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रविवार, 12 जनवरी 2014

एअरगन से मछलियों का शिकार (सेवाकाल संस्मरण - 18 )

वर्ष 1989, झांसी से चलने का वक्त आ गया था।यहाँ की पोस्टिंग ने मुझे सरकारी सेवा के कई प्रैक्टिकल अनुभव कराये।  एक तरह से आगामी सेवाकाल की पूर्व पीठिका तैयार हुई । कई अप्रिय  अनुभवों से भी गुजरना पड़ा. उन दिनों एक मंत्री जी थे श्री सीताराम निषाद जी जिनके पास सिचाई और मत्स्य दोनों का प्रभार था।  उनका आगमन हुआ।  मेरे सीनियर अधिकारी ने मुझसे मंत्री जी के आगमन पर उनके स्थानीय सद्भाव के लिए मुस्तैद रहने को कहा।  यह जानकारी भी  कि मंत्री जी के आगमन के बाद उन के खान पान का सारा इंतज़ाम हमें ही उठाना होगा -और केवल उन्ही के ही नहीं बल्कि उनके आगमन पर उनके और पार्टी के समर्थकों की भीड़ को भी चायपान और खाना भी खिलाना होगा। मगर इसके लिए विभाग का कोई बजट  अलाट होता नहीं।  मैंने अपने उच्चाधिकारी से पूछा कैसे होगा सब इंतज़ाम? उन्होंने कहा "ईंट इज नन आफ माय बिजिनेस" मैं अवाक! इतना वेतन भी नहीं था  कि खुद खर्चे उठा सकूं -कोई घर आये तो भले ही अतिथि है चाय पानी करा  दिया जाय पर पूरे अमले जामे को और वह भी सरकारी दौरे पर  खर्च खुद के द्वारा? मैं असहज हो उठा था।

मैंने सिचाई विभाग के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने कहा मंत्री जी के खान पान पर आये खर्च को तो वे  कर लेगें मगर मुझे बाद में आधी राशि देनी होगी! मैंने स्थानीय मंत्री जी के समर्थकों में से  जिनसे अच्छा  संवाद था अपनी समस्या बतायी मगर उन्होंने कहा यह तो दस्तूर है।  बहरहाल मंत्री जी के आने के बाद यह समस्या उन  तक पहुँच गयी और उन्होंने सारा इंतज़ाम केवल सिचाई विभाग पर थोप दिया। मगर यह सब आज भी चल ही रहा है और विभागों से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे ईमानदार बने रहें -यह बात तय है कि भ्रष्टाचार की कर्मनाशा (मैं गंगोत्री नहीं कहूंगा) भी ऊपर से ही प्रवाहित होती है! खासतौर पर राजनेता और भ्रष्ट अधिकारियों का गठजोड़ व्यवस्था को बदलने नहीं देता। कहते हैं न बेशर्मी का दूसरा नाम ही राजनीति है!

 मछली का एक और अप्रिय प्रसंग है जिसका अनुभव  झांसी से ही हुआ। लोग बाग़ पशुपालन विभाग से मुर्गा  खाने की फरमाईश नहीं करते मगर मछली वाला अधिकारी लोगों की रोज रोज मछली खाने की मांग से तंग हो रहता है। अब मुश्किल यह होती है कि कस्मै देवाय हविषा विधेम! मतलब किस किस को मछली दी जाय? शायद चीन जो मत्स्य क्रान्ति में भी सदियों से अग्रणी रहा है में भी यही समस्या रही है, सो वहाँ एक कहावत ही प्रचलित हो गयी है -" किसी को मछली खाने को दो तो वह अल्प  समय के लिए ही उसका लाभ उठा लेगा मगर किसी को मछली पालना सिखा दो तो वह जीवन भर उसका लाभ  उठायेगा!" मगर यह कहावत उत्तर परदेश में लागू ही नहीं हो सकती जहाँ अकर्मण्यता, मुफतखोरी  और निर्लज्जता  की एक संस्कृति सी बन गयी है! यहाँ अपनी जेब से खर्च करने की नीयत ही नहीं है! चाहे वो अच्छा ख़ासा कमाने वाले प्रशासनिक अधिकारी हो या आम ख़ास पड़ोसी!यही नहीं उच्चाधिकारियों की मीन मुफतखोरी का आलम यह रहता है कि मछली पहुचने के दूसरे  दिन की सुबह तक जी में धुकधुकी बनी रहती है कि सब कुछ ठीक ठाक निपट गया -मछली की कोई शिकायत नहीं आयी ! आला साहबों को डिसेंट्री डायरिया तो नहीं हुआ! कोई कांटा तो नहीं गले में फंस गया।  आदि आदि दुश्चिंताएं मन में उठती रहती हैं।  

 मैं  इस मत्स्यभोज  प्रसंग से क्षुब्ध रहता आया हूँ  ! झांसी मंडल के एक सबसे आला आफिसर के यहाँ एक बार भेजी गयी मछली ही बदल गयी।कुहराम मच गया। मेरे विभाग के बड़े अफसर तक की पेशी हो गयी। बंगले से हिदायत आयी थी एक ख़ास मछली की -गोईंजी जो साँप  सी दिखती है (मास्टासेम्बलस प्रजाति) -कुक ने समझा कि ये वाली तो मैडम खाएगीं नहीं सो उसे तो अपने घर भिजवा दिया और साथ भेजी गयी दूसरी मछली का पकवान बना परोस दिया।  खाने की मेज पर ही हंगामा मच गया।हम सब तलब हो गए।  बाद में स्थति साफ़ हुयी तो खानसामे पर नजला गिर गया. मैं हमेशा इन प्रकरणों से संतप्त होता आया हूँ! एक तो कहीं से मांग जांच कर मछली का इंतज़ाम करिये और फिर साहबों के नाज नखरे झेलिये। 

