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गुरुवार, 30 जून 2016

कहानी संग्रह अधूरे अफसाने-लावण्या दीपक शाह

अभी अभी लावण्या शाह (लावण्या दीपक शाह ) के कहानी संग्रह अधूरे अफसाने को पूरा किया है। चार  बाल कहानियों को समेटे कुल ग्यारह कहानियों के इस गुलदस्ते को लावण्या जी ने अपने सुदीर्घ सामाजिक जीवन के अनुभवों अॉर कुशल लेखनी से अलंकृत  किया है। कहानियों मे जीवन संघर्ष, मानवीय संवेदनाओं को लेखिका ने बखूबी अभिव्यक्ति दी है। कई कहानियों मे वतन अॉर  अपनों से विछोह की जो पीड़ा अभिव्यक्त होती है वह लेखिका के खुद के प्रवासी  जीवन का और अपने  सहधर्मियों के भोगे यथार्थ से अनुप्राणित होने की प्रतीति कराता एक यथार्थ दस्तावेज बन गया है। ज़िंदगी ख्वाब है मे जहां  महत्वाकांक्षी पति अॉर अभिमानी पत्नी की दुखांतिका है ,मऩ मीत पुरुष स्त्री के अादिम अाकर्षण की कथा है जो एक रहस्यपूर्ण परिवेश मे परवान चढ़ती है किंतु यह भी एक दुखांत गाथा है।

जनम जनम के फेरे अपनों और अपनी माटी से विछोह की पीडाभरी दास्ताँ है।  कादंबरी एक नृत्यांगना की संघर्ष गाथा है जिसमें उसके पुरुष कामुकता से उत्पीड़ित होते रहते की व्यथा कथा है।  नारी के शोषण को पुरुष कैसी कैसी रणनीतियां को अंजाम देता है यह कथा उससे खबरदार करती है।  समदर देवा भी नारी के पुरुष द्वारा शोषण की एक मानो एक चिरंतन गाथा  है किन्तु अपने कथानक में उदात्त प्रेम की भी सुगंध लिए है, मुंबई के सागर तट पर पनपती एक सात्विक प्रेम कथा मन को अंत तक बांधे  रखती है।  यहाँ उदात्त चरित्र के पुरुष पात्रों की उपस्थिति मन को गहरे आश्वस्त करती  है कि अभी भी धरा  पर मानवीयता जीवंत है।  लेखिका की यह कथा मुंबई के मछुवारों की जीवन शैली और इस मायानगरी के अँधेरे कोनो को भी आलोक में लेती है।



 कौन सा फूल सर्वश्रेष्ठ है घर में नवागंतुक दुल्हन के सहज होने के लिए जरूरी अभिभावकीय दायित्व को उकेरती है।  स्वयं सिद्धा अनुष्ठानों के आडंबरों से आक्रान्त भारतीय परिवार की कहानी है।  बालकथाओं में संवाद शैली के जरिये प्रमुख भारतीय पुराकथाओं और नायकों  का रोचक वर्णन है जो बच्चों में नैतिकता के आग्रह को तो प्रेरित करता ही है उनकी ज्ञानवृद्धि भी करता है।

लेखिका एक सिद्धहस्त रचनाकर्मी हैं। योग्य पिता की सुयोग्य पुत्री। आदरणीय पंडित नरेंद्र शर्मा जी की विलक्षण प्रतिभा पुत्री को आनुवंशिकता में मिली है।  लावण्या जी आश्चर्यजनक रूप से नारी सौंदर्य की चतुर चितेरी हैं जबकि समीक्षक इसे पुरुष डोमेन में मानता  आया है।  उन्हें नारी तन और मन की एक समादृत समझ है जो प्रशंसनीय है।  पुस्तक पढ़ने की प्रबल अनुशंसा है!

शनिवार, 26 सितंबर 2015

भ्रष्टाचार के देवता:एक आईएएस का सेवाकाल संस्मरण

दावात्याग: प्रस्तुत पोस्ट 'गॉड्स आफ करप्शन' पुस्तक की संक्षिप्त  समीक्षा मात्र  है और  इसमें व्यक्त विचार लेखिका के हैं, उनसे मेरी सहमति का कोई प्रत्यक्ष या  परोक्ष आग्रह  नहीं है।  

मैंने जब १९७६ बैच की सीधी भर्ती किन्तु अब सेवानिवृत्त आईएएस आफीसर श्रीमती प्रोमिला शंकर की संस्मरणात्मक पुस्तक गॉड्स आफ करप्शन की चर्चा सुनी तो उसे पढने की तत्काल इच्छा हो आयी  और आनन फानन फ्लिपकार्ट से यह पुस्तक  मंगा भी ली गई। इस तत्परता के पीछे दो महत्वपूर्ण कारण थे -एक तो मैं जब श्रीमती प्रोमिला शंकर जी  झांसी में 1987 में  ज्वाइंट डेवेलपमेंट कमिश्नर थी,और उनके  पति श्री पी उमाशंकर आईएएस वहीं के जिला मजिस्ट्रेट थे ,मैं एक मातहत अधिकारी था। 

मैं पी उमाशंकर जी का सीधा मातहत था और मुझे  कहने में सदैव फ़ख्र रहता है कि वे मेरे अब तक के सेवाकाल के बहुत अच्छे जिलाधिकारियों में से  एक रहे. तमिलनाडु राज्य का  होने  के नाते  हिन्दी के नए नए शब्दों को सीखने की उनकी उत्कंठा ने मुझे उनके करीब होने का सौभाग्य दिया।वे सदैव विनम्र और प्रसन्नचित्त रहते. उन्होंने मुझ पर बहुत भरोसा किया और जनहित में कुछ अत्यंत गोपनीय कार्य भी मुझे सौंपे. आगे चलकर प्रोमिला जी हमारी यानि मत्स्य विभाग की प्रमुख सचिव  भी रहीं  (वर्ष,२०००) इसलिए पुस्तक  को पढने के लिए मैं और भी प्रेरित हुआ।  

 इस पुस्तक को यथाशीघ्र पढने की उत्कंठा का दूसरा कारण यह भी रहा कि एक जनसेवक के रूप में संभवतः मुझे कोई महत्वपूर्ण मार्गदर्शन इसके पढने से मिल सके।  पुस्तक इतनी रोचक है कि एक सांस  में ही खत्म हो गयी मगर मन  तिक्तता से  भर उठा । यह पुस्तक शासकीय व्यवस्था के घिनौने चेहरे को अनावृत करती है -लेखिका ने पूरी प्रामाणिकता  और  वास्तविक नामोल्लेख के साथ अपने ३६ वर्षीय सेवाकाल के दौरान भ्रष्टाचार में लिप्त उच्च पदस्थ कई आईएएस अधिकारियों के कारनामों, उनके  पक्षपातपूर्ण व्यवहार, चाटुकारिता के साथ ही नेताओं और भ्रष्ट आईएएस के दुष्चक्रपूर्ण गंठजोड़, दुरभिसंधियों का उल्लेख किया है। 

इस अपसंस्कृति का साथ न देने के कारण और अपने मुखर  निर्णयों  के कारण श्रीमती शंकर को पग पग पर बाधाएं ,हतोत्साहन और अनेक ट्रांसफर झेलने पड़े।  महत्वहीन पदों पर पोस्टिंग दी जाती रही। सीधी भर्ती की आईएएस होने के बावजूद न तो इन्हे कभी डीएम बनाया गया और न ही कभी  कमिश्नर(मण्डलायुक्त) बन पाईं।  और तो और जब सेवाकाल के मात्र ६ माह शेष रह गए तो अचानक एक महत्वहीन से कारण को दिखाते हुए निलंबित कर दिया गया। 



