शनिवार, 30 अप्रैल 2011

शब्द नहीं,चरित्र बोलता है!

बहुत से लोगों की यह आम शिकायत होती है कि उन्हें कोई ठीक से समझ ही नहीं पा रहा ...आखिर अगले को कैसे किन शब्दों में समझाया जाय कि वह मुझे और मेरे दुःख दर्द को समझ जाय ...कई बार तो बात इतनी बिगडती जाती है कि जितना ही समझाने में शब्दों का अम्बार बढ़ता जाता है उस तरफ  गलतफहमी भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है ..अजीब सी स्थिति होती है यह! नामी गिरामी लोगों के साथ भी कई बार ऐसी स्थति उत्पन्न हो जाती है -कहते हैं कि एक बार हनुमान जी भी बिचारे एक ऐसी फजीहत में पड़ गए तो उन्हें अपनी छाती ही चीर कर दिखानी पड़ गयी -बहरहाल वहां तो राम लला विराजमान मिले. मगर हम जैसे छुटभैये क्या करें जब ऐसी स्थिति से दो चार होना पड़ जाय -अब इतने हिम्मती भी नहीं कि एक तो खुद  अपनी छाती चीर दें और उसके बाद अगर वह जुडी नहीं तब ? यह डर ,संशय ही ऐसे करामाती एक्शन  को अंजाम देने से हठात रोक  देते  हैं -अब हनुमान सरीखे चमत्कारी होने  का गुमान तो हम रख नहीं सकते और किसी राम की  कृपा भी प्राप्त नहीं? तब कोई विवश बिचारा करे क्या?



मगर क्या  हम जो कहते हैं और जो करते हैं उसमें सचमुच संगति रहती है? वैज्ञानिक कहते हैं मनुष्य के व्यवहार का ९० फीसदी प्रगटन -संचार गैर वाचिक होता है -मतलब वहां शब्द नहीं हाव भाव बोलते हैं ..जो मुंह में राम बगल में छुरी की पोल खोलते रहते हैं ..मगर फिर भी कुछ लोग वक्तृता में इतने कुशल होते हैं कि उनके बोले गए हर्फ़ दर हर्फ़ विश्वसनीयता की गारंटी से लगते हैं -अंतर्जाल में तो यह और भी आसान है -यहाँ तो शब्द ही सचमुच ब्रह्म है .....यहाँ तो बोलने वाले इतने मुखर हैं कि कईयों ने बोल बोल कर ही अपनी अच्छी खासी साख बना रखी है -हर दिल अजीज बन बैठे हैं ...युवा वृद्ध ह्रदय सम्राट /साम्राज्ञी बन बैठे /बैठी हैं ..क्योंकि यहाँ शब्द ही चलते हैं या बल्कि कहिये दौड़ते हैं -हाव भाव दीखते ही नहीं -इसलिए अक्सर कोई न कोई लोचा लफड़ा होता ही रहता है ....

मेरा मानना है  कि ज्यादातर जनता बड़ी भोली होती है और यह ब्लॉग जगत भी कोई अपवाद नहीं है ....अक्सर यहाँ लफ्फाजियों के जाल में लोग फसते जाते है -और जाल भी ऐसा कि एक बार फंसे तो खुदा न खास्ता बाहर निकल भी गए तो सलामती संभव नहीं ....भोगा यथार्थ यह है कि इस जाल जगत में सम्बन्धों के सहज परवान चढ़ने के पहले अतिशय सावधानी जरुरी है ....यहाँ सम्बन्धों का समीकरण  एक अंधी सुरंग  की ओर लिए चलता है और जब आँख खुलती है तो चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा दीखता है -यहाँ कथनी और करनी का फर्क बड़ा वाईड है ......

मैंने व्यवहार शब्द के लिए यहाँ चरित्र शब्द लिया है जिस पर मेरे कुछ तार्किक मित्रों को आपत्ति हो सकती है क्योकि इससे नैतिकता (की घुट्टी पिलाने ) की बू आती है ....उनकी यह आपत्ति जायज है -मगर चरित्र शब्द शायद  किसी व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का खाका खीचता है और उसके जीवन के पूरे टाईम और स्पेस को भी समाहित किये हुए है -ब्लॉग जगत में चरित्र ढूंढना एक आत्मघाती कदम है -यहाँ नक्कालों का पूरा साम्राज्य (जिनमें  मेरी गिनती सबसे ऊपर है ) कायम है ..यहाँ जो अजेंडे दीखते हैं वस्तुतः वे हैं नहीं -और जो यह अनवरत प्रचार करता रहे कि वह तो सबसे बड़ा समाज सुधारक है मेरी ही तरह सबसे बड़ा पाखंडी है .....उसके हिडेन अजेंडे दूसरे  हैं .नक्कालों  से सावधान! भौतिक और प्रत्यक्ष दुनिया में जिन तमाम लोगों की दाल नहीं गली यहाँ वे यहाँ पकवान परोसने में लगे हैं ....


