गुरुवार, 28 अगस्त 2008

टिप्पणी अवकाश रद्द ,फौरन वापसी हो !

यह तो अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति है -तमाम चरमानंद इसके आगे फेल .मैं तो अभिभूत और थोडा हतप्रभ भी हूँ कि एक ही झोंकें में चिट्ठाजगत के कितने ही पुरोधाओं की टिप्पणी एक साथ झोली में आ टपकी .जिनसे टिप्पणी पाने को कितने ही अहकते रहते हैं .और पाकर चहक उठते हैं . दोस्तों की मनुहार और थोडा ना नुकर चल ही रही थी कि बुजुर्गों का आदेश मिला - सीमा पर वापस लौटो ,छुट्टी आवेदन रद्द! वैसे जनाब वह भी तो एक सांकेतिक हड़ताल ही थी मगर सच मानिए चिट्ठाजगत की जीवन्तता ने मुझे आत्म बोध का मार्ग दिखा दिया .यह पूरा मामला ही संदर्भीय महत्त्व का बन गया है .मैंने आपना काम संभाल लिया है और अब वक्त है टिप्पणियों के लिए आभार प्रदशन का .......
तरुण भाई की टिप्पणी पहले मिली . मुआफी चाहता हूँ दोस्त आप तक कभी न पहुँच पाने का .....आप भी कभी हमें अपने यहाँ दिखे नहीं पर आपका अवदान उल्लेखनीय लगता है -अब आपको शिकायत नही होगी .मुश्किल है आप केपरिचय पृष्ठ पर ढेर सारे चिट्ठों का उल्लेख है -कस्मै देवाय हिविषा विधेम ?अपना सक्रिय ब्लॉग बताएं !
दूसरी टिप्पणी लवली जी की थी उन्होंने मुझसे सुंदरियों का नाम बताने का आग्रह कर डाला -मैंने उन्हें बताया कि ब्लॉग लिखते समय जिन सुदारियों का नाम जेहन में था उनमें वे नहीं हैं, निष्ठुरता की इंतिहा यह देखिये कि मेरे चीत्कार पर जहाँ नामचीन हस्तियों के भी सिंहासन डोल गए लक्षित सुंदरियां अभी भी मानिनी बनी बैठी हैं .यह है नायिका का गरूब और ठसक -जिसने उर्दू साहित्य की शेरो शायरी की एक लम्बी परम्परा की नींव डाली .लवली जी आप क्यों टटपुजियाँ हों , टटपुजिये हों आपके दुश्मन और मेरे सरीखा बिना सूरत सीरत वाला ब्लॉगर .. डॉ अमर कुमार जी की टिप्पणी एक पञ्च बन कर आयी -उनकी शैली ऐसी है कि जान कुर्बान जाऊं मगर लब्बो लुआब उनकी बात का क्या होता है मेरी अल्प बुद्धि देर में समझ पाती है -सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे किस्म वाली उनकी सधुक्कडी भाषा का आस्वादन अभी हाल ही मैंने शुरू किया है -मैं यह समझ नही पाया कि वे व्यंग पर उतारू हैं या उन्होंने मेरी पीडा को स्वर दिया है !
ज्ञान जी ने बिना लाग लपेट के इस नग्न यथार्थ को रेखांकित कर डाला कि एक अपर और दूसरा अंडर क्लास यहाँ ब्लॉग जगत में भी है -अब वे रहे केन्द्र सरकार के अफसर और मैं ठहरा राज्य सरकार का एक वह कर्म्चारीनुमा अदना सा अफसर जिसकी अफसरी मौलानों -मायावियों के दौर में जाती रही और जो रोजाना ही जूतम पैजार का शिकार होरहा है और लोकतंत्र की परिभाषा पूरी शिद्दत के साथ समझ रहा है - वह सलून वाले अफसर के सामने मुंह खोल भी नही सकता .अवज्ञा की गुस्ताखी मैं कर नही सकता, लिहाजा उनकी अभिजात्य क्लास वाली बात मान ले रहा हूँ -उन्होंने कितना सुन्दर शब्द दिया प्लेबिएन -ब्लॉग जगत के दलित -कुचले लोगों के लिए -उनका 'सुवर्ण 'प्रेम प्रमाणित .