एक और भी ऐसा ही मत्स्य प्रकरण है जिसमें आला अधिकारी का फरमान हुआ कि उनके बंगले के स्वीमिंग पूल में ही बड़ी बड़ी किसिम किसिम की मछलियां डाल दी जायं। जिससे उनकी जब भी इच्छा हो वे खुद वहीं से मछली निकाल लिया करें। आदेश का अनुपालन किया गया-जीप के ट्रेलर में भर भर कर उसी तरह मछलियां लायी गयीं जैसा कि मानस में वर्णन है कि भरत की आगवानी में निषादराज की आज्ञा से "मीन पीन पाठीन पुराने भर भर कान्ह कहारन लाने!" मगर ये सभी तो जिन्दा थी और अच्छे वजन और प्रजातियों की थीं! हाँ यह दीगर बात है कि परिवहन के दौरान बहुत सी मछलियां काल के गाल में समा गयीं।  कुछ दूसरे दिन से तरण  ताल में मर मर कर उतराने लगीं -बावजूद इसके सौ के ऊपर मछलियां बच ही गयीं। मगर हैरत की बात यह कि हर रोज उनमें से अधिकृत रूप से तो साहब बहादुर द्वारा एक दो ही निकाली जातीं मगर उससे ज्यादा गायब पायी जातीं।  क्या कोई चोरी कर रहा था ? साहब बहादुर के कम्पाउंड में किसकी जुर्रत कि वह चोरी करे। 

आखिर एक विभाग का चौकीदार रखवाली पर लगा दिया गया।  और तब मछलियों के कम होने का राज भी खुल गया।  होता यह कि साहब बहादुर के दुलारे किशोरवयी  प्रिंस अल्सुबह एक एअरगन लेकर निकलते और मछलियों पर निशाना साधते -एअरगन से चिड़ियों का शिकार तो देखा था मगर मछलियों के आखेट का यह पहला वाकया दरपेश हुआ था।  बहरहाल एक स्टाफ को इस घटना से साहब बहादुर को बताने के लिए तैयार किया गया और इसका अप्रत्याशित रूप से परिणाम बहुत अच्छा रहा -साहब बहादुर मछलियों पर दयार्द्र हो उठे और मछलियों की आगामी ढुलाई रोक दी गयी!

सर्विस में आगे भी ऐसे अनेक अप्रिय मत्स्य प्रसंग आते रहे हैं जिनकी चर्चा समय समय पर होती रहेगी!  जारी। .... 

रविवार, 5 जनवरी 2014

सबते सेवक धर्म कठोरा। (सेवा संस्मरण -17)

झांसी की यादों की एक खिड़की अब पूरी तरह खुल गयी लगती है। यह मेरा एक बड़ा सौभाग्य था कि मुझे यहाँ बहुत अच्छे सीनियर अधिकारी और सहधर्मी मित्र मिले जिनके साथ ने मेरे पूरे जीवन पर एक चिरस्थायी छाप छोड़ा है।  दो मित्रों का साथ और बात व्यवहार  आज भी  बना हुआ है -एक तो आर एन चतुर्वेदी जी जो इस समय चंदौली जनपद में जिला आपूर्ति अधिकारी हैं और दूसरे ऐ के श्रीवास्तवा जी जो खड़गपुर से आई आई टी पोस्ट ग्रेजुएशन करके प्रादेशिक सेवा में वैकल्पिक ऊर्जा विभाग में आ फंसे और इस समय मुख्यालय लखनऊ में पदस्थ हैं।  अगर ईमानदारी,  सज्जनता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति देखनी हो तो ऐ के श्रीवास्तवा जी से मिलना चाहिए। भाई आर एन चतुर्वेदी तो मित्रों के मित्र हैं -उनके कहकहों में सारी म्लानता सारा क्लेश मिट जाता है।  इन दोनों शख्सियतों से अक्सर बात होती है और ऐसा संवाद जुड़ता है जैसे हम जन्म जन्म के साथी हों। 

 उन्ही दिनों हमारे इमीडियेट सीनियर अधिकारी/ऐ डी  एम, पी सी एस सेवा के श्री कृष्णकांत शुक्ल जी थे जो मेरी सेवा के पहले सबसे ईमानदारी पी सी ऐस अधिकारी थे - सादगी और मनुष्यता के एक उदाहरण। मेरे झासी से आते समय श्रीमती शुक्ल जी ने हमें रास्ते का आहार- पाथेय दिया और यह हम आज भी नहीं भूले हैं। उनके बेटे हारित शुक्ल उन दिनों बैडमिंटन खिलाड़ी के रूप में उभर रहे थे मगर बड़ी  कृषकाया  थी उनकी।मुझे भी लगता कि एक खिलाड़ी के रूप में उनका विकास उनके साथ ज्यादती थी। हारित को मैं बायलोजी के कुछ पाठ पढ़ाता था और इसके लिए वे खुद मेरे सेलेस्टियल रांडिवू यानी आफिसर्स होस्टल के तीसरे तल  तक आते थे। मुझे उनके यहाँ जाना नहीं होता था।  आज हारित गुजरात  में आई ऐ एस हैं! 

इन्ही हारित को एक बार एक बी डी ओ साहब ने एक चाकलेट क्या थमा दिया था कि कृष्णकांत सर जी की नाराजगी झेलनी पडी थी और ईमानदारी की सीख भी।  उनके घर का अनुशासन कठोर था।  कृष्णकांत सर जी मेरा सम्मान करते थे जबकि मैं उनका मातहत था -एक बार मुझे अपने पैतृक गाँव ले गए थे।  उन्हें उन दिनों रविवार को टी वी पर आने वाले महाभारत सीरियल का बड़ा शौक था। हम  भी उन्ही के यहाँ यह सीरियल देखने बिना नागा पहुँच लेते थे।  एक दिन सीरियल शुरू ही हुआ था कि डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट का  बुलावा आ पहुंचा - बड़ा धर्म संकट उत्पन्न हो गया।  डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ठहरे दक्षिण भारतीय और सम्भवतः महाभारत से कम प्रभावित -बहरहाल शुक्ल सर जी ने महाभारत को वरीयता दी थी और डी एम  साहब का मनोमालिन्य झेलना स्वीकार किया था।  आज भी मैं इस निर्णय पर नहीं पहुँच पाया हूँ कि कृष्णकांत सर का   निर्णय सही था या नहीं! कारण कि सबते सेवक धर्म कठोरा। 