अभिषेक ओझा जी ने अंतर्जाल के ऐसे खतरों   पर एक प्रभावशाली पोस्ट काफी पहले लिखी थी -अगर उनकी निगाह इस पोस्ट पर पड़ जाय तो आग्रह है कि वह लिंक ब्लॉग  जन हिताय जरुर दे दें ! बाकी तो राम ही राखें!

52 टिप्‍पणियां:

  1. "कहते हैं कि एक बार हनुमान जी भी बिचारे एक ऐसी फजीहत में पड़ गए तो उन्हें अपनी छाती ही चीर कर दिखानी पड़ गयी -बहरहाल वहां तो राम लला विराजमान मिले. मगर हम जैसे छुटभैये क्या करें ......" :-)))

    आज का विषय बेहतरीन रहा, पहला पैरा पढ़कर ही आनंद आ गया ! दिखावे के प्यार, और चालाकियों से सज्जित इस दुनियां में, भावनाओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति, मानव के लिए आसान नहीं ....
    हनुंमान की तरह छाती चीरने की कोशिश कर सामने वाले का काम बहुत आसान कर दोगे ....यह हम हनुमानों को खूब पता है और सामने वाले को भी ... :-))

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  2. "भोगा यथार्थ यह है कि इस जाल जगत में सम्बन्धों के सहज परवान चढ़ने के पहले अतिशय सावधानी जरुरी है ....यहाँ सम्बन्धों का समीकरण एक अंधी सुरंग की ओर लिए चलता है और जब आँख खुलती है तो चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा दीखता है -यहाँ कथनी और करनी का फर्क बड़ा वाईड है ......"


    कमाल का अनुभव है आपका , मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ ....ब्लॉग जगत में दिखावा अधिक हकीकत नगण्य रहती है ! लोगों को यहाँ सावधान रहने की बहुत आवश्यकता है !

    आभासी जगत के बने ताजे रिश्ते, मस्तिष्क में छाने में देर नहीं लगाते और यह नशा जोश और उमंग में, किसी नौसखिये ( भावुक व्यक्ति ) की जान लेने ( डिप्रेशन ) को काफी है !
    आभार ...

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  3. शब्द नहीं, चरित्र बोलता है
    सही है
    तभी तो आज नेता
    लाख कसमे खाये
    जनता कहती
    झूठ बोलता है।

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  4. "ब्लॉग जगत में चरित्र ढूंढना एक आत्मघाती कदम है -यहाँ नक्कालों का पूरा साम्राज्य (जिनमें मेरी गिनती सबसे ऊपर है ) कायम है ..."

    एक बार एक ब्लॉग मित्र को आपके बारे में समझाने का प्रयत्न करते हुए मेरे शब्द थे ....

    " डॉ अरविन्द मिश्र से मित्रता आसान नहीं ...पहली नज़र में अरविन्द बेहद एरोगेंट तथा आत्ममुग्ध व्यक्ति लगते हैं और उनकी टिप्पणियों में अक्सर रुक्षता रहती है और रचनाओं में उन्मुक्तता ! ऐसा ब्लोगर निश्चित ही अपने संबंधों को लम्बे समय तक निबाहने में समस्या महसूस कर पायेगा और शायद अरविन्द इस बात को अच्छी तरह जानते भी हैं !

    इस तथ्य के बाद भी, अरविन्द द्वारा अक्सर अपने मित्रों के प्रति भी बेवाक और कडवी राय देना , मुझे अक्सर उनकी और खींचता है ! आमने सामने की पहली मुलाक़ात में ही अरविन्द अपनी इस इमानदारी का प्रभाव मेरे ऊपर छोड़ने में कामयाब रहे हैं !

    बेहतरीन प्रतिभाशाली अरविन्द निस्संदेह ब्लॉग जगत की खूबसूरती में, चार चाँद लगाने के लिए काफी है
    ये विवादास्पद व्यक्तित्व , उन चंद लोगो में से एक हैं जिनके कारण ब्लॉग जगत में बने रहने का दिल करता है !"


    आभार ...

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  5. आभासी दुनिया में बहुत धुंध छायी है।

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  6. अरविन्द जी प्रणाम,




    ब्लॉग जगत एक आभासी दुनिया है जिसमे हम लोगों के व्यक्तित्व या चरित्र का अंदाजा नहीं लगा पाते. पर मिश्रा जी , अगर हम वास्तविक दुनिया की बात करें तो वहां पर भी बहुत से ऐसे चरित्र मिलते हैं जिनकी असलियत का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है. उनके अंग प्रत्यंग के हाव भाव उनकी भाषा से इतना मेल खाते हैं की आप अंदाजा लगा ही नहीं सकते की इस रामनामी की बगल ( जो की कभी कभार स्लीवलेस भी होती है ) में छुरी भी हो सकती हैं. ऐसे रंगे सियारों की असलियत सामने जरुर आती है परन्तु इसके लिए ऋतु परिवर्तन का इंतजार तो करना ही पड़ता हैं क्योंकि अंततः सत्य की ही जीत होती है झूट की नहीं.

