Sunday, 22 November 2009

एक शाम गिरिजेश ने की मेरे नाम!

अभी अभी तो गिरिजेश गए हैं ! थोड़ी रिक्तता तिर आई है ! सपरिवार आये थे किसी सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने ! ब्लॉगर स्नेह सौजन्य ऐसा कि मुझसे मिलने आ गये ! उनकी सदाशयता ,विनम्रता ने मेरी एक शाम को सुखानुभूतियों से भर दिया ! रहे तो वे महज एक घंटे मगर इसी में हमने मानो एक युग जी लिया ! वो कहते हैं न कि मिलन की दीर्घावधि की तुलना  में उसकी गहनता ज्यादे मायने रखती है ! हम खूब हँसे ,खिलखिलाए ,नाश्ता पानी किया ,थोड़ी ब्लागरी पर बतियाया ,एक फार्मल फोटो सेशन किया !




   आगे कौस्तुभ और अरिदम ,पीछे दायें से गिरिजेश राव  ,बिटिया अलका ,श्रीमती गिरिजेश राव ,संध्या मिश्रा और मैं  (फोटो की खराब क्वालिटी  के लिए खेद है )



मैंने दो कथा संग्रह उन्हें भेट किये -'एक और क्रौंच वध  ' और अभी सद्य प्रकाशित और लोकार्पित 'राहुल की मंगल यात्रा ' ख़ास तौर पर बच्चों,बिटिया अलका और बेटे अरिदम  को भेट किया !अब इतने सरल चित्त और विज्ञ पाठक मिलें तो  यह फायदा कौन उठाना नहीं चाहेगा ! कोई बमुश्किल एक घंटे गुजार कर वे अभी कुछ पल पहले ही सपरिवार लखनऊ कूच कर गए हैं -रोका पर रुके नहीं ! अभी अभी रास्ते से ही उनका फोन भी आ गया -बाऊ के पुनरागमन पर कतिपय  प्रिच्छायें कर रहे थे....पूरी तरह ब्लॉगर चरित्र पर उतर आये हैं बन्धु !

                             बेटे अरिदम के साथ एक पोज 

 अब उनसे यह मुलाकात सार्वजनिक की जाय या नहीं इसे लेकर भी कुछ असमंजस की स्थिति रही ....मगर ब्लॉगर क्या चाहे बस एक पोस्ट की जुगाड़ -के फलसफे पर मैं कायम था मगर पत्नी को गंवारा नहीं था हर पल ब्लागिंग को समर्पित करते रहना!  फिर मैंने कुछ तार्किक चिंतन मनन किया -ब्लागर की  स्वतंत्रता (के तर्क ) का पल्लू थामा ,यह भी कि आखिर घोडा घास से यारी करेगा तो खायेगा  क्या ? और यह भी सोचकर कि जिस तेजी से गिरिजेश एक ब्लॉगर सेलिब्रिटी होने को उद्यत हैं आज यह मुलाक़ात सार्वजनिक कर आप लोगों की गवाही भी ले ले -न जाने आगे वे कहीं  पहचानने से ही इनकार न  कर दें -प्रभुता पाई काह न मद होई


ब्लागरी वर्ल्ड ने सचमुच दुनिया को एक परिवार का रूप दे दिया है -जो काम रीयल जगत नहीं कर पाया अब यह रायल जगत कर रहा है -नए नए नेह सम्बन्ध बन रहे हैं ! एक नया उत्साह जीवन को नए अर्थ दे रहा है -हम तो बहुत आशान्वित हैं !  क्या आप भी ?

Saturday, 21 November 2009

नहीं भूलेगी वो कैटिल क्लास की मानवता !(यात्रा वृत्तांत -अंतिम भाग)

