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रविवार, 3 फ़रवरी 2013

लोग दस वर्ष की उम्र कैद तक झेल जाते हैं। संदर्भ: मिड लाईफ क्राईसिस!

पिछले दिनों मैंने फेसबुक पर अपडेट किया -"कभी कभी मन बहुत अवसाद ,जड़ता और नकारात्मकता से भर उठता है -चिकित्सक इसे पुरुष रजोनिवृत्ति (मेल मीनोपाज ) भी कहते हैं! क्या सचमुच मेल मीनोपाज एक हकीकत है या फिर चिकित्सकीय भ्रम? मेरे समवयी मित्रों आप कभी इस मनोभाव से गुजरते हैं ? आप इसे दूर करने का क्या उपाय करते हैं?"जैसा कि अपेक्षित था मित्रों की सदभावनाएँ बरसनी शुरू हो गई। मित्रों ने मजाक भी किया " हर शाम रेड वाईन के दो बड़े पेग लें ठीक रहेंगे" -   मैंने कहा   मैं तो असुर हूँ भाई इसे तो न ले सकूंगा! हाँ कोई प्यारा सा साथ  मिले तो यह कुफ्र भी कबूल है, बहुत हो गया मुसलमा बने हुए :-) किसी मित्र ने नियमित व्यायाम सुझाया तो किसी ने ग़ज़ल सुनने -सुनाने की सलाह और किसी ने रचनात्मक लेखन (जैसे यह विधा कभी आजमाई ही न हो मैंने :-) ) डाक्टर से मिलने की भी सलाह दी गयी। एक मित्रा(णी) ने यहाँ तक सलाह दे ड़ाला कि इधर उधर की ताका झांकी और राग विराग के बजाय ईश्वर में मन लगाईये -योग कीजिये -ध्यानावस्थित रहिये! रसिक मित्र वीरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने तो एक पूरा वृत्तान्त ही पुरुष रजोनिवृत्ति पर चेंप दिया। एक संक्षिप्त सी प्रतिक्रिया आयी कि "सर्च मिडलाईफ क्राइसिस" ..मैंने ढूँढा तो विकीपीडिया ने स्वागत किया .जैसा कि मेरी रचना प्रक्रिया का यह हिस्सा है नयी जानकारी मैं मित्रों से साझा करता हूँ-यह विवरण यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत है -विस्तार से विकीपीडिया पर पढ़ ही सकते हैं।
मैंने बात पुरुष रजोनिवृत्ति से शुरू की थी। महिलाओं में रजस्राव बंद होने के बाद की उम्र बहुत से हार्मोनल असंतुलन और 'मूड स्विंग' की होती है .इसी के समतुल्य कुछ भावनात्मक असंतुलन की स्थिति जो पुरुषों में 45 वर्ष के बाद शुरू होती है को नाम मिल गया "पुरुष रजोनिवृत्ति" -जो एक 'मिसनामर ' भले ही है मगर कतिपय लक्षणों की उपस्थिति के चलते यह नामकरण प्रचलन में है . मिड लाईफ क्राईसिस भी पुरुष या स्त्री के 40-60 वर्ष के बीच की अवस्था में आने वाला एक समय है जब कई ऐसे भावनात्मक उद्वेग पैदा होते हैं जो विचलित करने वाले हैं -मगर यह पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है। यह समय काल ऐसा है कि  वह जीवन के उस पड़ाव पर होता है जब उसके शेष जीवन की अवधि कम हो रहती है और वह अपना मूल्यांकन शुरू करता है -क्या खोया क्या पाया? कितना सफल हुआ वह समवयी मित्रों/लोगों में, जीवन में सफलता या असफलता के परिप्रेक्ष्य में तथा नौकरी की संतुष्टि/असंतुष्टि,विवाह और रोमांटिक सम्बन्धों की स्थति, और खुद का आकर्षक -अनाकर्षक दिखना,यौनिक संतुष्टि -असंतुष्टि ,यौन परफार्मेंस में गिरावट आदि आदि भी महत्वपूर्ण कारक पाए गए हैं .मुझे लगता है इसमें कुछ कारण अवश्य महत्पूर्ण है।
इस त्रासदी से बचने के   लिए लोगबाग़ कई अधीर और हास्यास्पद प्रयास भी करते हैं -खुद को सजाने संवारने , प्रदर्शन के कई और जुगाड़ -नयी गाड़ियां या वैभव के दिखावे वाले सामानों को खरीदना,अपनी वैवाहिक संगिनी से इतर नए सम्बन्ध ढूंढना . और जीनवादियों (जेनेटिसिस्ट) की माने तो अनुर्वरक (नान रिप्रोडकटिव) हो चुकी पत्नी के उम्र की तुलना में उर्वरकतायुक्त(रिप्रोडकटिव) घानिष्टता की साध आदि आदि .
अब इस मिडलाईफ क्राइसिस से बचने के उपाय आखिर हैं क्या? कई सुझाव हैं -मनो चिकित्सक से संपर्क के अलावा जीवन शैली के बदलाव की सिफारिश है .मगर मुझे लगता है इसके अलावा मनुष्य को अपनी निजी स्वार्थपरता को त्याग कर समाजोपयोगी कार्य कलापों में रूचि लेना भी आत्मसंतुष्टि का संबल बन सकता है -और भारतीय आध्यात्म चिंतन में अभिरुचि -जीवन की निस्सारता की अवधारणा, मनुष्य के निमित्त मात्र होने का बोध आदि ऐसे समय बहुत लाभदायी हो सकते हैं . जीवन में तरह तरह की अपेक्षाएं पाल कर लोग दुखी होते हैं और अवसाद में भी चले जाते हैं . यही वह अवसर है जब बुद्धं शरणम गच्छ का आह्वान अर्थपूर्ण हो उठता है . 
अतिशय भौतिकता मनुष्य को अंततः पलायन की और ले जाती हैं -कृष्ण ने ऐसे ही उहापोह के समय अर्जुन से कहा -सर्व धर्मं परितज्य मामेकं शरणं ब्रज ..मतलब किसी एक परम सत्ता को समर्पण .....सम्पूर्ण भक्ति! मगर आप कदाचित अनीश्वरवादी हैं तो भी यह तो समझ ही सकते हैं कि मनुष्य के हाथ में सब कुछ नहीं है -पुरुष समग्र जीवन के परिप्रेक्ष्य में परिस्थितियों का भी दास होता ही है। वैसे भी मिड लाईफ क्राईसिस महिलाओं में मात्र 3-4 वर्ष और पुरुषों में दसेक वर्ष की पायी गयी है -अब इतना भी झेल लेना कौन सी बड़ी बात है -लोग दस वर्ष की उम्र कैद तक झेल जाते हैं।

