सोमवार, 29 अप्रैल 2013

पात्रता की पहचान

यह हम सभी को पता है कि प्राचीन काल में ऋषि मुनि बिना शिक्षार्थी की पात्रता की अच्छी भली जांच परख किये उन्हें स्वीकार नहीं करते थे .कई पौराणिक कहानियां इस बात को बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत करती हैं . जैसे कर्ण और परशुराम की कहानी को ही ले लीजिये जो कुछ यूं है (साभार विकिपीडिया) -"कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। कर्ण और उसके पिता अधिरथ आचार्य द्रोण से मिले जो उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे। द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि कर्ण एक सारथी पुत्र था, और द्रोण केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे। द्रोणाचार्य की असहमति के उपरान्त कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात किया ............ कर्ण की शिक्षा अपने अन्तिम चरण पर थी। एक दोपहर की बात है, गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद कहीं से एक जंगली कीड़ा आया और उसकी दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा। गुरु का विश्राम भंग ना हो इसलिए कर्ण असहनीय पीड़ा को सहता रहा। कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी, और उन्होनें देखा की कर्ण की जांघ से बहुत खून बह रहा है। उन्होनें कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु डंक को सह ले, और परशुरामजी ने तपबल से सब जान लिया और  कर्ण के   मिथ्या भाषण के कारण उसे श्राप दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उसके काम नहीं आएगी। और यही हुआ युद्ध के समय ऐन वक्त कर्ण का पहिया जमीन में जा  धंसा और वह उसे निकालने में वह ऐसा बेसुध हुआ कि अर्जुन ने सहज ही उसे मार गिराया .

यह कथा यह बताती है कि शिक्षा दीक्षा के मामले में प्राचीन गुरु लोग पात्रता का बहुत ध्यान देते थे और अक्सर यह भी होता था शिष्य को अपना सम्पूर्ण ज्ञान न देकर कुछ अपने पास ही रखते थे ...इन कथाओं का मर्म यही है कि अगर पात्र व्यक्ति का चयन शिक्षा दीक्षा के लिए सही न हुआ तो ऐसा गलत चयनित व्यक्ति प्राप्त दीक्षा का दुरूपयोग कर सकता है  ,खुद अपने ही गुरु के लिए भस्मासुर बन सकता है और खुद अपना नाम बदनाम करने के साथ ही गुरु का नाम भी डुबो सकता था . ऐसा नहीं है कि ऐसी पुराकथाएँ केवल भारत भूमि की हैं . ये चतुर्दिक विश्व की बोध कथायें हैं , ली फाक के प्रसिद्ध कामिक्स श्रृखला मैन्ड्रेक में मैन्ड्रेक का एक जुड़वा दुष्ट भाई भी है जिसने  मैन्ड्रेक के साथ ही साथ गुरु थेरान से शिक्षा पायी ...मगर जहाँ मैन्ड्रेक गुरु से प्राप्त अपनी जादुई शक्तियों से एक समाजसेवी बना वहीं उसका जुड़वा भाई मानवता का दुश्मन बन बैठा और अपने गुरु के लिए भी कष्टकारी बन गया ..गुरु थेरान उसकी पात्रता की जांच में चूक गए ...
आज तो बड़ी विषम स्थति है -पात्रता का चयन बड़ा ही मुश्किल हो गया है .फलतः अकादमीय क्षेत्रों में चेला ही गुरु का कान काट ले रहा है . राजनीति में जिस सीढी से नौसिखिये नेता ऊपर जा पहुंचते हैं उसी को नीचे फेंक देते हैं . पहलवान अपने ही गुरु को धोखे से धूल चटा  दे  रहे हैं . अब परशुराम सी शक्ति तो आज बिचारे गुरुओं में रही नहीं कि अपने पथभ्रष्ट शिष्य को शापित कर सकें ..मगर आजके गुरुओं को पुराने गुरुओं की इस परम्परा को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दीक्षा देने के लिए पात्रता को वे अवश्य देखें -अन्यथा उनका शिष्य उनका ही कान काट खायेगा या नाम डुबो के छोड़ेगा .... अब यह भोगा यथार्थ मुझ जैसे गरीब गुरु से बेहतर कौन अनुभव कर सकता है :-(

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

यह सत्तू का सीजन है -कभी तो आजमाईये!

इस ब्लॉग के पुराने पाठक भूले नहीं होंगे कि मैं कभी कभार बाजार के कुछ नए प्रोडक्ट की चर्चा करता रहा हूँ जो मेरी पसंद के होते हैं और उनकी चर्चा का यहाँ उद्येश्य होता है कि आप भी चाहें तो उन्हें आजमा सकते हैं . मतलब मेरी उन प्रोडक्ट के लिए सिफारिश तो रहती है लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं रहता कि मैं उन प्रोडक्ट को किसी व्यावसायिक निहितार्थ से प्रमोट कर रहा होता हूँ और न ही कम्पनियों/प्रतिष्ठानों द्वारा मुझे सम्बन्धित प्रोडक्ट का ब्रांड अम्बेसडर या प्रतिनिधि ही बनाया गया रहता है . इसी तरह एक प्रोडक्ट मुझे यहाँ राबर्ट्सगंज की बाज़ार में दिखा -जो नया तो नहीं है , है  बहुत पुराना, मगर प्रेजेंटेशन बढियां है -अशोक के सत्तू . आप जानते ही हैं अशोक मसालों का मशहूर ब्रांड है .


सत्तू का नाम ले लीजिये तो किसी भी असली पुरवयिये के मुंह में पानी आ जाता है। यह है ही इतनी शानदार खाद्य सामग्री जिसका बहुविध प्रयोग पुरवयिये करते हैं -यह घोल के पिया जाता है ,अर्ध गीला करके खाया जाता है ,इसकी फंकी लगाई जा सकती है . बाटी के भीतर भर कर पका कर खाया जाता है . और मजे की बात कि मीठा और नमकीन दोनों तरह का सत्तू लोगों को पसंद है . मुझे नमकीन सत्तू पसंद है तो घरवाली मीठे सत्तू की शौक़ीन है . सत्तू का एक पर्व भी है जिसे सतुआ संक्रांति या सतुआन कहा जाता है जिस दिन पूर्वांचल के लोग पूरे आध्यात्मिक भाव से सत्तू का भोग लगाते हैं -अभी कुछ दिन पहले ही यह पर्व यहाँ बीता है

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सत्तू का मुख्य घटक पिसा भुना चना और जौ का आटा है जो एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है . यह एक बेहतरीन अत्यल्प कैलोरी का तुरंता भोजन है -बस पानी और नमक या चीनी /गुड मिलाया और उदरस्थ कर लिए . हर जगहं हर वक्त खाने में सहज है . मेरी एक मित्र हैं मध्य प्रदेश सिविल सर्विसेज में ऊंचे ओहदे पर हैं वे अपनी पर्स में सत्तू रखती हैं और मीटिंग के दौरान भी इसे इस्तेमाल में ले लेती हैं . वे बड़ी फैन हैं इस नायाब खाद्य सामग्री की। इसके बढ़ते  डिमांड को देखते हुए व्यावसायिक प्रतिष्ठान इसका वैल्यू एडीशन कर बाज़ार में आकर्षक पैक में उतार रहे हैं और सेवन की विधि भी लिखी  हुई  है . आज मैंने अशोक के इस  सत्तू ब्रांड का सेवन किया -अच्छा है . आप भी ट्राई कर सकते हैं . बस चार चम्मच एक गिलास में लीजिये ,भुना जीरा,पुदीना पावडर,नमक /चीनी मिलाईये और गटक लीजिये -इस गर्मी में इससे सुस्वादु पेय शायद ही कोई दूसरा हो! कुछ और बेहतर स्वाद आप अपने तरीके से भी कर सकते हैं .अशोक मसाले वालों का यह पेज भी देख सकते हैं .
यह सत्तू का सीजन है -कभी तो आजमाईये!