 पता नहीं यह परम्परा आज भी है या नहीं मगर उन दिनों जिला परिषद् द्वारा एक बड़ा सालाना उत्सव -विकास प्रदर्शनी और मेला का  आयोजन का होता था जिसमें अखिल भारतीय कवि  सम्मलेन भी सम्मिलित था।  मुझे यानि  पहली बार जिला प्रशासन के किसी अधिकारी को कवि सम्मेलन के समन्वय/संयोजन   का जिम्मा दे दिया गया -यह मेरे जीवन का एक अनिर्वचनीय और अविस्मरणीय यादगार पल था।  स्थानीय पुरायट कवियों ने इसका विरोध किया था मगर मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और इसके आयोजन में इतना श्रम किया जितना आज तक फिर कभी किसी कार्य में नहीं किया हूँ। 

 कवि  सम्मलेन जिसका नामकरण मैंने बासंती काव्य निशा  रख रखा था अभूतपूर्व रहा और इसके चलते मैं भारत के कई महान कवियों का स्नेह सानिध्य भी पा सका जो आज भी मेरे मानस पर अंकित है। श्री उर्मिलेश शंखधार ने कवि सम्मलेन का संचालन किया था  और कविवर सोम ठाकुर ने उसमें अपनी जादुई आवाज और रस सिक्त काव्य पाठ से चार चाँद लगाया था।  कैलाश गौतम जी का प्रवाहपूर्ण काव्यपाठ मैंने पहली बार उसी समय सुना था। अन्य एक से एक कविगण आये थे जो मेरी मधुर स्मृतियों को  आज भी झंकृत करते रहते हैं। 

क्या दिन थे वे, जीवन को सार्थकता प्रदान करने वाले! जारी …

 

रविवार, 29 दिसंबर 2013

क्या करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट था वह (सेवा संस्मरण -१६)

कहते हैं न कि याददाश्त बड़ी खराब दोस्त है ऐन मौके पर साथ छोड़ देती है। झांसी की यादों के साथ भी ऐसा ही कुछ है। कोई भी एक मुकम्मल याद नहीं सब बिखरी बिखरी सी यादे हैं कोलाजनुमा और आज आपसे उन्हीं में से कुछ साझा करूँगा। मैंने अर्थशास्त्र का विधिवत अध्ययन नहीं किया मगर मुझे अपने आचरण में हमेशा यह देखकर संतोष होता आया है कि मैं खुद और परिवार पर हमेशा अर्थशास्त्र के इस सुनहले सिद्धांत के अनुसार ही व्यय करता रहा हूँ कि "संसाधन हमेशा सीमित रहते हैं और रोजमर्रा के खर्च को अनेक विकल्पों में से चुनना और सीमित करना होता है " .मैं शायद बचपन  से ही  एक संतोषी जीव रहा और अब तो जीवन के सुदीर्घ अनुभवों ने परम संतोषी बना दिया है -मुझे भौतिक चमक दमक और सुविधाओं की कभी शौक नहीं रहा। और न कभी इसका कोई गिल्ट ही। झान्सी के आफिसर होस्टल में भी वैसी ही सन्यासी ज़िंदगी,साधारण सी कुर्सियां एक मेज और हाँ तब चूंकि ऐक्वेरियम रखना एक विभागीय 'ट्रेडमार्क' सा था तो एक बड़ा सा रंगीन मछलियों का ऐक्वेरियम भी।  

श्रीमती जी को जो भी लगता रहा हो मगर मेरे स्वभाव से उन्होंने जल्दी ही अनुकूलन बना लिया था।  आफिसर होस्टल के दूसरे अधिकारियों जिसमें सेल्स टैक्स ,इंजीनियर ,प्रशासनिक अधिकारी आदि थे के लिविंग रूम वैभवपूर्ण और सुसज्जित होते थे और साथ ही उनके पास आधुनिक सुख सुविधा और मनोरंजन के साजो सामान भी  और कुछ की खुद की अपनी गाड़ियां भी। मगर मुझे यह सब देखकर किंचित भी हीन भावना नहीं होती थी. उस समय (1987 -89) तक मेरे पास न तो टी वी थी और न ही फ्रिज आदि। मगर मुझे यही लगता था कि कि ये फालतू चीजें हैं।  पत्नी ने कम से कम एक टी वी खरीद लेने का प्रस्ताव रखा।  मगर मुझे अपनी एक वचनवद्धता याद थी। जो मैं अपनी बहन के विवाह के वक्त ऐसा परिजनों का दावा था कि  मैंने दूल्हेराजा को एक रंगीन टीवी देने का वादा खिचड़ी खाने के मान मनौवल वाली रस्म के दौरान किया था।  अब बिना बहन को दिए खुद अपनी टीवी कैसे खरीद सकता था?  

उन दिनों अपट्रान के रंगीन टीवी बाज़ार में आये थे।  दाम पता किया तो 6 हजार -हिम्मत जवाब दे गयी. इतनी तो मेरी तीन महीनों की तनखाह  थी।  अब क्या किया जाय।  मेरे एक स्टाफ ने तुरंत सुझाव दिया कि मैं अपने जी पी एफ से लोन ले सकता हूँ। बात सुलझ गयी. मुझे कई आसान किश्तों की वापसी के आधार पर छह हजार रूपये मिल गए और मैंने रंगीन टीवी खरीद लिया और उसे सीधे बहन को भिजवा दिया।  अब जब तक यह लोन था दूसरी टीवी खरीदने की हिम्मत ही नहीं थी। मैंने टीवी अपने इलाहाबाद पोस्टिंग में १९९० में ली और वह भी मित्र  मुक्तेश्वर मिश्र की पहल पर।  और  फ्रिज तो 1997  में देवरिया में! 

