शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

ब्लॉगर बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है!


 ब्लागर बोलता नहीं लिखता है,बोलता तो प्रखर मुखर वक्ता होता, वाचस्पति होता .मगर मंच और पंच  का आदेश है तो यह ब्लॉगर  सूत्रवत कुछ कहेगा ही.ब्लागिंग यानी चिट्ठाकारी को वैकल्पिक मीडिया ,नयी मीडिया और अब तो सोशल मीडिया के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जा रहा है .इसकी ख़ूबसूरती है इसका त्वरित और तत्क्षण दुतरफा संवाद और  खतरा भी यहीं मंडरा रहा है . संवाद विनिमय का इतना सहज स्वरुप है जैसे दो जन या बहुजन आमने सामने बतिया रहे हों -भौगोलिक दूरियों को धता बताते हुए . यह अभिव्यक्ति के अधिकार का लोकतांत्रिकीकरण है -कहने का अधिकार अब किसी सामर्थ्यवान या मीडियाहाउसेज  तक ही सीमित नहीं रह गया है -अब जबरा मारे रोये भी न दे वाला युग बीतने के कगार पर है ..अब दबे कुचले शोषित को भी खुद अपनी आवाज बुलंद करने की तकनीक वजूद में है ...

सोशल मीडिया की अनेक नेटवर्किंग साईट या फिर ब्लॉग  अपने कंटेंट/ फीड की  नेट वर्किंग के चलते एक प्रमुख सोशल मीडियम बन कर उभरा है . यहाँ कोई ख़ास प्रतिबन्ध नहीं है या बिल्कुल भी प्रतिबन्ध नहीं है .किन्तु यही खतरे की सुगबुगाहट है .....इसके दुरूपयोग की संभावनाएं हैं -साईबर आतंकवाद की भयावनी संभावनाएं हैं .जिसकी एक बानगी अभी हम बड़ी संख्या में शहरों से लोगों के असम पलायन के रूप में देख चुके हैं -एक दहशतनाक मंजर का हाल ना दैन्यं न पलायनम पर बयां हुआ है .....ऐसी अफवाहें  और भी संगठित रूप से किसी भी मसले को लेकर फिर फैलाई जा सकती है -सारे देश में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है -यह साईबर आतंकवाद की एक छोटी सी मिसाल है ,झलक है .हमें सावधान रहना है . 

तकनीक के दुरूपयोग को भयावह दानव का मिथकीय रूप दिया जा सकता है ...इस अर्थ में तकनीक को हमेशा चेरी की ही भूमिका में रहने को नियमित करना होगा ,कभी भी स्वामिनी न बने वह ..(जेंडर सहिष्णु लोग इसे स्वामी या दास शब्द के रूप में कृपया गृहीत कर लें) ..और अब तो स्मार्ट प्रौद्योगिकी वाली इंटेलिजेंट मशीनें  भी आ धमकने वाली हैं  जिसके पास खुद अपने सोचने समझने की क्षमता होगी -आगे चल कर इनमें संवेदना भी आ टपकेगी ...तब तो इन पर नियंत्रण और भी मुश्किल होगा -दूरदर्शी विज्ञान कथाकारों ने ऐसी भयावहता को पहले ही भांप लिया था ...

इसाक आजिमोव ने इसलिए ही बुद्धिमान मशीनों पर  लगाम कसने का जुगत लगाया था अपने      
थ्री ला आफ रोबोटिक्स के जरिये -जिसका लुब्बे लुआब यह कि कोई मशीन मानवता को नुकसान नहीं पहुंचा सकती ..मनुष्य के आदेश का उल्लंघन भी कर सकती है अगर मानवता का नुकसान होता है तो ....वैज्ञानिक ऐसी युक्तियों पर काम कर रहे हैं जिससे मशीनें बुद्धिमान तो बनें मगर मनुष्यता की दुश्मन न बने ....ऐसे नियंत्रण जरुरी हैं  खासकर आनेवाली बुद्धिमान मशीनों के लिए .मगर आज भी जो मशीनें हैं ,अंतर्जाल प्रौद्योगिकी की कई प्राविधि -सुविधाएं हैं उन पर भी एक विवेकपूर्ण नियंत्रण तो होना ही चाहिए -मगर यह हम पर ही निर्भर हैं -हम इसका सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग!

आज ब्लॉग अपने शुरुआती स्वरुप यानी निजी अभिव्यक्ति से  ऊपर आ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ रहे हैं .आज कितने ही सामुदायिक ब्लॉग हैं और विषयाधारित ब्लॉग हैं -साहित्य ,संगीत ,निबंध, कविता ,इतिहास ,विज्ञान, तकनीक आदि आदि के रूप में ब्लागों का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य निखार पा रहा है .....मानवीय अभिव्यक्ति उद्दाम उदात्त हो उठी है ....मानव सर्जना विविधता में मुखरित हो उठी है ... मगर एक बात मैं ख़ास तौर जोर देकर कहना चाहता हूँ -ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम भर नहीं रह गए हैं अब  यह अभिव्यक्ति के  एक खूबसूरत और सशक्त विधा के रूप में भी पहचाने  जाने की दरख्वास्त भी करते हैं.

 विधाओं के अपने पहचान के लक्षण होते हैं -जैसे कहानी का अंत अप्रत्याशित हो ,ख़बरों का शीर्षक अपनी और खींचता हो ,प्रेम कथाओं में प्रेम पसरा पड़ा हो ....सस्पेंस कथाओं में द्वैध भाव हो ,कहानी(शार्ट स्टोरी )  एक बैठक में खत्म होने जैसी हो ....आदि आदि ..तो ऐसे ही ब्लॉग लेखन की विशेषताओं की भी पहचान और इन्गिति होनी चाहिए --क्या हो ब्लॉग विधा के पहचान के लक्षण ? ?  -हम इस पर चर्चा कर सकते हैं -जैसे ब्लॉग पोस्ट ज्यादा  लम्बी न हों ,ब्रेविटी इज द सोल आफ विट ....गागर में सागर भरने की विधा हो ब्लॉग ...कुछ लोग लम्बी लम्बी कवितायें ,निबंध ब्लागों पर डाल रहे हैं -कितने लोग पढ़ते हैं? -इसलिए कितने ही नामधारी साहित्यकार यहाँ असफल हो रहे हैं क्योकि उनकी पुरानी हथौटी लम्बे लेखों विमर्शों की है ....एक बार शुरू करेगें तो कथ्य का समापन और क़यामत  एक ही समय आये ऐसा  जज्बा होता है उनका :-) माईक पकड़ेगें तो छोड़ेगें नहीं ..

ब्लॉग लेखन ऐसी ही  कुशलता मांग करता है कि कम शब्दों में अपनी बात सामने रखें ....और यह अभ्यास से सम्भव है ..अनावश्यक विस्तार की गुंजाईश इस विधा में नहीं है .... लेखक की लेखकीय कुशलता का लिटमस टेस्ट है ब्लॉग विधा में लेखन ...ट्विटर तो १४० कैरेक्टर सीमा में ही अपनी बात कहने की इजाजत देता है ......किसी ने कहा था यहाँ तो मीडिया और मेसेज का भेद ही मिट गया है ..यहाँ मीडिया ही मेसेज है ...

ब्लॉग एक ही पोस्ट में लम्बे चौड़े अफ़साने सुनाने का माध्यम /विधा नहीं है ....हाँ जरुरी लगे तो श्रृंखलाबद्ध कर दीजिये पोस्ट को  ...मुश्किल यही है ब्लागिंग के  तकनीक के  सिद्धहस्त जिनकी संख्या बहुत अधिक है  यहाँ ,इसे बस माध्यम समझ बैठने की भूल कर बैठे हैं ....जबकि यह एक विधा के रूप में अपार पोटेंशियल लिए है हम इसकी अनदेखी कर रहे हैं .....आज ब्लागों के विधागत स्वरुप को निखारने का वक्त आ गया है ......हाऊ टू मेक अ ब्लॉग से कम जरुरी नहीं है यह जानना कि हाऊ टू राईट अ  ब्लॉग? ....

आपने मुझे बोलने का अवसर दिया इसलिए बहुत आभार! इस दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन और परिकल्पना सम्मान के आयोजकों को बहुत बधाई और आभार कि उन्होंने ब्लागिंग के इस उत्सव का सिलसिला बनाए रखा है . 
(अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन ,लखनऊ ,२७ अगस्त में विषय प्रवर्तन) 

