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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

यह सत्तू का सीजन है -कभी तो आजमाईये!

इस ब्लॉग के पुराने पाठक भूले नहीं होंगे कि मैं कभी कभार बाजार के कुछ नए प्रोडक्ट की चर्चा करता रहा हूँ जो मेरी पसंद के होते हैं और उनकी चर्चा का यहाँ उद्येश्य होता है कि आप भी चाहें तो उन्हें आजमा सकते हैं . मतलब मेरी उन प्रोडक्ट के लिए सिफारिश तो रहती है लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं रहता कि मैं उन प्रोडक्ट को किसी व्यावसायिक निहितार्थ से प्रमोट कर रहा होता हूँ और न ही कम्पनियों/प्रतिष्ठानों द्वारा मुझे सम्बन्धित प्रोडक्ट का ब्रांड अम्बेसडर या प्रतिनिधि ही बनाया गया रहता है . इसी तरह एक प्रोडक्ट मुझे यहाँ राबर्ट्सगंज की बाज़ार में दिखा -जो नया तो नहीं है , है  बहुत पुराना, मगर प्रेजेंटेशन बढियां है -अशोक के सत्तू . आप जानते ही हैं अशोक मसालों का मशहूर ब्रांड है .


सत्तू का नाम ले लीजिये तो किसी भी असली पुरवयिये के मुंह में पानी आ जाता है। यह है ही इतनी शानदार खाद्य सामग्री जिसका बहुविध प्रयोग पुरवयिये करते हैं -यह घोल के पिया जाता है ,अर्ध गीला करके खाया जाता है ,इसकी फंकी लगाई जा सकती है . बाटी के भीतर भर कर पका कर खाया जाता है . और मजे की बात कि मीठा और नमकीन दोनों तरह का सत्तू लोगों को पसंद है . मुझे नमकीन सत्तू पसंद है तो घरवाली मीठे सत्तू की शौक़ीन है . सत्तू का एक पर्व भी है जिसे सतुआ संक्रांति या सतुआन कहा जाता है जिस दिन पूर्वांचल के लोग पूरे आध्यात्मिक भाव से सत्तू का भोग लगाते हैं -अभी कुछ दिन पहले ही यह पर्व यहाँ बीता है

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सत्तू का मुख्य घटक पिसा भुना चना और जौ का आटा है जो एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है . यह एक बेहतरीन अत्यल्प कैलोरी का तुरंता भोजन है -बस पानी और नमक या चीनी /गुड मिलाया और उदरस्थ कर लिए . हर जगहं हर वक्त खाने में सहज है . मेरी एक मित्र हैं मध्य प्रदेश सिविल सर्विसेज में ऊंचे ओहदे पर हैं वे अपनी पर्स में सत्तू रखती हैं और मीटिंग के दौरान भी इसे इस्तेमाल में ले लेती हैं . वे बड़ी फैन हैं इस नायाब खाद्य सामग्री की। इसके बढ़ते  डिमांड को देखते हुए व्यावसायिक प्रतिष्ठान इसका वैल्यू एडीशन कर बाज़ार में आकर्षक पैक में उतार रहे हैं और सेवन की विधि भी लिखी  हुई  है . आज मैंने अशोक के इस  सत्तू ब्रांड का सेवन किया -अच्छा है . आप भी ट्राई कर सकते हैं . बस चार चम्मच एक गिलास में लीजिये ,भुना जीरा,पुदीना पावडर,नमक /चीनी मिलाईये और गटक लीजिये -इस गर्मी में इससे सुस्वादु पेय शायद ही कोई दूसरा हो! कुछ और बेहतर स्वाद आप अपने तरीके से भी कर सकते हैं .अशोक मसाले वालों का यह पेज भी देख सकते हैं .
यह सत्तू का सीजन है -कभी तो आजमाईये!

मंगलवार, 1 मई 2012

निर्धूम इन्डक्शन चूल्हे की धूम


आम भारतीय रसोईघरों में एल पी जी गैस कनेक्शन के बाद तेजी से एक नया निर्धूम चूल्हा जगहं घेरने लगा है -यह है इन्डक्शन चूल्हा. खाना पकाने का एक और नया सुभीतेवाला 'कूल' तरीका। यह ज्यादा पर्यावरण फ्रेंडली है और उन घरों में जहाँ जगह कम है,  रसोईघर के अलावा भी कहीं भी रखा जा सकता है...बस एक प्लग पॉइंट की दरकार है. लपटें नहीं धुंआ नहीं...कई मामलों में तो यह माइक्रोकूकर अवन से भी बढ़कर है...और  चूल्हे की लागत अन्य खाना पकाने के उपकरणों से बेहद कम.बस डेढ़ हजार से दो हजार के बीच...हां कई कम्पनियां इसकी लोकप्रियता के चलते अपने ब्रांड थोड़ा महंगे दामों में भी बाजारों में उतार चुकी हैं, मगर सस्ते इन्डकशन चूल्हों की भी बाजारों में भरमार है. कोई भी चुन लें!


