गुरुवार, 29 सितंबर 2011

पितरों के तीर्थ गया में (बनारस से बोध गया और गया तक की एक ज्ञान यात्रा -२)

यात्रारंभ से आगे ....
यह तो अच्छा हुआ हम बोध गया में ज्यादा देर बिना रुके पहले सीधे गया पहुंचें क्योकि कम से कम मेरे लिए तो बोध गया में रुकने और  'बोध' प्राप्ति के बाद फिर गया जाने का कोई औचित्य ही न रहता ...मेरी मित्र के पितरों के लिए श्राद्ध अनुष्ठान मंत्रोच्चार के बीच चल रहा था -इसी बीच मैंने आस पास का कुछ अन्वेषण आरम्भ कर दिया...यहाँ भी उसी चक्रवाती मानसून ने अब धावा बोल दिया था और बरसात ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे ..सूर्यास्त  नहीं हुआ था मगर अभी ही रात जैसा माहौल बन गया था ....बरसात की रात में गया और पितरों के आह्वान और ख़ास गंध वाले  धूप दीप और अगरबत्तियों ने माहौल में एक रहस्यात्मकता और भय का संचार कर दिया था जिसने  मुझ जैसे नास्तिक और अघी किस्म के मानव को भी संवेदित करना आरम्भ कर दिया था ....हजारों साल से गया (कम से कम तीन हजार वर्ष पहले से ) को पितृ -तीर्थ (पितर तीर्थ ) का गौरव प्राप्त है -यहाँ का सकारात्मक पक्ष यह है कि उस समाज में जहां आधुनिक जीवन शैली ने अपने पितरों के प्रति आदर भाव और कृतज्ञता में  निरंतर  क्षरण का काम किया है -यहाँ पितरों के प्रति श्रद्धार्पण  का एक भरा पूरा विधि विधान ही है -अनुष्ठान का शाश्वत आयोजन है -और यह सब हिन्दू जीवन दर्शन के उस प्रबल विचार की बदौलत है जिसके अनुसार आत्मा अजर अमर है ....मनुष्य देह से मृत्यु को प्राप्त होता है, आत्मा नहीं मरती ....

गया एक अति प्राचीन तीर्थ है ...और मान्यता है कि आत्मा की शान्ति और उसके  स्वर्ग /बैकुंठ तक बिना बाधा के पहुँचने के पहले उसकी  (आत्मा )  तृप्ति आवश्यक  है अन्यथा वह प्रेत योनि में पडी रहती है ....इसी प्रेत योनि से पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए यहाँ श्राद्ध कर्म को एक लम्बे अनुष्ठान के जरिये सम्पन्न किया जाता है जिसमें पितरों की तृप्ति के लिए उन्हें जौ और चावल के आटे  के बने और मधु - घी और काले तिल lसे युक्त कर छोटे छोटे गोले (पिंड ) जल सहित अर्पित किये जाते हैं और मन्त्रों से आह्वान कर  प्रेत योनि में पड़े  पितरों को बुलाया जाता है ...यह क्रिया वैसे तो बारहों माह चलती है मगर पितृपक्ष (भादव की चतुर्दशी से क्वार के अमावस्या तक -१७ दिन का विशेष मेला ) में विशेष महत्व की हो जाती है और अपार जन समूह अपने पितरों को तारने के लिए गया आ पहुँचता  है -जाहिर है यह हजारो साल से अनवरत होता आया है ....