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

सम्मान को लेकर छिड़ी जंग


अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन और परिकल्पना सम्मानों को लेकर छिड़ी जंग रोचक हो चली है, जिसके अधिष्ठाता अपने अनूप शुक्ल फ़ुरसतिया जी हैं .उनके अनुसार एक बहुत बड़ा कलयुगी अन्याय घट चुका है ....और कई तरह के पापों जैसे गो हत्या द्विज हत्या सरीखे  दोख परिकल्पना सम्मान के आयोजकों पर लग चुके हैं ....अब चूंकि उस सम्मान में मैं शरीक ही नहीं हुआ बल्कि मंचासीन भी हुआ तो मुझे भी पाप का स्पर्श हो गया सा लगता है जिसके निवारण हेतु यह पोस्ट लिख रहा हूँ -आदि और आद्यांत शक्तियां हमारा कल्याण करें ....और यह पोस्ट पूरी करने में मदद करें ....
किसी भी विधा -उपविधा के तनिक भी पुष्पित -पल्लवित होते ही उनसे जुड़े उत्सव रूपायित होने लगते हैं ....श्रेय कोई ले ले ...मगर यह एक ऐसा ऐतिहासिक /बाजारू दबाव है जो चरितार्थ हो ही जाता है ....रवीन्द्र प्रभात न होते तो कोई और होता और नाम परिकल्पना के बजाय संकल्पना होता ....ऐसे जुटावडे एक विधा से जुड़े समानधर्मा लोगों के मिलने जुलने ,बतकही ,हंगामे  -मौज मस्ती के रूप में तब्दील होते आये हैं -इन्ही के पार्श्व में कई सुकोमल भावनाएं भी आलोड़ित हो लेती  हैं और कुछ जरुरी गैर जरुरी प्रेम कथायें भी जन्म ले लेती हैं दुर्गा पूजा पंडालों ,डानडिया  की ही तर्ज पर   .....और अब तो ऐसे आयोजनों में खूब पुरस्कार सम्मान भी बाटे जाते हैं -जो अपनों के लिए अपनों के द्वारा अपनों के जरिये दिए लिए जाते हैं और यह एक वैश्विक कल्चर बन चुका है -अच्छा या बुरा यह अलग बात है और अगर आप इस वैश्विक ट्रेंड से परिचित हैं तो  मेरी तरह एक विज्ञ उलूक सा मुस्करा कर रह जाते हैं मगर  व्यंग विधा के पुरोधा उसी पर जंग छेड़ देते हैं .....यह हिन्दी ब्लॉग दुनियां में  व्यापक दृष्टि ,सहिष्णुता  और जानकारी के अभाव की भी पोल खोलता है ....अब परिकल्पना सम्मान की सूची पर आप नज़र डालें तो यह आपको भान हो जाएगा कि ये सारे सम्मानित  लोग तो ब्लॉगर ही हैं अपनी बिरादरी के ही हैं ..फिर इतना क्षोभ ,इतनी पीड़ा आखिर क्यों ? इससे तो यही लगता है कि खुद का निगलेक्ट होना ही लोगों को कचोट रहा है ..
इन सम्मानों की अंतर्कथा का एक रोचक पहलू यह भी है कि जब तक नहीं मिला रहता लोग उसकी आलोचना करते रहते हैं ..जब एक दिन उन्हें खुद मिल जाता है तो चुपके से कांख में (धर्मग्रन्थ की)  पोथी की तरह दबाये पतली गली से चल देते हैं ....सारी स्वकीया आलोचनाओं को क्षण भर में विस्मृत कर ..... :-) आलोचनायें तभी तक बुलंद रहती हैं जब तक एक दिन हमें  खुद ही वही सम्मान नहीं मिल जाता  :-) ..मगर कुछ और सत्याग्रही किस्म के लोग भी होते हैं जो पहले तो सम्मान मिलने की लाबीयिंग करायेगें और जब मिल जाएगा तो बहुत बड़ा सार्त्र सरीखा व्यक्तित्व बन उसे ठुकरा देगें ......
चमचमाता परिकल्पना सम्मान मेडल -किसी ने कहा हिन्दी ब्लागिंग का आस्कर 
मैं हमेशा से युवाओं को पुरस्कार/सम्मान  देने के पक्ष में रहता हूँ -मेडल की चमक से  वे उत्साहित होकर कुछ कर जाते हैं ....थकी चुकी प्रतिभाओं को पुरस्कार देना किसी भी लिहाज से न तो सम्बन्धित विधा या समाज के लिए लाभकर होता है -जो वास्तव में ऐसे सम्मान डिजर्व करते हैं उनके लिए तो ये सचमुच बेकार ही होते हैं क्योकि वे पुरस्कार के मुन्तज़िर नहीं होते -ऐसे कई अपने क्षेत्रों के पुरोधा लोगों ने सम्मान और खासकर सरकारी सम्मान तक को वापस कर दिया है ....नोबेल तक वापस हो गए ...नोबेल सम्मान जो १९०१ से शुरू हुए और एक चमकते मेडल के अलावा काफी बड़ी राशि देने को प्रतिबद्ध होते हैं  किसी के द्वारा इन्कारा भी जा सकता है ,हैरत की बात है . और यहाँ एक छोटे से सम्मान को लेकर हाय तोबा मची हुयी है . मगर सच पूछिए तो सम्मान कोई भी छोटा नहीं होता वह लोगों के किंचित (संचित नहीं )  सत्कर्मों की एक अनुशंसा भर ही होते हैं एक टोकेन मात्र  .बच्चे तो मेडल पाकर एक ऊर्जा और संकल्प से भर जाते हैं ...सम्मानों की फेहरिस्त में लोगों की कल्पनाओं में बस जाने वाला बहु-समानित आस्कर आवार्ड है जो १९२७ से अकैडमी आफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड सायिन्सेज के द्वारा दिया जाता रहा है .और फिर उसके बाद तो ग्रैमीज  आदि हैं जो हर वर्ष जलसों में दिए लिए जाते हैं ,विवादित भी होते हैं मगर जो विवाद करते हैं वे भी एक दिन इसे हथिया कर चुप्पी साध  लेते हैं ..और फिर सहसा ही अमुक अवार्ड उनके लिए बहुत प्रतिष्ठित हो जाता है .
अब आईये परिकल्पना सम्मान पर -जो सम्मान ब्लागिंग के पुरोधा सर्वश्री रवि रतलामी जी ,समीर लाल और बी एस पाबला थाम चुके हों वह  अब ऐसे ही हंसी ठट्ठे का विषय नहीं बनाया जा सकता ..अब ज्ञानदत्त पाण्डेय जी भी न सुन रहे हों तो कृपया सादर सुन लें .....क्योकि कहीं उन्होंने यह कहा कि अरे फिर कोई सम्मान समारोह हो गया? अब तो परिकल्पना सम्मान खुद ही समादृत हो गया है ....और रवीन्द्र प्रभात जी की गले की हड्डी बन गया है ...रुष्ट तुष्ट दोनों तरह के लोग अब उनकी जान के दुश्मन बने रहगें --वे  आगे संसाधन कैसे जुटायेगें,इतना बड़ा ताम झाम कैसे सर अंजाम देगें मेरी  संवेदना इसे लेकर है ---हाँ अगली बार एक परिकल्पना सम्मान का जुगाड़ तो विरोधियों ने कर ही लिया है .....अब यह न कह देना कि हम थूकते हैं ऐसे सम्मान पर ....चुप हो बैठिये ..जन स्मृतियाँ बहुत ही अल्पकालिक होती हैं अगले साल किसे याद रहेगा कि आपने विरोध का झंडा बुलंद किया था -हम चुपके से आपको पकड़ा देगें ..और आप दाब कर निकल आयियेगा और घर दुआर के अखबार में धांस के छपवाके पुजवायियेगा :-) है न शुकुल जी :-) 

बुधवार, 29 अगस्त 2012

अन्तराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन और परिकल्पना सम्मान: आँखों देखी!

मुझे पता था कि एक ब्लॉग मंडली (खल मंडली नहीं कह रहा इसलिए यह  मन में भी न लाईयेगा )   एक दिन पहले ही लखनऊ  पहुँच रही है और मुझसे भी अपेक्षा थी कि मैं पहले ही पहुँच जाऊं मगर कोई मोटिवेशन ही न था सो सबेरे वाली गाडी (बनारस) से पकड़ी और लखनऊ पौने दस बजे पहुँच गया ...मैं टुकड़ों टुकड़ों फेसबुक पर कुछ अपडेट डालता जा रहा था .और दूसरों के पढता जा रहा था ..चेला चीनी  संतोष त्रिवेदी  (गुरु गुड रह गए चेला चीनी हो गए ) भी फेसबुक पर कुछ लिख पढ़ रहे थे ...मैंने रास्ते में ही नोटबुक पर कुछ लिख पढ़ लिया था कि कहीं कुछ बोलना ही न पड़ जाय ..अब मुझ जैसा वरिष्ठ गरिष्ठ ब्लॉगर यह कह कर कैसे छूट सकता है कि अगर बोलवाना था तो पहले बताना  था न....और मेरी आशंका भी सच निकली ...कोई आदरणीय अतिथि नहीं आये तो मुझे भी  अचानक  ऐन वक्त उदघाटन सत्र के विशिष्ट डायस पर स्थानापन्न तौर पर बुला लिया गया और मैंने कुछ औपचारिक ना  नुकर करके यह सुअवसर हाथ से जाने न दिया ....हालांकि मंच पहले से ही सुशोभित था और शिखा वार्ष्णेय जी की उपस्थिति उसे एक अंतर्राष्ट्रीय गरिमा भी प्रदान कर रही थी ..वे जितना सुन्दर फोटुओं में लगती हैं वास्तविक रूप में उससे अधिक सुन्दर और सौम्य हैं ....और उनके बगल में बैठना भी मेरे लिए कोई कम  सौभाग्य नहीं था  ..हालांकि मैं हिचकिचा रहा था और मंच तक पहुंचते ही जैसे ही एक आख़िरी कुर्सी पर पसरा  था कि संचालक दिल्लीवासी ब्लॉगर डॉ .हरीश अरोड़ा ने घुड़क दिया कि संचालक की सीट रिक्त रखी जाय (अब संचालक को बैठने को का काम?) ..

