रविवार, 29 मार्च 2009

इसराजी बुआ नहीं रहीं -एक श्रद्धांजलि !

मैं निर्णय ले नहीं पा रहा कि इस खबर को अपने ब्लॉग की विषय वस्तु बनाऊं भी या नहीं पर उंगलियाँ हैं कि
की- बोर्ड पर थिरकती ही जा रही हैं ,बिना रुके ,बिना थमें और अनिर्णय की ही स्थिति में यह सब लिखा जा रहा है .अभी अभी पत्नी ने बताया इसराजी बुआ नहीं रही -'ओह ' मेरे मुंह से अकस्मात निकल पडा ! और सहसा ही मैं दुखी मन ,संतप्त हो गया हूँ ! पत्नी ने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक से उनकी सहसा ही मृत्यु हो गयी -गाँव के लोगों की बोली भाषा में यह एक शानदार मृत्य थी -बिना बीमारी की पीडा झेले और किसी को परेशान किये वे अचानक ही चल बसीं ! उनकी मृत्यु भले ही "शानदार " रही हो उनका जीवन पीडा और संत्रास की एक अकथ कहानी कहता है !

पहले जान लें इसराजी बुआ कौन थीं ! जब से मैंने होश संभाला श्वेत - वसना इसराजी बुआ को मैंने अपने पैत्रिक गाँव की हर गतिविधि में शरीक पाया -मगर यह भी मार्क किया की उनकी उपस्थिति को लेकर सदैव एक अन इजी फीलिंग लोगों में रहती थी ! इसका एक कारण भी था वे बाल विधवा थीं ! और विधाता उन पर इतना क्रूर था कि व्याह के ठीक बाद ही उनके पति की मृत्यु हो गयी थी -उन्होंने न तो पति और न ही ससुराल का मुंह देखा ! यह बात आज से कम से कम से ७५ वर्ष पहले की है ! तब की रूढियां ऐसी कि उनका पुनर्विवाह नही हुआ क्योंकि उन्हें अपशगुन का ही रूप मान लिया गया ! और तब से वे इस नृशंस और असंवेदनशील ,अन्धविश्वासी समाज में अपनी पहाड़ सी जिन्दगी काटने को अभिशप्त हो गईं ! मुझे याद है कि उन्हें हर अनुष्ठान अवसरों पर लोगों की घोर उपेक्षा ही सहनी पडती -और मुझे आज घोर आत्मग्लानि है कि जो ग्राम्य - परिवेश मुझे मिला था उसी के अनुरूप आश्चर्यजनक रूप से मैं भी उनके प्रति स्नातक होने के पूर्व तक एक अतार्किक उपेक्षा भाव ही रखता था !

ओह समझ गया शायद यही वह कारण है कि आज प्रायश्चित स्वरुप मैं उन्हें यह श्रद्धांजलि देने को विवश सा हो उठा हूँ ! शायद यह श्रद्धांजलि -अर्पण मुझे कुछ राहत दे सके ! वे हमारे मूल गाँव की नही थीं -उनके पिता को मेरे गाँव में कुछ जमीन जायदाद मिल गयी थी जिसे ग्रामीण बोली में नेवासा कहा जाता है ! बाल वैधव्यता का बोझ ढोते हुए वे अपने मूल गाँव से पैदल चल कर लगभग तीन किलोमीटर प्रति दिन मेरे गाँव अपने नेवासा की संपत्ति की देखभाल के लिए बिना नागा आती रहीं -जीवन के अंतिम क्षणों तक ! मेरी माता जी से उनकी अच्छी पटती थी सो अक्सर मेरे पैत्रिक घर पर उनका आना जाना लगा रहता था ! उन्होंने ससुराल का मुंह तो नहीं देखा मगर मुझे मालूम हुआ है कि उनकी अंतिम इच्छा थी कि मृत्युपरांत उन्हें उनके ससुराल अवश्य ले जाया जाय और उसके उपरांत ही उनका दाह संस्कार किया जाय ! उनकी अंतिम इच्छा तो पूरी कर दी गयी मगर जीवन भर इस समाज ने उन्हें जो संत्रास और अकथनीय दुःख दिया उसकी भरपाई भला कैसे हो सकती है !

