बुधवार, 17 जुलाई 2013

क्या सुबह सुबह हनुमान चालीसा नहीं पढ़ना चाहिए?

अभी परसों ही दिल्ली प्रवासी बहन ज्योत्स्ना(ज्योति )  ने मुझे फोन कर एक अजब सवाल सामने रख दिया . पहले तो यह पूछा कि "प्रात नाम जो लेई हमारा ता दिन ताहि न मिलै अहारा" कहाँ का प्रसंग है .अब मैं मानस का कोई व्यास तो हूँ नहीं कि हर पंक्ति हर दोहा प्रसंग सहित मुझे याद रहे फिर भी सहज बोध से  बता दिया कि सुन्दरकाण्ड का होना चाहिए और हनुमान या अंगद द्वारा कहा होना चाहिए . मगर प्रसंग याद नहीं आ रहा था जबकि यह अर्धाली मुझे बचपन से याद थी ..लगता है उम्र प्रभावी होती जा रही है .संयोगवश मैं नेट पर था तो तुरत फुरत ढूंढ  लिया -यह प्रसंग लंका में प्रवेश करते ही विभीषण हनुमान संवाद का है . हनुमान एक अलग ढंग का घर देखते हैं जहाँ विभीषण का वास है -वे आश्चर्यचकित होते हैं कि राक्षसों के बीच यहाँ कौन से सज्जन का निवास हो सकता है -लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।। फिर शुरू हुए विभीषण -हनुमान संवाद में आगे हनुमान द्वारा होता कही गयी उक्त अर्धाली भी मिल गयी जिसका अर्थ है जो प्रातः  बन्दर (का)  नाम ले लेता है उसे उस दिन भोजन नसीब नहीं होता . मैंने झट से ज्योत्स्ना को प्रसंग बता दिया -थैंक्स अंतर्जाल! ज्योत्स्ना ने कहा कि मैंने तो बहुत खोजा नहीं मिला तो मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया कि यह बड़ा भाई होने का फर्क  है? मगर अब बड़े भाई की मुसीबत होने वाले थी ...ज्योत्स्ना का दूसरा प्रश्न असहज करने वाला था ..

सवाल था तो क्या सुबह हनुमान चालीसा नहीं पढना चाहिए ? अब मुझे पूरा प्रसंग देखना पड़ गया ..आप भी देखिये न… तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।। दोनों रामभक्तों में जान पहचान कुशल क्षेम के बाद यह संवाद हुआ . विभीषण ने कहा कि मैं तो जन्म से ही अभागा हूँ ...मेरा तो यह राक्षस का अधम शरीर ही है और मन में भी प्रभु के पद कमल के प्रति प्रीति नहीं उपजती, आज आप जैसे संत ह्रदय से भेंट हुयी है तो यह तो हरि की कृपा ही है . हनुमान को यह भान हुआ कि विभीषण में अपने राक्षस रूप को को लेकर हीन भावना है . तो उन्होंने खुद अपना उदाहरण देकर उन्हें वाक् चातुर्य से संतुष्ट किया -अब मैं ही कौन सा कुलीन हूँ विभीषण ? और एक बन्दर के रूप में मैं भी तो सब तरह से,तन मन से हीन ही हूँ ..और लोक श्रुति तो यह भी है कि अगर कोई सुबह हमारा नाम(बन्दर का नाम)  ले ले तो उसे दिन भर आहार नहीं मिलेगा!
यहाँ हनुमान की प्रत्युत्पन्न बुद्धि और वाक् चातुर्य स्पष्ट दीखती  है ....विभीषण को हीन भावना से उबारने के लिए उन्होंने खुद अपने बन्दर रूप का उदाहरण दिया और प्रकारांतर से यह कह गए कि तन मन योनि से कोई फर्क नहीं पड़ता अगर प्रभु राम की कृपा हो जाय .प्रभु कृपा से अधम भी पुण्यात्मा बन जाय -मेरा ही देखिये जो कुछ भी मैं हूँ वह प्रभु कृपा से ही हूँ नहीं तो एक बन्दर की क्या औकात थी? "अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर" ...
 प्रभु राम की कृपा जिस पर हो जाय ..अपावन कौए पर हो गयी तो वे महाज्ञानी पावन काकभुशुण्डी बन गए . और मधुर वचन भी बोलने लग गए ..."मधुर वचन बोलेउ तब कागा :-) ....तो सब कुछ प्रभु की कृपा पर ही निर्भर है . अब जिस पर प्रभु की कृपा हो तो उसका नाम तो हर वक्त लिया जा  सकता है .सुबह शाम ..वह तो प्रातः स्मरणीय है और उस पर हनुमान का नाम जो राम के सबसे बड़े भक्त है . ज्योत्स्ना शायद यह पोस्ट तुम्हे संतुष्ट कर सके ...... अन्य मित्रगण भी अपना मंतव्य व्यक्त करेगें तो मुझे अच्छा लगेगा ..जय श्रीराम! 