बाएं से सुभाष राय ,शिखा वार्ष्णेय ,मैं सत्राध्यक्ष शैलेन्द्र सागर ,मुख्य अतिथि उद्भ्रांत जी 
बहरहाल बेआबरू होकर कुर्सी छोड़ा तो उससे बेहतर जगहं मिल गयी -शिखा जी के बगल और बिलकुल डायस-मध्य की जगहं ..हालांकि शिखा जी ने तनिक भी लिफ्ट  नहीं दी और अपनी तटस्थ गरिमामयी उपस्थिति बनाए रखने में सफल होती रहीं... यह कुछ वैसा ही है जैसा कि प्लेन के सफ़र में बगल के यात्री भी अक्सर  पूरी यात्रा तक कुछ नहीं बोलते -यह एक वह परिप्रेक्ष्य है जो  हाई सोशल आर्डर के निरंतर इम्पेर्सोनल होते जाने की कहानी कहता है ...मैंने अपनी एक विज्ञान कथा मोहभंग में इस पूरे भाव चित्र को काफी पहले ही शब्द दिए हैं ....आज मंच के  डिग्नैटेरीज भी इसी संस्कृति का निर्वहन करने लगे हैं ....और अपनी धीर गंभीर उपस्थिति बनाए रखने को विवश होकर रह गए हैं ..दूसरी ओर अपने संतोष त्रिवेदी जैसी जीवंत शख्सियत है जिनकी  निजी स्पेस में बार बार घुसपैठ  असहज सी तो करती है मगर यह भी याद दिलाती रहती है हम अभी मशीन नहीं हुए, हाड़ मांस के ही प्राणी हैं -और मुझे मंच पर जाने का मौका मिलते ही यह भी लगा कि चलो कुछ देर तो चेले चीनी के नोच खरोंच  से पीछा छूटा..मगर उनकी यह लागी ऐसी है कि छूटती नहीं अपने नौके कैमरे के साथ मंच पर भी आ पहुंचे और हे भगवान कैसी कैसी तस्वीरें खिंचवाई हैं तूने उनसे, यह तो बाद में पता चलेगा ....उनका कैमरा और वे खुद पूरे हाल और मंच तक चक्कर घिन्नी की तरह घूमते रहे और कोई आश्चर्य नहीं कि महराज के कैमरे से कुछ चित्र ब्लैकमेलिंग वालों की चान्दी न  बन जायं -खबरदार चेले राम ऐसी कोई हिमाकत करोगे तो ठीक नहीं होगा ....
सचमुच यह एक सम्मान समारोह ही था,सम्मलेन या विमर्श सत्र आदि कहना सटीक नहीं है  -बिल्कुल परिकल्पना ब्लॉगर सम्मान !..किसी ने कहा ब्लागर कम्युनिटी का आस्कर -ठीक भी है -ईश्वर ऐसा ही करें!और इसमें किंचित भी कोई असंगति नहीं ..कोई भी नयी विधा जब पुष्पित पल्लवित होने लगती है तो ऐसे समारोह उत्सव आनुसंगिक हो उठते हैं ..जो इनसे मुंह बिचका रहे हैं वे अपरिपक्व अनुभवहीन लोग हैं,गुड का स्वाद नहीं लिए हैं :-)  और इनमें किसी भी कारण से सम्मिलित न हो पाने की खीज मिटा रहे हैं ... 
बहरहाल  मैं जब ठीक दस बजे पहुंचा तो ज़ाकिर  जी काफी ऊपर दीवाल पर स्पाईडर मैंन सरीखा चढ़ कर बैनर टांग रहे थे ..वो तो जब वे कूद कर सम्मुख हुए तो मैंने सहसा पहचाना, अरे ये तो अपने ज़ाकिर मियाँ हैं ...अब हलके फुल्के लोगों से रश्क होता है दन से कहीं भी चढ़ और उतनी ही फुर्ती से उतर भी लेते हैं ..मैंने उन्हें प्यार  की झिड़की दी ये स्पाट ब्याय का भी काम? बोले ब्लागिंग के लिए कुछ भी,कभी भी कहीं भी  :-) अब ऐसा जज्बा हो तो भला क्या मुश्किल है? :-) हाल में घुसा तो रवि रतलामी जी ,सिद्धेश्वर जी ,अमित श्रीवास्तव जी ,डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी ,अपने आशु काव्य प्रतिभा के धनी और टिप्पणीकार रविकर जी कुछ उन पहलों में से थे जिनसे भर अंकवार मुलाक़ात हुयी .....चेले चीनी तो खैर थे ही ...फिर तो लोग आते गए और हम गलबहियां मिलते गए ..किसी और को भी गलबहियां -घेरे में लेने को मन था और निगाहें हाल में बार बार उसे ढूंढ रही थीं  ,बहरहाल  उसकी भी उपस्थिति हो आयी तो राहत रूह की अनुभूति हुई . ..मगर तब तक कार्यक्रम शुरू हो गया और हम मंच पर धर दिए गए .....
अब  मंच  से देखा देखी मंचीय गरिमा के अनुकूल नहीं थी सो हम तटस्थ और प्रत्यक्षतः निर्विकार भी हो लिए ..अडोस पड़ोस के गुरुतर गाम्भीर्य का भी तो हमें ध्यान  रखना था ..वामभागी  अध्यक्ष जी फिर भी मुझसे डिस्टर्ब होते रहे और बार बार मेरे फोन काल आने पर बुदबुदाते रहे और संतोष त्रिवेदी पर भी काफी कुपित होते रहे कि वे आखिर मेरी ही इतनी  फोटो क्यों उतारते जा रहे -चेला हैं न गुरु का ध्यान तो रखेगा ही ..मगर वे गुरु के साथ क्या क्या  गुल कैमरे में खिलाये हैं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा ..हम मंच से ही उन्हें घुड्कियाते भी रहे ..मगर बन्दर बालक एक सुभाऊ ...पूरे चिबिल्ले हैं संतोष त्रिवेदी! अब उन्होंने क्या क्या कैमरे के फोकस में रखा और उसके हवाले किये हम आपसे बता भी नहीं सकते ;-) ....
बाहर कुदरत मेहबान थी -फुहारें थीं ..और भीतर सभागार में भी सम्मान बरस रहा था ...झोलियाँ खुलती गयीं और सम्मान भरते रहे... मैं उदघाटन सत्र का स्थानापन्न डायस अतिथि बना था  और पहली बार भाग्य ने साथ दिया अंत तक डटे रहे ...... :-) अच्छा पास पड़ोस -सानिध्य हो तो हटना भी कौन कम्बख्त चाहता है :-) ..मगर मेरे लिए और भी आमंत्रण थे और मुझे उन्हें अटेंड करना ही था ...जैसी कि आशंका थी संचालक महोदय ने मेरी प्रशस्त काया और भारी भरकम मंचीय उपस्थिति को भी नज़र अंदाज कर मुझे वैसे ही पहले बोलने को बुला लिया जैसे कवि सम्मेलनों में सबसे  पहले जूनियर कवि को कविता पाठ के लिए बुलाया जाता है . ..
 कुछ विषय प्रवर्तन सा  करने के  मुगालते में मैं रहा ...मूड बना तो वह भी लिखेगें यहीं ....हाँ  मुझे पता नहीं क्यों रह रह कर अहसास होता रहा कि मैं ब्लागरों के सम्मलेन के बजाय किसी कवि सम्मलेन में आ फंसा हूँ ... :-) अखंड सम्मान का जो सिलसिला चला तो लंच का समय हो आया और उद्घाटन सत्र ही चलता रहा ... समय कम पडा तो एक चर्चा सत्र ही निरस्त हो गया -कई ब्लॉगर कुछ न कह पाने के कारण मायूस हुए ..कुछ उचित ही नाराज हो गए ....खिसियाये और चलता बने ..बाबा रे कहाँ कहाँ से आये थे लोग -कोई गोआ तो कोई हैदराबाद! आडियेंस सुश्री रचना सिंह जी, यशस्वी ब्लागर (नारी ) की प्रतीक्षा करते रहे,उन्हें भी सम्मानित होना था -वर्षों से ब्लागिंग क्रीज पर बिना हिट विकेट बनी हुई हैं वे  -मैं खुद उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा कर रहा था . उनका नाम  एक विमर्श सत्र में भी था -मगर वे नहीं आयीं!अपराह्न सत्र में कवितायें भी मंच पर सस्वरित हुईं ...मैं चौका .... कवि सम्मलेन और ब्लॉगर सम्मलेन में फर्क रखना होगा --एक कवयित्री ग़ज़ल सुनाईं और मैं हाल में उसे तरन्नुम में गुनगुनाता रहा और चेले को पकड़ के सुनाता रहा और चेले भी गज़ब ..गज़लकारा ब्लॉगर को ही बोल उठे  कि आपसे अच्छा तो मिसिर जी गा रहे थे ..हद हो संतोष .... .
सम्मानित कुछ शिष्ट विशिष्ट 
रवीन्द्र प्रभात ने इस समारोह को सफल बनाने में अतिशय / भयंकर मानसिक और शारीरिक श्रम किया और ज़ाकिर ने भी -उन्हें साधुवाद! अब सम्मान पर भी कुछ कह  लूं ....सम्मान मिलना अच्छी बात है मगर उसका अतिशय विज्ञापन बौद्धिक जनों में आत्म प्रचार का सन्देश ले जाता है ..आत्मप्रचार निरी बेशर्मी  मानी जाती है पढ़े लिखे गुनीजनों में   ...
कई सिद्ध प्रसिद्ध ब्लॉगर लखनऊ ब्लागर मीट में आये मगर जितना आये उनसे भी मुलाक़ात वहीं रहकर भी नहीं हो पायी :-( .....कारण हम उनके ब्लॉग से परिचित हैं उनसे जुड़े चेहरों से नहीं... और मजे की बात यह कि जिनके चेहरों से परिचित हैं उनके ब्लॉग से परिचित नहीं .. काश एक परिचय सत्र होता! हाँ बहुत से जो ब्लागर किन्ही भी कारणों से नहीं आये उनकी दबी साध उन्हें रह रह कचोट रही है और वे अपने विचारों से दूसरों को फेसबुक पर चिकोट रहे हैं ..कोई भी एक दिवसी और वह भी बिना सरकारी इमदाद का ब्लॉगर जलसा सारे ब्लागरों को समेट नहीं सकता..मगर एक दिन में ही जितना कुछ  अटाया/समाया गया इस समारोह  में वह दो दिन का काम था...सूत्रतः यही कह सकता हूँ जो नहीं आये भले रहे ..... और वे सम्मान तोषी नहीं हैं -वैसे भी अब बाकी अगले में सिमट ही जायेगें ...मनवा धीर धर... :-) मगर रवीन्द्र जी, पुरखों बूढों को सम्मान के बजाय क्या ही अच्छा होता हम कोई ऐसी प्रणाली विकसित करें जिससे नयी प्रतिभाएं सम्मानित हों और प्रोत्साहित हों -आने वाल कल उनका है .....बाकी तो मूड बना तो फिर कुछ लिखेगें ....हाँ युगों बाद बहुत संतृप्त होकर लौटने (लुटने न पढ़ें कृपया )की अनुभूति है -देखिये कब तक कायम रहती है :-)
 अधिकृत विवरण ,सम्मान सूची आदि आदि के लिए यहाँ जाएँ !

शनिवार, 25 अगस्त 2012

फुल इंटरटेनमेंट पैकेज 'प्रीक्वेल' फिलम 'एक था टाईगर'


एक रूमानी अहसास है यह फिल्म. प्यार होना कतई कोई टेढ़ी खीर नहीं है .यह सरे राह चलते चलते ऐसे ही यूं भी /ही हो जाता है ...केवल एक छोटी सी चहलकदमी साथ साथ और टाईगर (सलमान खान ) तथा जोया (कटरीना कैफ ) एक दूसरे को दिल दे बैठे ...दर्शकों को यह रील पर नहीं सहजता से घटता प्रसंग लगता है और शायद इसके लिए उन्हें दोनों सितारों की नजदीकियों की ख़बरों के द्वारा कंडीशन किया जाता रहा है .दोनो किरदार अपने अपने देशों (भारत पाकिस्तान ) की मानी जानी ख़ुफ़िया एजेंसियों  के नुमायिंदे हैं -रा और आई एस आई ...पहले इस बात से बेखबर ..अब प्यार तो दीवाना है, पगला है यह सब कहाँ देखता है ...."साले टाईगर को एक पाकिस्तानी जासूस ही मिली थी प्यार करने को " यह तात्क्षणिक उदगार होते हैं रा के मुखिया के ......दोनो अपने अपने देश -दायित्वों को छोड़ भाग चलते हैं .....और आज तक भाग ही रहे हैं ..देश दर देश शहर दर शहर .....और दोनो देशों की  ख़ुफ़िया एजेंसियां उनके पीछे पडी हैं ..फिल्म का यह अंतहीन अंत निश्चिय ही इसके सीक्वेल को प्लान करके गढ़ा गया है हालांकि निर्माता निर्देशक इस संभावना से इन्कार कर रहे हैं ..