अचानक ही मुझे आज के समाज में नारी की दशा से जुड़े अनेक विमर्श बहुत सार्थक से लगने लगे हैं ! इसराजी बुआ को मेरी भावपूरित श्रद्धांजलि ! उनके साथ जो हुआ वह किसी के साथ न हो ! और हम यह अपने तई मनसा वाचा कर्मणा सुनिश्चित करें तभी यह प्रवंचित नारी के प्रति की गयी सही श्रद्धांजलि होगी !

सोमवार, 23 मार्च 2009

कहाँ गए भूत भंजक और कहाँ गए भूतनाथ ! ( चिट्ठाकार चर्चा )

जी, सचमुच दो "भूत"अब शायद भूत हो गए ! एक भूत यह जो दरअसल भूत नहीं एक जाबांज भूत भंजक (मैंने प्यार से यही नाम दिया था उसे !) था ,बोले तो भूत विनाशक और दूसरा तो सचमुच पूरा भूत ही था .मगर मुझे ब्लागजगत के इन दोनों भूतों का असमय ही कहीं चला जाना दुखी कर गया है .क्योंकि ये थे तो भूत मगर प्यारे से दोस्त टाईप के भूत थे -एक तो खैर भूत था ही नही भूत विनाशक था मगर चूंकि उसके वजूद के बारे में और कुछ पता नही चल सका था ,वह छद्मनामी था, इसलिए उसकी गणना भी भूत की कोटि में कर ली गयी थी ! पर वह लिखता जानदार था -क्या मस्त मस्त शीर्षक से उसने अपनी बात ब्लॉग जगत में उठाई पर सहसा ही वह कहाँ लुप्त हो गया -यह मेरे लिए चिंता का सबब बन गया ! सच कहूं उसकी लेखनी का मैं फैन था पर लाख चाह कर उसकी असलियत नही जान पाया ! जबकि वह मुझे अच्छी तरह जानने लग गया था !

उसने एक बार मुझे यह भी लिखा की मेरी अमुक रचना -विज्ञान कथा उसने एक पत्रिका में भी पढी है ! मैंने गुजारिश भी की,हे घोस्ट बस्टर भाई अपने बारे में कुछ बताओ ना -मगर वह भी उन्मुक्त जी की तरह ही धुर सिद्धांतवादी निकला और अपने बारे में नही बताना था तो बिल्कुल ही नही बताया और अब न जाने कहाँ गुम हो गया है -आप लोगों में से कोई मुझे उसका कोई अता पता दे सकेगा ? और भूत भंजक भैया तुम अगर मेरी बात सुन रहे हो तो अपने होने का प्रमाण दे देना प्लीज ! बस इतना भर कि तुम ठीक ठाक हो और किसी भूत या भूतिनी ने तुम्हे कैद तो नही कर लिया है ? अभी यह चिट्ठाजगत अबोध शैशवावस्था में ही लगता है -किसी को सुध ही नही है कि कौन यहाँ से कूंच कर गया है -कौन बादर करता है यहाँ और किसे फ़र्क पड़ता है .यहाँ जिन्दों को तो लोग पूंछ ही नही रहे भूतों को कौन याद करेगा !

