मंगलवार, 17 जुलाई 2012

नारी सब दुखों की खान है -बोले सियावर रामजी! (मानस प्रसंग, 6)


सबसे पहले यह निवेदन और दावात्याग: प्रस्तुत लेख एक खुला हुआ नारी विमर्श है और मेरा अपना कोई पूर्वाग्रह पोस्ट-कंटेंट के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। विषय पर मेरी अपनी समझ और व्याख्याएं हैं। मगर यहां मैं उनसे निरपेक्ष रहकर मानस के नारी विमर्श को जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूं।मेरे मित्रगण खासकर महिला ब्लॉगर और मित्र इसी परिप्रेक्ष्य में इस पोस्ट को देखेगें/देखेगीं! हां विवेचन में अपने मनोभाव भी व्यक्त कर सकूंगा अगर कोई स्वस्थ बातचीत-विवेचन होता है तभी! पोस्ट लम्बी हो गयी है अतः दो भागों में आएगी...आज अरण्यकाण्ड पूरा हुआ। एक ख़ास प्रसंग है यहां . सीता की खोज में राम वन-वन भटकते हुए आगे बढ़ रहे हैं। एक सुरम्य सी जगह रुकते हैं। विराम करते हैं। मुनिजन, देवता गण आते हैं। स्तुति गान करते हैं। नारद भी आते हैं। सुअवसर जानकर एक सवाल पूछते हैं –

तब बिबाह मैं चाहऊँ कीन्हा केहिं कारण प्रभु करहि न दीन्हा...

प्रभु! मैं जब विवाह करना चाहता था तब आपने मुझे क्यों नहीं करने दिया? नारद को एक कसक थी...सो पूछ ही लिया...मोह में उनकी बड़ी फजीहत हुई थी। उन्हें अपने कामजेता होने का घमंड हो गया था और विश्वमोहिनी के स्वयंवर का सारा माया जाल उनके इसी दर्प को तोड़ने के लिए रचित हुआ था। कथा आपको पता ही है। भगवान राम ही अब उन्हें इत्मीनान से बताते हैं कि उन्हें उस समय विवाह करने से हठात खुद उन्होंने ही रोकने का यत्न क्यों किया था। यह प्रसंग मानस में नारी विमर्श का एक अनूठा प्रसंग है। श्री राम कहते हैं –


काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।। 


उन लोगों को जिन्हें अवधी पढ़ने समझने में असुविधा है, अर्थ भी बताते चलते हैं - संसार में काम क्रोध लोभ और मद मनुष्य के मोह के बड़े कारण हैं। मगर उनमें भी स्वयं माया रूपा नारी तो अत्यंत दारुण और दुखद है। हे मुनि, पुराण और श्रुतियों तक में यही कहा गया है कि मोह रूपी वन के लिए नारी बसंत ऋतु के समान है। अर्थात् सभी मोहों को बढ़ाने वाली है। और जप तप नियम रूपी जलाशय के लिए तो वह ग्रीष्म ऋतु बन कर इन गुणों को सोख लेती है। मगर काम क्रोध मद और डाह रूपी मेढकों के लिए नारी वर्षा ऋतु बनकर हर्षित कर देती है। और बुरी वासनाओं के कुमुदों के लिए तो यह सदैव सुख देने वाली शरद ऋतु बन जाती है। और सभी तरह के धर्मं कर्म रूपी कमलों के समूह के लिए नारी हिम (ऋतु) बन कर उन्हें क्षय कर देती है। ममता मोह रूपी जवास (के वन) को तो नारी शिशिर ऋतु बनकर हराभरा करती है। पाप रूपी उल्लू समूहों के लिए नारी घनी अंधेरी सुखभरी रात है जो उनके बढ़ने में सहायक है। और तो और बुद्धि बल शील और सत्य रूपी मछलियों के लिए यह बंसी (मछली पकड़ने का कांटा) बन जाती है।

हे मुनिवर युवती स्त्री सभी अवगुणों की मूल,पीड़ा देने वाली और दुखों की खान है और इसीलिए मैंने आपको विवाह करने से रोका थाअब जैसे मुनि और ज्ञानी जनों के लिए नारी सानिध्य ही पूर्णतया प्रतिबंधित हो!

मानस का यह प्रसंग निर्विवाद रूप से संतकवि के निजी भोगे हुए अनुभव और नारी विषयक तत्कालीन अद्यावधि ज्ञान का निचोड़ था जो किसी और के मुंह से नहीं स्वयं श्रीराम के मुंह से संत कवि द्वारा कहलाया गया। हमारे धर्मग्रंथों, आर्षग्रंथों में नारी को ज्ञान और तपस्या का एक विरोधी कारक बताया जाता रहा है जबकि यह भी सत्य है कि अनेक संदर्भ ग्रन्थ वैदिक -उपनिषदीय काल की नारियों को परम विदुषी और वेदों के ज्ञाता भी घोषित करते हैं।

मेरा असमंजस यही है - क्या कालान्तर में कतिपय कारणों, जिनकी पहचान की जा सकती है, के चलते नारी की यथोक्त स्थिति विद्वत मानस में बनती गयी। क्या सनातनी ब्राह्मणों ने बुद्ध विहारों में नारी स्वच्छंदता से उपजे व्यभिचार और ज्ञान मार्गियों के अधोपतन से कोई सबक लिया था? मानस में नारी विमर्श के इस स्वरुप को देखकर मैं हतप्रभ हूं। लिहाजा मैंने पूर्व कांडों का भी एक सिंहावलोकन किया। दरअसल बालकाण्ड से ही नारी का ऐसा रूप स्थापित होता दीखता है।

शेष अगले भाग में...


71 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार ऐसे ही हम सब परिवार वाले एक साथ बैठे हुए थे... और टीवी पर कोई फिल्म आ रही थी.. जिसमें अनुपम खेर कहता है कि 'नारी नरक का द्वार है' .. मैंने अनुपम खेर की बात का समर्थन किया ... तो मेरी बहन ज़ोर से कहती है कि ऐसा है ना कि यह तुम्हारी गन्दी सोच है.. नारी नरक का द्वार नहीं होतीं.. नारियां नरक द्वार होतीं हैं.. जाओ भागो यहाँ से .. तुम इतनी सारी नारियों से जुड़े रहते हो.. इसीलिए ऐसा कहते हो.... मैंने भी सोचा बात तो सही है.. अगर हमारी लाइफ में एक से ज़्यादा नारियां हैं तो ज़िन्दगी तो नरक बनेगी ही... नारियों का/से मैनेजमेंट बहुत मुश्किल होता है :) (वैसे यह कमेन्ट मैंने सिर्फ टाइटल पढ़ कर दिया है)... अब पोस्ट पढ़ता हूँ....

    आपने मीनिंग बता कर बहुत अच्छा किया... पोस्ट अच्छी लगी.. मेरा फेवरिट चैप्टर इन सायकोलॉजी मेल/फीमेल कम्पेरेटिव बिहेवियरल स्टडी है......
    "कतिपय" शब्द से याद आया कि एक बार अपने पाबला जी की पोस्ट में यह वर्ड था और रात के तीन बजे किसी महिला ने उनको नींद से जगा कर इसका मतलब पूछा था... :) फ़िर उनको नींद नहीं आई.. तो उन्होंने यह बात मुझे भी जगा कर बताई.. कि ऐसा भी होता है..

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  2. नारी सब दुखों की खान है -- अब चिंता की कोई बात नहीं . शायद इसी का समाधान करने के लिए अब सरकार और न्यायालय ने समलैंगिग संबंधों को मान्यता दे दी है . :)

    जब प्रकृति ने स्त्री पुरुष को एक दूसरे का पूरक बनाया है तो , नारी नरक का द्वार कैसे हो सकती है !

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  3. नारी नरक का द्वार है - ये रामचरित मानस में कहा गया है. तुलसीदास ने अपने अनुभव को व्यक्त करवाया राम के द्वारा. लेकिन नारी का एक रूप तो नहीं है , वह माँ , बहन , बेटी और पत्नी सभी रूपों में नारी ही है न - फिर किस नारी पर आक्षेप किया है? उसके किस रूप को नरक का द्वार बताया है. मानव को चारों आश्रम के बिना मोक्ष नहीं मिलता है और गृहस्थाश्रम बिना नारी के संभव नहीं है. नारी तो अनुसूया भी थी, नारी तो सीता और राधा भी थी. तुलसीदास जी ने जो भी अनुभव किया हो , लेकिन सृष्टि नारी के बिना संभव नहीं है और अगर वह नरक का द्वार है तो फिर सृष्टिकर्ता को सिर्फ पुरुष का निर्माण करना चाहिए था जो सीधे स्वर्ग के द्वार पर खड़ा रहता और उसमें ही प्रवेश कर जाता .