फिल्म के लोकेशन,चित्रांकन लाजवाब है ... कटरीना बला की खूबसूरत लगी हैं और अब तो उन्हें अदाकारी भी आ गयी है -उनके चेहरे के भाव कहानी की मांग को एकदम सटीक तरीके से पूरा करते हैं ..उनके कई स्टंट सीन लगता तो नहीं कि उन्होंने किये होंगे मगर फिल्म देखते वक्त यह भी नहीं लगता कि उन्होंने नहीं किये होंगे ...और मार धाढ और विध्वंस के सीन भी बहुत जीवंत हैं और हालीवुड फिल्मों की प्रतीति कराते हैं...रोमांटिक दृश्य बहुत ही सहज और साफ़ सुथरे और दिल को छू लेने वाले हैं ....एक दृश्य में टाईगर जोया को उल्कों की बरसात(मीटियार शावर)  का दृश्य दिखाता  है जो  बहुत ही नयनाभिराम है . फिल्म के एक प्रोफ़ेसर का किरदार यद्यपि अल्पावधि  के लिए है मगर प्रोफ़ेसर -स्टीरियोटाईप के बहु प्रचारित जुमले को बारीकी से  दृश्यांकित करते हैं .......
फिल्म की कहानी नहीं बता रहा क्योकि  अपनी ओर से यह सिफारिश है आप यह फिलम  देख सकते हैं ...पारिवारिक फिल्म है -बच्चों कच्चों के साथ किसी दिन थियेटर- माल में जाने का पूरा मौका है ....और कहानी में भी रुमान का रंग छाया हुआ है और मार धाड, धर -पकड़ की तो पूरी ग़दर ही मची है फिल्म में ..पहला हाफ तो इतना कसा हुआ है कि इंटरवल होने पर दर्शक चौकते हैं ...हाँ इंटरवल के बाद बस कुछ मिनटों के लिए कहीं कहीं फिल्म झोल खाती है मगर फिर तुरत फुरत संभलती भी है ....गाने मुझे तो कोई नहीं भाए..मगर इस तरह के फिल्मों में गाने वाने ज्यादा मायने नहीं रखते ....थ्रिलर और लव स्टोरी का उम्दा ब्लेंड है यह फिल्म ....प्रेम महिमामंडित हुआ है -देश और फर्ज भी प्रेम के आगे कुर्बान है -यह मुद्दा तनिक विचारणीय तो है मगर यह फिल्म है भाई -हकीकत नहीं और हकीकत में भी तो क्या इससे कम हुआ है कभी -फिल्म ने बड़ी चतुराई से दोनो देशों के कुछ हवा में तैरते ऐसे ही एकाध किस्से को थीम बनाया है जो कुछ समय पहले सुर्खियों में थे -एक पाकिस्तानी नागरिक ऐसी ही फ़रियाद लेकर भारत में दर दर भटक रही थी .....
फिल्म के मुताबिक़ जासूसी  दुनिया के असली किरदारों के बीच बहुत कुछ ऐसा घटता है जो चर्चा का विषय नहीं बनता ...रा के कौन लोग हैं और आई एस आई के कौन चेहरे हैं हम कहाँ देख पाते हैं? जबकि वे अपने आस पास ही किसी न किसी नागरिक -पड़ोसी, पात्रों के रूप में मौजूद होते हैं -हाँ उनकी एक अलग दुनिया है जो हमें नहीं दिखती जिसके बस एक पहलू को इस फिल्म के जरिये उजागर किया गया है ......तो कब देख रहे हैं सपरिवार यह फिल्म आप? वैसे तो मैंने अकेले ही निपटा दी है ...मगर घर की फरमाईश बनी हुयी है ..अब सलमान के फैन घर घर हैं न ..और हर उम्र के भी :-( इस बात की भी फिल्म में चुटकी ली गयी है .....और सलमान ने अब तक शादी क्यों नहीं की इसकी भी .......

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मुई इमेज!


मुई इमेज का भी लफडा ससुरा बड़ा अजीब है .अपने हिन्दुस्तानी और खासकर हिन्दी पट्टी वाले भाई इमेज बचाने के चक्कर में  अक्सर बेइज्जत भी होते देखे गए हैं:-) दरअसल यह एक सनातनी समस्या है या कहिये संस्कार है ..यहाँ लोकोपवाद से लोग बाग़ बहुत डरते भये हैं ....मर्यादा पुरुषोत्तम राम तक डर गए अपने इमेज के चक्कर में .....लोगों ने कहा कि ये कैसे हो सकता है सीता दशक दिनों रावण के छत्रछाया में रहीं और उसकी अंकशायिनी न बनी हों .....राम ने बस सीता को वनवास दे दिया....कहीं इमेज का फालूदा न हो जाय ..कहा कि राजा जैसा करता है प्रजा वैसा ही अनुसरण करती है ....हम अगर उदाहरण नहीं प्रस्तुत करेगें अपनी स्वच्छ साफ़ सुथरी छवि का तो आगे की कौमे भी वैसा ही करेगीं ..यद्यता आचरति श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः ......वाल्मीकि रामायण से ही एक और संस्कृत का श्लोक है -न भीतो मरणादस्मि केवलम दूषितं यशः मैं मरने से नहीं डरता बस कलंक से डरता हूँ -एक आम भारतीय का संस्कार ही ऐसा है ..वह इमेज को लेकर हमेशा थरथराता है पीपल के पत्ते जैसा .... और यही हुआ मेरी पिछली पोस्ट पर ..पढ़े तो सैकड़ों जन मगर टिप्पणी किये बिना पतली गली से सटक लिए ...काहें? अब इतनी अच्छी  इमेज बनी है ब्लागजगत में -सभ्य ,सुसंस्कृत ,उच्च पद ,प्रतिष्ठा ,पंच आदि आदि तो फिर काहें विवादों में फंसे ..भगवान् राम के पक्के अनुयायी ..पक्के सनातनी ... :-) 

हमारे इक मित्र हुआ करते थे बल्कि हैं भी मगर दूरी है इन दिनों ... बल्कि इमेज की ही ...जब भारत की सर्वोच्च सेवा के शुरुआती जवानी के दिन थे एक बार बहुत पीड़ित होकर बोले थे मिश्रा जी ये साली इमेज भी  बड़ी टुच्ची चीज है ..कई मामलों में मन मसोस कर रह जाना पड़ता है ..मैंने आग्रह किया कि सर जी दिल खोल कर बयाँ कर दिया जाय तो चूंकि उर्दू के वे अच्छे  जानकार हिन्दू हैं तो बेसाख्ता बोल पड़े थे- ये बंदा परवर क्या क्या सूरते बनायी हैं तूने हर सूरत को चूमने का दिल चाहता है ..मैंने सलाह दी सर किसी एक से अभिव्यक्त हो जाईये और शादी विवाह रचा डालिए ....मगर कह पड़े यही तो चक्कर है इमेज आड़े हाथों आ रही है ....बहरहाल गैर शादी शुदा रह गए ....अभिव्यक्त ही नहीं हो पाए बिचारे इमेज के चक्कर में .....मन में तो कितना कुछ उमड़ता रहता है मगर हम अभिव्यक्त नहीं हो पाते ...पता नहीं लोग क्या कह दें -सर जी आप भी? जैसे सर जी किसी दूसरे सांचे से ढल के आये हों :-) 
दरअसल हिन्दी पट्टी के नुमायिन्दों की एक कमजोर नस यह है कि वे अपना एक गुडी गुडी इमेज बनाए रखना चाहते हैं जबकि होते वैसे नहीं ..अनूप शुक्ल जी फोन पर ही कमेन्ट दे डाले मगर यहाँ नहीं खुले ....सार्वजनिक होने में इमेज जाने का खतरा रहता है भाई! लोग बाग बिचारे इसी डर से अधमरे बने रहते हैं कि कोई उन्हें कभी कुछ कह न दे! इसलिए वाद विवाद में भी नहीं फसना चाहते -आँख नीची किये खिसक लेते हैं ..
मगर इन्हें कौन समझाए कि इज्जत बचाने में अक्सर इज्जतें चली भी जाती हैं ..सो बिंदास रहो .....अपने को खुलकर अभिव्यक्त करो ..मन में हो जो कह डालो ....मित्रों कोई बात नहीं आप उस पोस्ट पर नहीं आये ..हमें भी इसका कोई उज्र नहीं रहता आयें या न आयें वह तो आपका विशेषाधिकार है मगर आपका नाम तो इमेजधारी लोगों में आ ही जाता है और यह भी उचित ही  है आप भगवान राम की परम्परा का ही अनुसरण कर रहे हैं .....और मैं भी उनका पक्का अनुयायी ....सो बोलती बंद है!

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

मैंने कब किसी को कहा ब्लागरा या ब्लॉग वालियां!?