पर सच कहूं मुझे तो फ़र्क पड़ता है भाई! मुझे लगा कि घोस्ट बस्टर के ब्लॉग और भाई भूतनाथ के ब्लॉग पर अहर्निश टिपियाने वाले तो जरूर उनकी सुध लेगें पर शरद ऋतु बीती और अब बसंत के बाद ग्रीष्म का आतप भी आन पड़ा किसी ने भूल से भी उन प्यारे भूतों की चर्चा नही की या कम से कम मुझे नही पता चला अगरचे किसी ने चर्चा की हो -हम ऐसे ही हो गये हैं शायद ! हम शायद एक अधैर्य से संसार में जी रहे हैं जहाँ किसी को भी किसी की फिक्र नही है ! बस खुदगर्जी का आलम है केवल बेशर्म खुदगर्जी का ! ( माफ़ करियेगा न जाने क्यों आज थोड़ा सिनिक हो गया हूँ ! आप सिनिक को सनक भी कह सकते हैं )

दूसरे असली वाले भूत भाई तो हमें हिटलर की प्रेमिका से दोस्ती की लालच देते रहे और यूनिटी डार्लिंग का ऐसा चरित्र चित्रण किया कि हमारे में से कई भाई उस चरित्र की रूमानियत के चलते उससे आसक्त ही हो लिए ! कईयों ने तो उसमें किसी और मनमाफिक ब्लॉगचरित्र का आरोपण कर फंतासी का पूरा संसार ही बुन डाला ! पर अफ़सोस ऐसी जीवंत लेखनी ने भी सहसा विराम ले लिया और किसी को उसे दुबारा याद करना भी गवारा न हुआ ! क्या यह आभासी जगत ऐसयीच ही है ? यह तो मृत्युलोक की मिथ्याभासिता से भी ज्यादा भ्रामक ,ज्यादा असत्य लग रहा है ! कथित वास्तविक जगत में तो लोगबाग भूले बिसरों को कभी कभार याद भी कर लेते हैं पर यह चिट्ठाजगत तो बहुत ही नाशुकरा निकला !

आज मैंने अपने इन दोनों प्रिय चिट्ठाकारों की चर्चा की -केवल आपको याद दिलाने के लिए और यह पूंछने के लिए कि क्या वे बिसरा देने के ही काबिल हैं ? क्या यह घटना यह इंगित नही करती कि जन स्मृतियाँ सचमुच अल्पकालिक ही होती है ? कितने जल्दी हम अतीत को भूल बैठते हैं ? शायद न तो हम क्षण जीवी हैं और न ही चिरन्तन जीवी ! हम सब शायद अल्पकालिक स्मृति या आत्मरति के ही शिकार हैं !

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

आईये एक लोकोत्सव में चलें !


आठो चैती समारोह
अभी उस दिन मनोज का सुबह सुबह फोन आया , "भैया इस बार आपको आठो चैती समारोह में आना है -पिछली बार आपके न आने से मजा नही आया " आप मनोज से मिले नही हैं उनकी पी आर क्षमता इतनी जबरदस्त है कि अपनी बात से सामने वाले को कब वशीभूत से कर लेते हैं उसे पता ही नही चलता ! अपनी इस नैसर्गिक अमोघ शक्ति का वे गाहे बगाहे अपने सगे सम्बन्धियों पर भी इस्तेमाल करने से नही चूकते और आप जरा भी असावधान हुए तो उनके मोहपाश में बधे ! वैसे तो मैं उनकी इस मारकता से सावधान हो चला हूँ मगर कभी कभी फँस ही जाता हूँ ! जैसा इस बार हुआ और जब तक संभल पाता उनके आत्मीयता से भरी मनुहार में मैंने हामी भर दी !

इन दिनों निर्वाचन की घोषणा के चलते मुख्यालय से बाहर बिना जिला निर्वाचन अधिकारी की अनुमति के प्रस्थान की सख्त मनाही है -बहरहाल आठो चैती का आह्वान और मनोज की मनुहार भारी पडी और मैं लोक परम्परा के इस महोत्सव में भाग लेने को देर शाम से ही आख़िर सपरिवार चल ही पडा .मगर इसके पहले मनोज को आने की हामी के फौरन बाद मैंने चिट्ठाजगत में कुछ लोक गीतों ( फाक सांग्स ) को ढूँढना चाहा तो एक जगह होली गीतों का एक पूरा जखीरा ही मिल गया -सौजन्य अनूप शुक्ल जी और मनीष कुमार जी ! और इसमें भी मैंने जो नायाब मोती चुना वह यह रहा -सौजन्य यूनुस जी !