झांसी  के आफिसर्स होस्टल में मेरे बगल के कक्ष संख्या 17 में ही उन दिनों एक नए आई ए  एस आफिसर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट की पहली पोस्टिंग पर आये।  उनमें एक बात विलक्षण थी ,उनके आई  ए  एस के पेपर्स में एक सांख्यिकी था और दूसरा उर्दू। एक साहित्य तो दूसरा एकदम नीरस विषय।  मेरी उनके साथ खूब जमी। साहित्य की बैठकें होती मगर एक ऐंटी क्लाइमेक्स तब आया जब उनकी एक गोपनीय जांच मुझे डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने सौंप दी और कहा कि मैं जांच करके रिपोर्ट  उसी दिन भले ही रात हो जाय मैं उन्हें सौंप दूं -अब मुझे तो काटो तो खून नहीं , दोनों आई ए  एस एक बॉस एक नया नया बना मित्र।  क्या  करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट।

बहरहाल मैंने जांच पूरी की जिसके लिए मुझे दिन भर मुख्यालय से बाहर कोई सत्तर पचहत्तर किलोमीटर दूर जाना पड़ा था -वापस लौटा तो जाड़े की रात के ग्यारह बज चुके थे. सीधे डी एम रेजिडेंस पर पहुंचा।  चौकीदार ने कहा साहब सो चुके हैं।  मिल नहीं सकते।   मैंने उसे खुद डी एम साहब का आदेश सुनाया और कहा कि यदि तुमने उन्हें बताया नहीं तो वे तुमसे नाराज हो जायेगें।  उसने बड़ी हिम्मत कर टेलीफोन के बेडरूम कनेक्शन का बज़र बजाया।  डी एम  साहब नाईट सूट में बाहर आये और मैंने उन्हें जाँच का लिफाफा सौंपा -उन्होंने जिज्ञासा से कुछ पूछा तो मैंने कहा सर सब कुछ रिपोर्ट में है।  और गुड नाईट कर वापस हो लिया।  उनके अपने ऊपर के विश्वास और एक मित्र के विरुद्ध की गयी जांच की एक अजीब सी मानसिक स्थिति से उबरने का प्रयास कर रह था मैं -ओह यह कैसा धर्म संकट था आज भी वह घटना याद आती है तो दिल में एक हूक सी उठ जाती हैं। 

झांसी प्रवास ने मुझे बेटे कौस्तुभ और बेटी प्रियेषा  के जन्म की सौगात भी दी। यद्यपि कौस्तुभ का जन्म स्वरुप रानी मेडिकल कालेज में और प्रियेषा का जन्म कमला नेहरू हास्पिटल इलाहाबाद में हुआ। कौस्तुभ के पहले जन्म दिन पर सेलेस्टियल रांडीवू यानि आफिसर्स होस्टल के कक्ष संख्या 18 में एक उत्साहपूर्ण जन्मदिन का आयोजन हुआ-उन दिनों वाल्ट डिस्ने के मिकी माऊस के जन्म जयन्ती की धूम थी तो कौस्तुभ के जन्म पर भी वही थीम था, वही रंग छाया हुआ था। कौस्तुभ के  घर का नाम मिकी रखा गया।  
अभी झांसी में एक और बड़ी जिम्मेदारी निभानी थी। .... जारी!

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

चोरी और सीनाजोरी एक साथ? सेवा संस्मरण -15

एक दिन मैंने एक दूरस्थ जलाशय जिसका नाम पहाड़ी है का निरीक्षण करना चाहा। वहाँ के विशाल पहाड़ी उपत्यकाओं से घिरे जलाशय के निरीक्षण के बाद उसी दिन लौटना सम्भव नहीं था।  इसलिए हमने रात वहीं रुकने को ठानी।  उस समय एक मेटाडोर थी जिससे हम  मैदानी भ्रमण करते थे।  मुझे बताया गया कि पिछले कई वर्षों से किसी ने वहाँ रात्रि निवास नहीं किया है।  और जगह  भी निरापद नहीं है। मुझे अब याद नहीं है कि  वहाँ सिचाई विभाग का डाक बंगला हुआ करता था या खुद मत्स्य विभाग का  आवास मगर रात वहीं रुकने का तय हुआ। रात रुकने का सुनकर मेरे साथ  चलने वाले एक दो कन्नी काट गए।  एक अपने ही जिले के टी एन तिवारी जी इंस्पेकटर थे, जो मेरी रिश्तेदारी भी जोड़ लिए लिए थे।  भारत में हर जाति का व्यक्ति चाहे तो आसानी से अपनी जाति के किसी दूसरे दूर -निकट के व्यक्ति से अपनी  कोई न कोई रिश्तेदारी ढूंढ और साबित कर सकता है!  

 अपने एक तेज तर्रार बाबू  को भी मैंने आदेश कर  अपने साथ कर लिया और अपने उच्च कार्यालय के एक खुर्राट बाबू जो मत्स्य भोजी भी थे साथ लटक लिए।  वे मछली खाने के मामले में सदा चिर प्रवंचित ही  अपने को व्यक्त करते थे यद्यपि कोई भी शायद ही ऐसा दिन होता हो जब उनका मत्स्याहार न होता हो। अब झांसी जलाशयों का समुद्र है तो उनकी अभिलाषा सहज ही पूरी होती रहती थी। मगर मछली की उनकी चिर  बुभुक्षिता  बनी ही रहती थी।  मैंने कहा बड़े बाबू आप को तो घर बैठे ही मछली मिल जाती है तो काहें इतनी दूर जाने का कष्ट उठा रहे हैं -"साहब, पहाड़ी की मछली कभी नहीं खायी।" उनके चेहरे पर उग आयी एक अजब बेचारगी पर मैंने उन्हें भी चलने की अनुमति दे दी।  वैसे वे बिना अनुमति के भी रुकने वाले नहीं थे। 

आखिर हमारा  कारवां औचक निरीक्षण के लिए चल पड़ा।  उन दिनों मोबाईल तो थे नहीं और फोन सेवायें भी सहज नहीं थी तो औचक निरीक्षण अपनी पूरी शुचिता और प्रभाव लिए ही होते थे। पहाड़ी सेंटर पर पहुँचने पर वहाँ अपेक्षानुसार हलचल मची।  प्रभारी नागेश पाण्डेय (वही महाशय जो लखनऊ के पिकनिक  स्पॉट घटना के पात्र थे ) प्रगटे।  विस्मित से।  साहब और उनके साथ चार  पांच लोगों की टोली देख उनका माथा ठनका।  मैंने कहा, "चलिए जलाशय के लैंडिंग सेंटर (जहाँ ठेकेदार द्वारा जलाशय की पकड़ी मछलियां लायी जाती हैं और तौल होती है ) आप यहाँ आफिस में क्या कर रहे हैं।  आपको तो वहीं लैंडिंग सेंटर पर होना चाहिए था अभी।" वे बहानेबाजी पर उतर आये। मैंने कहा चलिए अब मेरे साथ। अब वे मुझे समझाने लगे कि साहब आप वहाँ तक नहीं पहुँच सकते बहुत दुर्गम रास्ता है , पैदल जाना होगा।  गाड़ी नहीं जा सकती।  मैंने पूछा  कितनी दूर है तो ठीक से बता नहीं पाये।  मेरा ड्राइवर भी मछली की आस लगाये बैठा था।  कह पड़ा चलिए साहब मैं ले चलता हूँ बहुत पहले के साहब के साथ मैं आया था।   मुझे रास्ता पता है।  मुझमें नयी नौकरी का जोश और साथ मत्स्य प्रेमियों का दल तो फिर कारवां कहाँ रुकता ? हम  चल पड़े।  

