आपके इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं ! मगर  नायिका तो आज की विरहोत्कंठिता ही है !प्रिय के पूर्व तयशुदा समय पर न आने और चिर प्रतीक्षित आगमन के विलंबित  होते जाने पर व्यग्रता और दुश्चिंताओं  से ग्रसित और व्यथित नायिका ही कहलाती है -विरहोत्कंठिता!


विरहोत्कंठिता...कल की !

नायक के आगमन का पूर्व निश्चित  समय बीत चुका है ,समय आगे खिसक रहा है पल प्रतिपल -क्या हुआ कंत को ? व्यग्र नायिका को  अनेक शंकाएं त्रस्त  कर रही हैं ! भगवान् न करे ,कहीं उनके साथ कुछ हो तो नहीं गया  ?उसके केश वेणी के फूल मुरझाने से लगे हैं ,कांतिहीन हो चले हैं -वह घबराई सी प्रिय मिलन की संभावित  उत्फुल्ल , कामोद्दीपक क्रीडा कलोलो की  रोमांचित  कर  देने वाली कल्पनाओं को भी सहसा भूल सी गयी  है !  पल पल उस पर भारी पड़ रहा है ! बिलकुल यही तो है  विरहोत्कंठिता !

विरहोत्कंठिता ..आज की ...


मगर भाव तो चिरन्तन है !
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल                                      

बुधवार, 18 नवंबर 2009

रेल यात्रियों के लिए एक आपबीती बनाम कैटिल क्लास के संस्मरण !

या तो हनुमान की तरह मगर लौटा पूरा  अंगद बनकर  ! मगर जाते वक्त "जिय संशय कुछ फिरती बारा"  जैसी  कोई आशंका न थी ! बात ११ वें राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मलेन की है जिसमे शरीक होने को हम बड़े उत्साह से चल पड़े थे औरंगाबाद, पिछले 12 तारीख को . अभी कल ही लौटें हैं !कितनी कुछ ब्लॉग गंगा बह चुकी है यहाँ ! आते ही साथ गए जाकिर   ने एक तुरंता  रिपोर्ट भी ठोंक  ही दी है ! जो विज्ञान/वैज्ञानिक में  सूक्ष्मता के  प्रेमी हैं -अनूप शुकुल जी या विवेक जी मानिंद ,वहां झांक सकते हैं ! मगर अपुन तो यहाँ आर्डिनरी एक्स्ट्रा आर्डिनरी  लोग लुगायियों  से यानि आप से मुखातिब हैं ! और बयां करना चाहते हैं अपना दुःख दर्द वापसी यात्रा का ! मगर प्लीज हँस कर मेरे जले पर नमक  मत छिडकियेगा -वादा करिए तभी आगे बढूंगा !अपनी गलतियों के बजाय पानी पी पीकर रेल विभाग को कोसा हैं मैंने इस बार ! वैसे रेल के पिछले भी कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं !  बख्शता रहा हूँ हर बार, मगर इस बार नहीं क्योंकि तब मैं ब्लागिरी के धर्म से च्युत हो जाऊँगा ! ज्यों नहिं दंड करूऊँ खल तोरा भ्रष्ट होई श्रुति मारग मोरा ! अब आप देख लीजिये कि कितना गुस्सा  अभी भी है मन  में ....हाँ हाँ खिसियानी बिल्ली /बिल्ले जैसा ही !

बहरहाल किस्सा कोताह यह कि प्रस्थान  की दो चरणी रेल यात्रा तो ठीक ठाक रही ,बनारस से मनमाड और मनमाड से औरंगाबाद -मगर वापसी की ,अजी कुछ न पूछिए  -अभी भी रह रह कर हूंक उठ जा रही है  ! पहली बार बिना नए टाईम टेबल के साथ में रखे  यात्रा की -नामुरादों ने अभी तक भी नया टाइम टेबल जारी नहीं  किया है ! हद है रेल विभाग की निष्क्रियता  की ! वापसी की ट्रेन मुम्बई बनारस सुपर फास्ट 2165 में पिछले एक माह बुकिंग  करने के वक्त से ही वेटिंग   १  पर सूई अटक  गयी थी ! जाकर यात्रा की पूर्व संध्या को ही कन्फर्म हुआ . किसी के धैर्य की परीक्षा लेना तो कोई रेल विभाग से सीखे ! कमजोर दिल वाले कभी भी रेल के वेटिंग  लिस्ट वाले टिकट न लें !  ...


 वापसी में ६ बजे औरंगाबाद से जनशताब्दी पकडनी थी ! सो हम ५.३० पर स्टेशन पहुँच  चुके थे ! अभी रात ही थी ! पिछले ज्ञात एक साल के इतिहास में  जनशताब्दी पहली बार लेट हो गयी ! मराठी में जो उद्घोषणा हुई -उसके अनुसार तकनीकी खराबी  के चलते ट्रेन को लेट कर जाना था ! मतलब इस बार वह खड़े होकर नहीं जाने वाली थी ! हम लोग लेट कर जाने  वाली ट्रेन में खुद कैसे लेटेगें या बैठेगें यह  रणनीति बनाने लगे - जाकिर ने हंसी मजाक में मेरे लिए कुछ मुद्राएँ भी समझाईं ! खैर एक घंटे विलम्ब से ट्रेन एक के बजाय नंबर दो प्लेटफार्म पर आने को  उद्घोषित हुई ! सहयात्रियों ने बताया कि जनशताब्दी का २ पर आना भी एक अनहोनी है ! अब तक मुझे हिन्दी की वह कहावत याद आने लगी थी -जहाँ जाईं घग्घोरानी ऊहा बरसे पत्थर पानी ! मगर इस बार तो मिसेज साथ न थीं तो फिर मैं घग्घोरानी का चरित्र आरोपण किस पर करुँ ? दिमाग चकराया ! ट्रेन चल दी आखिरकार ! दो घंटे में ,९ बजे मनमाड पहुँच गयी ! प्लेटफार्म नंबर ५ पर . बरसात ने स्वागत क्या  किया -पूरी फजीहत कर डाली ! नसीहत नंबर एक -अंतर्राज्यीय यात्राओं में छाता अवश्य रखें !