यह चूल्हा चुम्बकीय फील्ड क्रियेट करती है और खाना उसी में पकता है. दरअसल यह चूल्हा भौतिकी के उस प्रदर्शन पर आधारित है जिसमें किसी क्वायल में बिजली के करंट के प्रवाह से आस पास एक चुम्बकीय क्षेत्र तैयार हो जाता है. अब ऐसी ही एक जुगत इस इन्डक्शन टाप/स्टोप/हाब (इसके कई नाम हैं) के भीतर है और उसके ऊपर एक न गरम होने वाली प्लेट लगी है.

जहां खाना बनाने के बर्तन-भगौना, कुकर, फ्राईंग पैन, तवा, कड़ाही को रखा जाता है - चुम्बकीय क्षेत्र उससे आकर टकराता है और बर्तन की पेंदी के प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) के चलते वह गरम होने लगता है...कोई हल्का फुल्का ताप नहीं, काफी ज्यादा ताप, जिसमें खाना मिनटों में बन कर तैयार हो जाता है. आश्चर्य की बात यह खाने का बर्तन गरम होता है मगर स्टोव नहीं ...बिना आग के भी खाना पक सकता है. यह है वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी का कमाल. मगर कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं - इन्डक्शन स्टोव पर केवल लोहे और स्टील के बर्तन ही इस्तेमाल में लाए जाते हैं, ऐल्म्यूनियम के नहीं - ऐल्म्यूनियम के बर्तन पिघल सकते हैं. इसलिए अब बाजारों में इन्डक्शन कूकिंग वेयर की भी बहुतायत हो चली है - हर खाना पकाने के काम आने वाले बरतन का इन्डक्शन रेंज अलग है, जिसमें उनकी पेंदी को इस लिहाज से सुधारा गया है. 

अगर आपको एलपी गैस मिलने में समस्या है या एक ही एलपीजी गैस सिलिंडर होने से उसके रिफिलिंग के दौरान खाना बनाने की समस्या है तो इस इन्डक्शन स्टोव को आजमा सकते हैं - बिजली की खपत भी काफी कम है.
तो आप भी चाहें तो इन्डक्शन स्टोव लेकर लेटेस्ट तकनीक प्रियता की धाक लोगों पर जमा सकती/सकते हैं! साथ ही ईंधन बचत के प्रबंध में भी एक कदम आगे ले जा सकती/सकते है...तो इन्डक्शन कूकिंग के लिए अग्रिम बधाई और शुभकामनाएं. जो लोग इसका पहले से इस्तेमाल कर रहे हैं वे अपने अनुभव भी साझा करें तो दूसरों का हित होगा.

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

भारतीय साड़ियों की दुशासन ब्रांड!

फैशन के नाम पर तन उघाडू संस्कृति के  पोषक पश्चिमी जगत का अगर कोई जाना माना डिजाईनर भारतीय साड़ी संस्करण लांच करे तो साड़ियों की उस खेप को मैं दुशासन ब्रांड ही कहूँगा या आपके पास कोई और मौलिक सुझाव है? टाईम पत्रिका से मुझे जानकारी मिली कि 174 वर्ष पुराने  पारसी फैशन हाउस हेर्मेस ने  भारतीय साड़ियों की पहली खेप जारी की है जो बेहतरीन फ्रेंच सिल्क और भारतीय पारंपरिक कला और शिल्पकारिता की अद्भुत मिसाल के रूप में प्रचारित की जा रही है . मगर यह पहली खेप तो भारतीय नारियों को ललचाने के लिए है जैसा कि हेर्मेस के भारतीय अध्यक्ष बेरट्रेंड मिचौड का कहना है ....मगर इन साड़ियों का मूल्य ६००० से ८००० डालर  के बीच है -मतलब तीन   से चार  लाख रुपये फी साड़ी....फिर तो इसे और भी दुशासन ब्रांड कहने का मन हो आया क्योंकि यह तो  अमूमन भारतीय नारी के तन को घेरने  वाली नहीं है ...बस फैशन शोज में दिखावे का आईटम बनके रह जायेगी जहां कपडे कम शरीर की नुमाईश ज्यादा होती है ..


इस ब्लॉग-पोस्ट के जरिये मैं हेर्मेस  को यह सलाह देना चाहता हूँ कि इन साड़ियों को वे दुशासन ब्रांड का नामकरण देकर यहाँ के परिवेश के एक ख़ास उपभोक्ता वर्ग में इन्हें ज्यादा लोकप्रिय बना सकते हैं ....कहते हैं इसी वर्ग ने इन दुशासन ब्रांड की पहली खेप को हाथोहाथ खरीद लिया ....भारतीय पहनावों और खासकर साड़ी के धंधे में भारतीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से मुकाबला आसान नहीं है ...यहाँ तक कि चीन ,ब्राज़ील और रूस के उपभोक्ता तक पश्चिमी फैशन डिजाईनरों /हाउसों के नए नए उत्पादों -फैशन पहनावों   को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं मगर भारतीय जनता इन्हें घास नहीं डालती -क्योकि आज भी यहाँ पारम्परिक परिधानों का ज्यादा बोलबाला है -देशी पसंद है .ऐसे परिवेश में हेर्मेस का यह साड़ी -उद्यम एक बड़े साहस का ही काम लगता है ...जो भी हो अभी तो इन 'दुशासनी'  साड़ियों की पहली खेप यहाँ बीते अक्टूबर में उतारी जा चुकी है और दावे हैं कि सभी की सभी बिक भी चुकी हैं ....
भारतीय नारी अपने पारम्परिक छवि में 
(फोटो पत्नी की पसंद है) 

