मंगलवार, 31 मई 2011

हिन्दी ब्लागिंग पर नायाब पुस्तक- एक अप्रायोजित समीक्षा!

जी हाँ ,बात "हिन्दी ब्लागिंग :अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति " की हो रही है जो अभी हाल में ही प्रकाशित और विमोचित हुई है -पुस्तक मुझे खैरात में नहीं मिली है और न ही प्रकाशक ने मुझे समीक्षा के लिए एक प्रति भेजी है .मैंने अपनी प्रति खुद खरीदी है .  किताब खरीद कर पढने का भी अपना एक आनंद या  पछतावा  होता है -आनंद तब जब पैसा वसूल हो जाए और पछतावा तब जब पैसा बर्बाद हो -राहत की बात यह है कि इस पुस्तक में लगा मेरा पैसा डूबने से बचा है .पुस्तक हिन्दी ब्लागिंग के इन्द्रधनुषी छटाओं को बिखेरने में कामयाब हुई है ...कई ख्यातिलब्ध नाम छूटे  भी हैं मगर हर प्रयास की अपनी सीमाएं जो होती हैं और शायद ऐसे प्रयासों की कोई इति तो होती नहीं ..जो कुछ सारवान छूटा है आगे आएगा ही ....

हिन्दी ब्लागिंग के कई पहलू आज उजागर हैं -उसका तकनीकी पक्ष ,विषयगत फलक ,सामजिक मीडिया के रूप में उसकी प्रासंगिकता ,इतिहास आदि आदि ....यह देखकर अच्छा लगा कि पुस्तक इन सभी पहलुओं को समाहित करती है ....तकनीकी खंड में ब्लागिंग के इस पक्ष पर धुरंधर ब्लागरों जैसे पंडित श्रीश शर्मा ,रवि रतलामी ,शैलेश भारतवासी ,बी एस पाबला ,विनय प्रजापति आदि खुद श्रीमुख  हुए हैं ...हिन्दी ब्लागिंग की साहित्यिकता का विवादित मुद्दा भी इस पुस्तक में गहन रूप से विवेचित हुआ है .सिद्धेश्वर सिंह का लेख 'हिन्दी ब्लॉग :सृजन ,संकट और कुछ उम्मीदें' बहुत प्रभावित करता है -लगा कि कोई ललित निबन्ध सा पढ़ रहे हों ...यह एकमात्र लेख ही पुस्तक को संग्रहणीय बनाने  की कूवत रखता है . इस लेख को पढ़ते वक्त सहज ही कई लाईनों को मैं रेखांकित करने से रोक नहीं पाया -यद्यपि पूरा आलेख  ही उद्धरण योग्य है .यह पढ़कर होठों पर मुस्कराहट तिर आई-" यह आरोप खारिज होता दिखाई नहीं दे रहा है कि अभी तक हिन्दी -ब्लागिंग के एक बहुत बड़े अंश पर आत्मलीन ,आत्ममुग्ध और आत्म केन्द्रित मानसिकता का कब्जा है ...." अरे यही आरोप तो कुछ ऐठूं दोस्त मुझ पर भी लगाते रहे हैं :) 

'रचनात्मक अभिव्यक्ति के विविध आयाम' पर लिखते हुए केवल राम यह आश्वस्त करते हैं कि,'हिन्दी ब्लागिंग आज व्यक्तिगत बातों के दौर से गुजरकर विमर्श के दौर में प्रवेश कर चुकी है '..मगर निश्चय ही ब्लागिंग की यह मूल प्रवृत्ति नहीं थी ..यह एक बेहद निजी अभिव्यक्ति थी मगर जब वह सार्वजनिक मंच पर मुखरित होती गयी तो समाज के सर्वागीण,  सार्वजनीन हितों और  सरोकारों से इसका पृथक रह पाना शायद संभव भी नहीं था .. भले ही रचना  जैसी ख्यात ब्लागर  इस बात के पक्ष में पूरी दृढ़ता से खड़ी दिखायी दें कि यह विधा केवल और केवल आत्म केन्द्रित अभिव्यक्ति का ही माध्यम है ..समय ने ब्लागिंग के इस मिथ को तोड़ दिया है ..आज अनेक विषयगत ब्लॉग मनुष्य के अनेक क्षेत्रों की क्षमताओं और उपलब्धियों को बयां कर रहे हैं ...सच है मनुष्य को एक सीमित दायरें में बाधा भी नहीं जा सकता ...उसकी उपलब्धियां अपरिमित ,अनन्त हो चली  हैं ...

हर व्यक्ति की अपनी दृष्टि सीमाएं हैं ....और यह भी सही है कि दृष्टि भेद से दृश्य भेद हो जाते हैं ...तथापि रवीन्द्र प्रभात के हिन्दी ब्लागिंग के समीक्षक और इतिहासकार के रूप का स्वागत है ...उन्होंने माना है कि इस विधा के लिए वर्ष २००७ धमाल का था (मैं जो इसी वर्ष पदार्पित हुआ था :) ...निश्चय ही इस धमाल के पीछे यूनीकोड जैसी तकनीकी का सहयोग था ...गिरीश पंकज का यह कहना भाया कि ब्लागिंग मानवीय सर्जना का नवोन्मेष है ...प्रमोद ताम्बट का यह वक्तव्य  'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधकचरे अपरिपक्व रूप से स्वच्छंद उपयोग करने का कोई ऐतिहासिक लाभ नहीं है ' सोचने पर विवश करता है ...अजित राय का 'वैकल्पिक मीडिया का नया अवतार 'शीर्षक लेख विचारोत्तेजक है .ब्लागिंग के शुरुआती दौर में कुछ नामचीन ब्लॉगर भी इसके आर्थिक पहलू से काफी आस लगा बैठे थे-प्रतीक  पांडेय ने इस पहलू को भी लिया है .शास्त्री जे सी फिलिप हिन्दी ब्लागिंग का एक बड़ा  नाम रहा है मगर हिन्दी ब्लागिंग में विज्ञान लेखन की संभावनाओं पर उनका लेख अति संक्षिप्त और अपूर्ण सा है ....उनसे जाहिर है हमारी अपेक्षायें बड़ी और विषद हैं ....
हिन्दी ब्लागों की संख्या कितनी है -इस पुस्तक के विभिन्न लेख इस प्रश्न को लाल बुझकडी लहजा दे देते हैं ..कोई कहे यह एक लाख है तो कोई तीस हजार .....खुशदीप सहगल इसे अस्सी  हजार मानते हैं तो सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी तीस हजार से ही संतोष करते हैं ....स्पष्ट है ये आकंडे  बस ऐसे  ही  बूझे गए हैं ...रवि रतलामी  शायद इसे सही बता पायें ..वैसे इसी पुस्तक में कहीं एक लाख की संख्या शायद उन्ही की बतायी हुई है ...बालेन्दु शर्मा दाधीच अपने आलेख में इसकी संख्या मात्र एक हजार बताते हैं ..निश्चय ही उनके पुराने लेख के इस अंश को काबिल सम्पादक द्वय संशोधित नहीं कर पाए ....

