Wednesday, 11 November 2009

यह नायिका है वासकसज्जा !(षोडश नायिका -५)

यह नायिका है वासकसज्जा !



"सेज को सुन्दर सुगन्धित फूलों से सजा कर सोलह श्रृंगार से संजी सवरी सुन्दरी  प्रिय की आतुर प्रतीक्षा  में मीठे सपनो में जा खोयी है....प्रियतम बस आते ही होगें यह विश्वास अटल है मन  में ....साँसों की लय में  भी उसके अंतस का दृढ विश्वास मुखर हो उठा है "
चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल
नोट  :अगली नायिका का दर्शन अब १९ नवम्बर को....

कुछ यादें इक गृह विरही की ....



एक घोर गवईं मानुष हूँ मैं -जन्म -गृह त्याग नहीं हो सका मुझसे ! आज भी वहीं पहुँचता रहता  हूँ बार बार -जननी की आश्वस्ति  भरी छाँव में ...जैसे मेरो मन  अनत कहाँ सुख  पावे ....

पिछले दिनों दीपावली और एकादशी पर घर गया घरनी  के साथ ........कुछ चित्र लायें हैं ! इसलिए यहाँ चेप रहे हैं ताकि यह विस्मृतियों  के वियाबान में कहीं खो न जायं !कुछ और चित्र फिर कभी !



                  

                          जगमग दीपावली में "मेघदूत", हमारा पैतृक आवास जौनपुर 








बेटी प्रियेषा ने बनायी जगमग रंगोली 









                                                                एकादशी पर  ईख चूसने का आनन्द  










                                                                                          आखिर डेजी ही क्यों पीछे रहती ,उसने भी चूसा गन्ना 

Tuesday, 10 November 2009

आज बात संयुक्ता की ( (नायिका भेद )

आईये रस परिवर्तन किया जाय ! विरह के बाद श्रृंगार के संयोग का भी तो आनंद लिया जाय !
जी हाँ ,आज बात संयुक्ता की -


" चुपके से  प्रियतम की आँखों  को पीछे से आ ढँक लेने के बहाने प्रिय से आ लिपटी बाला ...... .फिर उसने मादक अंगडाई ले अपने अनुपम अंगों को दिखला डाला ......... प्रियतम ने तब   भेद भरी  बातों  मे  सहसा इक  आग्रह कर डाला........ . शर्म से हुई छुईमुई बाला ने हँस कर  बात को टाला .........  अगले ही पल  बाला ने गले में प्रीतम के  डाली बाँहों की माला "...........






यह संयुक्ता नायिका है ! प्रिय  आलिंगन में आबद्ध !आह्लाद और प्रेमोन्माद से भरी  हुई !

चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

Monday, 9 November 2009

यह नायिका कहलाती है आगतवल्लभा !(नायिका भेद)

मुझे बहुत खुशी है इस श्रृंखला को ब्लागजगत में  सकारात्मक रूप से लिया गया है ,इसके पीछे भावना  बस अपनी जानकारी को मित्रों से बांटना है और एक सार्थक विमर्श ही है ! हमारी शास्त्रोक्त /हिन्दी साहित्य की नायिकाएं एक काल खंड के सौन्दर्य /संवेदना /रस बोध की अभिव्यक्ति  हैं -मानव के सौन्दर्यानुभूति की एक ज्ञात प्रस्थानिका या संदर्भ  बिंदु जिससे हम उत्तरवर्ती और आधुनिक मनुष्य के   सौन्दर्यबोध का तुलनात्मक आकलन कर सकते हैं -मानव की संवेदना में आये युगीन परिवर्तनों का भी एक जायजा ले सकते हैं !  जैसे अब तक उल्लिखित विरहिणी नायिकाओं पर आप सभी के  अनुकथन से यह बात साफ़ तौर पर उभर कर सामने आई है कि आज तकनीकी जुगतों के चलते  पहले जैसी विरहणी नायिकाएं अब   कहाँ रही  ? तो क्या अब की नायिकाएं केवल विहारिणी ही रह गयी हैं  ?उनमें  विरह  का लोप हो गया है ? यह चर्चा चलती रहनी चाहिए !
आईये आज की नायिका पर एक दृष्टि डालें !


