रविवार, 16 जून 2013

भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं!

पितृ दिवस पर एक मित्र ने कुछ चुटीला सुनाया ...पत्नी ने अतिरिक्त प्यार का इज़हार करते हुए पति से पूछा कि अजी ये सत्य और विश्वास में क्या फर्क है? पति विद्वान था इस फर्क को समझता था मगर उसके सामने चुनौती थी कि वह किन शब्दों में और कैसे पत्नी को यह फर्क समझाए कि उसे आसानी से समझ में आ जाय . सहसा उसके चेहरे पर एक कूट मुस्कान तैर गयी ..उसने जवाब दिया -
"सुमुखि, अब ये सोनू और मोनू तुम्हारे बच्चे हैं यह तो सत्य है मगर ये मेरे बच्चे हैं यह मुझे यह विश्वास है" :-)
 
पितृत्व को लेकर इतिहास में कितने ही विवाद दर्ज हैं.यद्यपि मातृत्व से भी जुड़े मसले हुए हैं मगर उनका निपटारा आसान रहा है . राजा ने बच्चे की दावेदारी को झगड़ रही  माताओं के लिए फैसला सुनाया कि बच्चे के दो टुकड़े करके आधा आधा हिस्सा दोनों को दे दिया जाय ...वास्तविक माँ चीत्कार कर उठी "मुझे नहीं चाहिए बच्चा ,इसे ही दे दिया जाय " ..और राजा ने इसी माँ को बच्चा सौंप दिया . हो गया फैसला और बिल्कुल सही भी! मगर पितृत्व के दावे बड़े जटिल होते रहे . जिनका शर्तिया निपटारा डी एन ऐ फिंगर प्रिंटिंग टेकनिक की मानो बाट जोह रहा था .पिछले शताब्दी के आख़िरी दशक में यह तकनीक लोकप्रिय होनी शुरू हुई और अब तो पूरी दुनिया में पितृत्व /मातृत्व के निपटारे के लिए यही सबसे विश्वसनीय तकनीक है जिसे ज्यादातर देशों में कानूनी मान्यता भी प्राप्त है . अपने यहाँ भी कई मामले इसी तकनीक ने सुलझाये हैं तंदूर से तिवारी काण्ड तक!

अपने देश के पितृ-सत्तात्मक समाज में पिता की महिमा तो जग जाहिर है . यहाँ जीवन के बाद के जीवन में भी पिता का महात्म्य बरकरार है .एक पूरा आधा महीना ही पितृ-पक्ष कहलाता है और एक ख़ास दिन पितृ विसर्जन . मातृ पक्ष की कोई व्यवस्था नहीं है -एक दिन भी नहीं! भला हो पश्चिमी जगत का कि अब पितृ और मातृ दिवस दोनों का वजूद है . मजे की बात यह है कि पितृ विसर्जन दिवस तो है मगर हमारे यहाँ पिता अपने जीवन काल में प्रत्येक दिन पूज्यनीय और प्रातः स्मरणीय हैं किसी एक दिन नहीं -हाँ उनके दिवंगत होने के बाद भी वंशज उन्हें साल में कभी तो याद करलें इसलिए पितृ-पक्ष की व्यवस्था की गई .पश्चिमी दुनिया में तो पिता जीते जी ही परित्यक्त और बिसरा उठते हैं इसलिए कम से कम एक दिन तो उनकी याद सम्मान का हो इसलिए ही यह फादर्स डे का विचार वजूद में आया -मगर जब हम इसका हिन्दी तर्जुमा करके पितृ-दिवस कहते हैं तो मुझे तो पितृ विसर्जन का बोध हो उठता है .

यह संस्कृति का फर्क है . यहाँ पिता रोज पूज्य हैं वहां दैनंदिन उपेक्षित पिता के लिए बस एक दिन मुक़र्रर है! मगर अब हम भी पश्चिम के अन्धानुकरण में तेजी से लगे हैं -अपने मूल्य हमें पिछड़ेपन के द्योतक लगते हैं और फादर्स डे जैसे विचार आधुनिकता के .....हम तेजी से अपने जड़ों से कट रहे हैं -नयी पीढी फेसबुक पर जोरशोर से फादर्स डे मना रही है . काफी भावुक है .....मैंने उन्हें यह कहकर समझाया भी कि ....अरे अरे ....मित्रों इतना भाव विह्वल भी मत हो जाईये ..भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं —

मंगलवार, 11 जून 2013

भारतीय समाज की विवशताएँ!


