रामचरित मानस में वैसे तो काव्य के सभी रसों का यथोचित प्रवाह परिपाक हुआ है मगर करुण रस की प्रधानता है .तुलसी करुण रस का ऐसा प्रभाव संचारित करने में सक्षम हुए हैं कि रूखा से भी रुखा और निष्ठुर व्यक्ति दयार्द्र हो उठे. भारतीय मानस भी करुण रस के प्रति बहुत सुग्राही है, सहिष्णु है. यहाँ करुणा महाकाव्य तक लिखा सकती है ,चुनावों में हारते को भी जीत दिला सकती है . रामायण की रचना के मूल में करुणा है और भारत की राजगद्दी भी करुणा के जरिये हासिल होती रही है . वह चाहे राम हों या फिर गांधी परिवार करुणा के सहारे जिनकी राजनीतिक नैया पार हुयी है .इंदिरा ,राजीव के आकस्मिक कारुणिक निधन के बाद लोगों ने सत्ता थाल में सजाकर एक परिवार को सौंप दी ...कहने का आशय यह कि भारतीय जनमानस करुणा रस में सहज ही बहता आया है .....एको रस: करुण एव - संस्कृत साहित्य के एक मूर्धन्य कवि भवभूति ने भी यही कहा और अपने ग्रन्थ उत्तर रामचरितम में यही प्रतिपादित और चरितार्थ भी किया .
मेरा नियमित मानस अवगाहन जारी है और मैंने पाया है कि यहाँ तमाम अन्य काव्यगत विशेषताओं के साथ ही एक कारुणिक भाव बोध निरंतर बना रहता है -करुणा की एक अंतर्धारा सी बहती रहती है मानस में ....राम वनगमन ,दशरथ की मृत्यु ,सीता विछोह ,लक्ष्मण की मूर्छा आदि प्रसंग एक एक कर आते गए हैं और करुणा रस में पाठक को सराबोर करते हैं. तुलसी इस भाव के प्रगटन में इतने सिद्धहस्त लगते हैं कि रावण जैसे अत्याचारी की मृत्य पर भी पाठकों को करुणा के प्रवाह में बहा ले गए हैं -उस समय जब देवता जन हर्षगान कर रहे हैं ,विमानों से पुष्प वर्षा कर रहे हैं -चारो और खुशी और उत्साह का माहौल है मगर मृत्यु तो आखिर मृत्यु ही है -शत्रु या मित्र सभी के लिए सम और समान . तुलसी बड़ी ही सूक्ष्मता और कुशलता से इस भाव को लेते हैं और मंदोदरी के विलाप के जरिये मृत्यु जन्य करुणा का विस्तार करने से नहीं चूकते ....
मंदोदरी विलाप करते हुए कह रही है हे नाथ तुम्हारे बल के आगे धरती नित्य चलायमान थी (आज्ञाकारिणी बनी हुयी थी -कांपती रहती थी ) और अग्नि ,सूर्य और चन्द्र सभी निस्तेज हुए रहते थे ...और जिसका भार शेष और कच्छप भी सहने में असमर्थ थे वही शरीर आज धूल धूसरित सामने निश्चल पडा हुआ है -
तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।।
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।।
हे नाथ! वरुण ,कुबेर, इंद्र और वायु भी तुम्हारे सामने कभी रणभूमि में टिक नहीं पाए ,स्वामी, आपने तो अपने बल और प्रताप से काल और यमराज को भी जीत लिया था किन्तु आज अनाथ की तरह पड़े हुए हो ...
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा।।
भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं।।
अरे तुम्हारी प्रभुता तो जगत विख्यात थी और हाय तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियों के बल की भी कोई थाह नहीं थी मगर आज हे नाथ राम के विमुख होने से तुम ऐसी दुर्दशा को पहुँच गए कि खानदान में कोई रोनेवाला भी नहीं रहा ....
जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई।।
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।।
हे नाथ विधाता की सारी सृष्टि ही तुम्हारे वश में थी ..लोकपाल सभी तुम्हे भयभीत हो सर नवाते थे मगर आज तुम्हारा ऐसा पराभव हुआ कि सर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं...रामविमुख के साथ तो होना भी यही था .....कितनी बार मैंने आपको कहा, मनाया मगर आप तो काल के वश होकर किसी का नहीं माने और आज इस गति को प्राप्त हुए .....जगत के नाथ को भी साधारण मनुष्य मान बैठे..
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा।।
अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।।
काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।।
ऐसे कारुणिक दृश्य को देखकर राम भी द्रवित हो गए और उन्होंने मंदोदरी को दिलासा देने के लिए लक्ष्मण को भेजा .....
मृत्यु तो सभी की तय है ....तुलसी इस अवसर पर देवताओं के हर्षगान को तो दिखाते हैं मगर मृत्युलोक के इस ध्रुव सत्य से भी विमुख नहीं होते कि मरना तो एक दिन सभी को है -रावण मृत्यु के बाद महज एक निस्तेज शरीर है ....इस मृत काय से अब कैसा वैमनस्य? एक यह भी प्रबल सन्देश देने से महाकवि विरत नहीं हुए हैं कि यहाँ कुछ भी चिरकालिक, अक्षय नहीं है ..रावण सरीखे पराक्रमी का भी पराभव हुआ और वह ऐसी गति -दुर्गति को प्राप्त हुआ कि रहा न कुल कोऊ रोवनहारा ....यह एक सीख है लोगों को जो उन्हें उद्धतत्ता से रोके और विनम्र बनाए .......जय श्रीराम!
राम चरित मानस का एक महत्वपूर्ण एवं करुण प्रसंग!!
जवाब देंहटाएंसशक्त सन्देश. ग्रहण करने वालों के लिए!
जवाब देंहटाएंआपके आलेखों को पढ़कर यही प्रमाणित होता है कि किसी आनंद की अहो-दशा में मानस-पाठ जुगाली की भांति करने से अमृत और केवल अमृत ही झरता है .
जवाब देंहटाएंमंदोदरी-विलाप करुणा के बजाय अहंकार और दर्प की वास्तविक परिणति ज़्यादा बताता है.मंदोदरी को रावण के विनाश का पूर्वाभास था और वह उसकी मृत्यु के बाद अपनी ही सोच को स्थापित कर रही है.
जवाब देंहटाएं...वैसे मानस के करुणा-प्रसंगों का आज की राजनीति के प्रसंगों से कोई मेल नहीं है.तब की करूण-कथाएं न प्रायोजित होती थीं और न ही लाभकारी !
बहुत ही अच्छी पोस्ट सर |
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंजय श्रीराम|
जवाब देंहटाएंकरुणा रस एक आवश्यक रस है लेकिन एक सीमा तक ही ठीक है| सही जगह पर यह रसस्राव हो तो गुण है, वरना तो..|
करुणा पर विहंगम दृष्टि-
जवाब देंहटाएंआधुनिक काल के दृश्य भी -
प्रभावी लेख ||
जय श्री कृष्ण |
शुभकामनायें ||
जीवन से जुड़ी कई सच्चाइयों का बोध होता है इस प्रसंग में .
जवाब देंहटाएंतुलसी दास जी ने कारुणिक दृश्यों का कैसा बखूबी बयान किया है यह आप की लेखनी से ज्ञात हुआ.क्योंकि हमें तो इतनी समझ ही नहीं ,न ही भावार्थ समझने की कोशिश की.
जवाब देंहटाएंम्रत्यु शाश्वत है .मृत्यु के बाद रावन एक निस्तेज शरीर है.काश !इस सत्य को सभी पहचान कर जीवन गुजारें और व्यवहार करें तो कितनी समस्याएँ सुलझ जाएँ.
भारतवर्ष की सहिष्णुता में वाल्मिकी और तुलसी का भी योगदान है, जैसा लगता है।
जवाब देंहटाएंआपकी राम भक्ति वंदनीय है। जन्माष्टमी के दिन भी राम और तुलसी को नहीं भूले!
