मंगलवार, 25 जून 2013

वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

अभी पिछले दिनों जब मैंने फेसबुक पर एक अपडेट किया तो अनुमान नहीं था कि उसका एक खौफनाक  परिणाम सामने आ जाएगा .अविनाश वाचस्पति जी को लगा कि वह अपडेट मैंने उन पर किया है और उन्होंने अपने ब्लाग्स को हमेशा के लिए ब्लाक कर दिया और मात्र फेसबुक पर बने रहने की घोषणा कर डाली। पहले तो आप मेरे उस अपडेट को पढ़ लें और चाहें तो एक नज़र आई टिप्पणियों पर भी डाल लें। वह कमेन्ट यूं था " एक हिन्दी ब्लॉगर ने डिजिटल मीडिया से शोहरत हासिल की और इस टटकी शोहरत को अब प्रिंट मीडिया में कैश कर रहे हैं -मजे की बात यह कि प्रिंट मीडिया में अपने छपे आलेखों को फिर से डिजिटल मीडिया में मित्रों से साझा कर रहे हैं मानो यह धौंस देना चाह रहे हों कि देखो तुम लोग लल्लू ही बने रहे और मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया ....ये उनकी आत्म विस्मृति के दिन हैं -एक दिन लौट के आना यहीं है! वैसे दोस्तों की मेहरबानी से अभी पूरी तौर से यहाँ से गए भी नहीं हैं ! बूझिये कौन ?"
दिनेश द्विवेदी जी ने अपनी प्रतिक्रिया यूं व्यक्त की थी -"ब्लागिंग में बहुत तरह के लोग आए और आते रहेंगे। बहुत वे भी हैं जो सरोकार और प्रतिबद्धता का अर्थ नहीं समझते। बहुत लोग हैं जिन के लिए अपना नाम चित्र अंतर्जाल पर लिखा, अखबार में छपा देखना और मौका लगे तो दो-चार सौ रुपए रोज बना लेना ही सरोकार और प्रतिबद्धता है। आप तो ब्लागरों की कहते हैं। अखबारों के कथित कालमों के कलमघिस्सू बनने के लिए बहुत से अच्छे  कलमकार बरबाद हो चुके हैं......जिस दिन ब्लागिंग का झण्डा एडियाँ उचका उचका कर ऊँचा किया जा रहा था। हम तब भी जानते थे कि एडियाँ उचकाने वाले जल्दी ही ब्लागिंग से भाग सकते हैं। वैसे भी वे ब्लागिंग के जरिए किताबों अखबारों की दुनिया में प्रवेश कर रहे थे। उद्देश्य तो किताबों और अखबारों की दुनिया ही था। जो लोग अपने ब्लागों के अखबारों में छपे अंश को ऑस्कर की तरह अपने ही ब्लाग पर लगा रहे थे उन से भी यही अपेक्षा थी और है। क्यों कि उन के साध्य का साधन ब्लागिंग बन रही थी।"
पता नहीं आप मित्रों में से कौन अभी भी फेसबुक पर आबाद नहीं हुआ है मगर फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी  पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि मैं उन्हें दोष नहीं देता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को  आंक नहीं पाए थे जबकि मैंने इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का  ध्यान आकर्षित किया था। आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ....

सचमुच फेसबुक की अब ब्लॉग से कोई तुलना ही नहीं रह गयी है .यह अलग बात है कि मुझ जैसे कई ब्लॉगर अभी भी अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे  हुए हैं -अब जैसे मुझे तो अभी भी किसी के लौट कर आने का शिद्दत से इंतज़ार है -जिससे यहीं पहली मुलाक़ात हुयी थी तो यह मेरे लिए मुक़द्दस जगहं है -मैं कयामत तक उनका यहीं इंतज़ार करूँगा! अब अनूप शुकुल वगैरह यहाँ क्यों टिके हुए हैं यह तो वही जानें अन्यथा अब इस पुराने शुराने माध्यम में रखा ही क्या रह गया है। वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं! 