भारत सरकार के द्वारा सेवानिवृत्ति के मात्र ६ दिन पहले बहाली मिली भी तो इन्हे तत्कालीन पोस्ट से तुरंत हटाकर लखनऊ ट्रांसफर कर दिया गया।  गनीमत रही कि लोकसभा  निर्वाचन आरम्भ हो  गए थे और भारत निर्वाचन आयोग के हस्तक्षेप से श्रीमती शंकर को अपने सेवाकाल के आख़िरी पद ,कमिश्नर (एनसीआर) पर ही रहकर सेवानिवृत्ति मिल गयी,हालांकि इनके विरुद्ध जांच चलते रहने का आदेश भी पकड़ा दिया गया। प्रोमिला जी उस समय उत्तर प्रदेश की सबसे सीनियर आईएएस थीं.  

सूबे में नयी सरकार बन गयी और दुर्भावनापूर्ण लंबित जांच निरर्थक हो गयी। अपनी इस संस्मरणात्मक पुस्तक में लेखिका ने पूरी बेबाकी और निर्भयता से गुनहगारों  के नामों का उल्लेख किया है जिन्होंने अपने न्यस्त स्वार्थों के चलते एक ईमानदार अधिकारी को जनहित में काम न करने देने के लिए पूरे सेवाकाल हठात रोके रखा।  कालांतर में कुछ तो उनमें से जेल गए और एक कथित आततायी  असामयिक कालकवलित भी हो चुके।  पुस्तक का एक एक पन्ना आँखों को खोल देने वाला विवरण लेकर सामने आता है। 

शासकीय व्यवस्था में खुलेआम भ्रष्टाचार ,भाई भतीजावाद, पक्षपात ,जातिवाद और योग्यता के बजाय चापलूसों  की बढ़त का जिक्र है।  खुद लेखिका को उनकी स्पष्टवादिता और मुखरता के चलते अच्छी वार्षिक प्रविष्टियों के न मिलने से केंद्र सरकार में भी जाने का मौका नहीं मिल सका।  लेकिन  इस स्थिति को लेखिका ने  पहले ही भांप लिया था।  मगर उन्होंने भ्रष्ट तंत्र  के आगे घुटने नहीं टेके ,संघर्ष करती रहीं।  उन्हें यह  एक बेहतर ऑप्शन लगता था कि अच्छी वार्षिक प्रविष्टियों के लेने  के लिए अनिच्छा से जीहुजूरी के बजाय मानसिक शांति के साथ कर्तव्यों का निर्वहन करती चलें।

 न्यायपालिका के भी उनके अनुभव  बहुत खराब रहे।  एक  न्यायालय की अवमानना भी झेलनी पडी और उनके अनुसार एक फर्म को गलत भुगतान किये जाने को लेकर अपना पक्ष प्रस्तुत करते समय न्यायाधीश महोदय द्वारा कहा गया कि वे जेल जाना चाहती हैं या फर्म को भुगतान करेगीं? वे जड़वत हो गयीं।उनकी एक विभागीय देयता के औचित्य को  पहले तो न्यायालय ने स्वीकार कर उनके पक्ष में निर्णय दिया किन्तु तत्कालीन मुख्य सचिव की बिना उन्हें सूचित किये पैरवी किये जाने पर अपने निर्णय को बदल दिया।  

लेखिका प्रोमिला  जी ने भारत की सर्वोच्च सेवा के लिए चुने जाने वाले अभ्यर्थियों  में बुद्धि, अर्जित ज्ञान और अध्ययन के साथ ही उच्च नैतिक आदर्शों ,चारित्रिक विशेषताओं  के साथ ही दबावों के  आगे न झुकने वाले व्यक्तित्व पर बल दिया है। उन्होंने राष्ट्प्रेम को भी अनिवार्य  माना है और क्षद्म धर्मनिरपेक्षता से  आगाह किया है। एक जगह  वे लिखती हैं कि स्वाधीनता दिवस कहने के बजाय इस अवसर को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए।हमें गुलामी का बोध कराने वाले प्रतीकों से अब दूर हो जाना चाहिए। उन्होंने सारे भारत में शिक्षा का माध्यम अंगरेजी होने  की वकालत की है। जिससे भाषायी विभिन्नताओं को बल न मिलें और हम  वैश्विक स्तर पर तमाम चुनौतियों के लिए बेहतर तौर पर तैयार हो सकें. 

पुस्तक दो खंडो में है -एक में उनके द्वारा विभिन्न विभागों  में अपने कार्यकाल  के दौरान उठायी गयी समस्याओं/कठिनाइयों  का विवरण दिया गया है और दूसरे खंड में अपने कार्यकाल में जो सीखें मिलीं उनका जिक्र है।  २३२ पृष्ठ की संस्मरण पुस्तक का मूल्य रूपये ५९५ है और इसे दिल्ली के मानस पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।  इसे नेट पर आर्डर देकर मंगाया जा सकता है.   

गुरुवार, 7 मार्च 2013

फागुनी अहसास को जगाता एक कविता संग्रह!

सुनीता शानू जी के नए कविता -संग्रह 'मन पखेरू उड़ चला फिर ' की मानार्थ प्रति मिली तो शीर्षक ने मन में बहुत उमड़ घुमड़ मचाया। अभी तक तो प्राण पखेरू का रूढ़ प्रयोग हिन्दी में दुखद संदर्भों में  आया है मगर यहाँ  मन पखेरू के उड़ने के सर्वथा नए प्रयोग ने चौका सा दिया . यहाँ मन का पखेरू शरीर के प्रतिबंधों से दूर उन्मुक्त विचरण के लिए उड़ चला है .बंधनों से चिर आजादी का यह भाव और इस नए बिम्ब प्रयोग को स्वीकार करने में कोई असहजता संग्रह को पढ़ने के  बाद  नहीं बची थी  . किताबों की समीक्षार्थ/ मानार्थ प्रतियाँ मिलने पर मैं उन्हें आदतन तुरंत नहीं पढता बल्कि अपनी स्टडी मेज या फिर ड्राईंग/लिविंग कक्ष की मेज (यहाँ राबर्ट्सगंज में टू इन वन या इन आल इन वन ही कहिये ) पर छोड़ कई दिन निहारता रहता हूँ . फिर बहुत ही अहतराम से उठा पढने में मुब्तिला हो उठता हूँ . अभी कल ही संग्रह की अंतिम कविता तक पहुंचा  हूँ .

