शनिवार, 17 नवंबर 2012

भाग दरिद्दर!

इस बार भी दीपावली पैतृक आवास(चूडामणिपुर, बख्शा  -नौपेडवा,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश ) पर मनाने का मौका मिला .सालाना त्यौहार अपने पैतृक आवास पर मनाना मुझे अच्छा लगता है . बड़े मिश्रित अनुभव रहे . पिछले वर्ष से शुरू हुयी बाल रामलीला इस वर्ष  बच्चों के और भी उल्लास के चलते अविस्मरणीय बनी . इस बार का प्रसंग था लंका दहन का . इस प्रसंग में बच्चों ने हनुमान के लंका में प्रवेश, लंकिनी से वार्ता और उसकी मुक्ति ,विभीषण से भेंट ,सीता को रावण द्वारा धमकाना ,हनुमान द्वारा श्रीराम की मुद्रिका गिराना ,उनके  द्वारा अशोक वाटिका का उजाड़ना ,अक्षयकुमार का वध ,मेघनाथ द्वारा हनुमान को ब्रह्मपाश में  बाँधना ,हनुमान रावण संवाद ,लंकादहन और माँ सीता से कोई स्मृति चिह्न माँगना और लौट कर उसे श्रीराम को सौंपना आदि दृश्य बहुत ही बढियां ढंग से अभिनीत किया . 
मातु मुझे दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा 
हनुमान की सर्वश्रेष्ठ भूमिका कर सरिता मिश्र ने प्रथम पुरस्कार जीता 
इस कार्यक्रम के पीछे की सोच यह है कि समाज में श्रेष्ठ सांस्कृतिक और पारम्परिक मूल्यों को अक्षुण बनाने की दिशा में बच्चों से ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए -कैच देम  यंग। इस दिशा में बाल रामलीला की शुरुआत एक विनम्र प्रयास भर है . कुछ चित्रों का आप भी दृश्य लाभ उठायें . जागरण ने भी चित्र के साथ खबर छापी .
बाल कलाकार टीम
 निर्देशक कीर्ति मिश्र,दृश्य समन्वयक प्रियेषा मिश्र,पार्श्व ध्वनि - स्वस्तिका, सोनी आदि 


प्रियेषा ने गाँव के बच्चों से घुलमिल कर रावण का पुतला भी बनाया और मुझसे पुतले के साथ अपना फोटो लेने का आग्रह किया . पुतला दहन के बाद  पैतृक  आवास मेघदूत  को सजाने संवारने का काम शुरू हुआ . इस बार हमसभी ने पटाखे से दूरी बनायी मगर चयनित फुलझडियों -अनार ,चरखियां ,स्वर्गबाण अदि आईटमों का मर्यादित प्रदर्शन किया गया -यह काम बच्चों को देने के बजाय आउटसोर्स कर एक प्रोफेसनल आतिशबाज को दिया गया . खूब मजा आया .
आतिशबाजी 