बहरहाल यह  हेतु नहीं था इस पोस्ट का ..मैं एक दूसरी बात कहने आया था। दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं   .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर  लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते! हाँ अगर मुद्रण माध्यम कुछ मानदेय आदि दे रहे हों तो बात कुछ समझ में आती है। मगर इसके लिए ब्लॉग लेखन को तिलांजलि दे दी जाय बात समझ में नहीं आती .हम केवल चंद  पैसों के लिए तो यहाँ नहीं आये थे और यह बात मैंने तभी कही थी जब गुजश्ता  ब्लागिंग काल के त्रिदेवों में से एक आर्थिक सम्पन्नता के बाद भी ब्लागिंग से कमाई का जरिया ढूंढते नज़र आते थे . 
पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर  लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। 
मित्रों आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ -यह काउंटर प्रोडक्टिव है! आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

शुक्रवार, 21 जून 2013

काश कोई कृष्ण आज भी होता!

गोवर्धन पर्वत का मिथक याद है आपको? कृष्ण ने कैसे गोकुल वासियों की अति वृष्टि (क्लाउड बर्स्ट ?) से रक्षा की थी ! कृष्ण अन्वेषी थे, बचपन में खिलाड़ी कृष्ण ने खेल खेल में ऐसी कोई सुरक्षित कन्दरा खोज ली होगी जहां आपात स्थिति में कम से कम लोगों की जान बच सके! और वे सफल हुए -जन स्मृतियाँ इसी घटना को मिथक के रूप में हजारों साल से सजोये हुए हैं! मगर यह कितना शर्मनाक है कि अति वृष्टि के अंदेशे के बावजूद भी हम अपार जनहानि को रोक पाने की कोई आपात व्यवस्था नहीं कर पाए -और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इतनी प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी जनहानि हमारे लिए शर्म की बात है! माना कुदरत के आगे हम विवश हो जाते है मगर जो कुछ उत्तराँचल में घटा है उससे तनिक भी आपको लगता है कि निरीह दर्शनार्थियों के जान माल के रक्षा की कभी कोई भी कवायद हुई होगी? आपदा प्रबंध की कोई तैयारी तक नहीं थी! सब असहाय निरुपाय काल के गाल में समा गए . हादसे का न तो पूर्वानुमान था और अगर था भी तो एक लापरवाह बेहयाई के चलते जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अनहोनी घटित हो गई !आज उत्तराखंड सरकार निश्चित रूप से कटघरे में खडी है और अपनी इस गैर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायेगी .काश हम अपने मिथकों से ही कोई सार्थक सीख ले पाते!
हे कृष्ण बहुत आई तुम्हारी याद !

सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
भांपा है और उनका दावा  है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं . हमें ऐसी हरकतों से आगाह होना होगा और समय रहते इनकी काट भी वजूद में लानी होगी!
एक और बात जिस पर हमें गंभीरता से ध्यान रखना  होगा वह है हमें ईश्वर को अपने अन्तर्मन में तलाशना होगा . भक्तजनों के लिए तो ईश्वर कण कण में विद्यमान हैं . हम घर बैठे क्यों नहीं ईश्वर का ध्यान करते? ऐसा प्रायः हो रहा है कि धार्मिक स्थलों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं .अभी पिछले कुम्भ में भगदड़ से लोगों की मौतें हुयी थी .अब हमारी जनसंख्या इतनी बढ़ गईं कि धर्म स्थलों पर आ जुटने वाली भीड़ को संभाल  पाना बहुत चुनौती भरा है .इन हादसों से मिलने वाले सबक में एक यह भी है कि हम घर में अपना मंदिर मस्जिद गुरद्वारा बनाएं . ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है खुद को मौत के मुंह में इस तरह झोंक  देना . आज कोई कृष्ण नहीं है बचाने वाला! 