नाहक ही मुझ पर तोहमत पर तोहमत लगाई जा रही है ...मैंने तो किसी को नहीं कहा ब्लागरा या ब्लॉग वालियां ...हालांकि इन दोनों शब्दों का कापीराईट मेरे पास है मगर अब क्या शब्द -कौतुक भी कोई गुनाह है? वर्ड प्ले तो बच्चों तक का प्रिय शगल है ...और वो कहावत भी तो कितनी जग प्रसिद्ध हुयी है ना -सुवरण को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर ... तो मैंने भी ये दो शब्द गढ़ दिए ताकि ब्लॉग शब्द कोश में अपनी इंट्री बना लें और साहित्य कोश की शोभा बढायें -अब यह किसी के प्रति ,किसी को लक्षित करके तो ओरिजिनली कहा नहीं गया था ..शब्द तो कितने ही हवा में तैरते रहते हैं और तब तक किसी के साथ नहीं आ चिपकते जब तक उसका वैसा आचरण न हो जाय -भाषा और शब्द के धनी मेरी इस बात को समझेगें ....और फिर ब्लागरा भी ऐसा कौन सा एलर्जिक शब्द हो गया जो उसे सुनते ही भड़क या चिहुंक उठा जाय ....अरे जैसे शायरा वैसे ब्लागरा..अब कोई बताये क्या शायरा शब्द फूहड़ है? या सम्मान से नहीं लिया जाता? ..अरे मेरे जमाने में तो लोग बाग़ बिना किसी शायरा का नाम सुने मुशायरे में जाते तक नहीं थे ... हाँ अब जमाना जेंडर न्यूट्रल शब्दों का आ गया है ...शायर और एक्टर प्रचलन में है दोनों के लिए मगर तो क्या नए शब्द गढ़ने पर कोई पाबंदी है या फिर शब्दों को डिक्शनरी से निकाल  दिया जाय? हम कभी कभी इतना संकीर्ण क्यों हो उठते है? कहीं कोई अपनी कमी कसक तो नहीं है?  
अब आईये ब्लॉग वालियां पर ..पढ़ने लिखने वाले जानते हैं कि अमृत लाल नागर जैसे सारस्वत प्रतिभा के धनी विद्वान ने ये कोठेवालियां लिखी थी ..मगर मेरा संबोधन तो कतई इस लिहाज से नहीं था ...अभी उसी दिन कोई चर्चा कर रहा था ....कौन पाबला? जवाब आया अरे वही अपने ब्लॉग वाले पाबला जी ? तो जब ब्लॉग वाले पाबला जी हो सकते हैं तो ब्लॉग वाली फलानी क्यों नहीं हो सकती? आम बोल चाल की भाषा में कई संबोधन ऐसे ही दैनन्दिन जीवन में सहजता से चलते रहते हैं और कई कार्य व्यवहारों को अंजाम देते हैं ...उनका कोई अन्य व्यंजनात्मक अर्थ थोड़े ही होता है ..मगर वो क्या है कि चोर के दाढी में तिनका .. तो वह चिहुंक पड़ता है ..जैसे वज्रपात हो गया हो ....अब क्या इक्केवालियाँ ,ठेलेवालियाँ, नखरेवालियाँ कोई खराब शब्द हैं -भाई ये तो रोजमर्रा के शब्द हैं ....हाँ बहुबचन में हैं ..अब एक वचन और बहुवचन, जैसी जरुरत हो उसी के मुताबिक़ व्यवहृत हो उठते हैं ... इसमें कहाँ कौन सा आक्षेप अन्तर्निहित है? हाँ जब शब्दों का धुर विरोध होता है तो वे नए अर्थ और गाम्भीर्य ग्रहण करते चलते हैं... अब जितना ही विरोध इन नव सृजित शब्दों का होगा वे और भी प्रचलन  में आते जायेगें ....लोगों को तो मुझे इन दोनों नए शब्दों के गढ़ने पर शाबाशी देनी चाहिए मगर दे रहे हैं गालियाँ ....हाय रे हिन्दी ब्लागवर्ल्ड :-( ..यह किसी के लिए कहा ही नहीं गया ...अब लोग अपने आचरण से इन शब्दों को अपने से चिपका लें तो बात और है ..अब तक तो तीन चार ने तो चिपका ही लिया है ...अब उनकी अपनी मर्जी ...बेदर्दी तेरी मरजी ....जो चाहे कह लो आखिर पुरुष द्रोह भी कोई चीज है ..
दरअसल यह सब परिणाम है ब्लॉग जगत की उन गोल गिरोह वाले वालियों के  सुकर्मों के जिनके चलते यहाँ कई दुरभि संधियाँ चल रही हैं --अब उन मोहतरमा के ब्लाग पोस्ट पर टिप्पणी करिए तो फलानी नाराज़ हो जाती हैं कि मेरे यहाँ तो करते नहीं बार बार वहीं जाते हैं ....अब कोई क्या कहे अरे वे मोहतरमा आपसे लाख गुना अच्छा लिखती हैं आप भी वैसा लिखिए तो हम दौड़े चले आयेगें ..और आपके यहाँ भी पुरुष मित्रों की कोई कम भरमार तो रहती नहीं ...सब दाद खाज देने पहुंचे ही रहते हैं और आपको ब्लॉग विदुषी की खुशफहमी देते रहते हैं ..मगर मेरी दाद?  मो सो नको .....बढियां लिखिए आयेगें आपके यहाँ भी आयेगें ....वैसे भी यह अपनी अपनी पसंद की बात है और मैंने खैरात टिप्पणियाँ बंद कर दी है उन सभी के यहाँ जिनके अपने अघोषित एजेंडे हैं और जो दुरभि संधियों में मशगूल हैं ....इनमें मेरे कई पुरुष मित्र भी हैं  .....
मेरी नसीब ही अजीब है ..ब्लॉग जगत में आने के पहले नारीवाद शब्द तक मैंने नहीं सुना था मगर एक मुहिम चलाकर मुझे नारी विद्वेषी घोषित करने के प्रयास किये जाते रहे हैं ....और अब तो लगता है मैं हो भी गया हूँ पक्का मीसोजीनिस्ट ....बार बार सही को गलत कहो तो वह गलत ही हो जाता है ....एक देवि हैं जिन्होंने नाक में दम कर रखा है.. कितने अच्छे श्रेष्ठ ब्लागरों को वे पैवेलियन तक पहुंचा चुकी हैं ...गोलबंदी की है ..कितनी दुत्कारों का सामना किया है मगर अवसर की ताक में रहती हैं ....कुछ लोगों को फिर से खेमें में जोड़ रही हैं .....लोग हैं कि अब उनकी सुनते ही नहीं .... कब खतम होगा ये अरण्य विलाप? 
मित्रों, ब्लॉग ऐसा ही माध्यम है ...यहाँ कड़वी कड़वी थू और मीठी मीठी गप्प नहीं चलेगा ....दोनों कहने का और सुनने  का माद्दा रखिये ...तब यहाँ टिकिए..तनिक टफ माध्यम है यह ...यहाँ ठकुरसुहाती लम्बे दिनों तक नहीं चलती ..प्यारे बोल बोलने वालों को तो एक उन मोहतरमा ने ही चलता कर दिया ...तो डट के ब्लागिंग करिए और ठसक के रहिये ..मुंहदेखी आलाप प्रलाप की जरुरत नहीं है ब्लागिंग में ......अपनी कहिये और एलानियाँ कहिये .....आप अपनी सोशल नेट्वर्किंग के कारण नहीं अपनी लेखनी से ही जाने जायेगें ....टिप्पणी मोह छोडिये ..गणना काउंटर आपको बतायेगा कि आप पढ़े जा रहे हैं और खूब पढ़े जा रहे हैं ..
टिप्पणियों का भी अपना समाजशास्त्र है और राजनीति है -मेरे कई पुरुष मित्र इसलिए भी आपके यहाँ सहज टिप्पणी करने से बचते हैं कि कहीं उनकी वे फलानी नाराज न हो जायं!और वे फलानी आपके यहाँ नहीं आतीं तो मुंह क्या बिसोरना? उन्हें फलाने ने मना कर रखा होगा ....और फिर और  भी कितने अच्छे अच्छे ब्लॉग लिखे जा रहे हैं वहां जाईये न ...रोनी सूरत बनाकर मत बैठिये ....और हाँ बन्दर बंदरिया घुड़कियों से मत घबराईये ..आप अपनी पर आ जाईये तो पायेगें आप उनसे लाख गुना अच्छा लिखते हैं ... आप लिखते भी हैं ..मैंने देखा है ..और आगे भी देखते रहेगें बाबा, टिप्पणी भी करेगें ..अब खुश न :-) 

सोमवार, 20 अगस्त 2012

ईद मुबारक!


दोस्तों,हमारे पास सहिष्णु साहचर्य के बिना और कोई चारा नहीं है -हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सभी को भारतीय जीवन की इस सच्चाई को समझना होगा... यह देश हम  सभी का और हम  सब इस देश के हैं.. अब यह विवशता है तो एक धुर सच्चाई भी है -हम इससे अगर मुंह चुरायेगें तो नुक्सान अपना करेगें ..हर तरह का नुक्सान, जानोमाल का नुक्सान जो आगामी पीढ़ियों तक को भी ग्रसित करेगा... जिम्मेदारी  सभी कौमों के सरपरस्तों और समझदार लोगों की है कि वे इस सच्चाई से सबको आगाह करते रहें ....आज हमारे बहुत से साथियों की ईद मनाने की इच्छा नहीं है ..कल किसी को होली दिवाली मनाने की इच्छा नहीं रहेगी ...एक आजाद और बहुरंगी संस्कृति के देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है ...देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष बनाये जाने के पीछे के गहन विचार मंथन को ऐसे ही कारणों में देखा और समझा जा सकता है ......आईये क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सभी को आगे बढ़ कर ईद की शुभकामनायें दें और जम कर सेवईयां जीमें :-) 
लगता है आज तो इतने से चल जाएगा ...कोई जरुरी तो नहीं कि हर पोस्ट एक  निश्चित सीमा के मापदंड हलांकि अघोषित, तक पहुँच ही जाए ....बात कभी कभी संक्षिप्त ही भली लगती है और संक्षिप्त बातें प्रायः सारगर्भित भी होती हैं -वो कहते भी हैं कि संक्षिप्ति वक्तृता/वाक्पटुता की आत्मा है ....तो आज इतना ही ..एक बार फिर आप सभी को ईद मुबारक हो! 

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

सागर सागर फिरती मारी एक अकेली व्हेल बिचारी


एक अजूबा है. वैज्ञानिकों के एक दल ने ऐसे अकेले व्हेल (नर या  मादा पता नहीं) का पता पा लिया है जिसे आज तक कोई संगी साथी नहीं मिला और वह सात समुद्रों तक उनकी तलाश में दर दर भटक रही है ...कारण है उसका प्रणय राग जिसका तरंग दैर्ध्य इतना ज्यादा -५२ हर्टज( ध्वनि की तीव्रता का पैमाना ) है कि कोई भी दीगर व्हेल उसे सुन ही नहीं सकती ....इसलिए वह बिचारी सारी दुनिया के सागरों में अपना  संगी साथी   ढूंढ रही है ..मीत ना मिला न कोई की तान छेड़े हुए ....वैज्ञानिक भी परेशान कि आखिर उसे किसी साथी से मिलाये तो कैसे ...इतने भारी भरकम जीव के साथ इंतजाम भी भारी भरकम हो तो बात बने मगर ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है -दूसरी मुसीबत यह कि यह अज्ञात प्रजाति की अकेली व्हेल दिखी है -मतलब अब तक इसके प्रजाति की पहचान नहीं हो पायी है .वैज्ञानिक भी चकराए हुए हैं कि आखिर यह आयी कहाँ से? 
                                          Photo credit: USGS/National Biological Information 
अपने प्रजाति (जिसका अता पता नहीं है अब तक ) से अलग थलग पडी इस  व्हेल का मानो जाति निकाला हो गया हो ....और अब तो यह उनसे या किसी अन्य व्हेल प्रजाति से संवाद भी कायम नहीं कर पा रही है -इसके  प्रणय राग अब अरण्य रोदन बन बैठे हैं . कोई सुनने वाला नहीं मगर यह भी अपनी धुन की ऐसी पक्की कि अपनी  विरह राग छेड़े हुए सागर सागर एक किये हुए है ...कभी तो मिलेगा मन का मीत .....सबसे पहले यह अमेरिकी नेवी के अफसरों को १९८९ में दिखी जब उन्होंने अपने श्रव्य उपकरणों पर एक अजीब सी फ्रीक्वेंसी की  आवाजें सुनी.जहां दूसरी व्हेलें १५-२५ हर्ट्ज़ पर ताने छेड़ती  हैं इसका इतना ऊंचा तान -तरंग दैर्ध्य होना वैज्ञानिकों को हैरत में डाले हुए है . ब्ल्यू व्हेल तो काफी कम तरंग दैर्ध्य -पियानो के करीब करीब राग छेड़ती है.
  
