सोमवार, 1 जुलाई 2013

मिथक का मतलब

इंजीनियर शिल्पा मेहता जी ने मुझसे मेरी पिछली पोस्ट पर एक सवाल  पूछा है कि मिथक का मतलब क्या है? अब जब किसी जिज्ञासु ने यह सवाल कर ही दिया तो यह फर्ज  बनता है कि जवाब दिया जाय .यद्यपि मैं जानता हूँ कि शिल्पा जी और मेरी सोच इस विषय पर  भिन्न संस्कारगत और स्वाध्याय के कारणों से अलग है मगर मैं समझता हूँ कि अपनी अल्प बुद्धि से  जो मैं आत्मसात कर सका हूँ वह पूरी ईमानदारी से आप से साझा करूँ! सबसे पहले यह कि मिथक शब्द हिन्दी मूल का नहीं है बल्कि इसे अंग्रेजी के मिथ या माइथालोजी से गढ़ा गया है .मिथक पुराकथाओं,विश्वासों ,चमत्कारिक घटनाओं, पात्रों ,अलौकिक आख्यानों का  ही संबोधन है जिनके सच होने की अनिवार्य प्रमाणिकता न हो। अब जैसे हमारी पुराकथाओं के अनेक स्थान, पात्र  मिथकों की ही श्रेणी में आते हैं .मिथक बोले तो जो 'रियल' यानी वास्तविक न हो . 
 पिछली पोस्ट में मैंने गोवर्द्धन पर्वत के नीचे लाकर गोकुलवासियों को  कृष्ण द्वारा अति वृष्टि से बचाए जाने का एक दृष्टांत दिया था . यह एक मिथक है!अब लोग बाग़ इस पर तर्क कर सकते हैं कि हद है कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं क्या उनके लिए ऐसा संभव नहीं हो सकता था-जिसकी भृकुटी विलास पर सारा ब्रह्मांड लय हो सकता है उसके लिए एक पहाड़ को अपनी उंगली पर  उठाना कौन  सी बड़ी बात?इसी तरह हमारे महाभारत और रामायण काल के कई आख्यान हैं . रावण द्वारा पूरा कैलाश पर्वत ही उठा लेने का मिथक है .नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र के प्रयोग हैं . पुष्पक विमान है।

 पुष्पक विमान:मिथक या सच 

मेघनाथ का माया युद्ध  है,आदि आदि ! क्या ये सब जैसा वर्णित है सच रहे होंगें? अगर आप  इन्हें सच मानते हैं तो बात ख़त्म हो जाती है -हम आपसे आगे बात नहीं कर सकते . क्योकि मेरा तर्क  है कि प्रौद्योगिकी तो तब इतनी विकसित ही नहीं थी (प्रमाण कहाँ है ? ) कि ऐसे गजेट वजूद में होते , हाँ मानव मेधा बहुत उर्वर तब भी थी . उसने अपनी कल्पनाशीलता के घोड़े को बेलगाम दौड़ा दिया . मगर यह कोई कम योगदान नहीं है -आज उन्ही दिव्यदृष्टि प्राप्त विचारकों की राह पर प्रद्योगिकी चल रही है और कोई आश्चर्य नहीं कि एक दिन  हमारे पास सचमुच का पुष्पक विमान हो , माया युद्ध के इंतजाम हों , शत्रु के टारगेट पर मार कर सकुशल वापस लौटने वाले मिसाईल हों जैसे भगवान् राम के बाण उनके तुरीण में लौट आते थे ! मगर ये सब कभी थे यह कहना सच नहीं है बल्कि मिथक है !
हाँ यह माना जा सकता है कि कुछ घटा होगा जिनकी सामूहिक/ जनस्मृति अवशेष आज के मिथक हों . समयांतराल में उनका स्वरुप फंतासी/स्वैर कल्पनाओं से आलोड़ित होता गया हो ! जैसे बहुत संभव है अतिवृष्टि की समस्या से आगाह होकर कृष्ण नामक कोई जन नायक महावृष्टि की किसी आशंका के चलते एक सुरक्षित विशाल कन्दरा ढूंढ ली हो और आपात काल में सबकी रक्षा हो गई  हो .कालांतर में वर्षा के देव इन्द्र के साथ संयुक्त हो यह पूरी घटना अपना मौजूदा  मिथकीय स्वरुप पा गयी हो .
मानव बुद्धि का तकाजा यह है कि वह अपने तर्क की क्षमता का उपयोग करे .फंतासी के पीछे छुपे सत्य को अनावृत करने का प्रयास करे .सभी अलौकिक घटनाओं के पीछे ईश्वरीय भूमिका को सहज ही मान लेना मानव बुद्धि का अपमान है ,उसका तिरस्कार  है . मिथकों ,जनश्रुतियों, लोक कथाओं में अंतर है मगर मिथकों को विराटता मिली है . जो अलौकिक हो, विराट हो ,चमत्कारिक हो वह मिथक है . उसकी दृश्यावलियाँ समकालीन दृश्य से मेल न खाती हों, एक दूसरी दुनिया सी हों .पात्र मानवीय न  होकर दैवीय हों ....स्वर्ग नरक पाताल देवता राक्षस मिथक ही तो हैं! मजे की बात है कि सभी लोक कथाएं तो सच नहीं मानी जाती  मगर मिथकों को कहने सुनने वाले उन्हें सच मानते हैं . स्वर्ग नर्क उनके लिए कोई परिकल्पना नहीं सच है! यह एक बड़ा विषय है .बहुत सी बातें इस छोटी सी पोस्ट की परिधि के बाहर हैं .हम फिर कभी चर्चा करेगें या फिर टिप्पणियों में कुछ चर्चा का विस्तार  हो सकेगा।आप चर्चा के लिए आमंत्रित हैं! 


82 टिप्‍पणियां:

  1. सर बहुत ही सुन्दर ढंग से आपने मिथक को समझाया है |आभार

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  2. किसको कितना सच माने हम, सबने ही फैलायी बातें,
    रात छिपाये दिन निकला या निगल गयी दिन काली रातें।

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  3. मिथ की परिभाषा मेरी दृष्टि से तो आपने ठीक दिया है .इस दृष्टि देखे तो रामायण ,महाभारत आदि के आधे से ज्यादा कहानिया मिथ है ,यह काल्पनिक है ,अतिशयोक्ति का भरमार है.आपने सही कहा, "अपने तर्क की क्षमता का उपयोग करे .फंतासी के पीछे छुपे सत्य को अनावृत करने का प्रयास करे .सभी अलौकिक घटनाओं के पीछे ईश्वरीय भूमिका को ही सहज ही मान लेना मानव बुद्धि का अपमान है ,उसका तिरस्कार है ."
    latest post झुमझुम कर तू बरस जा बादल।।(बाल कविता )

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  4. ...मिथक किसी भी तर्क-वितर्क से परे होता है !

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    1. ."..मिथक किसी भी तर्क-वितर्क से परे होता है !"
      यह भी एक अहमकाना तर्क है !