मेरे और जाकिर के पास छाता नहीं था ! हाँ मेरे पास पालीथीन थे -हमने सर ढंका और आगे बढे  भीगते हुए ! हमारी अलग अलग ट्रेने थीं -मगर बनारस   सुपर फास्ट और पुष्पक दो नंबर  पर ही आने को घोषित थीं ! ज्ञात जानकारी के अनुसार दोपहर 12 बजे के आस पास थीं दोनों ट्रेने ! जाकिर ने कहा कि अभी क्या करेगें २ पर जाकर ! मैंने उन्हें कहा कि यही बैठ कर ही क्या उखाड़ लेगे !  मैंने देखा है कि जाकिर में  अभी ही इस कम उम्र में भी एक ठहराव है -एक खरामा खरमापन है ! मगर उम्र के इस पावदान में भी मुझमें एक व्यग्रता सी है -अब आगत से अनभिग्य जाकिर के कहने पर हम वहीं ५ पर रूक कर बिन मौसम की बरसात में रूचि  लेने में लग गए !

मेरे टिकट या किसी  के भी टिकट पर ट्रेन का प्रस्थान समय नहीं दर्ज था -वही ट्रेनों के रूटीन वार्षिक समय बदलाव का बहाना!और हद यह कि अभी तक भी नया रेल टाईम टेबल उपलब्ध नहीं हो पाया है -मैंने किस किस स्टेशन पर नहीं पूछा  !  घर से जो समय बेटे ने दर्ज किया था उसके मुताबिक़ मेरी ट्रेन ११. ४० पर आने वाली थी ! प्लेटफार्म नंबर पॉँच पर दस बज गए तो मेरी व्यग्रता ने फिर उछाल मारी ! "चलो जाकिर वहीं २ पर ही चलते हैं ! " मगर जाकिर तो उसी ठहराव मोड में ! "क्या करेगें अभी जाकर " वे बोले .आखिर  मैं हठात खीच ही लाया उन्हें ! मगर तब तक जो  होना था हो चुका था   ! नसीहत नंबर दो -स्टेशन पर जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन हो वहीं पर सीधे जायं,अधर उधर न रुकें  ! बहरहाल २ नंबर पर आकर भी अभी ट्रेन के यथा ज्ञात समय से हम काफी पहले जम गए वहां ! मगर काफी देर तक  बनारस सुपर फास्ट का कोई अनाउन्समेंट नहीं ! अब छठीं हिस सक्रिय हुई ! जाकिर को कहा  जाकर पता करो भाई कि कहाँ अटक गयी  ट्रेन ! थोड़ी देर बाद ज़ाकिर लौटे तो व्यग्रता की प्रतिमूर्ति बने हुए थे  -चेहरा देख कर ही मैं किसी आशंका से काँप उठा  ! और यह सुनते ही की ट्रेन तो ९.४० पर ही जा चुकी ,यानि उस वक्त जब हम बगल के ही प्लेटफार्म पर वर्षा ऋतु  का आनंद  उठा रहे थे....सुनकर तो दिल की जैसे कुछ धडकने ही रुक सी गयीं ! अब क्या होगा ?
......जारी ...

रविवार, 15 नवंबर 2009

विज्ञान कथा कांफ्रेंस चालू आहे !

यहाँ औरंगाबाद में ग्यारहवां राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मलेन चल रहा है जिसमें कई क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों का जमघट है -मराठी मानुषों का पूरा जमावाडा है -दक्षिण भारत से भी काफी प्रतिभागी आये हुए हैं . हिन्दी से जाकिर अली रजनीश के साथ हम कुल चार जने हैं जो हिन्दी का भी झंडा बुलंद किये हुए हैं अन्यथा यहाँ हिन्दी की कोई पूंछ नहीं है -मराठी का साईंस फिक्शन साहित्य कहीं हिन्दी से भी ज्यादा समृद्ध है !

यहाँ बेड टी वगैरह समय से मिल रही है -खाने में दक्षिण भारत के खाने की प्रधानता है -हाँ मीनू बहुत सुरुचिपूर्ण अभिरुचि वाले व्यक्ति द्बारा फाईनल किया जा रहा है-पूडी के साथ रोटी भी मिल रही है और सूप भी सर्व हो रहा है -लंच और डिनर दोनों समय ,आज मांचो सूप सर्व हुआ -
ज्यादा डिटेल और तकनीकी परसों बनारस लौट कर !

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

यह नायिका है वासकसज्जा !(षोडश नायिका -५)

यह नायिका है वासकसज्जा !