कविता संग्रह बहुत ही मौके से मिला है मुझे -फागुनी बयारों के बीच फागुनी कविताओं ने कहर ही ढा दिया है समझिये :-) .मैंने अपने मन को गहरे स्पर्श कर गयी एक कविता को फेसबुक पर भी शेयर किया . देखिये मैं हिन्दी साहित्य का मनई तो हूँ नहीं तो मुझे समीक्षा कर्म वगैरह आता नहीं और उसके प्रतिमानों और अनुशासनों से सर्वथा अनभिज्ञ भी  हूँ इसलिए इसे कृति की समीक्षा न माना जाय .यह एक सुहृद के प्रति मेरी कृतज्ञता ज्ञापन का बस विनम्र उपक्रम भर है -सुनीता शानू जी से विगत वर्ष मेरी भेंट  लखनऊ के ब्लॉगर परिकल्पना दशक सम्मान में हुयी थी -उनकी विनम्रता, सहजता,सरलता ने क्षणों में ही अपरिचय की औपचारिकताओं को छू मंतर कर दिया था . तब मुझे यह बिल्कुल भान नहीं था कि मैं एक उदीयमान प्रतिभाशाली कवयित्री के चंद घंटों के सानिध्य में मैं हूँ-वे दिल्ली लौटीं और फिर उनकी स्मृति उनकी फागुनी कविताओं के साथ सहसा लौट आयी हैं .
मन पखेरू का मूल स्वर उन्मुक्तता/जड़ बंधनों से आज़ादी का तो हैं मगर डोर को पूरी तरह से स्वच्छंद छोड़ देने की हिमायती भी कवयित्री नहीं है। उनकी कविता डोर की अंतिम पंक्तियां यही तो कहती हैं - 'सच है डोर से बंधी होती तो पूरा न सही होता उसका भी अपना एक आकाश' ...संग्रह की आख़िरी कई कविताओं ने ख़ास प्रभावित किया जो  मेरी अपनी पसंद है -कवयित्री या प्रकाशक/सम्पादक ने कविताओं के चयन क्रम को अपने ढंग से रखा होगा . आनंद कृष्ण जी की इस पुस्तक से सम्बन्धित समीक्षा संग्रह के शुरू में ही है और यह इतनी सम्पूर्ण है कि उसके बाद किसी के लिए भी समीक्षा के लिए कुछ  बचता ही नहीं . उन्हें इस संग्रह  की कविताओं में एक संभावनाशील कवयित्री की पदचाप सुनायी दी है और मैं उनसे सहमत हुए बिना नहीं रह सकता . सुनीता जी ने प्रेम की सघन अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति नहीं की है बल्कि कई सामाजिक विडंबनाओं को भी सटीक उकेरा है -इस लिहाज से कन्यादान, ऐ कामवाली,माँ   रचनाएं बहुत सशक्त बन पडी है . संग्रह की सबसे बड़ी खासियत है कविताओं का अपने पाठकों से सहज संवाद -इन कविताओं में अमूर्तता नहीं है,निर्वैयक्तिकता नहीं है.  जीवन के पल प्रतिपल के अनुभवों से लबरेज हैं ये कवितायें!
 कृति 
हिन्द -युग्म ने बहुत सलीके से और एक स्लीक लुक के साथ इस कविता संग्रह को प्रकाशित किया है -प्रशंसा के मेरे दो शब्द प्रकाशक के लिए भी हैं। मुझे एक लम्बे समय बाद एक कविता संग्रह ऐसा मिला है जिसकी अधिकाँश कविताओं ने मुझसे सहज संवाद किया है। अंत में वो फेसबुक वाली कविता आपको पढ़ाना चाहता हूँ-

खामोशी
आँखों ने आँखों से
कह दिया सब कुछ
मगर जुबां खामोश रही

जब दिल ने
दिल की सुनी आवाज
धड़कन खामोश रही
तुम्हारे प्यार की
खुशबू से तृप्त
उठती गिरती साँसे देख
पलकें खामोश रहीं
कृतिकार 
और वहां मेरा कमेन्ट था- सारे पहरेदार या तो मौकाए वारदात पर सोये रहे या गुनाह के खामोश भागीदार हुए। :-)  सुनीता शानू जी को उनके प्रथम कविता संग्रह के प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई!

रविवार, 5 अगस्त 2012

फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे- कामुकता की पराकाष्ठा का साहित्य (पुस्तक परिचय )


फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे एक रत्यात्मकता  (इरोटिक-हे मूढ़मने! इरोटिक बोले तो पोर्नोग्राफी नहीं ) से ओतप्रोत ई एल जेम्स रचित औपन्यासिक कृति है जो पिछले २०११ से,प्रकाशन वर्ष से ही चर्चा में है -बेस्टसेलर है . यह एक  त्रिखंडी (ट्रायोलाजी) कृति है . उपन्यास में लोकेशन सिएटल है जहाँ एक कालेज छात्रा एनास्टासिया स्टीले और एक व्यवसायी टैक्यून  क्रिस्चियन ग्रे का प्यार(?)  पलता है. उपन्यास भले ही अश्लीलता(पोर्नो )/घासलेटी साहित्य का लेबल लिए नहीं है मगर एक आम भारतीय पाठक/पाठिकाओं  के लिए जो सेक्स को प्रत्यक्षतः एक निषिद्ध कर्म ही समझते हैं  यह  उसी कटेगरी की कृति है .उबकाऊ और किंचित घृणित भी .  यह पुस्तक  मूलतः  पश्चिमी पाठकों के लिए है जो सेक्स को और सेक्सियर बनाने के तामझाम में लगे रहते हैं और रति क्रिया में नित नयी नूतनता / नवीनता देने में  मानो हरवक्त तत्पर बने रहते हैं -वहां  सेक्स एक सत चित आनंद है, एक उत्सव धर्मिता है -  विपुल शेड्स लिए हुए  हैं ....सहज सामान्य सेक्स भी  और विकृत भी .....जहाँ अनेक सेक्स फंतासियों का दौरदौरा है ,समूह यौनिक आनंद का रिवाज है ,सी सी और मीठी/तीखी  मार के बीच यौनिक आनंद का खेल है आदि आदि .....
मगर मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ -दरअसल हुआ यह कि विगत दिनों मुझे अपनी आधी दुनिया के एक मित्र का यह अनुरोध मिला कि मैं दो कृतियाँ पढूं और उन पर पोस्ट लिखूं और उन्होंने मुझे यह कहकर और भी उकसाया कि कई और श्रेष्ठ ब्लागरों ने कितनी सुन्दर और समग्र पुस्तक समीक्षायें अपने ब्लागों पर की हैं,एक ने तो अभी हाल में ही  -तो फिर मैं क्यों नहीं ऐसा कुछ करता? अब  आप सब यह जानते ही हैं कि ऐसे उदाहरण /उलाहने /ताने मेल इगो को कितना हर्ट करते हैं  ...धर्मवीर भारती की आत्मकथात्मक गुनाहों का देवता एक बार पढ़ा था अब फिर पढने की चाह है यद्यपि उनकी पूर्व पत्नी सुश्री कांता भारती की कृति रेत की मछली भी उन  लोगों द्वारा अनिवार्यतः पढी जानी चाहिए जो 'गुनाहों  का देवता' को पढ़ते हैं क्योंकि  यह  'गुनाहों का देवता' का ही दूसरा अविभाज्य पहलू है . फिलहाल इन कृतियों पर यहाँ लिखना मुल्तवी है मगर वो क्या कहते हैं न कि आशिक लिफाफा देखकर मजमून भांप जाते हैं तो किताबी कीड़े किताब का रिव्यू देख उसके बारे में काफी कुछ जान जाते हैं -तो मैंने शेड्स आफ ग्रे की कुछ समीक्षायें यहीं अंतर्जाल पर पढीं और फिर सोचा आपका श्रम बचाने को आपसे उन्हें शेयर कर ही लूं ...मित्र ने जो सन्देश भेजा तो मैंने समझा कि वे फिफ्टी शेड्स आफ गे जैसा कुछ कह रही हैं औरत मैं तुरंत ही विमुख  हो गया था  -क्योंकि मुझे इस शब्द से ही एलर्जी होती गयी है ..मगर बाद में लगा कि मुझे चीजों /शब्दों को ध्यान से देखना चाहिए -अब उम्र भी तो ऐसे बचकानी हडबडी / जल्दीबाजी की नहीं रही .... 

