मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

बोर और बोगस है तीसमारखां!

संशय तो पहले से ही था,मगर फिल्म ने सारे संशयों को मिटा कर साबित कर दिया कि वर्ष २०१० के सबसे बोर फिल्मों में तीसमारखां  ने भी अपना नाम दर्ज कर लिया.पैसे और वक्त दोनों की बर्बादी है तीसमारखां . रही बात शीला की जवानी का आईटम डांस तो वह  पहले से ही तमाम चैनलों पर कोहराम मचाये हुए है .इसके बारे में भी यही समझ लीजिये कि दबंग के मुन्नी  बदनाम के आगे   यह मसाला आईटम  भी पनाह और पानी मांगता नजर आता है और गीत के अश्लील बोल की बात तो अलग है ही .

न जाने शुरू से ही क्यों फिल्म झोल खाती नजर आती है ,निर्देशन का कसाव तो फ़िल्म में कहीं है ही नहीं और शायद इसका अहसास निर्देशक फरहा खान को हुआ और इंटरवल के बाद उन्होंने मेहनत दिखाई मगर मामला हाथ से फिसल चुका था .हाँ एक गीत वल्लाह रे वल्लाह कर्णप्रिय जरुर है और मुस्लिम रहन सहन/परिवेश के अनुकूल है .मगर  इतना तड़क भड़क और रंगों साज इस्लाम के अनुकूल तो नहीं -इस विरोधाभास पर दिमाग चलता रहा और फिल्म की रील आगे खिसकती रही .

शीला की जवानी वाला आईटम  भी फिल्म के शुरू होते ही डाल दिया गया और उसके ख़त्म होते ही लग जाता है कि अगर इस बहु प्रचारित दृश्य का यह हाल है तो फिर पूरी फिल्म का क्या होगा -और आशा के अनुरूप ही फिल्म  बाँध  नहीं पाई -हाँ आठ दस वर्ष के बच्चे जरुर नायक की उल जलूल हरकतों पर किलकारियां मार रहे थे-मगर मुझे तो अक्षय कुमार की कलाबाजियां और बेहूदी संवाद अदायगी पर कुढ़न हो रही थी .

फिल्म की कहानी एक चोरों के सरताज की है जो एक पूरी ट्रेन को लूटने का तामझाम अंजाम देता है जिसमें सरकार के अन्टीक -पुरातात्विक महत्त्व के दुर्लभ खजाने भरे हैं .कहानी की मूल सोच दुरुस्त है मगर उसे ठीक से फिल्माया नहीं जा सका है ..छोटे मोटे दृश्य बच्चों के मनोरंजन के लिए बढियां बन पड़े हैं -जैसे अद्भुत ब्रेसलेट के जरिये  चोर का गायब होना और बिना सर वाले घुड़सवार भूत का आतंक .

मेरी ओर से एक स्टार ...बच्चों को भेज सकते हैं मगर वहां भी शीला की जवानी रोड़े अटकाए हुए हैं ...निर्णय आपका! 

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

दशक शुभकामना!

मित्रों ,अब से केवल दस दिन बाद की सुबह  मानवता की देहरी पर एक  नई  दशाब्दी की दस्तक लिए आ पहुंचेगी.अब कुछ लोगों के लिए दशाब्दी का आकलन अलग हो सकता है जैसे २००० से २००९ तक भी एक दशाब्दी है मगर मैं २०११ से शुरू हो रहे दशक को ही सुविधा और सहजता के लिए नया दशक मान  रहा हूँ .वैसे भी मेरी अंकगणित बहुत कमजोर रही है और संख्याओं का खेल भी मुझे नहीं भाता ....मैंने सोचा एक भरेपूरे नए दशक के लिए शुभकामना का मौका दसेक दिन पहले ही न क्यों लपक लिया जाय....आखिर यह कोई एक नए साल का ही मामला थोड़े ही है पूरे दस वर्ष का पैकेज  है और हम एक दो नहीं पूरे दशक की शुभकामना यहाँ चेपने वाले हैं ...आप सभी को नया दशक शुभ हो ,समृद्धपूर्ण  हो -यह हार्दिक कामना देने के लिए ही यह पोस्ट है ...



मगर यह अवसर है थोडा अतीत जीवी भी हो उठने  का ,क्या खोया क्या पाया का आकलन करने का भी .बीते दशक की अनेक परचम लहराती उपलब्धियों में एक तो अपनी यह हिन्दी ब्लागिंग ही है जिसने भारतीय अभिव्यक्ति का एक नया युग ही आहूत कर लिया ...और मजे की बात यह है कि अभिव्यक्ति के इस माध्यम में स्वयं के दोष निवारण की भी अद्भुत क्षमता अंतर्निहित है और स्व-आलोचना ,बेलौस अभिव्यक्ति ,अनुपम विविधता,और नैरन्तर्य  के मजबूत खम्बों पर यह निरंतर उत्थान को अग्रसर है ,नए दशक में हिन्दी ब्लागिंग सफलता के नए प्रतिमान बनायेगी,इसमें मुझे  किंचित भी संदेह नहीं है और मेरा यह भी पूर्वानुमान है कि यह इसी दौरान ब्लागरों के लिए आर्थिक परितोषोंमें  भी सक्षम बनेगी. ब्लागिंग के इस बीतते दशक  (यद्यपि हिन्दी ब्लागिंग का दशक अभी पूरा नहीं हुआ ) के बाद के वर्षों में मैं भी यहाँ प्रादुर्भूत हुआ ..ब्लागिंग से तो नहीं मगर ब्लागरों से भरपूर दंश/डंक  भी खाये तो  प्रेमोपम प्रोत्साहन भी मिले ...एक मिलाजुला अनुभव! ब्लागिंग के कथित/ तथाकथित  मठाधीशों को तिरोहित   होते देखा तो कई  अकथित प्रतिभाओं  को सहसा प्रस्फुटित होते हुए भी.किसी ने अंतर्मन को अपने न बूझे जाने वाले व्यवहारों  से बेंध डाला तो किसी ने आगे बढ़कर स्नेह का अनाहूत संबल दे दिया ....कुल मिलाकर हिन्दी ब्लागिंग ने कुछ दिया ही ,लिया कुछ नहीं ... :) मित्र दिए ,थोड़े दुश्मन दिए ,प्रशंसक दिए ,आलोचक दिए,खुशी और गम दिए  और एक तरह से कहूं तो समग्रता और संतृप्ति का भाव दिया -सेन्स आफ कम्प्लीटनेस दिया ..और क्या चाहिए ....

ब्लागिंग ने कई अभूतपूर्व मित्र दिए जिनमें कुछ भूतपूर्व (ईश्वर उन्हें चिरायु करें ) हुए तो आज भी कुछ अभूतपूर्व ही हैं और पूरा विश्वास है अब कोई भूतपूर्व नहीं होगा ..उनके नामों को यहाँ गिनाकर मैं उन पुंजीभूत संज्ञाराशियों को सर्वनाम नहीं करना चाहता ,मुन्नियों को बदनाम और नामियों को सरेआम करने की मेरी कभी कोई फितरत नहीं रही -यह नीच और निषिद्ध कर्म है और  प्रतिगामी -काउंटर प्रोडक्टिव है.मुझे पता है  नया दशक कितनी  ही और मित्रता की सुवासित सौगातों को लिए  आने वाला है.मैं आशावादी हूँ और आने वाले दशक का इसी लिहाज से खैर मकदम को उत्सुक हूँ.
मुझे उदासीन ,हर चीज में नुक्स निकालने वाले ,आर्मचेयर क्रिटिसिज्म वाले लोग फूटी आँख  नहीं सुहाते .... महज इसलिए कि यह सब जीवन जीने का उत्प्रेरण नहीं है...
 चल समेट बोरिया बिस्तर 
आगामी दशक मेरे लिए एक और बड़ी आशा और प्रफुल्लता लिए आएगा जब 2017 में मैं सरकारी चंगुल / (कु) सेवा मुक्त हो जाऊँगा ,अगर पहले ही आवेदन नहीं कर दिया तब -और तब दुगुने उत्साह से  अपनी रचनात्मक ऊर्जा को समाज की सेवा में बहुविध लगा सकूंगा! आगामी दशक समूची मानवता के लिए कई बड़ी खबरे भी लाएगा ..चाँद पर एक आशियाँ बसने के हम थोडा और करीब हो जायेगें और भारत में सेवायोजन के अभूतपूर्व अवसर आयेगें ...हमारी अर्थव्यवस्था उत्तरोत्तर और सुदृढ़ होगी बावजूद इसके कि भ्रष्टाचारियों का बोलबाला और मुंहकाला होता रहेगा और अगर स्विस बैंक में जमा धन का पूरा व्योरा ही मिल जाए और धन की आंशिक वापसी भी भारत को हो जाए तो फिर मजा ही आ जाए ....नए दशक! तुमसे ये भी उम्मीद रहेगी .....जूलियन असान्जे  युग का सूत्रपात हो गया है इसलिए ऐसे किसी स्कूप का पूरा स्कोप है . 