अभी कालोनी से निकल कर हम थोड़ी दूर ही मुख्य सड़क पर आगे बढे थे कि सामने से एक ट्रैक्टर ट्राली के साथ  आता दिखा। पीछे बैठे मत्स्य भोजी बोल पड़े, "साहब साहब सामने के ट्रैक्टर से मछली की ढुलाई हो रही है। " जलाशय परिसर में मछली के परिवहन को अनुबंध के मुताबिक़ चेक  किया जाना चाहिए था।  सो मैंने ट्रैक्टर रुकवा दिया।  पूरी ट्राली में मछली भरी हुयी थी। मेरे सिपहसालारों ने उसे चारो ओर  से घेर लिया।  मैंने चालान माँगा। अब चालान काटने वाले पाण्डेय तो मेरे साथ ही बैठे थे।  बिना तौल और बिना चालान मछली का मुख्य मार्ग पर परिवहन अनुबंध का खुला उल्लंघन था।  अब मुझे जब्ती की कार्यवाही करनी थी।  फिर मछलियों का  नीलाम कर प्राप्त  पैसा सरकारी खजाने में जमा करने की जिम्मेदारी। एक बड़ा टास्क! मेरे डांटने के  बावजूद मेरे साथ के स्टाफ ने अपनी मछली का इंतजाम कर लिया।  और मुझसे अगली कार्यवाही के लिए उत्कंठित हो प्रतीक्षा करने लगे।  उनका लक्ष्य पूरा हो गया था।  मगर वे अब पूरी स्वामिभक्त के साथ अधिकारी के अगले आदेश के अनुपालन में मुस्तैद और तत्पर लगे यह मुझे अच्छा लगा।  अब मुश्किल यह थी कि मछली की तौल कहाँ हो? पहली बार मुझे पता लगा कि मुख्य मार्गों पर धर्मकांटे भी होते हैं।  

 संयोग से एक धर्मकांटा पास ही था।  इन धर्मकांटों पर पूरी ट्रक /ट्रैक्टर ही तौल उठती है।  एक बार माल के साथ और एक बार माल उतार कर तो माल की सही तौल हो जाती है।  इस तरीके से मछली की तौल हो गयी।  अब बी क्लास (डेढ़  किलो से कम वजन की मेजर कार्प मछलियां जिन्हे प्रजनन का पहला  मौका नहीं मिला हो )  की मछलियां अलग की गयीं क्योकि इन पर अलग से फाईन थी।  यहीं मैंने पहली बार बड़ी बड़ी छिलकों (स्केल्स) वाली महाशेर मछली देखी।  यह मूलतः ठन्डे -पहाड़ी क्षेत्रों की मछली है और आखटकों की पहली पसंद (स्पोर्ट फिश)  है मगर नर्मदा में अपवाद तौर पर इनकी कुछ प्रजातियां मिलती हैं. पहाड़ी मध्य पदेश की सीमा पर है और महाशेर नर्मदा से पहाड़ी जलाशय तक पहुँच आती हैं। 

 महाशेर के प्रथम दर्शन पर मैं अभिभूत था मगर मुझे बहुत देर तक उसके आकर्षण में नहीं  रहना था -एक बडा काम आगे था।  मैंने नागेश पांडे को बी क्लास का पूरा विवरण बनाने को कहा।  एक एक मछली का ब्यौरा क्योकि प्रति मछली उन दिनों पांच रुपये जुर्माना   था. और वजन का मूल्य अलग. ठेकदार के चेहरे पर  हवाईयां उड़ रही थी।  वह हतप्रभ था कि यह क्या अनहोनी हो रही है -ऐसा तो  कभी हुआ ही नहीं।  अब तक उसे लग गया था कि यह नौसिखिया अधिकारी मानेगा नहीं और उसका भट्ठा बैठाये बिना नहीं छोड़ेगा।  उसने मेरे साथ के स्टाफ से खुसर पुसर शुरू की।  थोड़ी देर  बाद तिवारी जी आये और अपनी रिश्तेदारी के  दमखम   पर मुझसे बोले साहब पांच हजार रुपये दे रहा है।  (उस समय पांच हजार एक अच्छी रकम थी ) मैंने तिवारी जी से पूरी दृढ़ता से कह दिया  कि आप लोगों का टारगेट तो पूरा हो गया अब मुझे अपना टारगेट पूरा करने दीजिये।  अब मैं उन्हें यह कैसे समझा सकता था कि इतने आगे आने के बाद पीछे नहीं लौटा जा सकता था. और मुझे तब और आज भी बदनामी से बहुत डर लगता है। 

बहरहाल ठीकेदार ने भी कुछ समय बाद समर्पण कर दिया था।  उसे नोटिस सर्व की गई। जुर्माने की रसीद काटी गयी।  मछली की  नीलामी हुयी। अब तक रात हो गयी थी। हमें कालोनी में ही रुकना पड़ा।  स्टाफ ने वहीं मछली बनायी खायी और जश्न किया। बची मछलियां बर्फ में सुरक्षित कर ली गयीं।   मैं सो गया।  सुबह आँखे खुली तो कुछ उत्तेजित सी मगर फुसफुसाहट सी आवाजे सुनायी दीं।  पता लगा कि रात  में कुछ गुंडे आये थे और स्टाफ से कुछ झगड़ा झंझट हुआ और गोलियों का फायर भी हुआ था।  गोलियों के निशान दीवालों पर दिख रहे थे।  मुझे कुछ पटाखों जैसी आवाजे सुनायी तो दी थीं मगर दीवाली बिल्कुल नजदीक थी तो मैंने उसे पटाखेबाजी ही समझी। समझ में आ गया कि यह मुझे और स्टाफ को डराने की जुगत थी कि कहीं मैं आज भी न  लैंडिंग सेंटर पर जाऊं।  मगर मैं गया।   रास्ता बहुत दुर्गम  था मगर मेरी वाहन लैंडिंग सेंटर तक पहुँच ही गयी।  मगर आज वहाँ कुछ नहीं था. होना भी नहीं था।  एक बेकायदा उद्धत अधिकारी से कौन निपटता।  आज सोचता हूँ तो आश्चर्य होता है कि मैं ऐसा कदम कैसे उठा पाया था। वो अंगरेजी की एक मशहूर कहावत है न कि मूर्ख वहाँ तक  चले जाते हैं जहाँ बुद्धिमान कम से कम दो बार सोच कर जाते हैं।  