    इसलिए किसी बात के आवेश में आकार या किसी "आवेश" की बात से परेशान होकर छाती चीर कर दिल में क्या है ये दिखने का फायदा कुछ नहीं. जो लोग आपको जानते हैं, पहचानते हैं वो आपकी प्रतिभा को नकार नहीं सकते. मैं सतीश सक्सेना जी की ही तरह आपकी इस पोस्ट में कही हर बात से पुर्णतः सहमत हूँ.

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  7. सहमत हूँ.

    परन्तु यह तो 'रीयल' वर्ल्ड में भी है. कुछ दिनों पहले की ही बात है, अन्ना हजारे के समर्थन में पप्पू यादव ने उपवास रखा.

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  8. @विवादास्पद व्यक्तित्व,
    :)
    @सतीश जी, गुरुओं के लाख मन करने के बाद /बावजूद भी वाद -विवाद मेरी रूचि बचपन से रही है
    क्या करूँ कंट्रोलै नहीं होता ..
    मगर विद्वान् लोग यह भी कह गए हैं -वादे वादे जायते तत्वबोधः

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  9. @जो लोग आपको जानते हैं, पहचानते हैं वो आपकी प्रतिभा को नकार नहीं सकते.
    Vichar shoony ji ,
    Its embarasing:)!

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  10. उपयोगी आलेख है। अभिषेक का आलेख भी खोजकर पढता हूँ। जब सामने बैठे व्यक्ति को पहचानना ही सबके लिये आसान नहीं होता तो अंतर्जाल के पीछे छिपे लोग कैसे पहचान में आयेंगे? आन्ध्र प्रदेश में बच्चों को अक्सर दी जाने वाली सलाह "जाग्रता... जाग्रता" याद आ गयी।

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  11. अंतर्जाल में जाल इसलिए तो है कि संभल संभल कर चलिये ..
    कहते हैं कि कुशल तैराक ही डूबा करते हैं !यहाँ कई बार सावधानी रखकर चलने से भी धोखे मिलने की पूरी संभावनाएं हैं ..
    बस यही कहना होगा कि इस रहस्यमयी दुनिया में भी वही लागू होता है कि 'होई है वही जो राम रची राखा '......
    शब्दों के अद्भुत जादूगर यहाँ भी हैं ...कोई दो राय नहीं ..पूर्ण सहमत ! ऐसे में रिश्तों को आगे बढ़ाते हुए ..अभिनय सामने वाला कितनी देर तक कर सकता है ..यह भी देखना ज़रुरी होता है .समय सब की पहचान बता देता है.

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  12. .
    क्या मिलिये ऎसे लोगों से जिनकी सीरत छुपी रहे
    नकली चेहरा सामने आये, असली सूरत छुपी रहे

    बकिया ज़नाब सतीश सक्सेना जी ने आपके पोस्ट की इतनी विशद व्याख्या कर दी है, कि हमारी टिप्पणी बोझिल हो जायेगी ।

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  13. "क्या मिलिये ऎसे लोगों से जिनकी सीरत छुपी रहे
    नकली चेहरा सामने आये, असली सूरत छुपी रहे"
    @डॉ अमर जी,
    असली सूरत छुपी रहे\
    अगर अनुमन्य करें तो असली सूरत के बजाय मूरत कर दिया जाय और तब पंक्ति की नई भाव भंगिमा की अनुभूति की जाय ?

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  14. @प्रवीण त्रिवेदी जी
    शुक्रिया ,मुझे ही नहीं बहुत लोगों को जरुरत है !

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  15. आभासी दुनिया के रिश्ते आभासी हों यह स्वाभाविक है । उनमें वास्तविकता ढूँढने की कोशिश कष्ट को ही जन्म देगी ।

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  16. इंसान को पहचानना आसान नहीं फिर दुनिया आभासी हो या असली.

