शनिवार, 30 अप्रैल 2011

शब्द नहीं,चरित्र बोलता है!

बहुत से लोगों की यह आम शिकायत होती है कि उन्हें कोई ठीक से समझ ही नहीं पा रहा ...आखिर अगले को कैसे किन शब्दों में समझाया जाय कि वह मुझे और मेरे दुःख दर्द को समझ जाय ...कई बार तो बात इतनी बिगडती जाती है कि जितना ही समझाने में शब्दों का अम्बार बढ़ता जाता है उस तरफ  गलतफहमी भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है ..अजीब सी स्थिति होती है यह! नामी गिरामी लोगों के साथ भी कई बार ऐसी स्थति उत्पन्न हो जाती है -कहते हैं कि एक बार हनुमान जी भी बिचारे एक ऐसी फजीहत में पड़ गए तो उन्हें अपनी छाती ही चीर कर दिखानी पड़ गयी -बहरहाल वहां तो राम लला विराजमान मिले. मगर हम जैसे छुटभैये क्या करें जब ऐसी स्थिति से दो चार होना पड़ जाय -अब इतने हिम्मती भी नहीं कि एक तो खुद  अपनी छाती चीर दें और उसके बाद अगर वह जुडी नहीं तब ? यह डर ,संशय ही ऐसे करामाती एक्शन  को अंजाम देने से हठात रोक  देते  हैं -अब हनुमान सरीखे चमत्कारी होने  का गुमान तो हम रख नहीं सकते और किसी राम की  कृपा भी प्राप्त नहीं? तब कोई विवश बिचारा करे क्या?



मगर क्या  हम जो कहते हैं और जो करते हैं उसमें सचमुच संगति रहती है? वैज्ञानिक कहते हैं मनुष्य के व्यवहार का ९० फीसदी प्रगटन -संचार गैर वाचिक होता है -मतलब वहां शब्द नहीं हाव भाव बोलते हैं ..जो मुंह में राम बगल में छुरी की पोल खोलते रहते हैं ..मगर फिर भी कुछ लोग वक्तृता में इतने कुशल होते हैं कि उनके बोले गए हर्फ़ दर हर्फ़ विश्वसनीयता की गारंटी से लगते हैं -अंतर्जाल में तो यह और भी आसान है -यहाँ तो शब्द ही सचमुच ब्रह्म है .....यहाँ तो बोलने वाले इतने मुखर हैं कि कईयों ने बोल बोल कर ही अपनी अच्छी खासी साख बना रखी है -हर दिल अजीज बन बैठे हैं ...युवा वृद्ध ह्रदय सम्राट /साम्राज्ञी बन बैठे /बैठी हैं ..क्योंकि यहाँ शब्द ही चलते हैं या बल्कि कहिये दौड़ते हैं -हाव भाव दीखते ही नहीं -इसलिए अक्सर कोई न कोई लोचा लफड़ा होता ही रहता है ....

मेरा मानना है  कि ज्यादातर जनता बड़ी भोली होती है और यह ब्लॉग जगत भी कोई अपवाद नहीं है ....अक्सर यहाँ लफ्फाजियों के जाल में लोग फसते जाते है -और जाल भी ऐसा कि एक बार फंसे तो खुदा न खास्ता बाहर निकल भी गए तो सलामती संभव नहीं ....भोगा यथार्थ यह है कि इस जाल जगत में सम्बन्धों के सहज परवान चढ़ने के पहले अतिशय सावधानी जरुरी है ....यहाँ सम्बन्धों का समीकरण  एक अंधी सुरंग  की ओर लिए चलता है और जब आँख खुलती है तो चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा दीखता है -यहाँ कथनी और करनी का फर्क बड़ा वाईड है ......

मैंने व्यवहार शब्द के लिए यहाँ चरित्र शब्द लिया है जिस पर मेरे कुछ तार्किक मित्रों को आपत्ति हो सकती है क्योकि इससे नैतिकता (की घुट्टी पिलाने ) की बू आती है ....उनकी यह आपत्ति जायज है -मगर चरित्र शब्द शायद  किसी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का खाका खीचता है और उसके जीवन के पूरे टाईम और स्पेस को भी समाहित किये हुए है -ब्लॉग जगत में चरित्र ढूंढना एक आत्मघाती कदम है -यहाँ नक्कालों का पूरा साम्राज्य (जिनमें  मेरी गिनती सबसे ऊपर है ) कायम है ..यहाँ जो अजेंडे दीखते हैं वस्तुतः वे हैं नहीं -और जो यह अनवरत प्रचार करता रहे कि वह तो सबसे बड़ा समाज सुधारक है मेरी ही तरह सबसे बड़ा पाखंडी है .....उसके हिडेन अजेंडे दूसरे  हैं .नक्कालों  से सावधान! भौतिक और प्रत्यक्ष दुनिया में जिन तमाम लोगों की दाल नहीं गली यहाँ वे यहाँ पकवान परोसने में लगे हैं ....


अभिषेक ओझा जी ने अंतर्जाल के ऐसे खतरों   पर एक प्रभावशाली पोस्ट काफी पहले लिखी थी -अगर उनकी निगाह इस पोस्ट पर पड़ जाय तो आग्रह है कि वह लिंक ब्लॉग  जन हिताय जरुर दे दें ! बाकी तो राम ही राखें!

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

हिन्दी ब्लॉग जगत का काव्य कर्म: कतिपय विचार

यह प्रसन्नता की बात है कि हिन्दी ब्लॉग जगत में काव्य कर्म को एक अग्रणी स्थान मिल चुका है -काव्य से यहाँ  मेरा अर्थ पोयेट्री से है .इस क्षेत्र में महिला ब्लॉगर काफी सक्रिय हैं -यह भी एक शुभ लक्षण है . पुरुष कवि ब्लागरों के काव्य कर्म का फलक  जहाँ काफी विस्तीर्ण और विषय की विविधताओं से भरा हुआ है -नारी ब्लॉगर प्रायः आत्मकेंद्रित भाव विभाव ,वियोग और पुरुष के द्वारा छले जाने जैसी  आत्मानुभूतियों से लबरेज कविताओं के सृजन में मग्न दीखती हैं .खाटी और चोटी के मगर चुटिया विहीन ब्लॉगर अनूप शुक्ल ने हिन्दी ब्लॉग जगत के काव्य कर्म पर स्वभावतः एक तीखी चुटकी भी ली है ....वैसे यहाँ के  काव्य कर्म और  चौर्य कर्म में कभी कभार काफी साम्य दिखायी दे जाता है -मगर वह एक अलग विषय हो जाएगा जिसकी चर्चा फिर कभी ..