हाँ तो मैं बात इस उपन्यास की कर रहा था ...यह यौनिक दृष्टान्तों -दृश्यों से भरपूर कृति है और इसलिए ख्यात कुख्यात भी ....मानो कामसूत्र के इक्कीसवी सदी के संस्करण का रुतबा पाने की होड़ में पुस्तक कितनी ही यौनिक पद्धतियों -आसनों का चित्रण करती चलती है जिसमें परपीड़क यौनिक आनंद (बाँडेज/डिसिप्लिन /सैडिज्म /मैसोकिज्म=बीडीएसएम् ) आदि के भी विवरण /दृश्य हैं . किताब की कई करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं और ३७ देशों को इसके प्रकाशन के अधिकार भी मिल चुके हैं . हेनरी पाटर के भी रिकार्ड ध्वस्त हुए ... 
कहानी की शुरुआत कालेज छात्रा एनास्टासिया(अना) स्टीले से होती है जो अपने सबसे प्रिय मित्र कैथरीन कैवनाघ के साथ रहती है, जो कालेज पत्रिका के लिए नियमित कुछ लिखती रहती है . एक दिन जुकाम होने के कारण वह खुद न जाकर एनास्टासिया को  सफलता के शिखर पर पहुंचे अमेरिकी व्यवसायी क्रिस्चियन ग्रे का इंटरव्यू करने को भेजती है . इंटरव्यू के समय ही ग्रे अना को भा जाते हैं मगर इंटरव्यू पूरा नहीं हो पाता...फिर अना उसकी मित्र कैथरीन तथा एक और फोटोग्राफर  इंटरव्यू और फोटो सेशन के लिए ग्रे के पास फिर पहुंचते हैं .यहीं से अना और ग्रे की लव स्टोरी शुरू होती है मगर उनमें कई संवाद -अवरोध होते रहते हैं ...
अना को बार बार लगता है कि ग्रे " बस प्यार कर लिए जाने वाला छोकरा सरीखा  नहीं है" अना का  पहले भी जोस नामक व्यक्ति से अफेयर रह  चुका  है .. अना ग्रे को मन ही मन प्यार करने लगती है मगर ग्रे को तो बस अपनी यौन वासना की पूर्ति की भूख है उसे प्यार से कोई लेना देना नहीं है ..वह अपनी सेक्स -फंतासियों को अना के साथ चरितार्थ करना चाहता है ...इन्ही उधेडबुनों के बीच कहानी आगे बढ़ती है .......ग्रे की कामुक वृत्तियाँ असामान्य हैं -वह अना से कई तरह के वादे  लेता है जैसे धनिष्ठ क्षणों में वह उसकी आँखों में नहीं  देखेगी...  स्वयं उसे स्पर्श नहीं करेगी. वह इस फंतासी को मूर्त रूप देना चाहता है कि जैसे उसका पहला संसर्ग अक्षत यौवना से हो रहा हो ....(कौन कहता है भारतीय ही पुरातन पंथी हैं ?) अना इन यौन अत्याचारों के बाद भी ग्रे से प्यार करती है . क्योकि स्वयं उसकी विर्जिनिटी एक ऐसी महिला ने भंग कर दी थी जो शादी शुदा थी .. और यही ग्रंथि उसके मन में घर कर गयी थी ...
अना और ग्रे का सम्बन्ध केवल कामुकता का सम्बन्ध है रोमांटिक नहीं ....ग्रे  उसके साथ अजीबोगरीब यौन क्रियाओं का अनुबंध करता चलता है जिसमें एक यह भी कि यह सब वह गोपनीय रखेगी ....इस सम्बन्ध का शिखर बिंदु वह होता है जब अना कहती है कि जिस  भी कामुक कृत्य की अति  ग्रे चाहता है  अपनी इच्छा पूरी कर ले ....यहाँ तक कि ग्रे को वह खुद अपने शरीर पर बेल्ट से मार खाने को उकसा कर कमोद्वेलित होती है ....मगर अना धीरे धीरे ऐसे सम्बन्ध से ऊबती,उकता  जाती है और इस सम्बन्ध का अंत दोनों के  स्थाई विछोह में होता है . 
मुझे नहीं लगता भारतीय पाठक इस पुस्तक को पसंद करेगें ....आशीष श्रीवास्तव ने इसके बारे में फेसबुक पर लिखा "वेस्ट आफ टाईम एंड रिसोर्सेज.. " ..और मैं भी उनसे सहमत हूँ ....वासना का इतना  भोंडा रूप हमारे मानस को तो रास नहीं आ सकता ..मगर यहाँ भी तो कान्वेंट संस्कृति ने ऐसे सांस्कृतिक आघात के द्वार खोल ही रखे हैं -हम  छात्र जीवन में  सही गलत बहुत कुछ ऐसी किताबों से सीखते हैं और चूंकि स्वभावतः मनुष्य जिज्ञासु और अन्वेषी होता है इसलिए इन्हें भी एक बार तो कम से कम आजमाना चाहता है .....और होता  अंततः वही है जो इस पुस्तक का अंत है -मोहभंग और स्थाई विछोह......आश्चर्य है उपन्यास पूरी दुनिया में कालेज छात्राओं और ३५ वर्ष से ऊपर की महिलाओं में खासकर लोकप्रिय हो रहा है .....शायद आधी दुनिया से मुझे इस पुस्तक की सिफारिश इसलिए ही प्राप्त हुयी हो ....आप से भी गुजारिश है कि बस इस उपन्यास के बारे में यह रिपोर्ट ही काफी होनी चाहिए ....डोंट वेस्ट योर टाईम एंड रिसोर्सेज ......!


शुक्रवार, 1 जून 2012

पुस्तकें मिलीं


विगत सप्ताह दो महत्वपूर्ण पुस्तकों की मानार्थ प्रतियां प्रकाशकों की ओर से मिली.  पहली पुस्तक अनिल पुसदकर जी की क्यों जाऊं बस्तर मरने  तथा दूसरी सतीश सक्सेना जी की मेरे गीत  है .ये दोनों ही पुस्तकें जानी मानी शख्सियतों और ब्लागरों की लिखी हैं . अभी निकाय निर्वाचनों में अतिशय व्यस्तता के कारण इन्हें पढ़ तो नहीं पाया हूँ .मगर पुस्तक के आने पर उसके रैपर को खोलकर मुख्य पृष्ठ निहारने ओर एक सरसरी निगाह से पन्नों को पलटने का लोभ भला कहाँ संवरण हो पाता है . सो यह कृत्य तो सहज ही संपन्न हो गया .