रविवार, 16 जून 2013

भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं!

पितृ दिवस पर एक मित्र ने कुछ चुटीला सुनाया ...पत्नी ने अतिरिक्त प्यार का इज़हार करते हुए पति से पूछा कि अजी ये सत्य और विश्वास में क्या फर्क है? पति विद्वान था इस फर्क को समझता था मगर उसके सामने चुनौती थी कि वह किन शब्दों में और कैसे पत्नी को यह फर्क समझाए कि उसे आसानी से समझ में आ जाय . सहसा उसके चेहरे पर एक कूट मुस्कान तैर गयी ..उसने जवाब दिया -
"सुमुखि, अब ये सोनू और मोनू तुम्हारे बच्चे हैं यह तो सत्य है मगर ये मेरे बच्चे हैं यह मुझे यह विश्वास है" :-)
 
पितृत्व को लेकर इतिहास में कितने ही विवाद दर्ज हैं.यद्यपि मातृत्व से भी जुड़े मसले हुए हैं मगर उनका निपटारा आसान रहा है . राजा ने बच्चे की दावेदारी को झगड़ रही  माताओं के लिए फैसला सुनाया कि बच्चे के दो टुकड़े करके आधा आधा हिस्सा दोनों को दे दिया जाय ...वास्तविक माँ चीत्कार कर उठी "मुझे नहीं चाहिए बच्चा ,इसे ही दे दिया जाय " ..और राजा ने इसी माँ को बच्चा सौंप दिया . हो गया फैसला और बिल्कुल सही भी! मगर पितृत्व के दावे बड़े जटिल होते रहे . जिनका शर्तिया निपटारा डी एन ऐ फिंगर प्रिंटिंग टेकनिक की मानो बाट जोह रहा था .पिछले शताब्दी के आख़िरी दशक में यह तकनीक लोकप्रिय होनी शुरू हुई और अब तो पूरी दुनिया में पितृत्व /मातृत्व के निपटारे के लिए यही सबसे विश्वसनीय तकनीक है जिसे ज्यादातर देशों में कानूनी मान्यता भी प्राप्त है . अपने यहाँ भी कई मामले इसी तकनीक ने सुलझाये हैं तंदूर से तिवारी काण्ड तक!

अपने देश के पितृ-सत्तात्मक समाज में पिता की महिमा तो जग जाहिर है . यहाँ जीवन के बाद के जीवन में भी पिता का महात्म्य बरकरार है .एक पूरा आधा महीना ही पितृ-पक्ष कहलाता है और एक ख़ास दिन पितृ विसर्जन . मातृ पक्ष की कोई व्यवस्था नहीं है -एक दिन भी नहीं! भला हो पश्चिमी जगत का कि अब पितृ और मातृ दिवस दोनों का वजूद है . मजे की बात यह है कि पितृ विसर्जन दिवस तो है मगर हमारे यहाँ पिता अपने जीवन काल में प्रत्येक दिन पूज्यनीय और प्रातः स्मरणीय हैं किसी एक दिन नहीं -हाँ उनके दिवंगत होने के बाद भी वंशज उन्हें साल में कभी तो याद करलें इसलिए पितृ-पक्ष की व्यवस्था की गई .पश्चिमी दुनिया में तो पिता जीते जी ही परित्यक्त और बिसरा उठते हैं इसलिए कम से कम एक दिन तो उनकी याद सम्मान का हो इसलिए ही यह फादर्स डे का विचार वजूद में आया -मगर जब हम इसका हिन्दी तर्जुमा करके पितृ-दिवस कहते हैं तो मुझे तो पितृ विसर्जन का बोध हो उठता है .