अनाम लोगों की बात को गंभीरता से क्या लेना एक भाई मुझे ब्लागिंग जगत का बोझ बताते भये हैं .अब कुछ कहूं तो वह आत्मश्लाघा की बेशर्मी हो जायेगी !
पी सी रामपुरिया जी दोस्तों के दोस्त लगे -सलाम दोस्त! जिन्होंने एक दोस्त की गुहार को सही लेटर और स्पिरिट में लिया .
नीलिमा जी ने एक और ज्यादा टिप्पणी वाले ब्लॉगर का संकेत तो किया पर बताया नही -कृपा कर बताएं !
दूसरे अच्छे वाले अनाम भाई ने यह दुरुस्त फरमाया कि टिप्पणियों से टिप्पणी करने वाले के बौद्धिक स्तर का पता चलता है
.ब्लागजगत के बादशाह अनूप जी जिनकी मैं बहुत आदर करता हूँ ( उनका रामचरित मानस का संकलन ही अकेले पर्याप्त है उन्हें आदर देने के लिए ) भी दिखे मगर मुझे अपनी एक पहले की पोस्ट को पढ़ने की सलाह दे गए जिसे मैंने पढा भी था और टिप्पणी भी की थी -देखिये बादशाह रियाया को कैसे भूलता है .
जितेन्द्र भगत जी ने अपनी व्यस्तता का विन्म्त्र्ता भरा जिक्र किया -ठीक है जितेन्द्र जी एक शब्द की टिप्पणी ही बहुत है .
मुझ पर पलट टिप्पणियाँ न करने का ग़लत आरोप लगा - बात सिरे से ही ग़लत मुड गयी -मैंने केवल प्रति टिप्पणी न करने वालों को जगाना चाहा था -मैं उन सभी टिप्पणी कारों जो मेरे ब्लॉग पर आने का अनुग्रह करते है अवश्य ही आभार प्रगट करने उन उनके ब्लागों पर जाता हूँ और कुछ अपनी पसंद के दीगर ब्लागों पर भी .यह अब सम्भव नही रहा कि कोई सब ब्लागों पर टिप्पणी करे .
उन्मुक्त जी ने बिल्कुल दुरुस्त बात कही कि टिप्पणी का टिट्टिभ रोदन हमें छोड़ना चाहिए -पर उन्मुक्त जी जब अगला पूरी निष्ठा के साथ आपके ब्लॉग पर आए दिन टिप्पणी कर रहा है तो इतनी सौजन्यता तो होनी चाहिए कि एक बार उसके ब्लॉग जाकर उसे रेसिप्रोकेट किया जाय !
समीर जी - टिप्पणी संग्राहक सम्राट जो मुझे लगे रहो मुन्नाभाई के गांधीवादी तरीके की सलाह दे रहे है ताकि जो एकाध भूली भटकी कापी राईट टिप्पणियाँ मुझे नसीब हो रही हैं वे भी उन तक चली जाय .मैं उनके बहकावे में नही आने वाला .सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने मार्के की बात कही है कि टिप्पणी की प्रत्याशा नही की जानी चाहिए .चलिए यह भी जिद छोड़ते हैं -सभी को आभार !
छपते .......छपते .....
राज भाटिया जी का भी सुझाव आ गया कि टिप्पणी के फेर में न पडा जाय ,लिखने का काम जारी रखा जाय -वही तो कर रहा हूँ सर !