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

दिल को दहलाती दरिन्दगी

दिल्ली में दुबारा दरिन्दगी की वीभत्स दास्तान ने मन विचलित कर दिया है . इन दिनों मीडिया में ऐसी शर्मनाक घटनाओं का काफी कवरेज हो रहा है -क्या इन घटनाओं में अचानक बेतहाशा वृद्धि हुयी है? ऐसा नहीं है -निर्भया काण्ड के बाद इन घटनाओं को बस ज्यादा कवरेज मिल रहा है . सामान्य मनोविज्ञान ऐसा होता है कि किसी घटना के प्रमुखता से प्रचारित होने पर हम वैसी घटना की आस पास की पुनरावृत्ति की नोटिस लेने लग जाते हैं .पहले भी ये घटनाएँ घट रही थीं मगर मीडिया ने उन्हें निर्भया काण्ड के बाद ज्यादा फोकस और कवर किया है. हाँ मीडिया वीभत्स घटनाओं को कभी कभी और भी वीभत्सता प्रदान कर देता है . मगर अभी घटी दिल्ली की घटना को बयाँ करने में शब्द तक नाकाफी हैं . फिर मीडिया को भी क्या दोष देना? दिल्ली ही नहीं इन दिनों सारे देश से ऐसे समाचार मिल रहे हैं जो संवेदनशील लोगों को अवसादग्रस्त कर देने के लिए काफी हैं . निश्चय ही ये घटनाएं बहुत ही अमानवीय और घृणित है और आश्चर्य होता है कि कुछ नराधम किस सीमा तक जा सकते हैं। मगर ये असामान्य घटनाएँ हो क्यों रही है?
क्या नैतिक शिक्षा का अभाव हो चला है? लोग इंटरनेट पर बिखरी अश्लीलता से प्रेरित होकर ऐसा कर रहे हैं? या ये जन्मजात अपराधी हैं? नैतिक शिक्षा जब ज्यादा प्रभावी रही होगी तब क्या ऐसे वीभत्स यौन अपराध नहीं होते रहे होंगे ? यह यही देश है जहां सद्यजात बच्ची को मार देने के तरह तरह के फार्मूले अपनाए जाते रहे हैं . अजन्में फीमेल गर्भ के समापन में वैज्ञानिक विधियों का दुरूपयोग अब भी थमा नहीं है यद्यपि आज ऐसे कृत्य पर सख्त कानूनी पाबंदी और दंड के प्रावधान हैं . यह सब तो पहले से ही चल रहा है फिर हम किस और कैसी नैतिक शिक्षा की दुहाई दे रहे हैं? वह कितनी कारगर होगी? तो फिर क्या इंटरनेट ,विज्ञापन या फ़िल्में ही इसके लिए जिम्मेवार हैं? कुछ हद तक तो यह हो सकता है मगर इन्हें तो बहुत लोग देखते हैं मगर सभी कहाँ ऐसे घिनौने कृत्य करते हैं? तब? कारण दूसरा है!
न जाने किस  किस मनःस्थिति में  हताशा या आक्रोश में ब्लागजगत में विचित्र बात भी कही गयी एक पोस्ट में कि दरिन्दे यदि चाहें तो बड़े लोगों के साथ दुराचार कर भले कर लें मगर बच्चियों को छोड़ दें -"वे अपनी काम-पिपासा ,अपने हमउम्र वालों के साथ ही शांत करें. इन मासूम बच्चियों को बख्श दें"  इससे तो मुझे मिथकीय कहानियां याद आयीं जिनमें राक्षसों को संतुष्ट रखने और पूरी बस्ती को बचाने को रोज किसी को उसके हवाले कर दिया जाता था -बलि भी इसी मानसिकता की देन है -यह तो हास्यास्पद बात हुयी कम से कम विज्ञान के इस युग में! मुझे लगता है ऐसे कृत्य करने वाले जन्मजात अपराधी हैं . मैंने अपने एक साईंस फिक्शन में भविष्य के एक ऐसे समाज का खाका  खींचा है जो अपराध मुक्त है -मतलब वहां जीरो अपराध हैं .ऐसा इसलिए हो पाता है कि गर्भधारण के एक पखवारे के बाद से ही बच्चे के जींस की स्क्रीनिंग शुरू हो जाती है और समग्र रूप से उनके प्रत्येक विकारयुक्त जीन का विश्लेषण किया जाता है अगर विकारग्रस्त जीन का सुधार संभव हुआ तो ठीक वर्ना उसे जन्म देने की अनुमति नहीं दी जाती . हाँ जन्म लेने के पहले भी कोई भूल चूक की दुबारा तिबारा जांच होती है और अगर कोई आपराधिक जीन तब भी पहचान में आता है तो ऐसे बच्चे को जन्म तो लेने देते हैं मगर उसे एक निर्वासित जीवन के लिए "काला पानी" सदृश द्वीप आदि पर भेज दिया जाता है .मतलब ऐसे जीनिक अपराधियों को मुख्यधारा में रहने का अधिकार ही नहीं होता .
क्या अब हमारे पास सचमुच ऐसा ही विकल्प शेष है ? क्या ऐसी प्रौद्योगिकी जो अब असंभव नहीं रह गयी है के प्रति हम जन समर्थन के लिए आगे आयेगें? जिस प्रकृति के यौन अपराध हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अपराधी जन्मजात विकृतियाँ लिए हुए हैं और मुख्य समाज में उन्हें रहने का कोई हक़ नहीं है! हमें इसका कोई जड़तोड़ इलाज करना ही होगा ताकि न रहे बांस न बजे बासुरी . मुझे इसके अलावा कोई कारगर हल दीख नहीं रहा .क़ानून से डरने वालों के लिए क़ानून है जीनिक अपराधियों पर क़ानून का शिकंजा शायद ही कामयाब हो सके ? क्या सोचते हैं आप ?

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

हंगामा है क्यूं बरपा? डोयिचे वेले पुरस्कारों पर दो टूक!