"प्रियतम के विदेश से अवश्यम्भावी वापसी  की सूचना मिलते ही  नायिका की  खुशी का पारावार नहीं है -वह आह्लादित हो उठती है ! तन मन  पुलकित  है ,छाती भर आई  है ,गालों पर लालिमा आ गयी  है ! यह दशा देख सहेली आशयपूर्ण मुस्कराहट से कह पड़ती है ," सखि, लाओ यह दीन मलीन रूप तो  साज संवार दूं "
"रहने दो ,रहने दो ,ज़रा कंत भी तो देखें उनके विछोह ने मेरी कैसी गत दुर्गत कर डाली है ! "

मगर फिर न जाने कुछ सोच कर  अपनी सखी से प्रतिरोध नहीं करती और सखी उसकी साज संवार में लग जाती है! "



यह नायिका  है आगतवल्लभा ! 
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल 

कृपया यह पोस्ट भी पढें ! 

Saturday, 7 November 2009

यह नायिका है एक विरहिणी ,परकीया हो या फिर गृहणी!

वह नायिका विरहपीडिता (प्रोषितभर्त्रिका /पतिका ) कहलाती है जिसके पति विदेश चले गए हों !

                                               हाय !  ये कैसी दशा हो गयी मेरी सखी की !


मतलब कुछ ऐसा, ".... सखी रे! यह सावन निर्दयी कैसा रिमझिम बरस रहा है और मुझे रुलाये जा रहा है .मेरी आखें सजन की प्यारी सूरत देखने तक को तरस गयीं है -क्या विदेश में दिशायें बादलों की गडगडाहट से गुंजायमान नहीं होतीं या विरह वेदना को बढा  देने वाली चातक और मोर की बोली वहां नहीं सुनी जाती -ऐसा लगता है कि पिय की नगरी कुछ अलग ही जादूभरी हो गयी है जहाँ  ननद के भाई सुध बुध खो बैठे हैं (संकेतार्थ /गूढार्थ : कहीं ऐसा तो नहीं, मेरे प्रिय दूसरी नवयौवनाओं  के मोहपाश में बंध गए हों !) "


अब सखी कितना मन  बहलाए !  



 इस तरह विरह और प्रिय के प्रेम के बंट जाने की  अनेक दुश्चिंताओं से क्लांत नायिका है विरह पीडिता (प्रोषित भर्त्रिका /पतिका).नायिका की यह अवस्था अनूढा ,स्वकीया और परकीया सभी में संभव है .शीर्षक में महज गेयता और तुकबंदी के लिए  ही गृहणी का उल्लेख है जो सामान्यतः स्वकीया कही जा सकती है ! ऊपर  का दृष्टांत स्वकीया प्रेम की ही इन्गिति है ! पति की विरह वेदना पत्नी से सही नहीं जा रही है और मन  में अनायास  ही अनेक शंकाएँ उठ रही हैं !
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल

Friday, 6 November 2009

बौद्धिक प्रतिभाशीलता का ही नाम है गिरिजेश राव:चिट्ठाकार चर्चा !


                                                               गिरिजेश की एक भाव-मुद्रा 
बौद्धिक प्रतिभाशीलता का ही नाम है गिरिजेश राव -हाँ लम्बे समय से एक चुनिन्दा ब्लॉगर की तलाश में भटकता चिट्ठाकार चर्चा का यह यह ताजा  अंक आपके सामने हैं -और यहाँ पेश हैं  गिरिजेश राव ! एक आलसी का चिटठा और गाहे बगाहे लिखने के लिए कविता पर एक ब्लॉग  लिखने वाले गिरिजेश (मेरा उनके लिए यही स्नेहिल संबोधन है ) से मेरा परिचय कोई ज्यादा पुराना नहीं हैं -बस यही कुछ माहो से हम परिचित है मगर प्रयाग के संत समागम के बाद परिचय की प्रगाढ़ता और मिलन की गहनता सहसा काफी बढ़ गयी है!और यह अकारण नहीं  है !