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  5. जीवन का ताना बाना इन मिथकों से भी जुड़ा है | बदलते समय के अब तार्किक बातें तो होती ही हैं,

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  6. मेरी समझ से, मिथक या उसके करेस्पोंडिंग "मिथ" जिससे "मायथोलोजी" बनी, और उसी "मायथोलोजी" कि कुछ बातों का आपने ऊपर वर्णन किया है |

    एक बहुत बढ़िया डिबेट होती है अक्सर हमारे यहाँ कंपनी में , इन्नोवेशन बनाम इन्वेंशन , मुझे ये धर्म-ग्रन्थ बहुत उच्चकोटि के विचारों के संग्रह लगते हैं जिनमे ऐसी कल्पनाएँ की गयीं जो औलोकिक लगें, और उनपर भगवान की कृपा बताई गयी |

    "whatever human mind can perceive, it can achieve" वाले तर्क से देखें तो इन्हें वक्त के साथ अचीव किया जा सकता था , और शायद वही भगवान को पाने का तरीका होता, पर अपने यहाँ उसका दूसरा हिस्सा देखा गया | हम "Praise the Lord" की धुन पर आगे बढ़ गए , और एक बहुत बढ़िया "इन्नोवेशन" का स्त्रोत, "मिथक" बन के रह गया |

    उदाहरण के तौर पे , "लिओनारदो द विंची" की पेंटिंग , जिसे पहली फ़्लाइंग मशीन का कांसेप्ट कहा जाता है , दरसल हमारे यहाँ भी "उड़नखटोला" का वर्णन कुछ ऐसा ही था , पर वो लोग उड़ने वाला जहाज बना ले गए , उन्होंने "इन्वेंशन" की तरह लिया | हमने पहले भगवान की माया , बाद में फ्रस्ट्रेट होकर "मिथक" कह दिया !!!

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    1. मिथक का यथार्थ स्वरूपण!!,देवांशु निगम जी, ".......बाद में फ्रस्ट्रेट होकर "मिथक" कह दिया !!!"
      पढे लिखे होकर भी बोडम में न खप जांय, मिथक कह छूट लेने में ही बुद्धि की बलिहारी है. :)

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    2. बहुत अच्छी व्याख्या देवांशु ! लडके काम के हो यार !
      मिथक नामकरण तो बुद्धिजीवियों है दिया है ,बौड़म तो आज भी इसे भगवान् की लीला ही मानते हैं !

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    3. निश्चित ही 'मिथक' नामकरण भाषाविदों व बुद्धिजीवियों द्वारा ही दिया गया है. और इसीलिए ही उससे आगे के कतारबद्ध आने वाले बुद्धि-जीवियों के लिए,आनन-फानन 'मिथक' शब्द प्रयोग से, सार्थक निर्थक के भेद की मगजमारी से छुट्टी मिल जाती है.ऐसा अंधानुकरण सब जगह है,आपकी बात सही है,कुछ बौड़म सभी बातों को 'भगवान् की लीला' मानते है. लेकिन बुद्धिमत्ता का मूल प्रयोग यह है कि कहीं हमारी गणना 'भगवान् की लीला' मानने वाले बौड़म में न कर ली जाय, क्यों न मगजमारी किए बिन बुद्धिजीवी प्रदत्त शब्दानुकरण के सुरक्षित क्षेत्र में रहा जाय!!!

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    1. या फिर सामूहिक स्मृति शेष ऋषभ जी !

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    2. सामूहिक स्मृति यानी "मिथक "सिर्फ कल्पना नहीं थे !!

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    3. जी चर्चा से तो यही लग रहा है!

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  8. मुझे तो लगा था कि आप मिथक को मिथ्या से निकला बतायेंगे :)

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    1. बात तो काबिले गौर है -मिथक ,मिथ,मिथ्या ,माईथोलोजी सब एक ही ही चट्टे बट्टे हैं

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  9. चाहे ईश्वर की लीला ना माने कोई , प्रकृति ने तो अपनी लीला दिखाई है अभी ही !!

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  10. गल्प भविष्य की आहट हैं और मिथक बीते समय की अतिश्योक्ति मिश्रित स्मृतियां हैं। जिन्हें नितांत कल्पना कह देने से किसी भी ऊर्वरा बुद्धि की गति अवरुद्ध हो जाएगी।

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  11. शायद इसीलिए यूलीसिस में लिखा गया है कि इतिहास वह दुःस्वप्न है जिससे मैं बचना चाहता हूँ जो गंगा माँ थीं, उसे मिथक बना दिया गया और वो नये इतिहास प्रेमियों के लिए नदी रह गई लेकिन अधिकतर लोग खुशकिस्मत हैं जिनका पाला मिथक शब्द से नहीं पड़ता, वे अपने सपनों की दुनिया में जीते रहते हैं।

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  12. जिसका कोई प्रमाण न हो , वह मिथक ही कहलायेगा। गीतानुसार श्रीराम त्रेता युग में हुए यानि लाखों साल पहले जबकि श्रीकृष्ण द्वापर के अंत में यानि करीब पांच हज़ार साल पहले। महाभारत काल के अवशेष तो मिलते हैं यदि इन पर यकीन किया जाये , लेकिन लाखों साल पहले कहाँ अयोध्या थी , कहाँ मंदिर , कहाँ लंका -- आदि प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं प्रमाण सहित।

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    1. नहीं नहीं डॉ साहब उत्तर है शिल्पा मेहता जी और सुज्ञ जी के पास -आपने ऐसा कह कैसे दिया ?

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  13. १.
    @@. यद्यपि मैं जानता हूँ कि शिल्पा जी और मेरी सोच इस विषय पर अलग है
    AGREE . १००%. बिलकुल अलग है - बल्कि ठीक विपरीत है।
    ------------------
    २.
    @@. पूरी ईमानदारी से आप से साझा करूँ!
    आपको पूरा अधिकार है अपने views बनाने का / रखने का / साझा करने का ।
    ------------------
    ३.
    @@ सबसे पहले यह कि मिथक शब्द हिन्दी मूल का नहीं है बल्कि इसे अंग्रेजी के मिथ या माइथालोजी से गढ़ा गया है .मिथक पुराकथाओं,विश्वासों ,चमत्कारिक घटनाओं, पात्रों ,अलौकिक आख्यानों का ही संबोधन है जिनके सच होने की "अनिवार्य" प्रमाणिकता न हो।
    agree
    ------------------
    ४.
    @@ अब जैसे हमारी पुराकथाओं के अनेक स्थान, पात्र मिथकों की ही श्रेणी में आते हैं .
    DISAGREE. अनेक स्थान मिथक की श्रेणी में आते होंगे लेकिन सभी कुछ मिथक है ऐसा मुझे नहीं लग्ता।
    ------------------
    ५.
    @@ मिथक बोले तो जो 'रियल' यानी वास्तविक न हो .
    शब्द का अर्थ यह हो सकता है ।
    -------------------
    ६.
    @@ पिछली पोस्ट में मैंने गोवर्द्धन पर्वत के नीचे लाकर गोकुलवासियों को कृष्ण द्वारा अति वृष्टि से बचाए जाने का एक दृष्टांत दिया था .
    जी आपने यह दृष्टांत दिया तो था ।
    -------------------
    ७.
    @@ यह एक मिथक है!
    DISAGREE .
    इसके लिए (आपके नजरिये से असहमत होने के लिए ) आप मुझे पहले ही बौड़म इत्यादि की उपाधियाँ नवाज़ चुके है।
    **पहली बात तो यह है कि मैं आपको (या किसी भी और को) ऐसा कोई अधिकार नहीं देती कि मुझे कोई भी (अच्छी या बुरी) उपाधि दें ।
    **उपाधियाँ / अवार्ड्स आदि देने के लिए प्रामाणिक संस्थाएं होती है। कोई भी मन मर्जी से किसी को कोई उपाधि देने या न देने की योग्यता नहीं रखता। मेरे पास बेस्ट स्टूडेंट / यंग साइंटिस्ट / गोल्ड मैडल / बेस्ट रिसर्च पेपर / बेस्ट स्पीकर आदि आदि की इतनी उपाधियाँ हैं / प्रमाण पात्र पड़े हुए हैं कि उन्हें मैं गिन भी नहीं सकती । तो मेरे वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक होने के लिए मुझे सेल्फ अपोइन्टेड वैज्ञानिकों से नवाजे हुए अप्रामाणिक प्रमाण पत्रों की आवश्यकता नहीं है।
    **इस दुनिया में कुछ लोग हैं जो इश्वर को मानते हैं कुछ जो नहीं मान्ते। कुछ लोग राम कृष्ण आदि को अवतार मानते हैं तो कुछ उन्हें महामानव और कुछ उन्हें काल्पनिक कहानियों के काल्पनिक पात्र मानते हैं । मुझे इन में से किसी भी श्रेणियों के लोगों के विचारों से कोई प्रॉब्लम नहीं है।
    **लेकिन मुझे दुसरे लोगों के विचारों पर अवांछित कुठाराघात करनी की प्रवृत्ति बहुत ही नीच लगती है।
    **अपनी बात को सही साबित करने और विरोधी को चुप कराने के लिए विरोधी पक्ष के व्यक्ति को अपशब्द कहना, अपमानित करना मुझे बहुत ही तुच्छ attitude लगता है।
    **हो सकता है किसी विषय पर आप और मैं असहमत हों, किसी पर सहमत हों।
    **किन्तु अपने आप को इतना "सर्वज्ञानी" मान लेना / यह मान लेना कि "मैं" ही सही हूँ / दूसरा पक्ष ही गलत है / "मुझे" जो सही लगे उसके साथ जो असहमत हों वे सब मूर्ख हैं / "मुझे" यह निश्चित करने का अधिकार है कि कौन समझदार है / वैज्ञानिक है / अवैज्ञानिक है / बौड़म है - यह सब सोचना / कहना सिर्फ अहंकार की निशानियाँ हैं - इस से कोई किसी से उच्च सिद्ध नहीं हो जात।