पहले तो मैंने इस पोस्ट  के लिए भारतीय समाज की विडंबनाएं शीर्षक चुना था .मगर विचारों के प्रवाह में सहसा सूझा कि जिन्हें मैं विडंबनाएं समझ रहा हूँ दरअसल वे हमारी विवशतायें हैं . हम तमाम अंधविश्वासों में मुब्तिला हैं . आज भी किसी को 'छोटी माता' ( चिकन पाक्स ) के निकलने पर मनौती मानी जाती है, कुछ " अंगऊ" (दैवीय सत्ता को समर्पित करने के लिए अग्रिम के रूप में नगदी सोना या कोई भी सम्पदा को सहेजना ) निकालते  हैं और शीतला माई के मंदिर तक भागे जाते हैं . बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा नहीं देते .चाहे वह अभिव्यक्ति की हो या शिक्षा की या  निर्णय की स्वतंत्रता ...हम झूठी मान मर्यादा के लिए आनर किलिंग जैसे नृशंस कृत्य तक उतर आते हैं . ऐसे अनेक मौजूदा परिदृश्य हैं जो  आज की इस तार्किक दुनिया में क्या किसी विडम्बना से कम है? मगर हम इस परिदृश्य के मूल कारणों की अगर पड़ताल करें तो भारतीय समाज की विवशताएँ उजागर होती हैं और मन पीड़ा से भर उठता है. 
हमें कई समस्याओं के उदगम को समझने के लिए अपने अतीत में जाना होगा?आखिर गलती  कहाँ हुई और हम कहाँ सांस्कृतिक लिहाज से एक सभ्य समाज नहीं बन पाए . पहले तो वर्ण व्यवस्था जो स्वभावगत कर्म के आधार पर लोगों के कार्य विभाजन को मान्यता देती थी कालांतर में जन्म आधारित जाति को जन्म दे गई
समाज की कथित "ऊंच " और "नींच" जातियों का वजूद स्थापित होता गया . .आज भी यह कितना हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कितने ही ब्राह्मण आज भी जनेऊ और चुटिया को ही ब्राह्मणत्व का प्रमाण मानते हैं . आज इस  दुर्भाग्यपूर्ण और अवैज्ञानिक सामाजिक संरचना को अब तो राजनीतिक संबल मिल गया है .एक पार्टी जो ब्राह्मणों को जूते मारने के उद्घोष से सत्ता में आयी थी अब उसी सत्ता को संभालने के लिए ब्राह्मणों का चरण चुम्बन कर रही है . मतलब अब जाति व्यवस्था और भी स्थापित हो गयी . इस जातिगत व्यवस्था को तोड़ पाना आज की एक बड़ी चुनौती और विवशता है . कभी समाजिक मार्गदर्शकों ने इस जातिगत व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए "ऊंच " और "नींच" जातियों के बीच 'रोटी और बेटी " के सम्बन्ध का आह्वान किया गया था . मगर आज यह आह्वान अपना दम ख़म खो चुका हैं। 
अब इससे कौन इन्कार करेगा कि तमाम विकासोन्मुख योजनाओं के बावजूद भारत में भयंकर गरीबी हैं ,अशिक्षा है और स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है . और इसके साथ /बावजूद भी मान मर्यादा और 'इज्जत' के  मूर्खतापूर्ण विचार हैं . लडकी घर की 'इज्जत' है अगर उसके साथ कुछ हुआ तो एक गरीब विपन्नता के बोझ  से जो पहले से ही कराह रहा है 'इज्जत' गवाने का एक अतिरिक्त बोझ भला कैसे उठा सकता है ? लिहाजा वह बेटी/बेटियों की स्वतंत्रता का बचपन से ही गला घोटने लगता है . 
न जाने इस दहेज़ व्यवस्था का  उद्भव कब से हुआ मगर इस आर्थिक संघात ने भी बेटियों की स्थिति को कमजोर बनाया है . एक वह देश जो नारियों का दर्जा देवी देवताओं के बराबर देता था आज नारी को  समाज के निचले पांवदान पर उतार चुका  है। आज 'इज्जत' और दहेज़ का भय एक बड़ी विवशता बन चुका है. हद तो यह है कि किसी दूसरी जाति के साथ प्रेम या विवाह भी जातिगत कथित सम्मान पर भारी पड़ता है .आज भी शादी -व्याह को जातिगत बंधन से मुक्त नहीं किया जा सका है -जबकि विभिन्न जातियों में अंतर्विवाह से वंश की सबलता के प्रामाणिक 'जीनिक ' कारण मौजूद हैं . 
यौन कुंठाओं की तो पूछिए मत .आज बच्चों और युवाओं से बढ़कर प्रौढ़ों को यौन शिक्षा की जरुरत है -यह भी एक भयमूलक कारण है जो लड़कियों को लड़कों सदृश स्वच्छन्दता देने से रोकती है . बड़े -बूढों द्वारा सेक्स के प्रति बनाए गए सामाजिक परिवेश में लड़के और लडकियां दोनों ही यौन -कुंठित हो तमाम यौन अपराधो में संलिप्त हो उठते हैं . मेरा मानना है एक वर्जनाहीन समाज में यौन अपराध कम होंगें! चिकित्सा सुविधाओं /शिक्षा का घोर अभाव और निर्धनता आज भी लोगों को बीमारियों के इलाज के लिए ओझा -सोखा और देवी माता के पास ले जाने को विवश करता है . अब ये सारे परिदृश्य हमारे भारतीय समाज की विडंबनाएं हैं या विवशताएँ इसका निर्णय आप ही करें! लगता है भारतीय समाज का पुनर्निर्माण अब असंभव हो चला है !