मैं देख रहा था कि एक साथ सैकड़ों लोग   पिंड दान कर रहे थे  -मतलब अगर इसमें शतांश भी सच हो तो उस समय भी जब मैं वहां था हजारों आत्माएं  परिसर में भटक रही होंगीं  -मेरा मन खिन्न होने लगा था -जो सामने दिख रहा था और जैसा परिवेश हो गया था उस लिहाज से एक अनास्था वाले व्यक्ति पर यह सब भारी पड़ना लाजिमी था -मैं हठात उधर से ध्यान हटाकर कुछ  अन्वेषणोंन्मुख हुआ -सामने विष्णु पद मंदिर की भव्यता ने मुझे आकर्षित किया -मिथकों के अनुसार गयासुर नामक असुर के  दमन के बाद उस असुर  की ही इच्छानुसार विष्णु के पदों की यहाँ पूजा होने लगी ....और वर्तमान मंदिर तो अहिल्याबाई होलकर ने १७८० में बनवाया ....मंदिर के परिसर में भी जगह जगह पिंड दान क्रिया सम्पन्न की जा रही थी ..अजीब सी गंध चारो ओर फ़ैली हुयी थी ... 

बगल ही फल्गू नदी बह रही थीं जहाँ जाकर पिंडों का अंतिम अर्पण-निस्तारण किया जाता है .फल्गू बरसात में तो उफनाई हुयी दिखीं मगर शेष माहों में खासकर गर्मी में तो पूरी तरह अन्तः सलिला हो जाती हैं ....कहते हैं कभी राम लक्ष्मण और सीता भी यहाँ राजा दशरथ के तर्पण (तृप्ति) के लिए पिंड दान देने आये थे ..कथा है कि राम लक्ष्मण  पूजा सामग्री लेने चले गए और फल्गू के किनारे सीता जी अकेले रह गयीं ...और तभी पिंड दान का शुभ महूर्त आ पहुंचा और सीता जी ने पूरे श्रद्धाभाव से बालू का ही पिंड बना उसे राजा दशरथ को अर्पित कर दिया मगर राम और लक्ष्मण के लौटने पर लालची ब्राह्मण ने दान के चक्कर में झूठ बोल दिया कि पिंड दान तो हुआ ही नहीं -फल्गू नदी ने भी हाँ में हाँ मिला दिया .कुपित सीता ने श्राप दिया कि गया के ब्राह्मणों को दान से कभी भी संतुष्टि न हो और फल्गू  सूख जायं -यह कथा निश्चित ही फल्गू नदी की मौसमी स्थिति और गया के पण्डे -ब्राह्मणों की लालच को लक्ष्य कर किसी मनीषी ने गढ़ी होगी ... यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर श्रद्धाभाव हो तो बालू का भी पिंड दान किया जा सकता है ...श्राद्ध का अर्थ ही श्रद्धा से किया जाने वाला कार्य /अनुष्ठान है ...
विष्णु पद मंदिर में विष्णु पद 
और जगहों पर तो मैं नहीं जा पाया ...जिनकी संख्या दर्जनों हैं .मगर यहीं पास में मौजूद वैतरिणी सरोवर के बारे में सुना जिसका गरुड़ पुराण में विशेष उल्लेख है और कहा  गया है कि पुण्य  कर्मों से वंचित लोगों की आत्माएं/जीव  वैतरिणी नहीं पार कर पातीं ...पहले मैं कर्मनाशा और वैतरिणी को भूलवश एक ही मानता था मगर मेरा भ्रम यहाँ टूटा ....प्रेत शिला  और मंगलागौरी स्थल भी उल्लेखनीय हैं -मंगला गौरी वह 'शक्ति पीठ' स्थल है जहाँ विष्णु द्वारा विक्षिप्त शिव के कंधे पर पड़े दक्ष यज्ञ में झुलसी सती के मृत शरीर को कई खंडों में काट कर गिराए जाने के बाद उनका स्तन मंडल (मंगल भाग) गिरा था -यहाँ कोई जीवित व्यक्ति भी खुद  अपना मरणोपरांत का श्राद्ध भी पहले ही कर सकता है ऐसा विधान है ..अगली बार इन स्थानों को देखने की इच्छा है ..