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  17. अपने ब्लाग जगत में लोग नमस्ते बाद में करते हैं सहमत पहले होते हैं। अब देखिये आपकी पोस्ट का ही अंश है:
    ...मेरी ही तरह सबसे बड़ा पाखंडी है

    और आपके तमाम साथी आपसे सहमत हो लिये। (लेकर सतीश सक्सेना, शिवकुमार मिश्र, डा.अमर कुमार, विचार शून्यता ....) जबकि लोगों को कम से कम इस बात से तो नहीं सहमत होना चाहिये। :)

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  18. ब्लॉग जगत में चरित्र ढूंढना एक आत्मघाती कदम है... बहुत कड़ी बात कह दी

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  19. मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं कि ब्लागजगत में लोग पाखंडी हैं और असलियत में वे कुछ और होते हैं तथा वास्तव में कुछ और। केवल लेखन की बात हो तो असलियत छुपाना संभव हो सकता है लेकिन ब्लागजगत से जुड़े लोग टिप्पणी/वादविवाद और अन्य अवसरों पर भी अपने को अभिव्यक्त करते रहते हैं। लेखन से अलग अन्य अभिव्यक्तियों के माध्यम से किसी के भी बारे में एक खाका तय होता है और वह वास्तविकता के बहुत नजदीक होता है। सजग दृष्टि से देखा जाये तो व्यक्ति जैसे होते हैं उसी रूप में देखा जाना संभव होता है। धोखे की गुंजाइश कम रहती है।

    पाखंडी लोगों के लिये हमारा एक मित्र हैंडपंप शब्द का इस्तेमाल करता है। ऐसे लोग दो फ़िट ऊपर होते हैं अस्सी फ़ुट नीचे। लेकिन ऐसे की पहचान मुश्किल नहीं होती बशर्ते आपकी आंखें खुली रहें।

    और फ़िर व्यक्ति का व्यक्तित्व भी हमेशा एक सा नहीं रहता। समय के साथ बदलता है। बात-बात पर टीन टप्पर की तरह गरम हो जाने वाले सहनशील होने की कोशिश करते हैं। भाईचारे के ब्रांड अम्बेसडर तलवार थाम लेते हैं। और भी बदलाव दीखते हैं। लेकिन यह उनका पाखंड नहीं। उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू है। अगर आप किसी के व्यक्तित्व के एक पहलू से प्रभावित होकर उसके आधार पर ही उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हैं तो यह आपकी जल्दबाजी है। उसमें उस बेचारे की क्या गलती? आप किसी को देर से समझ पाये तो उसमें उसको पाखंडी कैसे कह सकते हैं? यह अन्याय किस अर्थ अहो।

    आपके शीर्षक से भी असहमत हूं। मेरी समझ में व्यक्ति के शब्द उसके चरित्र के बारे में बताते हैं। सब कुछ अगर न भी बतायें तो बहुत कुछ तो बताते ही हैं। अब यह हम पर है कि हम उन संकेतों को कैसे ग्रहण करते हैं।

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  20. समझाने की कोशिश ही क्यूँ की जाए, जिन्हें समझना होगा..वे बिन समझाए ही समझ जायेंगे...

    और असली चेहरे तो सामने आ ही जाते हैं..एक ना एक दिन....दुनिया आभासी हो या वास्तविक

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  21. आपका मैं प्रथम पुरुष कम, सर्वनाम अधिक लगता है.

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  22. @अनूप जी आपकी असहमति सर माथे मगर आपने एक छोटी सी बात को इतना लम्बा एक्सप्लेन कर दिया कि मेरी पोस्ट की आरम्भिक लाईन मुझे याद हो आई -
    "जितना ही समझाने में शब्दों का अम्बार बढ़ता जाता है उस तरफ गलतफहमी भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है"
    दरअसल मानव व्यवहार इतना सहज नहीं है कितना आप बखान रहे हैं -ओज भरी कविता करने वाले कई निजी जिन्दगी में बेहद डरपोक होते हैं और सात्विक प्रेम की दुहाई देने वाले बलात्कारी -और इसके उलट भी !केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जहाँ कथनी और करनी का फर्क काफी बड़ा है ...
    थोडा कहना अधिक समझना

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  23. आभासी और वास्तविक संसार दोनों जगह यही हाल है...... संभल कर रहने में तो बुराई नहीं

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  24. .
    @ अनूप जी,
    नमस्ते ( आप से असहमत होते हुये भी.... )
    आभासी सँसार में पाठक की आँखें स्क्रीन के उस पार नहीं जातीं, अतएव आपका कथन " सजग दृष्टि से देखा जाये तो व्यक्ति जैसे होते हैं उसी रूप में देखा जाना संभव होता है। धोखे की गुंजाइश कम रहती है। " सोदाहरण प्रमाण की गुहार लगा रहा है ! हाँ मैं यह मानता हूँ, कि शब्दों के चुनाव और भाषा-विन्यास से मोटी मोटा व्यक्तित्व का आकलन किया जा सकता है, किन्तु चरित्र विश्लेषण नहीं ! रही बात पाखँड की तो.. यह कटु तथ्य है कि हर व्यक्ति में पाखँत्व की कुछ न कुछ मिकदार अवश्य होता है ! हम जो लिखते हैं, ज़रूरी नहीं कि वैसा ही सोचते हों... समय और विषय की माँग के अनुसार बुना हुआ शब्द-जाल यही सिद्ध करता है, "जितना ही समझाने में शब्दों का अम्बार बढ़ता जाता है उस तरफ गलतफहमी भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है" । सो इस विषय पर मेरा थोड़ा लिखा बहुत समझियेगा । मुझे आपका यह सूत्र वाक्य सदैव स्मरण रहता है कि, " जिसकी जितनी समझ होती है.. वह उतना ही सोचता है " आपके इस कथन से असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता, पुनः सादर नमस्ते !