रविवार, 2 जून 2013

जीवन की गुणवत्ता

मनुष्य कैसा जीवन जी रहा है और उसे कैसा जीवन जीना चाहिए इस प्रश्न का जवाब धर्म और दार्शनिकता के नज़रिए से दिया जाता रहा है . और भी कई नज़रिए हो सकते हैं . धर्म की बात करें तो जीवन के चार मूल लक्ष्यों/ पुरुषार्थ की कसौटी पर मानव जीवन की सफलता असफलता आंकी जाती रही है -ये हैं धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष . इनका उचित अर्जन ही मनुष्य के जीवन की सफलता मानी गयी है . इनमें भी मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है मगर राहत की बात है की मोक्ष की धारणा काल्पनिक ही है . चार्वाक ने कहा कि मृत्यु ही मोक्ष है -और इस अवधारणा की समझ को सरल कर दिया . महात्मा बुद्ध की माने तो मानव जीवन के मूल में दुःख ही दुःख है और मनुष्य के जीवन का बड़ा अभीष्ट सुख की प्राप्ति है .जब जीवन दुःख भरा है तो निश्चित ही मृत्यु मोक्ष से कम नहीं . कवी ने भी कहा है निर्भय स्वागत करो मृत्यु का यह है एक विश्राम स्थल .यहाँ कवि जीवन की आपाधपी और कष्ट की अनुभूति को ही उजागर कर रहा है .
यह युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा सजाया संवारा जा रहा है . आज प्रौद्योगिकी ने मनुष्य की सुख सुविधा के कितने ही इंतजाम किये हैं . आज अल्प काल मृत्यु के मामले बहुत घट गए हैं मनुष्य की सामान्य आयु बढी है . कई रोग बढे हैं तो कई लाईलाज रहे रोगों पर नियंत्रण भी कर लिया गया है ,बड़ी माता और तावन जैसी बीमारियाँ छू मंतर होगई हैं . प्रसव मृत्यु दर काफी कम हुयी है . यात्राएं आसान हो गयी हैं .दो जून का भोजन एक बड़ी आबादी को उपलब्ध है . अगर सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को हम सही कर पाए तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को और भी सुखमय कर देगी .. हो सकता है रामराज्य का हमारा चिर कालिक स्वप्न भी साकार हो जाय -अल्प मृत्यु नहिं कवनऊ पीरा सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा ....मगर शायद हम सुख का एक सीमित अर्थ लगा लेते हैं -भौतिक सुख सुविधा को ही हम सुख मान लेते हैं! आध्यात्मविदों की बात हमें यहाँ सच लगती है कि सुख कहीं बाहर नहीं वह तो भीतर हैं अंतर्मन में है -उसकी खोज बाहर नहीं भीतर होनी चाहिए! और यह पूरा विषय ही आध्यात्म का हो जाता है ,
तो क्या बेशुमार धन दौलत ही सुख का आधार है . जाहिर तौर पर तो यही लगता है . मगर मैंने देखा है कि गाँठ के पूरे कितने लोग छदम बाबाओं पीरों की शरण में जा जैसे तैसे कमाए धन को लुटाते रहते हैं .पक्के अन्धविश्वासी हैं . हर पल डरते रहते हैं कि उनका वैभव कहीं भरभरा न जाए . क्या यह सुखपूर्ण जीवन है ?. हमारे पुरखों ने कितने ही सुनहले नियम बनाये हैं जिन पर चल कर हम भले ही सुखद कम मगर एक सार्थक जीवन जी सकते हैं . मगर अब वे नियम कहीं खो गए जल्दी मिलते नहीं .कोई पूछता भी नहीं . सार्थक जीवन के जो कुछ मूल मन्त्र थे उनमें दया ,परोपकार ,सत्य के प्रति आग्रह आदि थे. और ये मूल्य हैं . किसी विद्वान ने कहा है कि उपलब्धियों से भरे जीवन की अपेक्षा हमें गुणवत्ता पूर्ण जीवन को ज्यादा तरजीह देना चाहिए . पर यह जीवन की गुणवत्ता कैसे बढ़ायी जाय?
मेरे मन में यह प्रश्न कौंधता रहा है। और दैनंदिन जीवन में मिलने वाले लोगों को देख समझ कर तो यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस होती है कि जीवन जो बहुत दीर्घकालिक नहीं होता और फिर भी हम एक अंधी दौड़ लगाये हुए हैं में गुणवत्ता का समावेश कैसे हो सके ....आपके कुछ विचार हो तो साझा करें -हम उन विचारों को अगली पोस्ट में संश्लेषित कर प्रस्तुत कर सकेगें . आप भौतिक समृद्धि के अलावा जीवन में किन और चीजों को वरीयता देगें या दे रहे हैं ? आप खुद के जीवन को कितना सार्थक मानते हैं ? आपने कोई ऐसा काम अब तक किया है जिसकी कोई उत्तरजीविता हो? यानी जिसे लोग याद कर सकें? और नहीं तो कब करेगें समय तो पंख लगाये उड़ता ही जा रहा है ?क्या हमें खुद का जीवन जीना ही भारी लग रहा है? क्या हम सचमुच इतना असहाय हो गए हैं ? इस भूलभुलैया से निकलना मुश्किल सा हो गया है ?आपके लिए ये प्रश्न उत्तर देने में सहायक हो सकते हैं!