मित्रों यह दशक चिंतन तो अभी बस शुरू हुआ है ..और यह पोस्ट तो खालिस आपको शुभकामना के लिए है  ..आशा करता हूँ कि अभूतपूर्व मित्रों का साथ इस पूरे दशक तो रहेगा ही ,उसके बाद  भी ......आज इन पंक्तियों को लिखते हुए एक असीम उर्जा का संचार अपने में पा रहा हूँ और इसे आप तक भी संचारित कर रहा हूँ ...वर्चुअल आस्मोसिस (शब्द कापीराईट है  )  के जरिये ..आप सभी का नया दशक बहुविध मंगलमय और समृद्धिदायक बने यही कामना है ...

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

जिन्होंने दिया उनका भला और जिन्होंने नहीं उनका भी ...

बात मेरे बर्थ डे की है जो १९ दिसम्बर को सामान्य सहज बीत गयी .कल रात महफूज भाई की विलम्बतम विश मिली , उन्होंने करीब दस बजे जब बिग बॉस में डाली और वीना मलिक लड़ रहे थे,मुझे काल करके बधाई दी ..उन्हें लगा कि मेरा जन्मदिन कल ही था ....इस बार जन्मदिन पर आने वाले शुभकामना संदेशों ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ डाले ..और यह करामात फेसबुक की है ..करीब डेढ़ सौ शुभकामनाएं वहां कुछ इस तरह  आती रहीं जैसे शुभकामनाओं की बरसात हो गयी हो ...फेसबुक में प्रोफाईल के ठीक नीचे जन्मदिन का उल्लेख होता है ..जैसा पहले भी हुआ है इस बार भी जहाँ कई अनपेक्षित शुभकामनाएं ,सुखद आश्चर्य के रूप में  लपकती हुई आ पहुँची तो कई बहु प्रतीक्षित एक बार और दगा दे गयीं ...मगर कुछ बहुत स्नेहिल शुभकामनाएं भी मिलीं जो ई ग्रीटिंग्स द्वारा मिलीं ...मनुष्य के जीवन के ये कुछ ऐसे अवसर होते हैं जब मनुष्यता में उसका विश्वास और गहरा उठता है ....आस्थाएं पुनः अंकुरित हो उठती हैं और जीवन के मोह फिर जागृत  हो उठते है ..सच है जीवन के सतत और सुचारू संवहन के लिए मोहबद्धता के  ऐसे क्षण बहुत जरुरी होते हैं और शायद  यही कारण रहे होंगे जब हमारे आदि पूर्वजों ने इन अवसरों का अनुष्ठानीकरण शुरू किया होगा ....जिससे मनुष्य का उत्साह और सांसारिकता के निर्वाह का जज्बा जोर मारने लगे  ....प्रकृति भी तो यही चाहती है ....



 कुछ शुभकामनाएं तो भूली  भटकती मेरे पिछले पोस्ट पर जो दिल्ली संस्मरण पर थी आ टिकीं ,एक वह बात जो मुझे रुचती नहीं कि किसी पोस्ट की अंतर्वस्तु पर टिप्पणी के बजाय उस पर असंगत बात लिखी जाय ....मगर यहाँ भी मनुष्य के व्यक्तित्व का वही नितांत कोमल पहलू उजागर हो जाता है जिसके  कारण वह धरती के जीवों का सिरमौर बना हुआ है ..मेरे किसी भी शुभाकांक्षी को जब भी जहाँ भी पता लगा कि मेरी बर्थडे है उन्होंने वही प्यार उड़ेल दिया ...अब बताईये भला क्यों मनुष्य मात्र के प्रति  मेरा प्रेम और समर्पण और गहरा न हो जाय ...कुछ मानव /मनु पुत्र श्रेष्ठ मुझे अनजाने ही फेसबुक पर शुभकामना चेप गए और कुछ जानबूझ कर भी चुप रहे ...हा हा ...इसलिए कि शायद  भूलवश मैंने उन्हें जन्मदिन विश नहीं किया था ....यह तो कोई बात नहीं हुई ..अपनत्व तो तब हुआ जब जबरदस्ती केक/मिठायी  खाने की जिद की जाय ....मित्रों ,ऐसे अवसर तो हमें झटक लेने चाहिए क्योकि यह हमें हमारी विशिष्टता का ही बोध कराते हैं ....मानव संस्कृति के सुनहले अवसर हैं  ये ...

प्रशांत प्रियदर्शी ने मुझसे फेसबुक पर पूछा कि सर इस बार का बर्थ डे आपके परिवार ने  कैसा मनाया ...शायद वे ज्यादा तड़क भड़क वाली बात सुनना चाहते थे....मैंने सच और सादगी की बात उन्हें बता दी -"बस एकाध व्यंजन अधिक था ...अब आप भी कहाँ पचपन में बचपन वाले जन्मदिन मनाये जाने की बात करते हैं ..." यह उनके लिए आश्चर्यजनक रूप से प्रत्याशित उत्तर था ...."कहने लगे हाँ इस उम्र में तो बाल बच्चे ही माता पिता का बर्थ डे मनाते हैं ' ....हाँ प्रशांत ,अच्छे बच्चे जरुर ऐसा करते हैं ....मगर ..खैर जाने दीजिये ...

तकनीक कहाँ मनुष्य का विस्थापन कर रही?  एस एम एस ,फोन काल ,अंतर्जाल सभी ने मेरे इस तिरपनवें वर्षगाँठ में संदेशवाहक का काम किया ..वह तो मनुष्यता को जोड़ने में किसी फौलादी सीमेंट का ही कार्य कर रही है ...एक चेरी की तरह ..मशीने और तकनीक इसी तरह मनुष्य की सेवा में लगी रहें ..यही कामना है ....मुझे मेरे जिन मित्रों ने जन्मदिन की बधाई दी और जिन्होंने न जानते हुए या जानते हुए भी नहीं  दी ,सभी को मेरा स्नेहसिक्त आभार ,अभिवादन और मंगलमय  नव वर्ष /नए दशक की अनगिन शुभकामनायें  .....


शनिवार, 18 दिसंबर 2010

दिल्ली की तीसरी सुबह -शाम और वापसी (दिल्ली यात्रा की समापन किश्त )

दिल्ली का तीसरा दिन अपने साथ आये मित्रवर गुप्ता जी के एक 'देखुआरी'* अभियान में बीत गया .रजनीश जी को फोनियाया तो वे कहीं किसी साहित्य अकादमी का संदर्भ देने लगे ..बाद में पता लगा कि वे किसी सीक्रेट मिशन पर थे....बनारस से फोन पर फोन आ रहे थे वहां शीघ्र पहुँचने को ....मेरी वापसी यात्रा तो ९ के शाम को शिवगंगा एक्सप्रेस से नियत थी मगर अब तुरंत निकलना जरुरी हो गया था और उधर विज्ञान संचार की कांफ्रेंस भी अपने शबाब पर थी ....बनारस के लिए इन्डियन एरलाईन्स की साढ़े दस बजे जाने वाली उडान से निकलने की संभावना क्षीण थी ...शाम स्पाईस जेट की टिकट ही नहीं मिल पाई ....न तो कांफ्रेंस में जा पाए और न ही बनारस को निकल सके ....अब बचे थोड़े समय में  निर्णय लिया गया कि एक शादी के बाबत गुप्ता जी के  अनुरोध को  पूरा कर लिया जाय ..लड़के की देखुआरी कर ली जाय .