पुष्पक एक्सप्रेस से एक आशा तो थी ही कि काश यह मिथकीय पुष्पक विमान की तरह एक अतिरिक्त जगह भी दिला दे तो इसके नाम के अनुरूप काम भी हो जाय ! मगर डिब्बे मे घुसते ही थरूर क्लास की जनता की भेडिया धसान देख होश फाख्ता हो गए ! जाकिर को खुद अपनी आरक्षित बर्थ ढूंढें नहीं मिल रही थी -आखिर बर्थ नंबर १७ तक हम किसी तरह ठेल ठाल कर पहुंचे भी तो उस पर पूरा एक कुनबा विराजमान था ! पति पत्नी बंच्चे सभी पूरे अधिकार से वहां जमे थे! मुझे खुद आत्मग्लानि हो रही थी कि बिना वाजिब टिकट के मैं भी एक आक्रान्ता की तरह उसी डिब्बे में घुस आया था ! पता नही ऐसे मौकों पर मैं क्यूं अतिशय विनम्रता का शिकार हो जाता हूँ ! मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं  फूट पा रहे थे! हाँ ज़ाकिर का हड़काना जारी था -फलतः १७ तो नहीं हाँ सामने वाली बर्थ  पूरी खाली कर के दे दी गयी -हुकुम आप सब तो बैठो सामने ! मैं या तो खुद बैठ गया धम से या रिक्त बर्थ ने ही तेज गुरुत्व बल से मुझे बिठा लिया था ! वे  अच्छे विनम्र लोग थे! जौनपुरी ही थे ,मेरी ही तरह ! मुम्बई से शादी व्याह के चक्कर मे साले बहनोई अपने भरे  पूरे परिवार के साथ यात्रा कर रहे थे! उनकी भी समस्या यह थी कि उनके पास सीटें तो थी कुल चार मगर वे थे पॉँच अदद ,रेजगारिया अलग ! मतलब थरूर क्लास अपने चरित्र का पूरा निर्वहन कर रहा था !  मेरा स्कोप अब कमतर होता दीख  रहा था !

मैंने थोडा सांस संभलने पर डिब्बे के अन्तःपुर का सजग निरीक्षण किया ! विंडो बर्थ पर दाहिनी ओर एक भद्र मुस्लिम परिवार का पूरा कुनबा महज दो बर्थों पर समाया हुआ था - आठ सीटों के इस जन संकुल  स्पेस में कुल आठ बच्चे थे-पूरा वातावरण एक जबरदस्त ऊर्जा के प्रवाह ,किलकारियों से गुलजार हो रहा था ! बायीं ओर की  मोहतरमा इतनी बढियां ठेठ अवधी बोल रही थी कि मैं मंत्रमुग्ध  हुआ जा रहा था - कोई खाटी अग्रेज भी क्या इतनी धाराप्रवाह अंगरेजी बोलेगा ! रहा न गया तो मैंने भी ठेठ में पूंछ लिया कि आखिर यह नारी प्रतिभा कहाँ से बिलांग करती हैं -जवाब मिला गोंडा ! और प्रश्न के जवाब देने के एवज में उन्होंने अपने लगातार रोये जा रहे बच्चे को डांट कर चुप करते रहने का जिम्मा मुझे पकड़ा दिया ! किसी अजनबी पर इतना भरोसा या अधिकार ? सहसा मैं असहज होते हुए भी इस नए मिले काम को अंजाम देने में लग गया !

जाकिर तब तक कुछ और रोबदाब  दिखा कर ऊर्ध्वगामित यानि सबसे ऊपर के बर्थ पर लम्ब लेट चुके थे! और कमाल देखिये मैं इधर थरूर क्लास की मानवता की सेवा में जुटा/जुता खुद मानवीय होता रहा  - पूरे ६-7 साथ घंटे और जाकिर ऊपर सोते रहे -बाद में मासूमी से बोले थे कि वे बस पलक ही मूदे थे-भला चिल्ल पो में किसी को नीद भी आती है ! बहरहाल उनकी साफगोई किसी को भी कन्विंस नहीं कर पाई थी ! सब मन ही मन सोच बैठे थे कि चलो किसी एक ने तो अपना नीद का कोटा पूरा कर लिया है -सभी को रात में सोने की रणनीति तंग कर रही थी ,खास तौर पर मुझे !