विजयी  टीम दूसरे दिन रात तक वापस झांसी पहुँची और स्टाफ के परिवार भी मत्स्य भोज से आनंदित हुए।
मगर दूसरे दिन अल्ल सुबह बड़े साहब (डिप्टी डाईरेकटर ) का बुलावा आ पहुंचा।  मैं कुछ चिंतन मग्न उनके पास पहुंचा।  "यह क्या कर डाला आपने? उनकी तीखी आँखें भी मुझसे जवाब मांग रही थी।  आप समझते नहीं , इन लोगों की पहुँच कहाँ तक है " लम्बा डिस्कसन हुआ , मैंने पूरी दृढ़ता से आख़िरी जवाब दिया था कि "सर चोरी सीनाजोरी की तरह नहीं की जानी चाहिए , लबे सड़क चोरी का माल ले जाया जाना पूरे विभाग की बदनामी है " और इस बात पर वे निरुत्तर हो गए थे.

 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

झांसी में कबूतरों का आतंक और मछलियों का क्लोज सीजन - (सेवाकाल संस्मरण -14 )

झांसी में तनहा रहते हुए कुछ समय ही बीता था कि पत्नी को  साथ रखने का कर्त्तव्यबोध/इंस्टिंक्ट  तीव्र हो उठा। संयोग से एक इलाहाबादी मित्र के सम्पर्क सहयोग से सीपरी के पास आवास विकास कालोनी में तीन कमरे का आवास मिल गया  और मैंने  घर से पत्नी को लाकर अपनी दिनचर्या नियमित कर ली। मगर तब वहाँ चोरियां बहुत होती थीं और चोरों का डर हमेशा बना रहता।  पास में ही पहुंज जलाशय था जिसमें  मछली मारने का ठेका मत्स्य विभाग देता था।  लोग बताते कि वहाँ 'कबूतरों' का अड्डा है जो रात  बिरात कालोनी तक भी धावा बोल देते हैं .आये दिन अख़बारों में भी  छपता कि कबूतरे ये ले उड़े, वे ले उड़े। 

एक दिन सुबह सुबह पहुंज जलाशय का एक मछुआ भागता हुआ आया और हाँफते हाँफते बोला साहब कबूतरे जाल (मछली का जाल ) उड़ा  ले गए. मुझे सहसा तो माजरा ही समझ में  नहीं आया और वो चित्रमय कहानी याद आ गई जिसमें एक बहेलिये के पूरे जाल को कबूतर ले उड़े थे। मगर  बाद में बात समझ आयी कि झांसी में कबूतरे दरअसल लूट मार कर जीविका  चलाने वाले आदिवासी समूह हैं जिनका उस समय आतंक रहता था। पता नहीं अब भी वे हैं या नहीं। मगर उनका एक आभार है मुझ पर। 

 एक दिन मैंने  जिलाधिकारी महोदय से बड़े ही अनुरोधपूर्वक कबूतरों के करतूतों का हवाला देते हुए  अपने लिए सरकारी आवास ऐलाट करने की दुबारा गुहार लगायी। इस बार सुनवाई आखिर हो ही गई।  और मुझे आफिसर्स होस्टल एलाट हो गया -कक्ष संख्या अट्ठारह, द्वितीय तल जिसका मैंने नाम रखा था -"द सेलेस्टियल राण्डिवू (आकाशीय मिलन -स्थल ) . आफिसर्स होस्टल की लोकेशन बहुत अच्छी है। बगल में जिलाधिकारी आवास और सर्किट हाऊस यानि वी वी आइ पी लोकेलिटी। सरकारी आवासों की एक अच्छी बात है कि वहाँ सरकारी कर्मियों का एक 'मर्यादित' और निःशंक परिवेश मिलता है।  जबकि अन्यत्र रहने पर न  जाने कैसे कैसे लोगों की आवाजाही आस पास बनी रहती है। आप तब ईजिली अप्रोचेबल होते हैं. पत्नी भी अब काफी खुश थीं -उनका महिला साम्राज्य अब विकसित होने लगा था और अब वे  आवास विकास कालोनी के नीरस परिवेश से मुक्त हो गयी थीं।  पड़ोसनों का दैनिक 'बात व्योहार' आरम्भ हो गया था। एक दो की याद तो पत्नी को अभी भी है और मुझे भी ।
झांसी संस्मरणों के लिहाज से मेरे लिए आज भी बहुत समृद्ध है।  मगर दुविधा यही है कि क्या छोडूं क्या जिक्र करूं? और बहुत सम्भव है कि बहुत कुछ भूला भी हो जो महत्वपूर्ण हो और कम जरूरी बातें याद हों।  याद आता है कि तब कांग्रेस की सरकार सूूबे में थी और हमारी कैबिनेट मंत्री थीं श्रीमती बेनी बाई जी जो वहीं झांसी शहर की ही रहने वाली थीं।  मुझे कोई ऐसा वाकया याद नहीं पड़ता जिसमें उनके नगरागमन पर हमें कोई असहजता या समस्या झेलनी पडी हो।  वे प्रायः घर आतीं मगर उनका यह दौरा निजी ही होता था और सरकारी अमला जामा बस प्रोटोकाल में आते जाते  बस उन्हें नमस्कार करने की ही जहमत उठाता। यह नहीं कि अनावश्यक भीड़ भाड़ और उसे सम्भालने, खाने पीने की जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों की रहती ।  तब सरकारी सेवायें एक हद तक अनेक आडम्बर और अनुचित आग्रहों से मुक्त थीं -कम से कम मत्स्य विभाग तो उनके आने पर चैन की वंशी बजाता  रहता।  