"सेज को सुन्दर सुगन्धित फूलों से सजा कर सोलह श्रृंगार से संजी सवरी सुन्दरी  प्रिय की आतुर प्रतीक्षा  में मीठे सपनो में जा खोयी है....प्रियतम बस आते ही होगें यह विश्वास अटल है मन  में ....साँसों की लय में  भी उसके अंतस का दृढ विश्वास मुखर हो उठा है "
चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल
नोट  :अगली नायिका का दर्शन अब १९ नवम्बर को....

बुधवार, 11 नवंबर 2009

कुछ यादें इक गृह विरही की ....



एक घोर गवईं मानुष हूँ मैं -जन्म -गृह त्याग नहीं हो सका मुझसे ! आज भी वहीं पहुँचता रहता  हूँ बार बार -जननी की आश्वस्ति  भरी छाँव में ...जैसे मेरो मन  अनत कहाँ सुख  पावे ....

पिछले दिनों दीपावली और एकादशी पर घर गया घरनी  के साथ ........कुछ चित्र लायें हैं ! इसलिए यहाँ चेप रहे हैं ताकि यह विस्मृतियों  के वियाबान में कहीं खो न जायं !कुछ और चित्र फिर कभी !



                  

                          जगमग दीपावली में "मेघदूत", हमारा पैतृक आवास जौनपुर 








बेटी प्रियेषा ने बनायी जगमग रंगोली 









                                                                एकादशी पर  ईख चूसने का आनन्द  










                                                                                          आखिर डेजी ही क्यों पीछे रहती ,उसने भी चूसा गन्ना 

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

आज बात संयुक्ता की ( (नायिका भेद )

आईये रस परिवर्तन किया जाय ! विरह के बाद श्रृंगार के संयोग का भी तो आनंद लिया जाय !
जी हाँ ,आज बात संयुक्ता की -


" चुपके से  प्रियतम की आँखों  को पीछे से आ ढँक लेने के बहाने प्रिय से आ लिपटी बाला ...... .फिर उसने मादक अंगडाई ले अपने अनुपम अंगों को दिखला डाला ......... प्रियतम ने तब   भेद भरी  बातों  मे  सहसा इक  आग्रह कर डाला........ . शर्म से हुई छुईमुई बाला ने हँस कर  बात को टाला .........  अगले ही पल  बाला ने गले में प्रीतम के  डाली बाँहों की माला "...........






यह संयुक्ता नायिका है ! प्रिय  आलिंगन में आबद्ध !आह्लाद और प्रेमोन्माद से भरी  हुई !

चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

सोमवार, 9 नवंबर 2009

यह नायिका कहलाती है आगतवल्लभा !(नायिका भेद)

मुझे बहुत खुशी है इस श्रृंखला को ब्लागजगत में  सकारात्मक रूप से लिया गया है ,इसके पीछे भावना  बस अपनी जानकारी को मित्रों से बांटना है और एक सार्थक विमर्श ही है ! हमारी शास्त्रोक्त /हिन्दी साहित्य की नायिकाएं एक काल खंड के सौन्दर्य /संवेदना /रस बोध की अभिव्यक्ति  हैं -मानव के सौन्दर्यानुभूति की एक ज्ञात प्रस्थानिका या संदर्भ  बिंदु जिससे हम उत्तरवर्ती और आधुनिक मनुष्य के   सौन्दर्यबोध का तुलनात्मक आकलन कर सकते हैं -मानव की संवेदना में आये युगीन परिवर्तनों का भी एक जायजा ले सकते हैं !  जैसे अब तक उल्लिखित विरहिणी नायिकाओं पर आप सभी के  अनुकथन से यह बात साफ़ तौर पर उभर कर सामने आई है कि आज तकनीकी जुगतों के चलते  पहले जैसी विरहणी नायिकाएं अब   कहाँ रही  ? तो क्या अब की नायिकाएं केवल विहारिणी ही रह गयी हैं  ?उनमें  विरह  का लोप हो गया है ? यह चर्चा चलती रहनी चाहिए !
आईये आज की नायिका पर एक दृष्टि डालें !


"प्रियतम के विदेश से अवश्यम्भावी वापसी  की सूचना मिलते ही  नायिका की  खुशी का पारावार नहीं है -वह आह्लादित हो उठती है ! तन मन  पुलकित  है ,छाती भर आई  है ,गालों पर लालिमा आ गयी  है ! यह दशा देख सहेली आशयपूर्ण मुस्कराहट से कह पड़ती है ," सखि, लाओ यह दीन मलीन रूप तो  साज संवार दूं "
"रहने दो ,रहने दो ,ज़रा कंत भी तो देखें उनके विछोह ने मेरी कैसी गत दुर्गत कर डाली है ! "

मगर फिर न जाने कुछ सोच कर  अपनी सखी से प्रतिरोध नहीं करती और सखी उसकी साज संवार में लग जाती है! "



यह नायिका  है आगतवल्लभा ! 
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल 

कृपया यह पोस्ट भी पढें ! 

रविवार, 8 नवंबर 2009

यह नायिका है एक विरहिणी ,परकीया हो या फिर गृहणी!

वह नायिका विरहपीडिता (प्रोषितभर्त्रिका /पतिका ) कहलाती है जिसके पति विदेश चले गए हों !

                                               हाय !  ये कैसी दशा हो गयी मेरी सखी की !