लड़का  पीतमपुरा में किसी प्राईवेट कम्पनी में कार्यरत था ...अब गुप्ता जी पूरी जासूसी पर उतारू थे...लड़का आफिस से कुछ देर के लिए निकला था ..इसी बीच उसके कार्यालय भवन के पांचवें तल  पर मुझे भी खींच खांच कर वे ले जा पहुचे और जिस तरीके से लड़के से जुडी बातें पता करने लगे मुझे असहज  लगने लगा ..यह शिष्टाचार के विपरीत सा लगा और मैंने उन्हें हठात रोकते हुए कहा कि लड़के को आने दीजिये उसी से सब बातें पूछ लेगें ...इतने में 'लड़के' महोदय आ ही गए ओर हमें बड़े आदर भाव से आफिस में बैठाये और कॉफ़ी  मंगा ली ..मुझे लगा कि थोड़ी देर तक उनके बॉस ओर  सहकर्मियों ने मौके की नजाकत समझते हुए उन्हें ही कार्यालय के बॉस की पदवी दे दी थी -मतलब उनके आफिस में गजब की आपसी समझ थी ....गुप्त जी संतुष्ट हो चले थे..लड़का दिल्ली के अस्पतालों से प्लेसेंटा -गर्भनाल खरीद कर अमेरिका की स्टेम सेल कम्पनियों को भेजने के काम में लगी  फर्म में कार्यरत था ...अब मैं तो एक शौकिया विज्ञान संचारक हूँ ही ..लगा स्टेम सेल का कथा पुराण बांचने -लड़के के मुंह पर अपने देखुआरो के प्रति प्रशंसा भाव देख गुप्त जी आह्लादित हुए ...और लिफ्ट से उतरते ही मेरे प्रति तगड़ी कृतज्ञता व्यक्त की ..देखुआर और भावी वर दोनों इम्तहान में पास हो चुके थे..

अब थोड़े से बचे समय में हम चले प्रियेषा कौमुदी ,बेटी से मिलने जो दिल्ली विश्वविद्यालय नार्थ कैम्पस के  करीब ही हडसन लेन  में रहती हैं और अभी अभी जैसलमेर टूर से लौट कर वहां की मिठाईयां हम सभी को खिलाने को उत्सुक थीं ...पीतमपुर से यह जगह ज्यादा दूर नहीं है और हम पूरे दिन की टैक्सी कर ही चुके थे....प्रियेषा से मिलने के उपरान्त वापस पुराने राजेंद्रनगर के होटल पहुंचे और फिर सज धज कर आज के कांफ्रेंस बैंक्विट   के लिए जा पहुंचे -आज का भी रात्रि भोज स्वागत भोज की तरह भव्य और लाजवाब था ...उसका वर्णन पहले की पुनरावृत्ति ही होगी ...आज का रात्रि भोज मुख्य आयोजक संस्थान  के मुखिया द्वारा दिया गया था ....और भोज के दौरान ही उनका एक संबोधन ध्वनि विस्तारक से भी हमें सुनायी दिया जिसे सुन कर मुझे रामायण के राजा भानुप्रताप के भोज के समय की गयी आकाशवाणी याद आ गयी -ब्राह्मणों ,इस भोज को मत खाओ इसमें नर मांस मिला हुआ है ,सब अपने अपने घर जाईये ...(विप्र ब्रिंद उठि उठि  घर जाहू ..) यह पुराणोक्त  पूरा दृश्य ही लगा साकार हो उठा है ..होठों पर बरबस ही मुस्कान खिंच आई ...
 दिल्ली एअरपोर्ट टर्मिनल तीन का एक कोना

अगले दिन सुबह ही जल्दी जल्दी तैयारी,प्लेन न छूट जाय यह अतिरिक्त सावधानी बरत  कर सवा  आठ बजे ही इंदिरा गांधी अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जा पहुंचा ..फिर उसी टर्मिनल तीन के इन्द्रपुरी सरीखे दृश्यों का  नजारा किया -जगमग जगमग करते किताबों के स्टैंड ,फ़ूड मार्ट ,ध्यान केंद्र आदि  जगहों पर   इधर उधर निरुद्येश्य घूमता रहा ,ट्रैवेलेटर पर आता  जाता रहा ...एक जगह सामने बनते हुए  डोसा  देखा तो  खाने का मन हो आया तो ९० रुपये(हे राम )  का डोसा खरीदा ,खाया ..तभी याद आया रुमाल जेब में नहीं है और सारा सामान तो  लगेज में बुक हो गया है ...वहां के चमकते दमकते उपभोक्ता स्टोरों पर एकल रुमाल खोजने लगा मगर एक साथ ४ या पांच के सेट चार सौ से छः सौ की रेंजमें उपलब्ध मिले ..अकेला रुमाल कहीं मिल ही नहीं रहा था ..भला मार्केटिंग का यह कौन सा फंडा है  समझ नहीं पाया ... एक दूसरे ऊँची दूकान और फीके पकवान   वाले ने कहा कि हाँ अकेला रुमाल तो है मगर  लायिनेन/लिनेन (LINEN )  का ... मैंने तपाक से कहा दे दे भाई ..लो काम बन गया ..मगर दाम सुना तो लगा दिल ने सहसा धडकना ही बंद कर दिया हो -एक अदद रुमाल के लिए सिर्फ १४०० रूपये की दरकार थी ...मैंने तेजी से उसे वापस फेंका और सारी ,इट्स टू कास्टली कहकर वहां से फूट लिया ..प्लेन का समय भी हो चला था ...हल्दीराम के शो रूम जहाँ करीब सौ खाद्य आईटमों की रेंज थी और सभी आईटम बाजार भाव पर ही उपलब्ध थे ,थोड़ी खरीददारी की .....और चल पड़ा गेट नंबर २८ बी की ओर जो हमें विमान तक ले जाने  वाला था  .....वहां पहुँचने पर पता लगा कि प्रस्थान गेट में परिवर्तन हो गया है और अब विमान के लिए २९ अ से प्रस्थान करना है ..जो सौभाग्य से बगल में ही था ...

 लिनेन की चौदह सौ रूपये की हूबहू ऐसी ही रुमाल जो मैं ले न सका:जिनके तेल के कुए होंगे वे ही ले पाते होंगें

 विमान ने देर से उडान भरी मगर बनारस की औसतन एक घंटे की यात्रा को पचास मिनट में पूरा किया गया ..यात्रा के दौरान एक मजेदार क्षण तब आया जब परिचारिका को मैंने ये बताया कि नाश्ते की आलू की टिक्की की प्रेपरेशन ठीक नहीं है जबकि  मैं लगभग पूरा नाश्ता -केक ,स्प्रिंगरोल,एक पैटीज उदरस्थ  भी कर चुका था ....परिचारिका ने कहा सर मैं अभी आती हूँ और  अगले ही पल लाकर नाश्ते का दूसरा बड़ा पैकेट पकड़ा दिया ..मैं कहता ही रह गया कि नो नो आई डिड नाट मीन दैट..इस बार का नाश्ता पहले से कई गुना ज्यादा  अच्छा था ,बिल्कुल गौरमेट च्वायस -या तो यह एक्जीक्यूटिव क्लास वालों के लिए था .आई मीन कैटल क्लास वालों से अलग विशिष्ट यात्रियों के लिए या फिर क्रूज/विमान स्टाफ  के लिए था ...मैं भी स्नैक्स का स्वाद लेते वक्त  अपने को उसी क्लास का मानने के मुंगेरीलाल के सपने में खो सा गया ..तभी बनारस लैंड करने का ऐनाउन्स्मेंट हो गया ..झटपट नाश्ता खत्म किया ......

अगले बीस  मिनट बाद मैं बाबतपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के आगमन गेट से बाहर  निकल रहा था ...
इति श्री दिल्ली संस्मरण कथा -सीजन दो
सीजन प्रथम
*देखुआरी -भावी वर को देखकर विवाह के लिए चयन की प्रक्रिया पूर्वांचल में देखुआरी कही जाती है! 

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

संकलकों की असमय मौत पर एक शोकांजलि .....!

