बुधवार, 31 दिसंबर 2008

आइये नव वर्ष का रिजॉल्यूट (resolute – कृतसंकल्पीय) विचार मन्थन करें।(शीर्षक वाक्य साभार - ज्ञानदत्त जी .)

आज अल्लसुबह ज्ञान जी ने नववर्ष संकल्प लेने की सुधि दिलाकर सहसा ही भय का संचार किया कि अरे मैंने भी तो नव वर्ष का सकल्प लेना है( यह मैंने वाली स्टाईल व्याकरणीय दृष्टि से ग़लत है इस पर ध्यान दें ! )और समय कितने तेजी से बीत रहा है ! तो मैं भी क्यूं न फटाफट कुछ संकल्पों को यहाँ गिना दूँ (जो वस्तुतः मैंने ले रखे हैं ) -ताकि सनद रहे और जावाबदेही (ख़ुद के प्रति ) भी तय हो सके .पहले तो यह स्वीकारोक्ति कि अभी दशक डेढ़ दशक पहले तक मुझे भी नववर्ष सकल्प लेने देने की कोई जानकारी या प्रतिबद्धता नही थी ! दरअसल यह पश्चिम और अंगरेजी संस्कृति का अनुष्ठान है .हम मौन संकल्प लेने के अभ्यस्त रहे हैं और वहाँ इसे शोर शराबे के साथ लेने का रिवाज है .अब चूंकि मैं भी मध्यमार्गी बनता जा रहा हूँ अतः थोड़े मौन और थोड़ी मुखरता के साथ अपने ये नववर्ष संकल्प आपसे साझा करता हूँ , प्लीज ध्यान दें ,मैं गंभीर हूँ -
तो ये रहे मेरे नववर्ष संकल्प और यथावश्यक संक्षिप्त व्याख्या -
१-साईब्लाग पर अभी भी लंबित पुरूष पर्यवेक्षण यात्रा को पूरी करना जो पिछले वर्ष का ही एक संकल्प था लेकिन "ओबियस "कारणों से पूरा न हो सका ।
२-इस ब्लॉग पर चिट्ठाकार चर्चा में कम से कम दो दर्जन विख्यात /कुख्यात चिट्ठाकारों की खबर लेना -यह ख़ुद को भी चर्चा में बनाए रखने का एक आजमूदा नुस्खा है और बेशर्मी की सीमा तक आत्मप्रचार का जरिया भी .कौन अपने को व्यतीत /विस्थापित हुआ देखना चाहता है ? पर मैं जानता हूँ कि मेरा यह क्यूट सा ,प्यारा प्यारा सा मासूम चिट्ठाजगत मेरी इस धृष्टता की नोटिस नही लेगा .इससे मुझे एक फायदा यह भी होगा कि नए और नामचीन दोनों किस्म के चिट्ठाकार मेरे अदब में रहेंगे .कौन इस नश्वर जग में प्रशंसा नही पाना चाहता ? पर इसी आम मनोवृत्ति की आड़ लेकर मैं लोगों कीअपने नजरिये से खिंचाई का मौका भी नही छोडूंगा -संदेश -अपना आचरण संयमित रखें !
५-नारी ब्लागों के प्रति सहिष्णुता बरतूंगा और उनकी विजिट करूंगा और पूर्वाग्रहों को त्याग कर टिप्पणियाँ भी करूंगा ।
६-चार्ल्स डार्विन जिनकी यह (२००९) द्विशती है पर एक श्रृंखला साईब्लाग पर करूंगा ।
७-साईंस ब्लागर्स असोशियेसन की एक मीट वर्षांत तक करा सकूंगा ।
८-विज्ञान कथा के अपने नये संग्रह को प्रकाशित करूंगा और कुछ कहानियां अपने इस विषयक ब्लॉग पर पोस्ट करूंगा ।
९-कुछ पुराने प्रेम प्रसंगों की याद करूंगा और उनके पुनर्जीवित होने की संभावनाओं की टोह लूंगा और कुछ नए संभावनाओं का भी उत्खनन करूंगा -यह मैं बार बार कहता हूँ कि जीवन को सहज बनाए रखने के लिए कुछ रागात्मकता और मोहबद्ध्ता बेहद जरूरी है -आप माने या न मानें ! मेरी इस बात को मेरे कुछ पुरूष मित्र तो थोड़े ना नुकर के बाद मान भी लेते हैं (कितने सहिष्णु हैं वे !) पर महिलायें बहुत कंजर्वेटिव(बोले तो असहिष्णु ) हैं- इस बात /मामले में . काश मैं भी अपने कुछ नामचीन मित्रों की भांति विदेश जीवन जी रहा होता तो तस्वेदानिया फिल्म के क्षणों को भी जीने का सहज ही सौभाग्य मिल जाता !
१०-ब्लागिंग की गतिविधि को थोड़ा संयमित करूंगा ताकि जीवन के दूसरे पहलुओं के साथ न्याय कर सकूं ।
११-तस्लीम पर पहेलियाँ बुझाता रहूँगा !
यह ग्यारह की संख्या शुभ है और ज्यादा भी क्यों इन्हे पूरा भी तो करना है .
आप सभी को नववर्ष मंगलमय हो !

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

दिनेश राय द्विवेदी जी -एक असाधारण चिट्ठाकार !

आईये इस असाधारण चिट्ठाकार को लेकर आपसे कुछ अनौपचारिक सी चर्चा आज हो ही जाय .औपचारिक प्रोफाईल तो आप यहाँ देख ही सकते हैं जो किसी को भी सहज ही प्रभावित करता है -मैंने इन्हे ख़ास तौर पर अनवरत पढ़ कर और इनकी टिप्पणियों को पढ़ पढ़ कर अनवरत जाना समझा है .द्विवेदी जी बहुत ही अध्ययनशील ,विनम्र व्यक्तित्व के धनी हैं. क़ानून और लोक जीवन ,संस्कृति तथा परम्पराओं पर इनकी पैनी नजर है और इन विषयों पर इनकी प्रोफेसनल दखल है .मैं इनके ज्ञान से तब चमत्कृत रह गया था जब साईब्लाग पर चल रहे पुरूष पर्यवेक्षण की अगली कड़ी का भी इन्हे पूर्वाभास हो जाता था .मैं दंग रह जाता था की अपने प्रोफेसन से भी इतर विषयों पर इनका इतना व्यापक अध्ययन है .एक मजेदार वाक़या है -मैं खल्वाट खोपडी के कई जैव व्यावहारिक पक्षों की चर्चा शुरू कर चुका था और इस सन्दर्भ में जाहिर है दिनेश जी भी संवेदित हो रहे थे और उनकी संवेदना का इंट्यूशन मुझे भी हो रहा था और इसे लेकर मैं थोडा असहज हो चला था -आश्चर्यों का आश्चर्य की इन्होने मुझे मेल करके हरी झंडी पकडा दी कि " मुझे पता है कि आप अब गंजे लोगों के बारे में उस अध्ययन का हवाला देने वाले हैं जिसके मुताबिक गंजेपन और सेक्स सक्रियता में समानुपातिक सम्बन्ध देखा गया है " मैं स्तब्ध रह गया ..जब ऐसी विज्ञ ,अधयनशील विभूतियाँ हिन्दी चिट्ठाजगत में मौजूद है तो फिर इसके भविष्य के प्रति सहज ही आश्वस्ति का भाव जगता है .तब से मैंने इनका लोहा मान लिया और पूरी गंभीरता और एक सहज आदर भाव से इन्हे लेने लगा ।
इनकी नही पर मेरी ही एक खामी है -मैं कुछेक बातों को लेकर अचानक असहज सा हो जाता हूँ -बोले तो शार्ट टेम्पेर ! और लाख चाहते हुए इस दुर्गुण से मुक्त नही हो पा रहा .अब जैसे कोई किसी प्रायोजित मामले को सायास उठा रहा हो ....किसी मंतव्य को लेकर -महज अपना उल्लू सीधा करने के लिए आपको बना रहा हो या फिर जो सहज नही है ऐसा आचरण कर रहा है .तो मैं ऐसे क्षणों में तुरंत असहज हो जाता हूँ .और ऊट पटांग कह देता हूँ .बाद में पछताता भी हूँ -मेरी यह समस्या यहाँ के आभासी जीवन में भी बनी हुयी है .निश्चय ही द्विवेदी जी ने अपनी कुछ टिप्पणियों पर मेरी प्रति टिप्पणियों का दंश सहा होगा मगर बड़प्पन देखिये कि उन्हें भी निहायत सजीदगी और शिष्टता से ग्रहण कर लिया .-कुछ उसी लहजे में कि 'ज्यो बालक कर तोतर बाता ,सुनहि मुदित होयं पितु माता "
मैं यह देखता हूँ कि मेरे उनकी उम्र में बस यही कोई बमुश्किल दो साल का अन्तर है पर अनुभव ,ज्ञान और गंभीरता में मैं उनके आगे कहीं भी नही दिखता -इससे मुझे कोफ्त भी होती है -नाहक ही अब तक का जीवन वर्थ में गवा डाला !
बहरहाल यह भी तो बता दूँ कि मुझे द्विवेदी जी की किन बातों से आरम्भिक चिढ /खीज हुयी थी जो निसंदेह अब नही है .उनका नारियों के प्रति अधिक पितृत्व -वात्सल्य भाव का प्रदर्शन ! यह सहज ही होगा पर मुझे यह असहज लगा है -एक तो नर नारी की तुलना के प्रसंगों से मैं सहज ही असहज हो जाता हूँ और मेरा स्पष्ट /दृढ़ मत रहा है और उत्तरोत्तर मैं इस पर और दृढ़ ही हुआ हूँ कि नर या नारी में कोई किसी से कम या बेसी नही है उनके अपने सामजिक -जैवीय रोल हैं और उनके अनुसार वे दोनों फिट हैं -मगर ब्लागजगत में इस मुद्दे को लेकर भी झौं झौं मची रहती है और इनसे जुड़े मुद्दों पर द्विवेदी जी सदैव एक ही पक्ष की ओर लौह स्तम्भ की तरह खड़े दिखायी देते हैं .अरे भाई हम भी बाल बच्चे वाले हैं और कभी भी घर आकर देख महसूस लीजियेगा कि अपने दूसरे हिस्से के प्रति मेरा भी कितना सम्मान समर्पण है .इसे कहने और दिन्ढोरा पीटने से क्या होगा ? (यह वाक्य द्विवेदी जी को लेकर नही है )
नारी ब्लॉगों ने इन मुद्दों को लेकर जो धमा चौकडी मचाई है कि ब्लॉग जगत असहज सा हो गया है बल्कि अब तो यह असहजता स्थायी भाव लेती जा रही है .मगर दाद देनी होगी द्विवेदी जी की कि इन वादों पर क्या मजाल कि वे कभी नारी झंडाबरदारों को भी आडे हाथों लें कि क्या उधम मचा रखा है तुम लोगों ने ? पर नहीं बड़े बुजुर्ग होकर भी इन्होने उन्हें सदैव शह दिया है ,देते रहते हैं और अब तो इन्ही के कारण ही मैं भी मुंह बंद कर चुका हूँ .क्योंकि निसंदेह द्विवेदी जी की इन मामलों की समझ और देश के क़ानून का ज्ञान मुझसे कहीं बहुत अधिक है -इसलिए कहीं अपने में ही कुछ ग़लत, कुछ अपरिपक्व मान कर चुप लगा बैठा हूँ ।पर मैं इनके इस व्यवहार से असहज जरूर रहता हूँ .और बराबर ऐसयीच सोचता हूँ कि "साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय सार सार को गहि रहे थोथा देई उडाय ! "तो क्या कहीं द्विवेदी जी सार के साथ थोडा थोथा भी रख लेते हैं -यह तो पञ्च भी बताएँगे ? तो क्या राय है आपकी पंचों ?
तो अभी तो द्विवेदी जी पर चर्चा की इस पहली पारी को विराम देताहूँ ! और सोचने लगता हूँ कि अगली शख्सियत कौन होगी ? कोई हिन्ट ??