यह संस्कृति का फर्क है . यहाँ पिता रोज पूज्य हैं वहां दैनंदिन उपेक्षित पिता के लिए बस एक दिन मुक़र्रर है! मगर अब हम भी पश्चिम के अन्धानुकरण में तेजी से लगे हैं -अपने मूल्य हमें पिछड़ेपन के द्योतक लगते हैं और फादर्स डे जैसे विचार आधुनिकता के .....हम तेजी से अपने जड़ों से कट रहे हैं -नयी पीढी फेसबुक पर जोरशोर से फादर्स डे मना रही है . काफी भावुक है .....मैंने उन्हें यह कहकर समझाया भी कि ....अरे अरे ....मित्रों इतना भाव विह्वल भी मत हो जाईये ..भई यह पितृ दिवस ही है पितृ विसर्जन दिवस नहीं —

मंगलवार, 11 जून 2013

भारतीय समाज की विवशताएँ!


पहले तो मैंने इस पोस्ट  के लिए भारतीय समाज की विडंबनाएं शीर्षक चुना था .मगर विचारों के प्रवाह में सहसा सूझा कि जिन्हें मैं विडंबनाएं समझ रहा हूँ दरअसल वे हमारी विवशतायें हैं . हम तमाम अंधविश्वासों में मुब्तिला हैं . आज भी किसी को 'छोटी माता' ( चिकन पाक्स ) के निकलने पर मनौती मानी जाती है, कुछ " अंगऊ" (दैवीय सत्ता को समर्पित करने के लिए अग्रिम के रूप में नगदी सोना या कोई भी सम्पदा को सहेजना ) निकालते  हैं और शीतला माई के मंदिर तक भागे जाते हैं . बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा नहीं देते .चाहे वह अभिव्यक्ति की हो या शिक्षा की या  निर्णय की स्वतंत्रता ...हम झूठी मान मर्यादा के लिए आनर किलिंग जैसे नृशंस कृत्य तक उतर आते हैं . ऐसे अनेक मौजूदा परिदृश्य हैं जो  आज की इस तार्किक दुनिया में क्या किसी विडम्बना से कम है? मगर हम इस परिदृश्य के मूल कारणों की अगर पड़ताल करें तो भारतीय समाज की विवशताएँ उजागर होती हैं और मन पीड़ा से भर उठता है. 
हमें कई समस्याओं के उदगम को समझने के लिए अपने अतीत में जाना होगा?आखिर गलती  कहाँ हुई और हम कहाँ सांस्कृतिक लिहाज से एक सभ्य समाज नहीं बन पाए . पहले तो वर्ण व्यवस्था जो स्वभावगत कर्म के आधार पर लोगों के कार्य विभाजन को मान्यता देती थी कालांतर में जन्म आधारित जाति को जन्म दे गई
समाज की कथित "ऊंच " और "नींच" जातियों का वजूद स्थापित होता गया . .आज भी यह कितना हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कितने ही ब्राह्मण आज भी जनेऊ और चुटिया को ही ब्राह्मणत्व का प्रमाण मानते हैं . आज इस  दुर्भाग्यपूर्ण और अवैज्ञानिक सामाजिक संरचना को अब तो राजनीतिक संबल मिल गया है .