मैंने इस गीत को मनोज को तुंरत भेजा और शाम तक यह गीत स्थानीय गायक श्री बजरंगी सिंह ने कंठस्थ ही नही किया औपचारिक रूप से गीत सगीत प्रेमियों के सम्मुख सुना भी दिया !और जबरदस्त वाहवाही बटोरी. यह भूत पिशाचों के मुखिया शंकर जी द्वारा एक अनूठे ढंग से होली खलने की अद्भुत संकल्पना है ! आप भी सुन सकते हैं -थोड़ा ध्यान देंगें तो समझ भी लेंगें और होठों पर मुस्कान भी तिर आयेगी ! शंकर जी बिचारे बिना रंगों के ही होली खेल रहे हैं -उनके पास चिता भस्म की झोली और विष पिचकारी से लैस सापों की फौज तो है ही ना और यह होली श्मशान मेंहों रही है -सावधान ,बस सुन भर लीजिये पास जाने की जुर्रत मत कीजियेगा ! अभी आप वहाँ जाने के लिए अर्ह ही कहाँ हुए ?

भाव विभोर श्रोता

बहरहाल आयोजन जबर्दस्त रहा -आठो चैती यानि फागुन के बीतने के बाद के नए माह चैत के आठ दिन भी होली की खुमारी छाई रहती है और इसी उपलक्ष में यह आयोजन पूर्वांचल में लोकप्रिय है और इसमें होली के कई लोक गीत -फगुआ , चौताल ,चहका ,उलारा ,बेलवैया आदि तो मनोयोग से गाये और सुने जाते हैं मगर चैता का भी स्वर भी अब इसमें आ मिलता है ।

यह कार्यक्रम मेरे पैत्रिक निवास पर कब से बिना किसी नागा के नियमित चला आ रहा है मुझेभी ठीक ठीक नही मालूम -मगर खुशी है कि जब अनेक सांस्कृतिक परम्पराएँ मिट रही हैं यह कार्यक्रम अभी भी कहीं जीवंत है -क्या ही अच्छा होता मैं आप को अगली बार बुलाता और आप सभी इस चिरन्तन लोक परम्परा के साक्षी बनते -देखिये अगली बार तक एक ब्लॉगर मीट वहाँ संयोजित हो ही न जाय ! कहते हैं सत संकल्प अवश्य पूरे होते हैं तो क्या आप आयेंगें अगली बार इस लोक परम्परा की रौनक बढानें ?

बुधवार, 18 मार्च 2009

कुछ समाज सेवा भी तो की जाय !

एक बात पहले ही साफ कर दूँ इस पोस्ट को कृपा कर आत्मश्लाघा या प्रचार के रूप में बिल्कुल न लिया जाय -बल्कि उन बातों पर गौर किया जाय जो यहाँ उठायी जा रही हैं .मनुष्य में अपनी जाति रक्षा की भावना कूट कूट कर भरी हुयी है तथापि यह आश्चर्यजनक है कि इसका प्रगटीकरण दुर्लभ सा हो गया है .जिस समाज से हम पल बढ़ कर आगे आते हैं उसे क्या कुछ वापस भी कर पाते हैं -उपकार ,प्रत्युपकार मनुष्य की एक बड़ी विशिष्टता है ! एक और श्रेणी है जो बिना प्रत्युपकार की इच्छा के भी लोगों की सेवा करती है -गीता में ऐसे लोगों को सुहृद शब्द दिया गया है यानी जो प्रत्युपकार की बिना आशा के मानवता का उपकार करता रहे वह सुहृत /सुहृद है ! अजितवडनेकर जी इस शब्द पर अधिक प्रकाश डाल सकेंगें ! अस्तु !