अनिल पुसदकर जी की पुस्तक क्यों जाऊं बस्तर मरने दरअसल उनकी एक आत्मप्रवंचना  है जिसमें वे एक पत्रकार की हैसियत से दैनिक भास्कर में लगातार पुलिस के विरोध में लिखने के बाद/बावजूद  नक्सल हिंसा में शहीद पुलिस और परिवार के संवेदना के पहलुओं से रूबरू होते हैं . और नक्सली हिंसा के शहीद पुलिस एवं उनके परिवारों से जुड़े कई मौजू सवालों को पुस्तक में संवाद की शैली में उठाते हैं .यह संवाद उनके कई वर्षों के बाद अचानक मिले एक मित्र से होता है . पुस्तक का कलेवर नयनाभिराम है और वैभव प्रकाशन ,अमीनपारा चौक ,रायपुर ,छतीसगढ़ ने इसे बड़ी ही सुरुचिपूर्णता से छापा है . पुस्तक के सभी पृष्ठ बहुरंगी और प्लास्टिक कोटेड हैं .ज़ाहिर है पुस्तक का शेल्फ जीवन ज्यादा है.कृति के बारे में कभी फुर्सत से लिख सकूंगा .

दूसरी पुस्तक सतीश सक्सेना जी की  मेरे गीत की भी चर्चा इन दिनों चल रही है . ज्योतिपर्व प्रकाशन, इंदिरापुरम गाजियाबाद ने  इस पुस्तक -कवि के प्रथम गीत संग्रह को भी बड़े सलीके से छापा है . पुष्प छाया सज्जित आवरण  आकर्षित करता है. .यह एक भरा पूरा गीत संग्रह है १२२ पृष्ठों का ...और भूमिका तथा गीतों के संकलन को  एक नज़र में देखने से यह कृति कृतिकार के बारे में भी बहुत कुछ बताती हुयी लगती है -कोई गीतकार या कवि कैसे बन जाता है यह पुस्तक इसे बखूबी बयान करती लगती है . संकलित कुछ गीत पहले से ही पढ़े हुए हैं और विहगावलोकन के समय उनकी स्मृति भी कौंधती रही ...मैं सतीश जी के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व का पहले से भी फैन रहा हूँ -इसलिए यह पुस्तक मेरे लिए बहुत प्रिय है और मेरे बुक शेल्फ की लम्बी अवधि तक शोभा बढ़ाने वाली है . 



दोनों कृतिकारों को बहुत बहुत बधाई  के साथ यह सुझाव भी की पुस्तक को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए आनलाईन फ्लिपकार्ट सरीखी सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए अपने प्रकाशक से कहें ...मेरी गुजारिश है कि ये पुस्तकें आप भी पढ़ें और लेखकीय श्रम को सार्थक करें . 

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

किताबें मिली ,कुछ पढ़ीं कुछ अधपढ़ीं !

मेज पर कुछ किताबें पडी हैं ..मतलब पूरी तरह पढी नहीं जा सकी हैं ..पढ़ ली गयी होतीं तो  अब तक शेल्फ में पहुँच चुकी होतीं ...विषय भी काफी डाईवेरसीफायिड है -वैदिक सूक्त संग्रह से लेकर आधुनिक  कविता संग्रह तक ....इनमे सभी में से कुछ न कुछ पढ़ चुका हूँ .मगर पूरा अभी तक कोई भी नहीं कर पाया ...उत्तरवर्ती दिनों में मेरी यह गंदी आदत होती गयी है कि कई जगह मुंह मारने लगता हूँ जबकि एक समय में एक ही जगह (इसे किताब और केवल किताब  के सन्दर्भ में समझा जाय ) ध्यान देना ज्यादा उचित है.मगर एक पुस्तक प्रेमी -बिब्लियोफाईल  ही समझ सकता है कि पुस्तकों का टेम्पटेशन ऐसा ही होता है जो बहुत परेशान   करता है...नई रूप कलेवर में मनमाफिक कोई नई आई नहीं की बस मन उधर ही ललक उठता  है ..... कंट्रोलै नहीं होता .........ऐसा ही कुछ गुजर रहा है इन दिनों इधर ....एक साथ कई किताबों पर ध्यान गड़ा दिए हैं और मगर  कोई पूरी होती नहीं दिख रही हैं .

सीमा गुप्ता जी की विरह के रंग का अपना ही शेड्स है ..उनकी कवितायें विरह की पीड़ा को मुखर करती हैं -विरह जो श्रृंगार का ही एक अनिवार्य और अविभाज्य पहलू है ...सीमा जी कहती हैं कि सुख तो सभी का दुलारा है -दुःख आखिर क्यूं अलग थलग गुमसुम  सा रहे -तो मैंने उसे ही अपना लिया है अपनी कविताओं में ...विछोह का दुःख .... विरह  का दुःख ,अपनों के पराये होते जाने का दुःख ..सर्वं दुखमयम जगत ....तो फिर दुःख से कोई दूरी क्यूं ? दुःख तो अपना साथी है ....अभी कुछ कवितायेँ ही पढ़ सका हूँ ,इस कुशल शब्द शिल्पी की रची हुई  रचनाएं जिसमें विछोह के  भावों को तराश तराश कर संगमरमरी सौदर्य दे दिया  है रचनाकार ने अपने इस पहले कविता संकलन में! पूरी पढने के बाद  ही यह टेबल से हट पायेगी!

 रीडिंग टेबल पर पडी किताबें 

फिर है मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर एक  पुस्तक  -जिसे बनारस के सरयूपारीण परिषद् की आमुख पत्रिका वैदिक  स्वर के एक विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है -यह रामके ऊपर कई बेहतरीन लेखों का संकलन है -लेखकों में राम मनोहर लोहिया भी हैं और विद्यानिवास मिश्र भी ...राम का सीता  -परित्याग,बालि वध सरीखे प्रसंगों की मीमांसा हुई है -और बहुत तार्किकता के साथ लेखकों ने अपने पक्ष प्रस्तुत किये हैं -मित्र के लिए राम छल कपट भी कर देते हैं -बालि जो रावण से भी बड़ा और पराक्रमी योद्धा था इतनी आसानी से मरने वाला नहीं था  -रावण को ही मारने में राम की सब गति दुर्गति हो गयी -तब बालि से सीधे उलझना ठीक नहीं था और उसके पास  प्रतिद्वंद्वी के बल को आधा कर देने का वरदान /हुनर भी था .और सीता के निर्वासन के भी विवेचन प्रभावित करते हैं -इन पर फिर कभी विस्तार से चर्चा .

फंडामेंटल्स ऑफ़  माडर्न अस्ट्रोनोमी विज्ञान प्रसार दिल्ली का प्रकाशन है जिसे वहीं के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ .सुबोध मोहंती ने लिखा है .यह आधुनिक ज्योतिर्विदों की जीवनी और कृतित्व पर एक अच्छी किताब है मगर बहुत ज्यादा समय की मांग करती है अवगाहन का -इसे आद्योप[अंत पढने का मतलब है कई ब्लॉग पोस्टों पर टिप्पणियों के समय को यहाँ स्वाहा कर देना ..देखते हैं ऐसा दुर्योग /सुयोग कब बन पाता है .

