बुधवार, 18 दिसंबर 2013

चोरी और सीनाजोरी एक साथ? सेवा संस्मरण -15

एक दिन मैंने एक दूरस्थ जलाशय जिसका नाम पहाड़ी है का निरीक्षण करना चाहा। वहाँ के विशाल पहाड़ी उपत्यकाओं से घिरे जलाशय के निरीक्षण के बाद उसी दिन लौटना सम्भव नहीं था।  इसलिए हमने रात वहीं रुकने को ठानी।  उस समय एक मेटाडोर थी जिससे हम  मैदानी भ्रमण करते थे।  मुझे बताया गया कि पिछले कई वर्षों से किसी ने वहाँ रात्रि निवास नहीं किया है।  और जगह  भी निरापद नहीं है। मुझे अब याद नहीं है कि  वहाँ सिचाई विभाग का डाक बंगला हुआ करता था या खुद मत्स्य विभाग का  आवास मगर रात वहीं रुकने का तय हुआ। रात रुकने का सुनकर मेरे साथ  चलने वाले एक दो कन्नी काट गए।  एक अपने ही जिले के टी एन तिवारी जी इंस्पेकटर थे, जो मेरी रिश्तेदारी भी जोड़ लिए लिए थे।  भारत में हर जाति का व्यक्ति चाहे तो आसानी से अपनी जाति के किसी दूसरे दूर -निकट के व्यक्ति से अपनी  कोई न कोई रिश्तेदारी ढूंढ और साबित कर सकता है!  

 अपने एक तेज तर्रार बाबू  को भी मैंने आदेश कर  अपने साथ कर लिया और अपने उच्च कार्यालय के एक खुर्राट बाबू जो मत्स्य भोजी भी थे साथ लटक लिए।  वे मछली खाने के मामले में सदा चिर प्रवंचित ही  अपने को व्यक्त करते थे यद्यपि कोई भी शायद ही ऐसा दिन होता हो जब उनका मत्स्याहार न होता हो। अब झांसी जलाशयों का समुद्र है तो उनकी अभिलाषा सहज ही पूरी होती रहती थी। मगर मछली की उनकी चिर  बुभुक्षिता  बनी ही रहती थी।  मैंने कहा बड़े बाबू आप को तो घर बैठे ही मछली मिल जाती है तो काहें इतनी दूर जाने का कष्ट उठा रहे हैं -"साहब, पहाड़ी की मछली कभी नहीं खायी।" उनके चेहरे पर उग आयी एक अजब बेचारगी पर मैंने उन्हें भी चलने की अनुमति दे दी।  वैसे वे बिना अनुमति के भी रुकने वाले नहीं थे। 

आखिर हमारा  कारवां औचक निरीक्षण के लिए चल पड़ा।  उन दिनों मोबाईल तो थे नहीं और फोन सेवायें भी सहज नहीं थी तो औचक निरीक्षण अपनी पूरी शुचिता और प्रभाव लिए ही होते थे। पहाड़ी सेंटर पर पहुँचने पर वहाँ अपेक्षानुसार हलचल मची।  प्रभारी नागेश पाण्डेय (वही महाशय जो लखनऊ के पिकनिक  स्पॉट घटना के पात्र थे ) प्रगटे।  विस्मित से।  साहब और उनके साथ चार  पांच लोगों की टोली देख उनका माथा ठनका।  मैंने कहा, "चलिए जलाशय के लैंडिंग सेंटर (जहाँ ठेकेदार द्वारा जलाशय की पकड़ी मछलियां लायी जाती हैं और तौल होती है ) आप यहाँ आफिस में क्या कर रहे हैं।  आपको तो वहीं लैंडिंग सेंटर पर होना चाहिए था अभी।" वे बहानेबाजी पर उतर आये। मैंने कहा चलिए अब मेरे साथ। अब वे मुझे समझाने लगे कि साहब आप वहाँ तक नहीं पहुँच सकते बहुत दुर्गम रास्ता है , पैदल जाना होगा।  गाड़ी नहीं जा सकती।  मैंने पूछा  कितनी दूर है तो ठीक से बता नहीं पाये।  मेरा ड्राइवर भी मछली की आस लगाये बैठा था।  कह पड़ा चलिए साहब मैं ले चलता हूँ बहुत पहले के साहब के साथ मैं आया था।   मुझे रास्ता पता है।  मुझमें नयी नौकरी का जोश और साथ मत्स्य प्रेमियों का दल तो फिर कारवां कहाँ रुकता ? हम  चल पड़े।  