हिन्दी ब्लॉगर अपनी औकात एक बार फिर दिखा दिए.डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कारों में इस बार हिन्दी के शामिल होते ही बखेड़ा खड़ा हो गया है . जो वैश्विक समुदाय के सामने यह फिर साबित करता है कि हिन्दी वाले और अब खासकर हिन्दी के ब्लॉगर कभी परिपक्व नहीं हुए और न  होंगें .हिन्दी के साथ विवाद का चोली दामन का सम्बन्ध बना हुआ है और शुद्ध हिन्दी में कहें कि यह एक अन्योनाश्रित सम्बन्ध बन गया है . डोयिचे वेले की तरफ से कहीं कुछ गलत नहीं हुआ . और न परिकल्पना की ही ओर  से कुछ गलत था . यह हम हैं जो अपनी निजी खुन्नसों और निहितार्थों के चलते इन्हें विवादास्पद बनाते हैं . हिन्दी भाई कई लोग तो ऐसे होते हैं कि सम्मान पुरस्कारों की तब तक आलोचना करते हैं जब तक कि वही सम्मान उन्हें खुद नहीं मिल जाता . फिर चुप लगा जाते हैं .
डोयिचे वेले अंतर्जाल सक्रियता पर एक वैश्विक पुरस्कार आयोजन पहले से भी करती आयी है .बस इस बार उसमें हिन्दी जुड़ गयी और कुछ श्रेणियों में नामांकन मांगे गए . इसकी पहली सूचना ज्यादातर लोगों को खुशदीप जी की पोस्ट से मिली थी, सक्रिय लोगों ने नामांकन कर दिए . मैं नामांकन के जरिये पुरस्कार -सम्मान के पक्ष में कभी नहीं रहा -यह मुझे भीख का कटोरा लेकर कुछ मांगने जैसा लगता है भले ही कोई दूसरा ही आपका  नामांकन क्यों न करे . मगर यह मेरा अपना बहुत निजी विचार है मगर तमाम चयन की प्रक्रियाओं में यह भी एक प्रक्रिया है और मैं इसी रूप में इसे लेता हूँ . हाँ सम्मान तो जो सम्मान लायक हो -किसी क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया हो उसे अपने स्रोतों के माध्यम से सम्मानकर्ता व्यक्ति /संस्था को चुन लेना चाहिए - मगर नोबेल पुरस्कार तक नामांकन मांगते हैं तो अगर डोयिचे वेले ने भी यही रास्ता अपनाया तो यह उसका निर्णय है,उसकी शर्त है . कतिपय हिन्दी ब्लागरों ने चुपके से अपने ब्लागों को नामित कर दिया या करा दिया . कुछ लोगों ने दूसरे ब्लागों को घोषित तौर पर नामांकित किया -वास्तव में किया या खुद अपना कर गए कौन जानता है? :-)  . अब यह तो भारतीय सूचना आधिकार के तहत डोयिचे वेले से पूछा भी नहीं जा सकता और उसे बताने की भी कोई बाध्यता नहीं है . अब जो ब्लॉग नामांकित हुए होंगें उन ही में से कुछ चयनित भी होने थे सो हो गये. हमें भी शुरू में और अब भी लगता है कि चयनित ब्लागों से कितने ही बहुत बेहतर ब्लॉग छूट गए हैं मगर क्या कीजियेगा जब वे नामांकित ही नहीं हुए . 
एक मैं ही अकेला नकचढ़ा फक्कड़ थोड़े ही हूँ जो खुद नामांकन से दूर रहा . विज्ञान / भ्रमण की कटेगरी में उन्मुक्त सरीखा ब्लॉग जहाँ प्रामाणिक प्रथम स्रोत की जानकारी  लिए है और जहां  बेहतरीन पोडकास्ट भी है  या मेरा अपना साईब्लाग ही है विज्ञान संचार के समर्पित प्रयास हैं . मगर ये तो नामंकित ही नहीं हुये. हाँ तस्लीम को अवश्य नामांकित किया गया  और यह भी एक नियमित ब्लॉग है जिसमें शुरुआती योगदान मेरा भी कुछ कम नहीं रहा -नामकरण,अवधारणा और लगभग सौ शुरुआती पहेलियों जिनसे यह ब्लॉग निगाह में आया- मैं केवल इसलिए इससे जुडा रहा क्योकि आम आदमी तक विज्ञान संचार मेरे अस्थि -मज्जा में समाहित है . इसकी आरंभिक पहेलियों के जरिये ब्लागरों में विज्ञान में अभिरूचि जगाने का बीड़ा मैंने उठाया था -यहाँ यहाँ यहाँ और अनेक पोस्टों में यह इतिहास दर्ज है .
सर्प संसार में आज भी साँपों से जुड़े अपने फर्स्ट हैण्ड अनुभवों को निरंतर साझा करता रहता हूँ . मेरे करीब के लोग जानते हैं कि सापों में मेरी बहुत रूचि है .लोगों को याद होगा एक ब्लॉग भारतीय भुजंग था जिसकी माडरेटर लवली कुमारी हुआ करती थीं मगर उन्होंने पता नहीं किस रुष्टता से यह ब्लॉग बंद कर दिया और मेरे कितनी ही पोस्टें पब्लिक डोमेन से हट गयीं। मैंने उसे अनुरोध भी किया कि मुझसे व्यक्तिगत रुष्टता की सजा आप पाठकों को क्यों दे रही हैं -यह तो अन्याय है पर उन्होंने मेरी एक न सुनी और ब्लॉग ही बंद कर दिया . मैं अंततः  व्यक्ति को महत्वपूर्ण नहीं मानता उसके काम को प्राथमिकता देता हूँ . अब भारतीय भुजंग से मेरी छुट्टी के बाद मुझे शिद्दत से महसूस हुआ कि मेरे वे पाठक बिचारे जो भारतीय भुजंग से जुड़े थे और कितनों के मेरे पास फोन तक आते थे उनके लिए कुछ किया जाना चाहिए .अब चूंकि मैं अन्य तमाम कामों में उलझा रहता हूँ और मेरी दूसरी आदत है लोगों को विज्ञान लेखन में प्रोत्साहित करते रहने का मैंने जाकिर जी से यह अनुरोध किया और इस तरह सर्प संसार अस्तित्व में आया .
खुशदीप जी की ही दूसरी पोस्ट से मुझे बाब्स के लिए हिन्दी की श्रेणियों में चयनित ब्लागों की जानकारी हुयी तो मुझे आश्चर्यमिश्रित आह्लाद हुआ कि अच्छे कार्य कभी न कभी पहचाने जरुर जाते हैं . मैंने तुरंत फोन पर जाकिर जी को बधाई दी , मगर उसके बाद की घटी घटनाएँ मुझे पीड़ित कर गयीं और ऐसे अनुभव मेरे साथ होते ही रहे हैं अनगनित . सो मुझमें इम्युनिटी आ  गयी हैं -हुआ यह कि जाकिर जी के सौजन्य से लखनऊ के अखबारों में जाकिर जी के फोटो सहित यह समाचार छापे  गए कि उनके दो ब्लागों को बाब्स  पुरस्कारों के लिए चुन लिया गया है -आदि आदि , मुझे धक्का लगा -दोनों ही सामूहिक ब्लॉग हैं और ईमानदारी तो सभ्य/अकादमिक जगत में बरती ही जानी चाहिए -खबर तब भी बनती और डॉ जाकिर अली 'रजनीश का सम्मान भी कुछ कम न होता . वैसे भी ब्लॉग के माडरेटर वहीं हैं -बान जाने का उनका ही हक़ है और वे जायेगें भी .सर्प संसार के लिए भी यद्यपि उन्होंने मुझे जाने का आग्रह किया है मगर मैं तो उन्हें ही अधिकृत करता . मगर यहाँ जाकिर भाई से मानव स्वभावगत चूक हुयी। और उसी दिन मैंने अपने स्वभावगत मजबूरी से इस पुरस्कार अभियान से  खुद को तटस्थ कर लिया . मुझे हमेशा आगे देखने की आदत है.
मगर इस मुद्दे पर  फुरसतिया महराज मुझे  कोंचते जा रहे हैं और पोस्ट दर पोस्ट लिखते जा रहे हैं .अजीब सा गलचौर सा माहौल बन रहा है। लाबीयिंग चगल रही है .और तस्लीम तथा नारी को एक दूसरे के नाकारात्मक वोट (नेगेटिव वोटिंग ) मिल रहे हैं -मतलब जिसे नारी (कृपया पढ़ें सुश्री रचना सिंह ) अन्यान्य कारणों से पसंद नहीं है वो तस्लीम को वोट कर रहा है और जिसे तस्लीम(कृपया पढ़ें डॉ जाकिर अली 'रजनीश' ) पसंद नहीं वह नारी को वोट दे रहा है .खेमेबाजी प्रत्यक्ष हो गयी है. काश ये ब्लॉग सकारात्मक वोट ही हासिल करते और इतने खराब भी नहीं हैं  . इस खेमेबाजी के चलते मोर्चाये हुए लिंक भी उभर आये या उधिरा गए हैं जो चिटठा चर्चा की नवीनतम पोस्ट पर देखे जा सकते हैं .
 अब जबकि मैं तटस्थता से निकल आया हूँ तो यह स्पष्ट कर दूं (ताकि कोई मुगालता किसी को न रहे) कि सबसे अच्छे नामंकित हिन्दी ब्लॉग  में मैं तस्लीम को और मोस्ट क्रिएटिव ब्लॉग में सर्प संसार को और निजी ब्लागों में दुधवा लाईव को समर्थन कर रहा हूँ और मित्रों से इन्हें वोट करने की अपील करता हूँ!
अंत में निष्कर्षतः मैं यह अवश्य कहता हूँ कि डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कार के आयोजक धन्यवाद के पात्र हैं और मैं उनका व्यक्तिगत रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने हिन्दी को एक मौका दिया है , उनकी प्रक्रिया में सायास कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं की गयी है -मुझे खुशदीप जी  के इस कथन पर हैरत है कि ये पुरस्कार फिक्स्ड हैं . हाँ एक आदमी अगले चौबीस घंटों में दुबारा वोट कर सकता है और अपनी कई आई डी से कर सकता है यह उचित नहीं है -यह तो फिर थोक के भाव में लोगों से वोट कराने का मामला बन जाता है . मगर यही प्रक्रिया तो और भी भाषाओं के साथ है ! मैं जूरी से अपील करता हूँ कि हिन्दी वालों की हाय हाय से विचलित हुए बिना वे अपने निर्णय को अंजाम देगें!