इसी बीच टी टी भी आ कर जा चुका था -मुझसे उसने बिना वाजिब टिकट के यात्रा करने पर लगने वाली फाईन २५० रूपये और साधारण तथा स्लीपर क्लास के टिकट का डिफ़रेंस किराया कुल ४५० रूपये वसूल कर लिए थे -मगर कुछ अतिरिक्त शुल्क  में पूरी ट्रेन में किसी भी श्रेणी में बर्थ दिला पाने के मेरे प्रस्ताव को पूरी ईमानदारी से उसने ख़ारिज कर दिया था ! आखिर ईमानदारी दिखने का मौका बार बार थोड़े ही आता है ! जब ट्रेन पुष्पक हो और खचाखच भरी हो ,फिर तो ईमानदारी छलक ही पड़ती है ! बहरहाल मैं अब तक काफ़ी विनम्र हो चुका था और कोई जो भी कुछ कहता था फौरन ही मान  लेता था ! तभी जानकारी हुई कि ट्रेन तो भोपाल  से होकर जायेगी ! मुझे कई ब्लॉगर बन्धु याद आ गये ! एकबारगी तो घोर इच्छा हुई कि किसी/कुछ  को फोन कर स्टेशन पर ही बुला लूं मगर फिर लगा कि वे यहाँ ब्लॉग पर तो आते नहीं स्टेशन तक क्या आयेगें ! वैसे आज पाबला जी से कोई ब्लॉगर  बन्धु आकर मुरैना स्टेशन पर मिल लिए हैं ! अब अपना अपना नसीब है भाई! फिर मन  हुआ कंचन जी को फोन करुँ और भोपाल में ही इस विपदा से मुक्त हो लूं ! मगर फिर घर जल्दी पहुँच जाने का सहज बोध जोर मारने लगा ! हरिवंश राय  जी की कविता बदस्तूर याद हो आई.....बच्चे प्रत्याशा में होंगे ,नीड़ों से झाँक रहे होंगे -यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है ...दिन जल्दी जल्दी ढलता है ! ट्रेन तेज गति से भागती जा रही थी!

लगता है जाकिर ने रात्रि शयन की एक रणनीति पहले ही बना रखी थी ! मुझे पूरी बर्थ दे दी, खुद नीचे अख़बारों पर चद्दर बिछा और दोहर में मुंह छुपा अव्यक्त हो गए -और मुझे अपनी अव्यक्त कृतज्ञता की असहज अनुभूति के साथ रात बिताने की सौगात दे दी ! कहने को ही कैटिल क्लास है ,यहाँ तो मानवता के कूट कूट के दर्शन हुए ! सुबह लखनऊ समय से आ गये थे! फिर  उच्च दर्जे का बनारस तक का टिकट ३३४ रूपये मे लेकर अमृतसर हावड़ा मेल की ३ ऐ सी में जा विराजा ....मात्र ६१ रूपये का अंतर अदा किया और शाम तक वाराणसी पहुंचा तो खूब  उत्फुल्ल ,प्रफुल्लित था !

Friday, 20 November 2009

खंडिता है यह नायिका :(षोडश नायिका -७)

वह नायिका खण्डिता  हो रहती है  जब  अचानक यह प्रामाणिक तौर पर मालूम हो जाता है  कि उसके  प्रेमी /पति ने उससे बेवफाई कर किसी और से प्रणय सम्बन्ध स्थापित कर लिए हैं - उसकी घोर व्यथा ,संताप/प्राण  पीड़ा और तद्जनित आक्रोश  की मनोदशा उसे जो भाव भंगिमा प्रदान करती है वह साहित्यकारों की दृष्टि में खण्डिता नायिका की है!


 ऐसे नहीं घर में घुसने दूगीं ,पहले बताओ यह सब क्या करके आ  रहे हो ?
"रात बीत बीत गयी अपलक  प्रिय की प्रतीक्षा में ...वे नहीं आये और अब सुबह लौटे भी हैं तो यह क्या हालत  बना रखी है - होठो पर काजल और गालों पर किसी के होठों की लाली और माथे पर पैरों का आलता ? आँखें भी उनीदीं ! ओह समझ गयी मैं  ,अभी मैं इनकी गत बनाती हूँ ! " 


( नायक ने बीती रात अपनी दूसरी प्रेयसी के साथ गुजारी है ,प्रणय संसर्ग के चिह्न शेष सब गोपन उजागर कर दे रहे हैं -क्या क्या गुल नहीं  खिले हैं  ... दोनों जन में पारस्परिक प्रेम व्यापार  का खूब आदान प्रदान हुआ है -होठो पर काजल होने का अर्थ है  सौत की आँखों का चुम्बन ,गाल पर लिपस्टिक प्रत्युत्तर  है उस चुम्बन का ,हद है धोखेबाज  ने सौत के पैरों पर शायद उसकी मान मनौअल में सर भी रख दिया है ,तभी तो पैरों का आलता माथे पर तिलक सरीखा जा लगा है ! और फिर यह होने में रात यूं ही बीत गयीं -उनीदीं आँखों का यही सबब है. ) .