मंगलवार, 28 मई 2013

बात सम्मान और पुरस्कारों की ....

कभी कभी कुछ अजब गजब होने लगता है. जैसा कि पिछले दिनों मेरे साथ हुआ है. पुरस्कारों /सम्मानों के मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है .सर्प संसार को मिले डोयिचे बेले, जर्मनी के बाब्स पुरस्कार से हम अभी ठीक से उबर भी न पाए थे कि विज्ञान परिषद् प्रयाग ने छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल श्री शेखर दत्त जी के कर कमलों से संस्था के सौ साल होने के उपलक्ष्य में हमें शताब्दी सम्मान भी थमा दिया .हम अभी सम्मान जनित विनम्रता के दुहरे बोझ से दबे थे कि ज़ाकिर अली ' रजनीश' ने अभी अभी अन्तरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त तस्लीम संस्था की ओर से एक और सम्मान थमा दिया है . 
महामहिम के हाथों शताब्दी सम्मान

बहुत लोग ऐसा मानते हैं जिनमें मैं भी शामिल हूँ कि जब किसी को ज्यादा सम्मान पुरस्कार मिलने लग जायं तो यह माना जाने लगता है कि उसका सृजन काल अब अवसान तक आ पहुंचा . काश मेरे बारे में लोग ऐसी धारणा न बना लें -अभी मेरा सक्रिय सृजन काल चल ही रहा है . प्रत्यक्षम किम प्रमाणं . आज कल पुरस्कार सम्मान भी संदेह की निगाह से देखे जाते हैं और सेटिंग गेटिंग का फार्मूला यहाँ भी चलता है मगर मैं ईश्वर को हाज़िर नाज़िर मानकर यह कहना चाहता हूँ कि मुझे मिले इन पुरस्कारों की मुझे भनक तक न थी . अभी एक मजेदार वाकया हुआ -गोरखपुर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित साईंस ब्लॉगर कार्यशिविर के उदघाटन सत्र के आख़िरी पलों में मेरे मोबाईल पर कोई महत्वपूर्ण काल आ गई और उसी वक्त ज़ाकिर अली जी ने कोई उद्घोषणा कर डाली जिसे मैंने सुना नहीं .जैसे ही काल खत्म हुयी मैंने पाया कि डायस के अतिथिगण उठ कर खड़े हैं और मैं अभी भी बैठा ही हूँ -यह तो अशिष्टता थी ..मैं भी किंचित हडबडी से उठकर माजरा भांपने लगा तब तक एक अतिथि डॉ मनोज पटैरिया जी ने और तदनन्तर डॉ रामदेव शुक्ल जी ने मुझे बधाई दे डाली . मैं सकपकाया ...पूछने की धृष्टता तक कर बैठा कि किस लिए ? तभी अतिथि द्वय मुझे एक सार्टिफिकेट और स्मृति चिह्न पकडाते हुए कहते भये कि मुझे तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान से नवाज़ा जा रहा है . मैं अप्रस्तुत असहज सा रह गया . बल्कि मुझे तब तक यह डाउट था कि यह पुरस्कार मेरे लिए नहीं संभवतः डॉ पटैरिया के लिए था . मैंने उनसे यह कहा भी कि नहीं नहीं यह आपके लिए है तो उन्होंने सार्टिफिकेट का मुखड़ा मेरे सामने कर दिया ....और इसके पहले कि मैं पूरा माजरा समझ पाता पुरस्कार मेरे हाथ में था और कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे…. जाकिर भाई ,कम से कम कह कर तो देते .....
 तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान

एक मजेदार बात तो रह ही गयी ..जिस वर्कशाप बैग में अभी अभी मिले इस तीसरे सम्मान -सार्टिफिकेट को रखा था उसे घर पहुँच कर खोल कर देखा तो सार्टिफिकेट नदारद था ....अरे यह क्या हुआ ? अचानक दिमाग में कौंधा कि मेरे और डॉ पटैरिया का बैग एक जैसा ही था और हम एक ही होटल में रुके थे तो कहीं बैग तो नहीं बदल गए ? यही हुआ होगा -डॉ पटैरिया जी मैं डायस पर कह नहीं रहा था कि यह सम्मान आपके लिए था सो वह आपके साथ गया :-)
लोग बाग़ पुरस्कार और सम्मान के लिए बहुधा कहने लगे हैं कि भैया पुरस्कार में अगर कुछ नगद नारायण हो तो दे दो सम्मान अपने पास रख लो  ..घर की गृहणियां भी अब सम्मान चिह्नों को हिकारत की नज़र से देखती हैं -बेफालतू घर के कोंने कोने को कब्जियाते जा रहे हैं -एक व्यंगकार की पत्नी ने (जैसा कि उसने बताया) कहा कि इससे बेहतर तो आंटे की एक छोटी बोरी ही मिली होती जो कम से कम इस्तेमाल में तो आ जाती ..... उधर सम्मानों को उचित ठहराने वाले कहते हैं कि आखिर पद्म सम्मानों में ही नगद राशि कहाँ मिलती है ? यह विवाद थमेगा नहीं -ऐसे में जो कुछ मिल जाय सम्मान सहित ग्रहण करते रहा जाय -अब सम्मान सहित तो विष भी स्वीकार कर लेने की अपनी सनातन संस्कृति रही है ! 
 मित्रों इस पोस्ट को पढ़ भर लीजिये -बधाई देने की कौनो जरुरत नहीं -उसका कोटा पूरा हो चुका है !