मेरा  काव्य शास्त्र के  पिंगल या निघंटु से कोई साबका नहीं रहा है मगर कविता की थोड़ी बहुत समझ का मुगालता जरुर रहा है ... .और यह समझ तभी से विकसित होनी शुरू हो गयी थी जब पन्त जी की यह कालजयी पंक्ति पढी थी -वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान -उमड़ आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान -मतलब  कविता एक सहज उद्दाम प्रवाह है जो एक उमड़ती घुमड़ती नदी के मानिंद   स्वतः स्फूर्त और सहज प्रगटन की प्रवृत्ति रखती है .. प्रसाद जब यह कहते हैं कि घनीभूत पीड़ा थी जो मन में छाई दुर्दिन में आंसू बन वह आज बरसने आयी तो कहीं पन्त सरीखी काव्य -भाव गहनता या विह्वलता की ही अभिव्यक्ति करते हैं ....यह तो कविता का एक पक्ष हुआ -भाव प्रवणता या भाव विह्वलता का ..मगर कविता का कोई यही एक पहलू थोड़े ही है ...कवि की कल्पनाशीलता ,भाव उर्वरता ,प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण जिसमें समानांतर  दुनिया के रंग ढंग भी शामिल हैं ,उसके निजी अनुभव ,विपुल अध्ययन ,भोगे हुए यथार्थ ,शब्द और भाषा की समझ,फंतासी और यथार्थ का निरूपण  आदि अनेक पहलू हैं जिससे मानव की यह  सुन्दरतम वृत्ति उत्तरोत्तर समृद्ध होती गयी है....इन सभी एक-एक पक्ष पर काव्य कला /कर्म का विवेचन इस अकिंचन पोस्ट में कहाँ संभव  है ...!

मुझे अक्सर लगता है कि कविता लिखना कोई हँसी ठट्ठा नहीं है ,यह सहज आलेख ,गद्य लेखन की तुलना में एक दुरूह कार्य है -भले ही मनीषियों द्वारा गद्यम  कवीनां  निकषं  वदन्ति कहा गया हो! मैंने ब्लॉग जगत की कविताओं को पढ़ते हुए पाया है कि जहाँ कुछ कवि /कवयित्री बहुत प्रभावपूर्ण लिख रहे हैं वहीं अधिकाँश की काव्य कृति  में अभी काफी सुधार की संभावना है ....और यह कतई अनुचित भी नहीं है -मगर दुःख इस बात का  है कि कई रचनाकार ऐसे सुधार के प्रति सहिष्णु नहीं दिखते-ब्लॉग जगत की एक स्थायी प्रवृत्ति बन चुकी है जयकारा लगाने की ....कविताओं पर टिप्पणियों में क्रिटिकल विश्लेषण /आलोचना के बजाय बस ठकुर सुहाती का बोलबाला है ...कहीं किसी कवि(कवयित्री समाहित ) से जिज्ञासा वश ही सही कोई पृच्छा कर लीजिये तो वह नाराज हो उठता है -कई एक तो मुझे दुत्कार भी चुके हैं कि आपमें कविता की समझ  ही नहीं है ..वैसे तो उनका यह आरोपण मुझे कविता की अपनी अल्प समझ का अहसास दिलाती रहती है मगर यह भी कोई बात हुई कि कुछ जेनुईन जिज्ञासा हो ही जाय तो ऐसी फटकार लगा दी जाय ... :(

कविता लिखना  मेरे लिए बहुत असहज है -वैसे भी विज्ञान का आदमी कहकर मैं अपने को इस हीन भाव से मुक्त कर लेता हूँ कि मुझे कविता लिखनी नहीं आती ..लोग बाग़ मान  भी जाते हैं -भलमनसाहत उनकी ...मगर मैं समझता हूँ कि विज्ञान की पद्धति और काव्य कर्म की प्रक्रिया में समानतायें कम नहीं हैं -जहाँ विज्ञान की रीति सूक्ष्म प्रेक्षण ,जिज्ञासा, विचार प्रस्फुटन,परिकल्पना और परीक्षण-सत्यापन और तब सिद्धांत का अवधारण करती है कविता भी लगभग इन्ही चरणों का अनुसरण करती है ....यहाँ भी जिज्ञासा ,भाव -विचार प्रस्फुटन और सुचिंतित भाव प्रस्तुति प्रमुखता लिए है -हाँ जहाँ विज्ञान उत्तरोत्तर वस्तुपरक होता चलता है कविता अपनी भाव निष्ठता को कायम रखती है -इसलिए ही यह बहुत कुछ व्यक्तिनिष्ठ बनी रहती है -यह कहना कि विज्ञान का ही अंतिम अभीष्ट सत्य की खोज है शायद  सही नहीं है -कविता का भी उत्कर्ष /उत्स परम यथार्थ की अनुभूति ही है ...मगर हाँ कविता का साध्य सत चित आनन्द है और यहीं वह विज्ञान से अलग हो उठती है -विज्ञान का कोई ऐसा लक्ष्य नहीं दीखता और शायद   इसलिए ही उसपर शुष्कता का चिर आरोपण भी हैं .  प्रायः काव्य सत्य और विज्ञान सत्य का अलगाव प्रत्यक्ष हो उठता है ...