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  4. यहाँ हर इंसान अपनी मानसिकता अनुसार वाक्य का अलग अलग मतलब निकालते हैं , इस लिहाज से ऐसे शीर्षक को बिना समझे लोग ऐतराज करेंगे !
    अब या तो सफाई देते रहें या आरोप लेकर शांत हो जाएँ .....
    :)
    शुभकामनायें आपको !

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  5. रामायण में से अच्छी बातो को क्यूँ नहीं लिखा जाता ..???बार बार उन्ही बातो को क्यों दोहराया जाता है जो यह दिखाती है की पुरुष ही श्रेष्ठ है ..

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  6. @यहाँ हर इंसान अपनी मानसिकता अनुसार वाक्य .......

    jaise 'pathar' me 'pran' apni bhawna se pratisthapit karte hain yse hi kisi shabd/wakya ke 'arth' log apni mansikta ke hisab se hi karte hain

    aur haan...is lekh pe bare bhai ko koi safai nahi dena hoga....kyonke
    'shirshak' bajariye 'manas prasang'
    se 'shabd' tulsidasji ke aur 'bol' siyabar ramji ke, diye gaye hain......

    agar upar-likhit lekh ka anumodan bare bhaijee karte hain to 'aapka'
    shanka 'nirmul' nahi jayega......
    'bijliyan' giregi .....

    pranam.

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  7. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

    आइये-

    सादर ।।

    आदरणीय पाठक गण !!

    किसी भी लिंक पर टिप्पणी करें ।

    सम्बंधित पोस्ट पर ही उसे पेस्ट कर दिया जायेगा 11 AM पर-

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  8. @रेखा जी,
    नारी नरक द्वार तो भैया चिर कुंवारे महफूज का वाक्य है -तुलसी इतनी हल्की बात नहीं करते -विनम्र आग्रह करूँगा कि पोस्ट को एक बार फिर ध्यान से मंथर गति से पढ़िए -महफूज मियाँ से कन्फ्यूज मत होईये !

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  9. तुलसीदास जी से सहमत होना जरूरी तो नहीं है!

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  10. पी एन सुब्रमण्यम जी से सहमत.
    तुलसी तो क्या, सहमत होने लायक सभी काम तो स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम ने भी नहीं किये.

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  11. Mai to kahungi naree gar narak ka dwar hai,to purush Mahadwar hai!Gar purush me aql hai aur wo sochta hai,nari narak ka dwar hai,to usse door rahe,haina?
    Mahfooz ji kee tippanee badee rochak lagee!

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  12. तुलसी दास जी भूल गये कि उन्हें राम की शरण में जाने को प्रेरित करने वाली उनकी पत्नी एक नारी ही थी । और नारद मुनि को नारी से दूर रहने की बात कहने वाले भगवान क्या स्वयं नारी से दूर रह पाये ? हम आज बी देखते हैं कि पुरुष का मोह और विषयों के प्रति आकर्षण तो बुढापे में बी नही मिटता ।

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  13. तुलसी के पूरे पैरे का निचोड़ यह है कि पुरुष काम,क्रोध,लोभ और मद से मुक्त होना चाहता है तथा जप,तप और नियम उसके जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह भी,कि बुरी वासनाएं और पाप पुरुष को पसंद नहीं हैं और वह तो नारी के कारण कीचड़ हुए इस संसार में स्वयं को धर्मरूपी कमल समझता है अथवा बनना चाहता है।

    पुरुष के साथ जो भी ग़लत हो रहा है उसके लिए उत्तरदायी कोई और है,यह बात कम से कम कोई संत तो नहीं कह सकता। दरअसल,ऐसी सोच रखने के कारण ही व्यक्ति धर्म को सहज उपलब्ध नहीं हो पाता। धार्मिक व्यक्ति तो सारे दोषों के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानता है और अपनी उपलब्धियों को परमात्मा की कृपा कहकर अपने संतत्व का परिचय देता है।

    अगर हमने स्त्री को प्रेम दिया,तो वह अनिवार्यतः क्रोध बढ़ाने वाली ही क्यों होगी? पुरुष जिसे तमाम रोगों की जड़ बताता है,वह स्वयं उसके दिमाग में कुंठित अवस्था में रहता है जिससे वह पहाड़ों पर जाकर भी मुक्त नहीं हो पाता। अन्यथा,मेनका के लिए क्या कमी है पुरुषों की जो वह विश्वामित्र के ही तप को भंग करने में अपना समय गंवाए!

    हमारा जीवन सापेक्ष है। मगर पुरुष मन यह समझने के लिए तैयार नहीं है। वह काम-क्रोध-मद-लोभ से मुक्ति और परम तत्व की प्राप्ति पर अपना एकाधिकार समझता है। कल्पना कीजिए कि यदि महिलाएं भी काम-क्रोध-मद-लोभ से मुक्त होकर धर्मरूपी कमल बनना चाहें,तो वे स्वयं के लिए सबसे बड़ा बाधक किसे बताएंगी?

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  14. क्रिया के विपरित प्रतिक्रिया होती है ..

    समाज जैसा नारी को देगा वैसा ही वह उसे लौटाएगी ..
    चाहे इसे गलत कहा जाए या सही ..

    एक नजर समग्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर भी डालें

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  15. राम एक आदर्श पुरुष थे . वे नारी को अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग करेंगे , यह सोचा भी नहीं जा सकता . उन्होंने तो कैकेयी को भी अपने चौदह वर्ष के वनवास , पिता की मृत्यु का कारण होने के बाद भी क्षमा किया , स्वीकार किया. सीता के त्याग पर प्रश्न उठाये जा सकते हैं लेकिन उन्होंने उनके त्याग के समय या बाद में भी सीता का नारी होने के कारण किसी प्रकार का अपमान नहीं किया . दोनों ने अलगाव के इस क्षण को पूरी गरिमा से स्वीकार किया ,हालाँकि हम सब उनकी संतानें इस पर व्यथित होती है , प्रश्न भी उठाती है , जो स्वाभाविक भी है क्योंकि जिसे मर्यादा पुरुष कहा गया है , लोंग उन्ही के आचरण का अनुसरण करते हैं .
    इस प्रसंग में राम सीता को खोजते वन -वन भटक रहे हैं . तुलसीदास प्रभु राम की इस अवस्था का कारण मोह को मानते हैं और मोहजनित भावना को धिक्कारना चाह्ते हैं जो स्त्री के कारण उत्पन्न हुई . नारद को विस्तार से समझाने में यही प्रयोजन रहा हो कि उनका जन्म जगत कल्याण के लिए हुआ है , गृहस्थी के मायाजाल में सिमटने के लिए नहीं .
    यह एक तात्कालिक प्रतिक्रिया भी मानी जा सकती है . जैसे कई बार पति -पत्नी गृहस्थी के जंजाल से दुखी होकर कह देते हैं कि अच्छा होता जो ब्याह ही नहीं किया होता , या अक्सर लोंग दूसरों को कहते दिखाई पड़ते है अच्छा हुआ , तुमने विवाह नहीं किया ,वरना इस बंधन में पड़े रहते !
    तुलसीदासजी के मन में पत्नी द्वारा मोहजनित प्रेम को अस्वीकार करने की बहुत पीड़ा रही और इसका असर उनके लेखन में भी यदा- कदा दिखाई देता रहा जिसे उन्होंने राम के द्वारा कहलवाया . वरना तो लक्ष्मण के रूप में उन्होंने ऐसे पुरुष का भी वर्णन किया जो आदरणीय स्त्री के चेहरे की ओर भी नहीं ताकता , सिर्फ उनके चरणों के आभूषण से जानता है .
    मानव रूप में राम के गुण -दोष आम मनुष्य जैसे ही हो सकते हैं , उनके द्वारा किया गया प्रत्येक आचरण अनुकरणीय हो , यह आवश्यक नहीं ...निशांतजी से सहमत !

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  16. ओ लाला ओ लाला ....ये भी मानस में है ...

    (१)सिया राममय सब जग जानी ,करहूँ प्रणाम जोरी करि पाणी

    (२)शुद्र गवार ,ढोल पशु नारी ,सकल ताड़ना के अधिकारी ..

    एक यह भी इसकी उल्ट चल पड़ी है

    पुरुष गवार और घोड़ा ,

    इन्हें जितना मारो ,थोड़ा ...