वैदिक सूक्त संग्रह गीताप्रेस की है और मुझे बहुत ल्योर/टेम्प्ट  कर रही है -सूक्त एक ही अर्थ -भाव प्रकृति वाले कई मन्त्रों के समूह  को कहते हैं -पंचदेव सूक्त में लोक जीवन में प्रथमपूजा के अधिकारी गणेश  का स्तवन सहज ही ध्य्तान आकर्षित करता है =
श्रीगणपति-स्तवन
“ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीद् सादनम्।।”   (ऋग्वेद २।२३।१)
(हे अपनी गणों में  गणपति (देव) ,क्रान्तिदर्शी कवियों में श्रेष्ठ कवि ,शिव -शिवा के प्रिय ज्येष्ठ पुत्र ,अतिशय भोग और सुख आदि के दाता आप हमारी स्तुतियों को सुनते हुए  यहाँ विराजमान हों .....) मैंने तो अपनी ओर से गणेश का आहवान कर दिया है और उनकी कृपादृष्टि के आकांक्षी हैं .
..
इस वैदिक सूक्त -संग्रह से चयनित मन्त्रों को यहाँ भी समय समय पर जरूर प्रस्तुत करूंगा! अब आज्ञां दें ताकि मैं इन पुस्तकों का पारायण कर सकूँ अन्यथा ये अधपढी ही  रह जायेगीं !


दावात्याग:प्राप्त पुस्तकों की यहाँ समीक्षा नहीं की गयी है ...

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

रिटर्न टू अल्मोड़ा से ....कृपया ध्यान दें , वयस्क सामग्री है !

इंटर गवर्नमेंटल पैनेल आन क्लाईमेट चेंज (IPCC ) के मुखिया और इसी संस्थान के लिए नोबेल पुरस्कार झटक लेने वाले अपने राजेन्द्र पचौरी साहब इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं, मगर इस बार कारण दूसरे हैं . हिमालय के ग्लेशियरों के पिघल जाने  संबंधी २००७ में किये गए अपने दावों में कतिपय गलतियों के लिए उनकी खिंचाई अभी थमीं नहीं थी कि एक दूसरा मामला उनकी जग हंसाई का कारण  बनता जा रहा है .यह दूसरा मामला दरअसल उनके रोमांटिक उपन्यास रिटर्न टू अल्मोड़ा को लेकर है जिसके हाट विवरणों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में बवेला मचा हुआ है .
 कृपया ध्यान दें ,आगे वयस्क सामग्री है -
 रिटर्न टू अल्मोड़ा  की कहानी का  मुख्य पात्र  एक मौसम विज्ञानी  संजय नाथ है जिसके साथ खुद पचौरी साहब का स्पष्ट तादात्म्य झलकता है -साठोत्तरी जीवन में पदार्पण कर चुके संजय नाथ अपने संस्मरणों का साझा करते हैं पाठकों से -कैसे वे भारत के एक कसबे से निकल कर पेरू से होते हुए अमेरिका पहुंचे और उनकी एक अध्यात्मिक यात्रा पूरी हुई .उनके उपन्यास में वनों  को विदीर्ण करते ठेकेदार माफिया और भ्रष्ट राजकीय तंत्र के साठ गाठ  का खुलासा तो है मगर उपन्यास के गर्म वृत्तांत पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और साहित्यकारों और मीडिया के बीच चर्चा का विषय बन चुके है जो चटखारे ले लेकर उन्हें पढ़ और एक दूसरे से बतिया रहे हैं -नोबेल प्रतिष्ठा प्राप्त एक जग प्रसिद्ध शख्सियत की  यौनिक आसक्ति/फंतासी का मसला  गरमाया हुआ है .कई विवरण तो बहुत ही गरम हैं -यहाँ उद्धृत करने में की बोर्ड पर थिरकती अंगुलियाँ  शायद  और भी थरथरा उठें, मगर कुछ बानगी तो न चाहते  हुए भी  जी कड़ा करके यहाँ दे रहा हूँ -बस गुजारिश यही है कि मित्रगण मुझे बख्श देगें -भैया इदं न मम -यह मेरा नहीं पचौरी साहब का जज्बा है और मैं तो उनके जज्बे को देख खुद भी  हतप्रभ हूँ -प्रतिभा और सेक्स फंतासी में जरूर कोई न कोई सम्बन्ध है जरूर -हा हा -लीजिये मुलाहिजा फरमाएं सीधे रिटर्न टू अल्मोड़ा से .......

"अपनी  महबूबा शिरले मैक्लीन  से नैनीताल में  संजय के मिलन का यह पहला मौका था  -वह खुद संजय को बेडरूम में ले गयी ....उसने पहले गाऊँन उतारा ,नाईटी को भी नीचे सरका दिया और  शरीर को रजाई के भीतर  ढकेल दिया ...संजय ने उसे बहुओं के घेरे में ले लिया   और ताबड़तोड़  चुम्बनों की बरसात कर डाली...धीरे धीरे बाहुओं का  कसाव और चुम्बनों की  गहराई बढ़ती गयी ....
मैक्लीन फुसफुसाई ,सैंडी .मुझे आज कुछ नया अनुभव हुआ ....मेडिटेशन के ठीक बाद  तो तुम गजब ढाते हो .....क्यों नही तुम हर मेडिटेशन सेशन के बाद एक यह सेशन भी करते ....."

यह तो बस एक छोटी सी बानगी है .मुख्य पात्र के नारी उभारों  के प्रति असीम ललक के वृत्तांत से पृष्ठ दर पृष्ठ रंगे हुए हैं ...... यौनिक आनंदों के खुल्लम खुलाखुल्ला उल्लेख तो उपन्यास में खुला खेल फरुखाबादी से भी आगे बढ़ता  चला गया  है.
एक और बानगी ...."संजय ने एक स्थानीय  सावली  सलोनी कन्या को विनय के बिस्तर पर देखा ... उसकी भी सहसा एक अतृप्त कामना बलवती हो उठी ....उसने  अपने कपड़ों को उतार फेंका और संजना  के शरीर की स्पर्शानुभूति में जुट गया .खासकर उभारों को.........लेकिन अतिशय उत्तेजना के चलते शुरू होने के पहले ही वह ढेर हो गया था ......
.....उसने कन्धों को थोडा पीछे की ओर पुश किया इससे उन्नत उभार आगे की ओर और उभार पा गए ....जिन्हें देखकर उसकी सांसे धौकनी हो चलीं ...."
उपन्यास के कई वृत्तांत समूह यौनिक आनन्द पर फोकस होते हैं .एक दृश्य में तो नायक चलती ट्रेन की सहयात्री के रेशमी  लाल रुमाल को झटक कर   उसी के ही सहारे  अपनी पिपासा  शांत कर लेता है . 

यूनाईटेड नेशंस के अधिकृत एक वैश्विक संगठन का बॉस और नोबेल सम्मान से जुड़े एक प्रखर मेधा के वैज्ञानिक के लिए ऐसा क्या आन पड़ा कि वह भारतीय सन्दर्भ में अश्लीलता से भरे एक सतही  रूमानी उपन्यास की रचना कर बैठा ? उपन्यास का विमोचन अभी हाल ही में मुम्बई में उद्योगपति  मुकेश  अम्बानी के हाथों हुआ -प्रतिभा का एक और अधोपतन! सर्वे गुणा  कांचन माश्रयंते ....

पचौरी  अपने इन कृत्यों से भारतीयों के सामने कौन सा आदर्श स्थापित कर रहे हैं ?-कहीं इस व्यक्ति को पहचानने में पूरी दुनिया को कोई  धोखा तो नहीं हुआ है ? 
चाहें तो कुछ यहाँ,  और यहाँ  भी देख सकते हैं .