हममें में से तमाम लोग अति क्षुद्रता के स्तर तक उतर कर जीवन भर केवल अपने और बाल बच्चों की क्षुधापूर्ति में रह जाते हैं तरह तरह के हथकंडे अख्तियार करते हैं ,भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहते हैं और यह नही सोचते कि उनका एक और दायित्व है कुछ समाज को देने का भी -समाज सेवा का भी ! वैसे समाज सेवियों के नाम पर सफेदपोशों और दलालों की एक बड़ी फौज हमें दिख जाती है और उनके निमित्त ही इन दिनों एक बड़े अश्वमेध की तैयारी भी जोरो पर है ! मैं उनकी बात नही कर रहा जो समाज सेवा के नाम पर मेवे खा रहे हैं -मैं सीधे आपकी बात कर रहा हूँ जो समाज सेवा के लिए ईमानदार जज्बा तो रखते हैं पर अक्सर यह नही सोच पाते कि शुरुआत कैसे करें , कहाँ से करें ! यह असमंजस सहज ही है पर इससे उबरने का एक आसान सा रास्ता अंगरेजी की एक उक्ति सुझाती है -चैरिटी बिगिन्स एट होम ! यानी हर अच्छे काम की शुरुआत अपने घर से ही क्यों नही ?

चिकित्सक परिचय -डॉ वर्मा बाएँ से तीसरे

और मैंने ,मेरे परिवार ने एक ऐसी ही विनम्र , टिट्टिभ प्रयास अभी कुछ दिनों पहले ही किया है .अवसर था मेरे पितामह पंडित उदरेश मिश्र जी के पुण्य दिवस पर एक निशुल्क चिकित्सा शिविर के आयोजन से जिसमें मेरे जौनपुर स्थित पैत्रिक गाँव तेलीतारा और इर्द गिर्द के गावों के लगभग ३०० रोगियों ने निदान और चिकित्सा ,मुफ्त में औषधियों के वितरण का लाभ उठाया ! चिकित्सा शिविर ही क्यों ? इसके लिए आपको मेरे पितामह के बारे में थोड़ा जानना होगा !

दवाओं की जांच परख
".........मझोले -साँवले कद के पंडित उदरेश मिश्र पित्रिश्री की भांति पूर्णतः भारतीय वेश धारक तो नही थे ,पर पाशचात्यता की आस्थाहीनता एवं आयुर्वेदिक भैषज्य की शक्तिमता को वे भी सकारते थे .वे एक बडे घोडे पर दवा के साथ चलते थे .देखते ही लोग चरण स्पर्श के लिए टूट पड़ते थे ...........उन दिनों नाडी पकड़ते ही शुल्क देयता की प्रथा नही थी -सामान्य औषधियां तो वे बिना किसी प्रतिदान की आशा के ही वितरित करते जाते थे .तब देशी औषधियां धनी लोगों के व्यय पर बनती थी और दीन जनों और साधन हीनों में वितरित होती थी ......अपने क्षेत्र के प्रख्यात वैद्य उदरेश मिश्र का ९० वर्ष की अवस्था में ३ मार्च १९९३ को निधन हो गया ..........." यह शब्द चित्र हैं पूर्वांचल के प्रख्यात कवि साहित्य वाचस्पति श्रीपाल सिंह क्षेम के जो राजेन्द्र स्मृति -डॉ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र स्मृति ग्रन्थ में संग्रहीत हैं !