    हमें लगता है हुलसी के तुलसी पत्नी पीड़ित थे ,उन्हें उनकी पत्नी ने ही राम भक्त बनाया था -जितनी प्रीत मुझसे करते हो उतनी भगवान से करो तो नैया पार हो जाए .....

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  17. अगर किसी बात को उसके सन्दर्भ से काटकर देखा जाता है तो विपरीत अर्थ निकलते हैं.
    यहाँ काम,क्रोध,मद,लोभ जैसी दुष्प्रवृत्तियों को गलत बताने के लिए नारी का नाम काम के सन्दर्भ में लिया गया है.क्या कोई इस बात से इंकार कर सकता है कि कामांध या विषयासक्त होकर पुरुष कोई कार्य करता है तो उसे सुख की प्राप्ति होगी? उसने यदि नारी को विषय और काम का ही जरिया माना है तो नारी से उसे दुःख ही तो मिलेगा.धन,मद,लोभ जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ भी पुरुष या नारी को तकलीफ ही देंगी.

    सुब्रमनियम जी ने बिना विस्तार में गए तुलसीदास को ही मानने से इंकार कर दिया तो निशांत जी ने राम पर ही उँगली उठा दी.ऐसे बुद्धिजीवी ही खतरनाक हैं जो बिना पूरे सन्दर्भ को देखे अपनी निष्पत्तियों को अंतिम सत्य की तरह कहकर प्रचारित करते हैं.
    ज़रूरी नहीं है कि आप मानस को हमारे हिसाब से समझें,कई प्रसंगों को आधुनिक सन्दर्भ में देखेंगे तो वृथा पाएंगे,पर रचनाकाल और कविता की अलंकारिकता को नज़रंदाज़ करके आप कितना सही हो सकते हैं.हम पढ़-लिख तो खूब गए हैं पर विचारों को बांधना नहीं भूले.
    अगर तार्किकता की कसौटी पर आस्था के इन आयामों को हम कसते हैं तो यह हमारा अल्पज्ञान ही है.कई बातें जो पहले अवैज्ञानिक लगती थीं,समयांतर में वास्तविक सिद्ध हुईं.

    न सम्पूर्ण रूप से नारी दोषरहित है और न ही पुरुष !इसलिए संदर्भों को काटकर ऐसी निष्पत्तियां मूर्खतापूर्ण हैं !

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  18. @बहुत अच्छे और सुचिंतित विचार आ रहे हैं ,अब मुझे भरोसा हो चुका है कि अगले समापन अंक के पश्चात अपने विचार रख सकूंगा .

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  19. कुछ साल पहले आचार्य धर्मेन्द्र का एक प्रवचन टीवी पर देखा था, उन्होंने माईक का उदाहरण देते हुए कहा था कि माईक का प्रयोग कोई साधू ईश चर्चा के लिए करता है और उसी माईक का प्रयोग माईकल जैक्सन अपने हो हुल्लड के लिए भी करता है| प्रयोग करने वाले के हिसाब से ही वास्तु की उपयोगिता तय होती है| इसके साथ 'जाकी रही भावना जैसी' वैसी बात को भी जोड़कर देखें| किसी लेखक के लिए बात के मर्म को समझाने के लिए पाठक की सोच के धरातल पर उतरना कोई अजूबा नहीं, ये अलग बात है कि एक लेवल पर आने के बाद वही लेखक पाठक की सोच को फिर अपने स्तर तक उठा ले जाता है|
    संतोष त्रिवेदी जी की टिप्पणी की पहली पंक्ति और सबसे आख़िरी पंक्ति से अक्षरशः सहमत|

    डिस्क्लेमर - माईक वाली बात सिर्फ एक उदाहरण हैं, इस आधार पर या सिद्ध ण किया जाए कि टिप्पणीकर्ता ने नारी को एक बेजान वस्तु सिद्ध करने की हिमाकत की| टाईम खतरनाक है आजकल:)

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  20. @ Santosh Trivedi

    मान्यवर, ज्यादा भावावेश में मत आइये. शास्त्रों को पढ़िए और आराध्यों की पूजा करिए लेकिन बुद्धि पर ताले मत लगाइए.

    दिक्कतें तभी होतीं है जब आप चीज़ों को एब्सोल्यूट और आलोचना के परे मानने लगते हैं.

    ठीक से पढ़िए, "सहमत होने लायक सभी काम". दुनिया में कोई भी हो, चाहे वह कोई बुद्ध हो या अवतार या महापुरुष, कौन केवल ऐसे ही काम करता है जिनसे पूरी तरह से सहमत हुआ जा सके!?

    आप देश-काल और समाज का हवाला देकर राम के पुरुषार्थ और कृष्ण की लीलाओं को प्रासंगिक और आलोचना के परे मान सकते हैं पर कुछ ऐसा होता है जो मानवीयता की कसौटी पर हर समाज और काल में खरा होता है.

    सीता निष्काशन प्रसंग को आप कैसे उचित ठहरा सकते हैं? क्या राम के स्थान पर कृष्ण होते तो लोकाचार के दबाव में सीता को अपने जीवन से विलग कर देते? शायद वे ऐसा नहीं करते क्योंकि वे विद्रोही पुरुष थे.

    और बाबा तुलसी की उक्तियों को भी लोग तोड़-मरोड़कर पौलिटीकली करेक्ट बनाते आये हैं. क्या तुलसी ने विराम चिह्नों का प्रयोग करके वाकई ऐसा लिखा होगा "ढोल, गंवार शूद्र, पशु नारी"? ऐसी व्याख्या कोई अहमक ही कर सकता है.

    इन्हीं पौराणिकताओं के फेर में धंसा खंड-खंड बंटा हमारा समाज लगातार अवनति की ओर जा रहा है.

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  21. कोई भी परिभाषा या आदर्श देश-काल की वर्तमान स्थिति गड़ता है जो समय के साथ बदलता भी रहता है..अपने-अपने चश्में के हिसाब से..

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  22. .
    .
    .
    रामचरितमानस एक काव्य है और तुलसी एक कवि... तुलसी ने वाल्मीकि की रामायण से प्रेरणा ले यह काव्य रचा... तुलसी के काव्य के राम नायक जरूर हैं पर वह हर जगह सही हैं यह निष्कर्ष निकालना काव्य के साथ अन्याय है... पर हमारे समाज ने तुलसी के राम को इस और ऐसे तमाम वाकयों के बाद भी 'पुरूषोत्तम' माना है, 'आदर्श' माना है, मर्यादा पुरूष माना है... यह हमारे समाज के मूल चरित्र को अनावॄत सा करता है... तुलसी और तुलसी के राम समाज के एक बहुसंख्य तबके की सामाजिक, वर्गवादी, जातिवादी, राजशाहीवादी और लैंगिक सोच को पुष्ट करने का ही काम करते हैं... यहाँ यह याद रखिये कि कुछ तुलसी से पहले तक राम देवता नहीं थे... पर अब वह देवता हैं और उनके साथ है 'रामराज्य' लाने को, मध्ययुग मे वापस लौटने को तत्पर 'राष्ट्रवादियों' का हुजूम भी... यह कैसे लोग हैं यह आप ब्लॉगजगत में ही देख सकते हैं... :)





    ...

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  23. निशांत जी,शांत होकर ही मैंने कुछ कहा है और आप भी हमारी बात का सन्दर्भ समझ लें.

    अव्वल तो यहाँ विशेष सन्दर्भ में नारी के गुणों-अवगुणों की चर्चा की गई है सो इस पर न् कहकर तुलसी और राम तक बात को पहुँचाया गया.
    आज की पीढ़ी में असहमत होना सबसे आसान कार्य लगता है.हम गाँधी,नेहरू,राम और कृष्ण तक से घोर असहमत होते हैं बिना यह जाने-समझे कि उस समय क्या परिस्थितियां रही होंगी.
    मैं यहाँ केवल राम का आपके द्वारा दिया गया बहु-प्रचलित उदाहरण ही लेता हूँ.मर्यादा-पुरुषोत्तम होकर भी आखिर राम से ऐसी चूक या अपराध क्यों हो गया कि उन्हें अपनी प्रिय सीता को त्यागना पड़ा? ध्यान रहे,यह कार्रवाई आज की तरह किसी उत्पीडन-जैसी नहीं थी.अगर उस परिस्थिति को हम नहीं समझते तो फ़िर राम के वन-गमन सहित कई बातें हैं जो राम को नहीं माननी चाहिए.क्या ऐसे पिता का कहना उन्हें मन्ना चाहिए जो पत्नी-प्रेम में सही-गलत सब भुला बैठा हो?पर,राम ने रिश्तों की मर्यादा रखी.एक अनपढ़ धोबी ने जब सीता पर लांछन लगाया तो उसकी बुद्धि के अनुसार ही उन्होंने एक तरह से सीता-वियोग का दंश सहा.यह सीता ही नहीं स्वयं उनका अपना भी कष्ट और पश्तात्ताप था.यदि हम केवल नारीवादी चश्मा लगाकर इसे पढेंगे,तत्कालीन परिस्थिति और देशकाल को जाने बिना,तो बिलकुल गलत निर्णय साबित होगा.
    हमने सीधा-सी बात कही है कि नारी या पुरुष की किसी प्रवृत्ति के आधार पर उस वर्ग की आलोचना ठीक नहीं है.
    अगर आधुनिक कसौटी रखी जाय तो पूरी मानस खारिज है,तुलसी और राम भी !