एक पार्टी जो ब्राह्मणों को जूते मारने के उद्घोष से सत्ता में आयी थी अब उसी सत्ता को संभालने के लिए ब्राह्मणों का चरण चुम्बन कर रही है . मतलब अब जाति व्यवस्था और भी स्थापित हो गयी . इस जातिगत व्यवस्था को तोड़ पाना आज की एक बड़ी चुनौती और विवशता है . कभी समाजिक मार्गदर्शकों ने इस जातिगत व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए "ऊंच " और "नींच" जातियों के बीच 'रोटी और बेटी " के सम्बन्ध का आह्वान किया गया था . मगर आज यह आह्वान अपना दम ख़म खो चुका हैं। 
अब इससे कौन इन्कार करेगा कि तमाम विकासोन्मुख योजनाओं के बावजूद भारत में भयंकर गरीबी हैं ,अशिक्षा है और स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है . और इसके साथ /बावजूद भी मान मर्यादा और 'इज्जत' के  मूर्खतापूर्ण विचार हैं . लडकी घर की 'इज्जत' है अगर उसके साथ कुछ हुआ तो एक गरीब विपन्नता के बोझ  से जो पहले से ही कराह रहा है 'इज्जत' गवाने का एक अतिरिक्त बोझ भला कैसे उठा सकता है ? लिहाजा वह बेटी/बेटियों की स्वतंत्रता का बचपन से ही गला घोटने लगता है . 
न जाने इस दहेज़ व्यवस्था का  उद्भव कब से हुआ मगर इस आर्थिक संघात ने भी बेटियों की स्थिति को कमजोर बनाया है . एक वह देश जो नारियों का दर्जा देवी देवताओं के बराबर देता था आज नारी को  समाज के निचले पांवदान पर उतार चुका  है। आज 'इज्जत' और दहेज़ का भय एक बड़ी विवशता बन चुका है. हद तो यह है कि किसी दूसरी जाति के साथ प्रेम या विवाह भी जातिगत कथित सम्मान पर भारी पड़ता है .आज भी शादी -व्याह को जातिगत बंधन से मुक्त नहीं किया जा सका है -जबकि विभिन्न जातियों में अंतर्विवाह से वंश की सबलता के प्रामाणिक 'जीनिक ' कारण मौजूद हैं . 
यौन कुंठाओं की तो पूछिए मत .आज बच्चों और युवाओं से बढ़कर प्रौढ़ों को यौन शिक्षा की जरुरत है -यह भी एक भयमूलक कारण है जो लड़कियों को लड़कों सदृश स्वच्छन्दता देने से रोकती है . बड़े -बूढों द्वारा सेक्स के प्रति बनाए गए सामाजिक परिवेश में लड़के और लडकियां दोनों ही यौन -कुंठित हो तमाम यौन अपराधो में संलिप्त हो उठते हैं . मेरा मानना है एक वर्जनाहीन समाज में यौन अपराध कम होंगें! चिकित्सा सुविधाओं /शिक्षा का घोर अभाव और निर्धनता आज भी लोगों को बीमारियों के इलाज के लिए ओझा -सोखा और देवी माता के पास ले जाने को विवश करता है . अब ये सारे परिदृश्य हमारे भारतीय समाज की विडंबनाएं हैं या विवशताएँ इसका निर्णय आप ही करें! लगता है भारतीय समाज का पुनर्निर्माण अब असंभव हो चला है !