मैं डूबा तो था अपने दिल्ली संस्मरणों में मगर अचानक एक गतिरोध आ गया ....चिट्ठाजगत बंद हो गया ..अब यह स्थाई बंदी है या अल्पकालिक मुझे पता नहीं है मगर मैं इन संकलकों की व्यथा कथा समझ सकता हूँ ...सबसे पहली बात तो यही है कि ये एक बिल्कुल दया भाव/हितैषिता की भावना से वशीभूत /परोपकार  वाले "चैरिटी शो " के उपक्रम  है ..बिना किसी आर्थिक आधार  परोपकार के उदाहरण! एक तो दूर दूर तक कोई आर्थिक संभावना नहीं दूसरे मूर्खों की जमात का रोज रोज का उसी डाली के काटने का जूनून जिस पर वे जमे हैं ...मतलब लगभग रोज ही उन्ही  चिट्ठा  संकलकों  की कमियाँ गिनाना जो अगर वजूद में न  होतीं तो महानुभावों की  बातें भी सामने न आ पाती ....इन्ही कारणों से ब्लागवाणी बंद हो गया .....अब कौन कंगाली में आटा गीला करे -एक तो मिलना जुलना कुछ नहीं और रोज रोज लल्लू बरसाती और गजोधर के ताने सुनना ..मारो गोली क्या रखा है इस चैरिटी में ....

लिहाजा ब्लॉगवाणी ठप पड़ गयी  और अब चिट्ठाजगत के भी अवसान के दिन दिख रहे ...हिन्दी ब्लागिंग में यह संकट की स्थिति है ....क्योकि अभी भी हिन्दी ब्लागिंग परवान पर नहीं है और उसे अभी भी चिट्ठा संकलक के सहारे की जरुरत है -एक विश्वसनीय चिट्ठा संकलक की ..मैं अपने कुछ मित्रों से बात कर रहा था कि क्यों न ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत को आर्थिक सहयोग के सहारे फिर से इस मुहिम में लगने का आह्वान किया जाय ...और ये संकलक कोई वार्षिक सहयोग राशि रख दें ....बिना आर्थिक संबल के ऐसी गतिविधियां एक तो संभव नहीं हैं और दूसरे इनका मुफ्त लाभ लेना अनैतिक भी है ...हमारे बनारस में जहाँ ढाई तीन हजार रूपये सालाना लोग पान की पीक के साथ प्रक्षेपित कर देते हैं -अगर इन इन संकलकों को केवल ५०० रूपये सालाना वार्षिक फीस दे दी जाय तो मुझे लगता है कहीं कुछ गलत नहीं है ....अब मुफ्तखोरी बंद की जाय ...अगर हम फीस देकर किसी सेवा का लाभ उठायेगें तो उसके प्रति एक तो जिम्मेदारी का अनुभव करेगें दूसरे हम तब गुणवत्ता की अपेक्षा भी कर सकते हैं ...

इधर ब्लॉगर मीट के नाम पर हम हजारो फूँक दिए जा  रहे है मगर हम इस ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं ..क्योकि हमारी गतिविधियों को उजागर करने वाला चुपचाप सेवाभाव से अपना काम किये जा रहा  है मगर उसकी दैनंदिन दिक्कतों से हम मुंह फिराए बैठे हैं ..आईये हम इस पर गंभीरता से विचार करें और पहली प्राथमिकता चिट्ठाजगत और /या ब्लागवाणी को देकर हम इन संकलकों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें ..मैं और मेरे कुछ मित्र शुरुआती सहयोग से मुंह नहीं मोड़ेगें ऐसा मुझे विश्वास है ....कोई सुन रहा है ? (संकलक तो बंद हैं ! )


सोमवार, 13 दिसंबर 2010

ब्लागरों के ब्लॉगर और यारों के यार सतीश सक्सेना से मुलाक़ात ....दिल्ली प्रवास का दूसरा दिन!

सात दिसम्बर की सुबह दिल्ली बहुत ठण्ड थी ...पारा ६ डिग्री नीचे तक उतर चुका था ....टीवी के जरिये .इस ठण्ड की खबर के बावजूद भी मैं ठंड नहीं रख सका और बाबत ब्लॉगर मीट के सतीश सक्सेना जी को फोन कर डाला  ...उनकी वही परिचित दुःख हारण तारण उमंगपूर्ण आवाज सुनायी पडी ...वे मिलने को उत्साहित दिखे ...तय पाया गया कि सभी होटल रायल पैलेस या फिर निकटस्थ सम्मलेन के वेन्यू पर ही ९ की सुबह १० बजे इकट्ठे हो जायं ....इसके पहले मैं जिन जिन से अलग भी बात कर चुका था वे अन्यान्य कारणों से ९ के पहले उपलब्ध नहीं थे ..सतीश जी ने कहा कि वे ९ को तो आयेगें ही मगर इसके पहले भी मुझसे मिलना चाहेगें ..अगला इतने प्रेम से मिलना चाहे तो  मुझे मिलने में क्या दुविधा ..जाकर जेपर सत्य सनेहू तेहिं ता मिलई न कछु संदेहू ....आज कांफ्रेंस का उदघाटन सत्र था इसलिए हम सब पूरे औपचारिक तौर पर तैयार होकर जल्दी ही सम्मलेन स्थल पर पहुँच गए ....

आम जन के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार पर यह भारत का पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन था ....प्रतिभागियों में काफी उत्साह था ....५० से भी अधिक देशों के प्रतिभागी उपस्थित हुए थे ...काफी गहमा गहमी थी ..उदघाटन हमारे सर्वप्रिय पूर्व राष्ट्रपति  कलाम साहब ने किया और युवाओं को विज्ञान संचार के मुहिम से जोड़ने का आह्वान किया ....साईंस ब्लागर्स असोशिएसन और साईब्लॉग पर इसकी रपटें  पढी जा सकती है ...

विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार के इस विशाल और अन्तर्ऱाष्ट्रीय सम्मलेन को भी अपने अहम् और संकीर्ण नजरिये के चलते कुछ विज्ञान संस्थानों  /परिषदों ने बायकाट कर रखा था क्योकि सबको सेन्ट्रल चेयर की दरकार थी ....जबकि इसकी वेबसाईट पर सभी शर्ते ,भागीदारी के नियम स्पष्ट रूप से इंगित थे और यह साईट निरंतर अपडेट होती रही है मगर शायद कुछ लोगों की गलतफहमी या अहमन्यता थी कि उनका हाथ पकड़कर मुख्य कुर्सी तक लाकर बिठाया जाएगा ..आयोजकों ने ऐसे संकीर्ण मानसिकता वालों को घास तक नहीं डाला और एक भव्य सफल कार्यक्रम करके दिखा दिया ...लोग ठगे भकुए से बने देख रहे हैं ..बंधुओं क्या बिना मुर्गों  के  बाग़ दिए  सूरज नहीं निकलता है ? ....अब मुर्गों/मूर्खों  को कौन बताये ? 

मुझे एक समान्तर सायंकालीन सत्र विज्ञान कथाओं के जरिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार पर कोआर्डिनेट करना था ....उसके पहले सतीश जी का फोन आ गया था कि वे मुझसे मिलने ही नहीं बल्कि लेने आयगें और हमने बिना विचारे झट से हाँ कर दी थी ....अब मुझे क्या पता था कि वे ठीक उसी समय आ जायेगें  जब मैं अपने सत्र संचालन के मध्य में था ....ऐसे गलत वक्त साईलेंट मोबाईल  थरथराया ..अन्तःप्रेरणा से जान गया कि सतीश जी हैं ....बिल्कुल वही थे...बोले कि वे बाहर इंतज़ार कर रहे हैं ..मैं फुसफुसाया बस आधे घंटे और ...वे मौके की नजाकत समझ गए और कहा कि ठीक है आधे घंटे बाद आते हैं ....लगभग  दो तिहाई विदेशी प्रतिभागियों से भरे  व्याख्यान हाल में जाकिर अली रजनीश ने भी साईंस फिक्शन इन ब्लाग्स पर अपना परचा पढ़ा .....बहरहाल आधे घंटे में सत्र का समय समाप्त हो गया ....आडियेंस दूसरे लेक्चर हालों की ओर लपक उठी और मैं मुख्य द्वार की ओर ..