मंगलवार, 14 मई 2013

ग्रीष्मावकाश


A short time out from daily chores and of course from blogging too.Meeting you all shortly. Bye!

कलयुग के हनुमान


Visited Ashtbhuja (Godess with eight hands) temple located on outskirt of Mirzapur district.Nearby another site of a Kali temple is another attraction and the place is known as Kali khoh i.e.a deep crevices where diety rests.This man impersonating monkey God hanuman sits at entrance and enthralls public with his antics. I also bargained/haglled with him and got his blessings-touch of his 'gada' on my head in mere 10 rupees.

मंगलवार, 7 मई 2013

घर में घुस आया वह अनचाहा संगीतज्ञ!

वह संगीतज्ञ कब से हमारे घर में घुसा बैठा था मुझे पता ही नहीं चला . वो तो रात में पहली झपकी के दौरान ही एक ऐसे तेज संगीत से नीद उचट गयी जिसके आगे जाज और बीटल्स सब फेल थे ....नींद टूटने के बाद अपने को संयत करते हुए ध्यान संगीत के स्रोत की और फोकस किया ...ऐसा लगा कि कर्कश संगीत लहरियां मेरे स्टडी रूम से आ रही हैं। भारी मन से उठा और ताकि देख सकूं यह बिन बुलाया मेहमान कब से चुपके से आ गया था मेरे स्टडी कक्ष में -जयशंकर प्रसाद की एक कविता भी अनायास याद आयी -पथिक आ गया एक न मैंने पहचाना ,हुए नहीं पद शब्द न मैंने जाना ...कर्कश स्वर लहरी के बीच यह रोमांटिक कविता का यकायक स्मरण होना और नींद में खलल पड़ना -इस सिचुएशन पर एक बेबस मुस्कराहट भी होठों पर आ धमकी ...बहरहाल अब मैं अपने स्टडी कक्ष में था मगर ऐसा लगा आवाज कभी इधर तो कभी उधर से आ रही थी ....

रात के ११ बज रहे थे और मैं अपने स्टडी कक्ष  के दरो दीवार को निहार रहा था कि आखिर संगीत  लहरियां फूट कहाँ से रही हैं? मैं इधर उधर नजरे घुमाता उस संगीतज्ञ को ढूंढो ढूंढो रे की तर्ज पर ढूंढ रहा था .आखिर वह मिल ही गया .दरवाजे के कोने में संगीत की तान लेता वह पकड़ा गया .अब आपकी जिज्ञासा को और भटकाने के बजाय बता ही दूं कि ये एक झींगुर महराज थे जो मदमस्त हो गाये  जा रहे थे -मगर स्वर लहरी इतनी कर्कश कि सोता हुआ उठ के बैठ जाय और मुर्दा भी उठ के भाग जाय . जी हाँ ! मैंने उन्हें उनके पंखों से उठा कर बाहर फेंक दिया ...थोड़ी देर तो शान्ति रही मगर फिर वही संगीत बाहर से भी सुनायी पड़ने लगा. दरअसल झींगुर यानी 'क्रिकेट' अपने आगे के आरीनुमा पंखों को रगड़ कर यह आवाज पैदा करते हैं . यह खुद से दुश्मनों /रकीबों को दूर रखने का तरीका तो है ही, साथ ही मादाओं को प्रणय के लिए रिझाने की कवायद भी है .
 
आखिर मिल ही गए महाशय !
झींगुरों द्वारा संगीत उत्पन्न करने की इस प्रक्रिया को स्ट्रिडुलेशन कहा जाता है . इन्हें एक और करामात आती है जिसे वेन्ट्रीलोक्विजम कहते हैं . यह भला वेन्ट्रीलोक्विजम क्या है ? यह एक ऐसी आश्चर्यजनक क्षमता है जिससे आवाज को उसके निकलने के मूल स्थान के बजाय किसी और स्थान से निकलने का आभास होता  है . यही कारण है कि जब भी कोई झींगुर आवाजें निकाल रहा हो आप उसे आसानी से ढूंढ नहीं सकते क्योकि आवाज कहीं और से निकलती सुनायी देती है . इस कला में कुछ पुतलेबाज भी माहिर होते हैं जो बोलते तो खुद है मगर उनकी आवाज पुतले के मुंह से निकलती हुयी लगती है .