    continued ....

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  14. continued from previous comment

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    ८.
    @@ अब लोग बाग़ इस पर तर्क कर सकते हैं कि हद है कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं क्या उनके लिए ऐसा संभव नहीं हो सकता था-जिसकी भृकुटी विलास पर सारा ब्रह्मांड लय हो सकता है उसके लिए एक पहाड़ को अपनी उंगली पर उठाना कौन सी बड़ी बात?
    - हाँ जो लोग कृष्ण को भगवान मानते हैं वे यह कह सकते हैं । उन्हें अपना नज़रिया रखने का पूरा अधिकार है - उतना ही जितना आपको अपना नज़रिया रखने का । भारत के संविधान ने हर एक को यह आज़ादी दी हुई है।
    --------------------
    ९.
    @@अगर आप इन्हें सच मानते हैं तो बात ख़त्म हो जाती है -हम आपसे आगे बात नहीं कर सकते .
    बात करना और अपनी बात को मनवाने / सर्वोपरि रखने की जिद पकडे पकडे बात करना - ये दोनों बहुत अलग बातें हैं ।
    --------------------
    १०.
    @@ क्योकि मेरा तर्क है कि प्रौद्योगिकी तो तब इतनी विकसित ही नहीं थी (प्रमाण कहाँ है ? ) कि ऐसे गजेट वजूद में होते
    -- आप तर्क रख रहे हैं? या निर्णय दे रहे हैं ? यदि आप स्वयं को ही न्यायाधीश के पद पर विराजमान कर रहे हैं, तब तो वकील बन कर तर्क रखना सिर्फ एक दिखावा है । और यदि आप वकील बन एक पक्ष के तर्क रखते हैं तब आपको न्यायाधीश बन कर फैसला लेने का अधिकार नहीं ।पहले आपको सुनिश्चित करना होगा की आप वकील बन रहे हैं या न्यायाधीश ।
    ---------------------
    ११.
    @@ हाँ मानव मेधा बहुत उर्वर तब भी थी .
    शुक्र है आपने यह तो माना कि लोग मेधावी थे ।
    ---------------------
    १२.
    उसने अपनी कल्पनाशीलता के घोड़े को बेलगाम दौड़ा दिया . मगर यह कोई कम योगदान नहीं है -
    कल्पना के घोड़े अक्सर बेलगाम ही दौड़ते है।
    ---------------------
    १३.
    @@. आज उन्ही दिव्यदृष्टि प्राप्त विचारकों की राह पर प्रद्योगिकी चल रही है
    नहीं - प्रौद्योगिकी अपनी राह पर चल रही है । अभियंता पुरानों को पढ़ कर खोजें नहीं -करते वे अपने वज्ञानिक ज्ञान को बढाते और निखारते है।
    ---------------------
    १४.
    @@ मानव बुद्धि का तकाजा यह है कि वह अपने तर्क की क्षमता का उपयोग करे
    बिल्कुल। लेकिन एक पक्षीय निर्णय सुना देना ?
    ---------------------
    १५
    @@ यह एक बड़ा विषय है
    agree

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    उत्तर
    1. मैंने तो आपकी जिज्ञासा का पूरी विनम्रता और अकादमीय ईमानदारी से जवाब दिया था मगर इसमें आपको मेरी "नीचता"( आपने कहा -प्रवृत्ति बहुत ही नीच लगती है।) , तुच्छता( तुच्छ attitude) ,अहंकार(अहंकार की निशानियाँ)
      नज़र आ गया ..... मैंने आपको व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं कहा मगर पता नहीं किस गिल्ट और संशय से आपने मुझे
      व्यक्तिगत तौर पर इतने विशेषण गिफ्ट कर दिए :-) बहरहाल यह गौण है ! विषय की समझ का मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है!
      आप और सुज्ञ सरीखे कुछ लोग अमेरिका में सृजनवाद का फटा ढोल पीट रहे हैं ! और कानूनन इस विषय को पाठ्यक्रम में डलवाने को अड़े हुए हैं !
      मेरा कोई प्रायोजित मकसद नहीं रहता -विज्ञान संचार हाबी है तो जो कुछ अल्प ज्ञान हासिल होता है उसे बांटने का प्रयास करता हूँ -अब इसमें आपको कहाँ से अहंकार दिख गया समझ में नहीं आया
      सुज्ञ जी से तो मैं पहले से ही तोबा कर चुका हूँ - जनाब ऐसी छद्म धर्म की सधुक्कड़ी सरीखी भाषा का इस्तेमाल करते हैं कि यह प्रगट होता है जैसे प्रकांड विद्वान् हैं -पता नहीं उनकी शिक्षा क्या है (स्वाध्याय तो मैंने देख ही लिया है ) मगर आप पर तो इस गरीब देश का काफी पैसा खर्च हो गया है -इंजीनियर हैं . थोडा अध्ययन का दायरा बढाईये -शिक्षक भी हैं तो यह जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है ! कभी कभार विकीपीडिया पर भी नज़र डाल लिया करिए -उसी पर माइथालोजी खोजिये और डालिए -नहीं तो जोसफ कैम्पबेल को पढ़िए -मिथक क्या है जान जाईयेगा .कभी कभी लगता है अप जैसे लोग विज्ञान की तो कम मगर हिन्दू धर्म दर्शन का बहुत बड़ा नुक्सान कर रहे हैं जो माफ़ करने योग्य नहीं है!
      तुलसी की अर्धाली याद आ रही है -
      मूरख ह्रदय न चेत जो गुरु मिलैं विरंचि सम !