 जीवन शैली बदली मगर क्या जीवन भी ?
आखिर कैसे बर्दाश्त हो नायिका को साजन की यह सब ज्यादतियां -खण्डिता नायिका अब मानवती बन बैठती है ! उलाहना -भाव प्रबल हो उठता है -"तुम जाओ जाओ मोसे  न बोलो सौतन के संग रहो ....अब होत प्रात आये हो द्वारे यह दुःख कौन सहे ...या फिर... कहवाँ बिताई सारी रतिया ....साँच कहो मोसे बतिया ....पिया रे साच कहो मोसे बतिया ! (यादगार ठुमरियों  के अमर बोल हैं ये ) 

मानवती नायिका, नायिका का एक उपभेद है जिकी चर्चा हम आगे करेगें !

चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

Thursday, 19 November 2009

......आखिर कैसे छूटी ट्रेन और फिर शुरू हुआ 'कैटिल क्लास' का सफ़र ! (यात्रा वृत्तांत -२)

आखिर बनारस सुपर फास्ट ट्रेन छूट गयी ...और हम खड़े खड़े ,प्लेटफार्म पर जड़े जड़े गुजर गयी ट्रेन का हिसाब जोड़ते रहे ! मुझे जो समय ट्रेन के छूटने  का मालूम था ,वह था ११.४० और ट्रेन ठीक दो घंटे पहले बिलकुल सुई की नोक के ९.४० पर पहुँचते ही छूट चुकी थी ! आखिर यह गफलत हुई कैसे ? बहुत सी स्थितियां जिम्मेदार रहीं इसकी ! बल्कि सारी परिस्थितियाँ ट्रेन के छूट जाने की ही ओर अग्रसर होती रहीं और मैं उनसे बेखबर सम्मलेन और अन्य बातों की ओर बकलोल सा ध्यान केन्द्रित किये रहा !  एक वार्षिक त्रासदी या जश्न  के रूप में रेल विभाग द्वारा इस बिना पर कि ट्रेन के समय बदले जा रहे हैं  सम्बन्धित  स्टेशन से ट्रेन का प्रस्थान का समय टिकट पर न लिखा होना ,मेरे द्वारा स्वयं ट्रेन का  प्रस्थान का समय फिर से चैक न किया जाना ,औरों के इन्फार्मेशन पर ही निर्भर रह जाना-ये सब घातक कारण एकजुट हो लिए  थे    ! (नसीहत -३,खासकर नवम्बर माह में  यात्रा से जुडी ट्रेनों का निर्धारित स्टेशन पर आगमन और प्रस्थान  यात्रा आरंभ के ठीक पहले खुद अवश्य  चैक कर लें ! जाकिर ने तो नेट से अपनी ट्रेंन पुष्पक के टाईम टेबल का पूरा चार्ट ही प्रिंट आउट कर रखा था ) .पता नहीं अभी भी टाईम टेबल छपा कर आया या नहीं ! शायद ज्ञानदत्त जी प्रामाणिक जानकारी दे सकें !