मतलब कुछ ऐसा, ".... सखी रे! यह सावन निर्दयी कैसा रिमझिम बरस रहा है और मुझे रुलाये जा रहा है .मेरी आखें सजन की प्यारी सूरत देखने तक को तरस गयीं है -क्या विदेश में दिशायें बादलों की गडगडाहट से गुंजायमान नहीं होतीं या विरह वेदना को बढा  देने वाली चातक और मोर की बोली वहां नहीं सुनी जाती -ऐसा लगता है कि पिय की नगरी कुछ अलग ही जादूभरी हो गयी है जहाँ  ननद के भाई सुध बुध खो बैठे हैं (संकेतार्थ /गूढार्थ : कहीं ऐसा तो नहीं, मेरे प्रिय दूसरी नवयौवनाओं  के मोहपाश में बंध गए हों !) "


अब सखी कितना मन  बहलाए !  



 इस तरह विरह और प्रिय के प्रेम के बंट जाने की  अनेक दुश्चिंताओं से क्लांत नायिका है विरह पीडिता (प्रोषित भर्त्रिका /पतिका).नायिका की यह अवस्था अनूढा ,स्वकीया और परकीया सभी में संभव है .शीर्षक में महज गेयता और तुकबंदी के लिए  ही गृहणी का उल्लेख है जो सामान्यतः स्वकीया कही जा सकती है ! ऊपर  का दृष्टांत स्वकीया प्रेम की ही इन्गिति है ! पति की विरह वेदना पत्नी से सही नहीं जा रही है और मन  में अनायास  ही अनेक शंकाएँ उठ रही हैं !
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

बौद्धिक प्रतिभाशीलता का ही नाम है गिरिजेश राव:चिट्ठाकार चर्चा !


                                                               गिरिजेश की एक भाव-मुद्रा 
बौद्धिक प्रतिभाशीलता का ही नाम है गिरिजेश राव -हाँ लम्बे समय से एक चुनिन्दा ब्लॉगर की तलाश में भटकता चिट्ठाकार चर्चा का यह यह ताजा  अंक आपके सामने हैं -और यहाँ पेश हैं  गिरिजेश राव ! एक आलसी का चिटठा और गाहे बगाहे लिखने के लिए कविता पर एक ब्लॉग  लिखने वाले गिरिजेश (मेरा उनके लिए यही स्नेहिल संबोधन है ) से मेरा परिचय कोई ज्यादा पुराना नहीं हैं -बस यही कुछ माहो से हम परिचित है मगर प्रयाग के संत समागम के बाद परिचय की प्रगाढ़ता और मिलन की गहनता सहसा काफी बढ़ गयी है!और यह अकारण नहीं  है !

सबसे पहले मुझे गिरिजेश के बारे में सिद्धार्थ जी (प्रयाग में धनुष यज्ञ जेहिं कारण होई वाले अपने सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी - हमारे एक पूर्व चयनित चुनिन्दा चिट्ठाकार ) ने बताया था ! सिद्धार्थ जी और गिरिजेश दोनों ही गुरुभाई हैं और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की   कथित धुर गोबर पट्टी के गुदडी के लाल हैं; न जाने ऐसे लाल गोपालों के वजूद के बावजूद किसी  गोबर पट्टी की इन्गिति भी  कैसे की जा  सकती है ?  गिरिजेश के ब्लॉग का नाम प्रथम दृष्टया ही नहीं पुनः पुनः दृष्टया भी  अजीब ही लगा था -यह कौन सा उद्धत सांसारिक जीव है जो अपने आलस्य को ही प्रोमोट करना चाहता है ! मगर वह होगा तो कोई विशिष्ट ही जो कबीर की भाषा में यहाँ  उलट्बानी उद्घोषित कर रहा है ,डंके की चोट पर ! सो देखना चाहिए .और मैंने देखा तो  विमोहित होता गया !कंटेंट से !

गिरिजेश के ये दोनों ब्लॉग लोकमान्यता की  दक्षिण की दिशा के समान हैं -और एतदर्थ प्रगटतः गमन निषेधित ! जी हाँ मत जयियो दक्खिन बबुआ  की बुजुर्गी सीख की याद दिलाती हुई - उधर गए तो फंसे ! जैसे मैं फंसा तो आपको यह सात्विक हिदायत भी कि आप गए तो फिर आप भी फन्सेगें ,अगर अब तक कहीं फंस न गएँ हो तो -फिर मोहपाश (मोहन वशीकरण सब) से छूट नहीं पायेगें ! ये दोनों ब्लॉग भावनाओं की गहन गहनता समेटे  हुए हैं -अभी अभी बाऊ चरितावली  सम्पन्न हुई है जिसने भाषा शिल्प के मामले  में लोगों को फणीस्वर नाथ रेणु  की याद दिला दिया  !