रविवार, 14 अप्रैल 2013

नवरात्र की शुभ बेला और शक्ति पीठों का सांस्कृतिक पर्यटन (सोनभद्र एक पुनरान्वेषण-६)

कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर अब हम विन्ध्य पर्वतमाला की और बढ़ चले थे. सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों में कैमूर एवं विन्ध्य पर्वत मालाएं साथ साथ हैं। आज भी यहाँ की पहाड़ियां खूब वनाच्छादित हैं -उत्तर प्रदेश के उत्तराँचल विभाजन के बाद सबसे अधिक वन क्षेत्र यहीं है .अकेले सोनभद्र जिले में ही चार डिविजनल फारेस्ट आफीसर(डी ऍफ़ ओ ) के पद हैं जबकि प्रत्येक जनपद में मात्र एक ही डी ऍफ़ ओ होते हैं . इसी से आप यहाँ के वनाच्छादित अंचल  के महत्व का अंदाजा लगा सकते हैं . कभी यह क्षेत्र बहुत दुर्गम था और मात्र आदिवासी और गिरिजन ही यहाँ रहते थे .खान खदान और खनिजों के दोहन के लिए बाकी आबादी बाद में आती गयी .
देखिये विषयांतर होने लगा क्योंकि मैं बात अपने सांस्कृतिक भ्रमण -संस्मरण की करने वाला था . हम मिर्ज़ापुर जनपद की ओर बढ़ चले थे -यह भी बता दूं कि अभी विगत ढाई दशक पहले तक सोनभद्र मिर्ज़ापुर जनपद का ही एक हिस्सा था .बाद में स्वतंत्र जिला बना . हम मिर्ज़ापुर के प्रसिद्ध त्रिकोण दर्शन के अभिलाषी थे. मतलब प्राचीनतम विन्ध्याचल देवी ,अष्ठभुजा और काली खोह स्थान जिन्हें मिलाकर त्रिकोण दर्शन का उल्लेख -महात्म्य है. मेरी दृष्टि इन स्थानों की प्राकृतिक सुषमा ,प्राचीनता के आकलन -अवलोकन का था जबकि साथ के भक्त जनों को देवी के आशीर्वाद -प्रसाद की ज्यादा अभिलाषा थी . मैं अपने लिहाज से इसलिए ऐसे स्थलों को सांस्कृतिक पर्यटन की श्रेणी में रखता हूँ -आप चाहें तो इसे धार्मिक पर्यटन भी कह सकते हैं .

यह तय हुआ कि सबसे पहले हम त्रिकोण के एक कोण पर विराजमान अष्टभुजा देवी का दर्शन करगें  कंस के नाश की उदघोषणा करने वाली देवी यही हैं ऐसा कहते हैं  .गनीमत थी नवरात्र का आरम्भ एक दिन बाद होने वाला था इसलिए भीड़ नहीं थी . प्राकृतिक सौन्दर्य के लिहाज से यह स्थल बहुत रमणीक है -गंगा के किनारे की एक ऊंची चोटी पर मां विराजमान हैं -यहाँ से गंगा जी दिखती हैं और अपनी सुरम्य उपस्थति से मन मोहती हैं . अब यहाँ वाहन  द्वारा बिलकुल मंदिर तक जा सकते हैं मगर बीते दशकों में पैदल चढ़ाई ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था .बगल में खूबसूरत अष्टभुजा गेस्ट हाउस है जो उच्च प्रशासनिक अधिकारियों और माननीयों के लिए प्रायः बुक रहता है . कभी मुख्य मूर्तियाँ पहाड़ की खोह में हुआ करती थीं मगर अब वहां तक पहुँचने के लिए आसान सी सीढियां हैं .मतलब मैं भी मां अष्टभुजा का आराम से दर्शन कर सकता था -इससे उत्साहित मैं परिवार सहित सीढ़ियों से नीचे उतर चला .
 अष्टभुजा देवी के भक्तगण 
मगर यह क्या रास्ते में दुकानदारों और पंडों के नोच खसोट से मन खिन्न होने लगा . दर्शनार्थियों का ये यहाँ बहुविध शोषण करते हैं , एक दुकानदार ने कहा माँ की ओढनी ले लीजिये .चलो ले लिया ,आगे बढ़ते ही दूसरा बोल उठा -माँ की चुनरी ले लीजिये ,अब मुझे इन वस्त्रों का फर्क नहीं समझ आ रहा था मगर धर्म परायण भक्त जन  इसी खरीद फरोख्त में निमग्न रहे  -और यह क्रम माँ के सौन्दर्य -पूजन विधान के हिसाब से चलता ही रहा और मंदिर आ गया -मैं इन सबसे निरपेक्ष माँ  की मूर्तिगत विशेषताओं -पुरातत्व परिवेश को निहार रहा था -
माँ अष्टभुजा के पृष्ठ में अविरल  गंगा 
एक रहस्यात्मक भयमूलक अनुभूति भी निश्चित तौर पर थी वहां जिसका वहां के पण्डे नाजायज फायदा उठाते हैं .दुकानदार द्वारा पूजा हवन सामग्री में विविध वस्तुएं दी गयी थीं और पण्डे उनका उपभोग यहाँ वहां करने को हठ कर रहे थे .पत्नी तो सब मंत्रमुग्ध करती जा रही थीं मगर मुझे कठोर होना पड़ा .  एक और गुफा के भीतर भी कोई प्राचीन मूर्ति थी और पत्नी जी वहां जाने को उद्यत थीं मगर मैंने हठात रोका .  पंडों ने इतना क्षुब्ध कर दिया था मैं सीढ़ियों पर वापस ऊपर बढ़ चला . पीछे मुड़कर देखा तो पत्नी बिटिया भी ऊपर आ रही थीं . बाद में पत्नी ने मुझे बहुत कोसा भी कि  अन्दर वाली गुफा  देवी का दर्शन उन्हें नहीं करने दिया जिन्हें पूजने बचपन में वे अक्सर बड़ी और खडी चढ़ाई चढ़ कर आती थीं . उन्होंने यह सुनाया भी कि आपके साथ तो दर्शन करने आना ही नहीं चाहिए .अब कौन कहे दुष्ट पंडों ने इन स्थानों को दर्शन लायक छोड़ा ही नहीं -ये व्यवसाय के अड्डे बन गए हैं . अष्टभुजा देवी दर्शन के बाद पत्नी जी का चेहरा कान्तिमान लग रहा था -मैंने स्मृति के लिए एक फोटो उतार ली -बिटिया थोड़ी खीझी सी  लग रही है -कुछ मेरा स्वभाव पा गयी है -पंडों और दुकानदारों से वह भी क्षुब्ध थी . 
 काली खोह की माँ काली 