बुधवार, 27 अगस्त 2008

इन दिनों मैं टिप्पणी अवकाश पर हूँ !

मित्रों ,
अभी कल ही मेरे मित्र ज़ाकिर ने आप सभी के बारे में एक उलाहना दिया कि हिन्दी चिट्ठा जगत के कई ऐसे ख्यात विख्यात ब्लॉगर हैं जिनकी तमाम पोस्टों पर वे टिप्पणियाँ करते हैं पर वे सब कभी भी ,शिष्टाचार वश भी उनके ब्लॉग पोस्टों पर टिप्पणी नहीं करते .मैं उनकी मनोदशा को समझ सकता हूँ .क्योंकि यह स्थिति अकेले वे ही नहीं बल्कि ब्लॉग जगत में कई अन्य भी जिसमें मैं भी सम्मिलित हूँ काफी दिनों से महसूस कर रहे हैं ।
आईये इस मामले की कुछ विवेचना की जाय -
१.पहले मेरी मान्यता थी कि चिट्ठाजगत में भी एक एलीट बोध है -एक अभिजात्य वर्ग है जो इस आत्ममुग्धता में जीता रहा है कि वह तो सर्वग्य है उसके जैसा तकनीकी ज्ञान और चिंतन की विराटता दूसरों में कहाँ ? बाकी तो सब लल्लू पंजू हैं -असभ्य और भदेस हैं . भले ही उनके आलेखों पर जय हो गुरू जय हो गुरू करते जाईये वे पलट कर एक बार भी आपको प्रोत्साहित नहीं करेंगे और आप के प्रत्येक जय हो गुरू पर वे यही समझते रहते भये हैं कि अभी तो यह तुच्छ जीव ऐसे ही रिरियाता रहे ,कहाँ मैं और कहाँ यह अदना सा जीव ?ऐसे ही दैन्य भाव में जब यह प्राणोत्सर्ग करने लग जायेगा तब आशीष के दो शब्द दे दिए जायेंगे .यह एक तरह से गुरुडम बनाने का उपक्रम था जो कुछ हद तक बना भी मगर अब यह लगता है कि ऐसे लोगों का भ्रम चिट्ठाजगत में निरंतर नयी प्रतिभाओं के कारण टूट रहा है .अब कुछेक को छोड़कर कई तो औकात में आ गए हैं .कुछ हताश से हो गए लगते है क्योकि जो दिवास्वप्न उन्होंने देखा था वह जल्दी ही धराशायी हो गया .अब वे सुस्त और पस्त से ब्लागजगत में किसी और करिश्में के साथ अवतरित हो रहे हैं .पर सावधान ,मानसिकता तो उनकी अभी भी वही है ।
२-व्यस्तता ,जी हाँ व्यस्तता-यह बहाना है उन्ही अभिजात्य श्रेणी के कुछ अति अभिजात्य मानसिकता वालों का .जिसे हमारे कुछ दूसरेब्लॉगर मित्र न जाने किस मुगालते में प्रभु के एक अतिरिक्त गुण के रूप में देखते भये हैं .अब भाई -बहन , यहाँ कौन व्यस्त नहीं है ?क्या उड़न तश्तरीवाले समीर भाई या फिर मानसिक हलचल वाले ज्ञान जी [इन दोनों विभूतियों के लिंक की जरूरत नही है न ?}व्यस्त नहीं हैं जो दूसरों को प्रोत्साहित करनें का कोई मौका नही छोड़ना चाहते .तो यह तो बस एक बहाना है .असल बात यह है कि ऐसी मानसिकता वाले अपना गुरुडम बनाए /बचाए रहने के प्रयास में प्राणप्रण से लगे हैं और धन्य है यह हिन्दी ब्लागजगत कि उनका निरंतर पूजन अर्चन करता जा रहा है ।
३.प्रत्युपकार हमारे वन्शाणुओं में है -यह तय है कि यदि आपने टिप्पणी करने वाले की निरंतर उपेक्षा की तो फिर आपका लेखन भले ही नोबेल पुरस्कार का हकदार हो वह टिप्पणीकार तो गया आपके हाथ से -मगर नए टिप्पणीकार जो थोक के भाव में आते जा रहे हैं -वे गुरुडम का झंडा थाम लेंगे -तो भाई कुछ हद तक तो इलीटपन बना ही रहेगा इसलिए हमें इस ओर से उदासीन होना होगा -यदि आपको ब्लागजगत में कुछ अच्छा लग रहा हो तो टिप्पणी तो अवश्य करें मगर देख लें कि यदि कोई आपकी अनेक टिप्पणियों के बाद सौजन्यता /शिष्टाचार वश भी आपकी सुध नही लेता तो भूल जाईये उसे -जब वह नोबेल पुरस्कार पायेगा तो बधाई दे दी जायेगी ।
४-यह भी एक प्रेक्षण है कि ब्लागजगत की ६० फीसदी टिप्पणियाँ अकेले उड़न तश्तरी बटोर ले जारही है ,३० फीसदी मानसिक हलचल में हविदान होती जा रही हैं शेष दस में ब्लागजगत की सौन्दर्य देवियाँ [जहाँ कथित अभिजात्य लोग भी बिना नागा अनवरत दिखते हैं -कहाँ गयी व्यस्तता ?] तो फिर बची १ प्रतिशत टिप्पणियाँ कहाँ कहाँ दिखें ? इस समस्या का कोई समाधान तो समीर भाई या ज्ञान जी ही सुझा सकते हैं ।
५.अन्तिम बात यह कि मेरे मित्रों काहें को टिप्पणी की अपेक्षा करते हो आप -अपने काम को एक मिशनरी उत्साह से करते जाईये -काम करते जाने के आनंद का अहसास करें यह सबसे बड़ा पुरस्कार है .आगे चल कर आप जब कभी पीछे मुड कर देखेंगे तो पायेंगे कि जिनकी ओर से टिप्पणी पाने को आप झ्न्खते -[यदि समीर जी सरेस शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं तो इसे भी झेलिये ] रहते थे उनमें से कई स्वनाम धन्य तो कहीं दिख ही नहीं रहे और कुछ तो अभी से फूट लिए हैं ।
ज़ाकिर और मैंने हिन्दी ब्लागजगत की इस अभिजात्य मानसिकता के प्रतिकार स्वरुप एक सप्ताह का सांकेतिक टिप्पणी अवकाश ले रखा है जिसका समय शुरू होता है ठीक अब से ......हम इस दौरान कहीं टिप्पणी नही करेंगें .अगर आप अपनी वह बेहतरीन पोस्ट लिखने वाले थे तो जरा पुनर्विचार कर लें ......यदि आपने पुनर्विचार नहीं किया तो झख मार कर हमें ही पुनर्विचार को बाध्य होना पडेगा अतः रहम माई बाप रहम !!