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

मोतियाबिंद का आपरेशन

जब माता जी ने करीब छः महीने पहले यह शिकायत की कि उनकी आँखों के सामने मकडी के जाले  सा दिखता है तो मैंने उन्हें नेत्र चिकित्सक को दिखाने का निर्णय लिया .बनारस में आर के नेत्रालय सबसे अच्छा नेत्र चिकित्सालय है और डॉ. आर के ओझा एक जाने माने नेत्र सर्जन हैं . उन्होंने   जांच कर बताया कि इनकी आँखों में मोतियाबिंद की शुरुआत है और दायीं  आँख का आपरेशन करा लिया जाना उचित होगा . बाईं आँख के लिए इंतज़ार किया जा सकता है , आज सभी को मालूम है कि आँखों का कुदरती लेंस किन्ही कारणों (बल्कि कई कारण हो सकते हैं ) से धूसर होते जाते हैं तो दिखना प्रभावित होने लगता है . अब आपरेशन तुरंत कराया जाय या इंतज़ार किया जाय इस पर जैसा कि प्रायः सभी भारतीय परिवारों में दो विचार हो जाया  करते हैं यहाँ भी हुआ . इन मामलों में मैं चिकित्सक का सुझाव निर्णायक मानता हूँ . डॉ ओझा ने स्पष्ट रूप से कहा कि आपरेशन जरुरी है . माता जी थोडा घबरा रही थीं तो उन्होंने कई दलीलें रखीं -गर्मी का मौसम है ,धूल बहुत उड़ रही है ,बिना नहाये दो तीन दिन कैसे रहा जाय ...घर के कुछ सदस्य भी दन से माता जी से सहमत हो लिए ..मैं अकेला पड़  गया मगर मन में निश्चय कर लिया कि जितना जल्दी हो आपरेशन तो कराना ही है . इसी के तत्काल बाद मेरा ट्रांसफर भी हो गया और ऐसी जगहं कि वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध नहीं है ,सोनभद्र में ज्वाईन करते ही मेरे कार्यालय -मालिके मकान ने खुद अपना और एक और मामले का ऐसा उद्धरण दिया जिसमें वहां आपरेशन करने बाद आँख की रोशनी चली गयी थी  .....अब तो बनारस में आपरेशन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था  . सोनभद्र सर सामान ले कर जाने के पहले माता जी का आपरेशन करा लेना ही था . 
माता जी आपरेशन के ठीक बाद 
मुझे बचपन की जब मैं मात्र पांच साल का था यानी पचास साल  पहले गाँव में ही एक वृद्ध महिला के मोतियाबिंद के आपरेशन का खौफनाक दृश्य आज भी याद है . वह आपरेशन जमीन पर बैठा कर हुआ था पीढ़े पर दोनों मरीज और ग्राम्य शल्य चिकित्सक  बैठे थे ,अनेस्थेसिया तो था नहीं, ऐसे ही उसके औजार वृद्धा की आंख पर चल रहे थे और वे चिल्ला रही थीं ....यह दृश्य मुझे आज भी ठीक वैसे ही याद है .गनीमत कहिये या घोर आश्चर्य वह आपरेशन सफल हुआ था और वे महीनों तक एक हरे रंग की  आँख -टोपी लगाती  थी .बहुत झगडालू थीं अब दिवंगत बहुरूपा दादी की  आँख ठीक हो गयी तो उन लोगों को भी जिन्हें वे देख नहीं  पाती थीं देखने लग गयीं तो देखते ही आदतन गरियाने भी लग गयीं थीं . लोग शिकायत भी करते "काहें भैया इनका आपरेशन करा दिए इससे भली तो वे आन्हर ही थीं " :-) मगर उस समय जिस किसी ने उनकी आँख का आपरेशन उस ग्राम्य सर्जन से कराने का निर्णय लिया था ,उनके पति और हमारे आजा ( मैं उन्हें यही कहता था ) या उनके पुत्रों ने जिनमें एक अभी भी हैं को लेकर मेरे मन में बड़ा आदर है .उन्होंने एक बड़ा रिस्क तो लिया था क्योंकि  उन दिनों उस तरह की सर्जरी के बिना और कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी , 
आपरेशन का दूसरा दिन -काला चश्मा लग गया 
आज तो फेको सर्जरी है जिसमें आँख में बस एक-दो मिमी का चीरा लगा कर खराब लेंस को काटकर बाहर खींच लिया जाता है और नया लेंस लगा दिया जाता है .कुल आपरेशन महज 15-20 मिनट का ही है . परसों रात 10 बजे माता जी का आपरेशन हो गया . और ठीक दस मिनट बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी मिल गयी . रात भर एक पट्टी (बैंडेज) लगा रहा सुबह वह भी हट गया और काला चश्मा अभी कुछ दिन और लगा  रहेगा , मगर बस इसी पल भर के आपरेशन कराने का निर्णय लेने में कुछ महीने लग गए ..क्या करें, अकेले किसी एक आदमी को संयुक्त परिवार में अब निर्णय लेने में समय लग ही जाता है और अब कोई भी निर्णय शायद बहुमत से होते भी नहीं -कई समाजार्थिक कारण इनके पीछे होते हैं .