सबसे पहले मुझे गिरिजेश के बारे में सिद्धार्थ जी (प्रयाग में धनुष यज्ञ जेहिं कारण होई वाले अपने सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी - हमारे एक पूर्व चयनित चुनिन्दा चिट्ठाकार ) ने बताया था ! सिद्धार्थ जी और गिरिजेश दोनों ही गुरुभाई हैं और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की   कथित धुर गोबर पट्टी के गुदडी के लाल हैं; न जाने ऐसे लाल गोपालों के वजूद के बावजूद किसी  गोबर पट्टी की इन्गिति भी  कैसे की जा  सकती है ?  गिरिजेश के ब्लॉग का नाम प्रथम दृष्टया ही नहीं पुनः पुनः दृष्टया भी  अजीब ही लगा था -यह कौन सा उद्धत सांसारिक जीव है जो अपने आलस्य को ही प्रोमोट करना चाहता है ! मगर वह होगा तो कोई विशिष्ट ही जो कबीर की भाषा में यहाँ  उलट्बानी उद्घोषित कर रहा है ,डंके की चोट पर ! सो देखना चाहिए .और मैंने देखा तो  विमोहित होता गया !कंटेंट से !

गिरिजेश के ये दोनों ब्लॉग लोकमान्यता की  दक्षिण की दिशा के समान हैं -और एतदर्थ प्रगटतः गमन निषेधित ! जी हाँ मत जयियो दक्खिन बबुआ  की बुजुर्गी सीख की याद दिलाती हुई - उधर गए तो फंसे ! जैसे मैं फंसा तो आपको यह सात्विक हिदायत भी कि आप गए तो फिर आप भी फन्सेगें ,अगर अब तक कहीं फंस न गएँ हो तो -फिर मोहपाश (मोहन वशीकरण सब) से छूट नहीं पायेगें ! ये दोनों ब्लॉग भावनाओं की गहन गहनता समेटे  हुए हैं -अभी अभी बाऊ चरितावली  सम्पन्न हुई है जिसने भाषा शिल्प के मामले  में लोगों को फणीस्वर नाथ रेणु  की याद दिला दिया  !

गिरिजेश मूलतः कवि ह्रदय हैं -उनका गद्य भी ह्रदय से ही निःसृत है ! मतलब मस्तिष्क के उस हिस्से से उद्भूत है जो दिल का डिपार्टमेंट संभालता है ! मैंने उन्हें बौद्धिक प्रतिभाशील कहा है क्योंकि केवल बौद्धिक या प्रतिभाशील  कहकर उन्हें मैं आंक नहीं पा  रहा था !  इलाहाबाद और कानपुर वालों ने बौद्धिकता को अब अपने तक ही सीमित कर लिया है ,हथिया लिया है-   कुछ कुछ अविजित लंका की कैद सरीखा  और जहां तक प्रतिभा की बात है तो  उस पर तो  देश के आई. ए . एस न जाने कब से काबिज हो चुके हैं ! अब मेरा  ब्लॉग नायक भला इन एकल और उच्छिष्ट पहचानों का मुहताज क्यों बने !  मनुष्य के ये दोनों ट्रेट -बौद्धिकता और प्रतिभा ,अलग अलग ज्यादा दीखते  हैं -मगर गिरिजेश में इन दोनों लक्षणों का समग्र  परिपाक हुआ है  ! वे बौद्धिक हैं मगर दयामागूं - दीन , शोचनीय  विह्वलता से दूर हैं -आत्म मुग्धता से भी दूर हैं -प्रतिभाशाली बौद्धिक हैं !  सहज है सरल हैं -ठठा कर ऐसा हंसते हैं जो एक निर्मल ह्रदय वाले के ही वश का है ! नहीं तो  आज के युग में हंसी ?

