गिरिजेश की एक भाव-मुद्रा
बौद्धिक प्रतिभाशीलता का ही नाम है
गिरिजेश राव -हाँ लम्बे समय से एक चुनिन्दा ब्लॉगर की तलाश में भटकता चिट्ठाकार चर्चा का यह यह ताजा अंक आपके सामने हैं -और यहाँ पेश हैं गिरिजेश राव !
एक आलसी का चिटठा और गाहे बगाहे लिखने के लिए
कविता पर एक ब्लॉग लिखने वाले गिरिजेश (मेरा उनके लिए यही स्नेहिल संबोधन है ) से मेरा परिचय कोई ज्यादा पुराना नहीं हैं -बस यही कुछ माहो से हम परिचित है मगर प्रयाग के संत समागम के बाद परिचय की प्रगाढ़ता और मिलन की गहनता सहसा काफी बढ़ गयी है!और यह अकारण नहीं है !
सबसे पहले मुझे गिरिजेश के बारे में सिद्धार्थ जी (प्रयाग में धनुष यज्ञ जेहिं कारण होई वाले अपने
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी - हमारे एक
पूर्व चयनित चुनिन्दा चिट्ठाकार ) ने बताया था ! सिद्धार्थ जी और गिरिजेश दोनों ही गुरुभाई हैं और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की
कथित धुर गोबर पट्टी के गुदडी के लाल हैं; न जाने ऐसे लाल गोपालों के वजूद के बावजूद किसी गोबर पट्टी की इन्गिति भी कैसे की जा सकती है ? गिरिजेश के ब्लॉग का नाम प्रथम दृष्टया ही नहीं पुनः पुनः दृष्टया भी अजीब ही लगा था -यह कौन सा उद्धत सांसारिक जीव है जो अपने आलस्य को ही प्रोमोट करना चाहता है ! मगर वह होगा तो कोई विशिष्ट ही जो कबीर की भाषा में यहाँ उलट्बानी उद्घोषित कर रहा है ,डंके की चोट पर ! सो देखना चाहिए .और मैंने देखा तो विमोहित होता गया !कंटेंट से !
गिरिजेश के ये दोनों ब्लॉग लोकमान्यता की दक्षिण की दिशा के समान हैं -और एतदर्थ प्रगटतः गमन निषेधित ! जी हाँ मत जयियो दक्खिन बबुआ की बुजुर्गी सीख की याद दिलाती हुई - उधर गए तो फंसे ! जैसे मैं फंसा तो आपको यह सात्विक हिदायत भी कि आप गए तो फिर आप भी फन्सेगें ,अगर अब तक कहीं फंस न गएँ हो तो -फिर मोहपाश (मोहन वशीकरण सब) से छूट नहीं पायेगें ! ये दोनों ब्लॉग भावनाओं की गहन गहनता समेटे हुए हैं -अभी अभी बाऊ चरितावली सम्पन्न हुई है जिसने भाषा शिल्प के मामले में लोगों को फणीस्वर नाथ रेणु की याद दिला दिया !
गिरिजेश मूलतः कवि ह्रदय हैं -उनका गद्य भी ह्रदय से ही निःसृत है ! मतलब मस्तिष्क के उस हिस्से से उद्भूत है जो दिल का डिपार्टमेंट संभालता है ! मैंने उन्हें बौद्धिक प्रतिभाशील कहा है क्योंकि केवल बौद्धिक या प्रतिभाशील कहकर उन्हें मैं आंक नहीं पा रहा था ! इलाहाबाद और कानपुर वालों ने बौद्धिकता को अब अपने तक ही सीमित कर लिया है ,हथिया लिया है- कुछ कुछ अविजित लंका की कैद सरीखा और जहां तक प्रतिभा की बात है तो उस पर तो देश के आई. ए . एस न जाने कब से काबिज हो चुके हैं ! अब मेरा ब्लॉग नायक भला इन एकल और उच्छिष्ट पहचानों का मुहताज क्यों बने ! मनुष्य के ये दोनों ट्रेट -बौद्धिकता और प्रतिभा ,अलग अलग ज्यादा दीखते हैं -मगर गिरिजेश में इन दोनों लक्षणों का समग्र परिपाक हुआ है ! वे बौद्धिक हैं मगर दयामागूं - दीन , शोचनीय विह्वलता से दूर हैं -आत्म मुग्धता से भी दूर हैं -प्रतिभाशाली बौद्धिक हैं ! सहज है सरल हैं -ठठा कर ऐसा हंसते हैं जो एक निर्मल ह्रदय वाले के ही वश का है ! नहीं तो आज के युग में हंसी ?
इलाहाबाद में हमने बहुत गुल गपाड़े किये - मौज मस्ती वालों की बातें तो बस कहने भर की हैं ! दरअसल मुझ उद्धत उन्मत्त के साथ गिरिजेश सरीखा भी कोई हो जाय तो दूसरों का पत्ता साफै समझिये -सारी दुनिया के लिए हम तत्क्षण पागल करार हो सकते हैं ! अब जाकी रही भावना जैसी ...लोग गलत कहते हैं सभी डिजिटल रिश्ते धोखे होते है -गिरिजेश जीवंत उदाहरण हैं - कल्पित से भी ज्यादा उदात्त और मानवीय ! उन्होंने गहरी संवेदना से मुझे बड़ा भाई कहा -और मैंने इस रिश्ते को यद्यपि यह उत्तरदायित्व भरा है स्वीकार भी कर लिया है ! मस्त रहो अनुज ! हुडदंग जारी रहे.....
इलाहाबाद की संगोष्ठी में ब्लॉग बनाम साहित्य के मुद्दे पर गिरिजेश को सुनना एक अनुभव था ! कई वक्ताओं द्बारा उछाले गए कुछ जुमलो पर भी इनकी कटाक्ष ब्लॉग पोस्ट पढने लायक है ! गिरिजेश आलस का परित्याग पर चुके हैं -यह उनका स्थायी भाव बान जाय -यही शुभेक्षा है !
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