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  25. @अरविन्दजी,
    आपकी टिप्पणी का अंदाज आपै की तरह है। कुछ नहीं तो टिप्पणी की लम्बाई पर ही टोंक दिये। अरे भाई जब अपनी बात कहनी है तो अपनी तरह से कहेंगे न!

    बाकी यह अपनी अपनी समझ पर ही है कि किसी ने दुनिया को कैसा देखा है। जो जैसा होता है दुनिया के बारे में उसी तरह की धारणायें बनाता है। अनुभवों से वैसे ही भाव ग्रहण करता है। वैसे आप साइक्लिक लोडिंग बहुत किये हैं यहां। बात आभासी जगत की हो रही थी और आप हमको टहलाने लगे वीर रस के कवियों, सात्विक प्रेमी और बलात्कारियों में। ये बेमंटी नहीं तो और क्या है जी।

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  26. @डा.अमर कुमार,
    चाहते हुये भी और कई झकास उदाहरण पास होने पर भी मैं आपकी शंका के निवारण के लिये उदाहरण देना अभी उचित नहीं समझता काहे से मिसिर जी अभी-अभी टोंके हैं हमारी लम्बी टिप्पणी पर। आशा है आप हमारे मजबूरी समझेंगे। तब तक हमारी बात को सही माना जाये और सूत्र वाक्यों से काम चलाया जाये। :)

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  27. अजी क्या पता हनुमान जी ने छाती फ़ाडी ही हो, राम लीला मे तो हर साल यह होता हे, उस समय शायद भगवान बडे सर्जन हो, ओर यह बात हनुमान को पहले से पता हो, इसी लिये तो झट से छाती फ़ाड दी...
    "क्या मिलिये ऎसे लोगों/लुगाईयो से जिनकी सीरत छुपी रहे
    नकली चेहरा सामने आये, असली सूरत छुपी रहे"

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  28. "blogiye ke liye virtual world asli hotaa hai "-
    ye vartual hataa do to bechaaraa shoonya ho jaayegaa .
    veerubhai .

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  29. व्यवहार का दोहरापन तो वास्तविक जीवन में भी कम नहीं देखने को मिलता, कम से कम आभासी जीवन में अपनी सुविधा से अलविदा तो कहा जा सकता है ...

    शीर्षक से असहमति रखते हुए मैं भी यही कहूँगी की बोले और लिखे जाने वाले शब्दों में अंतर होता है ...वाचक परिस्थितियों के अनुसार कहता है , जबकि लेखक अंतर्मन के भाव ही उडेलता है ...लेखन कार्य आन्तरिक अनुभूतियों के बिना संभव नहीं है (जहाँ तक मैं समझती हूँ) ...इसलिए लिखे जाने वाले शब्द भी इंसान का वास्तविक चरित्र ही बताते हैं !

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  30. आपसे आंशिक रूप से सहमत, अनूप जी से आंशिक रूप से सहमत. डॉ अमर कुमार से पूरी तरह सहमत.
    आपलोग आभासी दुनिया को ब्लॉग जगत से हमेशा कन्फ्यूज़ करते हैं. मैं इसे एक शोधछात्र की तरह देख रही हूँ. मुझे लगता है कि अगर बात सिर्फ़ आभासी दुनिया की की जाय तो आपकी बात सही हो सकती है, लेकिन ब्लॉग जगत में लोगों के लेखन से काफी कुछ समझ में आ जाता है [यहाँ अनूप जी की बात सही है] वहीं ये भी सही है कि लेखन से किसी के व्यक्तित्व का पूरा खाका नहीं खींचा जा सकता [यहाँ डॉ. अमर की बात सही है]
    अब रही बात सिर्फ़ आभासी दुनिया और ब्लॉग जगत के अंतर की. आभासी दुनिया में अपने आप को छिपाया जा सकता है. जैसे कि कुछ लोग सोशल वेबसाईट के माध्यम से एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं फेक आईडी बनाकर और बहुत दिनों तक समझ में नहीं आता कि अगला कैसा है? कभी-कभी तो पूरा इंसान ही दूसरा होता है और वो या फिर आदतवश या जानबूझकर किसी को धोखा देता रहता है.
    पर यदि कोई ब्लॉग लिखता है और दूसरे के ब्लॉग पर टिप्पणी और वाद-विवाद भी करता है, तो वो खुद को छिपा ही नहीं सकता और अगर इस पर भी खुद को छिपा लेता है, तो वो इतना बड़ा शातिर है कि वास्तविक जीवन में भी सबको धोखा दे सकता है.
    थोड़ा लिखा, बहुत समझियेगा. "मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना" इसलिए ज्यादा विश्लेषण की ज़रूरत नहीं, जो सामने आये झेल जाइये.और भी गम है ज़माने में ब्लॉगिंग के सिवा :-)