प्रायः हम लोगों को कहते सुनते हैं कि अमुक आपरेशन तो बहुत हल्का, छोटा सा है। जैसे आँख के मोतियाबिंद का  यही आपरेशन . किन्तु मैं समझता हूँ कि किसी भी आपरेशन में रिस्क फैक्टर हमेशा मौजूद रहता है चाहे वह छोटा हो या  बड़ा . आपरेशन टेबल से सकुशल वापसी किसी बड़े युद्ध से सकुशल वापसी से कम नहीं है और बड़ी राहत वाली बात है . मुझे खुद अपना एक आपरेशन याद है 2005  का जब मैंने मेजर आपरेशन से अपने गाल ब्लैडर के स्टोन को निकलवाने का निर्णय लिया  था .फिजिसियन और सर्जन दोनों ही  मेरे क्लास फेलो थे ,बल्कि मैंने ही इस आपरेशन के लिए उन्हें चुना था . वह आपरेशन जनरल अनीसथीसिया में हुआ था यानी पूरा बेहोश करके . आपरेशन  टेबल पर लेटने के पहले तरह तरह के विचार मन में आ  रहे थे . उनमें एक तो यह था कि मुझे इसलिए चिंता नहीं करनी चाहिए कि अगर कुछ अनहोनी हुयी भी तो फिर तो आपरेशन के उपरान्त मुझे उसका पता ही नहीं चलेगा और आपरेशन सफल हुआ तो  चिंता करने की बात ही नहीं है . यानी दोनों ही स्थितियों में फिकर नाट . और यह बड़ी राहत  वाला विचार था . आपरेशन बहुत  सफल था मगर मेरे मित्र सर्जन ने बाद में बताया कि मुझसे ज्यादा तो वे तनाव में थे -मित्र के शरीर पर सर्जरी में उनका मन स्थिर नहीं था .....मैंने पूछा था क्यों ? तो उन्होंने बताया था कि आपरेशन में अगर कुछ भी हो जाता तो वे मित्रता के कारण ज्यादा आहत होते और अपयश भी कम न मिलता . ऐसे मामलों में चिकित्सक भी कहाँ पूरी तरह प्रोफ़ेसनल रह पाते हैं .आपरेशन टेबल हमेशा ही निरापद नहीं रहता . एक सर्जन  के जीवन की सबसे बुरी घटना होती है डी  ओ टी यानी डेथ आन आपरेशन टेबल और यह एकदम असंभव भी नहीं है . माता जी के सारे परीक्षण हो चुके थे ,वे ब्लड प्रेशर की मरीज हैं .मुझे डर  भी लग रहा था मगर वे आपरेशन टेबल से विजेता की तरह लौटीं -मेरे जान में जान आयी . सूत्र वाक्य यही कि जब तक सफल न हो जाय कोई भी आपरेशन छोटा -बड़ा नहीं होता यानी सब बड़े ही होते हैं! 

मैंने यह पोस्ट कुछ तो मोतियाबिंद को लेकर अपने अनुभव आपसे शेयर करने के लिए लिखी है ,.दूजे फेको विधि से मोतियाबिंद -सर्जरी की अच्छाई बताने के लिए और यह भी क़ि एलोपैथी में सर्जरी का कोई श्रेष्ठ  विकल्प नहीं है . 

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मन की उम्र

मेरे मित्र ,सहपाठी ,पारिवारिक चिकित्सक और जार्जियन डॉ. राम आशीष वर्मा जी अक्सर समवयियों(पीयर ग्रुप )  को चेताते रहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ काया तो जरावस्था को प्राप्त होती रहती है मगर मन उसी तरह स्फूर्त और युवा बना रहता है-मतलब शरीर मन का साथ छोड़ने लगता है.आशय यह हुआ कि मन और देह का चोली दामन का साथ नहीं है . और इस लिए बहुत सावधान रहना चाहिए और मन की हर बात को मानने के पहले अपनी दैहिक समीक्षा अवश्य कर लेनी चाहिए और एक विज्ञ सुचिंतित निर्णय लेना चाहिए नहीं तो अपने  स्वास्थ्य को आप खतरे में डाल  देगें और चिकित्सकों की चांदी में और इजाफा ही होगा -मुझे नहीं मालूम कि हमारे ब्लॉगर चिकित्सक, डॉ.वर्मा की इस बात से इत्तेफाक रखेगें या नहीं मगर मेरा पूरा इत्तेफाक है -क्योकि मैं डॉ.वर्मा पर एक चिकित्सक और मित्र के नाते भी पूरा विश्वास रखता हूँ . उनकी डायग्नोसिस सटीक होती है -और मैं इस उधेड़बुन में हूँ कि इधर वे कई बार यह बात मुझसे क्यों कह गए हैं? क्या मुझे भी उनकी सलाह पर गंभीरता से सोचना चाहिए या फिर इस बात को बस ऐसे ही कही जाने  वाली कतिपय बातों (प्लैटीचूड)   की तरह टाल दिया जाना चाहिए ..मगर मैं समझता हूँ कि उनकी बात में दम है!और इसलिए मैंने उनकी इस सलाह पर गंभीर चिंतन मनन किया है ..कुछ प्रेक्षण ब्लॉग जगत में भी किया है और खुद अपना भोगा हुआ यथार्थ तो है ही ... :) 