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  24. @अगर आधुनिक कसौटी रखी जाय तो पूरी मानस खारिज है,तुलसी और राम भी!

    यह क्या कह डाला शिष्य?
    वृथा न जाई देव ऋषि वाणी :-)
    कुछ सत्य शाश्वत होते हैं चिरन्तन -
    यहाँ एक मोहजनित पुरुष ही नहीं ऋषि के लिए नारी संसर्ग से दूर रहने को
    राम ने चेताया है .....और इसमें कहाँ कोई असंगति ...

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  25. @अगर आधुनिक कसौटी रखी जाय तो पूरी मानस खारिज है,तुलसी और राम भी!

    गुरूजी,यह बात मैंने तथाकथित आधुनिक कसौटी विशेषज्ञों और असहमति-धारकों के सन्दर्भ में कही है.

    निशांतजी ने अपने उत्तर में कृष्ण को राम से बेहतर बताया है,अब इससे ज़्यादा क्या कहा जा सकता है? यहाँ दोनों की तुलना संभव ही नहीं है.कृष्ण रासलीला और राजनीति करने वाले निपट चतुर व्यक्तित्व हैं तो राम ने जीवन में मर्यादा-पूर्ण आचरण किया है.हर सम्बन्ध निभाया है.राजा का भी और मनुष्य का भी !

    तुलसी ,मानस और राम को जानने के लिए उस चेतन मन की आवश्यकता है जिसमें किसी बात को सकारात्मक ढंग से लिया जाता है.
    बाकी,'जाकी रही भावना जैसी.प्रभु मूरति देखि तिन-तैसी'

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  26. कम बुद्धी है समझ में नहीं आती हैं
    नारी ही केवल नरक का द्वार कैसे हो जाती है
    पुरूष को भी तो वो ही अस्तित्व में
    जब इस दुनिया में ले के आती है
    राम और तुलसी ने जो कहा सो कहा
    हमारे चारों और भी तो नारी आती जाती है
    चलो मान लिया वो नरक का द्वार है
    फिर हमे नरक उत्पाद अपने को कहने मै
    शरम क्यौ आ जाती है ।

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  27. जब भी अरविन्द जी धार्मिक प्रसंगों पर आधारित कोई आलेख लिखते हैं तो मैं कमेन्ट करने से बचना चाहता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि मैं स्वयं धर्मभीरु नहीं हूं इसलिये चर्चा में पड़कर अनावश्यक विवाद को निमंत्रण क्यों दूं ?
    अब मजबूरी में ही सही जो भी कहूं उसे केवल तार्किक नज़रिए से देखा जाये वर्ना मेरा कमेन्ट डिलीट कर दिया जाये !

    (१)
    मोटे तौर पर मेरा मानना ये है कि श्री राम के चरित्र पर कहे गये आख्यानों की संख्या एकाधिक है
    आनंद रामायण, बाल्मीकि रामायण, श्री रामचरित मानस वगैरह वगैरह इसलिये अगर सुब्रमनियन जी और निशांत जी बाबा तुलसी दास से असहमत हों तो, उसे इसी आलोक में देखा जाये!
    (२)
    बाबा तुलसी दास हिन्दी भाषी क्षेत्र में स्वीकार्य हो सकते हैं किन्तु उन्हें अन्य क्षेत्रों में स्वीकार्य किया जाये यह ज़रुरी नहीं हैं क्योंकि उन क्षेत्रों के अपने अपने राम आख्यान हैं ना !

    (३)
    बाबा तुलसी दास की महानता के पीछे एक स्त्री (उनकी पत्नी) मौजूद है इसे भी ध्यान में रखा जाये!

    (४)
    अपनी कवित्व महानता के बावजूद बाबा अगर स्त्रियों से कुपित हैं तो उसकी वज़ह साफ़ है कि वे अनन्य राम भक्त होकर भी अपनी पत्नि के व्यवहार की खलिश से मुक्त नहीं हो सके थे जोकि उनके कृतित्व में झलकी!

    (५)
    दुनिया की सात अरब आबादी में से लगभग आधी आबादी को बाबा की मान्यता के नज़रिए से नहीं देखा जा सकता क्योंकि बाबा का सम्मोहन क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित है !

    (६)
    बिंदु और भी हैं किन्तु अभी आप स्वयं का कथन शेष है ! फिलहाल सुब्रमनियन जी, निशान्त जी, प्रवीण शाह जी, की असहमतियों का सम्मान आपको आगे बढ़कर करना चाहिये! वीरू भाई आधा इधर आधा उधर लगे :)

    (७)
    संतोष जी, भावुकता और भक्ति के सामने दूसरों की भावुकता / भक्ति या शायद तर्क को सहजता से लेना चाहिये ! आप लोग इतना उत्तेजित होकर बहस करियेगा तो इतना ही कहूँगा कि बाबा हमारे एरिया के हैं आपसे पहले उनपर हमारा अधिकार है !बहरहाल कुतर्क के लिए खेद सहित :)

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  28. नारी ने पैदा किये, तुलसी-सूर-कबीर।
    उस नारी का खींचते, सारे मिलकर चीर।।

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  29. आपका नजरिया आप जाने और तुलसी बाबा का तुलसी बाबा जाने. हम तो अपना नजरिया स्पष्ट कर देते हैं बाकी जैसा ब्लाग पंचायत फ़ैसला दे सो सही.

    "नर के लिये नारी और नारी के लिये नर" महा दुखों की खान है. बोलो ताऊ महाराज की जय।

    यह हमारा स्वयं का अनुभव है. हम उधार की या शाश्त्र की बात नही करते.

    रामराम.

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  30. मोह-छोह का द्वन्द्व, मनुज माथे धर लीन्हा,
    निज मन जो भरमाये, कारण नारी चीन्हा।

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  31. @प्रवीण शाह जी ,
    आपने विमर्श को एक पृथक किन्तु गम्भीर दिशा दे दी है -आभार! मगर यह विषयांतर हो जाएगा ...
    तुलसी ने क्या किया, क्यों किया इसे बिना व्यापक परिप्रेक्ष्य के नहीं समझा जा सकता है ....हाँ सही है कि
    मानस एक लोक -काव्य ही है -अब एक धोबी के कहने पर राम का अपनी प्राण प्रिय पत्नी का परित्याग?
    एक राजा का एक अदनी सी प्रजा की बात को इतनी गंभीरता से ले लेना -सन्देश क्या है? बहरहाल अभी
    तो नारी विमर्श पर ही टिकते हैं -आपकी बात पर कभी विपुल विमर्श का आमंत्रण है -आप तो पता नहीं कहाँ खो जाते हैं :-(