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

बिचारी कर्मनाशा!

अल्पना वर्मा जी ने मुझसे मेरी इस पोस्ट पर आग्रह किया था कि मैं खुद कर्मनाशा नदी को देखकर आने के बाद एक रिपोर्ट यहाँ डालूँ . वह संयोग कल पूरा हुआ और एक बार फिर मैं कर्मनाशा प्रसंग पर आपसे कुछ तफसील से साझा करना चाहता हूँ . सबसे पहले नदी के बारे में कुछ प्राथमिक बातें! कर्मनाशा नदी का उद्गम बिहार के कैमूर जिले के अधौरा व भगवानपुर स्थित कैमूर की पहाड़ी से हुआ है। यह  बक्सर के समीप गंगा नदी में विलीन हो जाती है।मगर अपने विस्तार में यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ,चंदौली और सोनभद्र जनपदों से गुजरती है और कुल 192 किमी का रास्ता तय करती है .इस नदी के बारे में जो बात हैरान करती है वह है इसका अभिशप्त होना ,अपवित्र होना . जबकि यह पतित पावनी गंगा की ही एक सहायिका है . कहाँ गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति की मान्यता और कहाँ इस नदी के स्पर्श मात्र से संचित पुण्यों के  स्खलित हो जाने का भय आज भी जन समुदाय में व्याप्त है .

अब कर्मनाशा को लेकर एक पौराणिक आख्यान भी आपको बताता चलूँ . सत्यवादी हरिश्चंद्र के पिता व सूर्यवंशी राजा त्रिवंधन के पुत्र सत्यव्रत, जो त्रिशंकु के रूप में विख्यात हुए उन्हीं के लार से यह नदी अवतरित हुयी। वर्णन है कि त्रिशंकु अपने कुल गुरु वसिष्ठ के यहाँ गये और उनसे सशरीर स्वर्ग लोक में भेजने का आग्रह किया। पर, वशिष्ठ ने यह कहते हुए उनकी इच्छा को ठुकरा दिया कि स्वर्गलोक में सदेह जाना सनातनी नियमों के विरुद्ध है। इसके बाद वे वशिष्ठ पुत्रों के यहाँ पहुंचे और उनसे भी अपनी इच्छा जताई। लेकिन, वे भी गुरु वचन के अवज्ञा न करने की बात कहते हुए उन्हें चंडाल होने का शाप दे दिया। सो, वह वशिष्ठ के द्रोही महर्षि विश्वामित्र के यहाँ चले गये और उन्हें उकसाया।  विश्वामित्र ने अपने तपोबल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। इस पर देवताओं ने आश्चर्य प्रकट किया और देवराज इन्द्र ने त्रिशंकु को नीचे धक्का दे दिया । त्रिशंकु त्राहिमाम करते हुए धरती पर गिरने लगे। विश्वामित्र ने ठहरो बोलकर पुन: उन्हें स्वर्गलोक भेजने का प्रयत्‍‌न किया। देवताओं व विश्वामित्र के तप के द्वंद में सिर नीचे किये त्रिशंकु आसमान में ही लटक गये। जिनके मुंह से लार टपकने लगी और उसी से एक नदी का उदय हुआ। कालांतर में  यही कर्मनाशा के नाम से जानी गयी। कर्मनाशा शब्द की व्याख्या करते हुए आचार्य कृष्णानंद जी 'शास्त्रीजी' का कहना है  कि जिस नदी के दर्शन व स्नान से नित्य किये गये कर्मो के पुण्य का क्षय, धर्म, वर्ण व संप्रदाय का नाश होता है, वह कर्मनाशा कहलाती है।( सन्दर्भ:भारत कोश)..