आखिर ऐसा क्यों है कि शरीर का साथ मन नहीं देता? बचपन में मन तो बच्चा रहता है किशोर और युवा भी होता चलता  है.. मतलब उम्र के सामयिक बढाव (क्रोनोलोजी) के साथ एक समय तक तो मन की  और देह की उम्र का सायुज्य -समन्वय बना रहता है मगर जैसे ही शरीर जरावस्था की ओर    अग्रसर होता है वह मानों जिद्दी बच्चे की तरह देह से किनारा करने लगता  है ....तुम जाओ भाड़ में अभी तो मैं जवान हूँ ..... एक अजीब सी कान्फ्लिक्ट शुरू हो जाती है ...शरीर बुढ़ाता जाता है मगर मन उसी तरह चंचल बना रहता है .....गीता में कृष्ण ने भी अर्जुन के माध्यम से जन जन को इसलिए ही आगाह किया -हे अर्जुन यह मन बड़ा चंचल है मगर हाँ , निरंतर स्व -अनुशासन   से इस पर नियंत्रण रखा जा सकता है ..मगर यह नियंत्रण वाली थियरी मानवता पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाई -कितनी ही शकुन्तलाओं और मत्स्यगंधाओं के जन्म इस बात के प्रमाण हैं ....मतलब आज तक न तो अध्यात्म और न ही विज्ञान या तकनीक के पास इस दुर्निवार समस्या का कोई स्थाई हल मिल सका है ....हाँ आत्म अनुशासन कुछ सीमा तक कारगर है मगर यह  परिवेश ,स्फुलिंग ,अंतरावस्था ,मनः स्थति आदि अन्यान्य बातों पर निर्भर है ....

पुराण कथा है है की राजा ययाति ने अपने एक पुत्र से युवावस्था की भीख तक मांग ली ...पितृभक्त पुत्र ने अपने मन का अर्पण कर दिया ..क्या आधुनिक चिकित्सा कोई ऐसा माजूम -मन्त्र मनुष्य को कभी सौंप सकेगी? एक कथा आती है अर्जुन की जब वे एक हिजड़े (बृहन्नला) के रूप से उन्मोचित हुए तो सचमुच बड़ी क्लैव्यता का अनुभव कर रहे थे तब दैव-चिकित्सकों ने उनको पुनः  उर्जित किया -वे मन से फिर युवा हो गए -क्या इस चिरयौवन की कुंजी मनुष्य को कभी मिल पायेगी? यह पोस्ट लिखते समय मेरे मन में बार बार यह एक असहज सी बात आ रही है कि देह और मन की यह बेमेलता पुरुषों के साथ ही क्यों ज्यादा है -वे ही इस अभिशाप से क्यों ज्यादा त्रस्त हैं?(ब्लॉग जगत के निरंतर प्रेक्षण ने इस अध्ययन में मेरी काफी मदद  की है -शुक्रिया ब्लॉग जगत! ) ..आखिर प्रकृति की क्या गुप्त अभिलाषा है?वह चाहती क्या है? एक जैविकी के अध्येता के रूप में मेरी कुछ संकल्पनाएँ हैं  -

मनुष्य अपनी अंतिम सांस तक प्रजनन -उर्वर रहता है जबकि नारी यह क्षमता जल्दी ही ,सामान्यतः ५० वर्ष के बाद ही त्याग देती है ....अब शरीर भले ही जरावस्था में है मगर कुदरत की खुराफात तो देखिये उसने नर की प्रजनन क्षमता -शुक्राणुओं को सक्रिय बनाए रखा है ...और यह बिना उद्येश्य के नहीं -यह प्रकृति चाहती है कि पुरुष मरते दम तक प्रजनन में योगदान देता रहे ....और यह तब तक क्रियात्मक नहीं होगा जब तक उसके मन को भी चंचल न रखा जाय! मगर विचारणीय यह है कि कुदरत की यह अपेक्षा पुरुष से ही क्यों है ? इन प्रश्न का उत्तर हमें जैविकी और मानव अतीत के कई अतीत -गह्वरों में ले जाएगा ....क्या संतति संवहन के लिए पुरुष(शुक्राणु )  का योगदान ज्यादा जरुरी है ? मगर बिना नारी के योगदान (अंडाणु ) के संतत्ति निर्वहन /संवहन संभव नहीं यह हम सभी जानते हैं ....क्या अतीत के किसी धुंधलके में पुरुषों की संख्या बहुत कम हो गयी थी -नारियां भोग्य थीं इसलिए  अबध्य थीं ..उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी ...पुरुष संख्या क्रांतिक सीमा तक कम होती जा रही थी... प्रकृति के पास कालान्तरों में   इसके बिना कोई चारा नहीं रहा कि वह पुरुष को अखंड उर्वरता दे दे ? सोचिये आप भी ....