जाप ध्यान भी हुआ,प्रसाद बांटे गए। एक लोक परम्परा के अनुसार दिवाली के दिन अपने व्यवसाय या जो भी काम आप करते हों अवश्य करना चाहिए जिसे 'दिवाली जगाना' कहते हैं कि वह काम आप अगली दिवाली तक निर्विघ्न करते रहें.  इस लिहाज से तो मुझे जो कुछ काम करने थे वे  एक भी नहीं हो पाए,ब्लागिंग भी नहीं :-) सबसे बुरी बात यह हुयी कि मेरे फेसबुक अकाउंट से करीब दो दर्जन मोबाईल  फोटो अपलोड आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए और मुझे विचलित कर गए .कारण अभी तक समझ में नहीं आया ,फेसबुक को  प्राब्लम रिपोर्ट किया मगर अभी तक जवाब नहीं आया है , मतलब मेरी दिवाली नहीं जगी . माता जी ने आँख में काजल इस बार भी घुड़क कर लगा ही दिया यह डरा कर कि अगर नहीं लगवाता तो अगले जन्म में छंछून्दर हो जाऊंगा . मुझे सहसा डार्विन की याद आयी और होठों पर बरबस मुस्कराहट आ गयी . रिवर्स एवोलूशन :-)
भाग  दरिद्दर! 
....देर से सोये ही थे कि  अल्लसुबह नींद कुछ धप्प धप्प ढब ढब की आवाज से खुल गयी .गृहिणी एक प्राचीनतम परम्परा का निर्वहन कर रही थीं हँसियाँ से सूप पीट पीट कर घर के अतरे कोने से दरिद्दर को भागा रही थीं . अब दीवाली की आराध्य देवी लक्ष्मी के आने पर दरिद्दर को घर से बाहर हो जाने की यह प्रतीकात्मक प्रस्तुति कहाँ से अनुचित है! मनुष्य उत्सव- अनुष्ठान प्रेमी है -वह कोई भी अनुष्ठान का मौका ऐसे ही गवाना नहीं चाहता . दरिद्दर भगाने का यह उपक्रम यहाँ पूर्वांचल में बहुत प्रचलित है . गाँव घर की लक्ष्मियाँ सूप पीट पीट कर गृह दारिद्र्य को गाँव से बाहर खदेड़ आती हैं . कहीं कहीं यह उपक्रम एकादशी की रात में करते हैं।

दिवाली की अगली रात से कार्तिक का शुक्ल पक्ष आरंभ हो रहा था सो कार्तिक महात्म्य की एक पर्म्पारा के मुताबिक़ हम सब ने आवला के पेड़ के नीचे सामूहिक भोज भात -आहारा का आयोजन भी किया . बारबीक्यू की तर्ज पर ....

आप सभी के यहाँ से  दुःख -दारिद्र्य भाग जाए दीपोत्सव की यही सर्वतोभद्र कामना है ........