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

मेरे प्यारे ताऊ ! चिट्ठाकार चर्चा -3

मैंने बहुत सोचा विचारा -ख़ास दोस्तों से सलाह मशविरा किया और तय पाया कि क्यों न अपने ताऊ को ही इनीशियल एडवांटे (कांसेप्ट सौजन्य :ज्ञानदत्त जी ) दे दी जाय .और अभी तो यह चिट्ठाजगत आर्यपुत्रों{संदर्भ :अनूप शुक्ल जी एवं कविता वाचकनवी जी ) से भरा है सभी इस जद में आ ही जायेंगे देर सवेर ,मगर इन दिनों तो ताऊ की चांदी है - किसकी हिम्मत है जो इस दुर्धर्ष सृजनशील व्यक्तित्व को अनदेखा कर जाय .ताऊ तो छा चुका चिट्ठजगत में ! और अगर अब भी कोई इस शख्सियत को हलके फुल्के ले रहा है तो उसे सावधान हो जाने की जरूरत है .इन पर कवितायें लिखी जा रही है -यह चिट्ठाकार ख़ुद भी कवितायें लिख रहा है और विनम्रता (?)भी ऐसी कि उस कविता को लेकर उद्घोषणा कि उक्त कविता तो ठीक किसी और से (एक कविता से ही ) कराई गयी है -उसके तो बस टूटे फूटे अल्फाज भर ही हैं ! नही नही इस शख्स यानी अपने ताऊ को बिल्कुल हलके फुल्के नही लिया जा सकता ।वैसे मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि यदि कोई अचानक कविता वबिता लिखने लगे तो समझिये उसी किसी से -स्वकीया या परकीया से प्यार हो गया है .पर ताऊ बिचारे की यह हिम्मत कहाँ ? कोई लट्ठ लिए हरवक्त उसके पीछे है ! हार्ड लक ताऊ !!
ताऊ आए ,उन्होंने चिट्ठाजगत को देखा भाला और बस छा गए ! और सच बताऊँ आज अगर यहाँ कोई लोकप्रियता की वोटिंग हो जाय तो समीरलाल जी भी शायद एक दू वोटों से हार ही जायेंगे और यदि काउंटिंग में कुछ आर्यपुत्र भी शामिल हुए तो कहिये कि ताऊ के आगे समीर जी को हरा न दिया जाय ! मुख्य कारण यही है कि ताऊ की विस्तृत हौसला- आफजाई टिप्पणियों के आगे समीर जी की चंद शब्दीय टिप्पणियों से भला कौन खुश है -केवल मुझे छोड़कर ! तो मित्रों मेरी गुजारिश है कि इस ताऊ नाम्नी सज्ञां शक्ति को अब बहुत गंभीरता से लेने का वक्त आ गया है -ई महराज का अभी केवल टिप बाहर (टिप बोले तो मुंडी ! ) दिखा है बाकी आठ नौ हिस्सा तो इन्होने अभी जाहिर ही नही किया है .और शायद मुंडी भी नही -क्या चिम्पांजी किसी मनुष्य का चेहरा बन सकता है ?ये भी चिट्ठाजगत में -प्रत्यक्षतः गुमनाम बने रहना चाहते हैं पर उन्मुक्त जी की तरह मनसा वाचा कर्मणा नही - कोई उन्मुक्त जी ऐसा पाषाण ह्रदय हो भी कैसे सकता है -प्रशंसक हथेली पर जान लेकर न्योछावर करने को उद्यत हों और कोई झलक तक ना दिखलाए -पर ई अपना ताऊ इतना अनुदार नही है -वह एक सीधा सादा भावनाओं से भरपूर ताऊ है ,लोगों की इज्जत करना जानता/चाहता है और थोड़ी अपनी भी इज्जत की साध है -बिल्कुल भी तटस्थ या उदासीन नही है इसलिए आभासी दुनिया से बाहर आकर भी चाहने वालों को फोनिया फोनिया कर अपना सही अता पता बता चुका है -मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ताऊ के पास आभासी जगत के जितने लोगों का फून नंबर होगा ,किसी के पास भी नही होगा .सबजिंदगी से कट रहे लोग हैं -अब जैसे मेरे पास ही केवल दो चार फोन नंबर है लोगों के -लुगाईयों का तो बस एक ही नंबर ! हाय !! पर अपने ताऊ के पास किसी भी का नंबर लेना हो वहा मौजूद है !आप सभी गाँठ बाँध लें -शेष जीवन मजे से गुजारना है तो थोड़ी मोह्बद्ध्ता की गुन्जायिश जीवन में बनाए रखें ,थोडा ही सही ताऊ बन जायं ! कुछ इश्क विश्क करें -अब अमिताभ जब इतनी उम्र में अपनी उम्र से इतना नीचे गिर कर यह सब कर ले रहे हैं तो आप क्यों नही ? क्या कहा ? वो अभिनय है -तो मैं कहाँ कह रहा कि आप सच्ची मुच्ची किसी लफडे में पड़ें ! अब ताऊ भी ऐसा कोईसचमुच का लफडा कहाँ पाल रहा है -उसे भी तो ताई की लट्ठ का डर है ! तो तय पाया कि अपना ताऊ एक मस्त मौला इंसान है और जीवन्तता से लबरेज है पर है बड़ा जालिम भी -ये कई और खुराफाते नेट पर कर रहा है पर मुझे गोपनीयता की शपथ है इसलिए नही बता पा रहा .पर सावधान जरूर कर दूँ आपसभी को- इस शख्स को हलके मे लिया आपने तो गए !
ताऊ दोस्तों का दोस्त है -अपने साईब्लाग चिट्ठे पर जब मैं नारी सौन्दर्य का अवगाहन कर रहा था और आभासी जगत की आभासी जूतियाँ चप्पलें खा रहा था तब वे ताऊ ही थे जो एक लौह ढाल बन आ गए मेरे फेवर में ! ताऊ की मेरी दोस्ती तभी की है और अब तो बहुत प्रगाढ़ हो चुकी है -बस दांत काटी रस्म रह गयी है -एक तो यह आभासी जगत है दूसरे उनसे वास्तविक भौगोलिक दूरी भी काफी है ! पर हमराज हम फिर भी हैं .बस उन्हें यह नही बताया कि मैं उन्हें इनीशियल एडवांटेज (या डिसएडवांटेज ! ) देने जा रहा हूँ -भडकना मत ताऊ -मैं तुझ पर अपना हक़ समझने लगा हूँ इसलिए यह प्रलाप कर डाला हूँ .अब अंत में देखिये ताऊ अपने बारे में क्या कहते हैं -
अब अपने बारे में क्या कहूँ ? मूल रुप से हरियाणा का रहने वाला हूँ ! लेखन मेरा पेशा नही है ! थोडा बहुत गाँव की भाषा में सोच लेता हूँ , कुछ पुरानी और वर्त्तमान घटनाओं को अपने आतंरिक सोच की भाषा हरयाणवी में लिखने की कोशीश करता हूँ ! वैसे जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज मे लेने वालों से अच्छी पटती है | गम तो यो ही बहुत हैं | हंसो और हंसाओं , यही अपना ध्येय वाक्य है | हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं ! ब्लागिंग का मेरा उद्देश्य चंद उन जिंदा दिल लोगों से संवाद का एक तरीका है जिनकी याद मात्र से रोम रोम खुशी से भर जाता है ! और ऐसे लोगो की उपस्थिति मुझे ऐसी लगती है जैसे ईश्वर ही मेरे पास चल कर आ गया हो !
पर मित्रों इन चिकनी चुपडी बातों में मत आना -इनमे बहुत सी बातें आप को भरमाने वाली हैं -आप ख़ुद समझें कि ताऊ किस फेनामेनन का नाम है ! क्योंकि अब यह किसी भी चिट्ठाकार के वश की बात नहीं कि वह ताऊ को सिम्पली इग्नोर कर सके .ताऊ चुके हैं और छा चुके हैं !

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

अथ श्री चिट्ठाकार चर्चा -कुछ स्पष्टीकरण !

