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सोमवार, 23 सितंबर 2013

ब्लॉगर सम्मेलनों की बहार में वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की रिमझिम!

पिछले हप्ते तो जैसे ब्लॉगर सम्मेलनों की बहार ही आ गई . एक तो काठमांडू में परिकल्पना समूह की अन्तरराष्ट्रीय ब्लागिंग कांफ्रेंस( 13-14 सितम्बर,2013), भोपाल की मीडिया चौपाल ( 14-15 सितम्बर) और फिर वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में 20-21 सितम्बर का आयोजन . एक को छोड़ मुझे दोनों में जाना था . मैंने काठमांडू में एवं अन्यत्र कुछ धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने नियोक्ता से अर्जित अवकाश के साथ अनुमति माँगी थी मगर दिनांक 12 सितम्बर तक अनुमति न मिल पाने से हमें काठमांडू की यात्रा अनिच्छापूर्वक रद्द करनी पडी . मन थोडा उद्विग्न हो गया था . कारण कि कोई कमिटमेंट होने पर मुझे उसे पूरा करने की अच्छी/बुरी आदत है . मन को तसल्ली दी चलो एक अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन छूटा तो एक और सम्मलेन इत्तफाकन अंतरराष्ट्रीय स्टेटस से जुड़ा था ... मतलब एक हप्ते में ही दो दो अंतरराष्ट्रीय टैगलाईन लिए ब्लागिंग समारोह . अब दूसरे को न छोड़ा जाय इस पर मन फोकस किया . अपने मन और जैविक -अजैविक प्रेरणाओं को टटोला -एक सात्विक प्रेरणा आखिर सब पर हावी हुई और मैं स्तरानुकूल (entitlement) न होने पर भी  तृतीय ऐ सी में यात्रा की हिम्मत कर सका -यह बात दीगर है कि भारत महान की रेल ने मुझे बधाई देते हुए जाने आने की दुतरफा यात्रा को बिना खर्च ऐ सी द्वितीय श्रेणी में अपग्रेड कर दिया -सत्कर्म के आग्रह को ईश्वर भी देखता है :-)
यात्रा लम्बी तो थी मगर यदि ट्रेनों के इंतज़ार की पीड़ा को न जोड़ा जाय तो यात्रा सुखद ही थी . अब ट्रेन से जुड़ी  साफ़ सफाई और कोच अटेंडेंट के प्रोफेसनल दायित्व की कुछ कमी रही भी तो मैं  यहाँ इसकी चर्चा इसलिए भी नहीं करना चाहता कि संघमित्रा ट्रेन प्रवीण पाण्डेय जी के अधिकार क्षेत्र की ट्रेन है जो अपनी बौद्धिक प्रखरता और एक सम्मानित ब्लॉगर भी होने के कारण मेरे आदरणीय हैं . और मन में यह भी था कि वे खुद वर्धा पहुँच रहे हैं सो उनके संज्ञान में कुछ सुझावात्मक बातें डाल दूँगा . रास्ते में कुछ पेंडिंग अकादमीय कार्यों को निपटाया . यह एक और आकर्षण है जो मुझे लम्बी ट्रेन यात्राओं के लिए उकसाता है. मुझे वर्धा के सेवाग्राम स्टेशन पर उतरना था जहाँ ट्रेन का स्टापेज मात्र एक मिनट का था और 19 सितम्बर की  शाम सात बजे  ट्रेन का वहां  पहुंचना नियत था -ट्रेन एक घंटे लेट थी ..रात हो गयी थी सो मैं ट्रेन के धीमे होने पर व्यग्र हो बार बार दरवाजे पर आ  जाता कि कहीं स्टेशन पर उतर ही न पाऊँ.  यह अतिरिक्त व्यग्रता /सावधानी उस समय  जस्टीफाई हो गयी जब  बाद में यह पता चला कि मनीषा पांडे सेवाग्राम न उतरकर आगे के दूसरे स्टेशन बल्लारशाह तक पहुँच गईं और सम्मलेन में काफी विलम्ब से शिरकत कर पाईं .