फ्रेंच साड़ियों की इस खबर पर मेरी नज़र एक बनारसी होने के कारण भी पड़ी -अब बनारस की साड़ियों  की एक अपनी अलग क्रेज है और अपुष्ट आकड़ों पर अगर कुछ भी भरोसा किया जाय तो यहाँ बनारसी साड़ियों का सालाना कारोबार करोड़ से अरब तक जा पहुंचता है -जबकि धंधे के मंदी की बात हर साड़ी दुकानदार और व्यवसाय से जुड़े लोगों की जुबान पर रहता है ...बनारसी साड़ियों की मांग व्याह शादी के अवसरों पर कई गुना बढ़ जाती है क्योकि फैशन से दीगर इनका अपना एक सांस्कृतिक महत्व भी है ....बरात में वधू से लेकर आधी दुनिया की पूरी नुमायन्दगी जब इन लक दक बनारसी साड़ियों में सज धज के होती है तो लगता है इन्द्रपुरी ही धरा पर उतर आयी हो ...और यह शुभ -सगुन की प्रतीक तो है ही ....नारी मन इन साड़ियों के साथ ही कल्पना /फंतासी के कितने ही ताने बाने बुनती रहती है .अभी अभी देखी फिल्म द डर्टी पिक्चर के आख़िरी दृश्य में  बिस्तर पर लाल रेशमी साड़ी में आत्महत्या -मृत  हीरोईन का शरीर अरमानों की मौत का दर्शक के लिए न भूल पाने वाले  दर्दनाक मंजर को उभारता है.....

भारतीय साड़ी नारी के अरमानों और फंतासियों से जुडी है ...और भारतीय सौन्दर्य भी इस परिधान में सौन्दर्य का जो प्रगटन पाता है वह एक आम  भारतीय के लिए किसी विदेशी परिधान में मूर्त नहीं हो पाता ....वैसे उदात्त सौन्दर्य  परिधान का मुहताज हो भी क्यों यह रसिक जनों का एक अलग  विषय है ....बात  साड़ी की हो रही है तो यह भारतीय नारी परिधानों में निश्चय ही बेजोड़ है....तभी तो जब हेंडा सेल्मेरान वाराणसी आयीं तो यहाँ के साड़ी आवेष्टित नारी सौन्दर्य पर ऐसी फ़िदा हुईं कि खुद साड़ी पहनने का जिद कर बैठीं ....उनकी तमन्ना हमने शौक से पूरी कराई और उन्हें साड़ी का उपहार भी दिया ....

आप भी  जब कभी  बनारस  आयें हम अपनी बेगम से आपको साड़ी खरीद में मदद की सिफारिश कर देगें ...अब तो वे कुछ भन्नाती हैं मगर यहाँ आने वाले परिजन पर्यटकों के लिए यह समाज सेवा वे खुशी खुशी करती थीं यद्यपि सेवा शुल्क मुझे चुकाना पड़ता था हर बार  उनके खुद के किसी साड़ी के बिल को अदा करने के रूप में -उनके सामने तो मैं खुद को कितना  वस्त्र निर्धन समझता हूँ जब भी उनका साड़ी वार्डरोब मेरे सामने खुलता है तो आँखे भी चुधियाती हैं और दिल अपनी वस्त्र -निर्धनता की स्थति पर धक से कर जाता है -हम तो मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तौर पर उनके वस्त्र भण्डार की बराबरी कई जन्मों तक भी न कर पायें ..ओह यह विषय विचलन .....हाँ तो यहाँ १००-१५० रूपये की साड़ी से साठ पैसठ हजार की साड़ियाँ मैंने खुद शो रूमों में सामने पसरते देखी हैं ..शादी सगुन पर हजार बारह सौ और एकाध बार दस हजार तक की खरीदनी पड़ी है ..मगर यहाँ साड़ी का असली दाम किसी को  भी शायद पता नहीं होता .गोदौलिया के साड़ी के अपरम्पार दुकानों में मोलभाव की आवाजें गूंजती रहती है -मगर समय और अनुभव के साथ हमने ऐसी दुकानों का चयन कर लिया है जहां मोलभाव बिलकुल नहीं है ...और इस तरह ज्यादा ठगे जाने का अहसास भी नहीं होता ....

बनारस के साड़ी प्रतिष्ठानों में अभी भी दुशासन ब्रैण्ड साड़ियों का इंतज़ार है . 


मंगलवार, 10 मई 2011

आखिर कौन सा उपहार लूं?