प्राचीन काल के मंदिरों के पुजारी इस कला के माहिर हुआ करते थे और मंदिर में आये अपने जजमानों को सहसा 'आकाशवाणी' सुना कर चमत्कृत करते थे -मतलब वे बोलते तो खुद थे मगर ऐसा लगता था कि आवाज कहीं दूर से आ रही है -इसमें पेट की मांसपेशियों के सहारे फेफड़ों पर बल देकर आवाज को प्रोजेक्ट किया जाता था .....इसलिए इस कला का नाम पेट बोली भी है .  अब यह लुप्तप्राय है मगर झींगुरों में अभी भी यह क्षमता विद्यमान है -सच कहता हूँ उस रात इस कीट महराज ने मुझे काफी छकाया मगर मैं भी कुछ कम जीव नहीं ,जीव विज्ञान का खिलाड़ी हूँ सो साहबजादे को ढूंढ ही निकाला .


तनिक आप भी सुनें न यह संगीत!

अब अगली बार जब आपका पाला किसी संगीत रस में डूबे झींगुर मोशाय से पड़  जाय तो तनिक उन्हें ढूँढने का प्रयास करियेगा -अरे अरे उस दिशा में नहीं, जहाँ से आवाज आ रही हो बल्कि उससे  अलग कहीं भी :-) हमने कितने ही गुण इन कीट पतंगों और जीव जंतुओं से सीखे हैं और आज उसी पर एक नयी प्रौद्योगिकी ही आकार ले रही है जिसका नाम है बायो-मिमिक्री यानी जैव अनुहरण जिसके बारे में कभी विस्तार से साईब्लाग पर चर्चा होगी . अब बताईये कैसी लगी यह पोस्ट? :-)

शनिवार, 4 मई 2013

भरत, भौंरा और चम्पे का फूल

भरत त्यागी हैं ,वैरागी भी हैं . राम को वापस लेने के लिए जब वे प्रयाग पहुंचते हैं तो भारद्वाज ऋषि उनका  आवाभगत करते हैं . हो सकता है भरत  के उसी सेवा सत्कार से हिन्दी का यह आवाभगत शब्द महिमामंडित हुआ हो -आवाभगत अर्थात भगत आये जिसमें उनकी सेवा सुश्रुषा का भाव अंतर्निहित है . वैसे इस शब्द के उद्भव पर किसी वैयाकरण की व्याख्या अपेक्षित है . भारद्वाज जी जान ही  रहे थे कि भरत राम के वियोग में अत्यंत व्यथित हैं ,उद्विग्न हैं तो उनका मन बहलाने को वे बहुविध प्रयास करते हैं। छप्पन भोग  के उपरान्त आंनंद और आराम के तमाम साजो सामान और यहाँ तक कि गणिकाएं वनिताएँ भी उन्हें मुहैया होती हैं . मगर भरत पूरी तरह उदासीन ही रहते हैं .
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

दो0-संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।(अयोध्याकाण्ड ) 

( बसंत  ऋतु  की त्रिविध समीर बह रही है .सभी प्रकार की सुख सुविधा - धर्म अर्थ काम मोक्ष के  चारो पदार्थ उपलब्ध है -माला चन्दन स्त्री आदि भोगों की उपलब्धता से लोग हर्षित विस्मित है , मगर भरत रूपी चकवे  के लिए इन  सभी चकई रूपी सामग्री से कोई लगाव नहीं है भले ही इन्हें मुनि ने एक पिंजरे में रात भर रखने का प्रयास किया और सुबह हो गयी .)
मगर आज की पोस्ट का मुख्य हेतु यह नहीं है . भारत वापस जब अयोध्या लौट आते हैं तब भी वीतराग ही रहते हैं . तुलसी प्रकृति के भी पारखी कवि हैं -उनका प्रकृति निरीक्षण अद्भुत हैं -वीतरागी भरत की तुलना वे भौरे से करते हैं और यही मेरी दुविधा का प्रश्न लम्बे समय से बना रहा -तुलसी कहते हैं -
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा चंचरीक जिमि चम्पक बागा ..अर्थात विरागी भरत राम विहीन अयोध्या में वैसे ही रहते हैं जैसे चंपा जैसे सुगन्धित पुष्प के बाग़ में भौरा .....बस यही बात मेरे मन में खटक जाती थी .....भौरा क्या चंपा के फूल से आकर्षित नहीं होता ? हिमांशु जी ने भी ऐसी ही व्याख्या अपने चंपा के फूल की पोस्ट पर की है -"खिलने वाला यह फूल भौंरे को मनमानी नहीं करने देता । झट से झिझक जाती है भ्रमर वृत्ति - अनोखा है यह पुष्प । यह अकेला ऐसा पुष्प होना चाहिये जिसकी उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते । बाबा तुलसी को भी यह बात रिझा गयी थी, और यही कारण है कि अयोध्या में राम के बिना भरत का अयोध्या के प्रति राग वैसा ही था - जैसे भौरा चंपक के बाग में हो । सर्वत्र बिखरा हुआ ऐश्वर्य (सुगंध), पर किसी काम का नहीं" .अब पता नहीं हिमांशु जी ने यह विचित्र भ्रमर व्यवहार खुद देखा है या नहीं -मैंने भी नहीं देखा मगर जिज्ञासा हमेशा बनी रही कि क्या सचमुच भौरे को चंपा के पुष्पों से परहेज है . वर्षों से मानस की इस अर्धाली ने मुझे व्यग्र कर रखा था .