गिरिजेश मूलतः कवि ह्रदय हैं -उनका गद्य भी ह्रदय से ही निःसृत है ! मतलब मस्तिष्क के उस हिस्से से उद्भूत है जो दिल का डिपार्टमेंट संभालता है ! मैंने उन्हें बौद्धिक प्रतिभाशील कहा है क्योंकि केवल बौद्धिक या प्रतिभाशील  कहकर उन्हें मैं आंक नहीं पा  रहा था !  इलाहाबाद और कानपुर वालों ने बौद्धिकता को अब अपने तक ही सीमित कर लिया है ,हथिया लिया है-   कुछ कुछ अविजित लंका की कैद सरीखा  और जहां तक प्रतिभा की बात है तो  उस पर तो  देश के आई. ए . एस न जाने कब से काबिज हो चुके हैं ! अब मेरा  ब्लॉग नायक भला इन एकल और उच्छिष्ट पहचानों का मुहताज क्यों बने !  मनुष्य के ये दोनों ट्रेट -बौद्धिकता और प्रतिभा ,अलग अलग ज्यादा दीखते  हैं -मगर गिरिजेश में इन दोनों लक्षणों का समग्र  परिपाक हुआ है  ! वे बौद्धिक हैं मगर दयामागूं - दीन , शोचनीय  विह्वलता से दूर हैं -आत्म मुग्धता से भी दूर हैं -प्रतिभाशाली बौद्धिक हैं !  सहज है सरल हैं -ठठा कर ऐसा हंसते हैं जो एक निर्मल ह्रदय वाले के ही वश का है ! नहीं तो  आज के युग में हंसी ?

इलाहाबाद में हमने बहुत गुल गपाड़े किये  - मौज मस्ती वालों की बातें तो बस कहने भर की हैं ! दरअसल मुझ उद्धत उन्मत्त  के साथ गिरिजेश सरीखा भी कोई हो जाय तो दूसरों का पत्ता साफै समझिये -सारी दुनिया के लिए हम तत्क्षण पागल करार  हो सकते हैं ! अब जाकी रही भावना जैसी ...लोग गलत कहते हैं सभी डिजिटल रिश्ते धोखे होते है -गिरिजेश जीवंत उदाहरण हैं - कल्पित से भी ज्यादा उदात्त और मानवीय ! उन्होंने गहरी संवेदना से मुझे बड़ा भाई कहा  -और मैंने इस रिश्ते को यद्यपि यह उत्तरदायित्व भरा है स्वीकार भी कर लिया है ! मस्त रहो अनुज ! हुडदंग जारी रहे.....

इलाहाबाद की संगोष्ठी में ब्लॉग बनाम  साहित्य के मुद्दे पर गिरिजेश को सुनना एक अनुभव था ! कई वक्ताओं द्बारा उछाले गए कुछ जुमलो पर भी इनकी  कटाक्ष ब्लॉग पोस्ट पढने लायक है ! गिरिजेश आलस का परित्याग पर चुके हैं -यह उनका स्थायी भाव बान जाय -यही शुभेक्षा  है !

चिट्ठाकार चर्चा

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

आईये मिलिए पहली नायिका से .....(नायिका भेद )

डॉ .राकेश गुप्त ने "नायिका " को यूं  पारिभाषित किया है -'सुन्दर एवं युवा पुरुष के प्रेम भाव का आलम्बन बनने की पात्रता रखने वाली मोहक और यौवन प्राप्त रमणी  ही नायिका कहलाती है . ' अन्यत्र यह भी उद्धरित है कि ' वह सुन्दरी और यौवन पूर्ण  स्त्री जिसे  देखने से रति स्थायी भाव जागृत हो और जिसका विस्तार श्रृंगार रस में हो -नायिका है !

आईये आपको सोलह नायिकाओं में से पहली नायिका से मिलवायें ! जरा  इस विवरण/दृष्टांत  को पढ़ लें -

प्रिय से सहसा यह सुनकर कि वे विदेश जा रहे हैं प्रियतमा सिहर उठी ,चेहरा म्लान हो उठा .उसकी यह स्थिति देख प्रिय ने ढाढस बंधाया , उसे बाहों में भर  बोल उठा -
" प्रिये धीरज रखो ,मैं जल्दी ही लौट आऊंगा ''
"प्रिये कहते हुए आपको तनिक भी लज्जा नहीं आती ,मुझे जब मधु ऋतु में यूं छोड़ के जा रहे हैं तो मुझे प्रिये नहीं दुष्टा या वन्या कहिये  !"


क्षोभ से भरी प्रियतमा बोल उठी ! .







उपर्युक्त  नायिका  प्रवत्स्यत्वल्लभा है ! मतलब प्रिय के आसन्न विदेश गमन के समाचार से दुखी नायिका !इस श्रेणी की नायिका में अनूढा ,स्वकीया और परकीया सभी सम्मिलित हैं!(पारिभाषिक शब्दावली याद हैं न ?) कठिन नामकरण है ना ? पर क्या करें जो है सो है -अब अगली नायिका की आतुरता से प्रतीक्षा करें !
चित्र सौजन्य : 

बुधवार, 4 नवंबर 2009

आज बस इतना ही ......तनिक धीरज रखें !(नायक -नायिका भेद -3)

पंच कह रहे हैं कि बहुत भूमिका हो ली ( भाग -१,भाग -२) अब आगे बढा जाय ! बहुत से लोग वैसा ही  समझते हैं जैसा  मैं पहले समझा करता था कि श्रृंगार रस केवल सजने सवरने ,आभूषण और अलंकारिकता की सुखानुभूति से ही सम्बन्धित है -बस आनंदम आनंदम ! मगर ऐसा है नहीं ! श्रृंगार रस अपने में वियोग की अकथ पीडा भी समेटे   हुए है -यह संयोग और वियोग दोनों का ही साझा  संबोधन है ! अब श्रृंगार के संयोग और वियोग के पहलुओं पर शास्त्रों और साहित्य में बहुत पन्ने स्याह सफ़ेद हो चुके हैं -यहाँ हम उनकी पुनरावृत्ति नहीं करेगें ! हम यहाँ नायक और नायिका भेद पर आपसे चर्चा करेगें जिनका आधार ही श्रृंगार का  संयोग और वियोग पक्ष रहा है -मतलब प्रकारांतर से हम यदि नायक और नायिका भेद को भलीभांति समझ गये तो संयोग और वियोग के भावों से भी एक साक्षात्कार कर ही लेगें -उनके मूल भावों को अन्तस्थ कर सकेगें और शायद कुछ भाग्यशाली और कुछ कम  भाग्यशाली जन उन विवरणों से खुद को जोड़ भी सकेगें !मतलब आयिडेन्टीफाई    भी कर सकेगें !