अब हम त्रिकोण के अगले कोण यानि काली खोह मंदिर के लिए चल पड़े -बमुश्किल कुछ किलोमीटर पर -कभी यहाँ एक दुर्गम कन्दरा हुआ करती थी मगर अब तो एक आधुनिक मंदिर हैं यहाँ . वाहन भी मंदिर के गेट तक जा पहुंचते हैं मगर काफ़ी आगे से ही  पण्डे और उनके मुस्तंडे आपके वाहन को साधिकार  रोकने लगते हैं।  आप रुके तो वहीं से काफी पैदल चलना पड़ेगा और जगहं जगहं आपकी जेब ढीली होती जायेगी . मंदिर के अन्दर भी लूट खसोट मची हुयी थी . मैं निर्विकार भाव से दर्शन कर लौट आया .रास्ते में लंगूरों को कुछ चने खिलाया .एक पेड़ की खोह में सचमुच के जीवित हनुमान जी (स्वांग) से बोला बतियाया भी -वह तब तक रुष्ट रहे  जब तक मेरे हाथ में दस रुपये की नोट नहीं देख पाए  -बाद में दयार्द्र होकर मेरे सर पर गदा पटक कर आशीर्वाद दिया -गनीमत रही सर सलामत रहा! इन उपक्रमों से ये सब  दर्शनार्थियों को भयभीत करते हैं . जिससे उनकी बन आती है . इन स्थलों पर निहित स्वार्थों वश पूजा भाव में भय का संचार करना संभवतः सदियों से चला आ रहा है .यहाँ की काली देवी की विशिष्टता यह दिखी कि उनकी जीभ बाहर नहीं निकली थी।  
 प्राचीनतम माँ विंध्यवासिनी(चित्र साभार: माँ विंध्यवासिनी 

अब हम त्रिकोण के शिखर बिंदु पर माँ विंध्यवासिनी के मंदिर की ओर  चल पड़े थे जिनका बहुत महात्म्य वर्णित है -यह अत्यंत प्राचीन पूजा स्थल है यह और नवरात्र में यहाँ भारी भीड़ रहती है -दिल्ली और हावड़ा के बीच की सारी रेलें यहाँ रुकने लगती हैं . मैं विन्ध्याचल देवी का बहुत बार दर्शन कर चुका हूँ इसलिए अपनी कुतिया डेजी जो हर तीर्थाटन में पिछले चौदह वर्ष से हमारे साथ रहती आयी है के साथ ही रुका रहा और बाकी भक्तजन देवी के दर्शन को बढ़ गए . और एक घंटे के बाद ही लौटे . इस प्राचीनतम पूजा स्थल का जिक्र इआन मैकडोनाल्ड ने अपनी प्रसिद्ध विज्ञान कथा-कृति रीवर आफ गाडस  में भी किया है.
 चोपन के निकट माँ वैष्णों देवी का भव्य  मंदिर 
 ऐसा लगता है सोनभद्र और मिर्ज़ापुर के आदिवासियों के मातृसत्तात्मक समाज के चलते ये क्षेत्र देवी पूजा के  विशेष शक्ति पीठ बने होंगे -कई सौ किलोमीटर दायरे के इस आदिवासी बहुल क्षेत्र  में देवी पूजा की प्रधानता है . पिपरी (रेनुकूट) में एक प्राचीन वन देवी का मंदिर भी विख्यात है. हमने इसी सांस्कृतिक यात्रा के अंतिम पड़ाव में उनका भी दर्शन किया मगर सुखद आश्चर्य कि वहां पंडों की लूट खसोट का नाम निशान तक नहीं था .पंडित के हाथ में चढ़ावा देने पर उन्होंने उसे हमारे सामने ही दानपात्र में डाल  दिया . मुझे इस मंदिर में सचमुच प्रशांति का अनुभव हुआ . आप कभी रेनुकूट जाएँ तो दर्शन करें! राबर्ट्सगंज और रेनुकूट मार्ग पर चोपन के पास ही मूल वैष्णो देवी की अनुकृति के एक भव्य मंदिर में भी हमने मत्था टेका .कहते हैं कि जम्मू के वैष्णों देवी के स्थान से प्रदीप्त अग्नि मशाल यहाँ लाई गयी थी .यह मंदिर भी देखने लायक है। बहरहाल शक्तिपीठों के दर्शन का यह सिलसिला वन देवी के दर्शन पर विराम पा गया .

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

सोनभद्र सफारी के वे अविस्मरणीय क्षण (सोनभद्र पुनरान्वेषण श्रृंखला -5 )

झाड़ियों झुरमुटों से रेंगती हमारी जीप अब हमें सोन प्वाईंट ले आयी जहाँ से सोन नदी बहुत सुन्दर दिखती है -ख़ास तौर पर शाम को सूर्य के अस्त होने का नज़ारा बड़ा दिलकश होता है यहाँ .मगर  एक और स्थल बहुत मजेदार है यहीं जिसे इको(echo-point)  प्वाईंट कहते हैं -पारिस्थितिकी वाला इको नहीं बल्कि अनुगूंज वाला इको . यहाँ भी एक विशाल गहरी खायीं हैं जिसके उस पार के पहाडी काफी ऊँची है -यहाँ से आवाज लगाने पर प्रतिध्वनि बिना गुणवत्ता में खराबी के वापस लौटती है -ध्वनि के इस अनुगूंज का आनन्द उठाने लोग आते रहते हैं . हमने भी खूब चीख पुकार मचाई -कई ब्लागरों का नाम लेकर पुकारा और प्रतिध्वनि सुनी? काश एक का नाम वहीं गुम हो गया होता सदा सदा के लिए :-) मगर नहीं मेरी आशाओं को धता बताते हुए वह नाम उतनी ही तेजी से मेरी ओर लपकता हुआ बार बार वापस आया ! यह ध्वन्यात्मक खेल ज्यादा देर नहीं चला और जल्दी ही इसमें रूचि ख़त्म होने को  आयी . अब भूख भी लग आयी थी .हम वापस डांक बगले की ओर  लौटने लगे .
इको(echo-point)

रास्ते में अब तक अनदेखी एक प्यारी सी चिड़िया दिखी . पहले तो वह तीतरनुमा दिखी मगर फिर फुर्र से उड़कर काफी ऊंचाई पर पहुँच गयी -उड़ते वक्त दिखा कि वह जोड़े में थी -तीतर को इतना ऊपर अमूमन उड़ते मैंने नहीं देखा था . इसलिए इस चिड़िया को लेकर जिज्ञासा बढ़ चली . बिटिया ने उड़ने से ठीक पहले जीप के बंद शीशे से ही एक तस्वीर उतार ली थी .आप क्या इस चिड़िया को पहचानने में मेरी मदद करेगें? पेंडुकी/घुघूती /फाख्ता? नहीं नहीं यह तो चेस्ट नेट बेलीड सैंड ग्राउज( भात तीतर ) निकली -थैंक्स सालिम अली ,थैंक्स गूगल!