 कर्मनाशा

गंगा के किनारे का वासी होकर जब मुझे यहाँ सोनभद्र आना हुआ तभी कर्मनाशा से साक्षात्कार का भी संयोग प्रबल हो गया था .यहाँ कर्मनाशा पर ही नगवां विकास खंड में एक बड़ा बाँध बना दिया गया है जो अत्यंत घने दुर्गम वन क्षेत्र में है और नक्सली प्रभावित होने से वहां अधिकारियों का आना जाना कम ही रहता है .यद्यपि विगत कई वर्षों से यहाँ कोई वारदात नहीं हुयी है और जंगल क्षेत्र में ही सेन्ट्रल पैरा मिलिट्री फ़ोर्स की एक पूरी छावनी  स्थायी तौर पर स्थापित  है मगर फिर भी वहां राबर्ट्सगंज मुख्यालय से अधिकारियों कर्मचारियों का आना जाना कम ही है . राबर्ट्सगंज से बाँध चालीस किमी पर है . कल सिचाई विभाग के अधिशासी अभियंता श्री के बी सिंह के सौजन्य से मुझे कर्मनाशा पर बने इस बाँध को देखने का सौभाग्य मिल ही गया .कहते हैं जब इसका निर्माण हुआ था तो यहाँ के घने जंगल में बाघ शेर तक प्रायः दिख जाते थे और दीगर वन्य जीवों की तो भरमार थी .ड्राइवर ने हमें वह जगहं दिखाई जहाँ १5 वर्षों पहले सीधे मार्ग पर ही उसने शेर को आराम फरमाते देखा था .खैर .....हम बाँध टाप पर पहुंचे और अवरूद्ध कर्मनाशा का विशाल जलाशय देखा . अधिशासी अभियंता श्री सिंह ने बताया कि इस बाँध के डाउन स्ट्रीम से निकली नहरों से हजारों किसानों की खेती आज हरी भरी है और उनकी आजीविका चलती है .
 नगवां में  कर्मनाशा पर बाँध

फिर यह नदी कैसे अपवित्र हुई? और ऊपर वर्णित आख्यान के पीछे का यथार्थ क्या है? मैं इसी का उत्तर पाने को व्यग्र रहा हूँ . इसी सिलसिले में कर्मनाशा ब्लॉग के लेखक सिद्धेश्वर सिंह जी से बात भी हुयी थी और उनका एक लेख  सृजनगाथा पर मुझे मिला। इसमें उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार शिवप्रसाद सिंह की लम्बी कहानी कर्मनाशा की हार का भी जिक्र किया है . सिद्धेश्वर सिंह जी के बचपन का एक अनुभव है -"मल्लाह को उतराई देने के लिये अक्सर पिताजी मुझे दो चवन्नियां इस हिदायत के साथ पकड़ा दिया करते थे कि इन्हें पानी में नहीं डालना है।क्यों? पूछने की हिम्मत तो नहीं होती थी लेकिन बालमन में यह सवाल  तो उठता ही था कि जब हम गाजीपुर जाते वक्त गंगाजी में सिक्के प्रवाहित करते हैं तो कर्मनाशा में क्यों नहीं? हां, एक सवाल यह भी कौंधता था कि गंगाजी की तर्ज पर कर्मनाशाजी कहने की कोशिश करने से डांट क्यों पड़ती है?" यह एक दृष्टांत ही काफी है यह बताने के लिए कि पौराणिक आख्यान आज भी जन मानस को कितना प्रभावित किये हुए हैं। आज भी बहुत से सनातनी इस नदी में स्नान नहीं करते . मेरी संकल्पना थी कि इसके पानी में हो सकता है कुछ विकारकारी प्रभाव हो और इसलिए विज्ञ पुरखो ने आख्यान की रचना कर  आम कार्य व्यवहार के लिए  इसे  प्रतिबंधित किया हो .मगर मुझे अपनी संकल्पना की पुष्टि के पक्ष में अभी तक तो  प्रमाण नहीं मिले हैं . फिर इस नदी के अभिशप्त होने का कारण?
बाँध से  बना विशाल जलाशय

ऐसा लगता है कि मगध में जब बौद्धों का आधिपत्य हुआ और उन्हें राजाश्रय मिला तो सनातनियों की शामत आ गयी . वैदिक ब्राह्मणों को उपेक्षित ही नहीं निर्वासित भी होना पड़ा होगा .बस प्रतिशोध की एक भाव भूमि तैयार हुयी होगी। लिहाजा गंगा के नित महिमा मंडन के साथ ही कर्मनाशा (जो निश्चय ही इसका मूल नाम नहीं रहा होगा ) का अवगुण वर्णन आरम्भ हुआ होगा क्योंकि कर्मनाशा को पार करने के बाद ही बौद्धों का प्रदेश प्रारंभ हो जाता था।कर्मनाशा अब पतित बन गयी थीं .गया आदि क्षेत्र आज भी प्रेत कर्म पिंड दान आदि के लिए ही घोषित बने हुए हैं .तो यह एक ऐसी घनघोर वैचारिक लड़ाई थी जिसकी भारी कीमत एक नदी को अपनी ख्याति देकर चुकानी पडी . कितना क्षोभजनक है यह? बिचारी कर्मनाशा!