अब मुश्किल यह है कि हम पहले नायिका भेद से शुरू करें या नायक भेद से ! पहले इस मुद्दे को लेकर मेरे विज्ञान ब्लॉग पर काफी लानत मलामत हो चुकी है और इसलिए मेरे मन  में किचित संकोच और डर भी है ! अब इस बात में  भी दम है कि यह सारा साहित्य चूंकि प्रमुखतः पुरूषों द्वारा लिखा गया है अतः यह एक ख़ास सोच और मनःस्थिति का परिचायक हो सकता है ! मेरा इस बात से इनकार नहीं है -मगर विनम्र अनुरोध केवल इतना है कि आज किसने रोका है कि प्रबुद्ध नारियां मौजूद साहित्य को समयानूकूल नारी की दृष्टि से संशोधित्त या परिवर्धित न करें ! फिलहाल तो जो जैसा है वैसा है के रूप  में हमें झेलना होगा ! मगर संशोधन की गुन्जायिश तो है ही -मगर क्या कोई प्रतिबद्धता के साथ आगे आयेगा ? जो भी हो   मुझे पूरा विश्वास है कि काव्य और कला के सहज प्रेमी जन और नाट्य कला /शास्त्र मे रूचि रखने वाले सुधी जन इसे सकारात्मक रूप से लेगें !


चलिए मैं पहले नायिका भेद से ही शुरू करता हूँ ! इस विषय पर मुझे विस्तृत साहित्य के अवगाहन पर यही लगा कि डॉ .राकेश गुप्त जिनसे आप इस श्रृखला के पार्ट एक में मिल चुके हैं इस विषय के अद्यतन अधिकारी अध्येता रहे है और उनकी डी. लिट .भी इसी विषय पर है ! उन्होंने उपलब्ध साहित्य के आधार पर हिन्दी साहित्य की  नायिकाओं बोले तो  हीरोईनों को १६ भेदों में बाटां  है -कई उपभेद भी हैं ! और यह वर्गीकरण नायिकाओं के नायकों के मिस /निमित्त रागात्मक सम्बन्धों , उनके मनोभावों ,विभिन्न अवस्थाओं और परिस्थितियों पर आधारित है !

एक बार फिर कुछ  श्रृंगारिक हिन्दी साहित्य के पारिभाषिक शब्दों को आत्मसात कर ले जिससे नायिका-भेद समझने में आपको सुभीता रहे ! 
अनूढा  -पुरुष विशेष से प्रेम करने वाली अविवाहित नारी अनूढा है .
स्वकीया -अपने पति से एकनिष्ठ प्रेम करने वाली विवाहित नारी  स्वकीया है .
परकीया -पति  से इतर पुरुष से प्रेम करने वाली विवाहित नारी परकीया कहलाती है .
ये शब्द संज्ञा के साथ ही विशेषण रूप में भी प्रयुक्त हो सकते हैं जैसे परकीया या स्वकीया प्रेम आदि !

आज बस इतना ही ......तनिक धीरज रखें !

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

सनसनाहट प्रेमी थोडा किनारा ही किये रहें....वे निराश होंगें!

वो कहते हैं न और भी गम हैं दुनिया में इक मुहब्बत के सिवा -तो हुआ यह कि मेरे पिछले श्रृंगार विषयक पोस्ट पर जन सहमति(याँ ) अपेक्षा के अनुरूप  नहीं मिलीं मगर पांच पंचों का अनुमोदन तो मिल ही गया है जो मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहा है !पॉँच पंचों के अनुमोदन को ही मैं जनवाणी मान कर श्रृंगार साहित्य में नायक नायिका भेद पर अपनी सद्य एकत्रित जानकारी आपसे बाटने को उद्यत हूँ ! मगर पहले ही एक दावा त्याग ! मैं हिन्दी साहित्य का अधिकारी श्रोता तक भी नहीं हूँ विद्वान् की तो बात ही छोडिये -इसलिए विषयानुशाषित नहीं हो सका हूँ ,हाँ विषयानुरागी होने के नाते ही अपनी जानकारी यहाँ  साझा करना चाहता हूँ ! मैं बार बार कह चुका हूँ साहित्य की मेरी समझ अधकचरी है और ज्ञान पल्लवग्राही ! तो मेरी यह धृष्टता ज्ञानी जन,साहित्य के मर्मग्य  क्षमा करेगें ! और मेरी गलतियों को कृपा कर सुधारेगें भी ! क्योंकि यह  ज्ञान के गहन साहित्य में यह एक अल्पग्य की अनाधिकार ,उद्धत घुसपैठ तो है ही !