पिंडदान अनुष्ठान 
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गया निश्चित ही एक अत्यंत प्राचीन पूजा  स्थल है जो पितरों को समर्पित है - कहा गया है -सवधा स्था तर्पणयाता मे पितृऋण(यजुर्वेद मंडल २,मन्त्र ३४)   -पितरों को तर्पण (जल आदि ) से संतुष्ट करो!पुराणों में बार बार यह उल्लेख है कि मनुष्य को बहुत से पुत्रों की इसलिए कामना करनी चाहिए कि उनमें से कोई तो गया जाकर पिता की  सदगति के लिए  तर्पण करेगा ...समय बहुत बदला है अब पुत्रियाँ भी अपने पिता और स्वजनों का तर्पण करने यहाँ  आती हैं -मेरी मित्र का तर्पण पूरा हो चला था ...हम अब बोध गया में विश्राम के लिए वापस हो लिए थे ...आज भी गावों में यही मान्यता है कि सब तीरथ बार बार ,गया गंगासागर एक बार ...पहले घोर घने जंगलों में से होकर पैदल ही लोग जाते थे ..आवागमन का साधन नहीं था ...इसलिए उम्र की अंतिम अवस्था -वानप्रस्थ में लोग इन तीर्थों के लिए जब निकलते थे तो लौट कर वापस नहीं आते थे ...और यही परम्परा बनी हुयी थी ...मुझे गया जाने वालों की बचपन की स्मृतियाँ हैं -मैंने तब भी भय और विस्मय से गया महात्म्य सुना  था  -यात्रा पूर्व के विविधता भरे आयोजनों -कर्मकांडों को देखा था और मृत्योपरांत जीवन और पितरों के  लोकों का एक खाका भी मन में उतर आया था ...जो आज स्पष्ट नहीं है ..मगर मैंने यह देखा कि मेरे अध्यावधि जीवन काल में गया -गंगासागर जाने वाले अब सशरीर स्वस्थ लौट रहे हैं.....लौटने के उपरान्त  बढ़ चढ़ भोज भात दे रहे हैं ....देखते देखते समय इतना बदल गया है .....अब गया जाने का मतलब लौट कर फिर नहीं आना नहीं है ..हम लौट कर ही तो यह वृत्तांत आपको सुना रहे हैं ...:) 

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

बनारस से बोध गया और गया तक की एक ज्ञान यात्रा -1

कभी महात्मा बुद्ध ने बोधगया से ज्ञान /बुद्धत्व प्राप्तकर  बनारस (सारनाथ ) तक उसी ज्ञान को जन सामान्य से साझा करने के लिए ज्ञान - यात्रा की थी और एक इतिहास को जन्म दिया था ....उन्ही के पदचिह्नों पर हालांकि उलटे  तरफ की यात्रा को लेकर मन में एक रोमांच था ....यही नहीं एक विख्यात शैव स्थली से घोर वैष्णवी स्थान  -गया की यात्रा कई जिज्ञासाओं को भी कुरेद रही थी ....यात्रा की तारीख पहले से निश्चित की जा चुकी थी ..मेरी एक भोपाल वासी मित्र भी साथ थीं जिन्हें अपने पितरों का श्राद्ध -तर्पण गया में करना था ...हमें २५(सितम्बर ,२०११)  की सुबह यहाँ से निकलना था -यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी थी बस भोपाली मित्र की प्रतीक्षा थी जिन्हें ट्रेन से २५ की सुबह ४.३० बजे तक पहुँच जाना था और वहीं स्टेशन  से उन्हें रिसीव कर सीधे प्रस्थान करना था ....मगर २४ तारीख से ही जो घनघोर वर्षा शुरू हुयी  कि लगा कि बादल फट गया है ...इतना पानी कि खंड प्रलय सा दृश्य उत्पन्न हो गया ..शहर जैसे डूबने लगा हो ...ट्रेन की पटरियां जलमग्न हो गयीं ...रेल यातायात ठप हो गया ..गनीमत यही रही कि मित्र की ट्रेन बनारस की सीमा में तो आ गयी थी मगर  दस किलोमीटर दूर अंगद का पाँव बन ठहर गयी थी ..उस तूफानी वर्षा और जल प्लावन से जूझते हुए किसी तरह एक  'रिस्क्यू आपरेशन ' के जरिये उन्हें ट्रेन से मुक्त कराया गया ...