अभी कालोनी से निकल कर हम थोड़ी दूर ही मुख्य सड़क पर आगे बढे थे कि सामने से एक ट्रैक्टर ट्राली के साथ  आता दिखा। पीछे बैठे मत्स्य भोजी बोल पड़े, "साहब साहब सामने के ट्रैक्टर से मछली की ढुलाई हो रही है। " जलाशय परिसर में मछली के परिवहन को अनुबंध के मुताबिक़ चेक  किया जाना चाहिए था।  सो मैंने ट्रैक्टर रुकवा दिया।  पूरी ट्राली में मछली भरी हुयी थी। मेरे सिपहसालारों ने उसे चारो ओर  से घेर लिया।  मैंने चालान माँगा। अब चालान काटने वाले पाण्डेय तो मेरे साथ ही बैठे थे।  बिना तौल और बिना चालान मछली का मुख्य मार्ग पर परिवहन अनुबंध का खुला उल्लंघन था।  अब मुझे जब्ती की कार्यवाही करनी थी।  फिर मछलियों का  नीलाम कर प्राप्त  पैसा सरकारी खजाने में जमा करने की जिम्मेदारी। एक बड़ा टास्क! मेरे डांटने के  बावजूद मेरे साथ के स्टाफ ने अपनी मछली का इंतजाम कर लिया।  और मुझसे अगली कार्यवाही के लिए उत्कंठित हो प्रतीक्षा करने लगे।  उनका लक्ष्य पूरा हो गया था।  मगर वे अब पूरी स्वामिभक्त के साथ अधिकारी के अगले आदेश के अनुपालन में मुस्तैद और तत्पर लगे यह मुझे अच्छा लगा।  अब मुश्किल यह थी कि मछली की तौल कहाँ हो? पहली बार मुझे पता लगा कि मुख्य मार्गों पर धर्मकांटे भी होते हैं।  

 संयोग से एक धर्मकांटा पास ही था।  इन धर्मकांटों पर पूरी ट्रक /ट्रैक्टर ही तौल उठती है।  एक बार माल के साथ और एक बार माल उतार कर तो माल की सही तौल हो जाती है।  इस तरीके से मछली की तौल हो गयी।  अब बी क्लास (डेढ़  किलो से कम वजन की मेजर कार्प मछलियां जिन्हे प्रजनन का पहला  मौका नहीं मिला हो )  की मछलियां अलग की गयीं क्योकि इन पर अलग से फाईन थी।  यहीं मैंने पहली बार बड़ी बड़ी छिलकों (स्केल्स) वाली महाशेर मछली देखी।  यह मूलतः ठन्डे -पहाड़ी क्षेत्रों की मछली है और आखटकों की पहली पसंद (स्पोर्ट फिश)  है मगर नर्मदा में अपवाद तौर पर इनकी कुछ प्रजातियां मिलती हैं. पहाड़ी मध्य पदेश की सीमा पर है और महाशेर नर्मदा से पहाड़ी जलाशय तक पहुँच आती हैं। 

 महाशेर के प्रथम दर्शन पर मैं अभिभूत था मगर मुझे बहुत देर तक उसके आकर्षण में नहीं  रहना था -एक बडा काम आगे था।  मैंने नागेश पांडे को बी क्लास का पूरा विवरण बनाने को कहा।  एक एक मछली का ब्यौरा क्योकि प्रति मछली उन दिनों पांच रुपये जुर्माना   था. और वजन का मूल्य अलग. ठेकदार के चेहरे पर  हवाईयां उड़ रही थी।  वह हतप्रभ था कि यह क्या अनहोनी हो रही है -ऐसा तो  कभी हुआ ही नहीं।  अब तक उसे लग गया था कि यह नौसिखिया अधिकारी मानेगा नहीं और उसका भट्ठा बैठाये बिना नहीं छोड़ेगा।  उसने मेरे साथ के स्टाफ से खुसर पुसर शुरू की।  थोड़ी देर  बाद तिवारी जी आये और अपनी रिश्तेदारी के  दमखम   पर मुझसे बोले साहब पांच हजार रुपये दे रहा है।  (उस समय पांच हजार एक अच्छी रकम थी ) मैंने तिवारी जी से पूरी दृढ़ता से कह दिया  कि आप लोगों का टारगेट तो पूरा हो गया अब मुझे अपना टारगेट पूरा करने दीजिये।  अब मैं उन्हें यह कैसे समझा सकता था कि इतने आगे आने के बाद पीछे नहीं लौटा जा सकता था. और मुझे तब और आज भी बदनामी से बहुत डर लगता है। 

बहरहाल ठीकेदार ने भी कुछ समय बाद समर्पण कर दिया था।  उसे नोटिस सर्व की गई। जुर्माने की रसीद काटी गयी।  मछली की  नीलामी हुयी। अब तक रात हो गयी थी। हमें कालोनी में ही रुकना पड़ा।  स्टाफ ने वहीं मछली बनायी खायी और जश्न किया। बची मछलियां बर्फ में सुरक्षित कर ली गयीं।   मैं सो गया।  सुबह आँखे खुली तो कुछ उत्तेजित सी मगर फुसफुसाहट सी आवाजे सुनायी दीं।  पता लगा कि रात  में कुछ गुंडे आये थे और स्टाफ से कुछ झगड़ा झंझट हुआ और गोलियों का फायर भी हुआ था।  गोलियों के निशान दीवालों पर दिख रहे थे।  मुझे कुछ पटाखों जैसी आवाजे सुनायी तो दी थीं मगर दीवाली बिल्कुल नजदीक थी तो मैंने उसे पटाखेबाजी ही समझी। समझ में आ गया कि यह मुझे और स्टाफ को डराने की जुगत थी कि कहीं मैं आज भी न  लैंडिंग सेंटर पर जाऊं।  मगर मैं गया।   रास्ता बहुत दुर्गम  था मगर मेरी वाहन लैंडिंग सेंटर तक पहुँच ही गयी।  मगर आज वहाँ कुछ नहीं था. होना भी नहीं था।  एक बेकायदा उद्धत अधिकारी से कौन निपटता।  आज सोचता हूँ तो आश्चर्य होता है कि मैं ऐसा कदम कैसे उठा पाया था। वो अंगरेजी की एक मशहूर कहावत है न कि मूर्ख वहाँ तक  चले जाते हैं जहाँ बुद्धिमान कम से कम दो बार सोच कर जाते हैं।  