   कौन सी चिड़िया?   
जीप आगे बढी तो ठीक बीच रास्ते एक गीदड़ साहब आराम फरमाते मिले -हमने उनकी आरामतलबी में खलल डाल दिया था . वे बहुत अलसाए से उठे तो मगर बीच रास्ते ही ठस हो गए -हमारे मुंह से बरबस ही निकल पड़ा बड़ा ढीठ सियार है यह तो! बिटिया को भी फोटो उतारनी थी सो जीप रुकी और उसने इत्मीनान से फोटो उतारने का वक्त दिया -फिर मानो यह मंशा थी  उसकी कि भाई फोटो सोटो  तो उतार ली, अब रास्ता नापो -मगर हमें तो उसी रास्ते से आगे जाना था .लिहाजा कुछ देर की जिच के बाद वे खरामा खरामा  रास्ते से हट के किनारे लग लिए .
 श्रृंगाल सर!

डांक बंगले पर पहुँचने के पहले एक म्यूजियम भी देखा गया -प्राकृतिक चित्रण केंद्र . मतलब नेचुरल हिस्ट्री कलेक्शन सेंटर -यहाँ कुछ दुर्लभ वन्य जीवन के चित्र और मृत जानवरों के संरक्षित अवशेष आदि दिखे -कांसेप्ट तो बहुत अच्छा था मगर इसका विकास उस तरीके से नहीं हो पाया जो इसके संस्थापक की सोच रही होगी -सरकारी सेवाओं में लीक से हट कर कल्पनाशील और सुरुचिपूर्णता लिए कम ही आफीसर होते  हैं . 
 विजिटर्स बुक में भी अपने विचार दर्ज कर दिए ताकि सनद रहे
इस वन्य विहार को व्यावसायिक पर्यटन के एक आकर्षक केंद्र में बदला जा सकता है -प्रवेश शुल्क भी लगाया जा सकता है -एक साथ इतने मनोरंजन के स्थल को संजोये यह वन क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है . एक बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति ही इसे इस दुर्दशा से उबार सकती है . या तो इसे निजी प्रबंधकों को ही सौंप देना चाहिए  . डांक बंगले में हम वन विभाग के स्थानीय सद्भाव,शिष्टाचार से सेवित हुए और धन्यवाद ज्ञापन किया . आज की हमारी सफारी पूरी हो गयी थी . अब हमें सांस्कृतिक पर्यटन पर विन्ध्याचल पहाड़ियों पर पहुंचना था तो हमने कैमूर पर्वत श्रृंखला को टा टा बाय बाय कहा और आगे चल पड़े .

रविवार, 7 अप्रैल 2013

हेरिटेज पर्यटन का एक दिनी आनंद -आईये साझा कीजिये!(सोनभद्र एक पुनरान्वेषण-4)


इन दिनों बच्चे यहाँ राबर्ट्सगंज आये हुए हैं -बंगलूरु से कौस्तुभ और दिल्ली से प्रियेषा तो हम दूनो  परानी के एकाकी जीवन में थोडा स्पंदन हुआ  -इस स्पंदन का परिणाम यह रहा कि हमने एक दिन प्रकृति की गोंद में  गुलजार करने का कार्यक्रम बना लिया -मैंने सोचा एक पंथ दो काज हो जाएगा -सोनभद्र के पुनरान्वेषण की मेरी श्रृंखला के लिए एक और पोस्ट का जुगाड़ हो जाएगा  -यहाँ के कई स्थलों पर जाने को लेकर मंथन होता रहा मगर अंत में महुवरिया जाने को लेकर एका हुयी जो आज भी महुआ के पेड़ों से आच्छादित एक सघन वन क्षेत्र है .पता नहीं आप लोगों के साथ ऐसा होता है कि नहीं मगर मेरे परिवार में सहमति मुश्किल से ही बन पाती है -यह बच्चों को अनावश्यक स्वतंत्रता देने का एक  परिणाम लगता  है  :-( . सबमें सहमति बनने में ही समय और मानसिक ऊर्जा दोनों का काफी अपव्यय हो जाता है .बहरहाल तय पाया गया कि हम महुवरिया स्थित  कैमूर वन्य जीवन अभयारण्य को आज गुलजार करके रहेगें . स्थानीय वन विभाग की मदद ली गयी और उनके एक  स्टाफ को लेकर हम आज भी दुरूह से जंगली क्षेत्र में कृष्ण मृग घाटी की ओर  बढ़ चले . 
 साभार: वेबसायिट -पूर्वी उत्तर प्रदेश पर्यटन ( हम इस दृश्य की फोटोग्राफी कर पाने में कामयाब नहीं हुए ) 

राबर्ट्सगंज से घोरावल मार्ग पर 15 किमी चलकर शाहगंज बाज़ार है जहाँ से बाईं और वनाच्छादित कैमूर पर्वत श्रृंखला  है -सुबह पौने सात बजे चलकर हम साढ़े सात बजे तक जंगल में प्रवेश कर चुके थे -मुख्य आकर्षण था जल्दी से जल्दी कृष्ण मृगों की एक झलक देखना जो बढ़ती गर्मी के साथ शिला खण्डों की  ओट लेने वाली थी और वहां  पहुँच वे फिर नहीं दिखते  .ट्रैवेल एजेंसी  ने इस वन्य पर्यटन के लिए बोलेरो के साथ एक दक्ष ड्राइवर हमें दिया था जो  दुर्गम पहाडी स्थलों पर भी आराम से ऐसे ड्राइव कर रहा था की हमें हैरत हो रही थी -अचानक ऐसा लगता कि सामने तो कोई रास्ता ही नहीं है -मगर वन विभाग का गाईड झाड़ियों के बीच से आगे की राह दिखा देता .करीब 45 मिनट तक चलते रहने के बाद भी एक भी काला मृग नहीं दिखा .हम निराश होते जा रहे थे .

 मृगों को देखने के लिए दूरबीन मुफीद रही 

तभी वनकर्मी ने अचानक वाहन रुकवाई और हमें तुरंत नीचे उतरने को कहा -हिरन हिरन के उच्चारण से हम फ़ौरन गाडी से उतर पड़े -वह दूर के एक उपत्यका की ओर  इशारा कर देखने को कह रहा था -मुझे कुछ नहीं दिखा -मैं कहाँ कहाँ कहता रहा और वह बार बार उंगली का इशारा करते हुए वहां वहां की रट लगाए जा रहा था -बेटे ने पहले देखा और कहा हाँ हाँ है तो वो देखिये . मुझे नहीं दिखा .लगा जैसे आसमान में अभी के धूमकेतु देखने के असफल प्रयास की पुनरावृत्ति सी हो रही हो . मगर यहाँ तो पूरा जमीनी मामला था ...तब तक बेटी ने और फिर पत्नी ने भी देखने की हामी भर ली -मैंने अविश्वास से पत्नी के चेहरे की ओर देखा -वहां हर्ष का उफान देखकर लगा कि वे मृगों को सचमुच देख चुकी थीं -अरे अरे वे तो गिनती भी करती जा  रही थीं -कुल अट्ठारह! अब मुझे एक बहुत नागवार  लगने वाला पराजय बोध  सा हो आया -हुंह! मैंने भी आख्नें उसी ओर गड़ा दीं जिस ओर कई जोड़ी आँखें पहले से उठी हुयी थीं -और लो मुझे भी दिख गया-मगर  बैकग्राउंड में वे ऐसे छुपे से थे कि बिना अभ्यस्त आँखों के उनका दिखना मुश्किल ही था और वे बड़े छोटे भी लग रहे थे .....मैंने दूरबीन की मदद ली जिससे आसमान और परिवेश की ब्यूटी निहारने में अब तक की मेरी प्रवीणता थी  -अब पहली बार वन्य जीवों पर दूरबीन साध रहा था .
 पुष्पित पलाश के  बैकग्राउंड में हमने फोटो खिचवायीं-साथ में डेजी भी ! 