महिलायें अपनी पारी की बाट जोहती


तो यह कार्यक्रम मेरे बाबा जी की पुण्य स्मृति में आयोजित हुआ .हम लोगों ने इसके लिए पूरे साल भर पैसे बचाए ! कोई ज्यादा नही कोई १५००० रूपये ! योगदान किया -मेरे अनुज डॉ . मनोज मिश्र ,बेटे कौस्तुभ ,बेटी प्रियेषा ने अपने जेब खर्च में कटौती करके ,पत्नी संध्या ने मेरी भावना समझ कर अतीव उदारता दिखा कर मासिक बजट से -सभी ने कुछ न कुछ बचाया और योगदान किया ! पर मेरे कभी रूममेट रहे और कालांतर में के जी एम् सी लखनऊ से एम् डी करने वाले ह्रदय रोग विशेषग्य ,मेरे परम सनेही डॉ राम आशीष वर्मा और उनके चिकित्सीय दल के योगदानके बिना यह सम्भव नही था जिन्होंने मेरे अनुरोध पर इस "नेक" काम के लिए अपनी पूरे दिन की प्रैक्टिस तो छोडी ही दवा कम्पनियों से हजारों रूपये की दवाएं अनुदान स्वरुप दिलवायीं ! जो रोगियों में मुफ्त वितरित हुईं -देखिये आपका कोई अच्छा संकल्प किस तरह लोगों की अहैतुक सहायता से फलीभूत हो उठता है -आज भी अच्छे लोगों की कमी कहाँ है ?

आप भी समाज सेवा की कोई भी छोटी सी शरुआत करें तों ......... मगर बिल्कुल निश्वार्थ .....किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ की भावना से अलग होकर ही ....

अब जरा इन आंकडों को भी देख लें जिन्हें मेरी बिटिया ने तैयार किया है -
शिविर में ५७ प्रतिशत रोगी गठिया और वात रोग से पीड़ित थे ! ब्लड प्रेशर ह्रदय रोग के १७ प्रतिशत ,श्वास रोग फेफडे के १३ प्रतिशत और शेष १३ अन्य रोगों से ग्रसित थे ! महिलाओं की लगभग आधी संख्या थी !

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

चिंता मत कीजिये बनारस में सब अमन चैन है !

बनारस : फिर से अमन चैन वापस !