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

मोतियाबिंद का आपरेशन

जब माता जी ने करीब छः महीने पहले यह शिकायत की कि उनकी आँखों के सामने मकडी के जाले  सा दिखता है तो मैंने उन्हें नेत्र चिकित्सक को दिखाने का निर्णय लिया .बनारस में आर के नेत्रालय सबसे अच्छा नेत्र चिकित्सालय है और डॉ. आर के ओझा एक जाने माने नेत्र सर्जन हैं . उन्होंने   जांच कर बताया कि इनकी आँखों में मोतियाबिंद की शुरुआत है और दायीं  आँख का आपरेशन करा लिया जाना उचित होगा . बाईं आँख के लिए इंतज़ार किया जा सकता है , आज सभी को मालूम है कि आँखों का कुदरती लेंस किन्ही कारणों (बल्कि कई कारण हो सकते हैं ) से धूसर होते जाते हैं तो दिखना प्रभावित होने लगता है . अब आपरेशन तुरंत कराया जाय या इंतज़ार किया जाय इस पर जैसा कि प्रायः सभी भारतीय परिवारों में दो विचार हो जाया  करते हैं यहाँ भी हुआ . इन मामलों में मैं चिकित्सक का सुझाव निर्णायक मानता हूँ . डॉ ओझा ने स्पष्ट रूप से कहा कि आपरेशन जरुरी है . माता जी थोडा घबरा रही थीं तो उन्होंने कई दलीलें रखीं -गर्मी का मौसम है ,धूल बहुत उड़ रही है ,बिना नहाये दो तीन दिन कैसे रहा जाय ...घर के कुछ सदस्य भी दन से माता जी से सहमत हो लिए ..मैं अकेला पड़  गया मगर मन में निश्चय कर लिया कि जितना जल्दी हो आपरेशन तो कराना ही है . इसी के तत्काल बाद मेरा ट्रांसफर भी हो गया और ऐसी जगहं कि वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध नहीं है ,सोनभद्र में ज्वाईन करते ही मेरे कार्यालय -मालिके मकान ने खुद अपना और एक और मामले का ऐसा उद्धरण दिया जिसमें वहां आपरेशन करने बाद आँख की रोशनी चली गयी थी  .....अब तो बनारस में आपरेशन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था  . सोनभद्र सर सामान ले कर जाने के पहले माता जी का आपरेशन करा लेना ही था . 
माता जी आपरेशन के ठीक बाद 
मुझे बचपन की जब मैं मात्र पांच साल का था यानी पचास साल  पहले गाँव में ही एक वृद्ध महिला के मोतियाबिंद के आपरेशन का खौफनाक दृश्य आज भी याद है . वह आपरेशन जमीन पर बैठा कर हुआ था पीढ़े पर दोनों मरीज और ग्राम्य शल्य चिकित्सक  बैठे थे ,अनेस्थेसिया तो था नहीं, ऐसे ही उसके औजार वृद्धा की आंख पर चल रहे थे और वे चिल्ला रही थीं ....यह दृश्य मुझे आज भी ठीक वैसे ही याद है .गनीमत कहिये या घोर आश्चर्य वह आपरेशन सफल हुआ था और वे महीनों तक एक हरे रंग की  आँख -टोपी लगाती  थी .बहुत झगडालू थीं अब दिवंगत बहुरूपा दादी की  आँख ठीक हो गयी तो उन लोगों को भी जिन्हें वे देख नहीं  पाती थीं देखने लग गयीं तो देखते ही आदतन गरियाने भी लग गयीं थीं . लोग शिकायत भी करते "काहें भैया इनका आपरेशन करा दिए इससे भली तो वे आन्हर ही थीं " :-) मगर उस समय जिस किसी ने उनकी आँख का आपरेशन उस ग्राम्य सर्जन से कराने का निर्णय लिया था ,उनके पति और हमारे आजा ( मैं उन्हें यही कहता था ) या उनके पुत्रों ने जिनमें एक अभी भी हैं को लेकर मेरे मन में बड़ा आदर है .उन्होंने एक बड़ा रिस्क तो लिया था क्योंकि  उन दिनों उस तरह की सर्जरी के बिना और कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी , 
आपरेशन का दूसरा दिन -काला चश्मा लग गया 
आज तो फेको सर्जरी है जिसमें आँख में बस एक-दो मिमी का चीरा लगा कर खराब लेंस को काटकर बाहर खींच लिया जाता है और नया लेंस लगा दिया जाता है .कुल आपरेशन महज 15-20 मिनट का ही है . परसों रात 10 बजे माता जी का आपरेशन हो गया . और ठीक दस मिनट बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी मिल गयी . रात भर एक पट्टी (बैंडेज) लगा रहा सुबह वह भी हट गया और काला चश्मा अभी कुछ दिन और लगा  रहेगा , मगर बस इसी पल भर के आपरेशन कराने का निर्णय लेने में कुछ महीने लग गए ..क्या करें, अकेले किसी एक आदमी को संयुक्त परिवार में अब निर्णय लेने में समय लग ही जाता है और अब कोई भी निर्णय शायद बहुमत से होते भी नहीं -कई समाजार्थिक कारण इनके पीछे होते हैं .