    उत्तर देंहटाएं
  32. तुलसी अपने वैचारिक पिछड़ेपन के बाद भी भारतीय जनमानस को दूसरे संत कवियों के बरअक्स अधिक प्रभावित करने में सफल रहे हैं। इसका पहला कारण तो यह है कि तुलसी धारा के विरुध्द जाकर कोई क्रांतिकारी बात कहने का जोखिम नहीं लेते। वह सदियों से चली आ रही पुरानी, धार्मिक, अलौकिक आस्थाओं को भुनाते हैं और अज्ञानियों के लिये ज्ञान का स्त्रोत बन जाते हैं। दूसरा कारण है-पिछले कई हजार वर्षों से भारतीय बुध्दिजीवी कवि को ईश्वर और काव्य को उसकी बनाई हुई सृष्टि मानते रहे हैं। जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। भारत में काव्य को ही मूल साहित्य माना गया है। कविता हमारी सांस्कृतिक अभिरुचियों का प्रतीक है, अध्यात्म की आत्मा है। तर्क से परे ब्रह्मरुपी (शब्दों का) भाषाई चमत्कार है। काव्य के गुणों पर मुग्ध होकर हम वैचारिक स्तर पर उसे बौध्दिक परखनली में नहीं डालते या काव्य के गुणों को ग्रहण करते हुए उसके दोषों को अनदेखा कर जाते हैं। कई भारतीय व विदेशी विद्वान तुलसी की काव्य प्रतिभा से सम्मोहित हैं। तुलसी एक काव्यात्मक संवेदनशील काल्पनिक इतिहास गढ़ते हैं, जिसके आधार पर वे दूर तक नये चिंतन को नकारते हैं। तुलसी का अपने समय का काव्य शिल्प जन सामान्य की भाषा, विराट प्रकृति वर्णन अलंकारों, रुपकों, बिम्बों, प्रतीकों का सौन्दर्य एवं दुख-सुख मिलन-वियोग के मर्मस्पर्शी वर्णन उन्हें जहां कालजयी कवि बना देता है, वहीं उनका मानस मूर्खों का पवित्र मिथ बन जाता है, जहां तर्क निषेध है। जिसका अनुकरण व पूजा की जाती है। कभी गांधी जैसे आस्थावान व्यक्ति ने कहा था, मानस एक संतरे की फांक है, जिसमें बीज, लुग्दी व रस है। आप रस ग्रहण करें, शेष फेंक दें। आज बहुत से लोग रामचरित मानस को पूजते हैं। उसका अखंड पाठ करते हैं। एक वर्ग विशेष में राम के साथ तुलसी पूजे भी जाते हैं किन्तु तुलसी आधुनिक युग के लिये वैचारिक स्तर पर कतई प्रासंगिक नहीं हैं। जो समाज जितने समय तक पिछड़ा रहता है क्लासिक कलायें उनमें उतने समय तक प्रभावी बनी रहती हैं। अब राकेट के स्थान पर बैलगाड़ी को सांस्कृतिक धरोहर मानने का युग नहीं रहा है। अन्तर्मुखी केचुवई मनोवृत्ति के धार्मिक लोग आधुनिक महानगर की सड़कों पर बैलगाड़ी में बैठकर नहीं चल सकते। यह समय की मांग है कि राजतंत्र की राजनीति एवं धार्मिक पाखंड हमें छोड़ने ही होंगे। वर्तमान समय की कविता अगर आम आदमी के पक्ष में नहीं खड़ी है तो हम उसे शंका की दृष्टि से देखते हैं।
    तुलसीदास की वैचारिक प्रासंगिकता
    http://www.aksharparv.com/Vichar.asp?Details=287

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  33. अली साब,आप अपने तर्कों से ठीक कहते लगते हैं लेकिन तुलसी के द्वारा रचे गए महाकाव्य को उनकी पत्नी द्वारा तिरस्कृत करने से प्रेरित कहना न्यायसंगत नहीं है.ऐसा होता तो वह स्त्री-पुराण ही लिख डालते.मानस के आख्यानों में स्त्री और पुरुष प्रवृत्तियों को अलग-अलग कई जगह दिखाया गया है.

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  34. @अली भाई,
    चर्चा को गति देने के लिए मैंने भी अपनी पोस्ट में तुलसी की निज नारी -व्यथा का संकेत भर किया था ..
    और आप भी झांसे में आ गए :-)
    यह बात हजम नहीं होती कि एक परम अध्येता एक परम ज्ञानी संत अपनी वैयक्तिकता से इतना भी ऊपर न उठ पाया हो और इतना पूर्वाग्रही रहा हो कि खुद अपनी निज पीड़ा को अनाप शनाप ढंग से अपने आराध्य के मुंह से कहलावाया हो ..
    मित्र बात को संवेदना और समझ के किसी और प्लेन पर पकडिये हुज़ूर -आप समाजशास्त्री हैं और ब्लॉग जगत आपकी टिप्पणियों के सूक्ष्म बिंदु विवेचन का अब मुरीद भी हो चला है - :-)

    उत्तर देंहटाएं
  35. @रचना जी,
    पहली लाईन पढ़ते ही लग गया था यह आपका लिखा नहीं है :-) -मगर प्रांजल विद्वत भाषा और विचार है तो स्वागत योग्य है .
    कई विद्वानों को तुलसी से बड़ा रंज रहता है -क्योकि वे उनकी प्रस्तुति-वर्णन के स्तर को छू तक नहीं सके -नैराश्य और कुंठा के शिकार हुए ..यद्यपि आप द्वारा उद्धृत अंश प्रभावित करता है मगर विषय से परे एक सामान्य निष्पत्ति है लेखक की -यहाँ नारी विमर्श से सम्बद्ध कुछ कहा जाय वही सुसंगत होगा ...

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  36. जो समाज जितने समय तक पिछड़ा रहता है क्लासिक कलायें उनमें उतने समय तक प्रभावी बनी रहती हैं।

    naari sae hi judaa haen puraa sandarbh

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  37. @पढ़ लिया था देवि!:-) अब इतनी शिक्षा दीक्षा प्राप्त कर अआप्की दृष्टि में हम पिछड़े लग रहे हैं तो भी यह शिरोधार्य है -इसमें कैसी बहस :-)

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  38. जब तक मानव जीवन में रूढ़िवाद बना रहेगा तब तक तुलसीदास प्रासंगिक रहेंगे. तुलसीदास की मुख्य समस्या थी कलियुग, एवं मुख्य विकल्प था रामराज्य. कलियुग अर्थात "कलि बारहि बार दुकाल परै, बिन अन्न दु:खी सब लोक मरै". कलि की पहचान भूख, गरीबी और मृत्यु हो. यह कोई दैवी प्रकोप नहीं है. यह समाज की भौतिक अवस्था है जिसके लिए मुख्यत: सत्ताधिकारी ही जिम्मेदार हैं. "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी".
    तुलसीदास को शुद्रविरोधी और नारीविरोधी भी कहा जाता है, लेकिन इसे स्वीकार करना मुश्किल है. शेक्सपीयर के नाटकों में नारी को डायन कह कर मारा जाता है. वे उसकी भर्त्सना भी करते हैं और कहीं समर्थन भी. तुलसीदास भी नारी वेदना को समझने वाले महान संत थे. "कत विधि सृजि नारि जग माही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं". पातिव्रत धर्म स्त्री की पराधीनता है.जब तक नारी पराधीन रहेंगी तुलसी प्रासंगिक रहेंगे. ऐसा समाज था जहां पुरूषों के लिए बंधन नहीं पर नारी के लिए था. अर्थात संबंधों की विषमता थी. इस विषमता को तुलसी ने रेखांकित किया. समाज के संबंधों में विषमता का अर्थ है दासता. सामाजिक बुराईयां इन्हीं विषमता से पैदा होती है. इस विषमता का जवाब था राम का आचरण. मानव संबंधों में समानता की खोज तुलसीदास रामचरित के रूप में करते हैं. एक पत्नीव्रता रूप. राम के सर्वप्रिय पात्र हैं निषाद और शबरी. निषाद लोक, वेद, शास्त्र और समाज सारे दृष्टि से इतने नीच थे कि जिसकी छाया पर जाए तो आदमी भ्रष्ट हो जाय. वह राम के अनन्य सखा हैं. सामंती समाज में जो सबसे अधिक प्रताड़ित है राम उन सबके निकट हैं. इसलिए तुलसीदास प्रासंगिक हैं. 500 वर्ष पहले जो समस्यायें तुलसीदास के समय थी वह आज भी है. अत: तुलसीदास के संघर्ष से भी हमारा संबंध है.

    http://saahityaalochan.blogspot.in/2008/08/blog-post_13.html

    more research is needed to understand why tulsi wrote what he wrote

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  39. @रचना जी .
    आपने यह भी अच्छा उद्धरण दिया है और मैं विवेचित बिन्दुओं से सहमत हूँ -प्रवीण शाह जी के लिए भी इसे पढने के लिए अनुशंसित करता हूँ -आपका आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  40. आज ही 'शब्दों के सफर' पर एक शानदार सुभाषित पढ़ा, आपसे साझा करता हूँ।

    - “पंकैर्विना सरो भाति सदः खलजनैर्विना । कटुवर्णैर्विना काव्यं मानसं विषयैर्विना ॥”

    अर्थात - कीचड़ बिना सरोवर, दुष्ट बिना गोष्ठी, कटुवर्ण रहित कविता और विषय-वासना-मुक्त मन सर्वोत्तम है ।
    --रसगंगाधर