इस शाश्वत से बनते जा रहे  सवाल  से आप भी दो चार हुए बिना नहीं रहे होंगे कि कहीं पर निमंत्रित हैं और भारी असमंजस यह कि आखिर उपहार कौन सा ले जायं? किसी का बर्थ डे है तो किसी की रिंग सेरेमनी और किसी का व्याह तो किसी की एनीवर्सरी -बड़ी उहापोह  की स्थति हो जाती है उपहारों के चयन को लेकर... अब जैसे कल ही मुझे अपने एक मित्र विनोद कुमार जायसवाल जी का निमंत्रण मिला, उनके बेटे समन्वय (वे मायिनार्टीज डिपार्टमेंट देखते हैं तो यह नाम अच्छा ही हुआ न!) के पहले जन्मोत्सव में शरीक होने का -सुबह से ही उधेड़बुन शुरू हो गयी -आखिर कौन सा उपहार ले जाना उचित होगा -वैसे इन दिनों लिफाफे में बस रूपये डाल के दे देने का रिवाज जोर पकड़ रहा है -जो देने वाले को उपहार के चयन और उसकी कल्पनाशीलता के झंझट से तो मुक्त रखता ही है ,कई आतिथेय (होस्ट ) भी नगद  धनराशि के ही मुन्तजिर होते हैं और नगद नारायण का अपने तरीके /आवश्यकता के मुताबिक़ इस्तेमाल कर लेते हैं ....अब होशियार कहिये या मूढ़ कुछ लोग यही युक्ति अपना कर जिम्मेदारी से फारिग हो लेते हैं ....पैसा फेको और फूटो! मगर मुझे तो यह बहुत फूहड़ अरुचिकर सा विकल्प लगता है ...

मुझ जैसे जगत गति से कुछ अलग थलग पड़े लोगों की समस्या अलग है जो हर वक्त वेवक्त अपनी करने की ठान लेते हैं ....कुछ कल्पनाशील.... कुछ सुरुचिपूर्ण ....कुछ अलग सा ...कुछ मूर्खतापूर्ण ....अब श्रीमती जी से विचार विमर्श शुरू हुआ कि आखिर फर्स्ट बर्थ डे गिफ्ट ली क्या जाय ...गहन विमर्श होता रहा -कपडे का सेट ले जाईये .".हूँ ".....यही ठीक रहेगा ....कोई खिलौना भी ले सकते हैं ..."हाँ "....देखिये इन दिनों चांदी का सिक्का कितने का  है ?.... "हाँ यह ठीक रहेगा "मैं श्रीमती जी के एक एक सुझाव पर विचार मग्न हो जा रहा था -तभी मुझे वो कविता याद आ गयी सहसा -ठुमकि चालत रामचंद्र बाजत पैजनियाँ....अच्छा चांदी की करधन या पैजनी कैसी रहेगी? "आपको मालूम भी है सोने चांदी का दाम" -इन दिनों आसमान पर है भाव -कोई पैजनी या करधन ही कम से कम दो ढाई हजार से कम की नहीं मिलगी ..मेरा दिल बैठ गया ...चलो एक चांदी का गिलास देखते हैं ...."वो भी काफी महंगा होगा....बहरहाल निर्णय यह हुआ कि किसी गिफ्ट सेंटर/दुकान  पर ही चल कर गिफ्ट आईडियाज  और च्वायस को अंजाम दिया जाय ...

 घुसते ही लगा कि किसी शादी -व्याह के पंडाल में आ गए
गिफ्ट का चयन /चुनाव करने का सबसे उपयुक्त स्थल एक अच्छी सी वैविध्यपूर्ण दुकान ही है जो केवल गिफ्ट्स की ही हो ....और मैंने चयन किया -एक आईटम जो मेरे हिसाब से थोड़ी नवीनता लिए ,मेरी रूचि के अनुकूल (अब बच्चे और माता पिता को कैसा लगा होगा ये तो वही जानें )  और मेरी जेब के हिसाब से भी ठीक ....आप भी देखें और मेरे चयन पर टिप्पणी करें ताकि मैं आश्वस्त हो लूं कि मेरा चयन  इतना बुरा भी नहीं .. :) 

 समन्वय के पैरेंट्स ने काटा पहले बर्थ डे का केक
पहली बर्थ डे पार्टी का भी कहना ही क्या  था -पंडाल में घुसते ही लगा कि किसी शादी के पंडाल में आ गये हैं ....लेकिन तभी होस्ट के करीबी और मेरे भी निकट के एक मित्र जनाब अजय कुमार कैसर ने  लपककर मुझे आत्मीयता से  रिसीव किया और फिर खान पान का जो सिलसिला शुरू हुआ तो रात ग्यारह बजे तक चलता रहा -मैंने पहले भी जिक्र किया है कि अब ये आउटडोर समारोह अपने खान पान की सुरुचिपूर्णता में पांच सितारा होटलों की प्रतीति कर रहे हैं -मीनू तो इतना विषद और रसमय कि क्या छोड़ें क्या खायं वाला डिलेमा आ उपस्थित होता है ...बनारस की लस्सी की धूम है इन दिनों ..शुरुआत तो उसी से हुयी ....फिर फ्रेश फ्रूट ,किसिम किसिम के चायनीज व्यंजन  ,टिक्की गोलगप्पा चाट ...सभी कुछ तो ....फ्रूट में अब विदेशी फलों की आमद भी काफी दिख रही है -मैंने लाल रंग के बड़े बड़े  अंगूर देखे जो अपने यहाँ के अंगूरों की तुलना में चार  गुना बड़े थे-बताया गया जापानी अंगूर हैं ...मगर बेहद मीठे -खट्टे तो कदापि नहीं ..अब इवेंट मैनेजमेंट का रंग यहाँ भी खूब दिखने लगा है -एक एक सेलेक्टेड और क्वालिटी कंट्रोल्ड आईटम ..जिनके स्वाद का तो बस कहना ही क्या? आईसक्रीम कम्पोजिट फ्लेवर -कई तरह के आईसक्रीम का मिक्स थी -और ऊपर से एक छतरी लगाकर गार्निश की गयी थी ...लाजवाब! 
 यहीं  सजनेवाली है फ्रेश फ्रूट की तश्तरियां