रविवार, 2 जून 2013

जीवन की गुणवत्ता

मनुष्य कैसा जीवन जी रहा है और उसे कैसा जीवन जीना चाहिए इस प्रश्न का जवाब धर्म और दार्शनिकता के नज़रिए से दिया जाता रहा है . और भी कई नज़रिए हो सकते हैं . धर्म की बात करें तो जीवन के चार मूल लक्ष्यों/ पुरुषार्थ की कसौटी पर मानव जीवन की सफलता असफलता आंकी जाती रही है -ये हैं धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष . इनका उचित अर्जन ही मनुष्य के जीवन की सफलता मानी गयी है . इनमें भी मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है मगर राहत की बात है की मोक्ष की धारणा काल्पनिक ही है . चार्वाक ने कहा कि मृत्यु ही मोक्ष है -और इस अवधारणा की समझ को सरल कर दिया . महात्मा बुद्ध की माने तो मानव जीवन के मूल में दुःख ही दुःख है और मनुष्य के जीवन का बड़ा अभीष्ट सुख की प्राप्ति है .जब जीवन दुःख भरा है तो निश्चित ही मृत्यु मोक्ष से कम नहीं . कवी ने भी कहा है निर्भय स्वागत करो मृत्यु का यह है एक विश्राम स्थल .यहाँ कवि जीवन की आपाधपी और कष्ट की अनुभूति को ही उजागर कर रहा है .
यह युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा सजाया संवारा जा रहा है . आज प्रौद्योगिकी ने मनुष्य की सुख सुविधा के कितने ही इंतजाम किये हैं . आज अल्प काल मृत्यु के मामले बहुत घट गए हैं मनुष्य की सामान्य आयु बढी है . कई रोग बढे हैं तो कई लाईलाज रहे रोगों पर नियंत्रण भी कर लिया गया है ,बड़ी माता और तावन जैसी बीमारियाँ छू मंतर होगई हैं . प्रसव मृत्यु दर काफी कम हुयी है . यात्राएं आसान हो गयी हैं .दो जून का भोजन एक बड़ी आबादी को उपलब्ध है . अगर सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को हम सही कर पाए तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को और भी सुखमय कर देगी .. हो सकता है रामराज्य का हमारा चिर कालिक स्वप्न भी साकार हो जाय -अल्प मृत्यु नहिं कवनऊ पीरा सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा ....मगर शायद हम सुख का एक सीमित अर्थ लगा लेते हैं -भौतिक सुख सुविधा को ही हम सुख मान लेते हैं! आध्यात्मविदों की बात हमें यहाँ सच लगती है कि सुख कहीं बाहर नहीं वह तो भीतर हैं अंतर्मन में है -उसकी खोज बाहर नहीं भीतर होनी चाहिए! और यह पूरा विषय ही आध्यात्म का हो जाता है ,
तो क्या बेशुमार धन दौलत ही सुख का आधार है . जाहिर तौर पर तो यही लगता है . मगर मैंने देखा है कि गाँठ के पूरे कितने लोग छदम बाबाओं पीरों की शरण में जा जैसे तैसे कमाए धन को लुटाते रहते हैं .पक्के अन्धविश्वासी हैं . हर पल डरते रहते हैं कि उनका वैभव कहीं भरभरा न जाए . क्या यह सुखपूर्ण जीवन है ?. हमारे पुरखों ने कितने ही सुनहले नियम बनाये हैं जिन पर चल कर हम भले ही सुखद कम मगर एक सार्थक जीवन जी सकते हैं . मगर अब वे नियम कहीं खो गए जल्दी मिलते नहीं .कोई पूछता भी नहीं . सार्थक जीवन के जो कुछ मूल मन्त्र थे उनमें दया ,परोपकार ,सत्य के प्रति आग्रह आदि थे. और ये मूल्य हैं . किसी विद्वान ने कहा है कि उपलब्धियों से भरे जीवन की अपेक्षा हमें गुणवत्ता पूर्ण जीवन को ज्यादा तरजीह देना चाहिए . पर यह जीवन की गुणवत्ता कैसे बढ़ायी जाय?
मेरे मन में यह प्रश्न कौंधता रहा है। और दैनंदिन जीवन में मिलने वाले लोगों को देख समझ कर तो यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस होती है कि जीवन जो बहुत दीर्घकालिक नहीं होता और फिर भी हम एक अंधी दौड़ लगाये हुए हैं में गुणवत्ता का समावेश कैसे हो सके ....आपके कुछ विचार हो तो साझा करें -हम उन विचारों को अगली पोस्ट में संश्लेषित कर प्रस्तुत कर सकेगें . आप भौतिक समृद्धि के अलावा जीवन में किन और चीजों को वरीयता देगें या दे रहे हैं ? आप खुद के जीवन को कितना सार्थक मानते हैं ? आपने कोई ऐसा काम अब तक किया है जिसकी कोई उत्तरजीविता हो? यानी जिसे लोग याद कर सकें? और नहीं तो कब करेगें समय तो पंख लगाये उड़ता ही जा रहा है ?क्या हमें खुद का जीवन जीना ही भारी लग रहा है? क्या हम सचमुच इतना असहाय हो गए हैं ? इस भूलभुलैया से निकलना मुश्किल सा हो गया है ?आपके लिए ये प्रश्न उत्तर देने में सहायक हो सकते हैं!

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