    बाकी गौस्वामी तुलसीदास जी को समझना उनके मन्तव्यों को भांपना हम जैसे मंशा मोही गोष्ठिकों के लिए दुष्कर है।

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  41. मैं सुज्ञ जी से सहमत हूँ. राम के चरित्र और तुलसीदास जी के राम चरित मानस को आज के सन्दर्भ में उसकी आलोचना और समालोचना अपने अपने दृष्टिकोण से सभी करते हें. लेकिन ये आस्था और अनुभव की बात है इसको विवाद का विषय बिना आशय समझे बना लेना उचित नहीं है. वैसे हमारे सुस्त ब्लोगर साथी ऐसे विषयों पर बढ़ चढ़ कर भाग लेते हें और हर एक का अपना अलग मत होता है और हम सभी अपने को ही सत्य मानते हें अतः ऐसे में आरोप और प्रत्यारोप उचित नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  42. @ संतोष जी,
    बाबा की पत्नि ने उन्हें धिक्कारते हुए जो कहा था वो हमें याद है किन्तु आप शायद भूल गये हैं :)

    @ अरविन्द जी,
    तो आपका मानना है कि महान लोगों की कोई कमजोरियां नहीं होतीं :)

    अब आप अपनी पूरी बात कह चुकिये तब हम भी कहेंगे :)

    उत्तर देंहटाएं
  43. रामचरितमानस के एक तुलसीकृत प्रसंग के बहाने चल रहे इस जबरदस्त नारी-विमर्श के संदर्भ में मेरा प्रश्न यह है कि क्या गोस्वामी तुलसीदास वाकई आज के दौर के लिए इतने प्रासंगिक और प्रामाणिक हैं कि उनके कवित्व भरे उद्गारों को इक्कीसवीं सदी में भी किसी युगद्रष्टा और युगस्रष्टा के आप्त-वचन के तौर पर लिया जा रहा है? तुलसीदास को स्वयं अपने जीवन के और अपने परिवेश के संताप से निकलने के लिए जो साध्य और उचित लगा, उसके उपक्रम में रचे गए रामचरितमानस को हर व्यक्ति अपने विवेक से और अपनी भावनाओं के अनुरूप ग्रहण करने के लिए स्वतंत्र है, पर क्या उसे किसी संविधान की तरह समाज-राष्ट्र के नियामक संदर्भ-स्रोत की तरह लिया जाना चाहिए?

    उत्तर देंहटाएं
  44. @अली भाई ,
    यह किसने कह दिया कि महान लोगों की कमजोरियां नहीं होतीं ...
    जरुर होती हैं मगर उनका प्रगटन वे थोड़े करते फिरते हैं -यह तो
    लम्पटों का काम है .....आप जरुर कहिये -यह तो खुला मंच है और
    माडरेशन भी नहीं है !

    उत्तर देंहटाएं
  45. @सृजन शिल्पी:
    तो क्या काव्यों की प्रासंगिकता तिरोहित हो गयी? क्या पश्चिमी साहित्य जगत ने गेटे और शेक्सपियर के ग्रंथों की समाधि दे दी?क्या कालिदास की कोई प्रासंगिकता नहीं रही ....इन्हें आप संविधान जैसे काल सापेक्ष व्यवस्था के समतुल्य ही देख पा रहे हैं ? भारत का संविधान जब नहीं था तब भी ये प्रासंगिक थे और जब उसके चीथड़े चीथड़े बदल नया रंग रूप लेगें तब भी ये यथावत बने रहेगें ......ये ग्रन्थ चिरन्तन क्यों हैं -क्योकि ये मनुष्य को अपने विवेच्य के दायरे में रखते हैं -मानव समाज ,मानव व्यवहार ,समाज इनके विवेच्य हैं .....जब तक मनुष्य रहेगा ये सदग्रंथ रहेगें!

    उत्तर देंहटाएं
  46. हरेली अमावस की हार्दिक शु्भकामनाएं। बोल सियावर रामचंद्र की जय। उमापति महादेव की जय,अंजनी सुत हनुमान की जय, सभी संतों की जय।

    शSSSSSSSSSS
    कोई है

    उत्तर देंहटाएं
  47. गंभीर आलेख |
    सादर प्रणाम गुरुवर -
    आ आकर पढ़ रहा हूँ-
    विद्वान और विदुषियों को -
    सबके लिए मेरी शुभकामनायें ||
    सादर ||

    उत्तर देंहटाएं
  48. "नारी दुखो की खान हैं बोले सियावर राम जी "

    सही तो कहा था

    माँ अगर खीर को ना बाँट कर खुद ही खा लेती तो अकेले वारिस होते

    कैकयी अगर वन ना भेजती तो १४ साल राज महल में ऐश करते

    चंद्र्नाखा अगर ना रीझती तो उसको शुपनखा न बनाते ना रावन आता

    सीता अगर सोने का हिरन ना मांगती तो बन बन ना भटक ना पड़ता , रावन से ना लड़ना पड़ता

    और सीता अगर धरती में ना समाती तो पत्नी को त्यागने का अपयश युगों तक ना मिलता

    और सियावर और सीता राम जिसको कहा जाए यानी पत्नी का नाम पहले तो वो तो यही कहेगा "नारी दुखो की खान हैं "


    सो उनकी जिन्दगी में तो हर नारी दुखो का खान ही थी उनकी व्यथा को कौन समझेगा
    अगर उनके युग , उनके समय की बात करे और उनको इन्सान समझे तो


    वर्तमान में

    राम हिन्दू आस्था का प्रतीक हैं क्युकी राम का नाम मुक्ति का प्रतीक हैं मुक्ति इस जीवन से अपनी व्याधियों से , अपने दुष्कर्मो से , अपने मोह से और अपनी माया से

    मरा मरा जपते जपते राम मिल जाते हैं बस मरामरा में स्पेस ना दे और पहला म यानि अपना अहम त्याग दे .



    और चलते चलते
    स्त्री "नरक का द्वार बनजाती हैं"

    ताकि राक्षस उस द्वार से बाहर आ सके और "राम" उनको ख़तम करके "राम" बन सके

    जिस दिन स्त्री ने "अपना द्वार " बंद करने की ठान ली और नरक वासियों को वही ख़तम करना शुरू कर दिया

    , समय बदलने लगेगा .

    अभी तो उस नरक के द्वार से निकले बहुत से "किसी राम " या फिर "किसी काली " के इंतज़ार में जीवन जी रहे हैं .

    और उनमे से कुछ तो "राम नाम सत्य हैं से भी मुक्त नहीं हो सकते " क्युकी धर्म की परमिशन नहीं हैं

    उत्तर देंहटाएं
  49. मुझे यह समझ नहीं आता कि किसी महाकाव्य में किसी खास संदर्भ में एक पात्र द्वारा दूसरे पात्र को कहे गए शब्दों - वाक्यों को उस रचनाकार का मंत्र वाक्य क्यों मान लिया जाता है?

    उत्तर देंहटाएं
  50. @ अरविन्द मिश्र,

    आपकी रामचरितमानस में आस्था को तनिक भी आहत किए बिना मैं फिलहाल केवल यह निवेदन करना चाहूंगा कि उसे एक महान भक्त की सोद्देश्य काव्यात्मक कल्पना के तौर पर ही लिया जाना चाहिए, न कि उसकी पंक्तियों की उस दृष्टि से विधानपरक व्याख्या की जाए, जैसी कि संविधान की न्यायालयों द्वारा की जाती है। आप रामचरितमानस की पंक्तियों के संदर्भ में कुछ वैसा ही उपक्रम करते दिख रहे हैं। आदर्श, आचार, व्यवहार युगानुरूप बदल जाया करते हैं। जो कभी श्रीराम होते हैं, वे ही दूसरे युग में दूसरा स्वरूप धारण कर लेते हैं। आप वर्तमान युग में तुलसीदास जी द्वारा की गई राम चरित की कल्पना के अनुरूप आचरण कर सकते हैं तो यह आपकी महानता है और इसे अपने परिवार में भी जरूर उतारें, जो शायद आप कर भी रहे होंगे। पर, इन पंक्तियों को जिस प्रकार से आप सर्वकालिक, सार्वदेशिक मान्यता दिए जाने की दृष्टि से व्याख्यायित करने की चेष्टा कर रहे हैं, उससे मैं सहमत नहीं हूं। यदि ऐसा हो पाता तो फिर तुलसी के रामचरितमानस की रचना मात्र से और आप जैसे उसके अनन्य प्रेमियों के मुग्ध भाव से उसका पारायण कर लेने मात्र से ही जगत का कल्याण हो चुका होता!