अब मैं आज के इस प्रलाप लेखन के हेतु पर आता हूँ -कल अपने मित्र आशीष राय जी से कविता पर काफी चैट -विमर्श हुआ .उन्हें भी कविता लिखने का शौक है और उनकी कविताओं में राष्ट्रकवि की बाह्य झलक दिखती है -उन्होंने अपनी एक कविता में अन्ना हजारे की दृढ़ता को मैनाक पर्वत की दृढ़ता बतायी -मैंने प्रतिवाद किया -भैया मेरे ,मैनाक पुराणोक्त चलायमान उड़ने वाले पहाड़ की  श्रेणी में आते हैं और हनुमान के लंका प्रयाण प्रकरण में बीच समुद्र में मैनाक पर तनिक सुस्ता कर जब हनुमान ने फिर छलांग लगाई तो मैनाक  रसातल को चला गया -तो मैनाक किस कारण दृढ़ता का प्रतीक हुआ? बहरहाल काफी बहस मुबाहिसों के बाद उन्होंने मेरी बात का मान रख लिया और कविता आंशिक रूप से संशोधित हो गयी और मैं उनके इस औदार्य से अभिभूत किंवा ऋणी हो गया ....अब कल की अपनी एक कविता में उन्होंने शाम के वक्त चिड़ियों को सप्तम स्वर में गाने की बात कही -मैंने पूछा कि पंचम क्यों नहीं या और कोइ और स्वर क्यों नहीं, सीधे सप्तम ही क्यों? तो उन्होंने जवाब दिया कवि की मर्जी!....मैंने पूछा क्या कभी शाम के वक्त चिड़ियों का चहचहाना उन्होंने सुना है तो भोलेपन से उनका जवाब था नहीं -फिर ऐसा प्रयोग क्यों मेरे भाई? अब काव्य सत्य के नाम पर इतनी छूट? मैंने सुबह  सूर्योदय होते ही चिड़ियों का कलरव सुना है जो मुझे सप्त स्वरों को समाहित किये लगता है ..फिर दोपहर   की पपीहे की पंचम भी सुनी है मगर अब चिड़ियों का सप्तम सुनना शेष है -मुझे सच में नहीं पता कि सांझ भये वे सप्तम तक जा पहुँचती हैं .....काश मेरे काबिल कवि दोस्त ने इस निरीक्षण परीक्षण के बाद ही ऐसा काव्य प्रयोग  किया होता ..... बहस जारी है! 

रविवार, 24 अप्रैल 2011

यह लेख डाक्टर मछलियों के बारे में है!(caveat emptor )

 यह लेख डाक्टर मछलियों के बारे में है बस जानकारी के लिए -कोई सिफारिश नहीं है ...निर्णय पाठकों को खुद करना (caveat emptor )  है!

दमा  दम से जाता है ,इस लोक विश्वास के चलते इस बीमारी से निजात पाने के लिए हैदराबाद में प्रत्येक वर्ष जून माह के शुक्ल पक्ष में एक गौड़ परिवार के यहाँ एक विशाल मेले सा दृश्य होता है जहाँ एक अज्ञात नुस्खे वाली दवा मछली के मुंह में डालकर दमे के मरीज को निगलने को कहा जाता है .दवा के बारे में दावा है कि इससे  दमा का जड़ से इलाज हो जाता है!अब तो कई और शहरों में ऐसे मछली इलाज का दावा करते लोग किसी होटल में अपना डेरा जमाये दिख जाते हैं ...मेरी उत्सुकता थी आखिर लोगों के लिए यह वरदान बनी यह अभिशप्त मछली कौन है?

दमा के लिए इस्तेमाल की जा रही सौरी प्रजाति 
आन्ध्रप्रदेश को नीली क्रान्ति (मत्स्य उत्पादन क्रान्ति ) का पालना कहा जाता है -व्यावसायिक मछलियों के विभिन्न प्रकार और  उत्पादन में आंध्रप्रदेश की कोई सानी नहीं है ....मैंने खोजबीन की तो यह दमा  निवारक मछली  सौरी(चन्ना )  की एक छोटी प्रजाति निकली ...मगर इसके साथ गुप्त दवा का मेल दमा  ठीक कर पाता है मुझे इसमें संशय है! मुझे तो शर्तिया तौर पर आजकल दमा के इलाज में इनहेलर चिकत्सा का कोई जोड़ नहीं दीखता ..भले ही यह जड़ से दमा को उखाड़ न फेके, मगर है बहुत कारगर और एक स्थायी रिलीफ के लिए दमा  रोगियों के लिए बहुत मुफीद भी ..जब इनहेलर नहीं थे तो दमा एक कुख्यात रोग बना हुआ था ....तब ऐसे ही मछली आदि जैसे माजूम /अवलेह /खरबिरैया ही दमा के इलाज में इस्तेमाल होते थे.... 

त्वचा रोगों और घाव के लिए टंच इलाज टेन्च से ...

ऐसी ही एक और मछली है टेंच जिसे डाक्टर फिश का ही नामकरण मिला हुआ है और यह ब्रितानी मूल की है -इसके शरीर से निकलने वाला चिकना लसलसा(slime)  पदार्थ कई त्वचा रोगों को दूर करता है ऐसी बड़ी पुरानी मान्यता है ...मुझे लगता है कि इसके स्लायिम में कोई जीवाणु रोधी तत्व  है जो त्वचा के घावों /रोगों को पूजने में मददगार है ..
भद्दे खुरदुरे  पाँव -तलवों को  को साफ़ करा लो गर्रा मछली से 

एक मछली गर्रा रुफ़ा  इन दिनों और भी चर्चा में है -और इसे भी डाक्टर मछली का दर्जा दे दिया गया है जो पेडीक्योर के लिए खूब इस्तेमाल में लाई जा रही है -पैर /तलवे की फटी बिवाईयों पर यह झुण्ड में टूट पड़ती है और मृत त्वचा को कुतर कुतर कर साफ़ कर देती है ..पैरों का सौन्दर्य निखर उठता है! .

मेरी कोई सिफारिश नहीं है मगर चाहें तो इस्तेमाल में ला सकते हैं इन मछलियों को!  

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

अन्ना का बनारस आगमन


आज बनारस के अखबारों में यह खबर सुर्खियों में थी कि अन्ना हजारे साहब बनारस आ रहे हैं -मुझे भी खबर पढ़ते ही बड़ी प्रसन्नता हुयी -मन प्रफुल्लित हो उठा इस महान व्यक्तिव की एक झलक पाने की आशा मात्र से ही! ..मगर अगले ही क्षण कई तरह की आशंकाएं मन में घिर आयी है -उत्तर प्रदेश में अन्ना साहब की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का आगाज बनारस से ही क्यों ? क्या यह प्राचीन शहर भ्रष्टचारियों का गढ़ है? यहाँ भ्रष्टाचार के विरुद्ध बिगुल फूंकने की ज्यादा जरुरत है?और यहाँ  जनता जनार्दन भ्रष्टाचार से इतना पीड़ित है कि अन्ना को सर माथे लगाने के लिए विह्वल है ?  या फिर यहाँ सदाचारियों का बोलबाला है और यहाँ अन्ना साहब को पूर्ण समर्थन मिलने की ज्यादा संभावना है? 