 


शुक्रवार, 15 मई 2009

चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -4

चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -1 चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -2 चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -3

बिखरे मोती में एक से बढ़कर एक कुल १४ गजलें समाहित हैं -पहली ही गजल अपनी ओर एक चुम्बकीय आकर्षण के साथ पाठक को आमंत्रित करती है -
"दम सीने में फंसा हुआ ,कमबख्त न निकले
तिरछा सा वार बाकी है इक तेरी नज़र का " (पृष्ट ७३)
अब इधर भी देखिये की क्या ये किसी व्याख्या की मांग करती हैं ?
" फैल कर सो सकूं इतनी जगह मिलती नहीं
ठण्ड का बस नाम लेकर मैं सिकुड़ता गया "(पृष्ठ & 77)

जन स्मृतियाँ दुर्भाग्य से कितनी अल्पकालिक होती हैं इस पर कवि का यह गहरा कटाक्ष तो देखिये -
"कल मरे थे लोग कितने ,रो रही थी ये जमी
महफिले सजने लगेगीं देख लेना शाम से " ( पृष्ठ -८३)
जीवन के एक कटु सत्य और नग्न यथार्थ से साक्षात्कार करती ये पंक्तियाँ मन को सहसा विषणण कर देती हैं मगर किया क्या जाए मानों जनजीवन की यही नियति बन गयी हो ! अब भला कितने लोगों को याद है मुम्बई का आतंकवादी हमला ?

समीर लाल के मुक्तक स्नेह सम्वेदना ,प्यार तकरार ,विछोह विप्रलम्भ से पूरी तरह लबरेज हैं -"जो मुझसे प्यार करती है " शीर्षक मुक्तक की इन पंक्तियों पर जरा गौर फरमाएं -
" कभी इनकार करती है ,कभी इकरार करती है
बड़ी नादान लडकी है , जो मुझसे प्यार करती है ( पृष्ठ -८९)
कवि अपनी या खुद के रचना कर्म की कालजीविता के प्रति कोई मुगालता नहीं पालता -
" आज मैं हूँ कल मेरा ये नाम बस रह जायेगा
वक्त की आँधीं में वो भी इक दिन बह जायेगा
( पृष्ठ -९०)
पर यह नीर क्षीर विवेक /न्याय भी तो काल बली के हाथ ही है ! मगर ये मौलिक रचनाएँ अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त तो करती हैं ! कवि की "तुम " शीर्षक की चार मुक्तक कवितायेँ वर्ड्सवर्थ की ही परम्परा में अपनी गर्विता प्रेयसी ( बोलो कौन ? ) को समर्पित है जो प्रेम और विछोह के उतार चढाव की तासीर लिए हुए हैं ! मुक्तकों के कई अन्य रूप रंग राजनीति ,धर्म और प्यार के प्रभावी अवयव समेटे हुए हैं !

क्षणवाद की फिलासफी भले ही अज्ञेय से गुजर कर आज भी अज्ञेय ही है मगर समीर लाल की क्षणिकाओं का प्रभाव कतई क्षणभंगुर नही है -लाचारी ,आरक्षण ,इंसान शीर्षक क्षणिकाएं गहरा प्रभाव डालती हैं.अन्तिम क्षणिका कवि की रचना प्रक्रिया से अवगत कराती है -
और अंत में
हाथ में लेकर कलम
मै हाले दिल कहता रहा
काव्य का निर्झर उमड़ता
आप ही बहता गया


[समीक्षित पुस्तक:
बिखरे मोती
(काव्य संग्रह )
रचनाकार -समीर लाल 'समीर '
प्रथम संस्करण :२००९
प्रकाशक -शिवना प्रकाशन ,सीहोर, मध्य प्रदेश
मूल्य २०० रूपये मात्र ]

गुरुवार, 14 मई 2009

चिट्ठाकार समीर लाल : जैसा मैंने देखा -3

चिट्ठाकार समीर लाल -जैसा मैंने देखा !

चिट्ठाकार समीर लाल : जैसा मैंने देखा -2

'बिखरे मोती' को रचनाकार ने गीत ,छंद मुक्त कविताओं,गजल ,मुक्तक और क्षणिकाओं अर्थात साहित्य की जानी पहचानी विधाओं से सजाया सवारा है . संग्रह में संयोजित रचनाएं रचनाकार को इन सभी विधाओं में सिद्धहस्त होने की इन्गिति करती हैं . हां यह जरूर है कि ये सभी रचनाएँ पाठकीय एकाग्रता की मांग करती हैं क्योंकि इनके अवगाहन में पल पल यह आशंका रहती है कि सरसरी तौर पर पढने में कहीं कोई सूक्ष्म भाव बोधगम्य होने से छूट न जाय! रचनाकार ने अपने व्यतीत जीवन की अनेक गहन अनुभूतियों को ही शब्द रूपी मोतियों में ढाल दिया है मगर संभवतः एक लंबे काल खंड के अनुभवों की किंचित विलम्बित प्रस्तुति ने ही उसे इन शब्द -मोतियों को बेतरतीब और बिखरे होने की विनम्र आत्मस्वीकृति को उकसाया है .मगर रचनाओं के क्रमिक अवगाहन से यह कतई नही लगता कि कवि के गहन अनुभूतियों की यह भाव माला कहीं भी विश्रिनखलित हुई हो !

संग्रह के २१ गीत दरअसल समय के पृष्ठ पर रचनाकार के भाव स्फुलिगों के ज्वाज्वल्यमान हस्ताक्षर हैं ! कहीं तो वह एक उद्दाम ललक "प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं "(पृष्ठ -२५) का प्रतिवेदन कर रहा है तो कहीं " तुझे भूलूँ बता कैसे तुझे हम यार कहते हैं " (पृष्ठ -२६)की मधुर स्म्रतियों में खो गया सा लगता है ! "तुम न आए "(पृष्ठ ३१) विरही भावों का खूबसूरत गीत है जो पाठको में भी सहज ही विरही स्म्रतियों को कुरेदने का फरेब सा करता लगता है !

कवि समीर का पूरा व्यक्तित्व ही इस गीत में उमड़ आया है -" वैसे मुझको पसंद नही "( पृष्ठ -३६) , भले ही इसका शीर्षक कविता की आख़िरी पंक्ति -"बस ऐसे ही पी लेता हूँ " ज्यादा सटीक तरीके से रूपायित करती हो मगर कविवर ठहरे चिर संकोची सो एक कामचलाऊ शीर्षक ही से संतोष कर बैठे ! वैसे यह गीत मेरी पसंद का नंबर १ है ..." जब मिलन कोई अनोखा हो .....या प्यार में मुझको धोखा हो ....जब मीत पुराना मिल जाए या एकाकी मन घबराए ....बस ऐसे में पी लेता हूँ " ऐसी ही कवि की विभिन्न मनस्थितियों को यह लंबा किंतु बहुत प्यारा गीत सामने लाता है और पाठक के मन में भी टीस उपजाता चलता है ! यह गीत समान मनसा पाठक को सहसा ही रचनाकार के बेहद करीब ला देता है ! कवि के विस्तीर्ण जीवन की मनोंनुभूतियों के चित्र विचित्र भावों का ही मोजैक है यह गीत !