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  31. @वाणी जी ,
    महान लेखकों के व्यक्तिगत जीवन के बारे में आप जितना जानेगी -शब्द और व्यवहार का फर्क आप को समझ में आएगा अ
    यह जरुरी नहीं कि अपनी रचनाओं में जैसी पिक्चर एक लेखक प्रस्तुत करता है जीजी जीवन में भी वैसा हो ..सच तो है कि अक्सर ऐसा नहीं होता -अगर कोई ऐसी धारणा बनाता भी है तो उसे मोहभंग के लिए तैयार रहना चाहिए ...
    प्रेमचंद अपनी कथाओं में नैतिकता के बड़े आग्रही रहे मगर निजी जीवन में गरीबो को सुतही (ब्याज -कर्ज ) पर रूपये बांटते थे...
    लगता है इस पर एक ठू पोस्ट ही करनी पड़ेगी ...
    ये लेखक बड़े मक्कार होते हैं :) शब्दों के जादूगर बस!व्यामोहित मत होईये ,मेरी बात पल्लू में बाँध लीजिये :)

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  32. @मुक्ति,
    असहमति तो जैसे आपका जन्मसिद्ध अधिकार है ,ख़ास तौर पर मेरे( कहे के )मामले में :)
    अब ज्यादा कुछ कहता हूँ तो बात लम्बी होगी और असहमति और बढ़ेगी जैसा मैं इस पोस्ट की
    प्रस्तावना में कही है ...
    मैंने अभी वाणी जी जवाब दिया है -लेखन की लफ्फाजी से लेखक के व्यक्तित्व का कोई अनिवार्य रिश्ता नहीं है ...
    हाँ ,सहमत हूँ (देखिये मैं आपसे सहमति का तिनका भी ढूंढ लेता हूँ :) कि ब्लागजगत में और भी कई खिड़कियाँ हैं जिनसे ब्लागर दिखता है ...
    उघरहि अंत न होई निबाहू कालनेमि जिमी रावण राहू

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  33. भाई मैं तो लगभग सभी से असहमत हूँ। शायद मेरा सच भी सभी से अलग है , इसलिये। व्यक्तिगत नहीं होना चाहिये पर बात की वस्तुनिष्ठता व्यक्तिगत होकर ही आयेगी इसलिये खुद को हाजिर कर रहा।

    निर्दोष होकर भी जितना कभी वास्तविक जीवन में लांक्षित/अपमानित नहीं हुआ था उतना इस आभासी माध्यम में होना पड़ा। एक रोगी ने मुझे रोगी कहा और आरोप लगाये, जिसको कमोबेश सभी ने स्वीकार किया, हाँ स्वीकार के तरीके अलग अलग अवश्य रहे।

    उस मनोरोगी/क्रेक माइंड ने जो कहा उसकी परख की जाय, यह किसी को आवश्यक न लगा उल्टे ‘कौव्वा कान लिहे भागा जाय’ के हिसाब से सबने कौव्वे का अनुसरण किया किसी ने अपने कान नहीं देखे।

    जब आरोप लगे उससे पूर्व इसी ब्लोगबुड में सैंकड़ों टीपें कर चुका था, लोगों ने सराहा भी था, लेकिन एक पत्र भर देखकर सबने मुझे रोगी माना, किसी ने साल भर पूर्व के मेरे परफारमेंस से क्या ऐसा निकलता है, इसे विचार भी नहीं किया। अदा जी द्वारा मेरी सहानुभूति में जो पोस्ट लिखी गयी उसमें भी कहा गया था ‘मरीज अमरेन्द्र के लिये’। किसी ने सवाल नहीं किया, सिवाय सतीश पंचम जी के। फिर बीच-बचाव संदर्भी एक पोस्ट मौज लेते हुये अनूप शुक्ल जी ने पेली और वहाँ सभी ने मौज ली, अपने अपने ढ़ंग से। जिन्होंने मुझे दबी जुबान में ठीक समझने की बात कही भी तो लगा जैसे दया करके गरीब को पैसे दिये गये हों। सो शब्द बोलते हैं, इस बात को मैं काफी अ-प्रमाणिक पा चुका हूँ।

    खैर अब तो यह क्लीयर हो ही चुका है कौन रोगी था, क्योंकि वह मूर्खा ब्लागर स्वयं के ही असाध्य रोगी होने की सार्वजनिक घोषणा कर चुकी है। ऐसे मौकों पर ईश्वर को मानने का ठोस आधार सा मिलने लगता है।

    सो इस आभासी माध्यम का क्या भरोसा, हाँ वास्तविक माध्यम में निर्दोष होने पर मुझ जैसे आदमी की ऐसी फजीहत न होती, शायद!!