आलोच्य पुस्तक में ब्लागिंग की कई उप विधाओं  -कविता ,कार्टून ,गाली गलौज :) पर विमर्श को भी उचित स्थान मिला हुआ है ...और इसके नागरिक पत्रकारिता ,वैकल्पिक पत्रकारिता के पहलुओं को ख़ास तौर पर उभारा  गया  है. पुस्तक के अंत में सक्रिय ब्लॉग लेखकों और उनके ब्लागों का परिचय / निर्देशिका  अतिरिक्त आकर्षण है . पुस्तक संग्रहणीय है ...और ब्लागिंग में रूचि रखने वालों के शेल्फ की एक जरुरत भी है ...








हिन्दी ब्लागिंग :अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति
सम्पादन:अविनाश वाचस्पति ,रवीन्द्र प्रभात 
संस्करण प्रथम -२०११
पृष्ठ संख्या:376 
मूल्य :४९५ रूपये(कांट्रीब्यूटरों को धेला भर नहीं ) 






शनिवार, 28 मई 2011

यह ग्रीष्म गायन सुना आपने?

गाँव और कस्बों में तो सुबह शाम यह सुमुधुर गायन सहज ही सुना जा सकता है ,हाँ घने कंक्रीट के जंगल इससे रहित हैं ....बात दहगल पक्षी के गायन की है - इन दिनों अल्लसुबह यह ऐसे तराने छेड़ती मिलेगी कि मन मुग्ध हो जाता है -सूरज निकलने के एक डेढ़ घंटे पहले से ही यह तराने छेड़ देती है और सूर्यास्त के बाद भी अपनी रागिनी छेड़ती है मानों सूर्यदेव की आगवानी और विदाई को विकल हो ....

छोटी सी करीब २० सेंटीमीटर की है यह चिड़िया ....इसे हिन्दी में दोयल या दहगल और अंगरेजी में मैगपाई कहते हैं..आपमें बहुतों ने देखा होगा ,मगर हो सकता है इसका मधुर गायन न सुना हो ....सुबह सूरज उगने के पहले उठिए और इसकी 'प्राणेर रागिनी ' का आनंद  उठाईये ..यह इनका प्रणय काल है ....निश्चय ही नर पक्षी अपने गाने के हुनर से मादा को आकर्षित करता है और यह भी जता  देता है कि उसका अधिकार क्षेत्र(टेरीटरी )   कहाँ तक है ताकि भूले भटके भी और  नर वहां न आ धमकें और उसकी इकलौती प्रेमिका पर डोरे डाल सकें !

यह है नन्हीं दहगल (विकीपीडिया )

इसके गायन में बकायादा आरोह है और एक तराने के खंत्म होने के चंद पलों के बाद ही दूसरा आलाप शुरू हो जाता है ...चिड़ियों के हाव भाव व्यवहार या गायन के मानवीय मंतव्य निकालने को जैव विज्ञानी "अन्थ्रोपोमार्फिज्म "की संज्ञा देते हैं जिसका मतलब है मनुष्य खुद अपनी भावनाओं का आरोपण इनके गाने बोली और व्यवहार में करता है जो वैज्ञानिकता के लिहाज से सही नहीं है -कोयल की कूक भले ही विरहिणी के ह्रदय की हूक बन जाती हो मगर यह कहना कि कोयल भी विरह वेदना से संतप्त है -अन्थ्रोपोमार्फिज्म है ....व्यवहार विज्ञानी ऐसे भावनिष्ठ निष्कर्षों से बचते हैं ....इस समय कोयल की कूक अपनी आख़िरी दम ले रही है -दहगल का गायन अपने चरम पर है .....मगर जल्दी ही वह समय आने वाला है जिसके लिए कवि कह गया है -अब तो दादुर बोलिहैं भये कोकिला मौन ..मतलब बरसात आ जायेगी ..या यूं कहिये कि हमेशा शहनाई ही नहीं मुखर होती ,नगारखाने में औरों(वाद्य यंत्रों ) की भी तूतियां बोलने लगती हैं :) .....तब रहिमन चुप हो बैठिये ....देख दिनन का फेर ...


यह पिजड़े की भी शोभा है! 

..तो दहगल का गायन सुन कर बताईयेगा कि कैसा लगा ? 

गुरुवार, 26 मई 2011

जनप्रिय सरकारें और सरकारी मुलाजिम!

आम लोगों की बुनियादी समस्याओं -कपडा रोटी मकान स्वास्थ्य आदि तो ठीक है मगर जनप्रिय सरकारें कई ऐसे कामों में अपने सरकारी मुलाजिमों की फ़ौज को लगा देती हैं  जिनका छुपा मकसद केवल आगामी चुनावों में अपना वोट बैंक पक्का करना होता है -इसी में कई जाति आधारित विकास कार्यक्रम भी हैं .हर वर्ष के तेजी से घटते भू जल स्तर और प्रायः हर वर्ष के भयानक सूखे और बाढ़ को लेकर कोई दूरगामी रणनीति/कार्ययोजना  नहीं दिखती -बिहार में बस एक महीने बाद महा विनाशकारी बाढ़ की सुगबुगाहट शुरू हो जायेगी मगर हमारे पास इसका कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है -सरकारें बस लघुकालिक लाभार्थीपरक उन योजनाओं पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं   जिनसे वे बस आसन्न चुनावों में वोटो की फसल काट  सकें  -शायद अपनी यह मूरख जनता भी ऐसी ही  है ,इन्ही सरकारों के लायक!  हमारे पास कोई टिकाऊ, स्थिर विकास का माडल नहीं दीखता ...

सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहां चुनी हुई जनप्रिय सरकारों के पास ही सारे विधायी अधिकार होते हैं सरकारी कर्मी बस जी हुजूरी तक ही सीमित हो रहते हैं -अब इतनी  फजीहत इन जनप्रिय सरकारों में सरकारी मुलाजिमों की है कि कुछ मत पूछिए .उन्हें वही लोक लुभावन ,वोट बटोरू पार्टी  अजेंडे के मुताबिक़ योजनायें बनानी और कार्यान्वित करनी हैं जो वे कभी भी शायद स्वेच्छा से नहीं बनाते ....वे बस यस मिनिस्टर कहते रहने को अभिशप्त हैं जबकि उनकी योग्यता में कोई कमी नहीं है किन्तु उसका इस्तेमाल नहीं है -अभी एक बहु प्रचारित सरकारी स्कीमं के तहत मिट्टी के उन टेम्पररी कामों में जनता का धन पानी की तरह बहा है जिनका  अगली बरसात में कोई नामों निशान नहीं रहेगा ....बस इसके सहारे लोगों को घर  बैठे मजदूरी का प्रलोभन  और प्रकारांतर से अगले चुनावों में वोट बटोरने का ही छुपा अजेंडा मुख्य है ....इस कार्यक्रम को कानूनी जामा पहनाकर सरकारी कर्मियों को भी विवश कर दिया गया है कि वे इस अनुत्पादक काम में लगें और जरा भी ना नुकर न करें नहीं तो जेल की हवा खा सकते हैं ...मरता क्या न करता सरकारी अमला जामा पूरे देश में इसके कार्यान्वयन में जुटा है....
सरकारी योजनाओं पर कटाक्ष करता पीपली लाईव का लाल बहादुर  
कभी कभी यह हताशा का भाव उमड़ने लगता है  कि क्या सरकारी कर्मियों की कोई अपनी आवाज नहीं है जो वे समय समय पर राष्ट्र के निर्माण में अपनी भी सार्थक भूमिका निभा सकें .....उन्हें यह पता है कि अमुक अमुक योजनायें केवल वोट बटोरूँ योजनायें हैं मगर वे कुछ कर नहीं सकते ....उन्हें बस आँख मूद कर ऊपर के आकाओं हुक्म बजाना है -लोग आम तौर पर यही समझते हैं कि 'विकास' और 'कल्याण' की अनेक योजनाओं पर संवेदनशील सरकारें कितना धन मुहैया करा रही हैं -मगर भैया यह पैसा तो देश के टैक्स पेयर का है , सरकारों का कहाँ? -यह पाई पाई तो त्वदीय वस्तु गोविन्द तुभ्येव समर्पये की पवित्र भावना से ही खरचना चाहिए न की वोटों की खातिर इन्हें स्वाहा करते जाना चाहिए ...