वाह! अद्भुत !! नयनाभिराम !!! यह काले मृगों का एक झुण्ड था -मादाएं ज्यादा थी मगर दो नर थे जो बड़े ग्रेसफुल और मोहक लग रहे थे -उनका काला पृष्ठ भाग और नीचे का सफ़ेद हिस्सा अद्भुत कंट्रास्ट सौन्दर्य प्रगट कर रहा था -उन्हें पता लग गया था कि वे निगरानी में हैं। काले मृग के नर की सींग भी बहुत मोहक होती है।  इन्हें अंग्रेजी में ब्लैक बक - एंटीलोप कहते हैं यानि इनकी सींग कभी नहीं गिरती जबकि हिरणों की सींग हर वर्ष गिर जाती है -हिरन (डीयर ) और एंटीलोप में यही बड़ा फर्क है। अब  मैंने देखना चाहा कि पत्नी की गणना सही थी या नहीं -कम से कम पराजित होने के अनुभव की भरपाई का एक मौका था मेरे पास -मैंने गिनकर उनकी संख्या शुद्ध की और कहा 18 नहीं कुल 19 मृग हैं -उनकी बतायी संख्या से एक ज्यादा . उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया तो मुझे संतोष हुआ ,वैसे दूरबीन तो मेरे ही पास थी और उन्हें फिर से गिनने का मौका मैं देने की मूड में नहीं था . उस दल का नेतृत्व मादा कर रही थी -अचानक ही सबने तेज कुलांचे भरी और ये जा वो जा -जिधर से हम आये थे उधर ही पूरा दल लोप हो गया था ! हम अनिवर्चनीय आनन्द के मोड में थे -यहाँ रक्त पुष्पित पलाश के पेड़ों के बैकग्राउंड में हमने फोटो खिचवायीं -एक मकसद तो पूरा हो गया था . अब क्या? ..  कुछ इसी  मुद्रा में मैंने वन पथ प्रदर्शक की ओर देखा .
                                       गहरी खाईं के छोर पर गुफा चित्रों का रोमांचक स्थल
वह बहुत मितभाषी था और स्थानीय डायिलेक्ट में जो बोल रहा था उसे भी समझने में काफी मशक्कत हो रही थी -जैसे वह भालू को भाल कह रहा था -वह जब भी कुछ कहता हम एक दूसरे के चेहरे को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लग जाते . उसका इशारा अब फिर से गाडी में बैठने के लिए था . अब हम लखनिया गुफा पाईंट पर पहुंचे जहाँ से सैकड़ों फीट नीचे की सपाट और 90 डिग्री की सीधी ढाल पर सोन नदी का विहंगम दृश्य था ....रहस्यानुभूति और रोमांच का भाव उत्पन्न करते इस दृश्य को हम मंत्रमुग्ध से निहारते रहे। हमने केव पेंटिंग्स के बारे में पूछा तो वनकर्मी ने उस सपाट सी बहुत खतरनाक खाईं के किनारे किनारे एक बड़ी सी छतरीनुमा चट्टान के नीचे जाने को कहा -मेरी तो हिम्मत नहीं हुयी -भारी शरीर लिए काफी झुक  कर जाना और वह भी खाईं के आख़िरी किनारे से ..न बाबा न ...जान है तो जहांन है -मगर बच्चे तो देखते देखते आँखों से ओझल भी हो गए और उनके ममत्व में माँ भी कहाँ रुकी -सब आँखों से ओझल बस मैं चिल्लाता रहा संभल के संभल के ....
  बूझो तो जाने! कौन सा जानवर बनाया था उस आदि चित्रकार ने  
उन्हें  गुफा चित्रकारी का आनन्द  लेते छोड़ हमारे पथ प्रदर्शक मुझे लेने लौट आये -मैंने उससे यह तहकीकात की कि पहले कभी भी कोई कैजुअलिटी आदि तो नहीं हुयी -कोई नीचे तो नहीं  गिरा -उसके यह बताने पर कि ऐसी कोई घटना कभी नहीं घटी मैं भी हिम्मत बांध बमुश्किल उंकरु -मुंकरु गुफा में प्रवेश तो कर गया -सामने ही दीवाल पर आदि मानवों द्वारा संभवतः पलाश के फूलों और मिट्टी से बनाएं रंग से भित्ति पर तरह तरह के चित्र उकेरे गए थे- जगली जानवरों के अनेक चित्र थे -बच्चे उनकी फोटो लेने में मशगूल थे -उनकी आनन्दित माँ किसी भी  खतरे से अनभिज्ञ रोमांचित दिख रही थीं  और मैं अपनी और सभी की सकुशल वापसी को लेकर व्यग्र था -आम भारतीय तनिक भी ऐडवेंचर प्रेमी नहीं है -मैं क्या खुद एक प्रमाण नहीं हूँ? बहरहाल धडकते दिल से मैं बाहर आया और फिर एक एक को चिल्ला चिल्ला कर वापस बुलाया -बेटे ने एक गुफा चित्र  फेसबुक पर लगाया है -आप बताईये कौन सा जानवर है -फेसबुक पर कई लाल बुझक्कड़ बूझ चुके हैं -मिजारिटी साही के पक्ष में हैं जबकि संतोष त्रिवेदी सूअर के पक्ष में हैं -आप भी तनिक बताईये -
अगला भाग अगली पोस्ट में !

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

एक अपील!

सदाबहार खुशदीप जी की इस पोस्ट ने मेरा ध्यान सहसा आकर्षित किया जिसमें जर्मनी के प्रसिद्ध रेडियो प्रसारण प्रतिष्ठान डॉयचे वेले (Deutsche  Welle)  द्वारा दिए जाने वाले हिन्दी ब्लागों के नामांकन में तस्लीम और सर्प संसार का उल्लेख था . गहरे संतोष हुआ कि मौलिक विचार और श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जाते .
यद्यपि मुझे चयन का मौका मिला होता तो इन दोनों ब्लागों के बजाय मैं और कहीं ढूंढता भटकता फिरता
और घर में छोरा नगर में ढिंढोरा की कहावत चरितार्थ करता . इसलिए ऐसे निष्पक्ष चयन पर एक तो पहले
विश्वास ही नहीं हुआ मगर आँखें मल मल कर देखा खबर सोलहो आने सच थी . तुरंत 'रजनीश' को बधाई दी।
खबर सुनकर वे आह्लादित हुए उनका मनोबल भी हाई हो गया . 
 तनिक देखिये दोयिचे वेली की जूरी ने  इन दोनों ब्लागों के बारे में  क्या राय जाहिर की है -तस्लीम के बारे में यह प्रतिष्ठित प्रसारण संस्थान लिखता है कि  -
"TSALIM is a science blog/website run by several scientists trying to promote interest in science through their various blog projects." ( तस्लीम एक वैज्ञानिक ब्लॉग/वेबसाईट  है जो अनेक वैज्ञानिकों द्वारा संचालित है और अपने कई ब्लॉग परियोजनाओं के जरिये लोगों में विज्ञान के प्रति अभिरुचि को बढ़ावा दे रही है "
सर्प संसार के बारे में दोयिचे वेली की यह टिप्पणी है -
"A website full of information about snakes made for a country where superstitions about the reptiles abound. World of Snakes works to demystify snakes and do away with irrational beliefs by confronting them with hard, scientific facts. Facts like: no matter what impression Bollywood might try to make, humans cannot turn into snakes and snakes cannot turn into humans."
(एक वेबसाईट जो सापों के बारे में जानकारियों से परिपूर्ण है और ऐसे देश के लिए है जहाँ सरीसृपों के बारे में अंधविश्वासों की भरमार है। सर्प संसार सापों से जुड़े रहस्यों का अनावरण करता है और लोगों में व्याप्त अतार्किक विश्वासों को वैज्ञानिक  तथ्यों के जरिये दूर करता है -ऐसे तथ्य जो भले ही  बालीवुड पर कोई प्रभाव न छोड़ें -  मनुष्य  सांप में और  सांप  मनुष्य में भला कैसे तब्दील हो सकते हैं?
तस्लीम(टीम फॉर साईंटिफिक अवेयरनेस ओन लोकल इश्यूज इन इंडियन मासेज )और सर्पसंसार दोनों मेरे मानस पुत्र हैं-विचार और नामकरण सहित,हाँ अग्रेतर संचालन और प्रबंध जाकिर अली 'रजनीश' जी ने बखूबी संभाला है और वे एक जिम्मेदारी के रूप में  जन विज्ञान संचार के इस मुहिम का निर्वाह कर रहे हैं .यद्यपि दोनों सामूहिक ब्लॉग हैं और मैंने  रचनात्मक योगदान भी दोनों ब्लागों के लिए  किया है मगर सक्रिय  माडरेटर जाकिर जी ही हैं! तस्लीम से कुछ वैचारिक असहमति के चलते मैं अलग हो गया हूँ -तथापि दोनों ब्लॉग मेरे मानस पुत्र हैं -और पुत्र तो मनुष्य की आत्मा का ही प्रतिरूप होता है -आत्मा  वै जायते पुत्रः !
 अंग्रेजी में एक कहावत है न, लेबर नेवर गोज बिहाईंड -सो एक श्रम सार्थक होता दिखाई दे रहा है मगर बिना आपके सहयोग के यह मुकाम तक नहीं पहुंचेगा .यह अपील आपसे है और यह दस्तूर  भी है कि मित्रों की मदद मौके दर मौके माँगी जाय . 
 मित्रों अपने मानस पुत्रों के लिए आपसे सहयोग मांग रहा हूँ -आप अपना वोट इन दोनों ब्लागों के लिए जरुर करिए . वोट कैसे करना है इस बारे में कोई असमंजस हो तो यहाँ जाकर समझ लीजिये -फिर देर काहें कि मित्रता निभाने का वक्त आ पहुंचा है और हम पहली बार आपसे कुछ मांग रहे हैं!