प्रायः हम लोगों को कहते सुनते हैं कि अमुक आपरेशन तो बहुत हल्का, छोटा सा है। जैसे आँख के मोतियाबिंद का  यही आपरेशन . किन्तु मैं समझता हूँ कि किसी भी आपरेशन में रिस्क फैक्टर हमेशा मौजूद रहता है चाहे वह छोटा हो या  बड़ा . आपरेशन टेबल से सकुशल वापसी किसी बड़े युद्ध से सकुशल वापसी से कम नहीं है और बड़ी राहत वाली बात है . मुझे खुद अपना एक आपरेशन याद है 2005  का जब मैंने मेजर आपरेशन से अपने गाल ब्लैडर के स्टोन को निकलवाने का निर्णय लिया  था .फिजिसियन और सर्जन दोनों ही  मेरे क्लास फेलो थे ,बल्कि मैंने ही इस आपरेशन के लिए उन्हें चुना था . वह आपरेशन जनरल अनीसथीसिया में हुआ था यानी पूरा बेहोश करके . आपरेशन  टेबल पर लेटने के पहले तरह तरह के विचार मन में आ  रहे थे . उनमें एक तो यह था कि मुझे इसलिए चिंता नहीं करनी चाहिए कि अगर कुछ अनहोनी हुयी भी तो फिर तो आपरेशन के उपरान्त मुझे उसका पता ही नहीं चलेगा और आपरेशन सफल हुआ तो  चिंता करने की बात ही नहीं है . यानी दोनों ही स्थितियों में फिकर नाट . और यह बड़ी राहत  वाला विचार था . आपरेशन बहुत  सफल था मगर मेरे मित्र सर्जन ने बाद में बताया कि मुझसे ज्यादा तो वे तनाव में थे -मित्र के शरीर पर सर्जरी में उनका मन स्थिर नहीं था .....मैंने पूछा था क्यों ? तो उन्होंने बताया था कि आपरेशन में अगर कुछ भी हो जाता तो वे मित्रता के कारण ज्यादा आहत होते और अपयश भी कम न मिलता . ऐसे मामलों में चिकित्सक भी कहाँ पूरी तरह प्रोफ़ेसनल रह पाते हैं .आपरेशन टेबल हमेशा ही निरापद नहीं रहता . एक सर्जन  के जीवन की सबसे बुरी घटना होती है डी  ओ टी यानी डेथ आन आपरेशन टेबल और यह एकदम असंभव भी नहीं है . माता जी के सारे परीक्षण हो चुके थे ,वे ब्लड प्रेशर की मरीज हैं .मुझे डर  भी लग रहा था मगर वे आपरेशन टेबल से विजेता की तरह लौटीं -मेरे जान में जान आयी . सूत्र वाक्य यही कि जब तक सफल न हो जाय कोई भी आपरेशन छोटा -बड़ा नहीं होता यानी सब बड़े ही होते हैं! 

मैंने यह पोस्ट कुछ तो मोतियाबिंद को लेकर अपने अनुभव आपसे शेयर करने के लिए लिखी है ,.दूजे फेको विधि से मोतियाबिंद -सर्जरी की अच्छाई बताने के लिए और यह भी क़ि एलोपैथी में सर्जरी का कोई श्रेष्ठ  विकल्प नहीं है . 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

.....और मैं हतप्रभ सा देखता रह गया!