आज गावों में मुफ्त अथवा कौड़ी के दाम पर राशन ,रोजगार आदि मुहैया कराया जा रहा है ....लोगों का साफ़ कहना है कि  इससे कामचोर बढ़  रहे हैं -घर घर के सामने सरकारी नलें लग रही हैं ,मगर पानी नदारद है ....पीपली लाईव में लालबहादुर हैण्ड पम्प लगाने का उपक्रम जिसने देखा होगा वह इस बात को सहज ही समझेगा ....भू जल रसातल  वेग या पलायन वेग से नीचे जा रहा है -हमारे  पास इसकी कोई दूरगामी कारगर  रणनीति नहीं है ....बस 'लालबहादुर हैंडपंप' लगते जा रहे हैं -सारा तामझाम बस वोटों की खातिर है ....हमारे आका अधिकारी बस इन्ही योजनाओं जिनसे नेता जी को वोट हासिल हो सके की कवायद में हलकान हुए जा रहे हैं और मातहतों की नीद हराम किये हुए हैं ....सारी की सारी सरकारी मशीनरी जैसे अपना वजूद ,अस्मिता और जमीर खोती सी गयी है ....नेता ,चंद भ्रष्ट  अधिकारी और कांट्रेक्टर-दलाल का नेक्सस  नई  नईं कारगुजारियों में लगा रहता है ....हलकान नीचे का मुलाजिम होता है ...

अब तो यही लगता है जनप्रिय सरकारों की चाकरी के बजाय जीविकोपार्जन का कोई और रास्ता चुना गया होता तो कम से कम अपनी निजी गरिमा को बचाए रखते हुए राष्ट्र निर्माण और समाज सेवा में कुछ ईमानदार सहयोग तो दिया ही गया  होता -यह पूरा जीवन ही जैसे व्यर्थ चला गया हो!

शनिवार, 21 मई 2011

मेरे पति मेरे कामों में बिलकुल भी हाथ नहीं बटाते!

अभी उसी दिन मेरे कानों तक यह नारी कंठ -स्वर आ पहुंचा -अनुमानतः बगल के फ़्लैट में चल रही दूरभाष वार्ता का कुछ अंश खिडकियों को लांघता मुझ तक आ पहुंचा था और संभवतः पड़ोसन  अपनी माँ से दुखवा सुखवा बाँट रही थीं -बरबस ही मेरे होठों पर मुस्कान थिरक आयी -यह एक आम शिकायत है जो भारतीय पत्नियों को अपने पति से रहती है.... हम आप सभी गाहे बगाहे इस आरोप के घेरे में आते रहते हैं ..कुंकडू कूँ पतियों (हेंन  पेक हस्बैंड्स ) को छोडिये वे अलग ही प्रजाति हैं ...मुझे याद है मेरे देवरिया (पूर्वी उत्तर प्रदेश ) पोस्टिंग के दौरान मेरे पहचान के एक दुखियारे पति  लगभग सभी घरेलू कामों यहाँ तक कि बर्तन मांजने ,आंटा गूंथने ,साग सब्जी काटने, घर की साफ़ सफाई ,कपडे साफ़ करने आदि में पत्नी का हाथ ही नहीं बटाते बल्कि प्रायः यह सब पूरा काम ही उनके जिम्मे रहता और बिचारे बाहर के कामों -दफ्तर आदि से भी निपटते रहते ...जाहिर है बहुत व्यस्त रहते थे -कई दिन तो उनके दर्शन भी दुर्लभ हो जाते थे....मेरी पत्नी अक्सर मुझे ताने देती और कहतीं देखो यही हैं एक आदर्श पति -और मैं उस आदर्श पति पर मन ही मन कुढ़ता ....

इस लिहाज से तो मैं कभी भी एक आदर्श पति नहीं बन पाया -और आज भी मुझे यह ताना सुनने को मिलता रहता है ....वैसे भी मैं कभी भी एक अच्छा अढवा टिकोर (errand ) और पत्नी टहल करने वाला इंसान नहीं बन पाया हूँ और ऐसे इंसानों से बेहद ईर्ष्या करता हूँ ...कभी कभी इन्हें खूब गरियाने का मन कहता है .....अपुन का मानना यही है कि आम तौर पर एक गृहिणी का कार्य क्षेत्र घर के भीतर का है और पुरुषों को बाहरी फ्रंट संभालना है ...यह कोई नयी बात तो नहीं -इस व्यवस्था की जड़ें हमारी जीनों में हैं -और जीनों में तब्दीली लाख लाख वर्षों में जाकर होती है कोई हजार वजार साल में नहीं -आज भी पुरुष अपनी उसी पुरानी शिकारी की भूमिका में है -उसका शिकारगाह उसका कार्यक्षेत्र है और शिकार उसके कार्य और परियोजनाएं हैं जिन्हें साधने के लिए वह एक रणनीति बनाता है रोज रोज .....वह हजारो साल पहले की ही भांति आज भी घर से बाहर  निकल पड़ता है ...'शिकार ' खेलने और शाम को जब लौटता है तब प्रायः शिकार की सफलताओं -असफलताओं पर गर्वित या दुखी मन घर की देहरी में प्रवेश करता है -अब ऐसे वक्त मोहक मुस्कान के बजाय उसे सब्जी काटने या आंटा गूथने की थाल पकड़ा दी जाय तो ? मैं तो न करूँ यह सब! 

मैं अक्सर शाम घर लौटने पर कुछ न कुछ खाने को ले आता रहा हूँ -मिष्ठान्न वगैरह -अब भी ऐसा ही करता हूँ जबकि अब बच्चे भी घर पर नहीं हैं -मुझे  यह परम्परा अपने पितामह के समय से ही याद है -यह भी मुझे शिकार गाह से लौटते वक्त हाथ में गर्वीली ट्राफी की प्रतीति कराता है ...खाली हाथ मतलब आज शिकार नहीं मिला -शिकार मिलने या न मिलने दोनों ही स्थितियों में कोई भी कामकाजी पति घर लौटते  ही सब्जी काटने या आंटा गूथने का आफर कैसे सहज हो स्वीकार कर सकता है? क्या गृहणियां इत्ती सी बात को भी नहीं समझ पातीं?  अब रही घर में रहने के दौरान का समय तो यह समय श्रेष्ठ पतियों का आमोद प्रमोद में क्यों न बीते?  साहित्य पठन,सृजन ,ब्लागिंग भी तो है .....अब ऐसे में इन  क्षुद्र कामों की फ़रियाद ....न बाबा न मुझसे नहीं होता यह सब ..बाहर भी सम्भालूँ और घर के भीतर भी .....