वर्षा का रौद्र रूप अभी भी बना हुआ था ...मगर हमें सूर्यास्त के पूर्व गया इसलिए पहुंचना था कि 'विधि विधान' के तहत सूर्यास्त के पहले ही पिंड दान पूरा हो जाना था ...इसलिए कोई और विकल्प नहीं था इसके सिवा कि वर्षा की परवाह किये बिना प्रस्थान कर दिया जाय -हालांकि यह निर्णय लेने में भी ग्यारह बज गए. गया की दूरी बनारस से सड़क मार्ग से २७० किमी बतायी गयी थी और इसे पूरा करने में ५-६ घंटे का अनुमानित समय बताया गया ..बरसात के चलते और भी विलम्ब होने की आशंका ड्राईवर ने जताई ...बहरहाल हम चल पड़े ..बनारस में ही जी टी रोड पर जगहं जगहं इतना पानी भरा था कि  इनोवा उस पर जैसे तैर सी रही  हो और इस 'तैराकी' के लुत्फ़ में हम बनारस की सीमा को पार करने में ही डेढ़ घंटे से अधिक समय गुजार दिए ...मित्र के चेहरे पर परेशानियां उभरने लगीं थीं  ....बहरहाल हम बिहार की सीमा में प्रवेश कर चुके थे जिसका प्रमाण भी साक्षात दिखने लगा था ....बिहार की एक वाटर मार्क-पहचान आप यहाँ चेपी फोटो में पा  सकते हैं ....
बिहार -एक पहचान (फोटो सौजन्य:कार्तिकेय जैन )  

हम जितने ही पवन वेग से आगे बढ़ना चाह रहे थे तूफानी चक्रवाती हवाएं और अंतहीन हो चली बौछारें रास्ता रोकें खडीं थी.....कुछ तो मानवीय अवरोध भी थे ....पुलिसिया वर्दी में लुटेरे गाड़ियों को रोककर जबरदस्ती वसूली कर रहे थे ..घोर काले घने बादल थे ..मूसलाधार वर्षा और धुंधलके में गाड़ियों से वसूली -एक दहशतनाक माहौल -हमारी गाडी की ओर भी सशस्त्र  लुटेरे लपके बावजूद कि ऊपर नीली बत्ती थी और सारथी के बगल में गनर ऐ के ५६ लेकर बैठा था ...हम तो सहसा स्तब्ध रह गए मगर जैसे ही  उनमें से एक बन्दा और करीब आया गनर ने इशारे से न जाने कौन सा भाव -संवाद  किया कि उसके बढ़ते कदम सहसा रुके ही नहीं पीछे की ओर १८० डिग्री मुड लिए ....हम आगे बढे तो  कर्मनाशा दिखीं  -पूरी तरह से उफनाई हुयी ...पवित्र गंगा से बस ४० -४५ किमी की दूरी पर कर्मनाशा जैसी कथित अपवित्र नदीं का होना भला किस संकेत की ओर  इशारा कर रहा था बहुत बुद्धि लड़ाने के बाद भी समझ नहीं सका -कहते हैं आज भी इस नदी में कोई स्नान नहीं करता ..विश्वामित्र के तपोबल से सशरीर स्वर्ग जा पहुंचे और फिर वहां से अधोपतित त्रिशंकु के लार से बनी कर्मनाशा के मिथकीय आख्यान से भला कौन अपरिचित होगा? इस वर्जित  नदी की वैज्ञानिकता पर कोई प्रकाश डाले तो ऋणी होऊंगा ....वर्षा थोड़ी थमी तो हमारी गति और भी तेज हुई और अपराह्न दो बजे तक हम सोन नदी तक जा पहुंचे थे ...सोन  की विकरालता देख हम स्तब्ध  थे....बाद में पता लगा था कि मध्यप्रदेश के बाण सागर से बहुत ज्यादा पानी छोड़ दिए जाने से सोन अपने उग्र रूप में थी -कहते हैं इसी रौद्र रूप के धारण  करने से यह नदी नहीं नद कहा जाता है -सोन नद ..और इस पर बने ब्रिज की लम्बाई यात्रा के समय ही तत्क्षण जी पी आर एस से जांची गयी -पूरे ३.२ किमी .. ..यह अवश्य ही लम्बे पुल का कोई रिकार्ड होगा ..हमने सोन  नदी की विनाश लीला देखी ..गाँव के गाँव डूबे दीख रहे थे... मन खिन्न हो गया .....