अंगरेजी की वह मशहूर कहावत है न कि मूर्ख वहाँ तक बेधड़क चले जाते हैं जहाँ विद्वान् जाने के पहले कम से कम दो बार सोचते हैं -सो मैंने भी ऐसी ही करतूत एक सनक में कर डाली और चिट्ठाकार चर्चा छेड़ दी ! पहली चर्चा में जाहिर है मेरे प्रिय कन्टेम्पोरेरी क्लासिक ब्लागरों- सारथी के शास्त्री जी और उन्मुक्त जी जो कई बात व्यवहार में दो विपरीत ध्रुव् सरीखे हैं का ही उल्लेख होना था और वे मेरे बेसऊरपने की जद में आ ही गए ! बहरहाल ,उस पोस्ट पर जो टिप्पणियाँ आयी उससे मेरी आँखें अकस्मात खुल गयीं ! मैं कोई बड़ा तीर नही मारने जा रहा था -अनूप शुक्ल जी ऐसी वैसी चर्चाएँ n जाने कब की कर के छोड़ चुके हैं और वह भी बहुत सुरुचिपूर्ण तरीके से ! अब वे भी ठहरे एक पुरातन-चिर नवीन /चिर प्राचीन जमे जमाये चिट्ठाकार और कभी कभी तो लगता है कि यहाँ ब्लॉग जगत की कितनी बातें उन्ही से शुरू हुयी हैं और वही जाकर विराम /पनाह मांग रही हैं .और एक प्रयास यह भी है जो चिट्ठाकार चर्चा ही है हाँ थोडा चिट्ठा और चिट्ठाकार का घाल मेल जरूर हैं यहाँ पर ,पर है तो यह चिट्ठाकार चर्चा ही.
पिछली पोस्ट पर मित्रों ,सुधीजनों की इतनी उत्साहजनक टिप्पणियाँ आयीं कि मैं सहसा ही गंभीर हो गया कि लो यह मुआमला तो गले ही पड़ गया -लोगों को मुंह दिखाने लायक काम चाहिए -कोई कैजुअल वैजुअल चर्चा नही लोग बिजनेस मांगता है ,फिर कुछ टिप्पणियों ने तो दिल पूरी तरह बैठा ही दिया -रचना जी ने इतने गर्मजोशी से इस विचार को लिया और उत्साह्भरी प्रतिक्रया दे डाली कि मैं थोडा अचकचा सा गया कि कही कोई गलती तो नही हो गयी -क्योंकि वे मुझे पहले एक बार तगडे हड़का चुकी हैं -अब बेसऊर बुडबक सीधे साधे गवईं मानसिकता वाले मनई को कोई एक बार जम के हड़का ले तो उससे तो वह आजीवन हड्कता रहता है .और जी में संशय भी बना रहता है कि फिर ससुरा कउनो लफडा न हो जाय -इसलिए उनकी सकारात्मक टिप्पणी को भी मैं सशंकित सा ही देखता रहा .फिर कुश भाई ने सहज ही पूंछ लिया कि मैंने चिट्ठाकार चर्चा के बाबत कुछ योजना तो बनायी होगी ! अब तो मैं पूरी तरह अर्श से फर्श पे आ गया .ऐसी तो कोई योजना मैंने वस्तुतः बनायी ही नही थी ,वह तो एक सहज आवेग था बस बह चला -मगर आज का युवा तो प्रबंधन युग का है -कुश के इस सहज से सवाल ने मुझे और भी असहज बना दिया .हिमांशु जी ने भी कुछ अपनी अवधारणा प्रगट की और कहा कि मैं लोगों के प्रोफाईल से भी कुछ मैटर उडाऊं .डॉ अनुराग जी ने निष्पक्षता की आकांक्षा की , लावण्या जी ने बकलम ख़ुद की ओरइशारा कर इस दिशा में पहले से हो रहे उल्लेखनीय योगदान की ओर ध्यान दिलाया .
अब मेरा पशोपेश में पढ़ना लाजिमी ही हैं न मित्रों /आर्यपुत्रों ? क्या करुँ ,कैसे करुँ ? अब करुँ भी या न करुँ ! और करुँ भी तो किस किस की करुँ ? कस्मै देवाय हविषा विधेम ?? यहाँ तो एक से बढ़ कर एक हैं ? नर पुंगव ! पिशाच और भूत वैताल तक भी ! भूत भावन भी हैं तो भूत भंजक भी ! परम ज्ञानी हैं, केवल ज्ञानी हैं तो अपने ज्ञानदत्त जी भी हैं !
लेकिन मैं मैदान छोड़ कर भागने वाला भी नही हूँ -बोले तो आई ऍम नोट ए क्विटर ! आप सभी विद्वतजनों के विचार सर माथे .मगर अपनी भी एक बात कहनी है -कहनी क्या दुहरानी भर है कि ब्लॉग तो अपनी निजी डायरी है और अंततोगत्वा इसके नियम कायदे तो ख़ुद मुझे ही तय करने हैं -हाँ आप सभी लोगों के विचारों और सुझावों को मैंने गहरे हृदयंगम कर लिया है .पर लिखना तो मुझे वही है जो मुझे मन भाए -स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ! हां पूरी कोशिश यह जरूर रहेगी कि किसी का दिल ना दुखे और बात भी कह ली जाय .यह है तो बड़ा मुश्किल काम मगर असम्भव थोड़े है और आप इतने जनों की शुभकामनाएं भी तो मेरे साथ हैं .मैं अपनी चिट्ठाकार चर्चा में -
१-सम्बन्धित चिट्ठाकार के बारे में अपना परसेप्शन रखूंगा .
२-अपने दोसाला अत्यल्प ब्लागकाल में मैं अपने नजरिये से उसके व्यक्तित्व और माईंड सेट की तहकीकात करूंगा -सरकारी सेवकों की चरित्र प्रविष्टि देने के लिए चरित्र प्रविष्टि कर्ता अधिकारी को महज तीन माह का ही समय अंग्रेजों ने तय किया था -मै तो अब दो साल से यहाँ हूँ ! पर यहाँ तो कोई चरित्र प्रविष्टि देने जैसी कोई बात नही है -बस मेरे पसंदीदा /गैर पसंदीदा ब्लागर के बारे में मेरे विचार यहाँ व्यक्त होने हैं और आपके नीर क्षीर विवेक की कसौटी पर उसे देखा जाना है -प्रकारांतर से यह मेरा भी एक परीक्षण ही होगा कि मैं कितना सही हूँ या ग़लत .
३-यह किसी ब्लागर का जीवन चरित लेखन का कतई प्रयास नही है .और नही कोई ठकुर सुहाती ही !
४-पर यह चर्चा होगी व्यक्तिनिष्ठ ही ,विज्ञान सेवी होने के बावजूद भी मैं ऐसा कोई दंभ नही पालना चाहता कि मैं वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण में दक्ष हूँ .मैं एक साधारण सा मनुष्य हूँ और कई राग विराग और मानवीय कमजोरियों से ऊपर नही उठ सकाहूँ .तो गलती भी सहज संभाव्य है . इसलिए भावी चयनित-चर्चित चिट्ठाकारों से अग्रिम क्षमां मांग लेता हूँ -कुछ अंट शंट निकल जाय तो प्लीज उसे ईंटेनशनल न माने .
५-चिट्ठा कार चर्चा का उद्द्येश्य महज एक दर्पण हो सकता है - हम अपने साथियों की छवि को एक दूसरे /तीसरे की आंख में देखें .
६-यह कोई आधिकारिक चिट्ठाकार चर्चा कदापि नही है मन का फितूर भर है .उससे ज्यादा कुछ नही अतः इसे गंभीरता से बिल्कुल न लिया जाय .
अब किसकी चर्चा शुरू करें -सोचते हैं !

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

बैठे ठाले एक चिट्ठाकार चर्चा -पहली कड़ी

इधर मुम्बई के हादसे ने कुछ ऐसा कर डाला था की ब्लॉग जगत से भी अरुचि सी हो गयी थी और अभी भी थोड़ी बहुत यह अरुचि बनी हुयी है ! ऐसा होने में दृश्य मीडिया की भी काफी भूमिका रही पर मैं इसके लिए उन्हें नही कोसता -दृश्य मीडिया ने भले ही अपने काम को बहुत जिम्मेदारी से अंजाम नही दिया मगर उसके पत्रकारों ने जान जोखिम में डाल कर ख़बर हम तक पहुंचाई -काफी कुछ सच दिखाया -जिन परिस्थितियों में वे काम कर रहे थे उसमें आचार संहिता का पालन बहुत मुश्किल था और समय भाग सा रहा था .और दुश्मनों के विरुद्ध जनमत इकट्ठा करने में तो दृश्य मीडिया ने उत्प्रेरक की भूमिका निभायी है,कमाल कर दिखाया है -टाईम्स ग्रुप्स ने तो आतंकवाद के विरुद्ध एक जेहाद सा छेड़ रखा है .मगर खौफनाक दृश्यों और मौजूदा हालातों ने मन काफी उचाट सा कर दिया और शायद हम बहुतों की स्थिति ऐसी है कि हमें मनोरोगविद -सायिकियाट्रिस्ट की सलाह लेनी चाहिए ।
मेरी मुश्किल यह है कि मुम्बई हादसे के तुंरत बाद से मैं सायिकियाट्रिक मोड़ में चला गया और चिडचिडेपन का शिकार हो गया -तब से मैंने कई ब्लागों पर इसी मोड में टिप्पणियाँ करता रहा हूँ और सचमुच बहुत आभारी हूँ अपने तमाम सहधर्मियों का कि वे मुझे झेलते आरहे हैं .अब नाम नहीं लूगा पर अपने कई ब्लॉग मित्रों का मैं क्षमां प्रार्थी हूँ -और इस पोस्ट की भी अग्रिम क्षमा मांग ले रहा हूँ क्योंकि अभी भी मैं आक्रान्तता मोड से पूरी तरह से उभर नहीं पाया हूँ .पर यह पोस्ट मेरे पटरी पर लौट आने का एक सायास प्रयास है -शायद काम बन ही जाय ।
जब हम चिट्ठाचर्चा में इतनी रूचि ले रहे हैं तो क्या यह उचित नही है कि बीच बीच में कुछ चिट्ठाकार चर्चाएँ भी कर ली जायं . साहित्य में कृतित्व के साथ व्यक्तित्व वर्णन की भी परिपाटी रही है -अनूप जी इस बात से इत्तेफाक रखेंगे .वैसे यह विवादित मुद्दा है -कई स्वनामधन्य विद्वानों का कहना है कि साहित्यकार का कृतित्व क्या कम नहीं जो उसके निजी जीवन में भी ताकझांक की जाय ? भाई क्या मतलब कि आपका पसंदीदा रचनाकार /ब्लॉगर कैसा है ,सुंदर देहयष्टि का स्वामी /स्वामिनी है या नही है ? क्या खाता पीता है ,कहाँ जाता सोता है -दयालु है या मरकहा है आदि आदि! कोई ये जरूरी नही है कि वह लिखता अच्छा है तो होगा भी अच्छा ही ! कई संयोग हो सकते हैं -लिखता अच्छा है तो दिखता बुरा है ,लिखता ख़राब है तो दिखता देवदूत है .इस बिन्दु पर किसी ब्लॉगर बन्धु /बांधवी ने चर्चा छेड़ी भी थी .पर अपुन का मानना है कि कुछ तो व्यक्तित्व (केवल चेहरा मोहरा ही नहीं )का असर पड़ता ही है -कविता कर के तुलसी ना लसे कविता पा लसी तुलसी की कला !
पर मैं यह प्रलाप कर क्यों रहा हूँ ?-मित्रों मैं अपने आक्रान्तता मोड से उबरना चाहता हूँ इसलिए अनाप शनाप बैठे ठाले ये प्रलाप किए जा रहा हूँ और आपको झेलना पड़ रहा है .मुआफी माई बाप !! तो ऐसे ही मेरे मन में इक खयाल आया कि क्यों न चिट्ठाचर्चा की तर्ज पर कुछ नामवर और कुछ बदनामवर चिट्ठाकारों की चर्चा ही की जाय कभी कभी ! यानी कोई क्या सोचता /सोचती है अपने ब्लागजगत के सहधर्मियों के बारे में -इस विधा की भी ब्लागजगत में प्राण प्रतिष्ठा क्यों ना की जाय ? मगर यह काम यथा सम्भव वस्तुनिष्ठता से हो तो बेहतर, मगर हम लाख दावे करें कुछ न कुछ भावनिष्ठ्ता तो हमारे विवरणों में आयेगी ही -पर इतना जोखिम तो उठाना ही पडेगा ।
और ब्लॉगर बंधुओं से भी आग्रह है कि वे यदि कबिरा निंदक राखिये वाला जज्बा ना भी रखते हों तो भी कृपा कर आवेश में न आयें या यदि उन्हें कोई आशंका हो तो पहले ही निराकरण कर लें या फिर नाम काटने का आग्रह कर , यदि उन्हें लगता हो कि संभावित सूची में उनका नाम भी हो सकता है .
तो श्रीगणेश मैं ब्लॉग जगत के दो आदरणीय शख्सियतों से कर रहा हूँ जिनके प्रति मेरे मन में असीम आदर /सम्मान है -ये हैं सारथी के आदरणीय शास्त्री जी औरउन्मुक्त जी ! ध्यान दें मैं यहाँ इन दोनों महानुभावों का जीवन चरित नहीं लिखने जा रहा हूँ पर इन्हे लेकर मेरे मन में जो भाव है उसे आप से साझा करना चाहता हूँ -करना चाहता हूँ चिट्ठाकार चर्चा !
अथ श्री चिट्ठाकार चर्चा !
ये दोनों ही चिट्ठाकार व्यक्तित्व के मामले में दो ध्रुव हैं बिल्कुल अलग थलग ! एक अपना सब कुछ सार्वजनिक करने को सहज ही उद्यत रहता है ,आतिथेय बनने को भी सदैव तत्पर यानी अपने शास्त्री जी तो दूसरे उन्मुक्त जी के बारे में आज तक जासूसी करने के बाद भी मुझे पक्का कुछ नही मालूम हो सका कि ये कहां के रहनेवाले हैं ,इनका असली नाम क्या है ? कोई कहता है कि ये इलाहाबाद में एडवोकेट हैं तो कोई कहे है कि ये दिल्ली केआस पास कहीं के हैं -इनकी अतिशय विनम्रता या जीवन दर्शन है कि लोगों को उनके काम से जाना जाय .ये हमारे उन आदि पूरवज मनीषियों की ही परम्परा में हैं जिन्होंने कितना ही रच डाला पर नाम पता भी ठीक से उद्धृत तक तक नही किया -आज साहित्य और इतिहास के विद्वानों को बड़ी मुश्किल होती है उनके काल निर्धारण में ,उनकी असली पहचान स्थापित करने में ! कालिदास ,कौटिल्य, पातंजलि ऐसे ही कोटि के विद्वान् रहे -कितने पुराणकारों ने विपुल सर्जना के बाद भी अपना नामोंल्लेख तक नही किया .उन्मुक्त जी उसी परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं .पर कभी कभी बहुत खीझ सी होती है इस अतिशय विनम्रता से .मैंने उन्हें विज्ञान कथाओं के राष्ट्रीय परिचर्चा में लाख बुलाना चाहा पर वे नही आए -शायद कहीं गोपनीयता भंग न हो जाय -पर भला आज की दुनिया में यह भी कोई बात हुई ? चलिए संतोष इस बात का है कि हम उनके रचना जगत से समृद्ध हो रहे हैं ! और उनकी भी विज्ञान कथाओं में बड़ी रूचि है -अज्ञेयवादी हैं और इस कारण भी मैं उनसे मन से जुड़ा हूँ !
शास्त्री जी की भी सदाशयता का मैं कायल हूँ -वे वेल रेड विद्वान् हैं भौतिकी के विशेषग्य और उतना ही विनम्र .पर उनके अपने कुछ आब्सेसन भी हैं जैसे वे इसाई धर्म के प्रति अनुरक्त है .भगवान में प्रबल श्रद्धा है !! तो ये दोनों बड़े ब्लॉगर कई मायनों में उत्तर और दक्षिण ध्रुव सरीखे हैं पर ये दोनों बहुत वरिष्ठ ,प्रणम्य ब्लॉगर साथी हैं -समूचे ब्लागजगत को इन पर गर्व है ! मेरा नमन !
आगे देखिये किसका नाम मन में कौंधता है -यह आप भी हो सकते हैं ! करिये धड़कते दिलों से इन्तजार अपनी बारी आने का !