    लेखन से व्यक्तित्व के व्यक्त होने के संबंध में यह बात रखा हूँ। आरोपों से सालभर पूर्व दी जारी तमाम स्वस्थ टीपों ने मेरे स्वस्थ मस्तिष्क का प्रमाण नहीं दिया होगा तभी तो लोगों ने ऐसा समझा। मेरी मान्यता है कि लिखने से मेरे बारे में कोई खाका बनता हुआ कभी नहीं लगा। सब फिजूल कहने की बात है।

    टीप लंबी हुई, क्षमासहित :)

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  34. पंडित जी!
    इतने मनीषियों ने इतने गहन और विस्तृत विचार रखे है कि अब शायद कहने को कुछ नहीं रहा... सिवा इसके कि अमुक से सहमत और अमुक से असहमत.. हाँ कलेजा चीरकर दिखाने वाली बात पर बस एक शेर:
    खतावार समझेगी दुनिया तुझे,
    अब इतनी भी ज़्यादा सफाई न दे!

    वैसे मैं भी यह मानने को तैयार नहीं कि किसी के लेखन या वक्तव्य से उसका चरित्र ..सौरी असली चरित्र पता चलता है.. वरना कई पद्मा पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार अपने उपन्यास में नारी को देवी कहते हैं और दूसरी और व्यक्तिगत जीवन में एक ब्याहता को छोड़ दूसरी को अविवाहित बताकर उससे विवाह कर लेते हैं जो बाद में रखैल साबित होती है...

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  35. @ अमरेन्द्र, ये बात बिल्कुल गलत है कि तुम्हें सबने 'उस' मामले में दोषी मान लिया था. मेरे जैसे बहुत से लोगों तो पता ही नहीं चला कि बात क्या थी क्योंकि एरी तरह उन्हें भी ब्लॉगजगत के विवादों से दूर रहने की आदत है. मैं तब तक तुमसे मिली नहीं थी लेकिन उक्त प्रकरण पता होने पर मुझे तुम निर्दोष ही लगे थे, जबकि मैं कभी दोनों पक्षों को सुने बगैर फैसला नहीं लेती. फिर भी मैंने तुम्हारे टीपों और पोस्टों के माध्यम से जितना तुम्हें जाना था और दूसरे पक्ष को, मुझे तुम अधिक मासूम लगे थे. कम से कम मैंने जिनसे बात की उन्होंने भी तुम्हें निर्दोष ही माना. मुझे लगता है कि तुम्हें कोई गलतफहमी हुयी है. बात तो ये थी कि लोग 'आ बैल मुझे मार' की तर्ज पर मुसीबत नहीं बुलाना चाहते थे. और मुझे तो सारी बात ही एकदम आखिर में जाकर पता चली. मैं इसे दो लोगों का आपसी मामला समझ रही थी, लेकिन जब उस तरफ तुम्हारे बारे में अनाप-शनाप लिखा गया तो मैंने वहाँ जाना ही छोड़ दिया.

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  36. वैज्ञानिक कहते हैं मनुष्य के व्यवहार का ९० फीसदी प्रगटन -संचार गैर वाचिक होता है -मतलब वहां शब्द नहीं हाव भाव बोलते हैं .."
    और फिर कभी कभी इस गैर वाचिक के शिकार तो शायद ताउम्र उबर भी नहीं पाते हैं ..

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  37. @अमरेन्द्र ,
    आपकी टीप से मैं भी किंचित संतप्त और आत्मग्लानि से ग्रसित हुआ हूँ -
    कहना न होगा इसी फैक्टर से उत्पन्न असंवाद की स्थितियों में मैं भी
    मुखर नहीं हो सका था ....आपकी मनः स्थति मुझसे बेहतर शायद ही कोई समझ रहा होगा
    निश्चिंत रहें कोई भी छल छद्म लम्बे समय तक नहीं चलता -आपकी मासूमियत और निश्छलता से हम सभी परिचित हैं
    अब बीती ताहि बिसार दे ...
    और एक सूत्र वाक्य यह है -गुड तो फार्गिव ,बेस्ट टू फारगेट ....यह मुश्किल है मगर अभ्यास से सहज हो जाता है ..मैं खुद भी इस पर अभ्यासरत हूँ ....और दूसरी बात अपने प्रति सच्चे बने रहिये -बी ट्रू टू योरसेल्फ ..
    ये मेरे मार्गदर्शक सूत्र रहे हैं जीवन के -यह आज आपसे साझा कर रहा हूँ ! मैं पढाई के दौरान इन्हें सामने रखता था ..ताकि बार बार दिखे ०जीवन की कई दुश्वारियां इनसे कम हुईं !