अब लगने लगा था कि सूर्यास्त तक शायद ही गंतव्य  तक हम पहुँच सके -समय से होड़ शुरू हो गयी थी ...हमें यह नहीं पता था कि सड़क मार्ग से पहले गया आएगा या बोध गया ...एक आस थी कि गया पहले होने पर कुछ राहत मिल सकती है ..मगर पण्डे (जी ) से बात होने पर यह आशा भी जाती रही ..पहले बोध गया  था ...सूर्यास्त का समय ५.५० था ...गति और बढ़ी....४ बजे तक हम बोध गया पहुँच लिए ..लुम्बिनी होटल में डेरा था ..व्यग्र  पण्डे जी वहीं मिल गए और हम बिना समय गवाएं गया को चल पड़े ....लगभग १५ किमी की यात्रा १२ मिनट में पूरी हुई और हमारी मित्र पहले से अनुष्ठान की सर -सामग्री लिए आसनारूढ़ पंडित जी के पास ४.३५ तक पहुँच ही गयीं ..तीव्र गति से मंत्रोच्चार के बीच श्राद्ध कर्म और पिंड पारण क्रिया आरम्भ हुई .....उसे सूर्यास्त तक पूरा कर लेना था ....
जारी ....

शनिवार, 24 सितंबर 2011

एक इलाहाबादी ब्लॉगर से मुलाक़ात

वे कहने भर के इलाहाबादी  हैं, हैं बनारसी,यहीं  बनारस में शिक्षा दीक्षा हुयी और अब रोजी रोटी के चक्कर  में  इलाहाबाद में रम  गए हैं ....शिक्षा-दीक्षा के लिहाज से मैं भी इलाहाबाद का शुक्रगुजार हूँ मगर रोजी रोटी का जुगाड़ फिलहाल बनारस में है -इस तरह यह एक रेसिप्रोकल फार्मूले का रिश्ता है जो जयकृष्ण राय तुषार जी से कायम हुआ और अभी जब मैं पिछले दिनों माननीय हाईकोर्ट गया तो इस युवा रचनाकार /ब्लॉगर से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ....जहां ये राज्य विधि अधिकारी के पद को सुशोभित कर रहे हैं ...इनके दो ब्लॉग हैं सुनहरी कलम से और छान्दसिक अनुगायन  -इन दोनों ब्लागों पर एक नज़र डालते ही आप समझ जायेगें कि ये पक्के साहित्यिक ब्लॉग हैं और कई नामी  गिरामी कवि और कवयित्रियों की रचनाएं वहां आपको रसास्वादन के लिए मिल जायेगीं....