मगर ऐसा परिहास कि मन के  ओज को बनाए रखने के बावजूद  भी शरीर को  प्रकृति  बुढापे से मुक्त नहीं कर पायी और पुरुष को प्रायः  उपहास का पात्र  बनाया :( ....यह ठीक नहीं हुआ ..सरासर नाइंसाफी ...मैं तो चाहता हूँ स्त्री और पुरुष दोनों को ही चिर यौवन की सौगात मिल जाय .
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अब वैज्ञानिकों से हम यही   आस लगाए बैठे हैं!  




रविवार, 24 अप्रैल 2011

यह लेख डाक्टर मछलियों के बारे में है!(caveat emptor )

 यह लेख डाक्टर मछलियों के बारे में है बस जानकारी के लिए -कोई सिफारिश नहीं है ...निर्णय पाठकों को खुद करना (caveat emptor )  है!

दमा  दम से जाता है ,इस लोक विश्वास के चलते इस बीमारी से निजात पाने के लिए हैदराबाद में प्रत्येक वर्ष जून माह के शुक्ल पक्ष में एक गौड़ परिवार के यहाँ एक विशाल मेले सा दृश्य होता है जहाँ एक अज्ञात नुस्खे वाली दवा मछली के मुंह में डालकर दमे के मरीज को निगलने को कहा जाता है .दवा के बारे में दावा है कि इससे  दमा का जड़ से इलाज हो जाता है!अब तो कई और शहरों में ऐसे मछली इलाज का दावा करते लोग किसी होटल में अपना डेरा जमाये दिख जाते हैं ...मेरी उत्सुकता थी आखिर लोगों के लिए यह वरदान बनी यह अभिशप्त मछली कौन है?

दमा के लिए इस्तेमाल की जा रही सौरी प्रजाति 
आन्ध्रप्रदेश को नीली क्रान्ति (मत्स्य उत्पादन क्रान्ति ) का पालना कहा जाता है -व्यावसायिक मछलियों के विभिन्न प्रकार और  उत्पादन में आंध्रप्रदेश की कोई सानी नहीं है ....मैंने खोजबीन की तो यह दमा  निवारक मछली  सौरी(चन्ना )  की एक छोटी प्रजाति निकली ...मगर इसके साथ गुप्त दवा का मेल दमा  ठीक कर पाता है मुझे इसमें संशय है! मुझे तो शर्तिया तौर पर आजकल दमा के इलाज में इनहेलर चिकत्सा का कोई जोड़ नहीं दीखता ..भले ही यह जड़ से दमा को उखाड़ न फेके, मगर है बहुत कारगर और एक स्थायी रिलीफ के लिए दमा  रोगियों के लिए बहुत मुफीद भी ..जब इनहेलर नहीं थे तो दमा एक कुख्यात रोग बना हुआ था ....तब ऐसे ही मछली आदि जैसे माजूम /अवलेह /खरबिरैया ही दमा के इलाज में इस्तेमाल होते थे.... 

त्वचा रोगों और घाव के लिए टंच इलाज टेन्च से ...

ऐसी ही एक और मछली है टेंच जिसे डाक्टर फिश का ही नामकरण मिला हुआ है और यह ब्रितानी मूल की है -इसके शरीर से निकलने वाला चिकना लसलसा(slime)  पदार्थ कई त्वचा रोगों को दूर करता है ऐसी बड़ी पुरानी मान्यता है ...मुझे लगता है कि इसके स्लायिम में कोई जीवाणु रोधी तत्व  है जो त्वचा के घावों /रोगों को पूजने में मददगार है ..
भद्दे खुरदुरे  पाँव -तलवों को  को साफ़ करा लो गर्रा मछली से 

एक मछली गर्रा रुफ़ा  इन दिनों और भी चर्चा में है -और इसे भी डाक्टर मछली का दर्जा दे दिया गया है जो पेडीक्योर के लिए खूब इस्तेमाल में लाई जा रही है -पैर /तलवे की फटी बिवाईयों पर यह झुण्ड में टूट पड़ती है और मृत त्वचा को कुतर कुतर कर साफ़ कर देती है ..पैरों का सौन्दर्य निखर उठता है! .

मेरी कोई सिफारिश नहीं है मगर चाहें तो इस्तेमाल में ला सकते हैं इन मछलियों को!  

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