अब इन्ही बातों को लेकर शुरू हो जाती है पति पत्नी की अनवरत चलने वाली नोंक झोंक -अभी अभी हुए एक सर्वे में यह बात सामने आयी है कि अमूमन पति पत्नी के बीच ऐसे ही मामलों को लेकर रोज  औसतन सात और वर्ष भर में ढाई हजार बार नोक झोंक हो जाती है -इसमें वह 'प्रोवर्बियल' मायके  चली जाऊँगी का ब्रह्मास्त्र भी शामिल है .....बात की जड़ और होती है मगर बतडंग होते देर नहीं लगती -आपने जूता सही जगह नहीं निकाला ,कपडे ठीक से सूखने को नहीं डाले .....पहनने के पहले कपडे नहीं झटके ..कमरा छोड़ने के पहले बत्ती नहीं बुझायी ...बाथरूम का दरवाजा ठीक से नहीं बंद किया ....किचेन में जो सामान जहाँ से उठाया वहां क्यों नहीं  रखा ....बाप रे ..कभी कभी तो जी इतना आजिज आ जाता है कि मन हिमालय आरोहण को तैयार होने लगता है ....

बुधवार, 18 मई 2011

धन्य रे कर्कशा नारि!

नारी का यह रौद्र वीभत्स रूप भी तनिक देखिये ..रोंगटे खड़े हो जायेगें .बात अपने जौनपुर की है ..घटना दिल दहलाने वाली है ...पहले पूरा समाचार जो अपने जिले जवार जौनपुर का ही है -बड़े बड़े मंसेधू(पति ) ऐसी नारी से  पार न पायें - ..

"जेवर कम देख भड़की मां कुएं में कूदी

May 17, 10:08 pm

बरईपार (जौनपुर): मछलीशहर थाना क्षेत्र के भाऊपुर गांव में आयी एक बारात में सोमवार की रात से लेकर मंगलवार की सुबह तक जमकर हंगामा हुआ। जिसमें बेटी के जेवर वर पक्ष द्वारा कम लाये जाने से भड़की मां ने कुएं में छलांग लगा दी।
बताया जाता है कि प्रतापगढ़ जनपद से एक बारात भाऊपुर गांव में आयी थी। रात में द्वारचार के बाद बारातियों ने भोजन किया और विवाद के लिए मण्डप लग गया। जिसमें बैठे वर पक्ष के लोगों ने जब दुल्हन के लिए लाये गये जेवर सबके सामने रखा तो तय वादे के मुताबिक कम जेवर देख दुल्हन की मां भड़क गयी। विवाह तो किसी तरह हो गया लेकिन मां की जिद थी कि न तो दुल्हन विदा होगी और न ही कन्या पक्ष द्वारा तय किया हुआ कोई सामान वर पक्ष के साथ जाएगा।
सुबह दुल्हन की मां को आस-पास न देख लोगों ने सामान को गाड़ी में लादना शुरु किया। इसी बीच अचानक वह पहुंच गयी और सबके ऊपर भड़क गयी। अपनी बात न मानते देख दुल्हन की मां ने घर के पास ही स्थित कुएं में छलांग लगा दिया। जिससे घरातियों-बारातियों में हड़कम्प मच गया। गनीमत तो यह था कि कुएं में मात्र चार फिट ही पानी था और लोगों ने काफी मशक्कत के बाद उनको बाहर निकाला।
इसके बाद देर तक पंचायत हुई और तय हुआ कि सिर्फ दुल्हन ही विदा होगी, जिसके साथ एक अन्य युवती भी जाएगी। उसके साथ कोई सामान नहीं जाएगा। वही यह शर्त भी रखी गयी कि एक दिन बाद दुल्हन वापस अपने मायके आ जाएगी। इस बात पर किसी तरह मामला शांत हुआ और विदाई की रस्म अदा की गयी। घटना को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त है।"

 आपको अजब लग सकता है लेकिन मेरा अब तक का जीवन ही ऐसी नारी गाथाओं को करीब से  देखते सुनते बीता है.  भला ऐसी नारियों से कौन पार पा   सकता है जिसे न तो अपने परिवार और न ही बेटी के परिवार वालों की मान मर्यादा का ख़याल रहा -सब शर्म से पानी पानी हुए!का न अबला कर सके का न सिन्धु समाय!
  मुझे बचपन की पढी कविराय की कुण्डलियाँ याद आयीं -एक आपसे साझा कर रहा हूँ -

मरे बैल गरियार मरे वह अड़ियल टट्टू 
मरे कर्कशा नारि मरे वह खसम निखट्टू 
बाभन सो मरि जाय हाथ ले मदिरा पीवे 
पूत सोई मरि जाय जो कुल को दाग लगावे 
बे नियाव राजा मरे तबे नीद भर सोईये
बैताल कहें विक्रम सुनो इते मरे न रोईये  
गरियार=ऐसा बैल जो कृषि कर्म के दौरान बैठ जाता हो और पैना (चाबुक ) 
मारने पर भी न उठता हो ... 
निखट्टू =कोई काम न करने वाला 
बेनियाव =अन्यायी 

रविवार, 15 मई 2011

इलाहाबाद की दोपहरी और सिविल लाईन्स का काफी हाऊस -एक जामिया वू सा अहसास!

पहले तो यह गुजारिश कि ये जामिया वू क्या बला है इस पोस्ट पर जाकर जान सकते हैं -आलसी लोगों के लिए वहीं से यह उद्धरण," जामिया ( jamiya )  वू आपको एक ऐसी स्थिति का आभास देता है जिसमें लगता है कि अमुक स्थिति में तो कभी आप रहे ही  नहीं जबकि हकीकत में वैसी स्थिति से आप पूर्व में गुजर चुके होते हैं!" ...कल अचानक इलाहाबाद जाना हुआ और अपनी घोषित रणनीति के तहत मैंने अपनी इस एक दिनी यात्रा का विवरण फेसबुक पर डाल दिया था -यह रणनीति इसलिए कि लोग बाग़ अक्सर कहते हुए पाए जाते हैं कि अरे आप तो हमारे  शहर में आये और बताया तक नहीं! पहले ही बता दिया होता तो आबे  हयात हाजिर न कर देता आपके सामने! ....बहरहाल कोई ब्लॉगर तो नहीं अलबत्ता एक -दो फेसबुकिये मित्रों ने कुछ तवज्जो जरुर दी ..साथ तो पूरा इस भौतिक जगत के ही एक मित्र ने दिया ..साथ साथ घूमे ..घुमाए अपनी चार पहिये पर ....हाँ तो बात जामिया वू की हो रही थी ..मित्र मुझे भरी दोपहर (मुई इलाहाबाद की गर्मी भी जानलेवा होती है और जाड़ा भी ) सिविल  लाईन्स के इंडियन काफी हाऊस ले गए -करीब ढाई दशक बाद पहली नजर में तो यह   मुझमें जामिया वू की फीलिंग्स जगा गया -जैसे मैं पहले तो यहाँ कभी आया ही नहीं ..कुछ नए रंग रोशन का असर था या सर पर चमकते सूर्य देव कि कुछ पलों तक मतिभ्रम सा बना रहा ... मगर जल्दी ही यादें फिर लौट आयीं  .अपने इलाहाबाद की  पढ़ाई के दौरान यहाँ तो हम आते ही थे.....
सुधियों  में बसा इलाहाबाद का काफी हाऊस 

