बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

आतंकवाद की अंतरंग पौधशाला


मैं देख रहा हूँ मेरे कुछ मुट्ठी भर तथाकथित प्रगतिशील फेसबुकिया मित्र प्रत्यक्ष, परोक्ष और कुछ घुमा फिराकर, कभी दबी जुबान कभी मुखर होकर भी देशविरोधी तत्वों को सपोर्ट कर रहे हैं। उनकी निजी कुंठाओं , दमित इच्छाओं को शायद ऐसे मौकों की तलाश रहती है जब वे अपनी दबी रुग्ण मानसिकता और विचारों का समर्थन, वैलिडेशन कुछ अपने सरीखे दिग्भ्रमित लोगों से करा कर संतोष पाते है । ये दमित इच्छाओं के मसीहा अपने निज जननी, देश के सम्मान को भी अपनी कथित अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दांव पर लगा देते हैं। वस्तुतः ये देश के गद्दारों को अपने कृत्य से बढावा दे रहे हैं। ईश्वर उनका भला करे।

एक सामान्य परिपाटी रही है कि किसी भी संगठन संस्थान/ कार्यालय /विभाग की गड़बड़ियों का जिम्मेदार उसके मुखिया को प्रथमतः माना जाता है -उत्तरदायित्व उसका ही होता है। कन्हैया कुमार जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष हैं , उनकी प्रमुख उपस्थिति घटना के पहले और बाद में भी प्रमाणित है। टीवी चैनलों पर भी उन्होंने अपना स्पष्ट मत व्यक्त नहीं किया ,मुखरता नहीं दिखी , आधेमन से ही उन्होंने अपनी निष्पक्षता बयान की बल्कि कहीं कहीं वे विकृत सोच वालों के पक्ष में दिखे,न्यायिक प्रक्रिया शुरू हो गयी है उस पर टिप्पणी न्यायालय का अपमान है ,हाँ वे अगर निर्दोष पाये जाते हैं ,काश वे हों तो सबसे अधिक खुशी मुझे होगी कि साधारण बिहारी परिवार से निकले इस संघर्षशील और मेधावी युवा का जीवन इन विकृत सोच वालों की सोहबत में बर्बाद होने से बच गया ! मेधावी रोहित वेमुला को हम खो चुके हैं।  काश फिर ऐसा न हो!


सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश सर्वोपरि या जेएनयू ? आखिर पुलिस क्यों नहीं कर सकती कैम्पस में सर्च आपरेशन? मेरी गट फीलिंग थी कि वहां आपत्तिजनक सामग्री और अनधिकृत लोग हो सकते हैं। जो कुछ देशद्रोही गतिविधि हुई है वह एक लम्बे समय से चल रही आपत्तिजनक गतिविधियों की ही परिणति है।मगर हम समय रहते यह देख न सके। विश्वविद्यालय परिसर की शुचिता के आड़ में देश विरोधी गतिविधियाँ कुछ गुमराह छात्र चलाते रहे हैं -ये वही छात्र हैं जिनमें से अधिकाँश नशे की आदत पाले हुए हैं। ड्रग्स का बेधडक इस्तेमाल करते हैं। रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है।

खुली सोच और बोलने की आजादी जैसे फिकरों , छद्म बौद्धिकता और तरह तरह के बौद्धिक प्रपंच के चलते जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का माहौल विगत कई दशकों से इतना विषाक्त होता गया है कि अच्छे खासे सांस्कृतिक माहौल से निकल कर वहां पहुंचे छात्र भी ब्रेन वाश के शिकार हो जाते हैं। सनसनी सम्भाषण (डेमोगागी) , मार्क्सवाद ,वामपंथ ,आज़ादी , नशाखोरी के चलते उत्पन्न मनोभ्रमों (पैरानायड़) और उन्मुक्त यौनचारों के चुंबकीय आकर्षण पाश इन युवाओं को दिग्भ्रमित कर एक वायवीय दुनिया में ले जाते हैं -आतंकवादी बनाने का प्रोसीजर भी ऐसा ही कुछ है।

नतीजा सामने है -जिस देश का ऋणी होना चाहिए आज यहाँ के छात्र उसकी बर्बादी का जश्न मना रहे हैं ! वह भी एक गरीब देश की जनता की गाढ़ी कमाई से काटे टैक्स के पैसे से। जेएनयू में छात्रों के रहने सहने का लगभग सारा बोझ ही इस देश की गरीब जनता उठाती है। विश्वविद्यालय के विकृत सोच के प्रोफ़ेसर भी बिगड़े छात्रों का कन्धा थपथपाते हैं ! एक गिलानी पकड़ा गया मगर कई और ऐसे हैं वहां ! जेनयू अलुमिनी देश के कई हिस्सों में पसरे हुए हैं और गरीब जनता की गाढ़ी कमाई से रोटी तोड़ रहे हैं। इनका संज्ञान लेना होगा -क्योंकि आतंकवाद की इस अंतरंग पौधशाला को खाद पानी देंते रहने का मतलब है परजीवी विष बेलों को पनपाते जाना ! चेतो भारत चेतो!