हाँ एक बार मैं तलब किया गया था. बात यूं थी कि उत्तर प्रदेश मत्स्य अधिनियम 1948 में उन प्रजननकारी  मेजर कार्प मछलियों के शिकार पर माह जुलाई और अगस्त में प्रतिबन्ध था जो डेढ़ किलो से नीचे थीं और जिन्हे एक बार भी पहले प्रजनन का मौका न मिला हो।  यह मत्स्य संरक्षण के लिए एक जरूरी प्रावधान था और अपने अकादमीय रूचि के कारण मैं इस प्रावधान को कड़ाई से लागू करने के लिए सक्रियक की भूमिका में आ गया।  जबकि अनुभव ने  बार बार यह सिखाया है कि सरकारी नौकर को अपने दायरे का अनावश्यक अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।  मैंने ऐसी मछलियों की बाजार में भी बिक्री पर कड़ाई से प्रतिबन्ध लागू किया।  औचक छापे मारे।  जुर्माने लगाये और रसीदें दीं - पहली बार झांसी के मछली बाजार में हड़कम्प मच गया।  मेरे मंडलीय अधिकारी वीरेंद्र कुमार जी ने मेरी  अति सक्रियता पर थोडा लगाम लगाना चाहा -मगर तब तो नया जोश और कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। 

 मेरा अभियान चलता गया।  मेरे पास आकर्षक आफर आने लगे।  मत्स्य व्यवसायियों ने 'प्रिवी पर्स' का प्रस्ताव दिया।  कई बार मन भी डिगा।  मगर नैतिकता कचोटती -क्या इसी के लिए इतना आगे बढे थे।  मैंने दृढ हो सभी प्रलोभनों को ठुकराया। और तब थक हार कर मछुआ समुदाय के लोग माननीय मंत्री जी के पास फ़रियाद लिए जा पहुंचे और उन्हें मछली के मुसलमान व्यवसायियों ने भी सपोर्ट किया।  मेरी पेशी हुयी।  मैं  किंचित घबराते हुए मंत्री जी के पास गया  मगर उन्होंने बहुत ही सहज आत्मीय तरीके से कहा कि " ऐ डी एफ (असिस्टेंट डाइरेक्टर फिशरीज ) साहब, आप गरीबों को क्यों सता रहे हैं? उन बिचारे लोगों के पेट पर लात मत मारिये "  अब मैं उन्हें कैसे समझाता कि कि अगर इसी  तरह प्रजनन काल में मछलियों को मारा जाता रहा तो एक दिन इन मछुआ परिवार के वंशजों को नदियों में मछली ही नहीं मिलेगी  और उनका जीवन निर्वाह मुश्किल हो जाएगा -पर्यावरण की कोई भी क्षति आखिरकार मनुष्य को ही प्रभावित करती है।  मगर इतना तो विवेक मुझे था कि यह बात लोकतंत्र के चुने प्रतिनिधियों को न तब और न अब भी समझा पाना मुश्किल है।बहरहाल मैंने कोशिश तो की मगर शायद सफल नहीं हुआ और यह मामला डी एम  साहब के छोर पर जा पहुंचा।  और मेरी पेशी वहाँ भी हुई। 

अब तक नए डी एम  साहब पी उमाशंकर जी आ चुके थे तो आंध्र प्रदेश मूल के आइ ए  एस थे और उन्हें  वस्तुस्थिति से अवगत कराना मुझे आसान सा लगा।  मैं ऐक्ट की प्रति उनके सामने ले गया था और प्रावधानों को उन्हें दिखाया और तब उन्होंने जिले के पुलिस अधीक्षक को भी यह कह दिया कि प्रजननकारी मछलियों को पकड़ने बेंचने में अगर मत्स्य विभाग का कोई कर्मी मदद मांगता है तो पर्याप्त आवश्यक पुलिस बल भी दिया जाय। मेरा मनोबल बढ़ा। मेरी शिकायत तत्कालीन निदेशक वीरेंद्र कुमार जौहरी साहब के यहाँ भी हुयी और उन्होंने जिलाधिकारी से जांच की अपेक्षा की और जिलाधिकारी महोदय ने मुझे क्लीन चिट  दे दिया।  यह तब की बात थी जब ज्यादातर उच्च अधिकारी अपने मातहतों के मनोबल  को ऊँचा बनाये रखने का यत्न करते थे।  मुझे याद है इसी आपाधापी में अगस्त बीत गया। और प्रतिबंधित काल(क्लोज सीजन ) ख़त्म हो गया. मगर इस घटना की गूँज बनी रही और मैंने जिलाधिकारी का विश्वास जीतने में कामयाबी पायी 
जारी ...।

रविवार, 1 दिसंबर 2013

कोई अधिकारी ऐसा तो है जो मुझसे बहस करने की हिम्मत रखता है( सेवाकाल संस्मरण -13)

यादों के वातायन में वापस लौटता हूँ वर्ष 1988 में,झांसी। मैं इस मामले में शायद अतिरिक्त रूप से सजग था कि "झांसी गले की फांसी" है, मगर इस बारे में आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह  कहावत है क्यों?   जिस किसी से पूछता वह अपनी अलग व्याख्या देता।  कोई कहता कि बुंदेल खंड में ट्रांसफर होने के बाद पूरे सर्विस पीरियड में वहीं रह जाना पड़ता है।  मेरे सामने ऐसे मामले आये जिसमें 14 साल यानी एक पूरी  वनवास  अवधि कई स्टाफ वहीं गुजार चुके थे जबकि वे रहने वाले पूर्वांचल के थे।  पूर्वांचल का मैं भी था तो मुझे भी आशंका होती कि कहीं मैं भी वहीं का न होकर रह जाऊं।  मुझे वहाँ सहायक निदेशक का प्रभार मिला था जिसके आहरण और वितरण का दायित्व उप निदेशक मत्स्य को था -एक तरह से यह  अनुचित आदेश था क्योकि मैं खुद एक राजपत्रित अधिकारी था।  मगर मौलिक पद व्याख्याता का होने के कारण उच्च अधिकारी मुझे आहरण वितरण का दायित्व देने से कतराते थे जबकि वित्तीय नियमों के अधीन यह एक स्पष्ट व्यवस्था है कि आप जिस पद का काम करेगें आपको उस पद का वित्तीय अधिकार भी होना चाहिए। 