अब विषय चर्चा बल्कि कहिये विषयासक्त चर्चा ....हिन्दी साहित्य में श्रृंगारिक नायक नायिका भेद एक उपेक्षित प्रसंग है ! भले ही हमारे शास्त्रों ने इसे महिमा मंडित किया हो ! हिन्दी के कई मूर्धन्य विद्वानों ने इसे हेय  और अश्लील तक माना है .महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि नायक नायिका भेद दरअसल सामंतों -राजाओं की  विलासिता पसंद अभिरुचि का रंजन भर है ! मगर मुझे लगता है कि जिस वैज्ञानिक पद्धति से हमारे मनीषियों ने इस विषय पर लिखा पढ़ा है वह एक दस्तावेज है और उसे यूं ही उपेक्षित कर देना उचित  नहीं है ! बल्कि इसका बार बार अनुशीलन होना चाहिए और यथा संभव इस साहित्य की अभिवृद्धि भी ! ज्ञान के नए अलोक में और नए युगीन संदर्भों और परिप्रेक्ष्यों   में ! तो नायक नायिका भेद जिसमें श्रृंगार रस का पूरा परिपाक हुआ है के अवगाहन के पहले आईये इस साहित्य की कुछ मूलभूत स्थापनाओं मतलब खेल के नियमों से भी परिचित हो लें जिससे खेल के बीच कोई गलतफमी न उपजे ! और हाँ यह भी कह दूं सनसनाहट प्रेमी थोडा किनारा ही किये रहें क्योंकि उन्हें  यहाँ  कुछ ख़ास नहीं मिलने वाला है ! वे निराश ही होंगें !

नायक नायिका भेद विवेचन के पीछे तो स्त्री पुरुष रति सम्बन्ध ही हैं जिनकी अनेक स्थितियां /मनस्थितियाँ हैं और वे ही इन  में रूपायित हुई हैं ! ये सहज और स्वाभाविक रति भावना की ही प्रतिफल है ,विकारग्रस्त यौनानुभूतियों की नहीं ! इस साहित्य में यौवन युक्त ,आकर्षक स्त्री पुरुषों के प्रेम को स्वीकृति मिली है ! मगर रसबोध के साथ ही सामाजिक मर्यादा का भी ध्यान रखा गया है ! केशव ने रसिकप्रिया में ऐसी स्त्रियों की सूची भी दी है जिनसे रति सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जाना चाहिए ! इस साहित्य के मूल में रति भावना को नैसर्गिक ,सहज और अनिवार्य माना  गया है क्योंकि बिना इसकी पारस्परिक स्थितियों के रस की निष्पत्ति संभव नहीं है !

काव्य शास्त्र में  प्रेम की स्थिति को स्वीकार किये बिना कोई स्त्री नायिका नहीं कही जा सकती ! इसलिए स्वकीया यानि विवाहिता (कृपया इन श्रृंगारिक पारिभाषिक शब्दों पर ध्यान देते चलें ) पर वात्स्यायन ने विचार तक नहीं किया है ! नायक नायिका का विभाजन परकीया (गैर वैवाहिक ) प्रेम और कामशास्त्र की दृष्टि से किया गया है ! वात्स्यायन के कामसूत्र से लेकर अब तक इस विषय पर सैकडों ग्रन्थ रचे गए हैं .साहित्य में एक मान्यता यह भी है कि रस सिद्धान्त में श्रृंगार को अधिक महत्व प्राप्त है ,यहाँ तक कि कृष्ण भक्ति का आधार भी रतिभाव ही है (विष्णु पुराण -पांचवा खंड ,अध्याय १३ ,१४) ;भागवत पुराण दाश्वान स्कंध ) .गोपियों और राधा कृष्ण के परकीया प्रेम और रति क्रीडा को भक्त के अनन्य समर्पण के रूप में स्वीकार कर लिया गया ! और लीला के माहात्म्य के रूप में प्रतिपादित किया गया ! जयदेव के गीत गोविन्द(12 वीं शती )  में कृष्ण गोपियों के प्रेम का सजीव ,चित्रमय वर्णन है ! यहाँ गोपियाँ जो परकीय नायिकाएं हैं के मनोभावों को बहुत बारीकी से उकेरा गया है ! जयदेव की राधा काम विह्वल हैं ! बंगला कवि चंडीदास में भी इस परकीया भाव की चरम परिणति है ! राधा हैं  तो अन्य की विवाहिता मगर कृष्ण प्रेम की पीडा की वेदना को सहती रहती हैं !
क्रमशः .......


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रविवार, 1 नवंबर 2009

एको रसः करुण एव -क्या सचमुच ?

संस्कृत  के एक महान कवि हुए हैं भवभूति . उन्हीने  कहा है यह - एको रसः करुण एव -मतलब करुणा ही प्रबल मानव  भाव है !  क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार दिए जाने पर आदि कवि वाल्मीकि की  वाणी  से भी सहसा करुणा ही फूट पडी थी जिसके लय छंद में ही  पूरी रामायण  लिखी गयी !  कवि सुमित्रानंदन पन्त ने  करुणा के महात्म्य को कुछ यूं बुलंद किया -वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान ,उमड़ आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान ! शायद  वाल्मिकी को ही स्मरण  कर रहे थे वे ....अब भवभूति के भाव को  भाव न देने की मेरी क्या बिसात  है मगर इस अकिंचन को सदा लगता रहा है कि करुणा नहीं  मनुष्य का प्राबल्य भाव श्रृंगार होना चाहिए !  क्योंकि दुःख ,करुणा तो मनुष्य का चिर  साथी है -यह दुनिया दुखमय ही है -महात्मा बुद्ध भी कह गए हैं ! तो फिर हर पल का वही रोना कलपना तो नी रस हुआ न ? रस कैसे हो गया ? तो यह खाकसार सौन्दर्य को ही प्रबल रस मानता है ! सच कहूं  इस रस के आगे सब रस धूरि समान लगते हैं  ! और श्रृगार रस ही तो है न जिससे यह दुनिया तमाम रोने धोने के बाद भी चलायमान है -ऊर्जित है -सृजनशील है ! क्यों ,आपको क्या लगता है ?  एक विलासी का आत्ममुग्ध एकालाप कि कुछ वजनदार बात ? 