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

आजाद है या पराधीन भारत ?

आप सभी सुधी ब्लॉगर मित्रों को भारतीय स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं !
इस अवसर पर एक कविता के चयनित अंश भी पढ़ लें -
चले थे कहाँ से किया था क्या वादा ,
कहाँ आ गए हम ,हुआ क्या इरादा
कितने मनोरम वे सपने लगे थे ,
हुए क्यों पराये जो अपने सगे थे
बहुत ही सुखद था उम्मीदों का पलना,
हुआ जब सबेरा तो छलना ही छलना
सितारों का पाना समझा सरल था ,
बढाया कदम तो अमृत भी गरल था
शहीदों ने जिसके लिए व्रत लिया था ,
कहाँ है वो भारत जो सोचा गया था
.....................................................
सत्यमेव जयते को क्या हो गया है ,
महाकाव्य का अर्थ ही खो गया है
वोटों के खातिर जुटे हैं जुआड़ी ,
हुयी द्रोपदी आज जनता विचारी
हालत जो पहुँची है बद से भी बदतर,
कहाँ चक्रधारी कहाँ हैं धनुर्धर
................................................
अस्मिता खोता भारत ,महाभ्रष्ट भारत
आजाद है या पराधीन भारत
महाभारती का महाघोष भारत
करो या मरो मन्त्र फिर से लो भारत !
डॉ .राजेंद्र प्रसाद मिश्र
(५ सितम्बर १९४० -५ अक्टूबर १९९९)

शुक्रवार, 8 अगस्त 2008

तुलसी जयन्ती के अवसर पर ......

आज तुलसी जयन्ती है -एक महाकवि के धरावतरण का पुण्य और शुभ दिन .इस अवसर पर मेरी इस महान मेधा को काव्यांजलि -श्रद्धांजलि मेरे स्वर्गीय पिता डॉ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र की इन पंक्तियों में अर्पित है -
निगमागम वाद अरण्य में
मतमतांतर द्वेशज शर्वरी ,
विवशता बन मृत्यु रता यदा
अरुण दीप शिखा तुलसी हुए

विविध दर्शन की सलिला सुधा
प्रवाहमान निरंतर विश्व में ,
सब समाहित 'मानस 'में सदा
सुसरिता इव तीरथ राज में

सरसता समता व्यवहारिता
त्रिपथगा बन काव्य प्रदेश की
शिवम् सत्यम लोक हितैषिणी
सुरुचि सूक्ति प्रवाहित सर्वदा

सफल मानव जीवन संहिता
फलित राज व्यवस्था राम की
सुलभ तो अन्यत्र कहीं नहीं
परम सूक्ष्म विवेचन धर्म का

सुकवि श्रेष्ठ सुनायक संत से
उरिन भारत सम्भव है नहीं
सुमन वन्दित यह श्रद्धांजलि
पद नख छवि ज्योतित रज बने
स्वर्गीय पिता जी जो तुलसी के अनन्य प्रेमी थे की यह कालजयीं पक्तियां आज तुलसी जयन्ती के अवसर पर उनकी ओर से ही महान कवि को सादर समर्पित -
त्वदीय वस्तु गोविन्द तुभ्येव समर्पयामि ..........