जैसे ही मुख्य द्वार पर पहुंचा एक कार तेजी से भीतर घुसी -अन्तःप्रज्ञा ने तुरंत सचेत किया कि सतीश जी हैं ,हाँ वही थे... उन्होंने  भीतर से हाथ हिलाया और गेट पर ही कार रोककर दरवाजा खोल दिया ...और पीछे से आई कार का हार्न बज उठा ..मैंने उन्हें आगे बढ़ाकर  कार रोकने का इशारा किया ,थोड़े से असमंजस के बाद उन्होंने कार बढाई और आगे जाकर रोक दी ....सतीश जी सचमुच मुझे कांफ्रेंस स्थल से बलान्नयित करने का दृढ इरादा लेकर आये थे-इस प्रेमानुराग के चलते मैंने कांफ्रेंस डिनर को मारी गोली और चल पड़े इस यारों के यार और ब्लागरों के ब्लॉगर के साथ ...जाकिर अली रजनीश साथ में  थे उन्हें  शैलेश भारतवासी के यहाँ जाना था जहाँ वे ठहरे थे....सतीश ने उन्हें लिफ्ट दिया और शाम के भोज का गिफ्ट भी ..
यारों के यार और ब्लागरों के ब्लॉगर

हम पहली बार मिल रहे थे मगर अपरिचय की कोई दीवार नहीं ....खूब हंसी ठट्ठा हुआ ,ब्लागजगत के नामी गिरामियों की चर्चा हुई ....और उन्होंने एक जोरदार दावत मोतीमहल में दी ...उन्होंने मुझसे कुछ गोपन सवाल जवाब किये और मैंने उनका खुला जवाब दिया ..मेरे पास गोपन कुछ नहीं है ....कोई दुश्मन है या दोस्त एलानियाँ कहता हूँ जबकि कुछ नीति विशेषज्ञों का मानना है कि जीवन में गोपनीयता का अपना महत्व है और कभी कभार यह बेहद जरुरी है (जुलियन असान्जे ,सुन रहे हो न बास ) ....सतीश जी ..अरे अरे अभी ही सब  कह दूंगा तो उनके बारे में अपने चिट्ठाकार स्तम्भ में फिर क्या कहूँगा ...यारो के यार ने मुझे होटल पर रात्रि के दस बजे के आस पास छोड़ा और जाकिर को छोड़ने आगे बढ गए ....होटल में पहुंचते ही बनारस के शीतला घाट पर हुए हादसे की खबर सुन कर सन्न रह गया ...अब ब्लॉगर मीट का क्या होगा? मुझे तो वापस भागना होगा ....परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी हो गयीं थीं ....

 जारी है ....


 


रविवार, 12 दिसंबर 2010

दिल्ली में निशा निमंत्रण ......

दुलहन सी दिखी दिल्ली -एक और दिल्ली संस्मरण!-1

ऐसा लगा हम चंद्रलोक पर आ पहुंचे हों-इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट नई दिल्ली टर्मिनल तीन का नजारा-2

और  अब  आगे  ....

 

दिल्ली की पहली शाम हवाई अड्डे से रैन बसेरे  तक की भीड़ भरी ट्रैफिक के भेंट चढ़ गयी  .. किसी मित्र ने सही कहा था कि दिल्ली में आधी उम्र तो सड़कों की लम्बाई नापने में निकल  जाती है ....आयोजन स्थल -राष्ट्रीय कृषि विज्ञान संचार परिसर टोडापुर तक पहुँचते पहुँचते रात हो आई ,ठंडक भी काफी हो आई थी -अगले दिन सुबह पता लगा कि दिल्ली की ठंड ने ६ दिसम्बर की रात को एक दशक के रिकार्ड को भी धराशायी कर दिया था . पारा ६ डिग्री तक आ गिरा था -पिछली रात तो नहीं अब यह सुनकर कंपकपी छूट गयी ..शायद यह बीती रात के स्वागत भोज और आयोजन स्थल की भव्यता और इंतजामों का कमाल  था कि कंपकपी को भी  शायद  हमारे निकट आने में कंपकपी छूट गयी हो ....

काशी की ही डॉ .विधि नागर और उनके समूह की नृत्य नाटिका 'कृष्ण रास  ' की रंगारंग प्रस्तुति और स्वागत भोज के अंतर्राष्ट्रीय संस्पर्श ने माहौल में गर्माहट घोल दी थी ..चहुँ ओर दूधिया रोशनी और जगह जगह  दहकते  अलावों की व्यवस्था ने परिवेश को गुलाबी बना दिया था  -हर दृष्टि से सचमुच यह एक वार्म बल्कि वार्मेस्ट वेलकम /रिसेप्शन था ....अलग अलग समूहो ,देशी विदेशी वैज्ञानिको के परस्पर मिलते जुलते ग्रुपों  के हाय हेलो ,तरह तरह के उष्म पेयों ने वातावरण को रूमानी बनाने  में कोई कोर कसर न छोडी थी ....मेरे साथ मित्र गुप्त जी  के पहले अन्तराष्ट्रीय सम्मलेन  के संकोच सकुचाहट को रेड वाईन ने काफी हद तक दूर कर दिया था ..अन्य मित्रों के उद्दीप्त और प्रफुल्लित चेहरों से विदेशी ब्रांडों की उत्कृष्टता झलक  पड़ रही थी ......भोज बहुत भव्य और भोजन सुस्वादु था ..देशज  और अंतरद्वीपीय छप्पनों व्यंजन किंवा अधिक ही मे से मन पसंद का ढूंढना किसी टेढ़ी खीर से कम न था ....मेरा पेट तो स्टार्टरों /एपिटायिजर को चखने में ही भर गया था ..सुब्रमन्यन .साहब सही कहते हैं मैं एक खाऊ इंसान हूँ ...अब पालक पनीर आदि अनादि तो रोज ही खाते हैं ...इसलिए मैंने अपने मन  पसंद का एक अंतरद्वीपीय व्यंजन  ढूंढ ही निकाला -वेज आगरटिन  /बेकड वेजिटेबल ...जिसके लिए मेरा पेट पुष्पक विमान सा व्यवहार कर  हमेशा थोड़ी अतिरिक्त जगह दे ही देता है ....तदनंतर आईसक्रीम ..जी हाँ ठण्ड में आईसक्रीम का आनंद कुछ और ही होता है  ...जिस मित्र ने मुझे यह राज कोई एक दशक पहले बताया था सहसा सामने आकर मुझे आईसक्रीम खाते देख ढेढ़ इंच मुस्कान बिखेरते कहीं खो गए ...आखिर पांच सौ से भी अधिक भीड़ में कौन किसके साथ कब तक टिके ..जब नए नए साथी इधर से उधर गुजरते दिख रहे हों ..आखिर बेहद अधीरता के आगोश में आती हुई  इस दुनिया में कौन कब तक किसी का इंतज़ार करे  ... 
 इन कुर्सियों को अभी भी शायद  किसी का इन्तजार है 
बहुत कुछ रंगीन होते हुए भी मेरा मन विरक्त सा ही बना रहा .... उम्र के लम्बे अनुभव मनुष्य को निश्चय ही  उदासीन या फिर यथार्थ के धरातल पर ला देते हों .....मेरे मित्र गुप्ता जी बहुत खराब अंगरेजी के बावजूद पता नहीं एक विदेशी वैज्ञानिक बाला को न  जाने भारतीय संस्कृति का कौन सा सबक देते दिख रहे थे ...शायद  रेड़ वाईन या व्हिस्की का कोई कमाल का ब्रांड अपना  कमाल दिखाने को उद्यत हो उठा हो  ...मैं थोडा  सशंकित हो उठा और उन्हें हठात अपनी ओर उन्मुख किया और एक दूसरे कोने की ओर ले चला .संस्कृतियों की विभिन्नता कभी कभी परिचय का एक ऐसा क्षद्म्मावरण तैयार कर   देती है कि भोले भाले लोग धोखा खा जाते हैं ...और मेरे यह मित्र तो बड़े ही सरल ह्रदय के हैं ....सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के एक वर्तमान वर्धा प्रवास के मित्र और मेरे पुराने मित्र अनिल अंकित राय मेरे खाने के आईटमों पर नजर रखे थे और उन्हें चिढाने के लिए मैं बार बार सीक कबाब .मछली टिक्का आदि आदि नान वेज लेने का उपक्रमं सा कर रहा था और वे किसी वेज आईटम के लिए व्यग्र दिखते थे....मैं बार बार उन्हें ताकीद करता बंधुवर कहाँ अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में शाकाहारी ढूंढ रहे हो ....