जब अन्ना हजारे साहब जंतर मंतर पर अनशन कर रहे थे तो बनारस में काफी सुगबुगाहट थी ...यहाँ कई दिन कैंडिल मार्च भी हुआ! और यह तो पूरा मीडिया इवेंट  था ही -मीडिया का भरपूर समर्थन अन्ना साहब को यहाँ भी मिला ...और यह सर्वथा उचित भी था -आज मीडिया सक्रियता का युग है और मेनस्ट्रीम मीडिया ने अन्ना के प्रबल समर्थन में यहाँ  भी  आक्रामक  रणनीति बनाकर एक सार्थक सामजिक भूमिका निभाई, भले ही इसके निहितार्थों पर भी प्रबुद्धजनों ने उंगलियाँ उठायीं हैं  .

आज किसी भी देश के लिए ,खासतौर पर भारत जैसे भ्रष्ट देश के लिए अन्ना जैसा शिखर व्यक्तित्व   हजारों लाखों लोगों के लिए आशा और विश्वास का प्रेरणा स्रोत बन गया है .यह नाम हारे को हरिनाम बनता गया  है -लोग उन्हें देवता का दर्जा दे चुके हैं ...बहुतों  की आस के लिए वे आख़िरी सांस की डोर बन गए हैं! वे भारत की करोड़ों जनता के मनोभावों की नुमायन्दगी कर रहे हैं ...बनारस के लोग भी पलक पावडे  बिछाए उनकी  आगवानी को उतावले हो रहे हैं ..मैं भी उन्हें प्रत्यक्ष देखने सुनने जाने का मन बना लिया है ...मगर सोचता हूँ मो सम कौन कुटिल खलकामी? मगर फिर यह भी हो सकता है कि उनके दर्शन मात्र से मेरे कलुष मिट जाएँ! इसलिए मैं तो जरुर जाऊँगा ..


 और मुझे बल मिला है उनके स्वागतोत्सुक लोगों के बारे में जान सुन कर -मैं ही नहीं जितने नाम अभी तक स्वागत मंडली में  सम्मिलिति उभरे हैं वे  मेरी ही कोटि के कुटिल खल कामी ही हैं  -मुझे अपनी जमात में जगह मिलने में देर भी नहीं लगेगी ...और अन्ना  साहब के सानिध्य में रहने पर वैसे ही ईमानदारी का सार्टिफिकेट मिल जायेगा ...बहती गंगा में हाथ धोने से भला बनारसी कब चूकने वाले हैं ....मैं देख रहा था कि अन्ना की आगवानी के लिए वही रानी के डंडे(क्वींस बैटन) वाली टीम ही ज्यादा मुखर है और वही अपनी महिमा विस्तारित करने में जुट गयी है ..मुझे लगता है इसी टीम ने उन्हें निमंत्रित भी किया है ..
..

कई बार यह लग रहा है की कहीं एक सच्चे सच्चरित्र सीधे साधे  व्यक्ति के इर्द गिर्द ऐसे लोगों की तो भीड़ नहीं जुट रही है जो जनता के सामने अपनी सफ़ेद पोशाकों को दिखाकर मानो यह प्रमाणित करना चाहते हों कि देख लो दुनिया वालों हम तो अन्ना के खासम ख़ास हैं और ईमानदारी की लड़ाई अन्ना हमारे बलबूते ही लड़ रहे हैं -वे प्रकारांतर से  नागरिक इकाईयों या फिर शासन प्रशासन  पर रोब भी जताना चाहते हैं जिनसे अपने कारोबार के सिलसिले में उनका साबका  पड़ता रहता है - यहाँ यह कहावत भी चरितार्थ होती लगती है कि नौ सौ चूहे  खाय बिल्ली  हज को चली   -कहना नहीं है ऐसे बगुला भगतों से अन्ना को सावधान हो जाना चाहिए !

ईमानदारी की मुहिम बड़ी कंटकाकीर्ण है -अन्ना साहब को फूँक फूँक कर कदम रखना है -उन्हें ऐसी मदद और सहायता  प्रस्तावों को ठुकराना होगा जिनकी स्थति बहुत स्पष्ट न हो ....उन्हें गांधी जी की तरह चौकस रहना होगा ..अपने पैसे से ट्रेन से सफ़र करना होगा और सभास्थल तक भी अपने किराए की वाहन की व्यवस्था करनी होगी -और यह सब मुखर होकर बताना भी होगा  -नहीं तो मौका परस्त लोग इस शख्सियत  को भी अपने हितों के लिए साध लेंगें और हमारी सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा ...देखना है अन्ना का बनारसी दौरा क्या रंग लाता है ? 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

आईये शनि दर्शन का लाभ उठाईये!

इस माह में धरती से शनि करीब होंगे और नंगी आँखों से दिखेगें यह समाचार आते ही मन इस खगोलीय घटना को देखने को ललक  उठा था ....बताया गया था कि ६ अप्रैल को ही शनि का सुन्दर नजारा दिखेगा ..मैं तभी से इस अवसर का लाभ उठाने को व्यग्र था ..मेरी  बात दर्शन बवेजा जी से भी हुयी जिन्हें विज्ञान में काफी रूचि है ....उनका दावा था कि उन्होंने शनि को ६ अप्रैल को ही देख लिया था -मगर मैं उतना भाग्यशाली नहीं था और यहाँ बनारस का आसमान भी कई दिनों से साफ नहीं था -बादल और धुंध से भरा था ...लिहाजा मैं मन मसोस करके रह गया मगर मेरा शनि अन्वेषण जारी रहा और आज तो खूब आह्लादित हूँ -आज यहाँ रात्रि -आसमान बिलकुल साफ़ है और शनि अपने पूरे सौष्ठव के साथ पूर्व दिशा को आलोकित कर रहे हैं!और अंधे को भी दिख जाएँ इतना साफ़ दिख रहे हैं!

 इस चित्र के सहारे आसानी से पहले स्वाति तारे(Arcturus )  तक पहुंचे फिर आगे चित्रा(Spica )  तक ..बस चित्रा के ऊपर ही शनि महराज हैं!