शनिवार, 13 दिसंबर 2008

रायशुमारी का नतीजा -क्या भारत को पी ओ के के आतंकी ठिकानों पर आक्रमण कर देना चाहिए ?

रायशुमारी का सांख्यिकीय नतीजा -७६ प्रतिशत का कहना है कि जी हाँ हमें पाक के आतंकी ठिकानों पर हमला कर देना चाहिए ,केवल २३ प्रतिशत इसके पक्ष में नहीं हैं उनकी अपनी अपनी आशंकाएं हैं ! यह एक प्रतिनिधि सर्वेक्षण कहा जायेगा क्योकि इस ब्लॉग पर टिप्पणीकर्ता रैंडम रूप से आए हैं -यह जनमत संग्रह दरसल भारत के मूड को प्रगट करता है .भारत पर आतंकी आक्रमण के फौरन बाद जिस सदमे / सकते की स्थिति में हम थे अब उससे उबर रहे हैं और सबसे अच्छी बात यह कि हम अब आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के प्रति और दृढ़ प्रतिज्ञ हैं ! मुम्बई के गेट वे आफ इंडिया पर हो रहे अहर्निश जन प्रदर्शनों ने हमारे संकल्प को पूरी मजबूती के साथ दुनियाके सामने रखा है । हम अब शायद पहले से भी कहीं बहुत अधिक एक राष्ट्र के रूप में एकजुट हो गए हैं ! इस संदेश को भारतीय संसद ने ही नहीं पूरी दुनिया ने सही तरीके से ले लिया है -हम अब कुछ भी नानसेंस बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं .अगर पाकिस्तान अब भी नही चेत्तता और आतंकी गतिविधियों पर पूर्ण विराम नहीं लगाता तो एक सबक सिखाने वाला युद्ध निश्चित है -इसे हमारे देश के मध्यमार्गी (प्र )बुद्ध जन भी अब रोक नहीं पायेंगे !
आज पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर है और उसे अपनी खस्ता हालत के मद्देनजर सदबुद्धि दिखानी होगी .उसे वांछित आतंकियों को सौंपना ही होगा -इससे कम कुछ भी स्वीकार्य नही है .पर जो दिख रहा है वह यह कि अभी भी वह अपनी हेकडी से बाज नही आ रहा -अभी भी वह आतंकी घटनाओं में पाकिस्तानियों के होने का प्रमाण माँगता जा रहा है जबकि पकडे आतंकी का पिता चिल्ला चिला कर उसका बाप होने का दावा कर रहा है और पाकिस्तान का मीडिया भी इसकी पुष्टि कर रहा है -क्या केवल भारत द्वारा एक पूरी ताकत से किया आक्रमण ही प्रमाण की कमीं को पूरा कर सकेगा ? ज़रा रायशुमारी में प्राप्त टिप्पणियों पर गौर तो करें -संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि अब हमारे सब्र का बाँध टूंट चुका है और हम अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे .और भारत में भी यदि किसी ने भी बुद्धि विवेक छोड़ कर आचरण अपनाया तो उसकी खैर नहीं है -वह चाहे हमारे नपुंसक छद्म धर्म निरपेक्षी हों या देश की मुख्य धारा और राष्ट्रीय भावना से वंचित अन्य धर्मावलम्बी ! यहाँ धर्म की कोई बात ही नही है -यहाँ मात्र एक संप्रभुता संपन्न देश जिसकी आबादी लगभग सवा अरब है के मान प्रतिष्टा की बात है ! और हमने अब तय कर लिया है कि किसी भी उद्दंडता का हम मुँहतोड़ जवाब देंगे ! हमारी मंशा से लोग परिचित हो जांय और किसी भी तरह के मुगालते में न रहें -आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमारी लडाई अब निर्णायक दौर में है .
आज सबसे बडा दायित्व मुसलमान भाईयों पर आ गया है -मैं जानता हूँ कि हमारे अनेक मुसलमान भाई असंदिग्ध रूप से अपने देश के साथ हैं पर सभी मुसलामानों के बारे में ऐसा विश्वास यहाँ के बहुसंख्यकों को नहीं है ,यह एक यथार्थ है जीससेमुंह नही मोडा जा सकता -आम ख़ास मुसलमान भाईयों को भी जाने अनजाने भी ऐसे किसी भी सदिग्ध आचरण से बचना होगा ,अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी जिससे कोई ग़लत संकेत उनके बहुसंख्यक भाईयों में जाय .यह उनके लिए भी एक अग्नि परीक्षा का समय है । हमारे यहाँ संदेह के चलते कई कई अनर्थ हो चुके हैं -यहाँ तक कि लोक कथाओं में हनुमान को अपना वक्ष दोफाड़ कर दिखाना पडा है कि वहां सीता राम ही बसते हैं -आज इतनी कठिन परीक्षा तो कोई दे नही सकता ,इसलिए पूरी जिम्मेदारी और संयम की जरूरत है .हाँ बहुसंख्यकों को भी पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी मिश्रित परम्परा के अनुरूप मुसलमान भाईयों के सम्मान में कोई कमी नही आने देनी चाहिए .और बिला वजह और हर बात पर उन पर शक करने भी किसी भी तरह जायज नहीं है -मौके की नजाकत वे भी समझ रहें हैं और वे किसी भी चूक का मौका निश्चित रूप से नही देंगे !
मैं तो बहुत चाहता था कि रायशुमारी की कुछ चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं को यहाँ पुनः उद्धृत करुँ पर ब्लॉग की प्रवृत्ति और मौजूदा कलेवर के अनुरूप यह ठीक नही होगा -हाँ आगे हम चुनिन्दा प्रतिक्रियाओं को सम्मिलित करते हुए एक विवेचना अवश्य करेंगे !
फिलहाल एक बानगी के तौर पर अब तक प्राप्त अन्तिम प्रतिक्रया टिप्पणी यहाँ जस का तस् उद्धृत कर रहा हूँ -
दुश्मन देश स्थित आतंक के अड्डों पर हमले के लिए इजरायल जैसी राजनैतिक ईच्छा-शक्ति और प्रतिबधता चाहिए जो बिना किसी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की परवाह किए अपने देश हित में कार्यवाही करता है.जिन यहूदियों को हिटलर ने नेस्तनाबूद कर दिया , जिनको एक सूखे बंजर का टुकडा रहने के लिए मिला, आज वो कौम कृषि यन्त्र और खासकर सिंचाई यंत्रो में विश्व में अग्रणी है !
उन पर एक गोली चलाओ -- जवाब में वो आप पर पुरी मैगजीन खाली कर देंगे ! स्पस्ट रूप से जब हमें इसी महाद्वीप में रहना है तो इजरायल वाली नीति ही कारगर होगी.. जैसे को तैसा ....
-मीनू खरे

रविवार, 30 नवंबर 2008

एक रायशुमारी -क्या भारत को बिना ऑर समय गवाए पी ओ के के आतंकी ठिकानों पर हमला कर देना चाहिए?

मित्रों ,मैंने यह रायशुमारी केवल आपकी भावनाओं को मुखर करने और आपके सलाह मशवरे के लिए की है .चूंकि इसके लिए जो गजेट ब्लॉग के हाशिये पर है उसमें केवल हां या ना का ही आप्शन है अतः यह सहायक पोस्ट भी इसलिए कि ब्लॉग दुनिया कुछ और भी तफसील से कहना चाहे तो कह सके ताकि एक जनमत बन सके और हमारे आका जो पता नहीं इस समय क्या कर रहे हैं जन भावनाओं से परिचित हो सकें ।
मेरा तो दृढ मत है कि अब तक भारतीय वायुसेना को यह आर्डर मिल जाने चाहिए थे कि वह पाक अधिकृत आतंकी ठिकानों पर बेलौस पूरी शक्ति के साथ आक्रमण कर दे -पर हमारा नेतृत्व फिर नपुंसकता ,क्लैव्यता की राह पकड़ रहा है -हमारे ऊपर आक्रमण हुए कई दिन बीत रहे -आखिर इन सत्ता भोगियों को स्पष्ट राजनीतिक निर्णय लेने में क्या अड़चन आ रही है?
पूरा देश इस समय अपमान की घूँट पिए ,कुछ न कर पाने के आक्रोश में डूबा है -क्या जन भावनाएं हमारे ही चुने हुए नेताओं की समझ में नहीं आतीं .आज याद आ रही है इंदिरा जी की जिन्होंने ऐसे ही मौकों पर तुंरत सटीक निर्णय लिए और अपने देश के शौर्य और प्रतिष्ठा को पूरी दुनिया में बनाए रखा .एक काबिल बाप की काबिल बेटी तो थी हीं वे और उससे बढ़ कर एक लौह महिला ,प्रधानमंत्री भी थीं ! आखिर हमारा वर्तमान नेतृत्व क्यों उनसे कुछ सीख नही लेता ! क्या हमारे प्रधान मंत्री सचमुच ही वही है जो वे दीखते हैं ? यानी ब्रिह्न्नला ? वे आखिर कर क्या रहे हैं ?क्या उन्होंने इस मसले पर फौरन राष्ट्रपति से बात की ? और हमारी श्रद्धेय राष्ट्रपति जी क्या कर रही है ?? मुझे एक नागरिक होने के नाते यह जानने का हक़ है -मगर मुझे कुछ पता नहीं चल रहा है ? क्या आपको पता है ? क्या वे अभी भी अपनी रोजाना की दिनचर्या में ही व्यस्त हैं ? यदि हम राजनीतिक -सरकारी निर्णय में किन्ही कारणों से हो रही देर की बात को इग्नोर भी कर दे तो क्या राष्ट्रपति जी की भी ऐसी ही कोई विवशता है जो यह राष्ट कभी समझ पायेगा ? क्या हमारे राष्ट्रपति जी ने सेना अध्यक्षों को बुलाकर उनसे सलाह मशविरा किया ? और यदि हाँ तो फिर देर क्यों ? क्यों अमूल्य समय गवायाँ जा रहा है ? यह निर्णायक क्षण है -सरकार को जन भावनाओं के अनुरूप कार्यवाही से क्या रोक रहा है ? पूरा देश साथ है -टक टकी बांधे दिल्ली की ओर ताक रहा है -निर्णय में विलंब क्यों ? क्या अमेरिका और ब्रिटेन हमारा युद्ध लडेंगे ? क्या हम आज इतने वेवश और शक्ति हीन हैं -हम शक्ति और तकनालोजी के मामले में पूरी दुनिया में अग्रपंक्ति में आज खड़े हैं .हम इतना दीन हीन क्यों दिख रहे हैं ? हे सोनिया ,हे मनमोहन अगर तुम्हे अपनी लाज ,देश की लाज और अपनी डूबती पार्टी की लुटिया बचानी है तो सामने आकर हमारा नेतृत्व करो नहीं तो दिल्ली को खाली करो ! समय बहुत कम है. कूटनीतिक गतिविधियाँ शुरू हो चुकी हैं -और देरी तुम्हे एक सही निर्णय से रोक देगी और तुम सब इतिहास से सबक न लेने की भूलों की फेहरिस्त में एक और इजाफा कर खुद कालातीत हो जाओगे !
पता तो चले कि देर क्यों हो रही है -क्या इसलिए कि पाकिस्तान जवाबी हमला कर देगा ? क्या इसलिए कि यह युद्ध नाभकीय हो जायेगा ? कि इसलिए कि मुस्लिम वोट बैंक खिसक जायेगा ? ऐसा कौन सा मुस्लिम है जो अपने देश पर हुए हमले के परिताप को सह पा रहा है -यह तुम्हारे नपुंसक सलाहकारों की गलत् राय है -पूरा देश साथ है !
इस समय न हम हिन्दू है ना मुसलमान ,न सिख ना ईसाई -हम एक राष्ट्र है -यह पूरा राष्ट्र अपील कर रहा है मरो या करो !