मगर मेरी ब्लॉग- मुलाकात इनसे इनके ब्लॉग पर एक संस्मरण से हुयी थी जिसमें इन्होने मेरी एक विश्वविद्यालयीय सीनिअर और अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणी शास्त्र विभाग में   प्रोफ़ेसर डॉ. अनिता गोपेश जी के विदेश संस्मरण को प्रकाशित किया था-इस संस्मरण के पढने और उस पर मेरे कमेन्ट को भी पढने की सिफारिश कर रहा हूँ ... अगर नारीवाद का मेरा कोई पहला परिचय हुआ था तो इन्ही डॉ. गोपेश जी के व्यक्तित्व से ही जो पिछली सदी  के आठवें दशक में रोबीली, एक बिंदास महिला की इमेज लिए हम सभी सहपाठियों से मिली थीं -बड़ी उन्मुक्त विचार की थीं और आज भी हैं ...मैं उनसे तब भी डरता था और आज भी डरता हूँ जबकि मुझे मालूम है मुझे वे बड़ा सम्मान देती हैं बावजूद इसके कि मैं उनका जूनियर हूँ -उस दिन भी जयकृष्ण जी ने उनसे जब मोबाईल पर बात करायी थी तो उनके बातों से उसी स्नेह-सम्मान की अनुभूति हुयी थी-मजे की बात यह कि हम घोर विज्ञान के छात्र होने के नाते उस समय यह नहीं जानते थे  कि उनका कार्य व्यवहार एक सच्चे नारीवाद का प्रतिबिम्बन कर रहा था -वह तो ब्लॉग जगत में आकर ही यह मालूम हुआ कि मैडम जी जो भी थीं या अभी भी  हैं उसी को एक सच्चा  नारीवादी कहते हैं ...उन्हें एक अतिरिक्त सलाम ..मैंने उनसे एक ब्लॉग बनाने का अनुरोध किया है और वे अगर आ गयीं तो पक्का समझिये यहाँ की कई छद्म नारीवादियों की छुट्टी हो जायेगी -सूरत और सीरत में यहाँ उनसा न कोई(उनके ऊपर-लिंकित संस्मरण पृष्ठ पर जाकर खुद देख लीजिये न ) !जयकृष्ण भाई ने मुझसे वादा किया है कि उनका ब्लॉग वे जरुर बनवायेगें -एक ब्लॉगर का वादा रहा यह! 

जयकृष्ण जी एक मजे हुए गीत/गजलकार हैं -अभी अभी ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए शहरयार साहब ने ज्ञानोदय में छपी उनकी गजल को सराहा है .मेरी दरख्वास्त है कि वे आपको उस रचना से रूबरू करायें ...अब ऐसे शख्सियत का और क्या परिचय दिया जाय. उनकी एक गजल  आपको पढवाता हूँ -

हमीं से रंज ,ज़माने से उसको प्यार तो है 

चलो कि  रस्मे मोहब्बत पे एतबार तो है 

मेरी विजय पे न थीं  तालियाँ न दोस्त रहे 
मेरी शिकस्त का इन सबको इंतजार तो है 

हजार नींद में एक फूल छू गया था हमें 
हजार ख़्वाब था लेकिन वो यादगार तो है 

गुजरती ट्रेनें रुकीं खिड़कियों से बात हुई 
उस अजनबी का हमें अब भी इंतजार तो है 

तुम्हारे दौर में ग़ालिब ,नज़ीर ,मीर सही 
हमारे दौर में भी एक शहरयार तो है 

अब अपने मुल्क की सूरत जरा बदल तो सही 
तेरा निज़ाम है कुछ तेरा अख्तियार तो है 

हमारा शहर तो बारूद के धुंए से भरा 
तुम्हारे शहर का मौसम ये खुशगवार तो है 
बहुत बहुत शुभकामनाएं जयकृष्ण जी .....