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    2. अरविंद जी
      छद्म वद्म भाषा कुछ नहीं है, यह सच है शिक्षा भी नहीं है. प्राथमिक शालाओं में कभी पढा था विद्या से विनय आता है, शिक्षा से विनम्रता में वृद्धि होती है. यदि शिक्षा का यही परिणाम है तो हम अशिक्षित ही ठीक है.

      आवेश में आपने उस स्थल पर से नियंत्रण खो दिया है जहाँ शिक्षा बिराजमान होकर अपना औचित्य सिद्ध करती है. स्वस्थ चर्चा पर स्थिरता नहीं हो पा रही तो कुछ समय चर्चात्मक विषयों से परहेज कीजिए. हाथ से विनय और विवेक दोनो जा रहे है. आप और प्रवीण जी हताश निराश विषाद में अनर्गल होते जा रहे है,सधुक्कड़ी, उलजलूल, हिंदुधर्म,गेरुआ पता नहीं क्या अल्लम गल्ल्म हुए जा रहे है. विचारकों, शिक्षितों, विज्ञानियों की पहली आवश्यकता है मस्तिष्क पर नियंत्रण और स्थिरता. हिंदु धर्म दर्शन की रक्षा तो बाद में कभी कर लें,न भी कर पाएँ तो वह अपने आप में सक्षम है, स्वतः हो जाएगी. देश का सरोकार में प्रथम अवश्यकता है व्यक्तिगत ईमान और निष्ठा, प्रत्येक नागरिक स्वभाव से शिष्टाचारी,कर्तव्यनिष्ठ,चरित्रवान,मृदु और सहिष्णु बने तो देश का सरोकार भी स्वतः हल हो जाएगा.
      और किसी भी दशा में तुलसी सम सधुक्कड़ी के संदर्भ का आधार लेने की आवश्यकता ही नहीं पडेगी इसलिए "मूरख ह्रदय न चेत जो गुरु मिलैं विरंचि सम !"


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    3. आदरणीय मिश्र जी
      मैंने ऊपर आपको न तो कहीं नीच कहा है, न तुच्छ और न ही अहंकारी। कृपया मेरे शब्दों को घुमा कर उनमे निजी अपमान न खोजें। जो लिखा उसे फिर से पेस्ट करती हूँ

      **दुसरे लोगों के विचारों पर अवांछित कुठाराघात करनी की प्रवृत्ति बहुत ही नीच लगती है। **विरोधी पक्ष के व्यक्ति को अपशब्द कहना, अपमानित करना मुझे बहुत ही तुच्छ attitude लगता है। **अपने आप को इतना "सर्वज्ञानी" मान लेना / यह मान लेना कि "मैं" ही सही हूँ / दूसरा पक्ष ही गलत है / "मुझे" जो सही लगे उसके साथ जो असहमत हों वे सब मूर्ख हैं / "मुझे" यह निश्चित करने का अधिकार है कि कौन समझदार है / वैज्ञानिक है / अवैज्ञानिक है / बौड़म है - यह सब सोचना / कहना सिर्फ अहंकार की निशानियाँ हैं - इस से कोई किसी से उच्च सिद्ध नहीं हो जात। 


      दूसरी विचारधाराओं पर अवांछित कुठाराघात करना, चर्चा में विपक्ष को अपमानित करना, और अपने विचारों को सर्वोपरि मान दुसरे विचारों को हल्का मानना इन तीनों पर मैंने यह शब्द लिखे है - बड़े साफ़ शब्दों में। इस पूरे कमेन्ट में "आपका" निजी अपमान या आपको निजी तौर पर य तीन अपशब्द कहा जाना कहां है????

      मिथक की परिभाषा आपसे मैंने पूछी और अपने जो परिभाषा बतायी (और पूरी विनम्रता से बताई) उस परिभाषा से मैं सहमत हूँ।

      रामायण इत्यादि मिथक मात्र हैं इस उदाहरण से मैं असहमत हूँ।

      न मैं यह दावा कर सकती हूँ कि ये सब मिथ्क् है न, और न ये दावा ही कर सकती हूँ कि ये मिथ नहीं हैं। मेरे अध्ययन में अब तक वह स्थिति नही आई कि मैं निर्णय सूना सकूँ। जब उतना जान सकूंगी तब कह सकूंगी। इस चर्चा में पड़ने की मेरी कोई इच्छा नही। क्योंकि पोस्ट मेरे नाम से शुरू हो रही थी तो मुझे अपना नजरिया बताना आवश्यक लगा। "मिथक क्या होता है ?" बस इतना ही प्रश्न था ।और आपकी परिभाषा से मैं सहमत हूँ। उदाहरण से असहमत।

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    4. आदरणीय मिश्रा सर जी -
      क्योंकि आपने मेरी टिपण्णी में से ढूंढ ढूंढ कर "तीन शब्द" अपने लिए निकाल लिए (जो आपके लिए कहे नहीं गए थे ) तो इसी पोस्ट की टिप्पणियों से "आपके कहे" कुछ शब्दों की लिस्ट चेंप रही हूँ - पढ़ देखिये कितने आदर पूर्वक आपने हम सब को चर्चा के लिए आमंत्रित कर हमें यह सब कहा है ।

      १ @@अहमकाना तर्क
      २ @@बौड़म
      ३ @@नहीं नहीं डॉ साहब उत्तर है शिल्पा मेहता जी और सुज्ञ जी के पास
      ४ @@जनाब ऐसी छद्म धर्म की सधुक्कड़ी सरीखी भाषा
      ५ @@अप जैसे लोग .......नुक्सान कर रहे हैं जो माफ़ करने योग्य नहीं है!
      ६ @@मूरख ह्रदय
      ७ @@पढ़े लोगों लोगों की भी सहज बुद्धि कहाँ चली जाती है
      ८ @@इन पढ़े लिखे कूप मडूकों को ही मूड़ डालूँ :-)
      ९ @@ये मेरे पैरो तलें लोटेगें

      :) :)
      -------------------------------

      और आदरणीय प्रवीण जी जो कहा है वह तो खैर अलग है ही :) आदरणीय प्रवीण जी - आभार । आप्ने अपने views बड़ी साफ़ गोई से बताये (कि आप हमारे बारे में क्या और कैसा सोचते हैं) आपका आभार :)

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    5. शुरुआत आपने की थी :-) वैसे क्यों दूसरों को दिए विशेषण अपने सर ले रही हैं

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    6. हाँ शिल्पा जी यह एक धर्मयुद्ध है :-)

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    7. धर्मयुद्द रोचक रहा। शिल्पाजी ने के जबाब मजेदार लगे।

      मिसिर जी अब आप अगली पोस्ट लिखिये। इसे मटियाइये। :)

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    8. मुझे तो यह धर्मयुद्ध नही लग रहा। :)

      न आप मानेंगे न मैं मानूंगी इस विषय पर। तो बेहतर हो कि we should agree to disagree on this matter. शुक्ल जी का सुझाव अच्छा है कि अब अगली पोस्ट का समय है। let's move forward.