 मेरी वापसी की यात्रा तो उसी दिन ही शंकाओं के घेरे में आ गयी थी जब लोकमान्य तिलक टर्मिनस -वाराणसी एक्सप्रेस २१६५ में आरक्षण के समय ही यानि २० अक्टोबर ०९ को  २ ऐ सी में वेटिंग १ की  असहज स्थिति उत्पन्न हुए  थी . लोग बार बार आश्वस्त   करते रहे कि अरे एक ही तो वेटिंग है , शर्तिया कन्फर्म हो जायेगा -मगर मुझे पहले का  एक और दृष्टांत याद आ  जाता रहा जब शिमला यात्रा के समय ऐसी ही स्थति में ज्ञानदत्त जी के आश्वासन के बावजूद भी यात्रा के एक दिन पहले ही मैंने टिकट निरस्त करा कर दूसरी कम महत्वपूर्ण ट्रेन में आरक्षण करा लिया था  ! मगर इस बार कई व्यस्तताओं और अन्य किसी ट्रेन के उपलब्ध न होने के कारण (हाय रे मुम्बई- बनारस रूट !) मैं हाथ ही मलता रह गया और वापसी का दिन भी अ पहुंचा  ! जब यात्रा का केवल एक दिन ही रह गया तो मेरा धैर्य जवाब देने लगा -उधर कांफ्रेंस अपने उरूज पर थी और इधर  मेरा मन आरक्षण की अनिश्चिता से उद्विग्न था !

उधर जाकिर को भी लौटने का आरक्षण पुष्पक में, ऐ सी में नहीं मिल  सका था मगर  उन्होंने न जाने कहाँ कहाँ से फोन वोन  कर स्लीपर में एक बर्थ का जुगाड़ कर ही लिया ! और मुझे आमंत्रित किया कि अगर आपका टिकट कन्फर्म नहीं होता तो आप भी एक ई टिकट लेकर मेरे साथ ही लखनऊ चले और वहां से वाराणसी चले जाईयेगा ! कोई विकल्प भी नहीं सूझ रहा था ,मेरा ऐ सी टू का वेटिंग अभी भी बरकरार था ,मानो मेरा मुंह चिढा रहा हो !  हजार किलोमीटर से भी दूर का सफर बिना आरक्षण कैसे संभव होगा ,सोच सोच कर दिल बैठा जा रहा था ! ज़ाकिर के सुझाव में दम दिखा और मैंने  उनके ट्रेन यात्रा ज्ञान पर मुग्ध होते हुए बगल के साईबर कैफे से  स्लीपर का का एक ई टिकट हथिया ही तो लिया ! वेटिंग १९७ ! जाकिर बोले फिकर नाट मेरे ही बर्थ पर डबलिया लीजियेगा ! टिकट तो रहेगा ही ! बहरहाल ,ई टिकट लेने के बाद कुछ राहत तो हुई ! मगर सबसे बड़ी राहत तब मिली जब अगले ही घंटे मोबाईल से सूचना मिल गयी कि पहले का वेटिंग लिस्ट आखिरकार कन्फर्म हो गया और १७ अंम्बर सीट भी अलाट हो गयी ! हो सकता है  यह मेरे मित्र और कभी रेलवे विजिलेंस में रहे देवमणि को sos भेजने का असर रहा हो !

अब मन फिर एक बार गंगा यमुना तीर हो गया था ! स्थानीय चीजों में सहसा ही फिर से एक नवीन रूचि उत्पन्न हो  गयी थी -वगैरा वगैरा ! अरे हाँ याद आया वह ई टिकट तो वापस कर देना था अब कुछ पैसे ही जु(ग )ड़  जायेगें !  ! हाँ हाँ क्यों नहीं जाकिर  ने भी हामी भरी  ! शातिर साईबर कैफे वाले ने चुपचाप  टिकट लिया ,की बोर्ड पर कुछ टिपियाया और कहा इसे जरा पढ़िए तो !वहां प्रदर्शित सूचना   में साफ़ साफ लिखा था कि चूंकि अब चार्ट तैयार हो गया है अतः रिफंड नहीं हो सकता ! जाकिर उग्र हुए ,मैंने रोका और कहा कि जाकिर यह ऐसा ही है -अब कुछ  नहीं हो सकता ! ४३० रूपये डूब चुके थे! साईबर कैफे वाले को सब पता था ,उसने चीट किया था !( नसीहत-४ ,ई टिकट को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतें और चार्ट तैयार होने के काफी समय पहले ही  अगर ऐसी स्थिति आये तो निरस्त करा लें  !नहीं तो जैसे मेरे डूबे आपके भी डूबेंगें-रेल विभाग इन्ही हराम की कमायियों से धन्ना सेठ बना बैठा है !  )