 मेरा पसंदीदा कांटिनेंटल आईटम -बेकड वेजिटेबल 

मेरे अनुज डॉ मनोज मिश्र अपने मा पलायनम उद्घोष के बावजूद भी बार बार मेरे पास से पलायन कर रहे थे....उन्हें मेरे खाने पीने का ख्याल रखना चाहिए था ,मगर शायद वे अपने प्रोफेसनल कैरियर के प्रति ज्यादा चैतन्य दिख रहे थे....लेकिन अगले दिन मेरे साथ संयुक्त पेपर के प्रेजेंटेशन के समय होटल में जा सोये और मुझे उनका पेपर पढना पड़ा ..जबकि  मेरा स्पष्ट  आदेश था कि पेपर वही पढ़ेगें और सवाल आदि उठेगा तो मैं झेल लूँगा ....

मुझे अब ठंडक का अहसास होने लगा था .रात के ग्यारह बज चुके थे   ..नाक अन्दर से गीली गीली लग रही थी ....इसके पहले कि आयोजक जन विदेशी प्रतिभागियों को उनके प्रवासी ठिकानो पर ले जाने में व्यस्त हो जायं मैंने आयोजन के एक मजबूत स्तम्भ और एक बहुत ही नेक इंसान जिन्हें मनोज ने ग्रासरूट इंसान की संज्ञा से नवाजा ,संतराम दीक्षित जी को पकड़ा और जब उन्हें यह कहा कि हुजूर एक आप ही तो हैं इस भीड़ में जिसके रहमो करम पर  हम जिन्दा हैं नहीं तो लंका निश्चर  निकट निवासा  इहाँ कहाँ सज्जन का वासा तो वे पुलकित हो उठे और तुरंत हमारे ठहरने के स्थल रायल पैलेस होटल ,पुराना राजेंद्रनगर तक एक टैक्सी का इंतजाम कर दिए ...मनोज मैं और गुप्ता जी रैन बसेरे की ओर चल पड़े ...इस तरह दिल्ली की यह पहली निशा बीत चली थी और मुझे अनायास ही भरत के प्रयाग प्रवास का वह मानस पद बार बार याद  आ रहा था ...
सम्पति चकई भरत चक मुनि आयस खेलवार 
तेहिं निसि आश्रम पिजरां   राखे भा भिनुसार 
दिल्ली की एक नई सुबह हमारी प्रतीक्षा कर रही थी ....
अभी जारी है ...
.

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

ऐसा लगा हम चंद्रलोक पर आ पहुंचे हों-इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट नई दिल्ली टर्मिनल तीन का नजारा

दुलहन सी दिखी दिल्ली -एक और दिल्ली संस्मरण!

अब आगे ....

कामनवेल्थ के पहले  हम जब भी दिल्ली एअरपोर्ट पर उतरे हैं ,वही परम्परागत तरीके से सीढ़ी का आकर यान से जुड़ने और फिर सीढ़ी से उतर कर फेरी बस पर बैठ एअरपोर्ट के आगमन भवन तक पहुंचने की स्मृति थी ...इस बार तो पूरा मंजर ही बदला हुआ था -सीढ़ी की छोडिये पूरा एअरपोर्ट भवन ही एक एअर  टनेल के जरिये विमान से  आ जुडा था ....यात्री  बस सीधे उसी में से होते हुए खूबसूरत दरियों/कारपेट  पर कदमताल करते हुए आगे बढ चले ....प्रौद्योगिकी का कमाल अपनी पूरी भव्यता के साथ हमारे सामने था ..एक क्षण को लगा कि जैसे मैं खुद अपनी विज्ञान कथा मोहभंग के नायक की ही तरह चंद्रतल पर लैंड कर चुका हूँ .....सब कुछ वायुरोधी एक बड़े कैप्सूल सा लगा और सामने   ट्रैवेलेटर जो समतल आगे की ओर भाग रहे थे और जो असहाय ,अशक्त  यात्रियों के लिए बनाए गए थे मुझे बेधड़क बनारसी की उन लाईनों की याद दिला रहे थे-ऐसी कब होगी दुनिया बेधड़क ,जब रुक जाएगा आदमी और चलने लगेगी सड़क ....जी हाँ वही मंजर सामने था और हम चलती सड़कों-ट्रैवेलेटर पर पैर जमाये आगे की ओर भागे जा रहे थे-हमारे रास्ते में ऐसी कई भागती सडके मिलीं ....कुछ छोटी जीपें भी दिखीं जिसे मैंने चंद्र्बग्घियों का प्रोटो टाईप माना,जो इधर से उधर यात्रिओं की फेरी में जुटी थीं ...यह सब चंद्रमा की भावी बस्ती का एक ट्रेलर ही तो लगा ....आज की इन प्रौद्योगिकियों से  अगर हम कोई संकेत लें तो निश्चय ही हम सौर मंडल में अन्यत्र की बसाहटों का सहज ही एक पूर्वानुमान लगा सकते हैं ....और विज्ञान कथाकारों के लिए ऐसे ही दृश्य भविष्य की कल्पनाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाते हैं! 

रुक गया है आदमी और चलने  लगी है सड़क -इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट नई दिल्ली टर्मिनल तीन 

मुझे अपना लगेज लेना था और इतने भव्य और तिलिस्मी से लग रहे भवन में अपना समान कहाँ से लूं यह दुविधा मन  में थी ..बहरहाल फ्लाईट संख्या आदि का पता बता  कर निचली मंजिल पर पहुँच एक इनक्वायरी विंडो पर जानकारी मिली कि  कन्वेयर बेल्ट संख्या तीन पर अभी अभी आ  पहुंचे जेट ऐअरवेज और इंडियन एअरलाईन के हमारे विमान आई सी ४०५ का सामान डाल दिया गया  है ..मैं मित्र गुप्ता जी के साथ वहां पहुंचा तो कन्वेयर बेल्ट पर सामानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था ....सबकी नजरें अपने अपने सामानों पर गडी थीं ,समान को सामने आते ही पहचान कर तुरंत उठाना था क्योंकि अगले पल इंगित सामान एक विशाल वलयाकार कन्वेयर बेल्ट पर घूमते हुए आगे बढ जाता था ..अचानक मैं असहज हो उठा क्योंकि इस बार मैं जो स्ट्राली ले गया था वह बहुत कामन माडल वाली थी ... बच्चे मेरी वाली स्ट्राली कब्जिया चुके थे और इस काले रंग की स्ट्राली जैसी कई स्ट्रालियाँ दीर्घ वलयाकार बेल्ट पर घूम रही थीं ...मैंने अपनी वाली  के  चक्कर  में दूसरों की कई स्ट्रालियों को उठा लिया और तुरंत  ही उनके वास्तविक स्वामी के टोंकने पर झेंपना पड़ा ..सबसे बड़ी झेंप तो तब हुई जब मुझे एक दूसरी स्ट्राली खुद अपनी ही लगी और ठीक यह फैसला लेने कि यह मेरी ही है के नैनो सेकेण्ड पहले उसके असली दावेदार ने अपना दावा ठोक दिया ....मैं अपना सा मुंह लेकर रह गया ..गलती यह हो गयी थी कि अपनी स्ट्राली पर मैंने कोई प्रमुख पहचान का चिह्न नहीं बनाया था ..अब मैं कुछ कुछ नर्वस सा होने लगा था और उधर मित्र गुप्ता जी बार बार यह कहकर कि इसलिए मैं लगेज बुक कराने का लफड़ा ही नहीं पालता मुझे खिझा रहे थे... एअर लगेज में बुक करने वाले समान पर एक सहजता से दिख जाने वाला  पहचान चिह्न प्रमुखता से न लगाकर मैंने बड़ी भूल कर दी थी ...धीरे धीरे सब सामानों के दावेदार अपना अपना सामान लेकर चलते जा रहे और मेरी स्ट्राली का कहीं अता पता नहीं था ...आखिर का  बैग भी उठ गया और कन्वेयर बेल्ट खाली हो गया ....