      :)

      हटाएं
    9. .
      .
      .
      @ शिल्पा जी,

      यह बिना वजह का आभार प्रदर्शन क्यों... हम तो किसी को भी कुछ नहीं कहे... :)


      ...

      हटाएं
    10. .
      .
      .
      सिवाय अरविन्द जी से वार्तालाप के... इतना करने का तो हक हमें है ही कि नहीं ???


      ...

      हटाएं
    11. :)
      आदरणीय प्रवीण जी

      अजी हम सब स्वतंत्र भारत देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। हर एक को वार्तालाप करने का पूर्ण अधिकार है।

      मैं बार बार अनेक जगह कहती रहती हूँ कि मेरा अध्ययन इतना नही है कि मैं निश्चित तौर पर इश्वर के अस्तित्व पर कुछ कह सकू।

      मेरा विरोध किसी के विश्वास / अविश्वास / आस्तिकता / नास्तिकता से कभी नही। मेरा विरोध रहता है दूसरों के विश्वासों को सार्वजनिक रूप से अनावश्यक ठेस पहुंचाने की प्रवृत्ति से है। यदि करोड़ों लोगों को राम और कृष्ण पर विश्वास है और यह विश्वास उनके जीवन के दुःख दर्दों पर एक पेन किलर की तरह काम कर उन्हें उनके दर्द से मुक्ति दिलाता है तो उस विश्वास को चोट पहुँचाने के प्रयास क्यों?

      शायद आप कहेंगे कि इस से कई नुक्सान हैं। होंगे। लेकिन बीमारी में दवाई जो दी जाती है वह यह देख कर कि इसके फायदे इसके नुकसानों से कितने अधिक हैं। और इश्वर पर विश्वास करने वाले कई बुराइयों से दूर रहने के प्रयास करते हैं कई अच्छाइयों को करने के भी। आप कहेंगे कि कई धार्मिक ऐसा नही करते। मैं कहूंगी कि वे धार्मिक हैं ही नही। वे इश्वर को मानते नही सिर्फ विश्वास का दिखावा करतेहाहै।

      हटाएं
    12. प्रवीण जी,

      उसी हक के उपयोग का आभार प्रदर्शन है… :) प्रायः लोग हक उठाना चुक जाते है, आपने उठा कर ओरों के लिए मार्ग प्रशस्त किया इसलिए… :) लिखा भी है न उस सोच के लिए…

      अरविन्द जी,

      यह धर्मयुद्ध नहीं है, मात्र शब्द युद्ध है और वो भी एक शब्द के लिए और उसके मनवांछित भावार्थ के लिए। यह बात अलग है कि लोग प्राय: एक शब्द उठाकर पहले धर्म पर आकृमण करते है, कोई शब्द चर्चा करे तो उसे धर्म का प्रतिआकृमण कहकर ऐसी शब्दार्थ चर्चा को धर्मयुद्ध संज्ञा देकर निरर्थक धर्म को बदनाम करने का कृत्य करते है।

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    13. आदरणीय प्रवीण जी
      आभार आपके clear cut views को पूरी honesty से रखनेके लिए।
      जैसे आप कहते हैं काले को काला और सफेद को अफेद कहना। आनेस्टी is always good। but silence is gold।

      सुबह एक लम्बी टिप्पणी लिखी पता नही कहां गयी।मोबाइल पर हूँ तो कॉपी पेस्टभी नइ कर पा रही।

      gist यह था कि मुझे आपके (या किसी भी और के) इश्वर को न मानने से कोई दिक्कत नही।

      मेरी प्रॉब्लम है करोड़ों लोगों के विश्वास का मखौल बनाने से। उनके मन में बसी प्रतिमाओं को खंडित करने को की गयी चोटों से, और उस चोट से उठते दर्द का मजाक उड़ा कर खुद को सुपीरियर मानने की प्रवृत्ति से।

      श्री राम या श्री कृष्ण को मिथक साबित करने के बारम्बार प्रयास क्यों??? बार बार इनमे विश्वास करने वालों को सार्वजनिक रूप से अपमानजनक शब्द क्यों? और यह कर कर खुद से इतनी सेल्फ satisfaction क्यों जैसे कोई किला फतह किया हो? इसके पीछे क्या है?

      और इतनी ही सच्चाई है तो यही वैज्ञानिक विरोध और मिथक आदि साबित करने के प्रयास कभी पैगम्बर जी आदि के लिए नही दीखते इन्ही वैज्ञानिक चिंतकों के । तो सत्यता भी धर्म निरपेक्ष क्यों नही? सारी वीरता हिन्दू मान्यताओं पर ही क्यों?

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    14. मेरी दो लम्बी टिप्पणियाँ गायब। स्पैम में हो तो कृपया निकाल लें। न तो न सही। फिर से टाइप करने की पेशेंस नही है अब।

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    15. शिल्पा जी ,
      "न आप मानेंगे न मैं मानूंगी इस विषय पर। तो बेहतर हो कि we should agree to disagree on this matter"
      मुझे आपके लिए सचमुच दुःख है!
      मैंने खुद एक बार प्रवीण शाह जी से प्रतिवाद किया था कि लाखों करोंड़ों लोगों की आस्था और विश्वास उनसे मत छीनिए क्योकि फिलहाल विज्ञान के पास कोई वैकल्पिक कार्य योजना नहीं है -जब यहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों तक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव है और वह भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी /अभियांत्रिकी पढ़े लिखे लोगों में भी तो बिचारे उन्ही लोगों से उनके विश्वास क्यों छीने जायं :-(
      तो आप अपनी चिंता करिए -आप ठीक होंगी तो उन करोड़ों लोगों को भी एक मार्ग मिलेगा -अभी तो विज्ञान संचारकों को पढ़े लिखे अज्ञानियों से जूझना पढ़ रहा है -एक आप ही नहीं और भारत ही नहीं पूरे विश्व में वकीलों जजों इंजीनियरों शिक्षकों की एक बड़ी जमात वैज्ञानिक नजरिये से मरहूम हैं -यह हमारे लिए बड़ी चुनौती है ! वे शिक्षित होकर भी कट्टर हैं घोर अन्धविश्वासी हैं -करोड़ों सीधे सरल लोगों को तो फिर भी समझाना बहुत आसान है इन्हें समझा पाना टेढ़ी खीर है !
      मैं यह मानता हूँ कि केवल मृत और मूर्ख अपने विचार नहीं बदलते -विज्ञान तो बदलते विचारों की ही एक प्रगति यात्रा है -अन्धविश्वासी और पुरातनपंथी अपने विचार नहीं बदलते -मैं तो हमेशा तैयार हूँ बशर्ते बात बुद्धि सम्मत ,बुद्धिगम्य और तर्कपूर्ण हो! और तक अपने आर्ष ग्रंथों ,वांग्मय की बात है उसमें जो सारभूत मुझे लगता है वह मेरे लिए प्रणम्य है -मैंने राम और कृष्ण पर कई पोस्ट और श्रिख्लायें की हैं -मगर उनमें कूप मंडूकता की दृष्टि को प्रोत्साहित कभी नहीं किया है !
      आप और सुज्ञ जी जिस स्कूल को चला रहे हैं उसके बारे में कबीर पहले ही कह चुके हैं -
      जाका गुरु है आंधरा चेला निपट निरंध
      अँधा अंधरे ठेलियो दोनों कूप परंत
      अगर आप सचमुच एक सही दिशा पकड़ना चाहती हैं तो मैं साहित्य सुझा सकता हूँ ! मगर सुज्ञ जी का तो मामला लाईलाज है !
      आप दोनों से न चाहते हुए भी ऐसी तरह से बात करने पर दुखी हूँ और क्षमापार्थी हूँ! अपनी ओर से प्रकरण समाप्त करता हूँ!