तो असल बात यह कि इन दिनों मैं हिन्दी का सौन्दर्य शास्त्र  बाँच रहा हूँ -बल्कि पिछले एक साल से यह अध्ययन चल ही रहा है -कुछ बानगी तो सुधी जन यहाँ और यहाँ देख भी चुके हैं -इसी बीच मैं अलीगढ़ गया और वहां यह जानकारी पाकर की डॉ .छैलबिहारी लाल जी अभी हैं -मैं गदगद हो उठा और उनसे मिलने को एक कार्यक्रम सेशन को तत्क्षण छोड़ भाग चला ! वे चिरायु -शतजीवीं हों -डॉ छैल बिहारी लाल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जो हिन्दी की पहली डी. लिट  डिग्री हथियाई वह सौन्दर्य शास्त्र पर ही थी -बोले तो एस्थेटिक्स पर !  Studies in Naykaa -Nayika -bheda (1967) ,यह उदारमना गुणग्राही व्यक्तित्व अब जीवन के नब्बे शरद वसंत देख चुका है और आज भी उनकी वही चमकती ,कुछ ढूंढती आँखों का मोहक व्यक्तित्व  अपनी ओर सहज ही आकर्षित करता है . न जाने क्यों इन्होने अपना नाम बदल कर डॉ राकेश गुप्त  कर लिया और  ज्यादातर  इसी नाम से जाने जाते हैं -जाने क्या जाते हैं जीते जी एक किंवदंती हैं !  

यह १९९२ की बात है जब मैं नौकरी की एक अनिवार्य दो वर्षीय ट्रेनिंग लेने मुम्बई (तब बम्बई ) गया हुआ था ,एक दिन मुझे मिली एक चिट्ठी ने विस्मित कर दिया ! यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मेरे पूर्व प्रवास के हास्टल से पुनर्निर्देशित हो मिली  एक टंकित चिट्ठी  थी जिसमें १९८९ में धर्मयुग में छपी मेरी कहानी "एक और क्रौंच वध " को नवें दशक  की श्रेष्ठ कहानियों और १९८९ की सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित होने की पुलकित करती घोषणा थी -नीचे दस्तखत -डॉ राकेश  गुप्त !  मैं जाहिर था फूल कर कुप्पा जैसा हो गया था ! फिर तो खतो किताबत शुरू हुई डॉ गुप्त से -उन्होंने मुझे 'नवें दशक की श्रेष्ठ कहानियां 'जो मेरे बुक सेल्फ की शोभा आज भी बढा रही है भेजी और बाद में मेरे अनुरोध पर ग्रंथायन प्रकाशन अलीगढ़ से छपी  अपनी जीवनी -देखे सत्तर शरद बसंत भेजी , जो एक तरह से तत्कालीन उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग की कारस्तानियों का कच्चा चिट्ठा भी है! उनका नववर्ष काव्यमय कार्ड हमेशा बिना नागा आता रहा मगर कुछ  वर्षों से यह क्रम अवरुद्ध हो गया था -मेरे ट्रांसफर आदि के चलते भी !

तो जब पिछले वर्ष मैं अलीगढ़ एक विज्ञान संचार कार्यशाला में गया तो स्थानीय प्रतिभागियों से आशंकित सा डरते डरते उनके बारे में पूंछा और मेरे आह्लाद की कोई सीमा न रही -वे मौजूद हैं सुनकर मैंने कार्यशाला सत्र  छोड़ दिया -भाग चला  उनसे मिलने ! यह हमारा प्रथम मिलन था ! दोनों खूब मिल बैठे , उनकी अपनी सुनी सुनाई ! उन्होंने बच्चों से कहकर खूब आदर सत्कार किया ,खिलाया  पिलाया !  पूरा परिवार ही बहुत शिष्ट सुसंस्कृत ! आते समय अपनी पुस्तक "षोडश नायिका' -The Sixteen Heroines  ( 1992,नवयुग प्रेस ,अलीगढ़ ) सौंप दी ! अब अंधा क्या चाहे बस दो आँखे ! मैंने पुस्तक पाकर उनका चरण स्पर्श किया और आशीर्वाद  लेकर चल  पड़ा  अपने स्थानीय प्रवास -डेरे पर -उत्कंठा ऐसी कि  एक नजर तो रास्ते में ही पूरी किताब पर डाल ली और वापसी  ट्रेन यात्रा  में तो सांगोपांग, आकंठ रसपान कर ही डाला ! 

मैं इस पुस्तक और जाहिर है 'क्वचिदन्यतोपि'(मतलब कुछ अन्यत्र से और भी जानकारी ) से भी आपसे साझा करना चाहता  हूँ  -जनता क्या चाहती है बताये ! 

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