विजयी  टीम दूसरे दिन रात तक वापस झांसी पहुँची और स्टाफ के परिवार भी मत्स्य भोज से आनंदित हुए।
मगर दूसरे दिन अल्ल सुबह बड़े साहब (डिप्टी डाईरेकटर ) का बुलावा आ पहुंचा।  मैं कुछ चिंतन मग्न उनके पास पहुंचा।  "यह क्या कर डाला आपने? उनकी तीखी आँखें भी मुझसे जवाब मांग रही थी।  आप समझते नहीं , इन लोगों की पहुँच कहाँ तक है " लम्बा डिस्कसन हुआ , मैंने पूरी दृढ़ता से आख़िरी जवाब दिया था कि "सर चोरी सीनाजोरी की तरह नहीं की जानी चाहिए , लबे सड़क चोरी का माल ले जाया जाना पूरे विभाग की बदनामी है " और इस बात पर वे निरुत्तर हो गए थे.

 

16 टिप्‍पणियां:

  1. chori sinajori se hi hoti hai apne yahaan :)

    aapki posts kee hindi pichhli post se (chaaploosi vaali) badi klisht lag rahi hai :(

    :)

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  2. गहन अनुभव से अवगत हुए, अच्छा लगा। अगर इसी ईमानदारी से हरेक विभाग काम करे और ऊपर से सहयोग ना मिले तो हमारा भारत देश पता नहीं कितनी प्रगति कर लेगा ।

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  3. शानदार संस्मरण चल रहे हैं सर. बस यह कहूँगा कि नौकरी के साथ आस पास के जीवन का जिक्र थोड़ा और विस्तार से हो जाय तो कमाल हो जाय. हम लोग भी एक गुज वक़्त देख लेंगे.

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  4. नयी जानकारी है हमारे लिए तो मगर विभाग के कर्मचारियों के मिलाभगत बिना यह संभव था क्या ?

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  5. भारत में हर जाति का व्यक्ति चाहे तो आसानी से अपनी जाति के किसी दूसरे दूर -निकट के व्यक्ति से अपनी कोई न कोई रिश्तेदारी ढूंढ और साबित कर सकता है!

    अजी संस्मरण में किसी सस्पेंस फ़िल्म से ज्यादा मज़ा आ गया। इंडियन राशनल सोसायटी सा विश्लेषण क्या बात है। सुबह फाइरिंग और बाद फाइरिंग मंसूबे बुलंद।

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  6. यह तो भूतकाल था , वर्तमान इससे कई-कई-कई-कई गुना खराब है । लूट मची है....

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  7. यह पड़ा तीर मछली की आँख पर, वह भी ढोयी जाती के।

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  8. सीख देता संस्मरण .... बहुत कुछ टारगेट पर टिका होता है ....

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  9. सरकारी सेवा के शुरुआती दिनों में ईमानदारी और ऊर्जा बरकरार रहती है , आगे भी बनी रहे तो और बढ़िया !
    संस्मरण पढ़कर अच्छा लगा।

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  10. कितना कुछ है जो दूसरे विषय वाले को पता नहीं होता ... आपने कार्यालय और कामकाज के साथ अच्छा संस्मरण चल रहा है ...

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  11. अब तक जो सुना था कि सीनाजोरी ऐसे होता है ..अब यकीन हो रहा है ..

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  12. वो तो पुराना समय था लेकिन आज के समय में आम आदमी पार्टी का असर डायरेक्टर साहब को कुछ जरूर होता.

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  13. सचमुच बहुत ही ख़तरनाक संसमरण था पण्डित जी!! बहुत कुछ सिनेमा में किसी ईमानदार सरकारी अफसर के साथ होने वाली घटना जैसा. किंतु इस तरह के औचक निरीक्षण में पुलिस बल का प्रावधान नहीं रहता क्या, सम्भावित विरोध आदि को देखते हुये? वैसे दोष किसे दें जब अपने विभाग के लोग ही लिप्त हों.
    आपकी अंग्रेज़ी कहावत से एक हिन्दी कहावत याद आ गई - कुल्हाड़ी में लकड़ी का दस्ता न होता, तो लकड़ी के कटने का रस्ता न होता!!

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  14. रोचक संस्मरण एक कहानी की तरह अंत लिए है.

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  15. आज तो सीनाजोरी भी करते हैं और चोरी भी नहीं मानते...

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