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    16. जी। प्रकरण को समाप्त माने ले रही हूँ।

      आभार।

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    17. मैं भी इस निर्र्थक बहस से निजात चाहता हूँ. बस विज्ञान के लिए एक छोटे से शुभकामना संदेश के साथ कि विज्ञान संचारण का भार विनम्र, विवेकशील,समतावानों के हाथों में रहे!! ताकि उसका लोक में सम्मान और आदर वृद्धि को प्राप्त करे.

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  15. mujhe bhee aaj he pata chala ki mithak ka matlab kya hota hai...

    meri nayi post par aapka swaagat hai...

    http://raaz-o-niyaaz.blogspot.com/2013/07/blog-post.html

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  16. मेरी अल्प बुद्धि में एक विचार कौंधा आपसे साझा करता हूँ माफ़ी नामा पहले >>>>शायद आज की तरह बीते समय में जानकारी को लिपिबद्ध करने की कला भिन्न रही हो आज की भांति हम कल कंठस्थ करने को ज्यादा महत्व देते रहे हों तभी मन्त्रों की प्रमाणिकता पर भी संदेह होना स्वाभाविक है और इसी क्रम में जन्म ले लेंगे मिथक

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  17. .
    .
    .
    अरविन्द जी,

    कौनो मिथक-विथक नहीं है यह कथायें... सब कुछ घटा है ज्ञानियों के सामने ही... दस तरह की तो बिजली होती थी तब और सोलह तरह के विमान भी... हिमालय को काँख में दबा जहाँ चाहे तहाँ रख दिया करते थे लोगबाग... एक जनाब तो कुछ घूंटों में समंदर ही पी गये... जहाँ ज्यादा पंगा लिया किसी ने तो तड़ से ब्रह्मास्त्र यानी हाइड्रोजन बम... इंसान तो इंसान, इंसान के शरीर पर किसी भी जानवर का अंग जोड़ा जा सकता था... हाथ में पानी ले फूं-फाँ कर जीते जागते इंसान को कुत्ता बिल्ली पत्थर बना देते थे भाई लोग...हजारों साल जीते भी थे वे लोग... यह तो बाद में तकरीबन बीस हजार साल पहले अचानक घोर कलयुग आ गया, इंसान फिर से कपि सा बन गया और सब कुछ भूल-भुला गया... पिछले पाँच हजार साल की तरक्की से अब कुछ लायक बना है तो आप जैसे विज्ञानसंचारक उस स्वर्णिम अतीत की गौरवगाथाओं को चौपट करने पर तुले हैं... धार के साथ बहना सीखिये... छद्मबुद्धिजीवी बने रहना छोड़ 'सौ फीसदी असली भगवा-हरा-सफेद ब्रान्ड बुद्धिजीवी' बनिये... हर उलजलूल-तर्कातीत-कपोलकल्पना पर यकीन करिये व कराइये भी... खुद भी सुखी रहेंगे, शिष्य बनेंगे व दिनोंदिन आभामंडल बढ़ेगा...

    १०१ फीसदी असली विज्ञान संचारक बनिये देव... मेरी शुभकामनायें साथ हैं...


    ...

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    1. आप भी यूं साथ छोड़ जायेगें सोचा न था ..बेगाने ऐसे ही होते हैं ! :-(
      :-)

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    2. कभी कभी प्रवीण जी बहुत कोफ़्त होती है पढ़े लोगों लोगों की भी सहज बुद्धि कहाँ चली जाती है ?
      मन तो यही होता है विज्ञान संचारक का चोला उतार फेंकू और गेरुआ पहन इन पढ़े लिखे कूप मडूकों को
      ही मूड़ डालूँ :-) यह देश ही ऐसा है सरोकार को गोली मारिये और अपनी थैली भरिये!
      और सच कहता हूँ इनसे लाख अच्छा सधुक्कड़ी करूँगा,ये मेरे पैरो तलें लोटेगें
      बस जमीर को परे धकेलने की बात है !

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    3. .
      .
      .
      हाँ सर जी,

      अपना भी यही मन करता है कभी कभी कि कहाँ यह सच बोलने की जिद पकड़ ली है... बात बात में कुछ पुराने मंत्र बोल कर, आड़ी तिरछी, बाँयी-दाहिनी, नाक खोल-बंद कर, जीभ तालू से लगा कर या दाँत के बीच भींच कर साँस लेते हुऐ किसी अपरिभाषित पर ध्यान लगा रीढ़ की हड्डी में से कु्ंडलिनी और न जाने क्या क्या जगा कर, उलजलूल और विचित्र अनुभव मिलने का बखान कर पैरों तले लोटने वाले चेला-चेलियाँ बनाऊँ... इसमें कौनो जमीर-वमीर की बात ही नहीं है, जैसे घोड़ा सवारी के लिये बना है और गधा बोझ ढोने के लिये...वैसे ही कुछ तो पैदा ही किसी को गुरू बना उसके पैरों तले लोटने के लिये ही होते हैं...


      ...

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    4. प्रवीण जी,
      चर्चिल के बाद भी काफी कुछ भारत वैसा ही है !
      विगत दिनों सतीश सक्सेना जी रिटायरमेंट के बाद कहीं (सुरक्षित ) पहाड़ पर आश्रमवास की बात कर रहे थे - हम भी आईये उसी में शामिल हो जायं ! शेष जीवन तो कम से कम समृद्धि और भव्यता से कट जाय .....बहुत हो गया इमान का जीवन !

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    5. गम्भीर और अकादमीय निष्ठावान चर्चाकारों का तर्कहीन होकर यूं पलायनवादी होना दुर्भाग्यपूर्ण है। ईमान तजने की प्रकट घोषणा और पाखण्ड की शरण में जाने की बात दुखद है। क्या करें निष्ठा भी बडी दुष्कर वस्तु है!! लेकिन चिंतको के लिए दुर्लभ नहीं……

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    6. .
      .
      .
      'पलायनवादी होना दुर्भाग्यपूर्ण'
      'ईमान तजने की प्रकट घोषणा और पाखण्ड की शरण में जाने की बात दुखद'


      ऐसा क्यों हुआ या हो रहा है, इसके कारणों पर भी प्रकाश डालिये सुज्ञ जी... कहीं पाखंड की सर्वव्यापता, मुखरता, बोलबाला और तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी खुजाउंगा की तर्ज पर बारी बारी से एक दूसरे के जयकारे लगवाने की प्रवृत्ति तो कारण नहीं... :)


      ...