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

आज क्यों उद्विग्न मन है

 कविता का प्रणयन एक दुसह वेदना से गुजरना है ....गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इसे प्रसव वेदना की तरह माना और जानकी वल्लभ शास्त्री ने "कुंद छुरी से दिल को रेते जाने'  जैसी अनुभूति माना ...कविता में मेरी गति नहीं है ..जबकि ब्लागजगत कविताओं गजलों की एक से बढ़ कर एक नायाब अभिव्यक्तियों से भरा है ...खासकर प्रवीण पाण्डेय जी और सतीश सक्सेना जी की कवितायें/गीत  मुझे लुभाते रहे हैं ..और भी कई नए और पुराने नाम और प्रतिमान हैं ....कुछ भाव मन में आज सुबह ही आ गए जबकि मैं इलाहाबाद का अधूरा संस्मरण आज पूरा करने वाला था ..मगर यह कविता बाजी मार गयी ...इलाहाबाद अगले दिनों ...
आज क्यों  उद्विग्न मन है  
 विगत की स्मृति  घनेरी 
प्रात से ही उमड़ आयी,
रहेगी अब साथ ही क्या 
दिवस के अवसान तक?
 या कहीं यह शेष जीवन 
तक बनी अब संगिनी 
याद क्षण क्षण कराती 
प्रीति जो  अविछिन्न है  
आज फिर  उद्विग्न मन है

यदि है यही अब नियति तो 
शिरोधार्य है ,स्वीकार्य है ..
स्नेह तो था उसी का 
अब त्याग भी अवधार्य है ..
याद वह पल भी है 
जब पुलकित गात था ..
मान था सम्मान था 
नित नूतन गान था 
 आज की यह वेदना भी 
 उसी की  सौगात है.. 
 रहेगी यह साथ  पल छिन    
 आज क्यों उद्विग्न मन है?
आप के उत्साह वर्धन और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी !  

बुधवार, 21 सितंबर 2011

इलाहाबाद की अल्पकालिक यात्रा की कुछ ख़ास मुलाकातें!

संगम की नगरी इलाहाबाद जाना मेरे लिए हमेशा अतीत की पगडंडियों पर चहलकदमी करने जैसा होता है ..यादें यादें बस यादें .जो आज भी तरोताजा और खुशनुमां हैं और हों भी क्यों नहीं यह नगरी मेरे इल्म की मां है ,अल्मा मेटर है.सोच की दशा और दिशा को बदलने में इस नगरी का बड़ा योगदान रहा है.अभी उसी दिन माननीय उच्च न्यायालय में एक विभागीय पैरवी के सिलसिले में वहां गया तो एक बड़ी ख़ास मुलाक़ात से मैं रोमांचित हो उठा.जिन्हें भी उच्च न्यायालयों /सर्वोच्च न्यायालय के परिसर/ खासकर भीतर न्यायालय कक्षों के आस पास जाने का मौका मिला होगा   वे वहां की गरिमापूर्ण परिवेश से अभिभूत हुए बिना नहीं रहे होंगें.अगर सम्मान -प्रतिष्ठा/गरिमा  को कहीं मूर्तिमान बना देखना हो तो एक बार किसी भी माननीय न्यायमूर्ति  के न्यायकक्ष और वहां की कार्यवाही का अवलोकन अवश्य करें.यह जीवन के कुछ बहुत ख़ास और अलग अनुभवों में से एक है -यह शायद हमारे अवचेतन में एक उस मिथकीय धर्मराज /दंडाधिकारी की मौजूदगी के अहसास का  स्फुरण भी है जो जीवन और मृत्यु के फैसले किया करता है .....जो धर्मराज है और प्रकारांतर से वही यमराज  भी  है ....