 भारतीय फलित ज्योतिष और आख्यानों में शनि सूर्य के पुत्र हैं ..मगर पिता पुत्र में बड़ी अनबन है ..पटती नहीं ,इसलिए वे सूरज के अंगने के आख़िरी छोर पर जा पहुंचे हैं ...वे सूर्य - छाया संसर्ग से उत्पन्न हैं इसलिए काले कलूटे हैं ..मेरे बनारसी ज्योतिषी मित्र ने आगाह किया कि मैं शनि को न देखूं क्योकि वे इस समय मेरी ही -कन्या(virgo )  राशि में हैं और चूंकि उनके सूर्य परिक्रमा की गति बहुत धीमी है ,शनैःशनैः वे अपने पथ पर अग्रसर रहते हैं (इसलिए शनिश्चर ) और   एक ही राशि में  ढाई साल तक बने रहते हैं ...अपने पिताश्री सूर्य की परिक्रमा में ये साढ़े उनत्तीस वर्ष का लंबा समय लगाते हैं ...लेकिन ज्योतिषी यह भी मानते हैं कि शनि केवल  बुरे ग्रह ही नहीं हैं ..वे कभी कभी खूब  फायदा भी पहुंचाते हैं-यह कई 'खगोलीय'  बातों पर निर्भर है ....मगर कन्या राशि के होने  के बावजूद  मना करने पर मैं भला अपने उत्साह को कहाँ रोक पाया  ..लिहाजा आज शनि देव का भरपूर दर्शन आनंद सपत्नीक उठाया है और आपसे भी आह्वान है कि इस मौके का आप भी फायदा उठायें और शनि दर्शन कर ही लें -यह एक सामान्य सी मगर खूबसूरत खगोलीय घटना है और इसका  मुफ्त में ही आनंद  उठाने में क्या हर्ज है?फलित ज्योतिषियों को कहने दीजिये वे जो कहते हैं!अधिकांश को  पत्रा के अलावा शनि आसमान में थोड़े ही दिखते हैं !
चाँद की यह स्थति १६ अप्रैल को होगी- तब आसानी से शनि को देखा जा सकेगा
क्या कहा आपको आकाश दर्शन का क ख ग भी नहीं मालूम? हम हैं न, आईये बताते  हैं आपको ... इस समय  सायंकाल के बाद से ही बहुत स्पष्ट है उत्तर दिशा में सात तारों का समूह -सप्तर्षि मंडल (Ursa Major )  ..यहाँ दिए चित्र के सहारे (ऊपर का पहला )  उसे आप आसानी से पहचान जायेगें ...उसके नीचे के तीन तारों से एक रेखा आगे यानी पूर्व की और खीचते हुए बढाते जाईये ..एक खूब चमकता तारा आपको दिखेगा जो स्वाति(Arcturus ) है ..इससे भी आगे लकीर खीचते जाईये ..एक मद्धिम सा तारा मिलेगा यह चित्रा है ....बस ठीक चित्रा(Spica )  के ऊपर शनि पूरे शान के साथ विद्यमान हैं ...और अगले कुछ दिनों में ही  तो चित्रा के समीप ही चन्द्र -पूर्णिमा होगी ....और तब शनि और चित्रा के बीच में पूर्ण चन्द्र का नयनाभिराम दृश्य होगा ....तब  आप और भी आसानी से शनि को देख ही लेगें !वैसे आज की ही रात से देखने का सिलसिला शुरू कर दीजिये ...१६ अप्रैल को सूर्यास्त के  बाद चंद्रमा के उदय पर आप उन्हें शनि और चित्रा के बीच पायेगें और दोनों ही प्रमुखता से दिखेगें -यह हिन्दी का चैत मास है -चूंकि पूर्णिमा का चंद्रोदय चित्रा नक्षत्र में हो रहा है जो कन्या राशि का एक तारा (चित्रा ) है इसलिए ही यह मास चित्रा -यानि चैत है ..हमारे पुरनियों ने  महीनों का निर्धारण प्रति माह चंद्रमा की पूर्णिमा की स्थति से कितने तर्कपूर्ण तरीके से किया है! ..कहते है पाणिनी ने हिन्दी  महीनों के निर्धारण की पद्धति आरम्भ की जैसे चित्रायुक्त पूर्णमासी से चैत,और आगे वैशाख आदि क्योकि इनमें पूर्णमासी का चाँद उदित हुआ!बहरहाल हम बात शनि की कर रहे थे जो इस समय कन्या राशि में हैं ...
 इस समय दिख रही है  चित्रा और शनि की  यही युति

यदि आपकी कन्या राशि है तब तो मेरी तरह से जरुर ही इस नायाब  नज़ारे का लुत्फ़ उठाईये ..और दूसरी राशि वालों को भी अपनी छत पर आमंत्रित कर उन्हें भी यह नजारा दिखाईये ..खासतौर पर  जब पूर्णिमा का चाँद आसमान में सायंकाल के बाद शनि के बिलकुल पास होगा और इससे आपको शनि महराज को ढूँढने में काफी आसानी भी रहेगी!हाँ आकाश दर्शन के लिए शहर के चकाचौंध से दूर गाँव का परिवेश बहुत अच्छा रहता है मगर आसमान साफ़ रहने पर यह नजारा शहर से ही दिख रहा है ...
आपके लिए शनि दर्शन मंगलमय हो!
चित्र सौजन्य:  
Earthsky

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सुन्दरता

जगज्जनिनी माँ सीता के सौन्दर्य के बारे में तुलसी कहते हैं -सब उपमा कवि रहे जुठारी केहिं पट तरों बिदेह कुमारी ..मतलब अनिर्वचनीय सौन्दर्य है माँ सीता का ...मगर राम का  सौन्दर्य भी तो कुछ कमतर नहीं हैं ...वनगमन के समय जो उन्हें देखने से रह गया ऐसे नगर ,ग्राम्यवासी अपने भाग्य को कोसते हैं.....मगर एक मजे की बात है कि आदि कवि वाल्मीकि जहाँ सीता के सौन्दर्य वर्णन को लेकर मुखर नहीं हैं वहीं वे राम के सौन्दर्य का बखान करने में मगन हो रहते हैं ...जहां सीता के सौन्दर्य की बात हुयी भी है उसे आदि कवि ने सीता जी के मुंह से ही कहलवाया है ..खुद मुखर नहीं हैं!मात्र युद्ध काण्ड के ४८ वें सर्ग  में दुःख संतप्त  सीता  अपने रूप का खुद वर्णन करती हैं .......मगर उनके दैन्य दारुण प्रसंग में सौन्दर्यबोध तिरोहित सा हो उठ्ता है ...जबकि   नारी सौन्दर्य के सभी उत्कृष्ट प्रतिमान सीता द्वारा स्वयं के रूप वर्णन  में सहज ही आ जाते हैं ..लेकिन आज यह प्रसंग नहीं ..आज तो रूप राशि पुरुषोत्तम राम का ही सौन्दर्य  वर्णन ...