मुझे पहली बार इंडियन काफी हाऊस का जाना भी सहसा याद हो आया ...वो पल तो मेरी स्मृति का एक अहम् हिस्सा है -बात १९७८ की है ,तब मैं एम् एस सी का छात्र था और दिमाग में जीवन और मृत्यु  के फलसफे को लेकर कई सवाल कौंधते थे ..मैं उन  दिनों बैंक रोड पर रहता था -बैंक रोड तब एक जाना माना नाम था जहाँ फिराक गोरखपुरी जैसे अजीम शायर और डॉ राम कुमार वर्मा जैसे मूर्धन्य साहित्यकार कवि और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अनेक ख्यातिलब्ध प्रोफेसरों के मकान थे -राज्यलक्ष्मी वर्मा जैसी मुखर वक्ता भी वहीं रहती थीं और... और...कितने नाम गिनाएं!  मेरे आवास की एक खिड़की सरोजिनी नायडू गर्ल्स होस्टल के पिछवाड़े की अमराई में खुलती थी ...और मेरे मौसा जी की सख्त हिदायत थी किर उस खिड़की को  कम से कम खोला जाय -मौसा जी बहुत अल्प भाषी थे ..तब भी आज भी (आज वे ९२ साल के हैं ) ..हम उनसे बहुत डरते भी थे इसलिए पूछ तक नहीं पाए कि यह पाबंदी उन्होंने क्यों लगायी थी ..तभी एक दिन मेरे एक खिलंदड़े दोस्त ने मेरे मना करने पर भी उस खिड़की को अकस्मात खोला तो ठीक सामने एक दो सुकन्यायों को देख हम सब स्तब्ध रह गए .....अरे यह तो विषयांतर होने लगा ....इस किस्साये हुस्नपरी को आगे के लिए मुल्तवी कर आईये आज के विषय पर लौटते हैं ...

हाँ तो बात बैंक रोड की हो रही थी ..एक दिन बैंक रोड के कटरा  वाले मुहाने पर मुझे प्रोफ़ेसर टी पति दिखे जो उस समय विश्वविद्यालय के प्रो वाईस चांसलर थे-उनकी छवि एक धुर विद्वान् और कुशल वक्ता की थी- वे आत्मा परमात्मा और ब्रह्म विषयों पर घंटो धाराप्रवाह बोलते थे-वे सामने थे और जैसे अंधे को क्या चाहिए बस दो आँखें तो मैं उनकी और लपक पडा और बिना किसी औपचारिकता के ही यह सवाल दाग दिया कि सर क्या आप भगवान् के अस्तित्व को मानते हैं? अविचलित से प्रोफ़ेसर ने इशारे से एक रिक्शे वाले को बुलाया ,वहीं ठेले से मूंगफली खरीदी और मुझसे कहा चलो बैठो ..मैं किसी और काम से जा रहा था मगर उस वक्त मंत्रमुग्ध सा उनके साथ रिक्शे पर जा बैठा ..उसका रुख पाश सिविल लाईन्स की और था ..मैं बार बार उनसे ईश्वर के बारे में पूछता और वे सवाल की अनसुनी करते हुए मेरे बारे में ,परिवार के बारे में सवाल करते ..फिर कहते कोई संस्कृत का श्लोक सुनाओ ..अब ब्राह्मण के घर में जन्म होने के नाते मैं एक एक कर जितने भी श्लोक याद थे उन्हें सुनाता रहा ..मगर इस बैचैनी के साथ कि अब तो वे मेरे महाप्रश्न का जवाब दे ही देगें ...इसी दौरान सिविल लाईन्स के  मशहूर काफी हाऊस के ठीक सामने रिक्शा आ रुका ..रिक्शा वाला उन्हें और उनकी मंजिल को जानता था ...बाद में पता चला वे अपनी हर शाम वहीं काफी हाऊस में ही गुजारते थे...जैसे इलाहाबाद के कवि कथाकारों सामाजिक सक्रियकों की यह एक शगल था ,एक दैननंदिनी थी ....मैंने सोचा अब संयत होकर यहाँ वे ईश्वर चर्चा करेगें..मैंने हताशा भरे स्वर में अपना सवाल फिर दुहराया ..मगर उन्होंने नाश्ते का आर्डर दिया और नाश्ते के सर्व होने तक  मेरी सवाल बनी  घूरती विस्फारित आँखों के बावजूद भी मौन साधे रहे ..नाश्ता भरपूर था ..मैंने अंतिम बार उन्हें बड़ी हताश नजरों से देखा कि हे प्रभु अब तो ईश्वर चर्चा हो जाय ...मगर उन्होंने  मुझे सामने के सुस्वादु व्यंजन को खाने का इशारा किया ..फिर काफी आयी ....और हम वापस उसी रास्ते बैंक रोड लौट आये लेकिन मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया उन्होंने ....आज तक मैं उस प्रखर वक्ता के मौन को ठीक ठीक परिभाषित नहीं कर पाया हूँ  और उनके मौन के निहितार्थों को सोचा करता हूँ -ईश्वर  सचमुच बताये  जा सकने की क्षमता से परे जो हैं!"जाहि अनादि अनन्त  अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावें " को भला प्रोफ़ेसर साहब इतने अल्प समय में एक अल्पज्ञ ,अधीर छात्र को कैसे बता पाते ....

आज भी भरी दोपहर में गुलजार था काफी हाऊस  

बहरहाल वहीं इंडियन काफी हाऊस में मेरे गैर आभासी  मित्र  डॉ.  बृजेश कान्त द्विवेदी मुझे डोसे की दावत दे रहे थे..फिर हमने कुछ पुरानी यादों  को ताजा करते हुए भरी दुपहरी में कोल्ड काफी पीकर 'वही मरहलें हैं वही जलन " की कशिश को भरसक दबाने की पुरजोर कोशिशें कीं -यह भी याद आया कि मेरी विज्ञान कथा ,'सम्मोहन'  की नायिका भी मेरे इन्डियन काफी हाऊस की यादों से ही जुडी थी ....इलाहाबाद की कितनी ही भूली बिसरी यादें कोल्ड काफी पीते पीते वहीं सिमट सी आयीं ...और यह हैंग ओवर काफी देर तक बना रहा -वापसी बस यात्रा में ऐसे ही कुछ ख्यालों में डूबे हुए मैंने फेसबुक पर टिपटिपाया-

आबे जमजम भी अब जाम नजर आता है 
 तेरे इश्क में कोई बदनाम नजर आता है 
जिन्दगी के इन आख़िरी पलों में अब तो 
इक वो चेहरा सुबह शाम नज़र आता है .....