आज सुबह से ही मुझे ईष्ट मित्रों ,सगे सम्बन्धियों के देश विदेश से फोन आ रहे हैं -यह जानने के लिए की बनारस में क्या हुआ है ? दरअसल बनारस में होली के रंग में थोडा भंग पड़ गया -
टाईम्स आफ इंडिया का यह समाचार शीर्षक देखिये -"Two killed: several hurt in police firing " और अमर उजाला का यह शीर्षक -"शुक्र है पूरे शहर में आग नहीं लगी " अमर उजाला आगे लिखता है कि 'होली के उमंग में बुधवार को लोग रंगों से सराबोर हो रहे थे कि बजरडीहा स्थित एक उपासना स्थल पर रंग के छीटे पड़ जाने से माहौल बिगड़ गया । उत्तेजित भीड़ पथराव करने लगी .कई पुलिस कर्मीं लुहूलुहान हो गये। पुलिस को फायरिंग करनी पड़ गयी -अंततः काशी की धरती को अपने ही दो बेटों के रक्त से स्नानं करना पडा ! हालात को देखते हुए क्षेत्र में १२ घंटे का कर्फ्यू लगा दिया ! ........"
बहरहाल अब स्थिति पूरी तरह सामान्य है और सबसे राहत की बात है कि अफवाहों पर भी विराम लग गया है जिससे कल तक पूरा शहर त्रस्त था ! आज शहर में महामहिम राष्ट्रपति जी भी आयी हुयी हैं जो बी एच यूं में दीक्षांत समारोह में भाग लेंगीं और कल बाबा विश्वनाथ जी के दर्शन पूजन के उपरांत वापस जायेंगीं ! इस तरह जिला प्रशासन के समक्ष दुहरी चुनौती थी -साम्प्रदायिक तनाव से शहर को मुक्त रखना और महामहिम की उपस्थिति में शान्ति व्यवस्था को बनाए रखना ! जिला प्रशासन की प्रशंसा करनी होगी कि अपनी सूझ बूझ से उसने फौरी तौर पर स्थति को नियंत्रित किया ! यहाँ के जिलाधिकारी श्री ऐ के उपाध्याय आई .ए .एस . ने अपनी सूझ बूझ और त्वरित कार्यवाही ,गणमान्य लोगों से मुलाकात ,वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ नगर का गहन भ्रमण करके यथाशीघ्र स्थिति को सामान्य बनाने में प्रशंसनीय भूमिका निभायी !
हम लोगों की होली की छुट्टियां सहसा रद्द हो गयीं -मोबाईल फोन घनघना उठे -ऐसा भी हुआ कि पिचकारी का आधा रंग पिचकारी में ही रह गया और हम सब मौके की नजाकत को भांप कर अपने नियुक्ति स्थानों पर दौड़ पडे ।४८ घंटे से ऊपर बीत गएँ हैं -रात दिन चक्रमण करते गुजरा है -मैं जिस जगह था वह भी अति संवेदनशील रहा -जब तब यह ख़बर आती रही यहाँ वह हो गया वहां यह हो गया पर जाकर देखने पर सब अफवाह ही साबित हुआ !
अफवाहों से माहौल और खराब होता है .यह भी बताता चलूँ कि जिस बात /ख़बर की पुष्टि न हो सके वह अफवाह है !
तो अब सब यहाँ ठीक से है .बाबा की नगरी में पूरी तरह से अमन चैन कायम है ! आप निश्चिंत हो लें और हाँ मैं भी बिल्कुल ठीक से हूँ मगर ड्यूटी से अभी भी मुक्त नहीं -यह आप लोगों का स्नेह है जो बीच बीच में ब्लागजगत में खींच ला रहा है ! इसी के जरिये लोगों को ओके रिपोर्ट भी तो देनी थी ना ?

बुधवार, 4 मार्च 2009

होली है, कबीरा सररररर ! (एक वर्जिन चिन्तन !)

होली का माहौल ब्लॉग जगत में बनने लगा है - और यह संक्रामक है ! दिन चौगुनी रात आठगुनी गति से यह पूरे हिन्दी और भारतीय चिट्ठाविश्व को समेट लेगा -मैं सोचता हूँ कि इस धमाचौकडी के परवान चढ़ने के पहले अपने कुछ निहायत (वाहियात ) किस्म के वर्जिन चिंतन आपसे साझा कर लूँ ! नर नारी कोई संकोच न करें एक तो यह होली की पोस्ट है दूसरे आप दोनों ही जहान के विचार इस मुद्दे पर मौंजू है ! तो आईये इस होली चिंतन में शरीक होईये !

याद है बचपन में जब पूरे गाँव के इज्जतदार बड़े बुजुर्ग गाँव के निर्जन किनारे पर होली जलाने रात में पहुँचते थे तो होलिका दाह कर्म पूरा होने के बाद एक पतला लंबा सा शख्स पता नहीं क्या जोर जोर से गाने सी आवाज में व्यक्त करता था फिर कुछ और लोग भी उसी हुँवा हुँवा में शामिल हो जाते थे ! हर साल का किस्सा यही रहता था ! अब बचपन में यह सब समझ में नही आता था -आठवीं कक्षा के आते आते लैंगिक संदर्भों का मूल ज्ञान होने लग गया था और फिर तो सहसा होली जलाने के बाद के वे समूह गान भी समझ में आने लग गए और मैं बडे बुजुर्गों के सामने शील संकोच से दुहरा होने लग गया -यह गनीमत थी कि उन दिनों होली के प्रकाश के बुझते ही अंधेरे में किसी बड़े बुजुर्ग -बाबा जी ,पिता जी ,चाचा ,काका आदि से आँखे नही मिलती थी और छुपते छुपाते घर आकर कम्बल /रजाई में दुबक लेता था ! अगली सुबह उन सबके सामने भी जाने में हिचक होती थी पर धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता था !