शनिवार, 29 नवंबर 2008

मुम्बई सदमे से अभी उबर नही पाया हूँ -आपके परिजन ,इष्ट मित्र ठीक तो हैं न ?

मुम्बई हादसे ने सहसा स्तब्ध सा कर दिया -संवेदनाओं को झिझोड़ कर रख दिया -कुछ ना कर पाने के हताशा जनक आक्रोश -पीडा ने गुमसुम और मौन सा कर दिया ! कुछ ऐसी ही स्थितियां कभी कभी मनुष्य में आत्मघाती प्रवृत्तियों को उकसाती हैं -एक तरह के सेल्फ अग्रेसन के भाव को भी ! एक राष्ट्र के रूप में हम कितना नकारा हो गए हैं -चन्द आतंकवादी सारे सुरक्षा स्तरों को सहज ही पार कर हमारी प्रभुसत्ता पर सहसा टूट पड़ते है और हम जग हसाई के पात्र बन जाते हैं !
क्या इतिहास ख़ुद को दुहरा रहा है ? क्या हम अपने अतीत से सबक नही ले पाये और आज तक काहिलियत ,अकर्मण्यता और बेपरवाह से बने हैं -एक समय था जब भारत को जब भी जिस विदेशी आक्रान्ता ने चाहा चन्द अरबी घोडों पे सवार हो अपने छोटे से दल के साथ यहाँ पहुचा और हमारे स्वाभिमान को रौंद, लूट खसोट कर वापस लौट गया ! मुम्बई की घटना में कया कही कुछ अन्तर नजर आता है -हम आज भीवैसे ही असहाय नजर आए और सारी दुनिया हमारी बेबसी को देखती रही ।
यह सब इतना सदमे वाला था कि मेरी सारी दैनिक गतिविधियों पर सहसा ही विराम लग गया .एक अजब सी बेचैनी ,बेकसी तारी हो उठी - यह ऐसा वक्त था जब सहसा लगा कि हम एक साथ हो एक जुट हो अपने दुःख और पीडा को बांटे -तभी वह शोक वाला चिन्ह दिखा और यह अपील की हम इस राष्ट्रीय त्रासदी में एकजुटता का परिचय दें और उस विजेट को अपने अपने ब्लागों पर प्रदर्शित करें .सहसा लगा हम इस घड़ी में अकेले नही हैं !
कई मित्रों ने यही किया और अकेली वैयक्तिक संवेदनाओं को साझा मंच मिल गया -कुछ राहत सी मिली .पर इस गाढे समय में भी कुछ लोग इस पूरे राष्ट्रीय सन्दर्भ से आश्चर्यजनक रूप से कटे , अलग थलग अपनी अपनी ढपली और अपना राग अलाप रहे थे -कुछ वैसी ही तर्ज पर जब प्राचीन भारत को विदेशी आक्रान्ता रौंद रहे थे -बौद्ध भिक्षु बुद्धं शरणं गच्छ का आलाप करते हुए जंगल जंगल घूम रहे थे -निस्पृहऔर निसंग !
कभी कभी मौन ही मुखर हो उठता है -शब्द बेजान हो जाते हैं .मैं उन मित्रों का बहुत आभारी हूँ ,नारी ब्लॉग का भी जिसने एक राष्ट्रीय त्रासदी में हमें यह सकून भरा अहसास दिलाया कि हम एक हैं -अपने आपसी छोटे मोटे आंतरिक विवादों के बाद भी बाहरी हस्तक्षेपों /आक्रमणों के समय हम एक समुदाय हैं ,एक इकाई हैं !
जो भाई बन्धु इस साझी संवेदना से नही जुड़ सके उनके प्रति अफ़सोस ही व्यक्त किया जा सकता है -वे लिखास के रोग से पीड़ित है और आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रीय मुद्दों से अलग थलग अपनी असम्पादित शब्द साधना मे जुटे हैं -
उन्हें साझा सरोकारों से कोई मतलब नही -यही वह कारण है किऐसा ही साहित्य डस्ट बिन में फेक दिया जाता है -हाशिये पर चला जाता है -साहित्य का मूल मकसद ही है जुड़ना ! जो एक राष्ट्रीय त्रासदी में भी ख़ुद को अलग थलग किए रहे -साझे सरोकार से नही जुट सके उन्हें क्या कहा जाय ?
आशा है आपके परिवार के सदस्य ,परिजन, ईष्ट मित्र सभी सकुशल होंगे .आईये हम जो कुछ घटा उस पर एक गंभीर चिंतन मनन करते हुए कुछ संकल्प लें औरऐसी घटना फिर न घटे उसकी अपने अपने ही ताई एक कार्ययोजना तैयार करें !

रविवार, 23 नवंबर 2008

एक कनफेसन !

मुझे अब ऐसे ही लग रहा है कि साईब्लाग पर पुरूष पर्यवेक्षण की इस कथा यात्रा को मैं कुछ वैसी ही विवशता और किसी की सौंपी हुयी प्रतिबद्धता के सहारे घसीट घसीट कर आगे लेकर बढ़ रहा हूँ जैसे कि कभी विक्रम ने वैताल के शव को ठिकाने लगाने का निरंतर और निष्फल प्रयास किया था .मेरी विवशता यह कि ख़ुद को श्रेष्ठ और सत्पुरुष मानने के क्षद्म आत्म गुमान के चलते इस कर्म को मैं छोड़कर उन निम्न पुरुषों की कोटि में नही वर्गीकृत होना चाहता जो किसी काम को शुरू तो बड़े चाव से करते हैं पर आधा अधूरा छोड़ कर चल देते हैं -भला कोई रचनाकर्मी अपनी स्वकीया से ऐसा बर्ताव भी भला कैसे कर सकता है ? भले ही ऐसे लोगों के सिर की विक्रम के सिर की भांति चूर चूर होने की आशंका न भी हो यह तो शर्म से सिर झुकने की बात है कि कोई अपनी ही कृति को आधा अधूरा छोड़ दे -क्या कोई माँ अपने बच्चे को अधूरा जन सकती है ? तो यह है मेरी विवशता ! पर मुझे अपने सिर के शर्म से झुकने से बड़ी चिंता यह है कि मैं इस बोझ को सही ठिकाने पर लगा दूँ ,पटाक्षेप पर ला दूँ ! पर अभी तो कई बार तरह तरह के धयान भंग के चलते वैताल पकड़ से यह छूटा वह छूटा और जाकर एक अगम्य सी डाल पर जा बैठा वाली स्थिति ही चरितार्थ हो रही है -जहाँ से सायास और सश्रम मुझे उसे फिर से खींच कर ब्लाग धारा में लाना पड़ रहा है ।
और उस पर दुश्चिंता यह भी कि कुछ विश्वासी मित्रों के अतिरिक्त सुधी/विद्वान् जनों का भी कोई प्रोत्साहन मुझे इस उपक्रम पर नही मिल रहा है -मेरी स्थिति तो ऐसी ही है -जो बाबा तुलसी दास ने यूँ व्यक्त किया है -
जो प्रबंध बुध नही आदरहीं सो श्रम बादि बाल कवि करहीं
(बुद्धिमान जिस कविता का आदर नही करते ,मूर्ख ही वैसी रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं )...मुझे दुःख है कि मेरे प्यारे हिन्दी चिट्ठा जगत ने नर नारी के सौन्दर्य विश्लेषण के मेरे इस विज्ञान संचार के 'मनसा वाचा कर्मणा ' अध्यवसन को भी नर - नारी समानता/असमानता विवाद /वितंडा की भेंट चढ़ा दिया .लोगों ने ,ब्लागजगत की कई नारी शख्शियतों ने मुझे बताया कि मेरे इस लेखन में उनकी टिप्पणियों के लिए उनकी लानत मलामत की गयी -उन्हें उलाहने दिए गए -क्या ऐसी प्रवृत्तियों से सहज रचना धर्मिता बनी रह पायेगी ? यह गोल बंदी नही तो क्या है ? पर यह तो लोकतंत्र है और हम संविधानिक रूप से ऐसे माहौल में रहने को आबद्ध हैं !
आज प्रुरुष पर्यवेक्षण की अगली कड़ी भारी मन से लिखने को साईब्लाग पर आया तो सहज ही यह पीडा निसृत हो गयी है -मगर यह चूंकि यह उस ब्लॉग के कलेवर के अनुरूप नही है अतः यहाँ लाया हूँ -एक दुखी दिल लाया हूँ की तर्ज पर -पढ़ें और आनंद उठाएं मेरी दशा पर रहम फरमाएं या ना फरमाएं !

रविवार, 16 नवंबर 2008

आप किसी सम्मलेन में शरीक तो नही होने जा रहे ?