वैज्ञानिक वैसे तो इसकी इस बिल्कुल यूनीक आवाज के चलते इसे आराम से सागर सागर ढूंढ ले रहे हैं मगर वे असहाय भी हो चले हैं कि इसका कोई जीवन संगी आखिर कैसे ढूंढ लायें . कैसे इसका चिर अकेलापन दूर करें ....अभी तक उन्हें यही पता नहीं लग पाया है कि इस व्हेल की संवाद और सामुद्रिक संचार में असमर्थता का कारण क्या है? क्या यह कोई आकस्मिक वर्ण संकर उत्पत्ति तो नहीं है जो अपने भिन्न माँ और पिता  प्रजाति से बिल्कुल अलग व्यवहार प्रदर्शन कर रही हो जिसमें यह विशिष्ट तरंगदैर्ध्य की तान भी सम्मिलित है ? एक जीव -भाषा विज्ञानी का तो कहना है कि यह शायद उससे भी ज्यादा दुखियारी है जितना हम समझ रहे हैं और अनन्त  सागर में टूटा दिल लिए विचर रही है . सागर का कोई कोना शायद अब इसका होना नसीब नहीं है ....आप सामान्य और इस दुखियारी व्हेल का प्रणय राग यहाँ जाकर सुन सकते हैं ....
हम मानव प्रजाति में भी कितनों की व्यथा कथा भी कुछ ऐसी ही है -विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना ,उमड़ी कल थी मिट आज चली मैं नीर भरी दुःख की बदली ...मशहूर कवयित्री के उदगार तो ऐसे ही लगते हैं ....आईये हम इस व्हेल के लिए दुआ करें! 

रविवार, 12 अगस्त 2012

चोरी भी सीनाजोरी भी ....फरीद ज़कारिया नहीं हैं भारतीय!


विश्वप्रसिद्ध टाईम पत्रिका ने अपने एक प्रमुख स्तंभकार और कई आमुख कथाओं (कवर स्टोरी ) के प्रस्तुतकर्ता  फरीद रफीक ज़कारिया को निकाल बाहर किया और सी एन एन ने भी जहाँ वे अपना एक नियमित कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे हैं इनसे किनारा कर लिया -कारण? साहित्यिक चोरी ....इनके ऊपर आरोप है कि इन्होने अपने आलेखों में कुछ पैराग्राफ और लाईनें दूसरे स्रोतों से जस का तस उड़ा लिया ...फरीद रफीक ज़कारिया भारतीय मूल के एक नामी गिरामी पत्रकार हैं जो काफी लम्बे अरसे से अमरीका में रह रहे हैं . न्यूजवीक पत्रिका में भी वे एक प्रसिद्ध स्तंभकार रह चुके हैं . वे अंतर्राष्ट्रीय विषयों,व्यापार और अमेरिका की विदेश नीति के अच्छे जानकार हैं .... 
आश्चर्य होता है ऐसे जाने माने और  तमाम विषयों तथा  भाषा पर अधिकार रखने वाले शख्स ने भी साहित्यिक चोरी का दामन थाम लिया ...साहित्यिक चोरी बौद्धिक समुदाय में कलंक सरीखी है -लिहाजा टाईम और सी एन एन ने बिना समय गवायें उन्हें तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया ..भले ही ज़कारिया ने माफी मांग ली ....किसी ने फिकरा  कसा कि अगर उनपर भारतीय संस्कारों का तनिक भी असर होता तो वे माफी नहीं मांगते -यहाँ तो पूरी की पूरी किताब ही उड़ा ली जाती है और लोग चुप्पी साधे रहते हैं  .....एक उस विनम्र प्रोफ़ेसर की कहानी मुझे याद है जिन्होंने अपने एक सहयोगी से जिसने उनकी एक पूर्व प्रकाशित पूरी किताब ही चुरा कर अपने नाम से कालांतर में छाप दी थी से यह अनुरोध किया था कि ' चलिए जो कुछ आपने किया, किया मगर  कम से कम आभार वाला पृष्ठ तो खुद लिख लिया होता :-) .....एक सज्जन खुद मेरे साथ भी ऐसा ही वाकया अंजाम दे चुके हैं जो एक प्रसिद्ध विज्ञान संचार संस्थान नयी दिल्ली में ठीक ठाक पद पर कार्यरत हैं और उनके इस कार्य में एक ब्लागर देवि जिन्हें खुद प्रकृति भी दण्डित कर चुकी हैं (क्षमा करें ,फिर भी लोग सच्चाई का मार्ग नहीं अपनाते-इसलिए लिख रहा हूँ!) बराबर की साझीदार रहीं ....आज तक उन वैज्ञानिक संचारक महोदय या मोहतरमा का माफीनामा नहीं आया ..लोग बाग़ मुझसे पूछते हैं कि मैं कोर्ट क्यों नहीं जाता ....अब मैं कोर्ट जाऊं तो क्या उनके साथ वैसा ही सलूक उनकी नियोक्ता संस्थायें करेगीं जैसा फरीद ज़कारिया के साथ टाईम और सी एन एन ने किया? यह भारत है बाबू ? यहाँ ऐसे ही घाघ बैठे हैं और दूसरो के खून पसीने पर ऐश कर रहे हैं . 
भारत में साहित्यिक चोरी के दृष्टांत आये दिन सुनायी देते हैं . भारत में प्रधान मंत्री के सलाहकार सी .एन .राव पर भी कथित रूप से यह कलंक लग चुका है जिन्होंने अपने एक शोध पत्र के अंश को पहले के छपे दूसरे शोधकर्ताओं के पेपर से शब्दशः टीप लिया था ....सी एस आई  आर के पूर्व डाइरेक्टर माशेलकर साहब भी इस आरोप से बच नहीं पाए ...और भी कई जाने माने भारतीय हैं जिन्होंने अपने देश को ऐसे कृत्यों से शर्मसार किया है मगर आज यहाँ उनका नाम गिनाने का मकसद नहीं है -आपके साथ यह चर्चा करना चाहता हूँ कि आखिर क्यों पढने लिखने वाले लोग भी ऐसे घटिया स्तर पर उतर आते हैं? क्यों करते हैं वे ऐसा ??  कहीं खुद भाषा और विचार,कल्पनाशीलता की कमी इन्हें  दूसरों का बना बनाया मैटर उठा लेने को न उकसाता हो? यह अंतर्जाल भी तो अब इन साहित्यिक चोरों का ऐशगाह है  जहाँ  कट -पेस्ट की सुविधा सहज ही उपलब्ध है ..जहाँ भी  अपने काम की सामग्री देखी खट से कापी किया और इंगित स्थल पर पेस्ट कर दिया ..पहले तो हर्फ़ दर हर्फ़ टीपना पड़ता था ......या फिर कैंची और गोंद का सहारा लेना पड़ता था  फिर टाईप कराने या मुद्रित कराने का लफड़ा था मगर अब तो बहुत कुछ लिखना पढना अंतर्जाल पर आता जा रहा है और टीपकों की नयी पीढी  की चांदी ही  चांदी है ..... 

कई बार लोग जब ज्यादा प्रालिफिक होने के चक्कर में रहते  हैं या उनका प्रमोशन /नियुक्ति आदि प्रकाशित सामग्री के मूल्यांकन पर आधारित होता है तब भी लोग ज्यादा से ज्यादा शोधपत्र ,आलेख ,किताब प्रकाशित करने के के जुगाड़ में लग जाते हैं और आसान सा रास्ता -साहित्यिक चोरी अपनाते हैं . मगर यह उन लोगों के लिए जिनकी सामग्री चुराई जाती है बहुत आहत करने वाला होता है- 'खून पसीने की कमाई' चोर लोग सहज ही ले उड़ते हैं और खुद मलाई खाते हैं ....बुद्धि विवेक किसी का और मजा कोई और लूटे ...और ये साहित्यिक चोर इतने निर्लज्ज हो रहते हैं कि मूल लेखक का संदर्भ देने की कौन कहे उनका पत्ता ही साफ़ करने के जुगाड़ में लग जाते हैं -कहीं पोल न खुल जाए ...कभी अपनी चुराई कृति में मूल लेखक का कोई संदर्भ सूत्र नहीं देते ....ताकि पाठक चोरी के स्रोत तक कहीं न पहुंच जाए .... 

मेरी दरख्वास्त है सभी मित्रों से कि साहित्यिक चोरी की कठोर शब्दों में निंदा करें ..ऐसे लोगों का खुलकर बहिष्कार करें न कि कुछ छोटे मोटे लाभों के चक्कर में उनकी मिजाजपुर्सी करते रहें .....मैं चूंकि ऐसी घटना का खुद भुक्त भोगी रह चुका हूँ और आप ब्लागरों में भी इस कृत्य के कई लोग शिकार हो चुके हैं इसलिए ऐसे चोरों के खिलाफ हमें बिगुल बजाते रहना होगा ताकि उन्हें कुछ तो शर्म हया आये और वे सफलता का शार्ट कट अपनाने के बजाय कुछ  परिश्रम करें.  देश के उच्च पदों पर आसीन होकर उसे निरंतर खोखला न बनायें ....मैं जानता हूँ इस मुहिम को आप गति देगें ....फरीद ज़कारिया की तरह यहाँ नैतिकता और विवेक की  आग्रही ये चोर जमात नहीं है -ये तो कभी माफी नहीं मानने वाले ....सामूहिक बहिष्कार ही इनका एकमात्र इलाज है ......और ऐसी कोई संस्थागत प्रक्रिया भी वजूद में आनी चाहिए जो  इस तरह के बढ़ते अकादमीय कदाचारों पर अंकुश लगा सके!