राम के सौन्दर्य वर्णन में वाल्मीकि बहुत मुखर हैं -वे उनके शारीरिक सौष्ठव का वर्णन करते अघाते नहीं ....बालकाण्ड में उनकी दैहिक विशेषता के लिए   -महाहनु ,आजानबाहु ,पीनवीक्षा  जैसे विशेषण देते हैं  और सुन्दर काण्ड के ३५ वें सर्ग में राम की रूपराशि का वे दूत हनुमान के माध्यम से विस्तृत वर्णन करते हैं(श्लोक संख्या ८ से २२ तक ) ...



त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च  त्रिसमस्त्रिपु चोन्नतः 
त्रिताम्रस्त्रिपु च स्निग्धो गंभीरस्त्रिषु नित्यशः 
त्रिवली मांस्त्रयंवतः ......................सुन्दरकाण्ड ३५/१७-१८

इस श्लोक में पुरुषोत्तम राम के तीन अंगों के कई जोड़ों (त्रिगात्र )  -उरु ,मणिबंध, मुष्टि ;पुनःभौह ,अंडकोष तथा बाहु ,नाभि ,कुक्षि तथा छाती और फिर  केश ,जबड़े के साथ ही आँख का  कोना ,हाथ और पैर के तलवे ,पादरेखा,केश तथा  लिंगमणि की विशेषताएं इंगित करते हैं  .....अनन्तर उनके उदर और गले में तीन वलियाँ थीं ...स्तनचूचुक  निम्न थे ..आदि आदि ..उनका शरीर सुन्दरता ,सुडौलपन  और बनावट में अप्रतिम था ....इस अलौकिक सौन्दर्य सुषमा  के दर्शन सुख से लाभान्वित कोई भी उनके ओझल  हो जाने पर भी अपने मन को उस चुम्बकीय आकर्षण से मुक्त नहीं कर पाता था ..जिसने राम को न देखा और जिसे राम ने न देखा हो वह लोकनिंदा का पात्र  होता था ...यश्यम रामं न पश्येतु यं च रामो न पश्यति ,निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते.. (वाल्मीकि रामायण ,२/१७/१३-१४ )

माना जाता है की राम की दैहिक संपदा और शील lके वाल्मीकि -  वर्णन से ही साहित्य जगत में नायक के गुणों का बोध हो सका ...नाटयशास्त्र   ज्ञानी  भरत द्वारा वर्णित  नायक के श्रेष्ठ आठ गुण  -शोभा,विलास ,माधुर्य, गाम्भीर्य ,स्थैर्य ,तेज .ललित तथा औदार्य का निरूपण राम के गुणों के ही विश्लेषण से ही रूपायित हो पाए हैं . ठीक वैसे ही  जैसे वाल्मीकि रामायण के विश्लेषण से संस्कृत साहित्य में महाकाव्य की अवधारणा विकसित हुई लगती है.... राम के शील -व्यक्तित्व के   निरूपण पर तो सैकड़ों ग्रन्थ उपलब्ध हैं ....किमाधिकम? 

रामनवमी पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं ! 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

रेडी टू कुक हैदराबादी बिरयानी:पछतायेंगे न खाने वाले!

पता नहीं पिछली बार हैदराबादी बिरयानी कब खायी थी मगर इस बार जो खाया तो मुरीद हो गया! अब माल और फ़ूड मार्ट श्रृंखलाओं का ऐसा ज़माना है कि इनकी तांक झाँक करते रहने पर  पर कुछ नए उत्पादों ,व्यंजनों ,रेसिपी (नुस्खों)  पर नजर टिक ही जाती है ...ऐसा ही हुआ जब कोई दो  माह पहले स्थानीय स्पेंसर के स्टोर में मुझे  Knorr की  रेडी टू कुक हैदराबादी बिरयानी नजर आयी.. रेडी टू  कुक और रेडी टू  ईट व्यंजन आईटमों की भरमार है इन दिनों जो तुरन्ता या चटपट व्यंजनों की श्रेणी में आती हैं .रेडी टू ईट जहाँ बस गरम कर तुरंत भकोसने के आईटम हैं वहीं रेडी टू कुक रेसिपी आपके पाक शास्त्र के ज्ञान का भी तनिक इम्तहान लेती है और कई सामग्री  आपको भी और जोड़ना /जुगाड़ना होता है !

 रैपर पहचान के लिए
Knorr की हैदराबादी बिरयानी का कुछ मत पूछिए -बस लाजवाब है! इसकी सुगंध इतनी क्षुधावर्धक है कि बिरयानी तैयार होने के पहले ही 'क्या करें कंट्रोलै नहीं होता " वाली  भूख जगा देती है ...आप तो जानते ही हैं कि स्वाद और सुगंध का तो बस चोली दामन का साथ है ..सुगंध और स्वाद दोनों के मिले जुले प्रभाव से ही किसी भी व्यंजन का जायका बनता है .कहना नहीं है कि सुगंध के साथ ही इस  बिरयानी का स्वाद भी बेमिसाल है ..यही कारण है कि एक बार खायेगें तो बार बार खायेगें के तर्ज पर मैं जब दुबारा इसकी खोज में स्पेंसर पहुंचा तो यह प्रोडक्ट नदारद था ..मैंने वहां नोट कराया और हर दूसरे तीसरे दिन इसे पूछता पंछोरता रहा मगर यह तो स्पेंसर ही नहीं पूरे बनारस शहर से ही गायब थी ... मैसिव हंट कम्पेन बेनतीजा रही ....मैंने हर जगह इसके नए स्टाक की आमद पर खुद को इत्तिला करने की गुजारिश कर रखी थी ....कल रात स्पेंसर से ही मोबाईल पर इत्तिला मिली की इस प्रोडक्ट की नयी खेप आ गयी है -बस सुबह ही पहुँच कर मैंने आज के मेनू का एक और रिजर्व स्टाक के तीन कुल चार पैकेट ले लिए हैं ....आप  आज आ जायं या आगे जब भी तो हम आपको यह बिरयानी जरुर खिलना चाहेगें! 