आप किसी सम्मलेन में शरीक तो नही होने जा रहे ? यदि हां तो कृपया गौर फरमाएं ! अभी मुझे एक राष्ट्रीय सम्मेलन -विज्ञान कथा :अतीत ,वर्तमान ऑर भविष्य के आयोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसमें देश के कोने कोने कोने से १०० से ज्यादा ही प्रतिभागियों ने भाग लिया -अकेले दक्षिण भारत से ही २२ प्रतिभागी आए थे .पूरा कार्यक्रम बनारस में संपन्न हुआ .चूंकि विज्ञान कथा मेरे लिए किसी पैशन से कम नही अतः इस विधा के लिए मैं कोई भी वैयक्तिक असुविधा ,असहजता झेलने को तैयार रहता हूँ .तथापि एक आयोजक के रूप में मुझे ऐसे कुछ ऐसे अनुभव हुए हैं जिन्हें आपसे इसलिए साझा करना चाहता हूँ ताकि यदि आप कभी ख़ुद आयोजक बनें तो ध्यान में रखें ऑर यदि कहीं प्रतिभागी बने तो ऑर भी धयान में रखें -एक समर्पित आयोजक जो अपने सभी प्रतिभागियों के रहने खाने पीने का पूरा इंतजाम रखता है वह भी कुछ ऐसी बातों से क्लांत हो जाता है मसलन -
1-ज़रा मैं कुछ देर के लिए एक वाहन चाहता हूँ -सोच रहा हूँ यहाँ आया हूँ तो फलाने से भी मिल आता .काफी दिनों से उनसे मुलाक़ात नही हुयी ।
२-मैं तो आपके ठहराए स्थान पर नहीं रूकूंगा क्योकि यहाँ तो मेरे रिश्तेदार फलां फलां जगह ,अरे वही बरगद के पास वाली गुमटी के पीछे रहते हैं अतः वहां से मुझे लेने- छोड़ने की व्यवस्था कर दें (अगर ऐसी अपरिहार्यता हो तो पहले से ही बोल कर रखें )
३-जल्दी में मैं अपना पावर पाईंट नही बना सका यह लीजिये यह रहा मैटर ज़रा बना के मंगवा दें प्लीज .
४-भाईआप तो जानते हैं कि मैं गिद्ध भोज (बुफे )नही करता -मेरे लिए कहीं अलग से इंतजाम करा दें (पहले से बोल रखें )
५-मैं तो जहाँ निरामिष भोजन बनता है वहां खाना नही खाता -अगर असुविधा न हो तो मेरे और अपनी भाभी के लिए कचौडी गली से पूडी कचौडी ही मंगा दें !
५.बनारस आया और भोले बाबा का दर्शन नही किया तो जीवन ही निस्सार हो जायेगा -भाई दर्शन का इंतजाम हो जाता तो फिर मजा ही आ जाता -तो ख़ुद न चले जाईये भाई साहब ,आख़िर रोका किसने है ।
६-मैं तो बिना गरम पानी के दाढी नही बनाता अभी तक इंतजाम नही हुआ (नहाने की बात जायज है पर यह दाढी वाली बात .....!)
७-पहले तो मैंने सोचा था कि बाम्बे मेल से चला जाउंगा पर अब ज़रा मैं अपनी एक मौसेरे भाई से मिलने भोपाल होकर जाने का सोच रहा हूँ -सेकंड ऐ सी फेयर तो आप दे ही रहे हैं ,चलिए निरस्तीकरण चार्ज मैं दे दूंगा अंब इस रूट से मेरा टिकट कटवा दीजिये /थोडा किराया अधिक लगेगा .
८-मिश्रा जी दरअसल पराड़कर जी का स्मृति दिवस भी बनारस में १६ से है आपका कार्यक्रम १४ को समाप्त हो रहा है कृपा कर दो दिनों तक और मेरे आवासीय और खाने पीने का खर्चा आयोजन मद से कर दें ।
९-आप मिश्रा जी हैं ? अरे साहब ये मेरे चार स्टुडेंट मान ही नही रहे थे आपके कार्यक्रम मे आने के लिए इतना जिद कर बैठे कि तत्काल कोटे से बंगलौर मेल से टिकट कटा कर आज ही सुबह हम लोग आप पर अहसान करने आ गए हैं बताएं कहाँ रुकना है ? क्षमां करेंमैं आपको पूर्व सूचना नही दे सका {बिना कोई पूर्व सूचना के सदल बल धमक आए लोग ! )
१० .मिश्रा जी मैं प्रोफेस्सर यादव हूँ आपके कार्यक्रम की सूचना देर से मिली मैंने आपको मेल किया था आपका कोई जवाब नही मिला और तत्काल टिकट भी नही मिल सका इसलिए किंग फिशर फ्लाईट से आ गया हूँ मैं वेनूयु भी नही जानता -"पर कार्यक्रम तो १४ को ख़त्म हो गया !" नही मुझे तो मालूम है कि यह १४ से शुरू हो रहा है -बहरहाल आप कहाँ रहते हैं ? वही आ जाता हूँ आपके साथ चाय भी पी लूंगा और टी ए तो आप दे ही देंगे मैंने फलाने से बात कर ली है .
कृपा कर आप किसी आयोजन में शरीक हीन जा रहे हों तो ऐसे आत्याचारियों सरीखे व्यवहार न करें न तो मुझ जैसा समर्पित व्यक्ति भी उन्ही आयोजकों की कतार में जा खडा हो जायेगा जो अपने प्रतिभागियों की तरह तरह से दुर्गति करते है और अपमानित करके विदा करते हैं .मुझे एक राहत है कि मैं कोई पेशेवर आयोजक नही हूँ पर यह पोस्ट इसलिए कि लोग पेशेवर प्रतिभागी बनने से भी बाज आयें !

बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

गाँव में ब्राडबैंड के साथ मैंने जगाई अपनी दीवाली (एक माईक्रो पोस्ट )!

अब गाँव कैलाश गौतम की मशहूर रचना' गाँव गया था गाँव से भागा 'से कुछ अलग रूख अपना रहे हैं यानी आकर्षण उत्पन्न कर रहे हैं -अब जैसे दूर संचार की क्रान्ति ही ले लीजिये .मैं अपने पैतृक गाँव दीवाली मनाने के लिए आया -मेरा गाँव राष्ट्रीय राजमार्ग ५६ पर जौनपुर शहर से १७ किलोमीटर दूर लखनऊ की दिशा में है .मेरे अनुज डॉ मनोज मिश्रा ने लैपटाप एक वर्ष पहले खरीदा था ,मगर केवल wll पर इन्टरनेट की सुविधा जो कि बहुत धीमी थी के चलते ब्लाग लेखन में पदार्पित नहीं हुए थे -कल ही यानी ठीक दीपावली के दिन ही बी एस एन एल ने यह सुविधा भी यहाँ मुहैया करा दी और हम लोगों की दीपावली मानों जग गयी -दीपावली पर एक ब्लॉगर को इससे बढ़कर क्या सौगात चाहिए -मैं यह पोस्ट अनुज के ही लैपटाप से ब्राडबैंड के जरिये कर रहा हूँ -हर हुनर वाले दीवाली के दिन अपने हुनर को आजमाते है -जगाते हैं और गाव में आकर भी मैंने अपनी ब्लाग्जीविता को जगा लिया है और फूल कर कुप्पा होरहा हूँ -अब भाई मनोज के चिट्ठाजगत में लाने की तैयारी शुरू हो गयी है -उनके भी ब्लॉग को आपका स्नेह मिलेगा -अभी तो नामकरण की चर्चा चल रही है -एक नाम पर विचार चल रहा है -मा पलायनम ! यह कैसा रहेगा ? अरे यह तो माईक्रो पोस्ट होनी थी ..अतः विराम !

शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

आईये दीपावली पर हम करें उल्लू स्तवन !


दीपावली पर हम मैया लक्ष्मी की पूजा की तैयारियां कर रहे हैं तो लगे हाथ लक्ष्मी मैया के वाहन का भी पूजन- स्तवन हो जाय !
पर क्या कभी आपने विचार किया कि लक्ष्मी वाहन उल्लू ही क्यों ? सरस्वती का वाहन हंस है -फिर लक्ष्मी का वाहन उल्लू क्यों ? उल्लू जिसे मूर्खता के अर्थ में रूढ़ मान लिया गया है .पर क्या उल्लू सचमुच मूर्ख है ?
वैज्ञानिक राय बिल्कुल भिन्न है -वे उल्लू को एक बेहद सजग रात्रिचर प्राणी मानते हैं -उसका मुंह तो देखिये दीगर परिंदों से बिल्कुल अलग उसके "धीर गंभीर " से चेहरे पर आंखे बिल्कुल सामने हैं .वह हल्की सी आहट पर चौकन्ना हो जाता है .शायद इन्ही खूबियों के चलते हमारे आदि कवि मनीषियों ने लक्ष्मी को वाहन के रूप में उल्लू का तोहफा दिया होगा ? पर एक अच्छे खासे से पक्षी को भारतीय सन्दर्भ में उल्लू क्यों मान लिया गया ? जीहाँ यूनान में उल्लू बुद्धि का प्रतीक माना गया है -अंगेरजी में ऐन आवलिश अपियर्रेंस का मतलब ही है विद्वता पूर्ण चेहरा और अक्सर न्यायधीशों के लिए 'ऐन आवलिश अपीयरेंस ' का जुमला इस्तेमाल होता है .वह कविता भी आपने शायद सुनी पढी हो -एक विग्य उल्लू बैठा था ओक की डाल पर ......
फिर ये माजरा है क्या -उल्लू यहाँ भारत में ही उल्लू क्यों है ? यह मामला है सदियों से विपन्नता का दंश झेल रहे भारतीय कवि मनीषियों का जिन पर लक्ष्मी कभी भी कृपालु नहीं रहीं -तो यह एक खीझ है जो कभी हजारो साल पहले हमारे पूरवज मनीषियों ने लक्ष्मी पर उतारी थी, उन्हें वाहन के तौर पर उल्लू अलाट कर और उसे मूर्खता का जामा पहना कर ।
किसी भी विद्वान को लें लक्ष्मी न जाने क्यों उससे रूठी हुयी हैं -अब अपवाद के तौर पर ऐसे लोग भी दिख जाते eहै जिन पर सरस्वती और लक्ष्मी दोनों की कृपा होती है मगर पुराण -इतिहास गवाह है विद्वान् ज्यादातर पैसे कौडी के मामले में 'दरिद्र' ही रहे हैं -उन पर लक्ष्मी कभी भी कृपालु नही रही हैं -इसलिए ही विद्वानों को ख़ुद को सरस्वती पुत्र eकहलाने में ज्यादा गौरव की अनुभूति होती है .और उहोने भी सदियों से ही लक्ष्मी की घोर उपेक्षा से खिन्न होकर उनके साथ सरस्वती की तुलना में काफी भेदभाव किया है और अपनी खीझ मिटाई है ।
अब यही देखिये सरस्वती को उन्होंने वाहन के रूप में हंस अलाट किया -कितना सुन्दर है हंस -यही नही उसमें नीर क्षीर विवेक की भी क्षमता डाली -वह केवल मानसरोवर का मोती चुगता है .जब लक्ष्मी जी को वाहन अलाट करने की बात आयी तो उनके लिए ऐसे वाहन की तलाश शुरू हुई जो रात्रि चर हो क्योंकि धन /कालाधन कमाने के सारे कामधाम रात के अंधेरे में ही संपन्न होते हई ,वह वाहन मांसाहारी हो यानी वैष्णवी वृत्ति से दूर ! मजेदार तो यह कि विष्णु को भी धता बता कर एक घोर अवैष्णवी वाहन लक्ष्मी को दिया गया .यह घोर मांसाहारी है -क्रूरकर्मा है .आदि आदि और लगता है इससे भी कविजनों को संतुष्टि नही हुई तो उसे मूर्खता के अर्थ मे भी रूढ़ कर प्रकारांतर से मानो यह कहा गया कि लक्ष्मी केवल उल्लुओं पर ही मेहरबान होती हैं - लक्ष्मी द्बारा की जा रही उनकी घोर और निरंतर उपेक्षा से ऊब कर उनके प्रति अपना आक्रोश यूँ जाहिर कर दिया और वृथा न जाई देव ऋषि वाणी के अनुसार वह व्यवस्था कालजयी बन गयी है ।उल्लू उल्लू न होने के बावजूद भारतीय मनीषा में मूर्खता का पर्याय बना है .
अब ज्ञानी जन भी यह मानते भये हैं कि बदलते परिदृष्य में वित्त का जुगाड़ ज्यादा जरूरी है .अतः हे माँ लक्ष्मी के वाहन मैं तुमसे अपने पुरनियों के किए धरे की माफी माँगता हूँ -तू तो मेरे घर का द्वार लक्ष्मी मैया को दिखा और इस नयी नयी हिन्दी ब्लॉगर बिरादरी के यहाँ भी उनका कम से कम एक विजिट करा दे .....हम तुम्हे ज्ञानी मानते हैं -हम नए युग के लोग है अर्थ की महिमा को बखूबी मानते हैं -अतः हे निशाचर मुझ अकिंचन पर भी रहम कर -हमारे पूर्वजों के किए धरे की खामियाजा हमसे मत वसूल -हम हंस को नही अब तुम्ही को पूजने को तैयार है - अभी से इसी दीपावली से ! जय उल्लू भ्राता की ! जय लक्ष्मी मैया की !
मित्रों आप सभी को दीपावली पर्व पर सुख -समृद्धि की हार्दिक शुभकामनाएं !

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2008

ब्लॉगर या टिप्पणीकार -काके लागूं पायं !