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

मंदोदरी विलाप (मानस प्रसंग -10)

रामचरित मानस में वैसे तो काव्य के सभी रसों का यथोचित प्रवाह परिपाक हुआ है मगर करुण रस की प्रधानता है .तुलसी करुण रस का ऐसा प्रभाव संचारित करने में सक्षम हुए  हैं कि रूखा से भी रुखा और निष्ठुर व्यक्ति दयार्द्र हो उठे. भारतीय मानस भी करुण रस के प्रति बहुत सुग्राही है, सहिष्णु है. यहाँ करुणा  महाकाव्य तक लिखा सकती है ,चुनावों में हारते को भी जीत दिला सकती है . रामायण की रचना के मूल में करुणा है और भारत की राजगद्दी भी करुणा के जरिये हासिल होती रही है . वह चाहे राम हों या फिर गांधी परिवार करुणा के सहारे जिनकी राजनीतिक नैया पार हुयी है .इंदिरा ,राजीव के आकस्मिक कारुणिक निधन के बाद लोगों ने सत्ता थाल में सजाकर एक परिवार को सौंप दी ...कहने का आशय यह कि भारतीय जनमानस करुणा रस में  सहज ही  बहता आया है .....एको रस: करुण एव - संस्कृत साहित्य के एक मूर्धन्य कवि भवभूति ने भी यही कहा और अपने ग्रन्थ उत्तर रामचरितम में यही प्रतिपादित और चरितार्थ भी किया .

मेरा नियमित मानस अवगाहन जारी है और मैंने पाया है कि यहाँ तमाम अन्य काव्यगत विशेषताओं के साथ ही  एक कारुणिक भाव बोध निरंतर बना रहता है -करुणा की एक अंतर्धारा सी बहती रहती है मानस में ....राम वनगमन ,दशरथ की मृत्यु ,सीता विछोह ,लक्ष्मण की मूर्छा आदि प्रसंग एक एक कर आते गए हैं और करुणा रस में पाठक को सराबोर करते हैं. तुलसी इस भाव के प्रगटन में इतने सिद्धहस्त लगते हैं कि रावण जैसे अत्याचारी की मृत्य पर भी पाठकों को करुणा के प्रवाह में बहा ले गए हैं -उस समय जब देवता जन हर्षगान कर रहे हैं ,विमानों से पुष्प वर्षा कर रहे हैं -चारो और खुशी और उत्साह का माहौल है मगर मृत्यु तो आखिर मृत्यु ही है -शत्रु या मित्र सभी के लिए सम और समान . तुलसी बड़ी ही सूक्ष्मता और कुशलता से इस भाव को लेते हैं और मंदोदरी के विलाप के जरिये मृत्यु जन्य करुणा का विस्तार करने से नहीं चूकते ....

मंदोदरी विलाप करते हुए कह रही है हे नाथ तुम्हारे बल के आगे धरती नित्य चलायमान थी (आज्ञाकारिणी बनी हुयी थी -कांपती रहती थी ) और अग्नि ,सूर्य और चन्द्र सभी निस्तेज हुए रहते थे ...और जिसका भार शेष और कच्छप भी सहने में असमर्थ थे वही शरीर आज धूल धूसरित सामने निश्चल पडा हुआ है -
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।।

सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।।

हे नाथ!  वरुण ,कुबेर, इंद्र और वायु भी तुम्हारे सामने कभी रणभूमि में टिक नहीं पाए ,स्वामी, आपने तो अपने बल और प्रताप से काल और यमराज को भी जीत लिया था किन्तु आज अनाथ की तरह पड़े हुए हो ...
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा।।

भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं।।

अरे तुम्हारी प्रभुता तो जगत विख्यात थी और हाय तुम्हारे पुत्रों  और कुटुम्बियों के बल की भी कोई थाह नहीं थी मगर आज हे नाथ राम के विमुख होने से तुम ऐसी दुर्दशा को पहुँच गए कि खानदान में कोई रोनेवाला भी नहीं रहा ....

जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई।।

राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।।

हे नाथ विधाता की सारी सृष्टि ही तुम्हारे वश में थी ..लोकपाल सभी तुम्हे भयभीत हो सर नवाते थे मगर आज तुम्हारा ऐसा पराभव हुआ कि सर  और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं...रामविमुख के साथ तो होना भी यही था .....कितनी बार मैंने आपको कहा, मनाया मगर आप तो काल के वश होकर किसी का नहीं माने और आज इस गति को प्राप्त हुए .....जगत के नाथ को भी साधारण मनुष्य मान बैठे.. 

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा।।

अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।।
काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।।

ऐसे कारुणिक दृश्य को देखकर  राम भी द्रवित हो गए और उन्होंने मंदोदरी को दिलासा देने के लिए लक्ष्मण को भेजा .....

मृत्यु तो सभी की तय है ....तुलसी इस अवसर पर देवताओं के हर्षगान को तो दिखाते हैं मगर मृत्युलोक के इस ध्रुव सत्य से भी विमुख नहीं होते कि मरना तो एक दिन सभी को है -रावण मृत्यु के बाद महज एक निस्तेज शरीर है ....इस मृत काय से अब कैसा वैमनस्य? एक यह भी प्रबल सन्देश  देने से महाकवि विरत नहीं हुए हैं कि यहाँ कुछ भी चिरकालिक, अक्षय  नहीं है ..रावण सरीखे पराक्रमी का भी पराभव हुआ और वह ऐसी गति -दुर्गति को प्राप्त हुआ कि रहा न कुल कोऊ रोवनहारा ....यह एक सीख है लोगों को जो उन्हें उद्धतत्ता से रोके और विनम्र बनाए .......जय श्रीराम!  


रविवार, 5 अगस्त 2012

फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे- कामुकता की पराकाष्ठा का साहित्य (पुस्तक परिचय )


फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे एक रत्यात्मकता  (इरोटिक-हे मूढ़मने! इरोटिक बोले तो पोर्नोग्राफी नहीं ) से ओतप्रोत ई एल जेम्स रचित औपन्यासिक कृति है जो पिछले २०११ से,प्रकाशन वर्ष से ही चर्चा में है -बेस्टसेलर है . यह एक  त्रिखंडी (ट्रायोलाजी) कृति है . उपन्यास में लोकेशन सिएटल है जहाँ एक कालेज छात्रा एनास्टासिया स्टीले और एक व्यवसायी टैक्यून  क्रिस्चियन ग्रे का प्यार(?)  पलता है. उपन्यास भले ही अश्लीलता(पोर्नो )/घासलेटी साहित्य का लेबल लिए नहीं है मगर एक आम भारतीय पाठक/पाठिकाओं  के लिए जो सेक्स को प्रत्यक्षतः एक निषिद्ध कर्म ही समझते हैं  यह  उसी कटेगरी की कृति है .उबकाऊ और किंचित घृणित भी .  यह पुस्तक  मूलतः  पश्चिमी पाठकों के लिए है जो सेक्स को और सेक्सियर बनाने के तामझाम में लगे रहते हैं और रति क्रिया में नित नयी नूतनता / नवीनता देने में  मानो हरवक्त तत्पर बने रहते हैं -वहां  सेक्स एक सत चित आनंद है, एक उत्सव धर्मिता है -  विपुल शेड्स लिए हुए  हैं ....सहज सामान्य सेक्स भी  और विकृत भी .....जहाँ अनेक सेक्स फंतासियों का दौरदौरा है ,समूह यौनिक आनंद का रिवाज है ,सी सी और मीठी/तीखी  मार के बीच यौनिक आनंद का खेल है आदि आदि .....
मगर मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ -दरअसल हुआ यह कि विगत दिनों मुझे अपनी आधी दुनिया के एक मित्र का यह अनुरोध मिला कि मैं दो कृतियाँ पढूं और उन पर पोस्ट लिखूं और उन्होंने मुझे यह कहकर और भी उकसाया कि कई और श्रेष्ठ ब्लागरों ने कितनी सुन्दर और समग्र पुस्तक समीक्षायें अपने ब्लागों पर की हैं,एक ने तो अभी हाल में ही  -तो फिर मैं क्यों नहीं ऐसा कुछ करता? अब  आप सब यह जानते ही हैं कि ऐसे उदाहरण /उलाहने /ताने मेल इगो को कितना हर्ट करते हैं  ...धर्मवीर भारती की आत्मकथात्मक गुनाहों का देवता एक बार पढ़ा था अब फिर पढने की चाह है यद्यपि उनकी पूर्व पत्नी सुश्री कांता भारती की कृति रेत की मछली भी उन  लोगों द्वारा अनिवार्यतः पढी जानी चाहिए जो 'गुनाहों  का देवता' को पढ़ते हैं क्योंकि  यह  'गुनाहों का देवता' का ही दूसरा अविभाज्य पहलू है . फिलहाल इन कृतियों पर यहाँ लिखना मुल्तवी है मगर वो क्या कहते हैं न कि आशिक लिफाफा देखकर मजमून भांप जाते हैं तो किताबी कीड़े किताब का रिव्यू देख उसके बारे में काफी कुछ जान जाते हैं -तो मैंने शेड्स आफ ग्रे की कुछ समीक्षायें यहीं अंतर्जाल पर पढीं और फिर सोचा आपका श्रम बचाने को आपसे उन्हें शेयर कर ही लूं ...मित्र ने जो सन्देश भेजा तो मैंने समझा कि वे फिफ्टी शेड्स आफ गे जैसा कुछ कह रही हैं औरत मैं तुरंत ही विमुख  हो गया था  -क्योंकि मुझे इस शब्द से ही एलर्जी होती गयी है ..मगर बाद में लगा कि मुझे चीजों /शब्दों को ध्यान से देखना चाहिए -अब उम्र भी तो ऐसे बचकानी हडबडी / जल्दीबाजी की नहीं रही .... 