हम थोड़ी देर वहीं ठगे से रह गए ...आयोजकों का फोन आ रहा था और जानकारी मिल  रही थी कि दिल्ली  का तापमान १० डिग्री के नीचे आ चुका था ...मेरे सारे गरम कपडे उसी स्ट्राली में थे .. ..गुप्ता जी ने मुझे तनाव में देखकर कहा कि चलिए बाहर से स्वेटर इत्यादि खरीद  लेते हैं ....."मगर ,आखिर मेरा समान गया कहाँ ,कहीं वही से तो लोड होने से नहीं रह गया ...." कहकर मैं गुप्ता जी को वहीं रोक कर अगले १० मिनट में  इस बारे मैं औपचारिक शिकायत वगैरह  में लगा रहा ..वापस आया तो गुप्ता जी को कन्वेयर बेल्ट के सुदूर दूसरे किनारे की ओर टकटकी लगाये देखते पाया ..जाहिर था वे अभी भी आस लगाए बैठे थे...मैंने निःश्वास लेकर कहा चलिए कम्प्लेंट कर दी है ..छोडिये जो होगा देखा जायेगा ..बनारस के एअरपोर्ट पर अपने मित्र के पी सिंह  जी तो हैं ही ,वे सब कुछ ठीक करा देगें ....और तभी एक काली हिलती डुलती चीज अकेली कन्वेयर बेल्ट पर आगे सरकते हुई दिखी ....अरे कहीं वही तो नहीं है मेरी स्ट्राली ...हाँ हाँ वही थी मेरी स्ट्राली ...उतारने के बाद पूरी संतुष्टि हो गयी ...लौटते वक्त मैंने इस पर अपने बड़े से कांफ्रेंस बैज को ही  पहचान के लिए स्थायी रूप से लगा दिया है ...जैसे मेरे पूर्व के बैग्स और स्ट्रालियों पर लगे हैं और जिन पर अब बच्चे कब्ज़ा जमा चुके हैं ....

एअरपोर्ट पर प्री पेड टैक्सियों का रेट रीजनेबल है ....हमने ३२० रुपये में आयोजन स्थल राष्ट्रीय  कृषि विज्ञान परिसर (एन ऐ एस काम्प्लेक्स ) ,देव प्रकाश शास्त्री मार्ग टोडापुर /दसघरा पूसा के लिए टैक्सी ली और गन्तव को चल पड़े ....
अभी जारी है!

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

दुलहन सी दिखी दिल्ली -एक और दिल्ली संस्मरण!

संस्मरण आखिर लिखे ही क्यों जायं?लिखने वाले के लिए तो मान  सकते हैं यह बिना लिखे रहा न जाय किस्म  की एक कशिश  है मगर पढने सुनने वाले का इससे कोई भला न हो तो फिर ऐसे संस्मरण से फायदा ही क्या ? दूसरी ओर कोई संस्मरण ऐसा हो जाए कि लोग पढ़ें और उन्हें लगे की अरे इस संस्मरण में तो मेरी खुद की ही झलक है-खूबियों की और मासूम भूलों  की  भी तो फिर बात ही बन जाए! मतलब संस्मरणों को बयां करना एक तरह से लोगों के मन  से जुड़ने की कवायद है ....इसलिए   इस बार की भी दिल्ली यात्रा के कुछ क्षणों को मैं आपके मन मस्तिष्क में  गिरवी रख देना चाहता हूँ ,ताकि कभी किसी मोड मुलाकात पर फिर से उसे जीवंत कर सकूँ .....अंतर्जाल और अपनी  याददाश्त का तो  कोई भरोसा नहीं .....मित्रों का भरोसा ही है जो अभी पूरी तरह टूटा नहीं ....अचानक ही कोई ऐसा शख्स आ मिल जाता है जो मानवता और दोस्ती में अपुन का विश्वास फिर से जगा जाता है .......दुनिया अच्छे लोगों से अभी पूरी तरह खाली नहीं हुई है ..ऐसा अनुभव शिद्दत के साथ दिल्ली में हुआ ...पर उसकी चर्चा आगे ...पहले यात्रा की कुछ बातें .....

दिल्ली में पी सी एस टी यानि पब्लिक कम्यूनिकेशन आफ साईंस एंड टेक्नोलाजी के ११वें  अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में अपनी भागीदारी के लिए जाने के पहले सतीश सक्सेना जी को मैंने यह बता दिया था कि मैं कुछ अपनी पसंद के ब्लॉगर से जरूर मिलना चाहता हूँ और कम से कम एक चाय अपनी ओर से उन्हें पिलाना चाहता हूँ ,. यह कोई ब्लॉगर मीट की भूमिका नहीं थी ..वैसे भी महानुभावों में अब ब्लागर मीट को लेकर एक उपहासात्मक और व्यंगात्मक लहजा मुखर हो चला है  ..तिस पर  दिल्ली अभी अभी एक बड़े ब्लागर मीट से उबरी है  और अपुन भी  कोई सेलिब्रिटी थोड़े ही हैं  .और .कुछ लोग  आँखे  तरेरे ही रहते हैं ....बकौल सोम ठाकुर के ...अपना धरम है खुशबू खुशबू ,अपनी व्यथा है मन ही मन फिर भी न जाने क्यों कुछ साथी आँख तरेरे देखे हैं ..क्या बतलाएं हमने कैसे सांझ  सवेरे देखे हैं .....बस मेरी इच्छा कुछ मित्रों से मिल कर उनका  कुशल क्षेम भर जान लेना था ,उन्हें आँख भर देख लेना था  क्यूंकि उनकी रचनाओं से तो खूब परिचित हो ही लिया हूँ ..... 

 बस मैंने सतीश सक्सेना जी की मदद  मांग ली .....उन्ही से   इसलिए कहा कि उनमें मुझे एक समन्वयक की प्रतिभा मूर्तमान  दिखती रही है ..वे जब हिन्दू मुस्लिम के समन्वयन की बात इतनी सहजता से कर लेते हैं तो फिर चन्द ब्लागरों का समन्वय तो उनके बाएं हाथ क्या कनिष्ठा का ही खेल समझिये ....उन्होंने अपना  कुछ संशय अंगरेजी में बोलें तो  रिजर्वेशन  जरूर  मुझसे शेयर किये मगर यहाँ से मेरे चलने के पहले ही एक ब्लॉगर चाय पार्टी की बात पक्की हो गयी और वेन्यू टाईम वगैरह दिल्ली पहुँचने के बाद तय होने की सहमति बनी ...

अब दिल्लीवासियों की भी अपनी मुसीबतें हैं ..खुशदीप भाई ने कहा कि मेरी ड्यूटी कुछ ऐसी है कि मैं शाम को अवलेबुल नहीं हूँ ,अजय झा भाई कोर्ट के किसी सम्मन में फंसे ....किसी  प्रिय ने कहा कि मुझे आपसे भीड़ में नहीं अकेले मिलना है ....डॉ दराल साहब की क्लीनिक सुबह ९ बजे से ४ बजे तक रहती है ....बस रंजना भाटिया ( रंजू ) जी ,सीमा गुप्त जी ,एम वर्मा जी ,दर्शन बवेजा जी जैसे मुझसे मिलने के लिए ही तैयार बैठे थे ....सतीश जी ने कहा कि आप आईये  तो मिलने के लिए कम से कम मैं बेकरार हूँ! बहरहाल एक हसीन सी ब्लॉगर चाय पार्टी का  तसव्वुर लिए मैं आई सी ४०५ की उडान में सवार हो चला .मेरे साथ ,मेरे परम मित्र किन्तु ब्लॉगर नहीं मित्र एम एल गुप्ता जी को भी सम्मलेन में मेरे ही सत्र में एक पेपर  पढना था ..मगर उन्हें ब्लॉगर मीट का मतलब मैं समझा नहीं पाया ..उन्हें ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है अब भी  पता नहीं है और उन्हें समझाने का मुझे वक्त नहीं मिला बल्कि कहिये उनके पास वक्त नहीं है .. ...वे बस अपने हाथ में एक बैग लटकाए जहाज में सवार हो लिए थे ..उनका मानना था कि लगेज बुक करने पर वहां वापसी लेने में बड़ी किच किच होती है और एक बार उनका बुक किया लगेज भी मिसप्लेस हो गया था, कई दिन बाद मिला .....इसलिए वे दिल्ली केवल एक हैण्ड बैग लटका के चलने के अभ्यस्त  हैं ...मैंने कहा भी कि दिल्ली में ठण्ड बढ चली है कुछ और गरम कपडे ले लीजिये तो उन्होंने कहा अगर ज्यादा ठण्ड लगी तो वहीं कुछ खरीद लेगें मगर समान बुक कर नहीं जायेगें..इधर मेरा हैंडबैग और जो स्ट्राली मैंने लगेज में बुक कराई गरम कपड़ों से ठसाठस भरे थे(सौजन्य श्रीमती जी ...) ..

