बाबू देवकी नंदन खत्री की अमर तिलिस्मी कृति चन्द्रकान्ता के प्रेरणा स्रोत रहे एक अद्भुत फंतासी की दुनिया के मौजूदा ध्वंसावशेष और आज भी रहस्यमयी विजयगढ़ दुर्ग पर कल हमने ट्रेकिंग कर ही लिया -किला फतह हुआ एक बार फिर कुछ साधारण से मनुष्यों द्वारा . देवकी नंदन खत्री के चन्द्रकान्ता उपन्यास की नायिका बेहद सुन्दरी राजकुमारी चंद्रकांता यहीं विजयगढ़ की थीं -इस कृति को दूरदर्शन ने काफी ख्याति दिलाई और कुछ और भी कल्पनाशीलता का सहारा लिया . जिन्होंने यह धारावाहिक देखा होगा उन्हें याद होगा कि विजयगढ़ के पास के ही नौगढ़ ( जो आज चंदौली जनपद में है ) के राजकुमार वीरेंद्र सिंह की प्रेम कथा में विजयगढ़ दरबार का ही क्रूर सिंह विलेन बना और अपने मकसद में सफल न होने पर समीपवर्ती चुनारगढ़ (अब मिर्जापुर ) के राजा शिवदत्त को विजयगढ़ पर आक्रमण के लिए उकसाया .खैर यह सब तो फ़साना है मगर हकीकत भी कुछ कम रोमांचकारी और रहस्यभरा नहीं है .
अभी तो आधा रास्ता भी नहीं हुआ
यहाँ सोनभद्र में आने के बाद देखे जाने वाली जगहों की सूची में विजयगढ़ का दुर्ग भी था मगर मुश्किल यह थी की यह चार सौ फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ पर स्थित है . और काफी चढ़ाई है . एक तरफ से तो करीब पांच किमी ट्रेकिंग करनी पड़ती है जो किले के मुख्य दरवाजे से प्रवेश दिलाता है मगर एक वाहन का रास्ता भी कालान्तर में वजूद में आ गया जो किले की एक खिड़की (गवाक्ष ) के नीचे तक जा पहुंचाता है. मगर यहाँ से सीधी चढ़ाई है और कोई व्यवस्थित मार्ग भी नहीं है -बस पत्थरों पर पैर रखते हुए सीधे खिड़की तक पहुँच जाईये - मैं इसी से घबरा रहा था -शरीर और उम्र का तकाजा ........मगर इस किले के रहस्य ने उत्साह भरा और चन्द्रकान्ता का नाम ले हम भी आखिर दुर्ग में प्रवेश कर ही लिए.भारतीय लिहाज से यह एक एडवेंचर यात्रा रही।
जन श्रुतियों का साक्षात रामसागर
राबर्ट्सगंज के नगवां ब्लाक में मुख्यालय से करीब तीस किमी पर मऊकलां गाँव में यह दुर्ग सबसे ऊंचे पहाड़ पर है। मऊकलां गाँव में बुद्ध से जुड़े अवशेष , गुफा चित्र भी हैं और अब यहाँ एक संग्रहालय भी है जिसे हम अगली बार देखने के लिए छोड़ कर आगे बढे। वाहन वाले रास्ते को चुना और खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों को देखते हुए किले के पीछे की खिड़की के ठीक नीचे जा पहुंचे। सिर उठा कर ऊंचाई देखी तो एक बार गहरी निराशा हो आयी।किले ऐसे ही सुरक्षित बनते थे ताकि दुश्मन की फौजे कहीं से भी आसानी से चढ़ न पायें। प्रियेषा सबसे पहले आगे बढीं मगर जोर से चिल्ला कर आगाह किया कि पापा आप चढ़ नहीं पायेगें। आज के युवा अपने बुजुर्ग पीढी को ऐसे ही अंडरइस्टीमेट करते हैं.हुंह! मैंने तत्क्षण चढ़ने का फैसला कर लिया।कुछ मत पूछिए, साँसे धौकनी हुई और एक दो जगहं बैठ गए तो बैठ गए। मैं, पत्नी और डेजी बुजुर्ग थे और डेजी तो मनुष्य की उम्र के हिसाब से एक सौ चालीस साल यानि चौदह साल की। प्रियेषा ने डेजी को गोंद में ले लिया और अब उसके लिए भी चढ़ाई मुश्किल हो गयी थी। आखिरकार हम खिड़की तक पहुँच गए और चौखट डांकते ही एक विशाल मैदान सामने था -थोड़ी देर तो भ्रम सा हो आया कि हम पहाड़ पर वाकई थे -यह इस इलाके का सबसे ऊंचा पहाड़ था।