खर्च ? अब बेटे का पहला बर्थ डे ..मां बाप के उमंग और उछाह की कोई सीमा थोड़े ही रहती है -कोई जरुरी है हर जगहं टुच्चे सवाल किये ही जायं? 
 मित्र ने की लपक कर की मेरी आगवानी
हमने बर्थ डे केक के कटने पर समन्वय को खूब आशीष दिया ..और भव्य सुरुचिपूर्ण भोजन पर जायसवाल दम्पत्ति को धन्यवाद देकर  हाल के बाहर हो लिए ...


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

रेडी टू कुक हैदराबादी बिरयानी:पछतायेंगे न खाने वाले!

पता नहीं पिछली बार हैदराबादी बिरयानी कब खायी थी मगर इस बार जो खाया तो मुरीद हो गया! अब माल और फ़ूड मार्ट श्रृंखलाओं का ऐसा ज़माना है कि इनकी तांक झाँक करते रहने पर  पर कुछ नए उत्पादों ,व्यंजनों ,रेसिपी (नुस्खों)  पर नजर टिक ही जाती है ...ऐसा ही हुआ जब कोई दो  माह पहले स्थानीय स्पेंसर के स्टोर में मुझे  Knorr की  रेडी टू कुक हैदराबादी बिरयानी नजर आयी.. रेडी टू  कुक और रेडी टू  ईट व्यंजन आईटमों की भरमार है इन दिनों जो तुरन्ता या चटपट व्यंजनों की श्रेणी में आती हैं .रेडी टू ईट जहाँ बस गरम कर तुरंत भकोसने के आईटम हैं वहीं रेडी टू कुक रेसिपी आपके पाक शास्त्र के ज्ञान का भी तनिक इम्तहान लेती है और कई सामग्री  आपको भी और जोड़ना /जुगाड़ना होता है !

 रैपर पहचान के लिए
Knorr की हैदराबादी बिरयानी का कुछ मत पूछिए -बस लाजवाब है! इसकी सुगंध इतनी क्षुधावर्धक है कि बिरयानी तैयार होने के पहले ही 'क्या करें कंट्रोलै नहीं होता " वाली  भूख जगा देती है ...आप तो जानते ही हैं कि स्वाद और सुगंध का तो बस चोली दामन का साथ है ..सुगंध और स्वाद दोनों के मिले जुले प्रभाव से ही किसी भी व्यंजन का जायका बनता है .कहना नहीं है कि सुगंध के साथ ही इस  बिरयानी का स्वाद भी बेमिसाल है ..यही कारण है कि एक बार खायेगें तो बार बार खायेगें के तर्ज पर मैं जब दुबारा इसकी खोज में स्पेंसर पहुंचा तो यह प्रोडक्ट नदारद था ..मैंने वहां नोट कराया और हर दूसरे तीसरे दिन इसे पूछता पंछोरता रहा मगर यह तो स्पेंसर ही नहीं पूरे बनारस शहर से ही गायब थी ... मैसिव हंट कम्पेन बेनतीजा रही ....मैंने हर जगह इसके नए स्टाक की आमद पर खुद को इत्तिला करने की गुजारिश कर रखी थी ....कल रात स्पेंसर से ही मोबाईल पर इत्तिला मिली की इस प्रोडक्ट की नयी खेप आ गयी है -बस सुबह ही पहुँच कर मैंने आज के मेनू का एक और रिजर्व स्टाक के तीन कुल चार पैकेट ले लिए हैं ....आप  आज आ जायं या आगे जब भी तो हम आपको यह बिरयानी जरुर खिलना चाहेगें! 