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

कुछ छुट्टा तूफानी विचार -फेसबुक से संकलन!

कई दिनों से शुकुल महराज कोंच रहे हैं कि कुछ लिखते क्यों नहीं( कुछ लेते नहीं के तर्ज पर ) ..उन्हें लाख समझाया कि गंभीर लेखन { :-) } कोई व्यंग लेखन तो है नहीं कि रोज रोज लिख मारा जाय . मगर वे मानते ही नहीं . कल चैट पर आये और बोल भये कि इस मौसम में और कुछ नहीं तो मानस प्रिया पर ही लिख दिया जाय। अब जबरदस्ती और ऐसे रूमानी विषय पर तो लिखा नहीं जा सकता न ....तो सोचा आज आपसे कुछ कुछ उन छुट्टा विचार स्फुलिगों को ही शेयर कर लूं जो विगत दिनों फेसबुक पर डाले हैं . मेरे कुछ ब्लॉग मित्र जो वहां नहीं हैं उनके लिए ये नए लगेगें! ताजे अपडेट से लेकर थोडा पीछे वाले अपडेट दे रहा हूँ .

सबसे पहले ताजा वाला दावा त्याग:

मेरे अपडेट से अनिवार्यतः मेरी सहमति ही हो ऐसा नहीं है -कई बार मैं मैं कई विचार स्फुलिंगों पर साथियों के मत जानना चाहता हूँ ताकि खुद उन पर अपना मत स्थिर कर सकूं ! ये विचार तरंगें सतत अपने परिवेश -पर्यावरण -प्रकृति से आती रहती हैं और मस्तिष्क एक एंटीना की तरह उन्हे कैच करता रहता है . यह एक अनैच्छिक क्रिया है ! चाहें या न चाहें ! कुछ मित्र कभी कभी इस विचार गंगा या/और वैतरिणी से थोडा हतप्रभ से हो जाते हैं कि मैं ऐसा कह रहा हूँ ! सच कहूं तो इदं न मम!
आशय यह कि प्लीज प्लीज यहाँ व्यक्त विचारों से मेरी कोई इमेज मन में न लाई जाय!

अब बाकी कुछ पुराने धुराने

यहाँ (सोशल नेटवर्किंग में ) जल्द ही पता लग जाता है किससे निभेगी और किससे खटकेगी ..और किससे खटक कर भी निभ जायेगी और किससे निभ कर भी खटक जायेगी..
अब कुछ लोग फेसबुक से भी गायब होने लगे हैं -ब्लॉग से गए यहाँ से गए -कौन गली गयो श्याम? (श्याम =जेंडर निरपेक्ष अर्थ में)......

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समकालीन परिदृश्य में संवेदनशील व्यक्ति की समाज में स्थिति बहुत दयनीय हो गयी है -उसे मूर्खता/हेयता /हास्य का पात्र समझ लिया जा रहा है -वह किसी काम का नहीं! और अगर कहीं उसकी कविता -साहित्य में भी रूचि है तो फिर बिचारे की स्थिति और भी दयनीय है! समूची व्यवस्था कितनी नृशंस और दो दूनी चार की ही हिमायती बनती जा रही है !


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मुद्रण माध्यमों की व्याप्ति अब एक अत्यंत सीमित भौगोलिक दायरे तक सिमट कर रह गई है!
यह उनकी एक बड़ी सीमा और सामर्थ्य हीनता बनती जा रही है ..
इसलिए हम डिजिटल मीडिया के कायल हुए जाते हैं और यहाँ अब सब कुछ है ,सब कुछ
यहाँ जो नहीं है वह अन्यत्र भी नहीं है !दिल कहे रुक जा रे यहीं पे.....