 मदार पुष्प पर भौरा

अब यहाँ राबर्ट्सगंज में यह गुत्थी अचानक ही सुलझती नज़र आयी .एक दिन मैंने सुबह सुबह ही देखा कि मदार के   (Calotropis) समूहों पर भौरे झुण्ड के झुंड मंडरा रहे हैं -तो इन्हें चंपा नहीं मदार के पुष्प पसंद हैं . मगर क्यों ? क्या मदार के पुष्पों में परागण -निषेचन इन्ही भौरों से ही संभव हो पाता है? और यह मदार और भ्रमर सम्बन्ध इसलिए ही प्रगाढ़ बन गया हो ? कोई वनस्पति विज्ञानी क्या इस भ्रमर व्यवहार पर प्रकाश डालेगा ? एक साहित्यकार ने तो अपना प्रेक्षण पूरा किया मगर वैज्ञानिक विश्लेषण तो विज्ञानियों के जिम्मे है . इसी पोस्ट में तुलसी के ऊपर उद्धृत दोहे में चकवा चकई का उद्धरण दिया गया है . और यह साहित्यिक मान्यता है कि यह पक्षी युग्म -नर मादा रात में बिछड़ जाते हैं और इसलिए एक दूसरे  को ढूँढने की बोली लगाते रहते हैं। तुलसी ने भारद्वाज मुनि द्वारा भरत  के सेवा सत्कार में इसी साहित्यिक सत्य का उद्घाटन किया है कि संपत्ति सुख साधन रूपी चकई और भरत रूपी चकवे को भारद्वाज ऋषि द्वारा एक पिंजरे में बंद कर देने के बावजूद  भी उनमें संयोग नहीं हो पाया और सुबह हो गयी ... चकवे चकई के इस अभिशप्त  रात्रिकालीन वियोग का क्या कोई वैज्ञानिक विवेचन भी है ? इस पर कभी फिर चर्चा होगी .

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

पात्रता की पहचान

यह हम सभी को पता है कि प्राचीन काल में ऋषि मुनि बिना शिक्षार्थी की पात्रता की अच्छी भली जांच परख किये उन्हें स्वीकार नहीं करते थे .कई पौराणिक कहानियां इस बात को बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत करती हैं . जैसे कर्ण और परशुराम की कहानी को ही ले लीजिये जो कुछ यूं है (साभार विकिपीडिया) -"कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। कर्ण और उसके पिता अधिरथ आचार्य द्रोण से मिले जो उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे। द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि कर्ण एक सारथी पुत्र था, और द्रोण केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे। द्रोणाचार्य की असहमति के उपरान्त कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात किया ............ कर्ण की शिक्षा अपने अन्तिम चरण पर थी। एक दोपहर की बात है, गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद कहीं से एक जंगली कीड़ा आया और उसकी दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा। गुरु का विश्राम भंग ना हो इसलिए कर्ण असहनीय पीड़ा को सहता रहा। कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी, और उन्होनें देखा की कर्ण की जांघ से बहुत खून बह रहा है। उन्होनें कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु डंक को सह ले, और परशुरामजी ने तपबल से सब जान लिया और  कर्ण के   मिथ्या भाषण के कारण उसे श्राप दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उसके काम नहीं आएगी। और यही हुआ युद्ध के समय ऐन वक्त कर्ण का पहिया जमीन में जा  धंसा और वह उसे निकालने में वह ऐसा बेसुध हुआ कि अर्जुन ने सहज ही उसे मार गिराया .

यह कथा यह बताती है कि शिक्षा दीक्षा के मामले में प्राचीन गुरु लोग पात्रता का बहुत ध्यान देते थे और अक्सर यह भी होता था शिष्य को अपना सम्पूर्ण ज्ञान न देकर कुछ अपने पास ही रखते थे ...इन कथाओं का मर्म यही है कि अगर पात्र व्यक्ति का चयन शिक्षा दीक्षा के लिए सही न हुआ तो ऐसा गलत चयनित व्यक्ति प्राप्त दीक्षा का दुरूपयोग कर सकता है  ,खुद अपने ही गुरु के लिए भस्मासुर बन सकता है और खुद अपना नाम बदनाम करने के साथ ही गुरु का नाम भी डुबो सकता था . ऐसा नहीं है कि ऐसी पुराकथाएँ केवल भारत भूमि की हैं . ये चतुर्दिक विश्व की बोध कथायें हैं , ली फाक के प्रसिद्ध कामिक्स श्रृखला मैन्ड्रेक में मैन्ड्रेक का एक जुड़वा दुष्ट भाई भी है जिसने  मैन्ड्रेक के साथ ही साथ गुरु थेरान से शिक्षा पायी ...मगर जहाँ मैन्ड्रेक गुरु से प्राप्त अपनी जादुई शक्तियों से एक समाजसेवी बना वहीं उसका जुड़वा भाई मानवता का दुश्मन बन बैठा और अपने गुरु के लिए भी कष्टकारी बन गया ..गुरु थेरान उसकी पात्रता की जांच में चूक गए ...
आज तो बड़ी विषम स्थति है -पात्रता का चयन बड़ा ही मुश्किल हो गया है .फलतः अकादमीय क्षेत्रों में चेला ही गुरु का कान काट ले रहा है . राजनीति में जिस सीढी से नौसिखिये नेता ऊपर जा पहुंचते हैं उसी को नीचे फेंक देते हैं . पहलवान अपने ही गुरु को धोखे से धूल चटा  दे  रहे हैं . अब परशुराम सी शक्ति तो आज बिचारे गुरुओं में रही नहीं कि अपने पथभ्रष्ट शिष्य को शापित कर सकें ..मगर आजके गुरुओं को पुराने गुरुओं की इस परम्परा को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दीक्षा देने के लिए पात्रता को वे अवश्य देखें -अन्यथा उनका शिष्य उनका ही कान काट खायेगा या नाम डुबो के छोड़ेगा .... अब यह भोगा यथार्थ मुझ जैसे गरीब गुरु से बेहतर कौन अनुभव कर सकता है :-(