पिछले कुछ दिनों मैं जौनपुर जनपद के अपने पैतृक आवास पर छुट्टियों के दौरान था जब 1/2 नवम्बर  की रात को  दो- ढाई बजे से चार बजे  के दौरान वह  अद्भुत आकाशीय नज़ारा दिखाई दिया. मुझे बचपन में ऐसा ही दृश्य दिखायी दिया था तब मेरी बाल सुलभ उत्सुकता को शांत करते हुए मेरे बाबा जी ने कहा था तुम यह जो घेरा सा देख रहो हो चंद्रमा के चारो ओर यह दरअसल इंद्र की सभा है और  वे  मौसम  के आगामी रुख पर विचार विमर्श कर रहे हैं -घटना थी चन्द्र छल्ले या चन्द्र आभा की . चन्द्रमा ठीक मेरे सिर के ऊपर और उसके चारो ओर सटीक गोलाई में ४४ अंश का घेरा ....मैं विस्मित सा देखता रह गया -आधी रात के बाद की घोर निद्रा में सो रही पत्नी और बेटी को भी जब यह नज़ारा दिखाया तो नीद में खलल पड़ने का उनको कोई मलाल न था और सबसे बड़ी राहत कि मुझे डांट नहीं पडी . मैं तो तुरंत फेसबुक अपडेट करने में लग गया . मगर हद है इक्का दुक्का ही लोग जागते मिले ..एक तो अजमेर के साहब जिन्हें भी यह दृश्य दिखा था .पलकों से नीद गायब थी और सुबह होते होते काफी जानकारी अंतर्जाल से बजरिये मोबाईल मिल गयी थी .. 
अद्भुत संयोग था कि सैंडी के अमेरिका के पूर्वी तट पर कहर बरपाने वाली रात को ऐसा ही छल्ला वहां दिखा था .....तो क्या मेरे द्वारा देखे गए चन्द्र छल्ले का मतलब किसी तूफ़ान का संकेत था ..बिलकुल  था -यह नीलम चक्रवात की ही धमक थी मगर अच्छी बात रही कि उसका प्रभाव यहाँ तक आते आते काफी क्षीण हो चुका था ,सुबह सुबह जागरण के स्थानीय संवाददाता ओंकार मिश्र ने इस खबर को कवर किया और जागरण ने इसे प्रमुखता से छापा .मगर मुझे आश्चर्य यह है कि आलतू फालतू ख़बरों को दिन रात दिखाने वाले मीडिया चैनेल और भारतीय खगोल शास्त्री या फिर शौकिया खगोल विद सभी उस रात घोड़े बेंच के सोये हुए थे? दरअसल ऐसी घटनाएं लोगों में और खासकर बच्चों -किशोरों में खगोल विज्ञान के प्रति रूचि जगाने का एक अवसर देती हैं और ऐसे में चूकना नहीं चाहिए. 
अद्भुत आकाशीय नजारे का हुआ दीदार
नौपेड़वा (जौनपुर): गुरुवार आधी रात के बाद चन्द्रमा के इर्द-गिर्द बना विशाल गोल घेरा लोगों को अचंभित कर रहा था। अद्भुत आकाशीय नजारा देखने हेतु लोगों ने अपने परिजनों को जगाया। रात दो बजे से चार बजे तक दिखा घेरा धीरे-धीरे स्वत: समाप्त हो गया। चन्द्रमा के बिल्कुल करीब वृहस्पति ग्रह भी स्पष्ट रूप से चमक रहा था। इस बारे में अपने पैत्रिक आवास चुरावनपुर बक्शा में छुट्टियां बिताने आए विज्ञान संचारक डा.अरविन्द मिश्र ने बताया कि यह एक दुर्लभ आकाशीय घटना है। जो प्राय: किसी आने वाले तूफान का आभास देता है।
डा.मिश्र ने बताया कि अमेरिका में आए हुए सैन्डी तूफान के ठीक पहले 28 अक्टूबर को पूर्वी तट के निवासियों ने एक ऐसा ही आकाशीय नजारा देखा था। वैज्ञानिक इस आकाशीय घटना को चन्द्र छल्ला 'ल्यूनर हालो' अथवा मूल रिंग का नाम देते हैं।
वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि जब आसमान में एक खास प्रकार के बादल जिसे सिर्रस बादल कहा जाता है जो बहुत ऊंचाई पर होते हैं तथा बर्फ के क्रिस्टल बनते हैं तो चन्द्रमा के प्रकाश के परावर्तन से चन्द्र छल्ले का बनना दिखलाई देता है। लोक कथाओं में ऐसे चन्द्र छल्ले का बनना दिखना किसी तूफान के आने का संकेत माना जाता है जिसे वैज्ञानिक भी पुष्ट करते हैं। सैंडी तूफान के आने के ठीक पहले एक विशाल चन्द्र छल्ले का दिखना इसका प्रमाण है। आकाश में गुरुवार की रात इस छल्ले को तमाम लोग देखे जिसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं रही।

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