यह भी दावे के साथ कहना चाहते हैं कि  वे गृहणियां जिनके वे  रूठे हुए हों ,कुछ खटपट या अनबन चल रही हो तो इसे एक ट्राई दे सकती हैं ..बिरयानी खाते ही सब मामले रफा दफा होने की गारंटी ..और प्रेमिका को इम्प्रेस करना चाहते हैं तो इसे  खुद बनाकर जरा अपनी उनको /मंगेतर को जिमा दे बस ..फिर देखें नतीजा!क्या कहा बनाना नहीं आता ? बेहद आसान ..इस प्रोडक्ट  के रैपर पर पाक विधि लिखी है जो बेहद आसान सी है ..बस कुछ सामग्री जुटानी पड़ेगी ....इस समय ३५ रुपये प्रति पैकेट के साथ दस रूपये का एक नूडल सूप भी फ्री मिल रहा है -आम के आम गुठलियों के दाम! नूडल सूप भी सूप श्रृंखला का नया उत्पाद है जिसमें सूप के साथ नूडल का भी मजा है या यूं कहें कि नूडल के साथ सूप का मजा भी!मुझे यह उत्पाद भी बहुत पसंद है!

तो बतायें आप भी कब निमंत्रित कर रहे हैं मुझे भी अपनी Knorr  बिरयानी पार्टी में ? :)

कंफेसन:
१-अन्ना हजारे साहब के अनशन को देखते हुए और अनशन स्थल पर कई लोगों के उपवास से अस्वस्थ होने की खबर `पर मेरी चेतना /नैतिकता बार बार यह पोस्ट जारी न करने को मना कर रही थी ..मगर उन सभी से जो जन लोकपाल विधेयक और देश से भ्रष्टाचार हटाने की मुहिम में लगे हैं  इस   क्षमा याचना के साथ कि यह पोस्ट दैनन्दिन जिन्दगी का एक गौण सा हिस्सा है और किसी भी तरह उनके अवदानों की उपेक्षा में नहीं है ,इसे जारी कर रहा हूँ! बिरयानी खाकर या न खाकर भी हम भी उस मुहिम का हिस्सा हैं!

२-यह किसी भी तरह से नार के उत्पाद का विज्ञापन नहीं है!जैसा पाया ,अनुभव किया यहाँ लिख दिया!  उपभोक्तावाद का समर्थन मैं भी नहीं करता -मगर कुछ उत्पाद  अपवाद भी हो जाते हैं !आप जानते ही हैं!
३-बिरयानी एक मुगलई व्यंजन है जो प्रायः मांसाहारी होता है मगर इसके शाकाहारी वर्जन भी बेहद जायके वाले होते हैं जैसे यह हैदराबादी बिरयानी! बिरयानी के कुछ और इंट्रा -कंट्री प्रकार यहाँ  हैं !

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

इश्क में क्या बतायें कि हम किस तरह चोट खाये हुए हैं !

जी हाँ ,इश्क दुखता है और तब तो और भी जब इश्क में कोई चोट खाए हुए हो!और कुछ ऐसा भी जैसे किसी ने  एक करारा घूँसा ही जड़ दिया हो ...आईये हम दिल खोल कर सुनाते हैं और आप कान खोल कर  सुन लीजिये.... ...यह रिपोर्ट है टाईम पत्रिका के ताजातरीन अंक (अप्रैल ११ ,२०११)में  .हैरत की बात यह है कि शारीरिक और भावनात्मक चोट की अनुभूति मस्तिष्क का एक ही स्थान करता है ....अगर किसी के रोमांस में आप रिजेक्ट हो गए तो उसका दुःख भी मस्तिष्क  का वही केंद्र करता है जो शरीर में कहीं भी चोट आ जाने पर संवेदित होता है .

इस तरह दिमाग इमोशनल दर्द की इन्तिहाँ और चोट लग जाने के बाद के शारीरिक दर्द में कोई ख़ास फर्क नहीं कर पाता ....महबूब /महबूबा की बेरुखी ,उसका रिजेक्शन  मस्तिष्क के भौतिक कष्ट वाले क्षेत्र को ही उद्दीपित करता है .एलिस पार्क अपनी इस रिपोर्ट में लिखती  हैं कि शारीरिक और इमोशनल दर्द के लिए चूंकि एक ही तंत्रीय प्रक्रिया क्रियाशील होती है इसलिए किसी प्रेमी /प्रेमिका द्वारा रिजेक्ट किये जाने की अनुभूति वास्तविक सी होती है ....

 एलिस पार्क -सीनियर रिपोर्टर, टाईम

इस  नए अध्ययन में ४० असफल प्रेमियों को लिया गया जो हाल ही में इश्क में ठुकराए हुए थे-इनके मस्तिष्क के अंदरुनी हिस्सों की एम आर आई  (मैग्नेटिक रेसोनेंस इमजिरी)   की गयी तो पाया गया कि इश्क में चोटिल हुए इन लोगों/लुगाईयों  को जब उनके पूर्व पार्टनरों  की फोटो दिखायी गयी तो उनके मस्तिष्क का वही हिस्सा प्रदीप्त हो उठा जो शरीर में कहीं भी चोट लगने पर सक्रिय होता है .इस विषय पर अनुसन्धान करने वाले वैज्ञानिकों  का मानना है कि इमोशनल पीड़ा मस्तिष्क के उसी दर्द की अनुभूति वाले हिस्से को सक्रिय कर देती है जो भौतिक रूप से चोट खाने पर उत्तेजित होता है ...

 तो क्या जिस तरह शारीरिक चोट का निवारण दर्द की दवाओं के इस्तेमाल से होता है इस दर्द की भी कोई दवा हो सकती है ? गालिब साहब ने तो यह सवाल काफी पहले ही कर दिया था -दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है ? मगर अफ़सोस यह कि आम दर्द निवारक जैसे एस्प्रिन आदि का असर प्रेम के चोट खाये हुए पर कारगर नहीं है -पुरानी यादें किसी भी चित्र या सुगंध से तरोताजा हो दुखदायी हो  उठती हैं जिसका सम्बन्ध पूर्व प्रेमी /प्रेमिका से होता है .शायद इश्क में हारे हुए के लिये गुजरता वक्त  ही  राहत दे पाता है .उर्दू शायरी   बेवफाई से उभरे दर्द की अकथ दास्ताँ नाहक ही नहीं समेटे हुए हैं ....