हाँ तो मैं बात इस उपन्यास की कर रहा था ...यह यौनिक दृष्टान्तों -दृश्यों से भरपूर कृति है और इसलिए ख्यात कुख्यात भी ....मानो कामसूत्र के इक्कीसवी सदी के संस्करण का रुतबा पाने की होड़ में पुस्तक कितनी ही यौनिक पद्धतियों -आसनों का चित्रण करती चलती है जिसमें परपीड़क यौनिक आनंद (बाँडेज/डिसिप्लिन /सैडिज्म /मैसोकिज्म=बीडीएसएम् ) आदि के भी विवरण /दृश्य हैं . किताब की कई करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं और ३७ देशों को इसके प्रकाशन के अधिकार भी मिल चुके हैं . हेनरी पाटर के भी रिकार्ड ध्वस्त हुए ... 
कहानी की शुरुआत कालेज छात्रा एनास्टासिया(अना) स्टीले से होती है जो अपने सबसे प्रिय मित्र कैथरीन कैवनाघ के साथ रहती है, जो कालेज पत्रिका के लिए नियमित कुछ लिखती रहती है . एक दिन जुकाम होने के कारण वह खुद न जाकर एनास्टासिया को  सफलता के शिखर पर पहुंचे अमेरिकी व्यवसायी क्रिस्चियन ग्रे का इंटरव्यू करने को भेजती है . इंटरव्यू के समय ही ग्रे अना को भा जाते हैं मगर इंटरव्यू पूरा नहीं हो पाता...फिर अना उसकी मित्र कैथरीन तथा एक और फोटोग्राफर  इंटरव्यू और फोटो सेशन के लिए ग्रे के पास फिर पहुंचते हैं .यहीं से अना और ग्रे की लव स्टोरी शुरू होती है मगर उनमें कई संवाद -अवरोध होते रहते हैं ...
अना को बार बार लगता है कि ग्रे " बस प्यार कर लिए जाने वाला छोकरा सरीखा  नहीं है" अना का  पहले भी जोस नामक व्यक्ति से अफेयर रह  चुका  है .. अना ग्रे को मन ही मन प्यार करने लगती है मगर ग्रे को तो बस अपनी यौन वासना की पूर्ति की भूख है उसे प्यार से कोई लेना देना नहीं है ..वह अपनी सेक्स -फंतासियों को अना के साथ चरितार्थ करना चाहता है ...इन्ही उधेडबुनों के बीच कहानी आगे बढ़ती है .......ग्रे की कामुक वृत्तियाँ असामान्य हैं -वह अना से कई तरह के वादे  लेता है जैसे धनिष्ठ क्षणों में वह उसकी आँखों में नहीं  देखेगी...  स्वयं उसे स्पर्श नहीं करेगी. वह इस फंतासी को मूर्त रूप देना चाहता है कि जैसे उसका पहला संसर्ग अक्षत यौवना से हो रहा हो ....(कौन कहता है भारतीय ही पुरातन पंथी हैं ?) अना इन यौन अत्याचारों के बाद भी ग्रे से प्यार करती है . क्योकि स्वयं उसकी विर्जिनिटी एक ऐसी महिला ने भंग कर दी थी जो शादी शुदा थी .. और यही ग्रंथि उसके मन में घर कर गयी थी ...
अना और ग्रे का सम्बन्ध केवल कामुकता का सम्बन्ध है रोमांटिक नहीं ....ग्रे  उसके साथ अजीबोगरीब यौन क्रियाओं का अनुबंध करता चलता है जिसमें एक यह भी कि यह सब वह गोपनीय रखेगी ....इस सम्बन्ध का शिखर बिंदु वह होता है जब अना कहती है कि जिस  भी कामुक कृत्य की अति  ग्रे चाहता है  अपनी इच्छा पूरी कर ले ....यहाँ तक कि ग्रे को वह खुद अपने शरीर पर बेल्ट से मार खाने को उकसा कर कमोद्वेलित होती है ....मगर अना धीरे धीरे ऐसे सम्बन्ध से ऊबती,उकता  जाती है और इस सम्बन्ध का अंत दोनों के  स्थाई विछोह में होता है . 
मुझे नहीं लगता भारतीय पाठक इस पुस्तक को पसंद करेगें ....आशीष श्रीवास्तव ने इसके बारे में फेसबुक पर लिखा "वेस्ट आफ टाईम एंड रिसोर्सेज.. " ..और मैं भी उनसे सहमत हूँ ....वासना का इतना  भोंडा रूप हमारे मानस को तो रास नहीं आ सकता ..मगर यहाँ भी तो कान्वेंट संस्कृति ने ऐसे सांस्कृतिक आघात के द्वार खोल ही रखे हैं -हम  छात्र जीवन में  सही गलत बहुत कुछ ऐसी किताबों से सीखते हैं और चूंकि स्वभावतः मनुष्य जिज्ञासु और अन्वेषी होता है इसलिए इन्हें भी एक बार तो कम से कम आजमाना चाहता है .....और होता  अंततः वही है जो इस पुस्तक का अंत है -मोहभंग और स्थाई विछोह......आश्चर्य है उपन्यास पूरी दुनिया में कालेज छात्राओं और ३५ वर्ष से ऊपर की महिलाओं में खासकर लोकप्रिय हो रहा है .....शायद आधी दुनिया से मुझे इस पुस्तक की सिफारिश इसलिए ही प्राप्त हुयी हो ....आप से भी गुजारिश है कि बस इस उपन्यास के बारे में यह रिपोर्ट ही काफी होनी चाहिए ....डोंट वेस्ट योर टाईम एंड रिसोर्सेज ......!


गुरुवार, 2 अगस्त 2012

एक वर्षा ऋतु वर्णन ऐसा भी ......(मानस प्रसंग-9 )


वर्षा ऋतु ही ऐसी है कि कवि मन आह्लादित हो उठता है ..सुमित्रा नंदन पन्त ने लिखा,पकड़ वारि की धार झूलता रे मेरा मन ...  कवियों ने वर्षा की  फुहारों से प्रेरित अपने मन की उत्फुल्लता को अनेक भावों में व्यक्त किया है .मानस में तुलसी ने भी किष्किन्धाकाण्ड में स्वयं राम के श्रीमुख से वर्षा ऋतु का वर्णन किया है जो अद्भुत और अविस्मरणनीय   है,.  आज मानस के इसी प्रसंग के कुछ अंश आपसे साझा करता हूँ .....राम गहन जंगलों में ऋष्यमूक पर्वत पर जा पहुंचे हैं ...सुग्रीव से मैत्री भी हो चुकी है. सीता की खोज का गहन अभियान शुरू हो इसके पहले ही वर्षा ऋतु आ जाती है . वर्षा का दृश्य राम को भी अभिभूत करता है .वे लक्ष्मण से कह पड़ते हैं .....बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए .....हे लक्ष्मण  देखो ये गरजते हुए बादल कितने सुन्दर लग रहे हैं.....और इन बादलों को देखकर मोर  आनन्दित हो नाच रहे हैं ......मगर तभी अचानक ही सीता की याद तेजी से कौंधती है और तुरंत ही बादलों के गरजने से उन्हें डर भी लगने लगता है .... :-) -घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥...आखिर वे लीला ही तो कर रहे हैं ..एक साधारण विरही की भांति .....

अब बिजली चमकती है तो वे कह पड़ते हैं - दामिनि दमक रही  घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥अर्थात बादलों में बिजली ठीक वैसी ही रह रह कर कौंध रही है जैसे किसी दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं होती, बस क्षणिक सी होती है ......और लक्षमण जरा पानी के बोझ से नीचे तक आते हुए इन बादलों को तो देखो जो वैसे ही लग रहे है जैसे विद्या पाकर विद्वान और विनम्र हो जाते हैं .....और यह भी तो देखो कि वर्षा बूदों को ये पर्वत शिखर ऐसे सह रहे हैं जैसे दुष्ट जनों के दुर्वचनों को संत लोग सहज ही सह लेते हैं बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें॥....और वर्षा से ये छोटी मोटी नदियाँ तो ऐसी उफना कर बह रही हैं जैसे थोड़ा सा ही धन मिलते ही दुष्ट जन भी इतराने लगते हैं ,मर्यादाओं का त्याग कर उठते हैं . ...छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥....और लक्ष्मण  यह भी तो देखो वर्षा जल कैसे तालाबों में वैसे ही सिमटता  आ रहा है जैसे कि सदगुण एक एक कर सज्जनों के पास चले आते हैं .. समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा॥
अब वर्षा ऋतु है तो उसके अग्रदूत भला कैसे पीछे रहते ....मेढकों की टर्राहट परिवेश को गुंजित कर रही है ..राम का ध्यान सहसा ही इन आवाजों की और जाता है और वे उन्हें एक परिहास सूझता है ..कह पड़ते हैं, लक्ष्मण इन मेढकों की टर्राहट तो एक ऐसी धुन सी सुनायी पड़ रही है  जैसे वेदपाठी ब्राह्मण विद्यार्थी वैदिक ऋचाओं का समूह पाठ कर रहे हों ....दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥यह अंश तुलसी ने ऋग्वेद से प्रेरित होकर मानो लिया है जहाँ मेढकों के वर्षा ऋतु गायन पर "मंडूक" नाम्नी  ऋचाएं हैं(संवत्सरं शशयानाः ब्राह्मणाः व्रतचारिणः वाचम पर्जन्यअजिंविताम  प्र मंडूकाः अवादिशुः -एक वर्षीय निद्रा से उठकर मौन वर्ती  ब्राह्मणों की तरह ही बादलों के आगमन से हर्षित हो मेढक गण मानो  वेदाभ्यास कर रहे हों ) ..अब वर्षा ऋतु है तो जुगनू भी दिप दिप कर रहे हैं ..राम को लगता है ये तो अँधेरे में ऐसे शोभायमान हो रहे हैं जैसे दम्भियों का पूरा समाज ही आ जुटा हो .....निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥
अब भरी वर्षा हो चली है .....राम देखते हैं छोटी छोटी क्यारियाँ और नाले भी उफनाकर बह चले हैं और वे फिर हास -परिहास भरी बात कह उठते हैं -महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं॥....लो अब तो तेज हवाएं भी चलने लगीं .....और राम कह पड़े ...लक्ष्मण,तेज हवाओं से बादल उसी तरह अदृश्य हो जा रहे हैं जैसे कुपुत्र के होने से कुल के उत्तम कर्म /धर्म नष्ट हो जाते हैं ....और कभी तो बादलों के कारण ही दिन में भी घोर अन्धकार छा जाता है तो कभी उनके हटने से सूर्य निकल आता है ठीक वैसे ही जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और फिर सुसंग पाकर वापस लौट आता है -
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं॥
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग॥

मानस में  वर्षा ऋतु के अविकल पाठ के लिए आप यहाँ जा सकते हैं -यह तो मात्र कुछ संकलित अंश है .....

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