यह भी दावे के साथ कहना चाहते हैं कि  वे गृहणियां जिनके वे  रूठे हुए हों ,कुछ खटपट या अनबन चल रही हो तो इसे एक ट्राई दे सकती हैं ..बिरयानी खाते ही सब मामले रफा दफा होने की गारंटी ..और प्रेमिका को इम्प्रेस करना चाहते हैं तो इसे  खुद बनाकर जरा अपनी उनको /मंगेतर को जिमा दे बस ..फिर देखें नतीजा!क्या कहा बनाना नहीं आता ? बेहद आसान ..इस प्रोडक्ट  के रैपर पर पाक विधि लिखी है जो बेहद आसान सी है ..बस कुछ सामग्री जुटानी पड़ेगी ....इस समय ३५ रुपये प्रति पैकेट के साथ दस रूपये का एक नूडल सूप भी फ्री मिल रहा है -आम के आम गुठलियों के दाम! नूडल सूप भी सूप श्रृंखला का नया उत्पाद है जिसमें सूप के साथ नूडल का भी मजा है या यूं कहें कि नूडल के साथ सूप का मजा भी!मुझे यह उत्पाद भी बहुत पसंद है!

तो बतायें आप भी कब निमंत्रित कर रहे हैं मुझे भी अपनी Knorr  बिरयानी पार्टी में ? :)

कंफेसन:
१-अन्ना हजारे साहब के अनशन को देखते हुए और अनशन स्थल पर कई लोगों के उपवास से अस्वस्थ होने की खबर `पर मेरी चेतना /नैतिकता बार बार यह पोस्ट जारी न करने को मना कर रही थी ..मगर उन सभी से जो जन लोकपाल विधेयक और देश से भ्रष्टाचार हटाने की मुहिम में लगे हैं  इस   क्षमा याचना के साथ कि यह पोस्ट दैनन्दिन जिन्दगी का एक गौण सा हिस्सा है और किसी भी तरह उनके अवदानों की उपेक्षा में नहीं है ,इसे जारी कर रहा हूँ! बिरयानी खाकर या न खाकर भी हम भी उस मुहिम का हिस्सा हैं!

२-यह किसी भी तरह से नार के उत्पाद का विज्ञापन नहीं है!जैसा पाया ,अनुभव किया यहाँ लिख दिया!  उपभोक्तावाद का समर्थन मैं भी नहीं करता -मगर कुछ उत्पाद  अपवाद भी हो जाते हैं !आप जानते ही हैं!
३-बिरयानी एक मुगलई व्यंजन है जो प्रायः मांसाहारी होता है मगर इसके शाकाहारी वर्जन भी बेहद जायके वाले होते हैं जैसे यह हैदराबादी बिरयानी! बिरयानी के कुछ और इंट्रा -कंट्री प्रकार यहाँ  हैं !

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

बड़े काम का प्रोडक्ट है हैण्ड सैनिटायिज़ेर (विज्ञापन नहीं!)

चिकित्सक तो इसका प्रयोग पहले से ही करते रहे हैं मगर अब यह  सर्वसुलभ हो चला है और बड़े काम की चीज है .इधर अनेक संक्रामक बीमारियों का दौर दौरा है जिसमें छुआछूत से और हाथों में संक्रमण से महामारियों के फैलने का भी अंदेशा बढ़ता गया है . सुअरा (स्वायिन फ़्लू ) का संक्रमण जब था तो हाथों को कई बार साफ़ रखने की हिदायत दी जा रही थी -डायरिया जैसी बीमारियाँ भी हांथों की गंदगी -जीवाणुओं के सम्पर्क से फैलने की संभावना रहती है क्योकि हाथों का सम्पर्क मुंह और नाक से होता ही रहता है ...अब हाथों को विषाणु  मुक्त रखने के के लिए बाजार में कई बहुराष्ट्रीय और देशी कम्पनियों ने हैण्ड सैनिटायिज़र उतार दिया है जिसमें अमूमन एथेनाल अल्कोहल होता है जिसका गुण है कि यह ९९.९९९ प्रतिशत तक जीवाणुओं का सफाया कर देता है ...एक मिनट के भीतर ....बशर्ते आप जिस हैण्ड सैनिटायिज़र का इस्तेमाल कर रहे हैं उसमें एथेनाल की सांद्रता ६०  फीसदी के ऊपर हो ...
यह अमेरिकी ब्रैंड मेरे उपयोग में है मगर यहाँ उपलब्ध नहीं है
इन दिनों सैनिटायिज़र का प्रयोग साबुन से हाथ धोने के विकल्प में प्रचलन में है ..मैंने अभी गोदरेज और लायिफबाय द्वारा लांच किये इस प्रोडक्ट को खरीदा है ...जिसकी कीमत ६० रूपये के आस पास है और इस्तेमाल के समय बस चन्द बूंदे हथेली पर लेकर पूरे हथेली के आगे पीछे मल लेना होता है ..साबुन पानी से फुरसत ...ये छोटी शीशियों में हैं अतः आवश्यकतानुसार साथ में बाहर रहने के समय भी  रखी जा सकती हैं -अगर आप किसी बीमार को अस्पताल देखने जा रहे हों और उसकी तीमारदारी में लगे हों तो यह काम की चीज है ....अल्कोहल युक्त सैनीटायिज़र ज्यादातर जीवाणु (बैक्टेरिया ) ,फफूंद और कुछ विषाणुओं (वाईरस ) का सफाया कर देने में सक्षम हैं ..हाँ अगर हाथ बहुत गंदे हों तो साबुन पानी का इस्तेमाल जरूरी है और फिर  सैनीटायिज़र का इस्तेमाल भी कर सकते हैं .इस्तेमाल के विस्तृत तरीके को यहाँ से देख सकते हैं जिसमें नाखूनों ,उँगलियों के पोरों तक इसे ठीक तरह से मलने की सिफारिश की गयी है -यह वास्तव में बहुत सहज और आसान है.