रविवार, 3 अप्रैल 2011

रिश्ते जो 'फैंटम लिम्ब ' बन गए!

इस ब्लॉग के कंटेंट और स्कोप में थोडा तब्दीली का मन हो आया है....मगर पंचों की राय हो तभी ...यह ब्लॉग मैंने एक फिलर आईटम के रूप में बनाया   था ताकि जो मामले मेरे  विज्ञान ब्लागों -साईब्लाग और साईंस फिक्शन इन इंडिया  के फलक में न सिमट सकें उन्हें यहाँ अभिव्यक्ति दे सकूं .मगर पंचों ने इसे ज्यादा प्यार दे दिया और यहाँ ट्रैफिक भी ज्यादा उमड़ने लगी ...मूलतः मैं विज्ञान संचार में रूचि रखने वाला मानुष हूँ तो एक सोच यह उभर रही है कि  क्यूं न यहाँ की बढी ट्रैफिक के मद्दे नजर  प्रायः तो नहीं हां नियमित अंतराल पर विज्ञान की सेवा की जाय -वैसे यह कदम अपनी चिता को खुद ही आग लगाने वाला हो सकता है मगर कोशिश कर लेने में क्या हर्ज है? वैसे भी विज्ञान और समाज का रिश्ता दिन ब  दिन गहराता जा रहा है और विज्ञान अब कोई अछूत नहीं रहा -लोगों का नजरिया तेजी से बदल रहा है -हाँ यहाँ की जो भी विज्ञान से जुडी पोस्ट होगी वह समाज और विज्ञान के गहरे नाते वाली ही होगी ..और हाँ लहजा वही होगा जैसे हम आपस में बात चीत करते हैं! तो आईये आज का विषय शुरू करते हैं ..मैंने अपनी पिछले पोस्ट पर रिश्तों के फैंटम लिम्ब हो जाने की बात अपने एक कमेन्ट में लिखी तो सुधी मित्रों ने पूछ लिया ये फैंटम लिम्ब क्या बला (बाला नहीं!)   होती है? आईये जानें!

उन मामलों ने चिकित्सकों को हैरत में डाल रखा  है जिसमें हाथ और पैरों के कट जाने के बाद भी लोगों की यह शिकायत रही कि उन्हें उनके कटे हुए हाथ पैर के स्थान पर दर्द  होता है -है न हैरानी की बात? जिस हाथ और पैर का वजूद ही नहीं दर्द की अनुभूति वहां हो रही है! भला यह कैसे संभव है? इस गुत्थी को सुलझाने में तंत्रिका विज्ञानी जुट गए ....

प्रमस्तिष्क (मस्तिक  का फ्रोंटल  लोब) का मोटर कमांड सेंटर  यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि किसी दुर्घटना में हाथ पैर का कोई हिस्सा या फिर नाक, कान, दांत या सर्जरी से निकाले गये पेट के अपेंडिक्स का कोई हिस्सा अब नहीं रहा ...लिहाजा वह उन अंगों तक रीढ़ की हड्डी के जरिये सन्देश -सिग्नल भेजना जारी रखता है . जाहिर है सिग्नल अब वजूद में ही नहीं रहे अंगों तक तो पहुँचता ही नहीं और वहां से वापस आने वाला रूटीन सिग्नल भी दिमाग को नहीं मिलता और वह कन्फ्यूज हो उठता है!दिमाग फिर से कोशिश करता है और खुद के ही उन हिस्सों को जो कटे अंगों से जुड़े होते हैं  "जवाब दो " का जोरदार सिग्नल जारी करता है-यही सिग्नल अब कटे हिस्सों से दर्द की अनुभूति कराते हैं! इसे ही फैंटम लिम्ब पेन के नाम से चिकित्सा जगत में जाना जाता है .

फैंटम लिम्ब पेन की जानकारी १८७० से ही नोटिस में आयी जब युद्ध पीड़ितों ने एक 'तंत्रीय दानव' यानि  सेंसरी घोस्ट से  त्रस्त  रहने की शिकायतें  कीं..इसके इलाज में कई तरह के दर्द निवारक इस्तेमाल में लाये गए हैं मगर वे सभी कारगर नहीं हो पाए ..इस समस्या से निजात दिलाने में एक बड़ी सफलता मिली है कैलिफोर्नियाँ यूनिवर्सिटी सैन डिएगो के वैज्ञानिक वी रामाचंद्रन को जिह्नोने अफगानिस्तान और ईराक में विकलांग  हुए अमरीकी सैनिकों के मामले में गहरी रूचि ली ..रामचन्द्रन कहते हैं कि भले ही कटे अंगों का वजूद बाहरी तौर मिट जाता है लेकिन मस्तिष्क के भीतर उनका नक्शा बना ही रहता है ..रामचंद्रन ने इसी नक़्शे से ही अपने शोध की प्रेरणा लेकर दिमाग को भ्रमित करने की योजना बनाई है -शरीर के दाहिने हिस्सों का नियंत्रण बाईं ओर का मष्तिष्क गोलार्ध करता है और बाएं हिस्से का दायाँ गोलार्ध ...इसलिए बिना किसी दर्द निवारक गोली को दिए उन्होंने ऐसे सैनिकों के उन कटे हिस्सों -हाथ या पैर के विपरीत एक दर्पण रखा जिसमें साबूत अंग का अक्स उभरा और बार बार यह दृश्य कष्ट में पड़े सैनिक को दिखाया गया -जिससे उसके मस्तिष्क को यह भ्रम हुआ कि    हाथ- पैर तो अपनी जगह सही सलामत है ...फिर क्या, दर्द उड़न छू   हो गया --दिमाग को डिसीव करने का यह तरीका कारगर पाया गया -न हर्रे न फिटकरी रंग चोखा -न दवा न दारू मरीज चंगा!  

 रामचंद्रन के इस 'कटे हाथ को आरसी' वाले  इस फार्मूले की जांच पड़ताल और कारणों पर इन दिनों खूब शोध  कार्य हो रहा है... क्या फैंटम लिम्ब बन चुके रिश्तों के लिए भी कोई ऐसा जादुई दर्पण काम में लाया जा सकता है?

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