चढ़े तो हम पिछवाड़े की खिड़की से मगर मुख्य दरवाजे तक आ पहुंचे
यद्यपि किले की प्राचीनता के बारे में बहुत प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती मगर कहते हैं कि इसका निर्माण पांचवी शती में कोल राजाओं ने कराया था। इतिहासकारों का दावा है कि इसका निर्माण पंद्रह सौ वर्ष पूर्व में ही भट्ट शासकों द्वारा हो चुका था। कालांतर में अन्य राजाओं ने इस पर अधिपत्य किया। काशी के राज चेत सिंह अंग्रेजों के समय तक इस पर काबिज थे. चंदेलों द्वारा भी यहाँ से राज काज संभालने का उल्लेख है. यहाँ के सप्त सरोवर आज भी दर्शनीय हैं - इतने ऊपर होने के बाद भी इनमें पानी कहाँ से आता है और कैसे दो सरोवरों में आज भी पानी सूखता नहीं विस्मित करता है। इनमें से एक राम सागर को लेकर तो कई दन्त कथायें प्रचलित हैं। कहते हैं कभी इसमें हाथ डालने पर बर्तन मिल जाते थे और लोग उसी में खाना बनाते थे। ये इतने गहरे हैं कि इनकी गहराई आज तक पता न लग पाने की बात कही जाती है.
रानी बुर्ज -एकमात्र यही संरचना कुछ ठीक है
आज दुर्ग बहुत खराब स्थिति में है। यहाँ पता नहीं कब एक मजार बन गयी और पास में ही एक कमरे का शिव मंदिर और एक तालाब हिन्दू का हो गया और एक मुस्लिम का। और एक ओर सालाना उर्स तो दूसरी ओर सावन में कांवरियों का मेला -आज बस दुर्ग की यही पहचान रह गयी है। कुछ और स्थापत्य के नमूने - बुर्ज रनिवास ,कचहरी ,शिला लेख आदि भी हैं। जनश्रुति यह भी है कि यह किला महज एक तिलस्मी भूल भुलावा है -एक दूसरा किला इस किले में छुपा है। काश मल्हार वाले सुब्रमन्यन साहब या राहुल सिंह जी भी साथ होते।
हिल टाप पर बसा है किला - एक लांग शाट
हम पहाड़ की चोटी पर चहलकदमी करते हुए किले के मुख्य दरवाजे पर जा पहुंचे। यहाँ से विशाल नयनाभिराम धन्धरौल जलाशय और चुर्क की कई किमी दूर की सीमेंट फैक्ट्री भी दिखती है. किले के मुख्य द्वार पर झाड झंखाड़ उगे हैं -एक काला नाग हमारे सामने से सरसराता गुज़र गया। प्रियेषा ने फोटो तो ली मगर उसका आधा हिस्सा गायब हो चुका था। मुख्य द्वार के समीप की प्राचीन कचहरी में उर्स के भंडारे की इंतजामिया कमेटी का कब्ज़ा है. बगल में हजरत मीर शाह बाबा की मजार है और उससे लगा प्राचीन तालाब मीर सागर। यहाँ प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह में उर्स का भारी मेला लगता है। अब तक हम काफी थक चुके थे अतः वापस चल पड़े। किले से उतरना भी कम दुष्कर नहीं है -सीधी चढ़ाई के बजाय सीधी उतरन में ज्यादा सावधानी की जरुरत रहती है।
फिर आयेगें विजयगढ़ !
यह पूरा क्षेत्र - मऊ कलां गाँव पुरातात्विक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।भारत सरकार का पुरातत्व विभाग इधर ध्यान दे यह अपेक्षा है! प्राचीन इतिहास के छात्रों के लिए यह एक महत्वपूर्ण भ्रमण स्थल है। हमें मुक्खा फाल भी देखना था जो विपरीत दिशा में करीब अस्सी किमी दूर था इसलिए हम डेढ़ बजे दोपहर के बाद किले से आगे चल पड़े !