इलाहाबाद में हमने बहुत गुल गपाड़े किये  - मौज मस्ती वालों की बातें तो बस कहने भर की हैं ! दरअसल मुझ उद्धत उन्मत्त  के साथ गिरिजेश सरीखा भी कोई हो जाय तो दूसरों का पत्ता साफै समझिये -सारी दुनिया के लिए हम तत्क्षण पागल करार  हो सकते हैं ! अब जाकी रही भावना जैसी ...लोग गलत कहते हैं सभी डिजिटल रिश्ते धोखे होते है -गिरिजेश जीवंत उदाहरण हैं - कल्पित से भी ज्यादा उदात्त और मानवीय ! उन्होंने गहरी संवेदना से मुझे बड़ा भाई कहा  -और मैंने इस रिश्ते को यद्यपि यह उत्तरदायित्व भरा है स्वीकार भी कर लिया है ! मस्त रहो अनुज ! हुडदंग जारी रहे.....

इलाहाबाद की संगोष्ठी में ब्लॉग बनाम  साहित्य के मुद्दे पर गिरिजेश को सुनना एक अनुभव था ! कई वक्ताओं द्बारा उछाले गए कुछ जुमलो पर भी इनकी  कटाक्ष ब्लॉग पोस्ट पढने लायक है ! गिरिजेश आलस का परित्याग पर चुके हैं -यह उनका स्थायी भाव बान जाय -यही शुभेक्षा  है !

चिट्ठाकार चर्चा

Thursday, 5 November 2009

आईये मिलिए पहली नायिका से .....(नायिका भेद )

डॉ .राकेश गुप्त ने "नायिका " को यूं  पारिभाषित किया है -'सुन्दर एवं युवा पुरुष के प्रेम भाव का आलम्बन बनने की पात्रता रखने वाली मोहक और यौवन प्राप्त रमणी  ही नायिका कहलाती है . ' अन्यत्र यह भी उद्धरित है कि ' वह सुन्दरी और यौवन पूर्ण  स्त्री जिसे  देखने से रति स्थायी भाव जागृत हो और जिसका विस्तार श्रृंगार रस में हो -नायिका है !

आईये आपको सोलह नायिकाओं में से पहली नायिका से मिलवायें ! जरा  इस विवरण/दृष्टांत  को पढ़ लें -

प्रिय से सहसा यह सुनकर कि वे विदेश जा रहे हैं प्रियतमा सिहर उठी ,चेहरा म्लान हो उठा .उसकी यह स्थिति देख प्रिय ने ढाढस बंधाया , उसे बाहों में भर  बोल उठा -
" प्रिये धीरज रखो ,मैं जल्दी ही लौट आऊंगा ''
"प्रिये कहते हुए आपको तनिक भी लज्जा नहीं आती ,मुझे जब मधु ऋतु में यूं छोड़ के जा रहे हैं तो मुझे प्रिये नहीं दुष्टा या वन्या कहिये  !"


क्षोभ से भरी प्रियतमा बोल उठी ! .







उपर्युक्त  नायिका  प्रवत्स्यत्वल्लभा है ! मतलब प्रिय के आसन्न विदेश गमन के समाचार से दुखी नायिका !इस श्रेणी की नायिका में अनूढा ,स्वकीया और परकीया सभी सम्मिलित हैं!(पारिभाषिक शब्दावली याद हैं न ?) कठिन नामकरण है ना ? पर क्या करें जो है सो है -अब अगली नायिका की आतुरता से प्रतीक्षा करें !
चित्र सौजन्य : 

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