बलिहारी जाऊं उन चंद फेसबुकिये  मित्रों की जिन्होंने जवाब में  तुरंत हाल चाल पूछा ..एक फेसबुकिये मित्र ने फ़ौरन घर पर भी आमंत्रित किया,मेसेज से पता और संपर्क नंबर भी दिया मगर तब तक तो बस सिविल लाईन्स से छूट चुकी थी ....काफी आगे भी चली आयी थी ..अब तो डेस्टिनेशन बनारस ही सूझ रहा था ....जहाँ इलाहाबाद की भरी दुपहरी की जलन के बाद एक पुरसकूं शाम मेरा इंतज़ार कर रही थी.....

मंगलवार, 10 मई 2011

आखिर कौन सा उपहार लूं?

इस शाश्वत से बनते जा रहे  सवाल  से आप भी दो चार हुए बिना नहीं रहे होंगे कि कहीं पर निमंत्रित हैं और भारी असमंजस यह कि आखिर उपहार कौन सा ले जायं? किसी का बर्थ डे है तो किसी की रिंग सेरेमनी और किसी का व्याह तो किसी की एनीवर्सरी -बड़ी उहापोह  की स्थति हो जाती है उपहारों के चयन को लेकर... अब जैसे कल ही मुझे अपने एक मित्र विनोद कुमार जायसवाल जी का निमंत्रण मिला, उनके बेटे समन्वय (वे मायिनार्टीज डिपार्टमेंट देखते हैं तो यह नाम अच्छा ही हुआ न!) के पहले जन्मोत्सव में शरीक होने का -सुबह से ही उधेड़बुन शुरू हो गयी -आखिर कौन सा उपहार ले जाना उचित होगा -वैसे इन दिनों लिफाफे में बस रूपये डाल के दे देने का रिवाज जोर पकड़ रहा है -जो देने वाले को उपहार के चयन और उसकी कल्पनाशीलता के झंझट से तो मुक्त रखता ही है ,कई आतिथेय (होस्ट ) भी नगद  धनराशि के ही मुन्तजिर होते हैं और नगद नारायण का अपने तरीके /आवश्यकता के मुताबिक़ इस्तेमाल कर लेते हैं ....अब होशियार कहिये या मूढ़ कुछ लोग यही युक्ति अपना कर जिम्मेदारी से फारिग हो लेते हैं ....पैसा फेको और फूटो! मगर मुझे तो यह बहुत फूहड़ अरुचिकर सा विकल्प लगता है ...

मुझ जैसे जगत गति से कुछ अलग थलग पड़े लोगों की समस्या अलग है जो हर वक्त वेवक्त अपनी करने की ठान लेते हैं ....कुछ कल्पनाशील.... कुछ सुरुचिपूर्ण ....कुछ अलग सा ...कुछ मूर्खतापूर्ण ....अब श्रीमती जी से विचार विमर्श शुरू हुआ कि आखिर फर्स्ट बर्थ डे गिफ्ट ली क्या जाय ...गहन विमर्श होता रहा -कपडे का सेट ले जाईये .".हूँ ".....यही ठीक रहेगा ....कोई खिलौना भी ले सकते हैं ..."हाँ "....देखिये इन दिनों चांदी का सिक्का कितने का  है ?.... "हाँ यह ठीक रहेगा "मैं श्रीमती जी के एक एक सुझाव पर विचार मग्न हो जा रहा था -तभी मुझे वो कविता याद आ गयी सहसा -ठुमकि चालत रामचंद्र बाजत पैजनियाँ....अच्छा चांदी की करधन या पैजनी कैसी रहेगी? "आपको मालूम भी है सोने चांदी का दाम" -इन दिनों आसमान पर है भाव -कोई पैजनी या करधन ही कम से कम दो ढाई हजार से कम की नहीं मिलगी ..मेरा दिल बैठ गया ...चलो एक चांदी का गिलास देखते हैं ...."वो भी काफी महंगा होगा....बहरहाल निर्णय यह हुआ कि किसी गिफ्ट सेंटर/दुकान  पर ही चल कर गिफ्ट आईडियाज  और च्वायस को अंजाम दिया जाय ...

 घुसते ही लगा कि किसी शादी -व्याह के पंडाल में आ गए
गिफ्ट का चयन /चुनाव करने का सबसे उपयुक्त स्थल एक अच्छी सी वैविध्यपूर्ण दुकान ही है जो केवल गिफ्ट्स की ही हो ....और मैंने चयन किया -एक आईटम जो मेरे हिसाब से थोड़ी नवीनता लिए ,मेरी रूचि के अनुकूल (अब बच्चे और माता पिता को कैसा लगा होगा ये तो वही जानें )  और मेरी जेब के हिसाब से भी ठीक ....आप भी देखें और मेरे चयन पर टिप्पणी करें ताकि मैं आश्वस्त हो लूं कि मेरा चयन  इतना बुरा भी नहीं .. :) 

 समन्वय के पैरेंट्स ने काटा पहले बर्थ डे का केक
पहली बर्थ डे पार्टी का भी कहना ही क्या  था -पंडाल में घुसते ही लगा कि किसी शादी के पंडाल में आ गये हैं ....लेकिन तभी होस्ट के करीबी और मेरे भी निकट के एक मित्र जनाब अजय कुमार कैसर ने  लपककर मुझे आत्मीयता से  रिसीव किया और फिर खान पान का जो सिलसिला शुरू हुआ तो रात ग्यारह बजे तक चलता रहा -मैंने पहले भी जिक्र किया है कि अब ये आउटडोर समारोह अपने खान पान की सुरुचिपूर्णता में पांच सितारा होटलों की प्रतीति कर रहे हैं -मीनू तो इतना विषद और रसमय कि क्या छोड़ें क्या खायं वाला डिलेमा आ उपस्थित होता है ...बनारस की लस्सी की धूम है इन दिनों ..शुरुआत तो उसी से हुयी ....फिर फ्रेश फ्रूट ,किसिम किसिम के चायनीज व्यंजन  ,टिक्की गोलगप्पा चाट ...सभी कुछ तो ....फ्रूट में अब विदेशी फलों की आमद भी काफी दिख रही है -मैंने लाल रंग के बड़े बड़े  अंगूर देखे जो अपने यहाँ के अंगूरों की तुलना में चार  गुना बड़े थे-बताया गया जापानी अंगूर हैं ...मगर बेहद मीठे -खट्टे तो कदापि नहीं ..अब इवेंट मैनेजमेंट का रंग यहाँ भी खूब दिखने लगा है -एक एक सेलेक्टेड और क्वालिटी कंट्रोल्ड आईटम ..जिनके स्वाद का तो बस कहना ही क्या? आईसक्रीम कम्पोजिट फ्लेवर -कई तरह के आईसक्रीम का मिक्स थी -और ऊपर से एक छतरी लगाकर गार्निश की गयी थी ...लाजवाब! 
 यहीं  सजनेवाली है फ्रेश फ्रूट की तश्तरियां

खर्च ? अब बेटे का पहला बर्थ डे ..मां बाप के उमंग और उछाह की कोई सीमा थोड़े ही रहती है -कोई जरुरी है हर जगहं टुच्चे सवाल किये ही जायं? 
 मित्र ने की लपक कर की मेरी आगवानी
हमने बर्थ डे केक के कटने पर समन्वय को खूब आशीष दिया ..और भव्य सुरुचिपूर्ण भोजन पर जायसवाल दम्पत्ति को धन्यवाद देकर  हाल के बाहर हो लिए ...