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  51. काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।


    प्रिय मिश्र जी विचारणीय प्रस्तुति तो है लेकिन कभी कुछ बातें किसी सन्दर्भ में कही जाती हैं उसका उस समय महत्त्व रहता है सदा के लिए ही वही हो ऐसा नहीं है ..अपवाद है और अर्थ और मायने अलग अलग ...भ्रमर ५

    उत्तर देंहटाएं
  52. .
    .
    .
    " हे मुनिवर युवती स्त्री सभी अवगुणों की मूल,पीड़ा देने वाली और दुखों की खान है और इसीलिए मैंने आपको विवाह करने से रोका था।अब जैसे मुनि और ज्ञानी जनों के लिए नारी सानिध्य ही पूर्णतया प्रतिबंधित हो!

    मानस का यह प्रसंग निर्विवाद रूप से संतकवि के निजी भोगे हुए अनुभव और नारी विषयक तत्कालीन अद्यावधि ज्ञान का निचोड़ था जो किसी और के मुंह से नहीं स्वयं श्रीराम के मुंह से संत कवि द्वारा कहलाया गया। हमारे धर्मग्रंथों, आर्षग्रंथों में नारी को ज्ञान और तपस्या का एक विरोधी कारक बताया जाता रहा है जबकि यह भी सत्य है कि अनेक संदर्भ ग्रन्थ वैदिक -उपनिषदीय काल की नारियों को परम विदुषी और वेदों के ज्ञाता भी घोषित करते हैं।

    मेरा असमंजस यही है - क्या कालान्तर में कतिपय कारणों, जिनकी पहचान की जा सकती है, के चलते नारी की यथोक्त स्थिति विद्वत मानस में बनती गयी। क्या सनातनी ब्राह्मणों ने बुद्ध विहारों में नारी स्वच्छंदता से उपजे व्यभिचार और ज्ञान मार्गियों के अधोपतन से कोई सबक लिया था? मानस में नारी विमर्श के इस स्वरुप को देखकर मैं हतप्रभ हूं। लिहाजा मैंने पूर्व कांडों का भी एक सिंहावलोकन किया। दरअसल बालकाण्ड से ही नारी का ऐसा रूप स्थापित होता दीखता है। "


    आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    मैं विषयांतर नहीं कर रहा यहाँ पर... मेरा कहना यह है कि तुलसीकालीन समाज के एक बड़े तबके का मनोवृति, सोचने का नजरिया जैसा है, वही नजरिया बाबा तुलसी का भी है... अब तुलसी अपने काव्य के जरिये उस सोच को पुष्ट करते हैं... और समाज उनके काव्य-नायक को अवतार/देवता बना देता है... परोक्ष रूप से तत्कालीन समाज यह सब कर अपने नजरिये को ही पुष्ट कर रहा है व राम को भगवान मान कर उसी सोच को एक धार्मिक या आध्यात्मिक आधार भी दे रहा है... तुलसी भी इस सब में बराबर के भागीदार हैं, वह हट कर कुछ नहीं कहते-बस अपने इर्दगिर्द के समाज के अधिसंख्य लोगों की सोच को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दे ऐसा करते हैं... वह यथास्थितिवाद के संत हैं... कबीर की तरह विद्रोही-परिवर्तनकामी नहीं...

    और हाँ, तुलसी के इस काव्य का वर्तमान में कुछ लोगों के लिये एक फायदा यह भी है कि पोलिटिकली करेक्ट बोलने के चक्कर में जो कुछ स्वयं नहीं बोल सकते वह तुलसी के बहाने या मानस प्रसंग पर चर्चा के बहाने कहा जा सकता है... :) {हालांकि मैं यह नहीं मानता कि आप यहाँ ऐसा कुछ कर रहे हैं}...



    ...

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  53. @@इस पोस्ट पर आयी टिप्पणियाँ चिंतन के कई नए आयामों का संस्पर्श करती हैं -सभी ने अपने अपने दृष्टिकोण से विषय पर प्रतिक्रिया दी है -मैंने ध्यान से सभी अभिव्यक्तियों को आत्मसात किया है और कई नए विचार भावों को महसूस किया -आभार सभी का .....अब अगले भाग की प्रतीक्षा कीजिये .....

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  54. @प्रवीण शाह जी,
    हाँ सही कह रहे हैं आप ..तुलसी ने वही महिमामंडित किया जो आमजन की अवचेतन और सुषुप्त अभिलाषायें होती हैं -
    और इसलिए ही वे जनकवि बन गए -रामराज्य एक यूटोपिया के रूप लेता गया ......और आपने सही पकड़ा है हम अपने अनुभवों को वितंडावाद से बचने के लिए इन आर्ष ग्रंथों की ढाल बनाकर साझा करते हैं...... :-)नारी विमर्श का मौजूदा हेतु या उदगम भी हो सकता है ऐसयिच ही हो :-)

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  55. मुझे एक बात समझ नहीं आती, प्रबुद्ध व्याख्याकार तुलसी के बहाने 'राम' का कद कुतरने में क्यों लग जाते है? उज्जवल ज्योतिर्मान सूर्य में छोटे छोटे श्याम बिन्दु की खोज कर उभारने प्रदर्शन करने से पूरे जगत को प्रकाशमान करने के सूर्य के गुण में कोई अन्तर पड जाएगा?

    राम मर्यादा पुरूषोत्तम थे और सारे 'ये' 'वो' के बाद भी रहेंगे। राम से प्राचीन सर्वोत्कृष्ट उत्तम चरित्र और मर्यादापालन का कोई अन्य उदाहरण नहीं है।

    दूध के कंटेनर में दो बूंद पानी के अस्तित्व से दूध के गुण समाप्तप्राय नहीं हो जाते।
    और जो लोग, भगवान, देवता, ईश्वर, व धर्म आदि में मानते ही नहीं उन्हें क्या फर्क पडता है लोग राम को देव, भगवान, ईश्वर माने अथवा पत्थर में आरोपित कर पूजे?

    उसी तरह रामायण वफादारी को उच्च स्तर पर स्थापित करती है, नैतिकता गुण को स्थापित करती है लोगों में इन गुणों के प्रति रूचि जाग्रत करती है तो उन सुविधाभोगियों को क्या फर्क पडता है आज के युग में उनसे नैतिकताओं का पालन नहीं होता?

    तुलसी और नारी विमर्श अगली पोस्ट पर करेंगे जैसा कि अरविन्द जी ने कहा है।

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  56. @जी हाँ सुज्ञ जी ,अब अगले भाग के नारी विमर्श की तैयारी है ..जहाँ राम का नाम नहीं होगा .....तब तो तुलसी को ही लोग कटघरे में लायेगें ....

    उत्तर देंहटाएं
  57. काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
    तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।

    ...विद्वान चर्चाकार इस दोहे को ध्यान से पढ़ें। बाबा तुलसी दास ने सभी नारियों के प्रति नहीं वरन 'मायारूपी नारि' के लिए पूरी बात लिखी है। 'मायारूपी नारी' से 'मायारूपी' हटा देने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है। नारद जी जिस नारी के चक्कर में पगलाये घूम रहे थे उस प्रसंग में भगवान विष्णु ने माया के द्वारा सुंदर नारी का सृजन किया था। इसके पीछे उनका उद्देश्य पथ से विचलित हो रहे नारद के अंहकार को शांत करना था। उसी मायारूपी नारी के संदर्भ में पूरी बात लिखी गई है। बात को तोड़ मरोड़ कर विद्वान लोग तुलसी और राम को ही नकार रहे हैं यह हास्यास्पद है।

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  58. जिसे देख पा लेने का जितना अधिक लोभ होता है उसे न पा सकने/ न समझ सकने की स्थिति में वही उतना ही कलंकित करने/ खट्टा कहने की चेष्टा करता है। न करे तो मन को बहलाए कैसे? अंगूर, छी वे तो खट्टे थे, हैं व रहेंगे। कैसे मानें कि कद छोटा है?
    घुघूती बासूती

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  59. @देवेन्द्र जी,
    आखिर मामला आपने सलटा ही लिया,बनारसी पंडित जी जो ठहरे ,, :-)
    मगर एक प्रतिवाद है -माया रूपी नारी कोई अलग सी नारी थोड़े ही होती हैं ,दरअसल सभी
    नारियां ही माया रूपी होती हैं -एक व्यास जी कह रहे हैं ..
    माया रूपी नारी या नारी के रूप में माया ?