 स्टेशन पर मुझे लेने विश्वविद्यालय के मीडिया मैनेजमेंट के छात्र विमलेश पांडे को जिन्हें संकाय के डीन और मेरे पुराने घनिष्ठ मित्र डॉ  अनिल राय 'अंकित ' ने काफी सहेज कर भेजा था, आये थे . उन्होंने वैसी ही सजगता और आदर के साथ मुझे रिसीव किया और सफ़ेद झक अम्बेसडर तक मुझे मेरा सामान खुद उठाये हुए ले गए -मैंने उनसे  लाख कहा कि  मैं अभी इतना अशक्त नहीं हुआ मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी -ड्राइवर का गजानन नाम उनके मराठी होने का संकेत दे रहा था . स्टेशन से मात्र दस मिनट तक की डाईव थी -गजानन ने कहा कि क्या मैं रास्ते के साई बाबा के मंदिर को देखना चाहूँगा -क्यों नहीं? मैंने कहा!  इतना सुनते ही  लगा गजानन के मन में मेरी इज्जत बढ़  गईं और मैंने  भी उनके उत्साह को कम करना  उचित नहीं समझा था -वर्धा का साईं मंदिर साफ़ सुथरा था -साईं कृपा -सबुरी लिखा था -सबुरी का मतलब क्या था यह  उत्कंठा मन ही में रह गयी -कोई बतायेगा?
 भव्य नागार्जुन सराय
रात साढ़े आठ बजे विश्वविद्यालय कैम्पस में प्रविष्ट हुए -रात होने के बाद भी वह काफी सुन्दर सा और आमंत्रण देता लगा -फादर कामिल बुल्के गेस्ट हाउस से होते हुए कार जब आगे बढ़कर मुडी तो सामने नव निर्मित नागार्जुन सराय दिखा --जिसे एक अनुपम सौन्दर्य बोध , क्लासिकी और आधुनिकता के  ठेठ ठाठ से संवारा गया है . विशाल फाईबर के पारदर्शी गेट सामने पहुंचते ही अपने आप खुले -इस सराय के लिए कोई खुल जा का सूत्र नहीं था -सबके लिए स्वागत -हर आगत का स्वागत . रिसेप्शन पर एक गतिशील युवा था -आदर से नाम पूछा -और सामने की सूची  पर दृष्टि दौडाने लगा -और मैं भी लगभग उसी तीव्रता से सूची पर निगाह दौडाई -मेरा नाम कम्प्यूटर से प्रिंट दिखा ....अरे अरे यहाँ हाथ से लिखा अनूप शुक्ल का भी नाम दिखा -मेरे साथ? मन में तुरंत कौंधा कि यह तो शरारत हो गयी -मैंने सूची पर फिर सायास नज़र दौडाई -दिखा कि अनूप जी का नाम प्रवीण पांडे जी के साथ कमरा संख्या  206 के सामने  प्रिंट है जिसे हाथ से काटकर मेरे साथ किया गया है ! इन दो प्रत्यक्ष अलग मानसिकताओं -एक व्यंग चेतना संपन्न तो दूसरा वैज्ञानिक चेतना संपन्न को को कौन एक साथ रखने की महत्वाकांक्षा पाले हुए था? -धीरे से पता लगाया तो सम्मलेन के कर्ता धर्ता सिद्धार्थ जी का नाम उद्घाटित  हुआ? एक तीव्र विचार प्रवाह कौंधा -ये सिद्धार्थ जी आखिर चाहते क्या है? दो ध्रुवों को एक साथ करना -एक म्यान में दो तलवारें? खैर यह पता लगते ही कि महानुभाव शुक्ल जी को अगले दिन आना है -एक रात मुझे परवरदिगार ने बख्श दिया था -शेर कौंधा -मुद्दई लाख चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुद होता है :-)
 नागार्जुन सराय प्रांगण -साफ़ सुथरा और स्निग्ध
जल्दी ही खाने की बुलाहट आ गयी . ट्रेन के खाने से ऊबा मैं सुस्वादु खाने पर जम  गया . खाना खाने के बाद बाहर ठंडी हवाओं के रुमान का अहसास कर ही रहा था कि सिद्धार्थ जी का सलामती जिज्ञासा का फोन आ  गया और यह फरमान भी कि चिर परिचित वाईस चांसलर साहब के साथ सुबह साढ़े पांच बजे मुझे परिसर की प्रदक्षिणा यानि मार्निंग वाक पर निकलना था -थोड़ी देर में सिद्धार्थ जी आये भी मगर मैंने अनूप प्रसंग को जानबूझ कर नहीं छेड़ा - मामला गंभीर था और मुझे कोई फुलप्रूफ रणनीति बनानी थी ......मैंने इस बात को हठात दबाते हुए सुबह वी सी साहब के साथ मार्निंग वाक  की अपनी अनिच्छा जताई! सोचा तब तक कहीं कोई रणनीति नहीं बन सकी तो? ,दूसरे अल्लसुबह घूमने का आलस्य भी तारी हो रहा था .......
 चित्र सौजन्य: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
जारी है ......


शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

पैतृक आवास पर मनाई दीवाली ..शुरू हुई बाल रामलीला!

 पैतृक  आवास मेघदूत जो वाराणसी लखनऊ मार्ग एन एच 56 (जौनपुर) पर है.

कल जौनपुर स्थित अपने पैतृक  आवास से दीवाली मना कर लौटा -मगर यहाँ तो बिजली गायब ,फोन का डायल टोन गायब ,ब्राडबैंड कनेक्शन नदारद ..लगा कहीं सुदूर अतीत में आ पहुंचे हों ...बिना अंतर्जाल के जुड़ाव से यह दुनियाँ सहसा कितना बदरंग हो जाती है इसका अनुमान आपको होगा ही ...जैसे तैसे रात कटी ..आज का पहला काम बी एस एन यल आफिस में शिकायत और फिर कहीं से आप सब से जुड़ने की जुगाड़ .... .अब  इसमें सफल हुआ हूँ...
 बाल रामलीला टीम
..सोचा था विस्तार से ग्राम्य दीवाली की चर्चा करूँगा मगर अब यह संभव नहीं दीखता ...हाँ कुछ चित्रों और उनके विवरणों को जरुर साझा करना चाहता हूँ -हमारा कोई भी त्यौहार सच पूछिए तो बच्चों का ही होता है ..उनका उत्साह देखते बनता है ....घर पहुँचते ही बिटिया प्रियेषा और बेटे कौस्तुभ तथा अनुज मनोज के बेटे आयुष्मान और बिटिया स्वस्तिका ने गाँव भर के बच्चों की दिवाली की टीमें तैयार की -कोई कंदीले बनाने में जुटा तो कोई दीयों और मोमबत्तियों को संभालने में तो कोई आतिशबाजी संजोने में .....
 सीता(आस्था ) श्रृंगार में जुटी प्रियेषा

 लेत उठावत खैंचत गाढे काहूँ न लखा रहे सब ठाढ़े ...धनुषभंग बाल राम (आयुष्मान ) द्वारा
मैंने एक नयी शुरुआत कराई .बाल रामलीला की ....और बाललीला टीम का आडिशन,पात्र चयन ,संवाद अदायगी आदि का काम दीवाली के दिन ही रिकार्ड ४  घंटे में पूरा किया गया ..मेरी मदद में आयीं गाँव की ही होनहार छात्रा कीर्ति मिश्र ..उन्होंने निर्देशन का काम संभाला ..शाम को बाल रामलीला की एक नयी परम्परा ही शुरू हो गयी ...दृश्य था सीता स्वयम्बर का ..बच्चों ने ऐसी अभिनय प्रतिभा दिखाई कि लोग बाग़ बाग़ हो उठे और वाह वाह कर उठे ....बच्चों में अपनी संस्कृति और संस्कारों के प्रति प्रेम -झुकाव  आज के इस विघटन के युग में बनाए  रखना भी एक बड़ी जिम्मेदारी है ....पश्चिम की आंधी में हमारा बहुत कुछ बेहद अपना भी दूर होता जा रहा है ....अंगरेजी में कहा ही जाता है "कैच देम यंग " मतलब जिन संस्कारों की नीवें गहरी करनी हो उसके लिए बच्चों से ही शुरुआत होनी चाहिए ..अभी तो यह हमारी यह विनम्र शुरुआत ही है आगे इसके विस्तृत स्वरुप की संभावनाएं हैं .....

 मनोज ने विधिवत संपन्न कराई लक्ष्मी पूजा
आतिशबाजी हमारी एक सुन्दर सी प्राचीन कला है जिसमें विज्ञान के साथ  ही कलात्मकता का अद्भुत मिश्रण है..हम तो आतिशबाजी के बड़े वाले पंखे(फैन) हैं  ..सो एक आतिशबाज को ही पिछले साल से पड़ोस में बसा लिया गया है और उसे इस अवसर पर आर्डर देकर आतिशबाजी का प्रदर्शन करने को बुलाते हैं ..हम आतिशबाजी पर लिखने  लगेगें तो यह पोस्ट कम पड़ जायेगी....बस इतना ही कि बड़े आईटमों से बच्चों को दूर रखते हैं और तेज आवाज के पटाखे हम नहीं छुडाते ....बाकी तो स्वर्गबान ,चरखी ,राकेट ,अनार आदि का तो प्रदर्शन होता ही है -हमने इस बार भी आतिशबाजी का खूब आनन्द लिया ..बच्चों ने खूब तालियाँ ठोंकी और गला फाड़ कर चिल्लाए ...बड़ा  आनंद आया ....
 दीवाली पर दुल्हन की तरह सजा हमारा पैतृक आवास मेघदूत