एक सवाल यह भी है कि मुसलमान भाई  सेहत के इस नायाब नुस्खे का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं क्योंकि इसका मुख्य घटक ही अल्कोहल है जो इस्लाम में हराम -वर्जित है.मगर इस बिंदु पर इस्लामी विद्वानों का मानना है कि एक दवा के रूप में यह वस्तुतः हलाल है मतलब इसका इस्तेमाल कर सकते हैं .मुस्लिम काउन्सिल आफ ब्रिटेन का भी यही कहना है .वैसे अध्ययन भी यही बताते हैं कि हाथों में प्रयोग के बाद इसका अधिकाँश भाग अवशोषित नहीं होता बल्कि हवा में उड़ जाता है और इसका असर शरीर के अंदरूनी हिस्से तक नहीं होता ....और नशा उत्पन्न करने की कोई समस्या तो है ही नहीं ...

 यह कंज्यूमर स्टोरों  पर उपलब्ध है 
 
एक अच्छी बात और है कि यह एन्टीबायोटिक औषधियों के प्रति असहिष्णु (रेजिस्टेंट ) हो चुके जीवाणुओं और टी बी के जीवाणुओं पर भी समान  रूप से कारगर है -मतलब इनका सफाया करके न रहेगा बांस न बसेगी बासुरी जैसी उपयोगिता भी इसने ऐसे जीवाणुओं के मामले में साबित किया है .फ़्लू ,कामन कोल्ड ,एच  आई वी के जीवाणुओं पर तो कारगर है ही .यद्यपि इनमें से कई विषाणु जब तक फेफड़े में नहीं पहुँचते रोगकारक नहीं होते .....हाँ रैबीज विषाणुओं पर यह  उतना कारगर नहीं है .
 यह तो अभी अभी खरीदा है ..

इसके इस्तेमाल में सावधानी यह होनी चाहिए कि आग का स्रोत निकट न हो ..और इसके उड़ जाने के बाद ही माचिस की तीली आदि जलाई जाय ..यह बहुत ही ज्वलनशील है और समीपस्थ आग की लौ  इसे ज्वलनशील कर सकती है ...बच्चों की पहुँच से इसे दूर होना चाहिए.. यह  केवल बाह्य उपयोग के लिए है ....जख्म जले कटे पर इस्तेमाल वर्जित है ..मुंह से गरारे के लिए भी वर्जित है ...बच्चे इसका इस्तेमाल बड़ों की देखरेख में करें .. अमेरिका में अकेले २००६ में ही जब इसका प्रचलन बढ़ा था तो १२००० लोग इसे पीने की गलती कर गए जिसमें बच्चों की बड़ी तादाद थी ....यह बच्चों के लिए विषाक्त है .बाजार में अब सहजता से उपलब्ध होने के कारण यह दवाओं की ओवर द काउंटर (ओ टी सी ) श्रेणी में है .

आप के लिए  सिफारिश करता हूँ ...

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

आप किस नहाने के साबुन का इस्तेमाल करते हैं?(यह विज्ञापन नहीं है)


आप भी सोच रहे होंगे अजीब खब्ती आदमी है ,जब लोग बाग़ फैसले की आख़िरी घड़ी का दम साधे इंतज़ार कर रहे हैं तो इसे साबुन जैसी तुच्छ चीज सूझ रही है ...मैं समझता हूँ (अपनी अल्प बुद्धि से ) कि बड़े बड़े मसलों/मसायल  को बड़े लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए -जिस काम के लिए पूरा तंत्र सक्रिय हो ,मशीनरी चुस्त दुरुस्त हो फिर हम छुटभैये क्या खाकर कुछ बना बिगाड़ लेगें ..तो आईये कुछ साबुन वाबुन जैसी रोजमर्रा की छोटी बात पर ही समय जाया कर लिया जाय ..