 उन दिनों और अब भी लगभग सभी जनपदों में वर्ल्ड बैंक के सहयोग से एक और योजना आरम्भ हुयी थी -मत्स्य पालक विकास अभिकरण जिसके अध्यक्ष जिलाधिकारी (अब जिला पंचायत अध्यक्ष ) होते थे और मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक सचिव होते हुए इस स्वयं शासी संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी ई ओ ) होते थे /हैं।  मुझे तब इस पद यानि सी ई ओ का पूरा वित्तीय अधिकार दिया गया था।  तब किसी भी संस्थान का सी ई ओ एक तोप  माना जाता था।  मैंने ठाठ से इस पदनाम से एक विजिटिंग कार्ड भी छपवा लिया था।  तब तो कई साध और शौक और भी थे  और साथ थी पूरी  अपरिपक्वता :-) ।  लोग बाग़ सुनते कि मैं कहीं का सी ई ओ हूँ तो ज्यादा तवज्जो देते और व्याख्याता कहने पर कोई ख़ास तवज्जो नहीं देते।  धन्य है हमारा परिवेश और समाज! 
हलाँकि तब मेरे मंडलीय अधिकारी /उप निदेशक मत्स्य वी कुमार साहब जो आगे चलकर निदेशक मत्स्य उत्तर प्रदेश हुए,  मीठी झिड़की देते हुए  कहते कि मुझे सहायक निदेशक मत्स्य ही लिखना और प्रगट करना चाहिए मगर  मेरा  जवाब रहता कि उस  पद का पूरा अधिकार ही मेरे पास कहाँ था।  वे कहते कि नहीं पूरे जनपद का प्रभार आपके पास ही है।  और मुझे इस द्वंद्व में नहीं रहना चाहिए अन्यथा मेरी कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।   मगर कहने से क्या होता था, मुझे असलियत तो पता ही थी।  मेरे बाबुओं ने आखिर एक दिन इस मामले में एक असहज स्थिति उत्पन्न कर ही  दी.  उन्होंने मुझे पता नहीं कैसे यह कन्विंस कर लिया कि सहायक निदेशक मत्स्य के रूप में मैं चतुर्थ श्रेणी यानि  मछुआ के पदों पर कार्यरत कर्मियों का ट्रांसफर कर सकता हूँ और मुझसे एक दो नहीं कोई आधा दर्जन मछुओं का ट्रांसफर करा दिया।  हड़कम्प मचना ही था सो मचा।  बाबूओ ने ट्रांसफर हुए स्टाफ पर अपनी खुन्नस मेरे जरिये निकाली थी।  आदेश के एक दो दिन बाद ही वी कुमार साहब ने मुझे तलब कर लिया।
आपने यह क्या कर डाला? मैंने दृढ़ता से उत्तर दिया 'सर, जनपदीय अधिकारी के अधिकार से मैंने वे ट्रांसफर किये हैं ,अब क्या जनपदीय अधिकारी को यह भी अधिकार नहीं है ? " वे कन्विंस नहीं थे ," यह अधिकार केवल उप निदेशक और उच्च अधिकारियों को है, सहायक निदेशक को नहीं " अब मैं असहज सा हुआ, "यानि कि सहायक निदेशक को जिस पर पूरे जनपद की जिम्मेदारी है को अपने चतुर्थ श्रेणी के कर्मियों को एक जगहं से दूसरी जगह पदस्थ करने का अधिकार नहीं है ? " "बिलकुल नहीं है और यह करके आपने अधिकार सीमा का ऊल्लंघन किया है और यह दंडनीय है " अब मुझे काटो तो खून नहीं और विस्मित सा अलग।  "चलिए मैं इसे अनदेखा करता हूँ मगर आईन्दा आप अपने अधिकारों के ऊपर जाकर काम नहीं करेगें और बाबुओं के प्रस्ताव पर सजगता से और विभागीय निर्देशों की पूरी जानकारी करके ही निर्णय लिया करिये।" मेरी नयी नौकरी पर यह उनका उदार निर्णय था।  वे अभी भी हैं हालांकि सेवा निवृत्त और कभी कभी फोन पर मेरी हाल चाल लेते रहते हैं।
उनसे कई बार बहस भी हो जाती थी क्योकि मत्स्य विभाग में सहायक निदेशक यानि जनपदीय अधिकारी को जिम्मेदारी तो बहुत दी गयी है मगर कोई भी प्रशासनिक अधिकार नहीं है -न तो किसी भी तरह दंड देने का और न ही ट्रांसफर करने का।  उस पर अपेक्षा यह की जाती है कि वह अपने अधीनस्थ पर यथेष्ट नियंत्रण रखे।  और यह व्यवस्था विगत तीस वर्षों में जस की तस है, जो प्रशासनिक समस्या मेरे सामने तीस वर्ष पहले थी वही आज भी है।  इन्ही मुद्दों को लेकर मेरी तत्कालीन उप निदेशक वी कुमार साहब से तल्ख़ बहसें भी हो जाती थीं मगर वे एक परिपक्व और बड़े विजन के अधिकारी थे और मुझे डांटने के बजाय दूसरों से मेरी बड़ाई ही करते और कहते ," कम से कम कोई अधिकारी ऐसा तो है जो मुझसे बहस करने की हिम्मत रखता है " और मैं जब यह सुनता तो लज्जित सा हो उठता।

उनके साथ मेरे संबंध उत्तरोत्तर अच्छे बनते गए थे और जब वे निदेशक बने तो भी उनका वही स्नेह मुझे मिलता। एक बार तो लखनऊ जाने पर मुझे अपनी राजकीय कार में बिठा कर हजरतगंज ले गए और जनपथ की तब एक निर्जन  सी  चाट के दुकान  पर मुझे गोलगप्पे खिलाये और खूब बतकही की -मैं तब बनारस  जनपद में सी ई ओ था मगर उनके हाव भाव में कहीं भी निदेशक होने का भाव नहीं था -एक गाइड एक अभिभावक के रूप में ही वे दिखे बल्कि  मित्रवत भी।  ऐसे अधिकारी अब कितने कम से कमतर होते गए हैं।
जारी ……

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