जी हाँ, किसिम किसिम की पहेलियाँ!कालिदास काल से लेकर अमीर खुसरो तक पहेलियों ने कई रूप रंग बदले हैं और अब अंतर्जाल युग की पहेलियाँ हमारे सामने हैं .पिछली पोस्ट पर अल्पना जी ने मार्के की बात कही ,"अंतर्जाल पर हर तरह की पहेलियाँ उपलब्ध हैं..हिंदी ब्लॉग जगत में चित्र पहेली बहुत ही कॉमन हो गयी हैं .***लेकिन विवेक रस्तोगी जी की गणित की पहेलियाँ और रवि रतलामी जी की वर्ग पहेली ,सागर नाहर जी की संगीत पहेली[धुन आधारित ].... अपने आप में अलग हैं ***"
पहेलियाँ जिस भी काल की रही हों उनका उद्येश्य सदैव मानव मेधा को कुरेदना,ज्ञान के स्तर की जांच ,प्रत्युत्पन मति(हाजिर जवाबी ) की परख और वाक् चातुर्य के प्रदर्शन के साथ निसंदेह मनोरंजन भी था.
आज की इस पोस्ट का मकसद पहेलियों की अपनी परम्परा के कुछ दृष्टान्तों को आपसे साझा करने की है.राजा विक्रमादित्य /भोज और कालिदास के काल की इन्गिति करती कई पहेलियाँ संस्कृत साहित्य में समस्या पूर्ति के नाम से जानी जाती हैं .मतलब कोई एक वाक्य/पद्यांश दे दिया जाता था और तुरत फुरत उसे पूरा करने को कहा जाता था .एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जायेगी .एक दिन राजा भोज ने दरबार में आते ही सुना दिया ....
टटन टटन टह टट टन टटन्टह
सभी दरबारी भौचक ....आम तौर पर कालिदास ही जवाब दे पाते थे . उन्होंने यह समस्या पूर्ति भी कर दी जैसे कि उन्हें कोई दिव्य ज्ञान सा हो ..जो दृश्य वे देखे तक नहीं रहते थे, कहते हैं वह उनके मन मष्तिष्क में कौंध जाता था ..उन्होंने जवाब दिया -
राज्याभिषेके जलमानन्त्या
हस्ताच्युतो हेम घटो युवत्या
सोपानमार्गे च करोति शब्दं
टटन टटन टह टट टन टटन्टह
मतलब राजा के अभिषेक के लिए सोने के घड़े में जल लाती युवती के हाथ से घड़े के गिरने से सीढ़ियों पर उसकी शब्द ध्वनि हुई -टटन टटन टह टट टन टटन्टह! ऐसी समस्यापूर्ति के अनेक उदाहरण है जो किसी पहेली से कम नहीं लगते .ऐसे ही अनेक उदाहरण हिन्दी में भी हैं -जैसे कडी कडक गयी कड कड धप .... राजा भोज ने सोचा होगा कि नितांत वैयक्तिक और गोपनीय बात भला कैसे कोई बता पायेगा मगर कालिदास की दृष्टि तो त्रिकाल दर्शी और अन्तर्यामी थी ...जवाब दिया -
भोज प्रेम भर भयो भुजंग
लिपटे लीलावति के अंग
जब मद हुआ घोर गड गप्प
कडी कडक गयी कड कड धप
अब हिंडोले में प्रेम की सघनता हिंडोले की कड़ियों को तोड़ दे तो इसमें क्या आश्चर्य ..राजा भोज अवाक हुए और लज्जालु भी -विवरणों में ऐसा लिखा है .इन मनोरंजक समस्यापूर्ति/पहेलियों में मौलिक योगदान अमीर खुसरो ने किया ..उन्होंने अपनी विद्वताभरी मुकरियों के जरिये पहेलियों के साथ ही उनका उत्तर भी बड़े ही संवेदनापूर्ण और साहित्यिक लहजे में दिया ...दो घनिष्ठ सहेलियों की आपसी बतकही को उन्होंने इन पहेलियों का शिल्प आधार बनाया -
रात समय वह मेरे आवे
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!
नंगे पाँव फिरन नहिं देत
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!
अब इनमें एक सहेली की तो बस साजन उन्मुखता प्रबल है मगर दूसरी का बुद्धि चातुर्य देखिये वह साजन -निरपेक्ष रहकर बुद्धि चातुर्य से सखी को चिढ़ा सी भी रही है .अमीर खुसरो ने कुछ पहेलियाँ ऐसी स्टाईल में पूछी जो आज के बच्चे किशोर-युवा जाने अनजाने इस्तेमाल में लाते हैं -जैसे
जूता पहना नहीं
समोसा खाया नहीं
उत्तर— तला न था
समोसा खाया नहीं
उत्तर— तला न था
रोटी जली क्यों? घोडा अडा क्यों? पान सडा क्यों ?
उत्तर— फेरा न था
उत्तर— फेरा न था
और कई यहाँ है मनोरंजन कर सकते हैं .और एक निन्यानवे पहेली का चक्कर यहाँ भी चला है.आगे भी बीरबल और अकबर की नोक झोक में कई पहेलियों का आनन्द मिलता रहा ...जिन पर शायद फिर कभी चर्चा करुँ ..मेरा पहेली पोस्ट टाईम खत्म होता है अब .......