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

आज नाग पंचमी है -आईये सापों के अतीत में झांके !

मेरी तकनीकी अल्पज्ञता से यह पोस्ट जो नाग पंचमी के दिन प्रकाशित भी हुयी थी डिलीट हो गयी जबकि इस पर सुधी मित्रों की टिप्पणियाँ भी मिली थी .....पुनः इसे यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ ताकि यह अभिलिखित रहे .अफसोस यह कि मित्रों की बहुमूल्य टिप्पणिया तो छूट ही गयीं .
भारत में थोड़े बहुत सांस्कृतिक परम्पराओं के हेर फेर से नाग पंचमी हर जगह अनायी जाती है .दरअसल यह त्यौहार सापों के प्रति हमारे भय का ही एक इजहार है .यह सावन में इसलिए भी मनाया जाता है कि इसी समय सांपो का जनन काल होने से वे बहुधा आदमी से टकराते हैं -सबसे अधिक सर्पदंश से मौते इसी समय होती आई हैं ।

मगर साँप और नाग ये अलग अलग शब्द क्यों ?अंगरेजी में तो इनके लिए बस स्नेक ही प्रचलित है ।

गीता में स्वयम कृष्ण कहते हैं कि वे सापो में वासुकि और नागों में अनंत हैं .क्या फन वाले साँप नाग हैं और बिना फन वाले महज साँप ? कोबरा को हिन्दी में नाग कहते हैं और किंग कोबरा को नागराज .ऐसी कथा है कि जन्मेजय के सर्प नाश यग्य में भी कुछ पहचान का ऐसा ही संकट उत्पन्न हो गया था जब डुन्डूभि नामक साँप ने आर्तनाद करते हुए कहा कि

"अन्य ते भुजगा राजन ये दशन्तीह मानवान ".....मजेदार मामला यह भी कि मनुष्यों में भी एक नाग वंश हुआ है .इतिहास के प्रेमी इस नाग वंश के बारे में बखूबी जानते हैं आज

भी नाग उपनाम के लोग हैं -इनका रेंगने वाले सरीसृप साँप से क्या कोई सम्बन्ध हो सकता है ? मतलब नामकरण और इतिहास का -वैसे भला कहाँ साँप कहाँ आदमी -दूर दूर का जैवीय रिश्ता भी नही है इनमे ।भारत रत्न डॉ पांडु रंग वामन काणे ने धर्मशास्त्र नामक अपने सन्दर्भ ग्रन्थ मे लिखा है कि पश्चात् कालीन वैदिक काल से ही नाग की एक पृथक मनुष्य जाति होने का वर्णन मिलाने लगता है .

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आज ही एक विचित्र रस्म निभायी जाती है -लडकियां गुडिया लेकर उन्हें संभवतः मृत समझ तालाब में फेक देती हैं और लडके रंग बिरंगे डंडों से उन्हें खूब छपाक छपाक पीटते हैं -कोई सुधीजन बता सकते हैं कि इस रस्म के पीछे क्या कहानी छुपी है ?क्या इसका नाग पंचामीं से कोई सम्बन्ध है ?

भविष्य पुराण में नागों की माता कद्रू और विनता इन दोनों बहनों का बड़ा ही रोचक किंतु क्रूरता से भरा किस्सा है -इन दोनों में ऐसी लाग डाट लगी कि कद्रू ने अपने ही बेटों को जन्मेजय के सर्प यग्य में भस्म हो जाने का श्राप दे दिया ।

सापो के भारतीय सन्दर्भों पर वोगेल की इन्डियन सर्पेंट लोर एक पठनीय पुस्तक है ।

सर्प आदि देव शंकर के आभूषण हैं तो विष्णु उन्हें शैय्या बनाए बैठे हैं -साँप समुद्र मंथन से ही हमारी साथ हैं -हमारे अनगिनत दंतकथाओं के हीरो और विलेन हैं -एक बाला लखंदर की दर्दीली दास्ताँ बंगाल लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक कही सुनी जाती है .आपने कभी सुनी बला लखंदर की किहिनी ?

मुझे तेज आवाजे सुनाई दे रही हैं -छोटे गुरू को लो बड़े गुरू को लो ........आज आप भी सर्प दर्शन मत भूलियेगा .......!

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