इस पोस्ट को लिखने की जहमत क्यूं आन  पडी यह तो मैं आखीर में बताऊंगा मगर अभी आपसे अपने कुछ सोप -अनुभवों को बाँटना चाहता हूँ ...बचपन के दिन याद आते हैं तो नहाने के साबुन की वो लाल वाली बड़ी लाईफबाय की  बट्टी बरबस ही याद हो उठती है ..उस समय कपडा धोने के लिए सनलाईट की सफ़ेद बट्टी और यही लाईफबाय ही देखने को मिलता था ..बाद में तो धोने के साबुन के अलावा डिटर्जेंट की एक बड़ी रेंज ही आ गयी ....तब भी हाट बाजार की  दुकानों पर लोग  "सनलाईट  सोप साबुन" ही मांगते  नजर आते थे .  नहाने वालो साबुनों में लाईफबाय की मोनोपोली को दूसरे कई साबुन ब्रैंड ने चुनौती दी ...उनमें एक तो मोती था जो गोल गोल बड़ा सुडौल सा था और दूसरा भीनी सुगंध वाला खस साबुन था ..पियर्स भी तभी आ गया था जो अभिजात्य लोगों की पसंद था ,तब भी इसका दाम तनिक अधिक ही था -आम लोगों के लिए  लक्स जब सिने तारिकाओं के फोटो के साथ  बाजार में आया तो  गाँव गाँव में लक्स की धूम मच गयी ..लोग नहाते भी थे और रैपर पर स्वप्न सुन्दरी की मोहक अदाओं का आकंठ पान भी करते थे- लगभग यही समय हमाम का भी था ...और बाद में नीम, डेटाल,डव ,और अब तो न जाने कौन कौन नए देशी ब्रैंड तथा अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड केमी वगैरह भी बाजारों में अपनी पैठ बना चुके हैं ..कुछ नाम भूले भटके  छूटे होंगे  तो आप बताएगें ही ...

मैं इन सभी साबुनों की बात नहीं कर रहा ...वैसे भी नहाने के मामले में मैं बहुत कोसे जाने वाला प्राणी हूँ ....ज़रा भी मौका मिला तो एकाध दिन नहाने से नागा भी कर जाता हूँ ..साबुन तो एक हप्ते में एक बार ही लगाता  हूँ -एक जीवशास्त्री होने के नाते मेरे अपने तर्क हैं ..रोज रोज साबुन लगाने से देह का  मित्र जीवाणु फ्लोरा तो विलुप्तप्राय होता ही है ,साथ ही देह की कुदरती मानुष गंध -फेरोमोंन का भी सफाया हो जाता है ....जो लोगों में परस्पर जैव रासायनिक संचार का एक बहुत ही महत्वपूर्ण जरिया होता है -मनुष्य के पारस्परिक व्यवहार ,आक्रामकता ,प्रेम  सबंध आदि के निर्धारण /नियमन में फेरोमोंन की बड़ी भूमिका है -मगर यहाँ विषयांतर न करके मैं अपने सोप चर्चा पर वापस आता हूँ ...  हाँ तो मुझे एक दूसरा ही साबुन किशोरावस्था से ही बेहद पसंद है ...वह है लिरिल ..लगता है मेरी कोई कंडीशनिंग इसके साथ हो गयी थी जो आज भी अवचेतन में कायम है -मुझे याद है जब मैंने पहले इसे देखा था तो इसके रैपर पर  एक सद्यस्नाता अर्ध वसना नवयौवना का चित्र था ....मुझे सेलिब्रिटी सौन्दर्य नहीं लुभाते ..सौन्दर्य की मेरी अपनी धारणा है ,पैरामीटर और इंडायिसेज हैं -लोग बाग़ हेमा मालिनी पर लहा लोट हो रहे थे और मैंने अपना समस्त सौन्दर्यबोध उसी नवयौवना पर केन्द्रित कर दिया -लिरिल मेरी पहली पसंद बन गया था ....

अब इतना उल जुलूल पढने के बाद आईये इस पोस्ट की हेतु पर -आज ही मैंने लिरिल का नया स्वरुप देखा ..लिरिल २००० जिसमें वह नवयौवना तो नहीं है मगर  एक प्यारा सा परिवार है -पति पत्नी और एक प्यारी सी चुलबुली बिटिया का ..जैसे यह मेरे साथ ही बड़ा होता गया हो बाल बच्चेदार .सोने में सुहागा यह कि इसमें टी ट्री आयल(Tea tree oil, or melaleuca oil,)  मिला हुआ है जो एक जाना माना जर्म रोधी है और यह मुझे किसी और साबुन में नहीं दिखा ..टी ट्री आयल न्यू साउथ वेल्स आस्ट्रेलिया के उत्तरी पूर्वी खाड़ी के क्षेत्रों में पाए जाने वाले देशज पौधे Melaleuca alternifolia,की पत्तियों से प्राप्त होता है और इसमें अद्भुत एंटीसेप्टिक और जर्म रोधी चिकित्सीय  गुण हैं ...इसमें त्वचा सौन्दर्य को टोन अप किये रहने के भी गुणों के दावे होते रहे हैं और अब वैज्ञानिक अध्ययनों से इसके कई त्वचा रोगों में कारगर होने के प्रमाण भी मिल रहे हैं ...यह कई तरह के त्वचा के विषाणु ,जीवाणु गत रोगों ,फफूंद और माईट-स्केबीज (खुजली ) जनित रोगों में प्रभावकारी  पाया गया है ... त्वचा के कुछ विकारों को दूर करने में यह चमत्कारी असर  वाला पाया गया है ...आम के आम गुठलियों के दाम -सौन्दर्य प्रसाधन भी और त्वचा की मुकम्मल सुरक्षा भी ..मैंने एक साथ चार  लिरिल 2000 ले लिया (तीन के साथ एक मुफ्त ) ..आप भी एक ट्राई कर सकते हैं ....


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