...जय श्री कृष्ण।
@ देवेन्द्र जी कृष्ण पर इसी ब्लाग में अन्यत्र है .....राम और कृष्ण तो एक ही चेतना के स्वरुप हैं !
जवाब देंहटाएंपढ़कर, आपके साथ साथ हमारी भी मानस यात्रा हो गई
जवाब देंहटाएंकरुणा स्वाभाविक है, करुण रस का महत्व सर्वव्यापी है, संत तुलसीदास जैसे भक्तकवि अति-प्रभावी हैं।
जवाब देंहटाएंजन्माष्टमी की शुभकामनायें!
इस करुणा प्रधान आलेख से आपकी मेहनत झलकती है !
जवाब देंहटाएंजन्माष्टमी की शुभकामनाएं !
जय श्रीराम!
जवाब देंहटाएंवैसे मंदोदरी के विचार तो सदा से ही रावण से अलग रहे हैं .....सच शायद उसे यह अनुमान था कि कुछ ऐसा ही परिणाम होगा .....
जवाब देंहटाएंमंदोदरी ने कई बार रावण को आगाह किया मगर दर्प और अभिमान ने विनाश काले विपरीत बुद्धि सा कार्य किया ...अभी सरस दरबारी जी ने अपनी रचना ने रावण के इस दर्प या मिथ्याभिमान को नई दृष्टि दी है !
जवाब देंहटाएंमृत्यु के पल करुणा उपजाते हैं , वह दशरथ रहे या रावण ...इस दृष्टि से कभी पढ़ा नहीं था .
विवेचना में व्याख्या करने के लिए आभार!
विग्यान के साथ साथ आपका अपने पौराणिक ग्रंथों के बारे मे केवल ग्यान ही नही आप उस विषय के गहन अर्थ, भाव तलाश लेते हैं।क्या करुण रस का क्षय भी होता है गाँधी परिवार के लिये ये रस कब तक बहेगा?
जवाब देंहटाएं..यह एक सीख है लोगों को जो उन्हें "उद्धतत्ता" (उदंडता ) से रोके और विनम्र बनाए .......जय श्रीराम!
जवाब देंहटाएं,विमानों से पुष्प वर्षा कर रहे हैं -"चारो"(चारों ) और खुशी और उत्साह का माहौल है मगर मृत्यु तो आखिर मृत्यु ही है -शत्रु या मित्र सभी के लिए सम और समान . तुलसी बड़ी ही सूक्ष्मता और कुशलता से इस भाव को लेते हैं और मंदोदरी के विलाप के जरिये मृत्यु जन्य करुणा का विस्तार करने से नहीं चूकते ....
भाई साहब "करुणा रस "प्रयोग अखरता है करुण ही समीचीन रहेगा वैसे भी आज "करुणा "के पास न करुणा है न "निधि "
नाम "करुणा -निधि " और काम ?कुनबा -गीरी .
बड़ी सारगर्भित नस पकड़ी है आपने भारतीय जन मानस की यहाँ सहानुभूति वोट कितनों की नैया पार लगा गई .
करुण रस का परिपाक मानस में व्यापक रूप से हुआ है आपने उन प्रसंगों को आलोकित किया है .बढ़िया आलेख और ये पूरी श्रृंखला रही है मानस की .मिश्र परम्परा के अनुरूप .
शनिवार, 11 अगस्त 2012
कंधों , बाजू और हाथों की तकलीफों के लिए भी है का -इरो -प्रेक्टिक
कारुणिक प्रसंग ..... मंदोदरी के विचार रावण से पूर्णतया भिन्न थे ...
जवाब देंहटाएंमंदोदरी विलाप उन मूढ़ों के लिये एक सच है जो मृत्यु और विनाश के बारे में सोचना ही नहीं चाहते हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब , बधाई .
जवाब देंहटाएंकृपया मेरी नवीनतम पोस्ट पर पधारें , अपनी प्रतिक्रिया दें , आभारी होऊंगा .
Nice Read...jai shree ram
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