शुक्रवार, 6 मई 2011

परशुराम का आह्वान

आज परशुराम जयन्ती है और इस अवसर पर राजकाज से मेरा अवकाश भी ...सो इसका सदुपयोग करते हुये आज आपसे परशुराम चरित पर तनिक चर्चा का मन है -परशुराम अमर माने गए हैं -यह श्लोक देखिये -
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभिषण:
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः 
मतलब अश्वत्थामा,राजा  बलि ,व्यास ,हनुमान ,विभीषण ,कृपाचार्य और परशुराम  ये सातों विभूतियाँ अमर हैं ..जाहिर है  इनकी प्रासंगिकता चिरकालिक है ,आज भी है! पिछले वर्ष जब मैं दक्षिण -यात्रा पर अर्थात दक्षिणायन था तो डॉ. जे सी फिलिप शास्त्री ने मुझे दक्षिण में भी राजा बलि और परशुराम के प्रताप का कुछ बोध कराया था -जहाँ लोकमानस में इनकी आज भी काफी कद्र है ..उनसे ही पहली बार जाना की कोंकण और केरल उनका ही बसाया हुआ है -ऐसी मान्यता है .वर्णन मिलता है कि उन्होंने कोंकण से लगे समुद्र में अपने फरसे को शमित किया था और एक बड़े भू भाग को समुद्र से मांग  (रिक्लेम ) कर मनुष्य के उपयोगार्थ बनाया था ...गोवा में  परशुराम की भव्य प्रतिमा उनके प्रति राज्य  के सम्मान और समर्पण की संकेतक है .



कौन थे परशुराम ?महज एक मिथकीय चरित्र या कुछ ऐतिहासिकता भी है इनके व्यक्तित्व और कृतित्व   के निरूपण में ? यह एक मुश्किल सवाल है -हम भारत के अतीत के एक बड़े हिस्से को अभी भी ऐतिहासिकता के दायरे  में नहीं ला पाए हैं -मगर हमें यह इतिहास वेत्ताओं की सीमाओं का ही भान कराता है,सत्य का नहीं! हम अगर प्रमाण नहीं इकट्ठा कर पा रहे हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि लोक मानस में  हजारों सालों से
जीवंत अनेक वृत्तांत सब झूंठे हैं -हाँ बहुत सी बातों में छुपी अतिरन्जनाओं ,समय के साथ की विकृतियों में भी हमें कुछ काम की बातें मिल सकती हैं बशर्ते हम पूर्वाग्रहों से मुक्त आँख कान खोल अपने अतीत का अवगाहन करें ..]

मुझे लगता है परशुराम वैष्णव संस्कृति के एक यशश्वी ध्वजावाहक थे -इनका आविर्भाव हमारे पुराणोक्त त्रेता युग और वह भी इक्कीसवें त्रेताकाल में हुआ था -न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है यह वही समय था -संभवतः ईसा से ५-६ हजार वर्ष पहले जब दक्षिण भारत में अफ्रीका से आये मूल वंशजों का अधिपत्य हो चुका था और एक भरी पूरी संस्कृति अस्तित्व में आ  गयी थी -परशुराम एक उद्भट विद्वान् और पराक्रमी इन दोनों विपरीत से लगने वाली विशिष्टियों के धनी थे और निरंतर अपने राज्य के विस्तार में लगे थे -उन्होंने दक्षिण में अपने तत्कालीन वैष्णवी संस्कृति  के विरोधियों से जमकर लोहा लिया ...बस केवल इक्ष्वाकु वंश जिसके कालांतर में यशस्वी वंशधर  राजा राम हुए को छोड़ते हुए उन्होंने तत्कालीन दुष्ट ,आक्रामक क्षत्रियों का एक बार नहीं अनेक बार नाश किया -उनके धरती पर बढ़ते प्रभुत्व पर विराम लगा दिया ....वह बड़े बड़े आंतरिक युद्धों का समय था ..शायद उत्तर की ओर से धमक रही आक्रान्ताओं की भीड़ से संघर्ष की शुरुआत थी और यह जाकर खुद वैष्णवीं राम के बढ़ते अधिपत्य के साथ समाप्त हुयी -कथायें बताती हैं कि किस तरह परशुराम राम का सम्मिलन हुआ और तब जाकर परशुराम का अभियान थमा -वे पुनः आंध्र स्थित महेंद्र पर्वत पर जाकर ध्यानमग्न हो गए ....वाल्मिकी रामायण और राम चरित मानस में यह प्रसंग /रूपक बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत हुआ है -परशुराम का राम से समन्वय वैष्णवों के उत्कर्ष और शैवों के किंचित पराभव का भी द्योतक हो सकता है यद्यपि राम में  शैवों और वैष्णवों दोनों के आमेलन का प्रभाव कालांतर के तुलसी सरीखे चिन्तक और कथाकार दर्शाते हैं ....

परशुराम का व्यक्तित्व जरा इन अलग अलग काल के मनीषियों की दृष्टि से देखिये -
पुरतः चतुरो वेदाः ,पृष्ठतः सशरं धनु:
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि 
(मुख चारों वेदों से सुशोभित ,पीठपर शरों सहित धनुष ,एक ओर तो ब्राह्मण - तेज रूपी  शास्त्र   और दूसरी ओर क्षत्रियोचित शस्त्र ) -यह श्लोक आज के ब्राह्मणों को भी शायद प्रेरित कर सके! अब   देखिये तुलसी परशुराम को किस रूप में देखते हैं -
वृषभ  कंध  अरु  बाहू  विशाला .चारु  जनेऊ  माल   मृगछाला
कटि   मुनि बसन  तून  दुई बांधे .धनु सर कर कुठारु कल काँधे 

..यहाँ तुलसी फरसे को भी समाहित कर लाये ....अब राष्ट्र कवि दिनकर का यह व्यक्तित्व निरूपण देखिये -
मुख में वेद पीठ पर तरकस ,कर में कठिन कुठार विमल 
शाप और शर दोनों ही थे जिस महान ऋषि के संबल 

अर्थात वे ज्ञानार्जित  वचन  और पराक्रम दोनों से अपने विरोधी को श्रीहीन करने में पूर्णतया समर्थ थे.....अतीत में एक  लम्बे समय तक चलने वाले देश के आंतरिक युद्ध के नायक थे परशुराम और इसलिए कई युगों तक उनका प्रभाव बना रहा -यह संभवतः वही दीर्घकालिक युद्ध था जिसमें कभी क्षत्रिय विश्वामित्र और महामुनि वशिष्ठ भी भिड़े थे और विश्वामित्र अकस्मात कह पड़े थे..
धिग बलम क्षत्रिय  बलम ब्रह्म तेजो बलम बलम 
एकेन      ब्रह्मदण्डेन        सर्वस्त्राणि हतानि मे 
(वाल्मीकि रामायण )
कदाचित यह अन्यथा नहीं कि उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुयी राजनैतिक भूमि को स्थिरता देने के लिए आज यहाँ के जन्मना ब्राह्मण परशुराम को अपने जाति के गौरव /शौर्य का प्रतीक माने हुए हैं मगर उन्हें ऐसे महान नायक के गुणों का भी समावेश अपने में करना होगा ...मात्र एक सीमित अजेंडे के परिप्रेक्ष्य में इस महान व्यक्तित्व का आह्वान निश्चय ही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होगी ....