उस  अलौकिकता की अनुभूति के बावजूद भी मैंने न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह जी से उन्ही के चैंबर में निजी मुलाक़ात का साहस जुटाया  और उनके निजी सहायक के पास जाकर मिलने की अर्जी पकड़ा दी -उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे कुछ इस तरह घूरती आँखों से देखा कि मुझे पहली बार अपने मानव प्रजाति का होने पर गंभीर आशंका उत्पन्न हो गयी -मैंने तत्क्षण खुद अपना आत्मावलोकन कर डाला और पाया कि मैं होमो सेपियेंस सेपियेंस ही हूँ,भले ही नस्ल का कुछ अंतर हो गया हो.जब सहायक महोदय अपने प्राणिनिरीक्षण का कार्य  निपटा चुके तो मैंने विनम्र बने रहने की दिशा में सारी ऊर्जा लगाते हुए अनुरोध किया कि वे बस माननीय न्यायविद महोदय को यह चिट भर दे दें बस..अगर वे मना करते हैं तो कोई बात नहीं.उन्होंने बड़ी अनिच्छा से कहा कि चिट पर 'परपजलिखिए मैंने तुरंत अनुपालन किया,लिखा "साईंस फिक्शन इन इंडिया".'आपको न्यायमूर्ति साहब जानते हैं?' "हाँ", मुझे कहना ही पड़ा ....तब कहीं जाकर कुछ अनिश्चय की सी मानसिकता में वे मेरी चिट और कुछ अन्य कागजातों के साथ लेकर न्यायमूर्ति के कक्ष में प्रविष्ट हो गए...



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अगले कुछ पल मुझे युगों से प्रतीत हुए मगर वे बस कुछ पल ही थे....बमुश्किल एक भी मिनट नहीं बीता था कि सहायक ने आकर वह उद्घोषणा कर ही दी जिसका मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था ....जाईये बुलाया है उन्होंने आपको ,और भीतर उनके उपस्थिति स्थान आदि परिप्रेक्ष्य के बारे में यह संक्षिप्त जानकारी भी कि वे निर्धारित चेयर पर नहीं बल्कि पी सी पर बैठे हैं ....लिहाजा मैंने भी इस महत्वपूर्ण सूचना के हिसाब से खुद की मनस्थिति बनाकर कक्ष में घुसा -न्यायमूर्ति महोदय कक्ष में घुसते ही दायीं ओर पी सी पर विराजमान थे..मैंने देखते ही अतिरिक्त शिष्टाचार के साथ  दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन किया ....वे उठ खड़े हुए अभिवादन का जवाब वैसे ही हाथजोड़ कर दिया ....

.हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान् और शान्तिनिकेतन के शिक्षक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने एक जगह लिखा है कि 'व्यक्ति वह महान होता है जिसके संसर्ग में आकर  किसी साधारण व्यक्ति को भी अपने महत्व का  बोध होने लगे .." उनके साथ बिताये लगभग  दस मिनट मुझे खुद को महत्वपूर्ण होने का अनुभव दिलाते रहे ...आश्चर्य मिश्रित आनंद सहसा  तब आया  जब उन्होंने हिन्दी ब्लागिंग के बारे में कतिपय पृच्छायें कीं और प्रतिवर्ष किसी एक पुरस्कार की स्थापना ,जैसे बेस्ट ब्लॉगर ....पर बल दिया और इसके लिए संस्थागत सहयोग की भी आश्वस्ति दिलाई ...मैंने उनसे अनुरोध किया है कि प्रश्नगत संस्था से मुझसे संपर्क करने को कहें ...साईंस फिक्शन पर वार्ता तो हुई ही ..वे विज्ञान कथाओं के चतुर चितेरे रहे हैं .....अभी अमेजन द्वारा प्रचारित पुस्तक साईंस फिक्शन इन इंडिया में उनका एक लेख है -'साईंस फिक्शन -द पाईड पाईपर आफ साईंस' यह लेख उनकी इस विधा की गहन और सूक्ष्म जानकारियों /पकड़ का द्योतक है ....एक न्यायमूर्ति का उनके कार्यावधि में अधिक समय लेने का दुस्साहस मैं नहीं कर सकता था ..अतः बिना मन के उठ खड़ा हुआ और इसके पहले मैं उनसे विदाई नमस्कार करता उन्होंने खुद हाथ जोड़ दिए ....एक न्यायमूर्ति से इनके निजी कक्ष में न्याय व्यवस्था से सर्वथा इतर विषय पर बात कर इतराते हुए मैं बाहर निकल फिर दुनियादारी में लग गया ....

एक और ख़ास मुलाकात अभी बाकी है .......तनिक धीरज रखिये ...

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