जेएनयू से देशद्रोहियों को बाहर करो और कैपिटल पनिशमेंट दो! एक नागरिक के नाते यह मेरी मांग है। अगर इन्हें इसी तरह इग्नोर किया गया तो सचमुच हम अपनी सम्प्रभुता खो देगे। फ्रीडम आफ एक्सप्रेसन के नाम पर तुम पाकिस्तान की जय जयकार करोगे? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को चुनौती दोगे? कश्मीर की फ्रीडम की आवाज बुलंद करोगे? भारत की बर्बादी की जंग करोगे? इन सभी को पकड़ो और देशद्रोही की तरह बर्ताव करो।नहीं तो अब कैम्पस में जनता घुसेगी और इन देशद्रोहियों को उनके अन्जाम तक पहुंचायेगी।

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।
मैथिली शरण गुप्त

6 टिप्‍पणियां:

  1. इस दुनिया में जो लोग बना नहीं सकते , वे मिटाने में लग जाते हैं । राजनीतिज्ञ होने में कोई बुद्धिमत्ता चाहिए क्या ? बस नीचता की सीमा से भी नीचे गिरना । इस देश का भविष्य अनुसरण का शिकार हो रहा है जिसे तत्काल रोकना होगा ।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और कैलाश नाथ काटजू में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. एक गिलानी पकड़ा गया मगर कई और ऐसे हैं वहां ! जेनयू अलुमिनी देश के कई हिस्सों में पसरे हुए हैं और गरीब जनता की गाढ़ी कमाई से रोटी तोड़ रहे हैं। इनका संज्ञान लेना होगा -क्योंकि आतंकवाद की इस अंतरंग पौधशाला को खाद पानी देंते रहने का मतलब है परजीवी विष बेलों को पनपाते जाना ! चेतो भारत चेतो!
    जेएनयू से देशद्रोहियों को बाहर करो और कैपिटल पनिशमेंट दो! .......... नहीं तो अब कैम्पस में जनता घुसेगी और इन देशद्रोहियों को उनके अन्जाम तक पहुंचायेगी।
    ..................
    बोलने की स्वतंत्रता का मतलब देश विरोधी नारे और कुछ भी अनाप शनाप कैसे हो सकता है, इस पर शख्ती से कार्यवाही करनी चाहिए। इसके साथ ही सिर्फ जो लोग सामने नज़र आते हैं उनपर ही नहीं जो लोग उनके पीछे खड़े रहते हैं, जिनके बल पर ऐसे दिग्भ्रमित लोग उछलते है, उन्हें भी ढूंढ निकाल कर अविलम्भ देशहित में कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
    .. बहुत सटीक प्रेरक सामयिक चिंतन प्रस्तुति आभार!

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  4. जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
    वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।

    सार्थक आलेख

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  5. जो व्यक्ति अपनी मातृभूमि का अपमान करे...निश्चय ही वो व्यक्ति निंदनीय और घृणा योग्य है तथा उसे कानून सम्मत जो सज़ा हो...दी जानी जानी चाहिए. लेकिन अपने देश में ऐसा कब कहाँ हो पाया है कि गुनाह करने वालों को बिना किसी भेदभाव के सजा दी जाती हो. वर्तमान सन्दर्भ की बात करें तो बस्सी साब कह रहे हैं कि बाहर से लोग आये थे. क्या ये वही लोग थे जो एक ख़ास विचारधारा की सर्वमान्यता के लिए भाड़े के गुर्गे बन कर आये थे और आग में घी डालने के लिए भारतमाता का अपमान करके गए? स्टार न्यूज़ की अभी की खबर है कि कन्हैया कुमार ने भारत के खिलाफ कुछ कहा ही नहीं.
    http://www.abplive.in/india-news/jnu-row-this-the-reality-of-kanhaiyas-azadi-video-some-channels-are-running-wrong-information-292219

    हो सकता है कि अपमान करने वाले जेएनयू के हों. हो साकता है भाड़े के लोग हों. पर पुलिस अपना अनुसंधान करे और उसे अंजाम तक ले जाए. ये वकील कौन होते हैं हिंसा करनेवाले. क्या भारत में तालिबानी व्यवस्था बहाल करने का प्रयास हो रहा है? क्यों ललित नारायण मिश्र की हत्या का असली कातिल बेनकाब नहीं हो पाता. क्यों १९८४ के सिख दंगे के दोषियों को सजा नहीं हो पाती. क्यों २००२ जैसे दंगे से प्रजातंत्र का मखौल उड़ाया जाता है. क्यों किसी न्यायिक प्रक्रिया के अनुपालन को भावनात्मक रंग दिया जाता है. ये कुछ ऐसे प्रश्न है जो हर किसी सच्चे और स्वस्थ प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में पूछने जाने चाहिए. ऐसे प्रश्न उठाने वालों पर देशद्रोह का इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहिए. पर हां, जिनका दिमाग बिगड़ गया हो और जो अपमी जन्मभूमी को ही अपमानित कर रहे हों, उसपर जरूर कानूनसम्मत कारवाई हो.

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