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    7. अब मैं क्या कारणों पर प्रकाश डालुं, आपने यथार्थ कह ही दिया। तर्कशून्य होते ही पाखण्ड की तरफ पलायन के यही दो कारण है। लगता है पाखंड की सर्वव्यापकता, विशाल आय और बोलबाला देखकर लार पहले से ही टपक रही होगी, प्रकट रूप से ईमान तजने का कोई बहाना तो चाहिए ही चाहिए, चलो यही बहाना काफी है कि लोगों ने हमारे निष्कर्ष नहीं सुने। :) वाकई लालच बुरी बला है इसीलिए दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे में दूसरा कारण, साथ मिल जाय 'तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी खुजाउंगा'तो दिल बिल्लियों उछल कर आंतरिक जयकारे लगाता ही है। दिख रहा है न, यही कारण है। संशय को कोई स्थान नहीं… :)

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  18. कुछ तो कुएं से निकल गये , वे हरे हो गये ,लेकिन बहुत का निकलना बाकी है अभी. |

    कोशिश करता हूं इस बारे में थोड़ा देखने की.

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  19. घटिया शब्द ..
    कष्टदायक प्रकरण..
    न आता , तो अच्छा रहता !!

    आत्म मुग्धता मानव की ,
    कुछ काम न आये जीवन में !
    गर्वित मन को समझा पाना ,
    बड़ा कठिन, इस जीवन में !
    जीवन की कड़वी बातों को, कहाँ भूल पाते हैं गीत !
    हार और अपमान यादकर, क्रोध में आयें मेरे गीत !

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    1. मिथक घटिया शब्द ?? यह कोई गाली का शब्द नहीं है सतीश जी !
      हाँ यदि आपका अभिप्राय कुछ और है तो एक बार फिर से कहना चाहता हूँ
      मुझे लाईक लाईक सुहानी टिप्पणियों के खातिर किसी अकादमीय बहस को बलि
      देना नहीं आता -ठकुर सुहाती और राग दरबारी(संगीत छोड़कर ) प्रिय नहीं क्योंकि
      इससे कोई सार्वजनीन लाभ नहीं! व्यक्तिगत सम्बन्ध तो बनते बिगड़ते रहते हैं
      (पिता जी कहा करते थे ) आप भावुक मना हैं जल्दी ही गीतमय हो जाते हैं :-)

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  20. विचारों का अच्छा प्रकटीकरण हो रहा है।

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  21. मिथक तो समझ में आ ही गया।

    झन्नाटेदार प्रतिक्रियायें पढकर तबियत हरी हो गयी। :)

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    1. आपकी तबियत तो हरी होनी ही थी गुरु ...

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    2. सुकुल आज फिर मौका,पंडित उसी मूड में
      मिसिर आज साक्षात् खड़े, दुर्वासा जैसे ,
      है मारू अंदाज़ , काट ले, जैसा चाहे
      ऎसी फसल न मिले,आज ही आग लगा दे
      कह कट्टा कविराय, चूक न जाना मौक़ा
      आज न गाली पड़े , बड़ा है अच्छा मौक़ा -कट्टा कानपुरी असली वाले

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  22. कभी कभी तो लगता है, विकी भी कई जगह मिथकों से प्रभावित है .

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  23. शुक्रिया डॉ अरविन्द मिश्र भाई उत्साह बढाने का .ॐ शान्ति .चार दिनी सेमीनार में ४ -७ जुलाई ,२ ० १ ३ ,अल्बानी (न्युयोर्क )में हूँ .ॐ शान्ति .

    हाँ यह माना जा सकता है कि कुछ घटा होगा जिनकी सामूहिक/ जनस्मृति अवशेष आज के मिथक हों . समयांतराल में उनका स्वरुप फंतासी/स्वैर कल्पनाओं से आलोड़ित होता गया हो ! जैसे बहुत संभव है अतिवृष्टि की समस्या से आगाह होकर कृष्ण नामक कोई जन नायक महावृष्टि की किसी आशंका के चलते एक सुरक्षित विशाल कन्दरा ढूंढ ली हो और आपात काल में सबकी रक्षा हो गई हो .कालांतर में वर्षा के देव इन्द्र के साथ संयुक्त हो यह पूरी घटना अपना मौजूदा मिथकीय स्वरुप पा गयी हो .




    बेहद सटीक अर्थ पूर्ण विश्लेषण जन श्रुति ही मिथक निर्माण का कच्चा माल मुहैया करवाती है .वैसे भी पूछा जाता है :मिथ या यथार्थ

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  24. आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ. वैसे मिथक ओर सत्य तो एक दूसरे से पृथक ही रहे है लेकिन कोई आश्चर्य नहीं कि आज का मिथक कल का सद्यः सत्य हो जाए विज्ञान के बूते.

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    1. बिल्कुल कल के स्वप्न आज के हकीकत बन रहे हैं !क्योकि प्रौद्योगिकी दिन दूनी रात चौगुनी बढ रही है!

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  25. @सबसे पहले यह कि मिथक शब्द हिन्दी मूल का नहीं है बल्कि इसे अंग्रेजी के मिथ या माइथालोजी से गढ़ा गया है.....

    अर्थात हिन्दी अथवा हिन्दू सम्बंधित बातो को ये सपष्ट करने में पूरी तरह उपयुक्त शब्द हो ऐसा न होने की संभावनाए भी है! क्योकि अनुमानों के आधार पर इसके अर्थो के अनुमान लगाए जायेंगे!इसके अर्थो की कही भी किसी से भी तुलना की जायेगी!और जिसको जो अच्छा लगेगा वो वही मान लेगा!

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  26. विचार विमर्श जब बहस बन जाये तो अर्थहीन हो जाता है क्योंकि बहस का न कोई अंत होता है , न निष्कर्ष। न किसी की जीत होती है , न हार । इसलिए बहस निरर्थक है।

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  27. bhagwan ke naam par kitni ladaiya hoti hain :o... bhagwan (agar hain to) sochte honge .. kash main na hota to kitna achcha hota. Aur agar nahin hain to ye sab dekh kar kabhi hona bhi nahin chahenge :p :p

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  28. देर से आने का एक फायदा यह भी होता है कि टिप्पणियों को पढ़ने का मौका मिलता है और इस पोस्ट ही से नहीं टिप्पणियों से भी ज्ञान वर्धन हुआ.
    ..........

    खो गए पथिक की सुध लेने हेतु धन्यवाद.
    बस ज़रा स्कूल में व्यस्तता थी.
    आभार

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  29. मेरी टिप्पणी स्पैम में गई?

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  30. अगर यही दूसरे धर्म के लिये कह दिया गया होता तो अभी तक तो शहरों, राष्ट्रों में मोर्चे निकल गये होते, आग लग गई होती.. इससे यह तो साबित होता है कि मिथक हो या ना हो.. परंतु हम सहिष्णु जरूर हैं.. हर चीज को आत्मसात कर लेते हैं ।

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  31. एक प्रश्न जो मन में उठ रहा है कि अभी तक तो किसी भी तथ्य की प्रमाणिकता उस विषय का विशेषज्ञ करता था। और यह समाज विशेषज्ञ के उस निर्णय को मान्यता भी देता था। क्योंकि उनके पास निर्णय के लिए कुछ न कुछ आधार होता था। फिर इस मुद्दे में भी यही तो हुआ है ?