    उत्तर देंहटाएं
  60. @आदरणीय अरविंद जी..

    सभी नारियाँ माया रूपी नहीं होतीं। रामचरित्र मानस के पात्रों में ही लें...क्या हम सीता माता को माया रूपी कह सकते हैं? क्या कौशल्या,सुमित्रा जैसी माताओं को माया रूपी कह सकते हैं? हाँ, कैकेयी, मंथरा को कह सकते हैं। लेकिन वे भी माया रूपी नहीं थीं. दैवीय माया थी जिसने रावण वध के लिए मंथरा के माध्यम से कैकेयी की मति फेर ली।

    यह कभी, किसी काल में भी हो सकता है। दैव किसी भी समय किसी की भी मति फेर सकते हैं। जब नारी की मति फिर जाती है, पुरूष पराजित हो जाता है तो मारे दर्द के चीखता है..माया, माया, माया महां ठगिनी हम जानी...। जब पुरूष की मति फिर जाती है..वह नारी पर अत्याचार करता है, नारी चीखती है.. राक्षस है पुरूष! बहुधा देखा यही गया है कि शक्तिवान निर्बल का शोषण करते है। ताकतवर कौन है, यह सभी जानते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  61. दूसरी वाली टीप में यह लिखना छूट गया....

    ...इस अर्थ में आपकी बात सही है कि माया रूपी नारी कोई अलग से थोड़े ही होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  62. I have read the maanas, reading the post, reading the comments. agree with mosam ji's example of saadhu and michael jackson's use of mike. no comments.

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  63. देखो चाहें किसी रूप में चाहे उसे नरक का वासा कहो या साँपन मगर उसके बिना गुजर नहीं है तुलसी दास ने तो उसे डिफेन्स मिकेनिज्म के रूप में इस्तेमाल किया है यहाँ वहां उनके अवचेतन का विस्फोट देखा जा सकता है तो पूर्ण समर्पण भी नारी के प्रति और कण कण में उसका वास भी देखतें हैं तुलसी जब कहतें हैं सिया राम मय सब जग जानी ,..... .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
    क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?
    क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?


    कौन सा तरीका सेहत के हिसाब से उत्तम है ?
    http://veerubhai1947.blogspot.de/
    जिसने लास वेगास नहीं देखा
    जिसने लास वेगास नहीं देखा

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

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  64. @ देवेन्द्र जी
    "मायारूपी" नारी में से "मायारूपी" हटा कर यदि सिर्फ "नारी" कहा जाए तो, ऐसा लगता है की राम जी ने कहा है की "हर नारी" दुखों की खान है | वही राम जी पीछे माँ (नारी) के चरणों में स्वर्ग होना बता आये हैं, यह भुला दिया जाता है | वही राम जी पीछे सीता को कह आये हैं की "राम और सीता अलग अलग हैं ही नहीं, "सियाराम" एक ही हैं, यह भी भुला दिया जाता है | हम अपने निजी विचारों के लिए अपने आराध्यों तक को नहीं बख्शते, उनसे भी वही बुलवा देते हैं, जो हम खुद बोलना चाहते हैं | कहीं राम से स्त्रीनिन्दा का , कहीं कृष्ण से अनगिनत मनुष्यों की हत्याओं का , कहीं खुदा से जीव हिंसा, और कहीं वेदों में गौहत्या के आदेश ढूंढ लेते हैं |

    इसी तरह बाद में सीता जी के अपहरण के समय कहा गया की "मायामृग" राक्षस था - जो रावण का साथी था | तो क्या यहाँ भी "मायामृग" में से "माया" हटा कर सिर्फ "मृग" कह कर, यह मान लिया जाए की "सभी मृग" राक्षस हैं और रावण के साथी हैं ? तब तो भारत के संविधान को ताक़ पर रख कर (protected animals ) सारे मृगों की हत्या कर देने का आदेश भी समझा जा सकता है न ?

    किसी भी एक बात को जब हम अपने निजी दृष्टिकोण के रंग में रंगते हैं, तो उसके एक शब्द / विशेषण को हटा देते हैं / जोड़ देते हैं, और अर्थों के अनर्थ कर देते हैं | इस पूरे विमर्श ने महान रामभक्त तुलसीदास जी को एक नारी विरोधी पुरुष भर बना कर रख दिया अधिकाँश पाठकों / टिप्पणीकर्ताओं की नज़र में | :( | अब इस पोस्ट को लेकर इश्वर में आस्था न रखने वाले यह भी कहेंगे की - "क्योंकि राम और तुलसी स्त्री विरोधी हैं, तो रामायण को मानना ही बंद किया जाना चाहिए, इसे नहीं पढ़ा जाना चाहिए " बात निकलती है तो फिर दूऊऊऊऊऊर तक जाती है | ऐसे विवादों को शुरू करने से पहले विद्वान् जनों को सोचना चाहिए की ये सिर्फ मज़ाक भर की बातें नहीं हैं |

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  65. शिल्पा जी ,
    सचमुच ये मजाक भर की बाते नहीं हैं -

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  66. किस प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नही हूँ. जो लिखा गया है वो माया-नारी के लिए या ऐसे ही कटु अनुभव देने वाली स्त्री के लिए नही????

    'पशु-नारियों' की कमी नही..... 'पिशाच-पुरुष' भी खूब हैं पर.........आपके उल्लेखित गद्यांश में यह सम्पूर्ण नारी वर्ग के लिए लागू नही होता.
    रचनाकार संसार में पाए और खुद के जीए सत्य को अपने पात्रों के मुख से बुलवाता आया है सर जी! अपने जीवन में मिले कटु अनुभवों से पीड़ित औरत पुरुष को दुनिया का सबसे घटिया गंदा इंसान बताती है और........ मैं??? हा हा हा दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृति मानती हूँ जिसने पिता,भाई,पति,बेटा, ससुर,देवर जेठ दोस्त जैसे अनगिनत रूप में आकर जिंदगी को खूबसूरत बनाया.जिनके बिना जीवन की कल्पना नही क्र सकती मैं तो.....
    तुलसी के मानस को जब भी पढ़ा. कांप गई. सुन्दरी रत्नावली कैसी पत्नी रही होगी (शायद यही नाम था उनका)की तुलसी जैसे भक्त ने लिखा 'पशु-नारी'. आज भी है आगे भी रहेगी.
    और हाँ--------- 'ढोर गंवार अरु पशु-नारी 'सही पद है. 'ढोर का अर्थ ही पशु होता है तो तुलसी जैसे विद्वान शब्द की पुनरावृति क्यों करेंगे??? लोगों ने पशु- नारी में से हलंत हटकर बेचारे को पशु,नारी कर दिया. मैं तो इस पर बहस करने वालों से कहूँगी अपने जीवन की कल्पना कीजिये जिसमे न माँ हो ,न पत्नी, न बेटी, न दोस्त......अपना कहने को भी कोई औरत न हो.........कितने दिन सामान्य इंसान की तरह जी पायेंगे????
    कुछ आहात करने जैसा लगा हो तो क्षमा कर दीजिएगा. मैं तथाकथित 'नारीवादी ' नही हूँ. जिस दिन एक भी पुरुष मेरे जीवन में नही रहेगा (उफ़!कितना गंदा लिख रही हूँ..सोचकर ही आत्मा कांप उठी है ) मैं आत्म हत्या कर लूंगी. आपने सुना???? मैं आत्म हत्या कर लूंगी. :( :(

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    1. इंदु जी आत्महत्या करें आपके दुश्मन :-) आपकी व्याख्या बुद्धि गम्य है!

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    2. इंदुजी
      "ढोल गंवार शुद्र पशु नारी "
      इसमें ढोर नहीं है बल्कि ढोल है और क्या पशु-नारी ही होती है पशु-नर नहीं. इसी प्रकार गंवार-शुद्र ही होता है गंवार-सवर्ण नहीं?

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  67. aadraneey shobhna gupta ji ! dhor ka arth 'janwar yani pshu hota hai. tulsidaas ji jaise vidwan shbd-poonavriti kyon krnege bhal??? ' pashu naari' ko ek krke pdhiye. arth spasht ho jayega. pashuon jaisa vyavhar krne wali naaree ko taadan ka adhikari btaya gya hai jo hr yug me sahi hai aur rhega.
    maine upr likha hai ki kya 'pishach-purush' nhi hote??? chliye kah deti 'pashu-purush' . ye 'pashu-nariyan aur 'pashu-purush' hme jeena sikhate hain ji. bs duniyan me km ho. :)

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