दीवाली का एक मुख्य कार्यक्रम है देवी लक्ष्मी की पूजा से जुड़ा  अनुष्ठान जिसकी जिम्मेदारी मनोज ने निभाई ....और उन्होंने सभी को प्रसाद का वितरण किया ..हम लोगों के यहाँ एक मान्यता यह भी है कि हर हुनर और क्षेत्र के लोगों को दीवाली के दिन अपना काम भले ही अंशतः लेकिन करना  जरुर  पड़ता है ..जिससे साल भर उसमें कोई विघ्न बाधा न उत्पन्न हो ..बच्चों को किताब खोलना ही पड़ता है .अकादमियां का आदमी कुछ जरुर पढ़ लिख लेता है ... हम सभी ने  कुछ न कुछ बतौर शुभ करने को  अपना अपना इंगित काम किया ....इसी मान्यता के अंतर्गत रात में चोर लोग कही हाथ भी साफ़ करते हैं -इसलिए दीवाली की रात इधर चोरियां भी बहुत होती हैं .....हमने तो कुछ सामान जानबूझ कर मैदान में छोड़ भी दिया था मगर दुःख यह हुआ कि किसी ने उन्हें छुआ तक नहीं ..जाहिर है लोग दीवाली जगाने में भी अब लापरवाही बरत रहे हैं :) 
 आतिशबाजी आसमानी

घर को सजाने में भी बाल टीम जुटी रही ...और बाल रामलीला के कलाकारों के  मेकअप को बेहद कम समय  के बावजूद प्रियेषा ने निपटाया......मेरे शंखनाद से बाल रामलीला शुरू हुई..मैंने मुख्य दृश्यों के समय रामचरित मानस के सुसंगत अंशों का सस्वर पाठ भी किया ...काफी ग्राम्य जन जुट आये थे इस नए अचरज को देखने सुनने ...अगले वर्ष से इस कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप देना है ....प्रियेषा को दिल्ली जल्दी लौटना था इसलिए हम दीवाली के दूसरे दिन जिसे यहाँ जरता परता कहा जाता है और जिसमें कहीं आना जाना निषेध भी है ..यहाँ लौट आये हैं ....और झेल भी रहे हैं ..


और यह रही इस बार की रंगोली जो प्रियेषा और स्वस्तिका ने मिल बैठ  बनाई 


रविवार, 10 जुलाई 2011

हिन्दी ब्लागरों के जन्मदिन का महोत्सव

सचमुच यह एक अति विशिष्ट मौका है  ...अपने एक  सर्वप्रिय ब्लॉग पर पांच सौंवी पोस्ट अब से बस कुछ और पलों  की मुन्तजिर है.... एक इतिहास ...ब्लागेतिहास लिखा जाने वाला है ...यह मौका है एक उस शख्सियत के नेक कामों की पुरजोर प्रशंसा और कृतज्ञता ज्ञापन की जिसने ब्लागिंग के मायनों को एक नया आयाम दिया और एक सामाजिकता की नई पहचान दी ....

यह शख्सियत और कोई नहीं बल्कि अपने बी एस पाबला जी हैं जिन्होंने ब्लॉग के जरिये लोगों की सामाजिकता की अभिव्यक्ति का एक मंच दिया, लोकप्रिय ब्लॉग ,'हिन्दी ब्लागरों के जन्मदिन ' के रूप में जहाँ केवल जन्मदिन ही नहीं वैवाहिक वर्षगांठों का  भी सेलिब्रेशन हुआ और आज अर्धरात्रि से इस पर पांच सौवीं पोस्ट आने को मचल उठी है ...यह एक महोत्सव का अवसर है ...

लोगबाग कहते हैं ,कुछ दिलजले भी कह उठते हैं कि ब्लागिरी नाते रिश्तेदारी की जगह नहीं है ..यहाँ केवल मुद्दे उठाना चाहिए ...मुद्दों पर बात चीत होनी चाहिए .आज ही एक मोहतरमा मुझसे प्रत्यक्षतः   कह रही थीं कि उनका लेनादेना बस ब्लागिंग से है ब्लागरों से नहीं ..जबकि ब्लागरों के जन्मदिन वाले ब्लॉग पर उनका भी जन्मदिन और एनिवेर्सरी सेलिब्रेट की गयी और केवल उन्ही की क्यों ऐसे तो सैकड़ों हैं ! भला मानव से उसकी मानवीयता और सामाजिक सरोकार पृथक किये जा सकते हैं? ...चलिए यह मौका उलाहनों का नहीं एक बड़े अवसर को सेलिब्रेट करने का है ...

आईये पाबला जी को बधाईयों से सराबोर करें ....उनकी सामाजिकता का गौरव गान करें ताकि हम खुद मानव होने की अर्थवत्ता को मूर्तमान कर सके ....अपनी खुद की सार्थकता का आह्वान कर सकें! 
लांग लिव 'हिन्दी ब्लागरों के जन्मदिन' 
लिखते लिखते 
यह पोस्ट प्रकाशित हो ही रही थी कि पाबला जी ने एक स्वचालित वेबसाईट लांच कर देने की 
घोषणा की है जो ब्लागरों की एक समग्र डायरेक्टरी की कमी को भी पूरा करेगी ..
हम मुरीद हुए आपके पाबला जी ! 


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