    चलो माना कि वे विशेषज्ञ भटक गए हैं। या विज्ञान को समझने में असमर्थ हैं। वास्तविकता और कल्पना में भेद नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। तो अब प्रश्न उठता है कि हम तो वास्तविकता और कल्पना में भेद कर पा रहे हैं। हम तो भ्रमित नहीं हुए हैं। तो फिर हमारे पास उनके भ्रमित होने का कारण भी होगा। तो फिर हम उस भ्रम को क्यों दूर नहीं करते हैं ? या फिर उन्हें हसी का पात्र बनाए रखना चाहते हैं। क्योंकि हम सब तो व्यस्त आदमी रहे। और फ्री समय में कुछ जोकरों की आवश्यकता तो पड़ती ही है।

    दरअसल ऐसी बात करने के पीछे भी एक कारण है कि बचपन में रेगिस्तान की मरीचिका को जब भ्रम बताया जाता है। तब विज्ञान के एक सिद्धांत से हमें अवगत कराया जाता है। आखिर हम उस चीज को भ्रम कैसे कह सकते हैं ? जिसे देखने पर हर व्यक्ति वैसी ही प्रतिक्रिया देता है जैसा कि एक वैज्ञानिक देता है। एक वैज्ञानिक भी उस परिस्थिति में वही देखता है जो एक सामान्य मनुष्य देखता है। क्योंकि उन सभी को एक समान परिदृश्य दिख रहा है। भौतिकी उन लोगों में भेद नहीं कर पा रही है। जो उस परिदृश्य को देख रहे हैं। फिर विज्ञान का एक सिद्धांत कहता है कि यदि आप वास्तविकता और भ्रम में भेद के साथ-साथ उसके कारण को ढूंढ पा रहे हैं। तब तो आप वाकई इतनी देर से भ्रमित हो रहे थे। क्योंकि उस कारण के जरिये आप उन लोगों को वास्तविकता से परिचित करा सकते हैं। जिसे लोग अब भी वास्तविकता मान रहे हैं। आप उनकी समझ को उस कारण के उपयोग से परिवर्तित कर सकते हैं। ये है विज्ञान

    मैं यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूँ। विज्ञान केवल तथ्यों का जमावाड़ा नहीं है। और न ही सिर्फ भौतिकी का दूसरा नाम विज्ञान है। अब आप जैसा समझे...

    जो व्यक्ति पुष्पक विमान जैसे मिथकों को लेकर प्रमाण मांगते हैं। वे भी गलत नहीं हैं। परन्तु उनकी मंशा समाज और विज्ञान दोनों के लिए खतरनाक है। क्योंकि वे विज्ञान के जिस कूट-करण सिद्धांत का उपयोग करते हुए, अपनी बात कहते हैं। वे नहीं जानते है कि आखिर कूट-करण सिद्धांत कहता क्या है ? उस सिद्धांत का विज्ञान में क्या महत्व है ? क्या भौतिकी के नियमों की प्रमाणिकता में यह सिद्धांत लागू होता है ? इस सिद्धांत की सीमा कहाँ तक है ? बेशक वे लोग सिद्धांत का अनुप्रयोग करते हैं। परन्तु विज्ञान के प्रति उनकी समझ तथ्यों तक ही सीमित रहती है। वास्तव में वे विज्ञान को समझते नहीं हैं। सिर्फ उसे जानते हैं।

    विषय संबंधी लेख : विज्ञान... विज्ञान... विज्ञान... । www.basicuniverse.org/2014/12/Vigyan-Vigyan-Vigyan.html

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  32. मिथकों पर सदा से जारी चर्चा को एक नया अवसर भी मिल गया इसी बहाने...

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  33. सबसे पहले तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि किन-किन विषय-वस्तुओं को प्रमाण की आवश्यकता होती है ? सिद्धांत, नियम, तथ्य, कथन, खोज, सूत्र, तकनीकी ज्ञान और जानकारियों के लिए प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं। अर्थात प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जैसा की ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि ये सभी आठों बिना प्रमाण के समाज में नहीं स्वीकारे जाते हैं। और न ही ये आठों प्रत्यक्ष अर्थात भौतिक अवस्था में पाए जाते हैं। जिनकी उपस्थिति को हम छूकर, देखकर या सूंघकर ज्ञात कर लेते। इसलिए हम इनकी उपस्थिति की प्रमाणिकता को अपनी समझ को विकसित करके स्वीकारते हैं। जिनमें से साक्ष्य विज्ञान का सबसे कम विश्वसनीय प्रमाण है। भले ही न्यायालय में साक्ष्य को बहुत अहमियत दी जाती हो। परन्तु विज्ञान में साक्ष्य देने का तरीका सबसे कम विश्वास करने योग्य माना जाता है। आप १९८६ की चर्चित फिल्म "एक रुका हुआ फैसला" को देखकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि साक्ष्य को विज्ञान में कम अहमियत क्यों दी जाती है। इस फिल्म में १९ वर्षीय एक लड़के को उसके पिता की हत्या के आरोप में सजा देने से पहले इस केस के पुनः अध्ययन के लिए १२ अलग-अलग पेशे के लोगों को न्यायलय द्वारा कहा जाता है। न्यायलय द्वारा यह शर्त रखी जाती है कि आप सभी १२ लोगों को कसूर या बेक़सूर के लिए एक मत होना पड़ेगा। फिल्म की शुरुआत में ही ११ व्यक्ति एक मत होकर उस लड़के को कसूरवार ठहराते हैं। जबकि शेष एक व्यक्ति की समझ उस हत्या की घटना का स्पष्ट चित्रण बना सकने में असमर्थ थी। इसलिए उस व्यक्ति ने कुछ भी न कह सकने की स्थिति में उस कथन अर्थात वह लड़का कसूरवार है, को नहीं स्वीकारा। निश्चित नहीं होने की स्थिति में उस व्यक्ति ने घटना के पुनः अध्ययन की मांग उठाई। और फ़िल्म के अंत में वह लड़का दोषमुक्त ठहराया गया। जबकि फिल्म में एक से अधिक घटना के साक्षी अर्थात साक्ष्य को गवाह के रूप में दिखाया गया है। तो फिर विज्ञान में साक्ष्य को किस स्थिति में स्वीकारा जाता है ? और किन कारणों से अस्वीकारा जाता है ?

    संबंधित लेख : प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीके । विज्ञान के अनुप्रयोग
    www.basicuniverse.org/2015/01/Praman-Dene-ke-Tarike.html । www.basicuniverse.org/2015/01/Vigyan-ke-Anuprayog.html

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  34. मिथक क्या है? एतदर्थ आप सब विद्वानों ने गहन चिन्तन-मनन व विमर्श किया है और कर रहे हैं. पर मुझे नहीं लगता कि आप किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाएँगे. जब मिथ या मिथक स्वयं ही अपरिभाषित है, तो क्यों उसे थौंप रहे हैं ? पहले यह सुनिश्चित कर लें कि यह मिथक या मिथ है. जब साहित्य जगत् में सर्व-सम्मत रूप आ जाएगा, हम निश्चित ही स्वीकार करेंगे. फ़िलहाल आपका 'मिथ' या 'मिथक' मिथ्या के अतिरिक्त कुछ नहीं है. क्योंकि यह भारतीय साहित्य-जगत् में तो कहीं है ही नहीं. फ़िर हमारे पास शब्द-भण्डार की कमी भी नहीं है कि इस (मिथ/मिथक) के बिना हमारा समीक्षाशास्त्र या साहित्य-संसार डूब जाएगा या तहस-नहस हो जाएगा. हमने तो पूरी की पूरी संस्कृतियों को पचा लिया है, इस मिथ/मिथक को भी सहर्ष स्वीकार लेंगे. किन्तु; पहले एक मत होकर इसे परिभाषित तो कर लीजिए... :)
    डॉ.भवानीशंकर शर्मा 'महाजनीय'

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