दिल्ली तक की यात्रा एक घंटे २० मिनट में अच्छे स्नैक्स चाय /काफी के साथ पूरी हो गयी ..और विमान जब  लैंड होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल तीन से आ  लगा तो कामनवेल्थ के गेम के बाद की सजी सवरी दुलहन सी दिल्ली की मानो मुंह दिखाई हुई हो ....अद्भुत ,विस्मयपूर्ण दृश्य और यांत्रिकी ने हमारा  मन मोह लिया .....
अभी जारी है .....
 - 

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

मणिकर्णिका घाट पर पांच घंटे

बनारस काशी या वाराणसी नाम अलग भले हैं , स्थान एक और महात्म्य भी एक -भवसागर से मुक्ति की गारंटी! काशी के अनेक रंग हैं मगर मुक्तिदायिनी काशी का ही बोलबाला है -कहते हैं काश्याम मरणात मुक्तिः जो काशी में जीवन त्याग करता है वह मुक्त हो जाता है ....और काशी का यह  रंग  विगत एक दशक से मुझे अपनी ओर शनैः शनैः और भी आकर्षित करता रहा है .....मतलब जीवन की नश्वरता का भान उत्तरोत्तर और गुरुतर होता रहा है ....इन दस सालों में कितने ही स्वजनों  परिजनों को मैंने यहाँ अंतिम विदाई दी है .....मणिकर्णिका घाट पर उनकी जलती चिता को सलामी दी है ..याद पड़ता है वर्ष १९९९  में जब पिता जी को यहाँ मुखाग्नि दी थी और जलते हुए अनेक शवों को सामने देखा था तो जीवन से मानो वैराग्य हो उठा था....मगर आश्चर्य है कि फिर जगत गति में लीन  हो गया ...और  वही वैराग्य फिर फिर जोर मारने लगता है जब किसी स्वजन की अंतिम यात्रा में भाग लेता हूँ और उनके अंतिम संस्कार में शरीक होने मणिकर्णिका पहुँचता हूँ ....युधिष्ठिर से एक यक्ष प्रश्न यह भी पूछा गया था कि सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो युधिष्ठिर का जवाब था कि लोग शव यात्रा में भाग लेते हैं ..उस वक्त यही अहसास करते हैं कि एक दिन यहीं परिणति मेरी भी होनी है मगर दूसरे ही दिन से फिर से दुनियादारी में लीन हो जाते हैं ...


कल  सुबह ही पैतृक घर से माँ का फोन आ गया था कि फूफा जी(पिता जी की बहन के पति )  नहीं रहे ...फ़ूआ चार वर्ष पहले दिवंगत हुईं थी और गंगा के  मणिकर्णिका घाट पर उनके भी दाह संस्कार में मैं शामिल था ...और अब फूफा भी ..दोनों की असमय मृत्यु ...फ़ूआ  अपेंडिक्स -सेप्टिसीमिया और अब फूफा हार्ट फेल हो जाने से .असमय ही चल बसे .....उनकी अंतिम यात्रा की  प्रतीक्षा दिन भर करता रहा ..शाम को ६ बजे शव यात्रा बनारस पहुँची ....दाह संस्कार की लम्बी प्रक्रिया में रात्रि के पांच घंटे वहीं मणिकर्णिका पर बीते ....गंगा का मणिकर्णिका घाट विदेशी पर्यटकों के बीच बर्निंग घाट के रूप में प्रसिद्ध है क्योंकि वहां चौबीसों पहर अनवरत ,लाशें जलती रहती हैं .कहते हैं कि यहाँ की अग्नि विगत तीन हजार वर्षों से बुझी ही नहीं ...वहां का अग्नि कुंड लाशों की अग्नि से प्रज्वलित होता रहा है ..और वहीं से अग्नि निरंतर आ रही लाशों को भस्म करती रही है ...चिरतन ज्वाला है यह ,शाश्वत अग्नि !.......मणिकर्णिका का नामकरण कहते हैं तब पड़ा जब अग्नि कुंड में जली सती के मृत शरीर को लेकर घूमते विदग्ध शिव यहाँ भी पहुंचे और सती का  कर्ण फूल  यहाँ गिरा ....यहीं पर गंगा से पृथक किन्तु घाट से ही लगा एक आदि तीर्थ कुंड -चक्र पुष्करिणी है .जहाँ स्नान से सीधे मुक्ति का मार्ग  प्रशस्त हो उठता है मगर विधि की विडंबना देखिये अब इसमें पानी की एक बूँद भी नहीं है .....मरणं मंगलम यत्र सफलं यत्र जीवनं .......... यत्र सैसा  श्री मणिकर्णिका ....जहां मरना मंगलमय है और जीवन सफल वही मणिकर्णिका है ..ऐसा स्कन्द पुराण काशी खंड में वर्णित है .

फूफा जी के अब सहसा ही अनाथ हो गए दो पुत्र हैं ..बड़े २८  वर्षीय राघवेन्द्र शुक्ल और दूसरे कानपुर कृषि विद्यालय में पी एच डी कर रहे पंकज .....दिल्ली से राघवेन्द्र को आने में थोडा विलम्ब होने से अर्थी बनारस देर से पहुँची ..किन्तु विधान के अनुसार २४ घंटे के भीतर ही ....हमारे यहाँ मान्यता है कि पिता को मुखाग्नि ज्येष्ठ पुत्र जो शादी शुदा हो और जिसका यज्ञोपवीत हो गया हो (मतलब जनेऊ धारण करता हो ) वही करता है ....मगर पुरनियों ने विचार विमर्श कर कतिपय कारणों से  छोटे पुत्र पंकज को मुखाग्नि देने को आदेशित किया और झटपट उनको जनेऊ धारण कराया गया ...उनका मुंडन -केश प्रक्षालन  हुआ .....चिता सजाई गयी ....चन्दन और घी से उपचारित करने के बाद अग्नि कुंड से सरपत /नरकटों के बीच अग्नि स्फुलिंग लाकर दिया गया ..जिससे पांच बार परिक्रमा कर मुखाग्नि दे दी गयी ...सामान्यतः शव का पूर्ण दाह ढाई से तीन घंटे में होता है .....और तीन साढ़े तीन कुंटल लकडियाँ इस्तेमाल होती हैं .....जब तक शव का पूरा दाह नहीं हो गया ..हम सब वहीं शोकाकुल बैठे रहे ...शव दाह के उपरान्त जल कलश से कर्मकांड कर उसे पंकज ने पीछे की ओर गिरा कर फोड़ दिया ......दाह संस्कार पूरा हुआ ...

अब बारी थी गंगा स्नान की ..पंकज और कई और  लोगों ने  रात्रि के ११ डिग्री तापमान पर नंगे बदन वहीं बगल सिंधिया घाट पर स्नान किया .और हम जैसे विधर्मियों ने बस गंगा जल का छिडकाव कर अपना शुद्धिकरण किया ... कठिन कष्टप्रद कर्मकांड की प्रक्रिया पूरी करके सब लोग रात्रि ११ बजे जौनपुर रवाना  हो गए ..अभी तो अंतिम संस्कार के कई चरण पूरे होने हैं जिसका  तेरहवें दिन ब्रह्म भोज से,  जो पुरातनकाल में निश्चित ही ब्रह्म गोष्ठी रही होगी ....से समापन होगा ....मुझे पंकज को देखकर बार बार रुलायी आ जा रही थी जिस बिचारे पर अभी ही इतना बड़ा बोझ आ  पड़ा है  ...

 बर्निंग घाट मणिकर्णिका : यात्रा का आखिरी पड़ाव 
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कल से ही मन  खिन्न है .....वैराग्य भाव प्रबल हो उठा है ....अपनी भी  काशी में ही अंतिम  संस्कार की  नियति  तो सुनिश्चित है ...कब होगी नहीं पता मगर यहीं होगी देर सबेर ...वंश परम्परा अपना कर्तव्य निभाए  बिना तो  मानेगी. नहीं ..और मैं बेबस हूँ ..कुछ कर नहीं सकता ..इतनी चिरन्तन परम्परा से विद्रोह करना अपने बूते में नहीं ....



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