आख़िर उस समूह गान में होता क्या था जिसकी शुरुआत एक वह लीजैण्डरी मैन करता था ? दरअसल वह एक लोक गायन कबीरा की शुरुआत करता था --सुनाने वाले का नाम था बिज्जल जो समाज के कथित निचले वर्ग से थे और लोग उसे सबसे पहले उस लोक गायन की शुरुआत को उकसाते थे ! मत पूँछिये वह कितना अश्लील होता था ! सारे पुरूष और नारी के मूलांगो के अभिधात्मक उल्लेख के साथ ही नर नारी के अनेक गोपन सम्बन्धों ,क्रीडाओं की विविधता और गाँव के फंटूस लोगों लुगायियों के कल्पित सम्बन्धों पर वह तफसरा पेश होता था कि आप यहाँ एक भी झेल नहीं सकते !

जबकि अब यह हिन्दी ब्लागजगत भी ऐसे रूमानी गीत -कबीर /कबीरा के लिए बहुत रिच रा - मटेरियल मुहैया करा रहा है -गाये गए कबीरा में ग्राम्यजन की दमित कामेच्छा शायद एक दिन /रात खुल कर प्रगट होती थीं -और उनकी सेक्स फंतासियाँ भी खुल कर अभिव्यक्त होती थीं ! कोई बिल्कुल भी बुरा नहीं मानता था ! बल्कि उस पल और भी संकोची लोगों को भी कोंच कोंच कर कबीर बोलने को उकसाया जाता था ! कुछ अनगढ़ कबीर बोलने वाले पर ठहाके भी गूजते थे ! किसी को टारगेट भी बनाया जाता था जो सामजिक कामों में हिस्सेदारी के बजाय ज्यादा घर में ही घुसा रहता था !

कबीरा की शुरुआत का वाक्य ही कबीरा सरररर से होता था और अंत भी उसी से ! आज भी यह प्रथा है तो मगर वह जीवन्तता नहीं रह गयी .पिछली बार होली में घर जाने का मौका मिल गया था तो देखा कबीर गाने वाला ही कोई नही रह गया -बिज्जल को स्वर्गवासी हुए भी जमाना गुजर गया ! आज समझ में आता है कि उस एक रात हम परिपक्व होने के पावदान पर अगला कदम रख देते थे ! अनावश्यक संकोच को दूर भगाते थे -वह एक ऐसा रैगिंग सत्र था जो अभिभावकों के ठीक सामने और उनकी देखरेख में होता था -शब्द चित्रों के श्लेष धीरे धीरे समझ में आते जाते थे !

मदनोत्सव की वह शुरुआत सहसा ही याद हो आयी -कबीर की उद्धतता ,साफगोई और बेलौस बोलने के गुणों के चलते उस लोक पर्व के गीत को उचित ही कबीर के नाम पर रख दिया गया ! पर तब भी कथित भद्र लोग उसे बोलने /शुरुआत करने को किसी निचले तबके के बिज्जल सरीखे व्यक्ति को चुनते थे और ख़ुद बडप्पन की आड़ में मजा लेते थे ! माना तो यह भी जाता है न कि होली और रंग वंग हमेशा से निचले तबके का ही त्यौहार रहा है और रोचक तो यह है कि कबीर भी आज गाँव गिरांव के निचले तबके में या तो फिर उच्च विद्वानों में ही ज्यादा प्रिय हैं !
चलिए इस वर्ग भेद को भूल कर हम अपने इस प्रिय ब्लागजगत के सारे गिले शिकवे भूल कर नई स्फूर्ति और चेतना के साथ होली को मिल जुल गले लग जा के आह्वान के साथ मनाएं !
कबीरा सरररर ........!

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