अनूप शुक्ल जी के लिए सचमुच यह भाव सच्चे मन से निःसृत हो रहा है कि वे ब्लागजगत के एक कुशल टिप्पणी भाष्यकार हैं -अभी एक दो दिन पहले ही उनका टिप्पणी भाष्य का नया संस्करण आया है उनके चिट्ठे पर -आपको भी याद होगा .जिन्हें याद नही उनके लिए शायद यह चर्चा नही है .उन्होंने अपनी बात शास्त्री जी के टिप्पणी वाली चर्चित पोस्ट पर लिखी थी -पहले भी इस खाकसार की टिप्पणी वाली पोस्ट पर उन्होंने जो टिप्पणी की थी उसमें अपने एक पहले के टिप्पणी चर्चा का जिक्र किया था -लुब्बेलुआब यह कि टिप्पणी शास्त्र पर उनका अब एकाधिकार सा होता जा रहा है -और यह बात मैं अभिधा में ही कह रहा हूँ कोई यमक या श्लेष नहीं .मैंने इन्हे टिप्पणी शास्त्र विशारद तभी मान लिया था जब उन्होंने यह जोरदार टिप्पणी की कि ज्ञान जी का ब्लॉग वहाँ आने वाली टिप्पणियों के लिए ही जानी जाती हैं -हाँ वहाँ ऐरो गैरों की सचमुच नही चलती क्योकि मैंने भी यह समझ बूझ लिया है कि जो ज्ञानी पुरूष की अभिजात्य मानसकिता होती है या होनी चाहिए -ज्ञान जी उसकी प्रतिमूर्ति हैं ,तो वहां जाने पर ज़रा कैजुअल अप्रोच से काम नही चल पाता इसलिए सभी यहाँ तक कि ख़ुद अनूप जी भी वहाँ अतिरिक्त सावधानी से ही टिप्पणियाँ करते हैं और ज्ञान जी के आभा मंडल को परिधि में बनाए रखते हैं (ताकि वह बिखर ना जाए ) ।
अभी अभी चिट्ठा चर्चा में हीएक मसला -मत विमत ऐसा भी आया कि कुछ मित्र केवल अपने ही लिखे पर आत्ममुग्ध हो टिप्पणियों कीअपेक्षा करते हैं -दूसरों की पढने की इच्छा ही नही करते -मानों वे सर्व ज्ञान संपृक्त हो चुके हों -मैं भी ऐसे कई लोगों को जानता हूँ ।
कभी कभी तो यही लगता है कि बीच बीच में हिन्दी जगत के पुरोधा चिट्ठाकारों को अपना महान लेखन सप्ताह -पखवारे तक स्थगित कर दूसरों का लिखा ही पढ़ते रहना चाहिए और खूब मुक्त भाव से यथा सम्भव और यथोचित टिप्पणियाँ उसी मनोयोग से करनी चाहिए जैसे कि वे अपना ख़ुद का चिट्ठा ही लिख रहे हों -पर उपदेश कुशल बहुतेरे की बात नहीं यह मैं ख़ुद शुरू करने की गंभीरता से सोच रहा हूँ .इससे कई फायदे होंगे -हम दूसरों केलेखन से जहाँ मनोयोग से परिचित होंगे वहीं एक सहिष्णुता का भाव भी ब्लॉग जगत में व्याप्त /व्यापक होगा जिसकी आज जरूरत है -अनूप जी ने भी इस बातको टिप्पणी मे ही कहा है कि दूसरों की बात के मर्म को ठीक से लोग समझे और संवाद कायम करें .तभी सार्थक चर्चा का नैरन्तर्य बना रहेगा .अब उनकी यह नसीहत ठीक से समझी गयी या नहीं राम जाने !
पता नहीं क्या क्या बातें मन में उमड़ घुमड़ रही थीं जो यह पोस्ट शुरू की पर अब इसका उपसंहार किया जाए -
समीर जी का सचमुच कितना प्रणम्य व्यक्तित्व है कि वे कितने ही पोस्टों को पढ़ते हैं टिप्पणियाँ करते हैं और अपना हर बार का धांसू फांसू पोस्ट भी लिखते हैं ,वे अभी तक तो हिन्दी ब्लागजगत के कालिदास ही हैं क्योंकि उनके बाद दूसरेनंबर पर तो कोई दीखता नहीं -तीसरे नंबर पर ज्ञान जी हैं ,शास्त्री जी हैं और कई और भी विद्वान् तेजी से उभर रहे हैं ।
तो समीर जी एक सफल चिट्ठाकार के साथ ही एक प्रखर टिप्पणीकार भी हैं ! एक परफेक्ट ब्लेंडिंग ! और बाकी सब चिट्ठाकार ज्यादा टिप्पणीकार कम हैं -एक अपवाद है अनूप जी जो चिट्ठाचर्चा के ही बहाने विशुद्धतः टिप्पणी चर्चा ही तो कर रहे हैं -वे एक टिप्पणीकार है -टिप्पणी भाष्य कार भी हैं .अब मैं निष्पत्ति पर आ रहा हूँ -किसके पायं लगूं -एक महान चिट्ठाकार के या किसी महान टिप्पणीकार के ! अभी महान चिट्ठाकार का शायद अवतरण नही हुआ है -समीर जी अगर टिप्पणी कम कर दे तो अवश्य उस श्रेणी में आ जायेंगे पर शायद यह होगा नहीं और तब तक अनूप जी को ही एक विद्वान टिप्पणीकार भी स्वीकार करते हुए उनके पायं -जो पता नही धोती में छुपे हैं या पतलून या पैंट में ,लगना ही श्रेयस्कर है .आईये हम एक श्रेष्ठ टिप्पणीकार का अनुसरण करें -महाजनों ये गतः सा पन्थाः !

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008

यादें -पुण्यस्मृति दिवस की !


५ अक्टूबर को पिता जी का पुण्य दिवस था .यह विगत ९ वर्षों से एक आयोजन के रूप में मेरे पैतृक निवास -चूडामणिपुर ,बख्शा ,जौनपुर में मनाया जाता रहा है .ऐसा नहीं है कि उन उनके दोनों पुत्र -एक मैं और मेरे अनुज डॉ .मनोज मिश्र बहुत लायक पुत्र हैं और एक अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं .बल्कि यह एक जन कार्यक्रम है ,बहुत अच्छी शिक्षा और मेधा के बावजूद पिता जी गावं में ही रह गए -और आज उनकी लोक गम्यता ही प्रतिस्मृति के रूप में उन्हें वापस हो रही है -लोगों की उनके प्रति यह स्वप्रेरित श्रद्धांजलि है जो हर वर्ष उनकी स्मृति को तरोताजा करती है .अंगरेजी की एक कहावत है कि जीवन में जैसा निवेश आप करते हैं वही आपको उत्तरार्ध में वापस होता है . पिता जी की रचनाएं सरस्वती में छपी , वे कल्याणमन लोढा और आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री जी के स्टुडेंट रहे .रामचरित मानस में उनका अगाध प्रेम था -भारतीय वांग्मय पर तो उनका अध्ययन विस्मित करने वाला था -इस ब्लॉग पर समय समय पर उनकी रचनाएं भी आपको पढने को मिलेंगी .साहित्यानुराग मेरी नजर में उनका ऊज्वल, सबल पक्ष था और राजनीति में रूचि दुर्बल पक्ष .शायद राजनीति ने उनकी असीम संभावनाओं पर ग्रहण भी लगाया . सभी तो आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हो सकते जिन्होंने कविता और राजनीति को साथ साथ साध लिया .

उन्हें नौकरी और किसी की दासता स्वीकार नहीं थी -उनका आदर्श वाक्य ही था -पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं .यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है -मुझे अफसोस होता है कि इस बात पर मुझ मूढ़ द्वारा बहस कर उनका कईबार दिल दुखाया गया .पर आज लगता है मनुष्य जैसे नश्वर और क्षणभंगुर जीव के लिए समझौते करते रहना सचमुच कोई पुरुषार्थ नहीं है -उन्होंने अपने शर्तों पर जीवन जिया और आज क्षेत्र में अपनी यशः काया में जीवित हैं ।
मैं सोचता हूँ मैंने तो एक चाकरी कर ली है पर क्या इस स्थूल शरीर के बाद भी मुझे कोई जानेगा ? वैसे ऐसी मेरी कोई इच्छा नहीं है पर कहते हैं न कि अमरता की चाह तो सभी में होती है -सभी अपनी यशः काया में बने रहना चाहते हैं .
पर मुझे कभी कभी यह सुखानुभूति अवश्य होती है कि मैं एक बहुत ही योग्य पिता का पुत्र हूँ और इसलिए ख़ुद को नालायक भी नहीं कह सकता -क्योंकि आत्मा वै जायते पुत्रः .
पुनश्च -मित्रों यह मेरी एक नितांत निजी पोस्ट है ,आप पढ़ तो लें पर टिप्पणी आवशयक नहीं .

शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?

महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
गर्व से कहता ताल ठोंक कर -
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
चाहे जितना ही लिख मारो
प्रवचन करते रहे शास्त्र पर ,
नही असर पड़ने वाला है
वज्र हुआ ईमान बेच कर
नित नूतन महफ़िल सजती है ,
स्वर्ग कैद है हाथ हमारे
मरे थैलों पर चलते हैं -
मुल्ला पंडित कवि बेचारे ,
गर्व से कहता ताल ठोक कर
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
सुरा सुन्दरी की दुनिया से
किंग कोबरा सा फुफ्कारे
काले धन के उच् शिखर से
हाथ उठा फिर फिर ललकारे
भ्रष्ट रहा हूँ ,भ्रष्ट रहूँगा -
चाहे जितना जोर लगा ले !
गर्व से कहता ताल ठोक कर
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
टूटे नेता टूटे अफसर
टूटी जनता टूटी आशा
विद्यामंदिर भी सब टूटे
टूट रहा समाज का नाता ,
सब कुछ टूट चुका है लेकिन
मैं दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता ,
गर्व से कहता ताल ठोंक कर
महा भ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे ?
प्रेस मालिक अपना जिगरी है
सम्पादक ? मेहमान हमारे !
राजा दादा ,अपना ही है
कौन तुम्हारे है रखवारे ?
साक्ष्य हमारे टुकडों जीता
न्याय हमारे पाकेट में है
शासन मेरी बाट जोहता
सारी सत्ता साथ हमारे
जो सक्षम हैं वे सब मेरे-
किसके बल तुम आँख दिखाते
गर्व से कहता ताल ठोंक कर
महाभ्रष्ट हूँ क्या कर लोगे
(राजेन्द्र स्मृति से साभार ,२०००)
यह कविता स्वर्गीय पूज्य पिता जी,डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्र ( सितम्बर १९४०- अक्टूबर १९९९) ने १९९० के आसपास लिखी थी .कल उनका पुण्य दिवस है और मैं इस अनुष्ठान में भाग लेने गावं (जौनपुर ) जा रहा हूँ .वहाँ नेट की सुविधा अभी नही है इसलिए यह कविता श्रद्धांजलि स्वरुप क्वचिदनयतोअपि पर आप मित्रों के लिए छोडे जा रहा हूँ ! उम्मीद है पसंद आयेगी !




गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

हिन्दू धर्म -स्फुट विचार !