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उन लेखकों से सीख लेने चाहिए जो वसुधा वसुंधरा के अनंत मसलों पर निर्बाध और समान गति से लिख रहे हैं और फेसबुक पर लिंक चेप रहे हैं -
सोचकर लिखना? अरे किस युग की बात कर रहे हैं ? अब तो लिखकर भी सोचा नहीं जाता ! बहुत आसान है -एक बार ट्राई करके तो देखिये ! यश उसी से मिलेगा !

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एक स्टडी.के मुताबिक़ भारतीय महिलायें बहुत ज्यादा स्व- और परिवार केन्द्रित होती हैं -दिन रात खुद अपने और बच्चे अपने पति के बारे में ही सोचती रहती हैं जबकि भारतीय पुरुष इसके ठीक उलट हैं! वैसे भी आत्मकेंद्रित होने की कोई हद भी तो चाहिए खासकर जब हम समाज में रह रहे हों और हमारे सामाजिक सरोकार हों!

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मैंने कई फेसबुक मित्रों को मार्क कर लिया है जो मेरे स्टेटस को बस लाइक कर चल देते हैं, भले ही उनमें अर्जेंसी या कोई इमरजेंसी ही क्यों न हो या वे कितने सारवान ही क्यों न हों मगर वही मित्र महिला मुखों के स्टेटस पर आनन्द और मुक्त भाव से टिप्पणियाँ करते हैं लाईक भी करते हैं!
*कुछ लोगों की असहमत होने की जन्मजाति प्रवृत्ति होती है -कुछ भी कहिये वे झट से असहमत हो लेते हैं -मेरे एक मित्र ऐसे ही हैं -
यहाँ तक कि जब मैं उनसे ऊब कर अंततः यह पूछ बैठता हूँ ....
"तो आप इस मुद्दे पर भी मुझसे असहमत हैं? "
उनका जवाब होता है " नहीं तो, बिल्कुल नहीं"
"यानि सहमत हैं? "
"नहीं नहीं" ......
ऊफ ऐसे मित्र !

*
 कुछ लोगों के लिए मित्रता की समझ और परिधि बस इतनी सी है कि आप उनके लिखे को पसंद करते जाईये और वाहवाही में लगे रहिये और जिस दिन भी आप ऐसा करना बंद कर देगें वह दोस्ती का आख़िरी दिन होगा ..
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 हिन्दी ब्लागरी और फेसबुक अपडेटिंग में अध्ययन का अभाव और वर्तनीदोष प्रायः दिखता है -कभी किसी ने कहा था कि एक मौलिक वाक्य लिखने के लिए कम से कम एक पेज और एक पेज लिखने के लिए कम से कम सौ पेज के अध्ययन से गुजरना आवश्यक अर्हता होनी चाहिए !
आज एक कवयित्री का पुनर्पाठ को पुर्नपाठ लिखना बर्र के डंक सा बेध गया है मगर मित्रगण हैं कि कविता की वाहवाही में प्राणप्रण से लगे हुए हैं -मित्रों आप यह क्या कर रहे हैं - उस कवयित्री के लिए यह आपका हर्षगीत है या शोक गीत ?


 

सोमवार, 1 जुलाई 2013

मिथक का मतलब

इंजीनियर शिल्पा मेहता जी ने मुझसे मेरी पिछली पोस्ट पर एक सवाल  पूछा है कि मिथक का मतलब क्या है? अब जब किसी जिज्ञासु ने यह सवाल कर ही दिया तो यह फर्ज  बनता है कि जवाब दिया जाय .यद्यपि मैं जानता हूँ कि शिल्पा जी और मेरी सोच इस विषय पर  भिन्न संस्कारगत और स्वाध्याय के कारणों से अलग है मगर मैं समझता हूँ कि अपनी अल्प बुद्धि से  जो मैं आत्मसात कर सका हूँ वह पूरी ईमानदारी से आप से साझा करूँ! सबसे पहले यह कि मिथक शब्द हिन्दी मूल का नहीं है बल्कि इसे अंग्रेजी के मिथ या माइथालोजी से गढ़ा गया है .मिथक पुराकथाओं,विश्वासों ,चमत्कारिक घटनाओं, पात्रों ,अलौकिक आख्यानों का  ही संबोधन है जिनके सच होने की अनिवार्य प्रमाणिकता न हो। अब जैसे हमारी पुराकथाओं के अनेक स्थान, पात्र  मिथकों की ही श्रेणी में आते हैं .मिथक बोले तो जो 'रियल' यानी वास्तविक न हो . 
 पिछली पोस्ट में मैंने गोवर्द्धन पर्वत के नीचे लाकर गोकुलवासियों को  कृष्ण द्वारा अति वृष्टि से बचाए जाने का एक दृष्टांत दिया था . यह एक मिथक है!अब लोग बाग़ इस पर तर्क कर सकते हैं कि हद है कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं क्या उनके लिए ऐसा संभव नहीं हो सकता था-जिसकी भृकुटी विलास पर सारा ब्रह्मांड लय हो सकता है उसके लिए एक पहाड़ को अपनी उंगली पर  उठाना कौन  सी बड़ी बात?इसी तरह हमारे महाभारत और रामायण काल के कई आख्यान हैं . रावण द्वारा पूरा कैलाश पर्वत ही उठा लेने का मिथक है .नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र के प्रयोग हैं . पुष्पक विमान है।