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

मार्च का महीना और वैशाख नंदन

कभी किसी ने कहीं लिखा था कि मार्च महीने में दफ्तरों और सरकारी कर्मियों के आवास के लगे गमलों में फूलों के रंग ज्यादा चटख हो जाते हैं -इशारा साफ़ था कि इन दिनों सरकारी खजाने का मुंह जो वैसे तो   साल भर तक  बंद सा रहता है मगर मार्च महीने के आते ही चौड़ा खुलने लगता है और आख़िरी दिनों में तो अपनी फुल सीमा पर खुल उठता है और करोड़ों अरबों का निस्तारण एक दो दिनों में ही हो जाता है , मगर मुझ जैसे रहीम शहीम और मोहकमाये मछलियान के आफीसर के लिए यह महीना जी का जंजाल बनकर आता है -खासकर महीने की अंतिम तारीख तक वित्तीय स्वीकृतियां मिलती रहती हैं जिनका आहरण 31 मार्च तक कराया जाना अनिवार्य होता है . अन्यथा अधिकारी का गला फंस जाने का  भयपूर्ण माहौल बनने लगता है। हम एक ऐसी ही जहालत में हलकान थे तभी मोबाईल पर फेसबुक में अनूप शुक्ल महराज का अपडेट देखा था तो वे ठीक 31 तारीख का और उस दिन पड़ने वाले इतवार का गुणगान पूरी फुरसत में किये जा रहे थे -अब यह पढ़कर कहीं कुछ जल- भुन (सुलग का प्रीतिकर शब्द ) ही तो गया -मैंने टिपियाया, महराज डी डी ओ होते तो जानते -अब मेरी जो आशंका  थी वह सच निकली कि वे कहीं यह न पूछ लें कि ये डी डी ओ क्या होता है -और लीजिये उन्होंने पूछ ही लिया -मैं जी. के.  की ऐसी अज्ञानता से बहुत चिढ़ता हूँ -तो उन्हें टका   सा जवाब दे टरका दिया कि इसके बारे में सिद्धार्थ शंकर  त्रिपाठी जी से पूछ लीजिये -अब यह उनके लिए हिंट साबित  हो गया -अब इतने समझदार तो हैं ही अपने फुरसतिया शुकुल -तुरंत कहे कि हम प्रोडक्शन वाले आफीसर हैं आहरण वितरण अधिकारी (डी डी ओ ) नहीं -काश यह आपको पता होता अनूप जी तो उस दिन हम जलने भुनने से बच गए होते ....

खैर मुझे पता नहीं कि सिद्धार्थ जी से अनूप जी ने इस बारे कुछ तहकीकात की या नहीं ,नहीं तो सिद्धार्थ जी उन्हें मेरे उस घबराए फोन का जिक्र भी जरुर किये होते जो  एक ट्रेजरी आहरण की समस्या में मैं उनसे मदद मांगी थी -मगर एक ब्लॉगर और एक बड़े खजाने के अधिकारी सिद्धार्थ जी में अंतर तो है ही  - ब्लॉगर धर्म का निर्वाह कर अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद भी वे बोले बतियाये मगर अंत में टका सा जवाब मिल गया कि मेरी समस्या मेरे ही खजाने का अधिकारी दूर करेगा और मैं उन्ही की शरण में जाऊँ -खैर कल रात 10 बजे मामले का निपटारा निरापद तरीके से हो गया .मैंने यहाँ के सिद्धार्थ जी के समकक्षीय सीनियर ट्रेजरी आफिसर श्री राकेश सिंह जो ब्लागरों के दुर्भाग्य से अभी तक ब्लॉगर नहीं हैं का  बहुत आभार व्यक्त किया -काश अधिक से अधिक ट्रेजरी के पदाधिकारी ब्लॉगर हो जाते -इस दिशा में सिद्धार्थ जी के सहयोग की अपेक्षा रहेगी .

ले देकर किसी तरह मार्च बीता तो आज मूर्ख दिवस आ धमका . मैंने उत्साह से फेसबुक खोला कि इस पुनीत अवसर पर अनूप जी कुछ आयोजन किये होंगें मगर वहां तो कुछ दिखा ही नहीं -मैंने तुरत यह अपडेट सटाया- इतना सन्नाटा है क्यों है भाई यहाँ ? तो लोग जैसे सोते  से जागे और सन्नाटे को तोड़ दिया और अभी भी तोड़ते ही जा रहे हैं . मगर आश्चर्य है व्यंगकार भाई आज रहस्यात्मक चुप्पी साधे हुए हैं या फिर आत्मावलोकन में लगे हैं -आपने भी नोटिस किया होगा कि आपके करीब कल तक मुखर रहने वाले कुछ लोग आज सहसा चुप हो गए हैं और कल तक चुप रहने वाले अकस्मात मुखर हो गए हैं -यह आज के पुनीत दिवस का महात्म्य है। वैसे अप्रैल फूल फिरंगियों की देन हैं मगर यह अपनी विरासत छोड़ गया है अन्यथा हमारे यहाँ का ऐसा ही पावन दिवस वैशाख नंदन जी को समर्पित है ,आप इस शख्सियत तो परिचित होंगें ही-न हों तो संतोष त्रिवेदी जी तफसील से बता देगें -हाँ वैशाख नंदन जी का जब समय आएगा तो अपने आप आपको पता चल जाएगा और उनके दिव्य दर्शन भी  हो जायेगें।   वैसे ब्लॉग जगत में एक और सन्नाम शख्स है अपने ताऊ जिनके पास वैशाख नंदनों की अच्छी जमात है। उनसे भी आज ही पूछ लीजिये -क्या आप पूछने जा रहे हैं?? 

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