रचनाकार की छंदमुक्त कवितायें भी कविमन के गहन भावों की सुंदर प्रस्तुतियां हैं -" मेरा बचपन खत्म हुआ ....कुछ बूढा सा लग रहा हूँ मैं ...मीर की गजल सा " (पृष्ठ -४७)या फिर "उस रात में धीमें से आ थामा उसने जो मेरा हाथ ...मैं फिर कभी नही जागा " ( पृष्ठ -६३) । "चार चित्र " शीर्षक कविता में मानव जीवन के विभिन्न यथार्थों का शब्द चित्र उकेरा गया है -मसलन " वो हंस कर बस यह याद दिलाता है वो जिन्दा है अभी "(पृष्ठ -६७)
जीवन की यह क्रूर नियति तो देखिये ," महगाई ने दिखाया यह कैसा नजारा गली का कुत्ता था मर गया बेचारा " ( पृष्ठ -७०)


अभी जारी ......






बुधवार, 13 मई 2009

चिट्ठाकार समीर लाल :जैसा मैंने देखा -2

हम अपने प्रिय चिट्ठाकार समीर लाल जी की चर्चा में जुटे हैं ! कहाँ तक कहा जाय ,वे ब्लॉग जगत के लिविंग लीजेंड बन चुके हैं ! लिविंग फासिल तो कदापि नही ! यहाँ उनकी विरुदावली पेश करने की मेरी जरा भी मंशा नहीं है और ही मैं किसी चारण ( भांट ) परम्परा का वहन ही कर रहा हूँ ! मैं अपनी सामर्थ्य और सीमा के तहत चिट्ठाकारों के बारे में कुछ कह सुन रहा हूँ -वह चाहे उनके अच्छे कार्यों /कारणों से हो या बुरे ! अल्पज्ञात ,कुख्यात और समीर जी जैसे विख्यात सभी ब्लॉगर मेरी हिट लिस्ट में हैं ! और अभी तो बहुत कुछ आना बाकी है ! ठण्ड रख बादशाहों !

अब जब समीर जी की चर्चा यहाँ छेड़ ही दी है तो लगे हाथ उनके बिखरे मोतियों को क्यों समेटने का उपक्रम कर लिया जाय ! सिद्धार्थ जी ने अतिशय विनम्रता के साथ इस काज से तोबा कर ली है ! मैं उन सरीखा विनम्र नही हूँ ! मैं पूरी उद्धतता के साथ अपनी मूर्खताओं /बेवकूफियों को आपके साथ बाँटने में आनंदित होता हूँ -यह कुछ कुछ आत्मपीडात्मक ही तो है ! पर शायद मेरी यही आत्मपीडा ही है जो समीर सरीखे रचनाकार से कहीं कुछ तादात्म्य बिठा लेती है -जीवन के कुछ पल छिन जहाँ मानों रचनाकार से हिल मिल से जाते हैं ! समीर जी के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह को पढ़ते हुए मुझे अनेक स्थलों पर ऐसा ही लगा कि अरे यही तो मेरी भी पीड़ा है ,मेरा भी अनकहा हैएक कुशल रचनाकार का यही लिटमस टेस्ट भी है कि वह अपनी रचनाओं से किस सीमा तक पाठकों से तादाम्य स्थापित कर पाता है ! समीर जी के इस काव्य संग्रह की यही बड़ी विशेषता है कि इसकी तमाम रचनाएँ पाठकों की अपनी अनुभूतियों से सीधे जा जुड़ती हैं ! मैं कोई पेशेवर काव्य समीक्षक तो हूँ नहीं और ही इस विधा की शास्त्रीय बारीकियों से परिचित हूँ -अतः सुधी ब्लॉगर बन्धु मेरी कुछ धृष्टताओं और अज्ञानता जनित गलतियों को अवश्य माफ़ कर देगें इस आशा और विश्वास के साथ मैं समीर लाल कृत बिखरे मोती काव्य संग्रह की एक पाठकीय समीक्षा यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ! मुलाहजा फरमाएं !

बिखरे मोती काव्य संग्रह को समीर जी ने अपनी माँ की पुण्य स्मृति को समर्पित किया है -और इस समर्पण में भी एक वेदना ही छुपी है -बिन माँ के उस घर में कैसे रह पाउँगा ? काव्य संग्रह को कई नामचीन साहित्यकारों ने अनुशंसित/अभिस्वीकृत भी किया है जिसमें मेरे प्रिय कवि कुंवर बेचैन भी हैं जिनकी कुछ पंक्तियाँ ( दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना ....) मैं अक्सर गुनगुनाता रहता हूँ ! उन्होंने समीर जी को मूलतः प्रेम का कवि माना है ! जो वे निसंदेह हैं ! सर्वश्री रमेश हठीला ,राकेश खंडेलवाल और पंकज सुबीर प्रभृत रचनाकारों ने भी अपने अपने तई इस काव्य संग्रह के रचना विधान /प्रक्रिया पर अपने विचार व्यक्त किए हैं ! पर जैसा मैंने कहा है समीर जी और उनकी रचनाओं के बारे में बहुत कुछ कह कर भी कितना कुछ अनकहा सा रह जाता है ! ठीक उस बिहारी की नायिका की भांति जिसके सौन्दर्य वर्णन में एक से एक गर्वीले चित्रकार का घमंड धूल धूसरित हो जाता है -चित्रकार है कि उसे अपने कैनवास पर उतारने को उद्यत है और नायिका है कि क्षणे क्षणे यन्न्वतामुपैति ...दैव रूपं रमणीयताह .....मतलब उसके सौन्दर्य में क्षण क्षण बदलते भावों को चित्रकार अपनी तूलिका में कैद कर पाने से हताश हो कर अंत में उसके चित्र को अधूरा ही छोड़ हार मान लेता है मैं समझ सकता हूँ सिद्धार्थ भाई की हताशा को ..मगर मैं तो मानूंगा नही अपनी अनाधिकार उद्धत चेष्टा से ...

बिखरे मोती के आरम्भ में ही समीर जी ने मन की बात के तहत अपने प्रस्तुत काव्य कर्म की प्रस्तावना की है ! यह आश्चर्यजनक है कि मात्र कुछ वर्षों के कालखंड ( मात्र १९९९ से अद्यावधि ) में ही समीर लाल की यह प्रत्यक्ष आभा दृष्टिगत हुई है जिनमें उनके ब्लॉग लेखकीय जीवन की बहुत बड़ी भूमिका है ! यह सचमुच एक मीटिओरिक सक्सेस है -शायद ही ऐसा कोई और दृष्टांत कहीं और सम्भव हो ! जाहिर है इस आभामंडल का पार्श्व कोई कम आलोकित नही रहा होगा मगर वह नजरों से ओझल जरूर रहा ! और निश्चित तौर पर हिन्दी ब्लॉग ने इस महान रचनाकार को हमारे सामने ला प्रस्तुत करने में एक उल्लेखनीय भूमिका निभायी है ! और जैसा कि रचनाकार ने ख़ुद स्वीकारा है उसके काव्यकर्म को प्रोत्साहित करने में श्री अनूप शुक्ला फुरसतिया ( कौन हैं भाई ? ) श्री संजय बेगाणी ( क्या अपने ब्लागर संजय बेगाणी ? ) आदि की महनीय भूमिका रही है ! अपने प्रस्तावना में रचनाकार कुछ गृह विरही ( नोस्टालजिक ) सा हो उठा है ! जो सहज ही है ! उन्होंने कविता के याहू ग्रुप को भी श्रेय दिया है जहाँ उनका लावण्या शाह और दीगर किंतु काव्यकर्म के दिग्गजों से मेल जोल हुआ ! काव्य संग्रह का श्रेय अपने पिता श्री को भी देना वे नहीं भूले हैं !

जारी........

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