बृहस्पतिवार, 25 अप्रैल 2013

यह सत्तू का सीजन है -कभी तो आजमाईये!

इस ब्लॉग के पुराने पाठक भूले नहीं होंगे कि मैं कभी कभार बाजार के कुछ नए प्रोडक्ट की चर्चा करता रहा हूँ जो मेरी पसंद के होते हैं और उनकी चर्चा का यहाँ उद्येश्य होता है कि आप भी चाहें तो उन्हें आजमा सकते हैं . मतलब मेरी उन प्रोडक्ट के लिए सिफारिश तो रहती है लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं रहता कि मैं उन प्रोडक्ट को किसी व्यावसायिक निहितार्थ से प्रमोट कर रहा होता हूँ और न ही कम्पनियों/प्रतिष्ठानों द्वारा मुझे सम्बन्धित प्रोडक्ट का ब्रांड अम्बेसडर या प्रतिनिधि ही बनाया गया रहता है . इसी तरह एक प्रोडक्ट मुझे यहाँ राबर्ट्सगंज की बाज़ार में दिखा -जो नया तो नहीं है , है  बहुत पुराना, मगर प्रेजेंटेशन बढियां है -अशोक के सत्तू . आप जानते ही हैं अशोक मसालों का मशहूर ब्रांड है .


सत्तू का नाम ले लीजिये तो किसी भी असली पुरवयिये के मुंह में पानी आ जाता है। यह है ही इतनी शानदार खाद्य सामग्री जिसका बहुविध प्रयोग पुरवयिये करते हैं -यह घोल के पिया जाता है ,अर्ध गीला करके खाया जाता है ,इसकी फंकी लगाई जा सकती है . बाटी के भीतर भर कर पका कर खाया जाता है . और मजे की बात कि मीठा और नमकीन दोनों तरह का सत्तू लोगों को पसंद है . मुझे नमकीन सत्तू पसंद है तो घरवाली मीठे सत्तू की शौक़ीन है . सत्तू का एक पर्व भी है जिसे सतुआ संक्रांति या सतुआन कहा जाता है जिस दिन पूर्वांचल के लोग पूरे आध्यात्मिक भाव से सत्तू का भोग लगाते हैं -अभी कुछ दिन पहले ही यह पर्व यहाँ बीता है

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सत्तू का मुख्य घटक पिसा भुना चना और जौ का आटा है जो एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है . यह एक बेहतरीन अत्यल्प कैलोरी का तुरंता भोजन है -बस पानी और नमक या चीनी /गुड मिलाया और उदरस्थ कर लिए . हर जगहं हर वक्त खाने में सहज है . मेरी एक मित्र हैं मध्य प्रदेश सिविल सर्विसेज में ऊंचे ओहदे पर हैं वे अपनी पर्स में सत्तू रखती हैं और मीटिंग के दौरान भी इसे इस्तेमाल में ले लेती हैं . वे बड़ी फैन हैं इस नायाब खाद्य सामग्री की। इसके बढ़ते  डिमांड को देखते हुए व्यावसायिक प्रतिष्ठान इसका वैल्यू एडीशन कर बाज़ार में आकर्षक पैक में उतार रहे हैं और सेवन की विधि भी लिखी  हुई  है . आज मैंने अशोक के इस  सत्तू ब्रांड का सेवन किया -अच्छा है . आप भी ट्राई कर सकते हैं . बस चार चम्मच एक गिलास में लीजिये ,भुना जीरा,पुदीना पावडर,नमक /चीनी मिलाईये और गटक लीजिये -इस गर्मी में इससे सुस्वादु पेय शायद ही कोई दूसरा हो! कुछ और बेहतर स्वाद आप अपने तरीके से भी कर सकते हैं .अशोक मसाले वालों का यह पेज भी देख सकते हैं .
यह सत्तू का सीजन है -कभी तो आजमाईये!

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  • Terminator Salvations teaser trailer - http://www.youtube.com/watch?v=kXnELk6pZVk a2a_linkname="Terminator Salvations teaser trailer";a2a_linkurl="http://www.scifirama.com/index.php/2008/07/443/";
    4 वर्ष पहले