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  38. Girijesh Rao said...

    'स्लीवलेस रामनामी' - विचारशून्यता को नमन : )

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  39. @ मुक्ति जी , शुक्रिया न कहना नाइंसाफी होगी। शुक्रिया जी।

    @ अरविन्द जी , मैने बहुत सहज होकर लिखा है, ये ओबजर्वेसन मेरे थे ही, यहाँ स्थिति बनी तो लिख डाला, आप किसी संताप में न रहैं, जिन लोगों का नाम लिया हूँ - पूर्व कमेंट में - वह वस्तुनिष्ठता के तहत ही है। शौकिया या तात्कालिक तौर पर नहीं कहा हूँ कुछ भी। ‘बी ट्रू टू योरसेल्फ’ - के लिये आभार !!

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  40. आज अगर हनुमान जी होते और सीना चीर कर दिखाते , तब भी लोग यकीन ना करते । ऐसी स्थिति हो चुकी है इस स्वयंभू टाइप दुनिया वालो की...खैर ,आपकी बात दुरुस्त है । चरित्र उत्तम हो तो, रनिंग कमेंट्री की आवश्यकता नही होती । जब तत्व कम होता है , तभी अधिक शब्दों की आवश्यकता होती है....।

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  41. @ अमरेंद्र ,
    जिस प्रकरण की तुम बात कर रहे हो उसमें मैंने अपनी तरफ़ से भरसक प्रयास किया था कि संबंधित लोग बात आगे न बढ़ायें, अप्रिय पोस्टें न लिखें। अति उत्साह में सब से एक-दूसरे पर आक्षेप और छीछालेदर करने वाली पोस्टों को हटवाने का भी प्रयास किया। इसके चलते मेरी लानत-मलानत भी हुई कि मैंने ऐसा क्यों किया और बी्च-बचाव का ’नाटक’ क्यों किया। उस समय जो मैंने पोस्ट लिखी थी वह आत्मव्यंग्य था। उसमें किसी तरह से तुम्हारे ऊपर कुछ नहीं लिखा गया था। (पोस्ट का लिंक यह है http://hindini.com/fursatiya/archives/1661)बाद में भी तुमको काफ़ी समझाया कि इस मामले में तुम जरूरत से ज्यादा संवेदनशील हो। यह तुम्हारी अपनी सोच है कि तुम्हारे ऊपर जो आरोप लगाये गये वह सबने स्वीकार लिये।

    मेरी समझ में उस मसले पर मैंने जो टिप्पणी की थी (जो कि बाद में मिट गयी पोस्ट के साथ) उतनी संयत टिप्पणी मैंने आज तक नहीं की। :)

    खैर यह सब बातें कहने की नहीं महसूस करने की होती हैं। और क्या कहा जाये!

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  42. ९० फीसदी प्रगटन -संचार गैर वाचिक होता है -मतलब वहां शब्द नहीं हाव भाव बोलते हैं

    भाव को अधिक भाव देंगे तो सीना चीरना ही पडेगा :)

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  43. ब्लॉग जगत में पहली छवि तो शब्दों के माध्यम से ही बनती है.

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  44. इंसान चाहे मशीन के उस पार बैठा हो या सामने हो... समझ पाना बेहद मुश्किल है...
    हर शख़्स यहाँ बेनाम क़िताब है

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  45. अजब-गजब टिपण्णीयों में हमारे खतरों को क्या स्थान :) आपकी पोस्ट पर तो आना होता ही है देर-सवेर. फिलहाल तो ऊपर की ४६ टिपण्णीयों को पढ़ और सोच रहे हैं.

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  46. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  47. बात बहुत हद तक सही ही कहा आपने....आँखों के आगे दिन रात विराजित व्यक्तित्व की तहों को भी जब हम बहुधा पढ़ नहीं पाते,तो शब्दजाल पर उपस्थितों के कुछेक शब्द से कैसे व्यक्तित्व समझने का दावा कर सकते हैं...

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  48. अरविन्द जी ,
    वाचिकता हो या गैरवाचिकता दोनों ही में बोलना कामन है ! आशय ये कि देह बोले या वचन ,बोलना तय है ! अब यह बंदे पर निर्भर है कि सुने / देखे / महसूस किये गये 'बोल' से क्या क्या निष्कर्ष निकाल पाये :)

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  49. मैं तो सर पर कफ़न और आँख पर पट्टी चढ़ा कर यहाँ कूद लगा गयी...कुबूल है...

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  50. @अमृता तन्मय ,
    कबूल हमें भी है ,तभी यहाँ रुके हैं अब तक !
    जो बात है यहाँ वो कहीं पे नहीं ...

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