बहरहाल यह तो एक दिन पहले का चूना लगने का वृत्तांत रहा ! हाय कन्फर्म ऐ सी आरक्षण होने और वहीं  स्टेशन तक समय से पहुँच जाने के बावजूद भी मेरी ट्रेन आखिर छूट गयी ! अब क्या किया जाय !अगले तीस मिनट में पुष्पक यानि जाकिर की ट्रेन भी आने वाली थी और अब बस वही डूबने  वाले का  एकमात्र तिनका  सहारा  थी -मगर टिकट ? हम स्ट्राली वाली खींचते खांचते स्टेशन के बाहर भागे -एक लाईन में मैं जा चुकी ट्रेन का टिकट रद्द कराने और दूसरी में ज़ाकिर मनमाड से चारबाग लखनऊ का चालू टिकट लेने लग ही तो लिए ! मुझे विंडो  बाबू ने कुल ७२८ रूपये काट के थमाए रूपये ७२७ और मैंने यंत्रवत  नए टिकट के लिए उसी  में से ज़ाकिर को थमाए ३३४ रूपये ! अभी भी ओवर ब्रिजों को क्रास कर आने  से सांसे धौकनी की तरह चल  ही रही थीं और फिर पुष्पक भी न छूट जाये इसलिए हमने फिर एक दौड़ लगाई और गिरते पड़ते आखिर ट्रेन के आगमन तक प्लेटफार्म पर जा ही पहुंचे ! इस बार कोई चूक नहीं होनी थी -अभी अभी तो दूध के जले थे हम !

धडधडाती हुई पुष्पक आ गयी और हम बकौल शशि थरूर के कैटिल क्लास में लद लिए ! मरता क्या न करता ......
जारी .......

इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं -आज की नायिका है विरहोत्कंठिता

चलिए आपके इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं ! मगर  नायिका तो आज की विरहोत्कंठिता ही है !प्रिय के पूर्व तयशुदा समय पर न आने और चिर प्रतीक्षित आगमन के विलंबित  होते जाने पर व्यग्रता और दुश्चिंताओं  से ग्रसित और व्यथित नायिका ही कहलाती है -विरहोत्कंठिता!


विरहोत्कंठिता...कल की !

नायक के आगमन का पूर्व निश्चित  समय बीत चुका है ,समय आगे खिसक रहा है पल प्रतिपल -क्या हुआ कंत को ? व्यग्र नायिका को  अनेक शंकाएं त्रस्त  कर रही हैं ! भगवान् न करे ,कहीं उनके साथ कुछ हो तो नहीं गया  ?उसके केश वेणी के फूल मुरझाने से लगे हैं ,कांतिहीन हो चले हैं -वह घबराई सी प्रिय मिलन की संभावित  उत्फुल्ल , कामोद्दीपक क्रीडा कलोलो की  रोमांचित  कर  देने वाली कल्पनाओं को भी सहसा भूल सी गयी  है !  पल पल उस पर भारी पड़ रहा है ! बिलकुल यही तो है  विरहोत्कंठिता !

विरहोत्कंठिता ..आज की ...


मगर भाव तो चिरन्तन है !
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल                                      

Wednesday, 18 November 2009

रेल यात्रियों के लिए एक आपबीती बनाम कैटिल क्लास के संस्मरण !