रविवार, 1 मई 2011

कुछ गजल वजल हो जाय ......(लाईटर मूड में)

मुझसे किसी ने कल या परसों पूछा कि क्या  मैं गजल वजल भी लिखता हूँ ..मेरा जवाब अक्सर यही होता है नहीं और यह बिलकुल सच जवाब है ...मैं जिस शुष्क और असंवेदनशील माहौल में काम करता हूँ वहां ऐसी रचनात्मकता के लिए कोई जगह नहीं है .बल्कि उल्टे लोग ऐसी सृजनात्मक प्रवृत्तियों को उपहास की नजर से देखते हैं - जैसे  गजल वजल लिखना कोई नामर्दगी का काम हो ..हमारा परिवेश ऐसे ही लोगों से भरा पूरा है ...अगर आपकी ऐसी कोई चित्त वृत्ति है तो आप तुरंत हलके में ले लिए जायेंगे  -और अगर कहीं अपने ऐसे हुनर के चलते आप कोई ठीक ठाक रोजगार पाने से रह गए तो फिर तो उपहास की धार और तेज हो जाती है -'देखो तो पढ़े फारसी बेचें तेल' ...

समाज का जब ऐसा हाल है तो रचनाधर्मिता का दुर्दिन तो है ही ....अब कैसे कोई कविता गजल लिखता रहे और लिखकर भी इस तंत्र में तना रहे ..मैंने कई बड़े ही प्रतिभाशाली उच्च पदों पर आसीन अफसरों को देखा है जिन्होंने शुरुआत में तो अपनी सहज रचनाधर्मिता बनाये रखी मगर बाद के नौकरी के दिनों में उन्होंने रचनात्मकता से ऐसा मुंह मोड़ा कि फिर मुड़  कर नहीं देखा ..सरस्वती सिर धुनती रह गयीं!एक बहुत ही ओजस्वी रचनाकार जिनकी साहित्य जगत में तूती बोलती थी -पी सी एस आफीसर बनने के बाद धीरे धीरे अपने इस शौक का दामन छोड़ते गए और करीब पचीस बरसों बाद जब एक जिले में डी.एम् .बन कर आये तो मैंने उनकी कुछ पुरानी कवितायेँ सार्वजानिक रूप से पढ़ दीं -मुझ पर नाराज हो गए, अलग ले जाकर बोले कि मैंने अपनी उस पुरानी जिन्दगी को अलविदा कह दिया है -यहाँ मेरी पोल मत खोलो, लोग हलके में लेने लगेगें -मैं हतप्रभ रह गया ...ऐसे ही एक आई ये यस  हैं (वैसे ये तबका अब  कम रचनाधर्मी होता है) जो कभी लिख लिख कर मुझे अपने शेर भेजते थे अब शेरो शायरी का नाम भी नहीं लेते ....आज एक बहुत ऊँचे ओहदे को सुशोभित कर रहे हैं ....कभी मिलने पर शेरो सुखन और मौसिकी की बात छेड़ो तो किसी सोच में डूब जाते हैं .कितना दुखद है हमारा परिवेश अब इन सहज मानवीय वृत्तियों का विरोधी बन बैठा है ...या शायद  हमेशा से विरोधी रहा है ...

ऐसे में मेरे जैसा अदना सा मुलाजिम कोई गजल लिखता भी तो कैसे ...? ये हुनर आया ही नहीं ,हाँ कुछ लेख वेख पर जरुर हाथ आजमा लेता रहा क्योकि ऐसी सृजनशीलता छुपाई जा सकती है मगर कविता और शेरो शायरी का शौक इश्क और मुश्क की तरह  छुपता नहीं, फ़रिया जाता है और अक्सर फजीहत का बायस बन जाता  है हुक्मरानों और निजाम के बीच ...अब कहाँ रहे वे गुणग्राही लोग और हुनर की कद्र करने वाले राजा महराजा ...अब तो हालत यह है कि 'कद्रदानों की तबीयत का अजब हाल है आज ,बुलबुलों की ये हसरत के वे उल्लू न हुए..' ....

बात मैंने शुरू की थी उस मित्र के सवाल से -उन्होंने जिद पकड़ ली ..आपने लिखा जरुर होगा .मैं मान ही नहीं सकता/सकती-अब कुछ आग्रहों को टाला भी नहीं जा सकता तो मैंने अपने कई ट्रांसफरों   के दौरान चिद्दी चिद्दी होती डायरी के एक पुराने पन्ने से यह गजल उन्हें समर्पित कर दी .आप भी मुलाहिजा फरमाएं ....

मुझसे आखिर क्या खता हो गयी 

निगाहें उनकी जो खफा हो गयीं 
चाहत में न थी मेरे कोई कमी 
आशनाई उनकी  फ़ना  हो गयी 
या  कोई रकाबत का है ये  सितम 
उल्फत जो उनकी  बदनुमा हो गयी 
निभाते रहेगें हम रस्मे  वफ़ा 
गर जुदाई उनसे फिर भी हो गयी 



यह तब की है जब मैं बी एस सी कर रहा था -गुनी जन टालरेट कर लेगें ऐसी गुजारिश है और  मात्रा भाव आदि का दोष हो तो ठीक भी कर देगें यह भी अनुरोध  है .मैं इस रचना  को यहाँ  देते हुए बहुत सकुचाया और अब शर्मा भी रहा हूँ ...गुनी जन क्या कहेगें!इत्ती घटिया रचना ..हा हा ..मित्रजन तो वाह वाही करेगें ही,मित्रता में कोई दोष देखता है भला? उम्मीद तो पारखियों से है और आज के दिन तो मैं यह भी न लिख पाऊँ!


इस रचना को कुछ यूं इम्प्रोवायिज किया है ब्लागजगत के हर दिल अजीज हरफनमौला सतीश सक्सेना साहब ने ..मुलाहजा फरमाएं -
मुझको आखिर बताएं खता क्या हुई
क्यों तुम्हारी निगाहें बदल सी गयी !
चाहतों में न आई, मेरे कुछ कमी
आशनाई क्यों तेरी फ़ना हो गयी !

यह कैसी रकाबत,यह कैसा सितम है
क्यों उल्फत,तेरी बदनुमा हो गयी है?
निभाते रहेंगे, यह रस्मे वफ़ा हम !
जुदाई तेरी गर, नसीब बन गयी है ! 

शुक्रिया सतीश भाई! ....

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