इस समय हिन्दी ब्लागजगत मजहबी द्वन्द्वों से आंदोलित सा है -मजहब को लेकर सबकी अपनी अपनी प्रतिबद्धताएं हैं और लोग अपने स्टैंड से एक इंच भी आगे पीछे होने को तैयार नहीं हैं .आश्चर्य तो यह है कि अब हिन्दू भी कई बातों को लेकर अकड़ने लगे हैं -यह उनका प्रतिक्रया वादी स्टैंड है !
कुछ बातें सूत्र रूप में ही कहना है -लेकिन सबसे पहले माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्बारा "हिन्दू धर्म "पर कुछ वर्ष पहले व्यक्त एक अभिमत कि "दरअसल हिन्दू धर्म एक जीवन दर्शन है -"धर्म की किसी सकीर्ण परिभाषा में इसे बाँधना मुश्किल है .आख़िर धर्म क्या है ?
जो धारण किया जाय या धारण करने योग्य हो वही धर्म है .एक उदाहरण से इसे समझें तो बात बहुत आसान हो जायेगी .रेडिंयम् एक चमकने वाला पदार्थ है -पुरानी घडियों में इसी के हलके लेप से अंधेरे में अंकों को देखकर समय ज्ञात होता था .आज रेडियम परिवार के अनेक तत्व हैं और प्रकाश विकिरण के गुण को रेडियो एक्टिविटी के नाम से जाना जाता है -यह प्रकाश विकिरण ही इन तत्वों का गुण धर्म है -उनकी रेडियोधर्मिता है ।
विज्ञान का सेवक हूँ ना इसलिए यह उदाहरण विज्ञान की दुनिया से !आख़िर मनुष्य का धर्म क्या है ! या क्या होना चाहिए ? इस पर मजहबों की पोथियाँ हैं और हम सब मनुष्य को धारण करनेवाले कितने ही उदात्त बातों को एक साँस में कह सकते हैं -पर फिर यह खून खराबा क्यों ? यह मंदबुद्धियों की देन है -जो पोंगे और कठमुल्ले बने हुए है उन्होंने अपने धर्मग्रंथों विकृत कर डाला है ,वस्तुतः उन्हें अपवित्र कर डाला है ।
अब हिंदू धर्म को ही देखिये -इतनी उदार ,व्यापक सोच शायद ही कहीं है ! यहाँ कोई प्रतिबंध नही है -
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आप इश्वर को माने या ना माने आप हिन्दू है !
आप मन्दिरजाएँ या ना जाएँ आप हिन्दू हैं
आप मांस खाएं या ना खाएं आप हिन्दू है
आप शराब पियें ना पियें आप हिन्दू हैं
आप धूम्रपान करें या करे आप हिन्दू हैं !
आप व्रत रखे या ना रखे आप हिन्दू है .
हिन्दू इतनी स्वतंत्रता को एन्जॉय करता है कि वह केवल देव दुर्लभ है !
हमारीबौद्धिक यात्रा ही "इदिमिथम कही सकई ना कोई " की रही है -चरैवेति चरैवेति की -यानी सत्य की खोजमें चलते रहो चलते रहो जिसे तुम अन्तिम सत्य मान बैठे हो वह सत्य का पासंग भी नही है -कितना वैज्ञानिक सम्मत चिंतन है यह -विज्ञान की दुनिया में फतवे नहीं होते -अंध श्रद्धा नही होती !
क्या ऐसे ही नहीं हो सकते दुनिया के सभी धर्म ?
मुझे बहुत संतोष है कि मैं हिदू हूँ क्योंकि अगर कुछ भी और होता मसलन एक मुसलमान तो मुझे इश्वर पर जबरिया विश्वास करना पङता !
क्यों सच कहा ना ?

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

देवी दुर्गा का वाहन सिंह या बाघ !

व्याघ्र वाहिनी माँ दुर्गा !
आज से नवरात्र शुरू हो रहा है -शक्ति पूजा का एक बड़ा अनुष्ठान ! मेरे मन में एक सवाल उमड़ घुमड़ रहा है जिसे मैं आप के साथ बाँटना चाह रहा हूँ -देवी दुर्गा को कहीं तो बाघ और कहीं शेर पर आरूढ़ दिखाया गया है -सबको पता है है कि ये दोनों अलग अलग प्राणी हैं -सभी देवी देवताओं का अपना अलग अलग एक निश्चित वाहन है .इन्द्र का ऐरावत हाथी ,यमराज का भैंसा ,शिव का नंदी ,विष्णु का गरुण ,आदि आदि अरे हाँ पार्वती का व्याघ्र या पति के साथ वे नंदी को भी कृत्य कृत्य करती हैं .वैसे तो मां पार्वती के परिवार में कई वाहन हैं मगर वे चूहे को छोड़ सभी पर ,नंदी-वृषभ ,बाघ और मोर पर भ्रमण करती देखी गयीं हैं .क्या पार्वती का वाहन बाघ और माँ दुर्गा का वाहन शेर है -दुर्गा जी क्या सचमुच शेरावालिये हैं ! मामला पेंचीदा है तो आईये इस मामले की थोड़ी पड़ताल कर लें क्योंकि आज से नवरात्र की पूजा शुरू हो रही है और हमें अपनी अधिष्टात्री के स्वरुप ध्यान के लिए इस गुत्थी को सुलझाना ही होगा ।
पहले तो यह जान लें कि समूची दुनिया में भारत ही वह अकेला देश है जहाँ बाघ और शेर का सह अस्तित्व है .चित्र में आप बाघ और शेर को सहज ही पहचान सकते हैं .अफ्रीका में भी शेर है तो बाघ नदारद ! रूस में बाघ है तो शेर नदारद ! चीन में भी बाघ है पर शेर का नामोनिशान नहीं .भारत का राष्ट्र पशु भी १९७२ तक शेर ही था पर बाघों की गिरती संख्यां से विचलित भारत सरकार ने प्रोजेक्ट टाईगर के साथ ही इस देश का रास्त्रीय पशु भी बाघ घोषित कर डाला ।
तो पहले भारत में कौन आया शेर या बाघ ? कैलाश सांखला जैसे वन्य जीव विशेषज्ञों की माने तो बाघ भारत में सबसे पहले आया .सिन्धु घाटी के लोगों को शेर की जानकारी नहीं थी जबकि उस काल की मुद्राओं पर बाघ की छाप अंकित पाई गयी है .शेर का उल्लेख वैदिक काल से मिलाने लगता है .अब अपने आदि देव शंकर को ही लें -वहां बाघम्बर( व्याघ्र चर्म ) है ,पार्वती बाघ पर आरूढ़ दिखती हैं .कैलाश सांखला जोर देकर कहते हैं कि बाघ भारत में हर हाल में ४५०० ईशा पूर्व से मौजूद है .शेर की मौजूदगी का प्रचुर विवरण सम्राट अशोक के काल से मिलने लगता है .एशियाई सिंहों के बारे में पारसियों को अछ्ही जानकारी थी .ऐसा प्रतीत होता है कि १५०० ईशा पूर्व से भारत में व्याघ्र सत्ता का पराभव और शेर का वर्चस्व शुरू होता है.इसकी पुष्टि संस्कृत साहित्य से भी होती है .शेर की सत्ता स्थापित होने में सम्राट अशोक की भी बड़ी भूमिका लगती है -भारत के स्वतंत्र होने पर सम्राट अशोक की पटना में स्थापित लाट (३०० वर्ष ईशा पूर्व )से ही भारत का रास्त्रीय चिह्न चुना गया जिसमे शेरों को ही प्रमुखता से दिखाया गया है ।अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत में अपनी अपनी सत्ता स्थापित करने की धमाचौकडी बाघ और शेर के बीच आदि काल से चलती रही है -कभी बाघ ऊपर तो कभी शेर ! पर यह तय है कि बाघ ही हमारा आदि साथी है जो इस समय राष्ट्रीय पशु के रूप में ही प्रतिष्ठित है -जब किंग एडवर्ड सप्तम -प्रिंस आफ वेल्स ने १८५७ में बिहार के पूर्णिया क्षेत्र में बाघ का शिकार किया तो वाहवाही में भारतीय बाघ को रायल बंगाल टाईगर का खिताब नवाजा गया .आख़िर वह किसी ऐरे गैरे की गोली का शिकार थोड़े ही हुआ था -तो रायल बंगाल टाईगर भारत में कहीं भी मिलने वाला बाघ है केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं ।
तो अब आप ही निर्णय लें कि माँ दुर्गा का आदि वाहन क्या था -मेरी अल्प बुद्धि से तो यह बाघ ही था पर कालांतर के सामयिक परिवर्तनों से उनके भक्त जन भी अपनी अधिष्टात्री को बदल बदल कर वाहन अर्पित करते रहे कभी बाघ तो कभी शेर -पंजाब में तो वे पूरी तरह शेरावालियाँ ही हो गयीं है -इस बार के पूजा पंडालों पर ज़रा गौर करें देवी किस वाहन पर आरूढ़ दिखती हैं -बाघ तो मान शेर पर !वैसे पर वे बाघ पर आरूढ़ हों या शेर पर उनकी शक्तिमत्ता में तो रंच मात्र का फर्क नहीं रहेगा .या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपें संस्थिता ...........

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

बिग ब्रदर से बिग बास तक का सफर -कहीं कुछ घपला है !

बिग बॉस की अधिष्ठात्री शिल्पा शेट्टी
इस समय भारत में रियलिटी शो के नाम पर बिग बॉस का डंका बज रहा है .यह अभी पिछले वर्ष इंग्लैंड में चर्चित हुए बिग ब्रथर रियल्टी शो की ही भोंडी/देशी नक़ल मात्र है जिसमें शिल्पा शेट्टी नाम्नी अभिनेत्री को नस्ल भेदी टिप्पणियों से रूबरू होने का मामला सारी दुनिया में काफी उछाला गया था . दरअसल बिग ब्रदर शब्द से ही सुप्रसिद्ध ब्रितानी उपन्यासकार जार्ज आरवेल के मशहूर नॉवेल ,1984 की याद जाती है। `बिग्र ब्रदर इज वाचिंग यू´ (देखो, खूसट दादा/बुड्ढा देख रहा है) इसी उपन्यास से निकला हुआ वह जुमला है जिसका इस्तेमाल प्राय: निजी जीवन में किसी के हस्तक्षेप-ताक झांक के प्रयासों के समय किया जाता है। यह वाक्य-जुमला निजता में हस्तक्षेप के विरुद्ध कुछ न कर पाने की असहायता को भी इंगित करता है।
कभी जॉर्ज आर्वेल जैसे युग द्रष्टा ने प्रौद्योगिकी की रुझान को भांप लिया था और यह पूर्वानुमान कर लिया था कि कालांतर में ऐसी जुगते जरूर बन जांयेगी जिससे हर किसी को हर वक्त वॉच किया जा सकेगा .निजता जैसी बात नही रह जायेगी -यह भविष्य का एक खौफनाक मंजर था -लोग ऐसी दुनिया की सोच से ही खौफजदा हो गए थे -यह भी कोई बात हुयी -सोते जागते ,खाते पीते ,काम केलि तक भी कोई आपको ताक रहा है -देख रहा है .और हाँ आज के मोबाईल ,क्लोज सर्किट कैमरा आर्वेल की उस दूर दृष्टि पर ही मुहर लगा रहे हैं .आज नियोक्ता से बच के आप नहीं रह सकते .....वह हर वक्त आपको घूर सा रहा है !
मगर इस दहशतनाक मंजर को भी रियल्टी शो के जरिये मनोरंजक बना देने की सूझ सचमुच अप्रत्याशित है -बिग ब्रथर और बिग बॉस जैसे शो के जरिये आज लोगों की निजता भी अब बिकाऊ बन गयी है -लोग अपनी निजता भी बेंच रहे हैं और हमारे आप जैसे फालतू लोग ऐसे चरित्रों से तादात्म्य बनाते हुए इन प्रयासों को हिट बना रहे हैं-भारत में कोलोर चैनेल पर बिग बॉस इस समय टी आर पी में हिट जा रहा है -हद तो यह है कि इसके ज्यादा तर पात्र अपने वास्तविक जीवन में अपराधी या नकारात्मक छवियों वाले रहे हैं -मगर रील की अपनी रीयल लाईफ में वे हिट जा रहे हैं -क्या यह लोकरुचि में एक खतरनाक बदलाव का संकेत तो नही है -हम जरायम पेशा लोगों को तो कहीं अपने हीरो के रूप में तो नही देख रहे हैं -क्या पारंपरिक आदर्शों के दिन लद चुके क्या सचमुच अब हमारे सामने अब मोनिका बेदी और राहुल महाजन जैसों का ही आदर्श अपनाने को रह गया है ?कहीं आम लोगों /दर्शकों की सुरुचि प्रियता को को संगठित तरीके से विनष्ट तो नही किया जा रहा है ? क्या जीवन मूल्यों में सायास रद्दोबदल से व्यावसायिकता का नया घिनौना खेल तो नही शुरू हो गया है ?
बिग ब्रदर से बिग बॉस तक का सफर हमें इन बातों को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है ! आपकी राय क्या है ?

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