या तो हनुमान की तरह मगर लौटा पूरा  अंगद बनकर  ! मगर जाते वक्त "जिय संशय कुछ फिरती बारा"  जैसी  कोई आशंका न थी ! बात ११ वें राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मलेन की है जिसमे शरीक होने को हम बड़े उत्साह से चल पड़े थे औरंगाबाद, पिछले 12 तारीख को . अभी कल ही लौटें हैं !कितनी कुछ ब्लॉग गंगा बह चुकी है यहाँ ! आते ही साथ गए जाकिर   ने एक तुरंता  रिपोर्ट भी ठोंक  ही दी है ! जो विज्ञान/वैज्ञानिक में  सूक्ष्मता के  प्रेमी हैं -अनूप शुकुल जी या विवेक जी मानिंद ,वहां झांक सकते हैं ! मगर अपुन तो यहाँ आर्डिनरी एक्स्ट्रा आर्डिनरी  लोग लुगायियों  से यानि आप से मुखातिब हैं ! और बयां करना चाहते हैं अपना दुःख दर्द वापसी यात्रा का ! मगर प्लीज हँस कर मेरे जले पर नमक  मत छिडकियेगा -वादा करिए तभी आगे बढूंगा !अपनी गलतियों के बजाय पानी पी पीकर रेल विभाग को कोसा हैं मैंने इस बार ! वैसे रेल के पिछले भी कुछ अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं !  बख्शता रहा हूँ हर बार, मगर इस बार नहीं क्योंकि तब मैं ब्लागिरी के धर्म से च्युत हो जाऊँगा ! ज्यों नहिं दंड करूऊँ खल तोरा भ्रष्ट होई श्रुति मारग मोरा ! अब आप देख लीजिये कि कितना गुस्सा  अभी भी है मन  में ....हाँ हाँ खिसियानी बिल्ली /बिल्ले जैसा ही !

बहरहाल किस्सा कोताह यह कि प्रस्थान  की दो चरणी रेल यात्रा तो ठीक ठाक रही ,बनारस से मनमाड और मनमाड से औरंगाबाद -मगर वापसी की ,अजी कुछ न पूछिए  -अभी भी रह रह कर हूंक उठ जा रही है  ! पहली बार बिना नए टाईम टेबल के साथ में रखे  यात्रा की -नामुरादों ने अभी तक भी नया टाइम टेबल जारी नहीं  किया है ! हद है रेल विभाग की निष्क्रियता  की ! वापसी की ट्रेन मुम्बई बनारस सुपर फास्ट 2165 में पिछले एक माह बुकिंग  करने के वक्त से ही वेटिंग   १  पर सूई अटक  गयी थी ! जाकर यात्रा की पूर्व संध्या को ही कन्फर्म हुआ . किसी के धैर्य की परीक्षा लेना तो कोई रेल विभाग से सीखे ! कमजोर दिल वाले कभी भी रेल के वेटिंग  लिस्ट वाले टिकट न लें !  ...


 वापसी में ६ बजे औरंगाबाद से जनशताब्दी पकडनी थी ! सो हम ५.३० पर स्टेशन पहुँच  चुके थे ! अभी रात ही थी ! पिछले ज्ञात एक साल के इतिहास में  जनशताब्दी पहली बार लेट हो गयी ! मराठी में जो उद्घोषणा हुई -उसके अनुसार तकनीकी खराबी  के चलते ट्रेन को लेट कर जाना था ! मतलब इस बार वह खड़े होकर नहीं जाने वाली थी ! हम लोग लेट कर जाने  वाली ट्रेन में खुद कैसे लेटेगें या बैठेगें यह  रणनीति बनाने लगे - जाकिर ने हंसी मजाक में मेरे लिए कुछ मुद्राएँ भी समझाईं ! खैर एक घंटे विलम्ब से ट्रेन एक के बजाय नंबर दो प्लेटफार्म पर आने को  उद्घोषित हुई ! सहयात्रियों ने बताया कि जनशताब्दी का २ पर आना भी एक अनहोनी है ! अब तक मुझे हिन्दी की वह कहावत याद आने लगी थी -जहाँ जाईं घग्घोरानी ऊहा बरसे पत्थर पानी ! मगर इस बार तो मिसेज साथ न थीं तो फिर मैं घग्घोरानी का चरित्र आरोपण किस पर करुँ ? दिमाग चकराया ! ट्रेन चल दी आखिरकार ! दो घंटे में ,९ बजे मनमाड पहुँच गयी ! प्लेटफार्म नंबर ५ पर . बरसात ने स्वागत क्या  किया -पूरी फजीहत कर डाली ! नसीहत नंबर एक -अंतर्राज्यीय यात्राओं में छाता अवश्य रखें !