 पुष्पक विमान:मिथक या सच 

मेघनाथ का माया युद्ध  है,आदि आदि ! क्या ये सब जैसा वर्णित है सच रहे होंगें? अगर आप  इन्हें सच मानते हैं तो बात ख़त्म हो जाती है -हम आपसे आगे बात नहीं कर सकते . क्योकि मेरा तर्क  है कि प्रौद्योगिकी तो तब इतनी विकसित ही नहीं थी (प्रमाण कहाँ है ? ) कि ऐसे गजेट वजूद में होते , हाँ मानव मेधा बहुत उर्वर तब भी थी . उसने अपनी कल्पनाशीलता के घोड़े को बेलगाम दौड़ा दिया . मगर यह कोई कम योगदान नहीं है -आज उन्ही दिव्यदृष्टि प्राप्त विचारकों की राह पर प्रद्योगिकी चल रही है और कोई आश्चर्य नहीं कि एक दिन  हमारे पास सचमुच का पुष्पक विमान हो , माया युद्ध के इंतजाम हों , शत्रु के टारगेट पर मार कर सकुशल वापस लौटने वाले मिसाईल हों जैसे भगवान् राम के बाण उनके तुरीण में लौट आते थे ! मगर ये सब कभी थे यह कहना सच नहीं है बल्कि मिथक है !
हाँ यह माना जा सकता है कि कुछ घटा होगा जिनकी सामूहिक/ जनस्मृति अवशेष आज के मिथक हों . समयांतराल में उनका स्वरुप फंतासी/स्वैर कल्पनाओं से आलोड़ित होता गया हो ! जैसे बहुत संभव है अतिवृष्टि की समस्या से आगाह होकर कृष्ण नामक कोई जन नायक महावृष्टि की किसी आशंका के चलते एक सुरक्षित विशाल कन्दरा ढूंढ ली हो और आपात काल में सबकी रक्षा हो गई  हो .कालांतर में वर्षा के देव इन्द्र के साथ संयुक्त हो यह पूरी घटना अपना मौजूदा  मिथकीय स्वरुप पा गयी हो .
मानव बुद्धि का तकाजा यह है कि वह अपने तर्क की क्षमता का उपयोग करे .फंतासी के पीछे छुपे सत्य को अनावृत करने का प्रयास करे .सभी अलौकिक घटनाओं के पीछे ईश्वरीय भूमिका को सहज ही मान लेना मानव बुद्धि का अपमान है ,उसका तिरस्कार  है . मिथकों ,जनश्रुतियों, लोक कथाओं में अंतर है मगर मिथकों को विराटता मिली है . जो अलौकिक हो, विराट हो ,चमत्कारिक हो वह मिथक है . उसकी दृश्यावलियाँ समकालीन दृश्य से मेल न खाती हों, एक दूसरी दुनिया सी हों .पात्र मानवीय न  होकर दैवीय हों ....स्वर्ग नरक पाताल देवता राक्षस मिथक ही तो हैं! मजे की बात है कि सभी लोक कथाएं तो सच नहीं मानी जाती  मगर मिथकों को कहने सुनने वाले उन्हें सच मानते हैं . स्वर्ग नर्क उनके लिए कोई परिकल्पना नहीं सच है! यह एक बड़ा विषय है .बहुत सी बातें इस छोटी सी पोस्ट की परिधि के बाहर हैं .हम फिर कभी चर्चा करेगें या फिर टिप्पणियों में कुछ चर्चा का विस्तार  हो सकेगा।आप चर्चा के लिए आमंत्रित हैं! 


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