मेरे और जाकिर के पास छाता नहीं था ! हाँ मेरे पास पालीथीन थे -हमने सर ढंका और आगे बढे  भीगते हुए ! हमारी अलग अलग ट्रेने थीं -मगर बनारस   सुपर फास्ट और पुष्पक दो नंबर  पर ही आने को घोषित थीं ! ज्ञात जानकारी के अनुसार दोपहर 12 बजे के आस पास थीं दोनों ट्रेने ! जाकिर ने कहा कि अभी क्या करेगें २ पर जाकर ! मैंने उन्हें कहा कि यही बैठ कर ही क्या उखाड़ लेगे !  मैंने देखा है कि जाकिर में  अभी ही इस कम उम्र में भी एक ठहराव है -एक खरामा खरमापन है ! मगर उम्र के इस पावदान में भी मुझमें एक व्यग्रता सी है -अब आगत से अनभिग्य जाकिर के कहने पर हम वहीं ५ पर रूक कर बिन मौसम की बरसात में रूचि  लेने में लग गए !

मेरे टिकट या किसी  के भी टिकट पर ट्रेन का प्रस्थान समय नहीं दर्ज था -वही ट्रेनों के रूटीन वार्षिक समय बदलाव का बहाना!और हद यह कि अभी तक भी नया रेल टाईम टेबल उपलब्ध नहीं हो पाया है -मैंने किस किस स्टेशन पर नहीं पूछा  !  घर से जो समय बेटे ने दर्ज किया था उसके मुताबिक़ मेरी ट्रेन ११. ४० पर आने वाली थी ! प्लेटफार्म नंबर पॉँच पर दस बज गए तो मेरी व्यग्रता ने फिर उछाल मारी ! "चलो जाकिर वहीं २ पर ही चलते हैं ! " मगर जाकिर तो उसी ठहराव मोड में ! "क्या करेगें अभी जाकर " वे बोले .आखिर  मैं हठात खीच ही लाया उन्हें ! मगर तब तक जो  होना था हो चुका था   ! नसीहत नंबर दो -स्टेशन पर जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन हो वहीं पर सीधे जायं,अधर उधर न रुकें  ! बहरहाल २ नंबर पर आकर भी अभी ट्रेन के यथा ज्ञात समय से हम काफी पहले जम गए वहां ! मगर काफी देर तक  बनारस सुपर फास्ट का कोई अनाउन्समेंट नहीं ! अब छठीं हिस सक्रिय हुई ! जाकिर को कहा  जाकर पता करो भाई कि कहाँ अटक गयी  ट्रेन ! थोड़ी देर बाद ज़ाकिर लौटे तो व्यग्रता की प्रतिमूर्ति बने हुए थे  -चेहरा देख कर ही मैं किसी आशंका से काँप उठा  ! और यह सुनते ही की ट्रेन तो ९.४० पर ही जा चुकी ,यानि उस वक्त जब हम बगल के ही प्लेटफार्म पर वर्षा ऋतु  का आनंद  उठा रहे थे....सुनकर तो दिल की जैसे कुछ धडकने ही रुक सी गयीं ! अब क्या होगा ?
......जारी ...

Sunday, 15 November 2009

विज्ञान कथा कांफ्रेंस चालू आहे !

यहाँ औरंगाबाद में ग्यारहवां राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मलेन चल रहा है जिसमें कई क्षेत्रीय भाषाओं के लोगों का जमघट है -मराठी मानुषों का पूरा जमावाडा है -दक्षिण भारत से भी काफी प्रतिभागी आये हुए हैं . हिन्दी से जाकिर अली रजनीश के साथ हम कुल चार जने हैं जो हिन्दी का भी झंडा बुलंद किये हुए हैं अन्यथा यहाँ हिन्दी की कोई पूंछ नहीं है -मराठी का साईंस फिक्शन साहित्य कहीं हिन्दी से भी ज्यादा समृद्ध है !

यहाँ बेड टी वगैरह समय से मिल रही है -खाने में दक्षिण भारत के खाने की प्रधानता है -हाँ मीनू बहुत सुरुचिपूर्ण अभिरुचि वाले व्यक्ति द्बारा फाईनल किया जा रहा है-पूडी के साथ रोटी भी मिल रही है और सूप भी सर्व हो रहा है -लंच और डिनर दोनों समय ,आज मांचो सूप सर्व हुआ -
ज्यादा डिटेल और तकनीकी परसों बनारस लौट कर !

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    1 year ago

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