बुधवार, 4 जुलाई 2012

गुरु ,गुरुघंटाल और ब्लागजगत के अफ़साने


अभी कल ही की तो बात है .गुरु पूर्णिमा पर अपनी पोस्ट का लिंक जैसे ही मैंने फेसबुक पर डाला वे अवतरित हो गए ...भावुकता भरे शब्दों में अपना उदगार व्यक्त कर गए -मेरे तो गुरु आप ही हैं .मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई की ही तर्ज़ पर . वे अक्सर हमें यह अहसास दिलाते रहते हैं कि वे मेरे शिष्य है और यह हर बार मेरे लिए एक असमंजस भरी अनुभूति होती है ...कारण, मैं बराबर की मित्रता में बिलीव करता हूँ -उम्र का कोई झाम  आड़े हाथ नहीं आने देता ....और फिर खुद को गुरु मानने की मूर्खताभरी  अहमन्यता से भी दूर रहना चाहता हूँ ...वैसे भी आजकल काहो गुरु! का संबोधन व्यंगात्मक ज्यादा है .पता नहीं उनमें सचमुच का शिष्यत्व है या नहीं या फिर वे भी काहो गुरु वाली ही स्टाईल में यह उपाधि मेरी और उछालते हों -मैं भी सावधान रहता हूँ -और उनके ऐसे संबोधन को मजाकिया लहजे में ही लेता हूँ .....
एक बार मैंने थोडा गंभीर मगर पवित्र भाव से पूछ ही लिया कि अगर मैं गुरु हूँ तो वे फिर वे कौन हैं जिनकी चर्चा अक्सर उनके होठों पर रहती हैं तो वे तपाक से बोल उठे -"अरे वे तो गुरु घंटाल हैं .अब  गुरु घंटालों की चेल्हआई से राम बचाएं ....मेरे लिए तो गुरुवार आप ही ठीक हैं ."मगर मेरा मन हमेशा असमंजस में ही रहता है कि ये शिष्य कब कौन सी खुराफात न कर बैठे -चलो बच्चू ज्यादा खुरचाली कभी की तो गुरु द्रोणाचार्य की याद करके अंगूठा मांग लूँगा गुरु दक्षिणा में और उसी दिन असली नकली शिष्यत्व का फैसला भी हो जाएगा .. :-) मुला मेरे एकाध शुभाकांक्षी जो रह गए हैं ताकीद करते हैं कि भैया आधुनिक शिष्यों से सावधान रहा करियो नहीं तो वे गुरुओं का ही अंगूठा काट लेते हैं -मैं तुरत ग़मगीन होकर उन्हें बता दिखा देता हूँ कि अब कोई स्कोप नहीं है ...दोनों अंगूठे तो पहले से ही लिए जा चुके हैं अब तो और की गुंजायश ही नहीं है -गनीमत है डैशबोर्ड पर अंगूठों का इस्तेमाल नहीं होता -नहीं तो कलमों पर अभिव्यक्ति टिकी होती तो मैं तो गया था काम से ....आधुनिक तकनीकीविद कैसे युग द्रष्टा हैं उन्हें आभास है कि गुरुओं के अंगूठे गायब हो रहेगें ....शिष्यों का ऐसा ही कुछ जलवा है आज के युग में ....मेरे मित्र फिर कहते हैं कि वे दंडवत होकर आपके पैर का अंगूठा भी काट सकते हैं ....मैं दहल तो जाता हूँ मगर फिर कह पड़ता हूँ चलो कोई बात नहीं परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर ..मगर अपने डर की आशंका को हंसी में उड़ाते हुए यह भी जोड़ देता हूँ चलो ससुरे जो भी अंग वे चाहें काट ले जाएँ बस न ....अब इस उम्र में कई अंग वैसे ही अवशेषी अंग की उपाधि ग्रहण करने वाले हैं ......
बहरहाल मैंने अपने शिष्य से बातचीत आगे बढ़ायी-और भाई क्या हाल हैं गुरु घंटाल के? बोले हाल कुछ ठीक है चाल तो कभी सुधरेगी नहीं और वैसे भी बिचारे इन दिनों बड़ी मुसीबत में हैं .काहें? एक अद्भुत सुखानुभूति के साथ मैंने पूछ ही तो लिया .."अरे हालत पस्त और तबीयत खस्ता है इन दिनों उनकी ...." मैंने सलाह दी,.. तो फिर ज्ञानदत्त जी गंगा किनारे वाले ब्लॉगर से कुछ पिस्ता विस्ता क्यों नहीं दिलवा देते उन्हें ...अभी फेसबुक पर वे डिक्लेयर किये थे कि उनके पास मेवे का जखीरा है और गुरु पूर्णिमा के दिन उन्होंने खूब  मेवे डालकर खीर बनवाई है ..मगर इस हास्य बोध को न पकड़ कर मेरे शिष्य का मुंह अब भी गुरुघंटाल की हालत बयान करते हुए लटका हुआ था ..
मैंने अपनी आवाज में जानबूझ कर थोडा रहस्य का पुट देकर पूछा और कोई ऐसी वैसी बात तो नहीं है ...."वो तो मुझे पता नहीं मगर इन दिनों वे खोयी हुए शान शौकत को फिर से जमाने में लगे हैं" ...भला कैसे? मैंने पूछा और यह भी जोड़ा कि भाई वे तो बड़े आशावादी ब्लॉगर हैं."हाँ आशा तो उनकी बलवती है ही   -उसी तरह जैसे पांडवों और कौरवों के युद्ध में जब सारथी  शल्य को अंत में दुर्योधन ने अपना सेनापति बनाया  तो संजय धृतराष्ट्र से कह उठे कि राजन देखिये दुर्योधन कितना आशावादी है जो शल्य को पांडवों पर विजय के लिए भेज रहा है . यही हाल बिचारे गुरु घंटाल का है जिन्होंने एक नया चिटठा चर्चाकार चुना है जो चिट्ठाचर्चा का बेड़ा पर करेगा ...और उस नए चिट्ठा चर्चाकार ने अपनी गोल  जुटा कर सर संधान भी कर लिया है ....ओह चिट्ठाचर्चा को भला यह दिन भी देखना था ...? मेरा मन क्षुब्ध हो गया .....शिष्य ने मुझे चिंतन से उबारा -आप काहें चिंतित होते हैं ....जो हो सो हो आपसे क्या लेना देना ....मेरा मुंहबोला  शिष्य अब पूरे शिष्यत्व भाव से मेरे सहज होने के प्रयास में जुट गया था ..ब्लॉग जगत के कई दूसरे अफसानों  का जिक्र शुरू हो चला  था ......

22 टिप्‍पणियां:

  1. 'काहो गुरु' तो बनारसी लहजा है.
    और फिर आज के एकलव्य की चिंता काहे होगी जबकि अंगूठा अब संधान के लिए जरूरी ही नहीं रह गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. .
    .
    .
    देव,
    पढ़ा और सब कुछ समझा भी...
    एक टाइम-खोटी पोस्ट... :(
    आपकी अपने पाठक के प्रति कोई जिम्मेदारी है कि नहीं... काहे फालतुवे में उसके पाँच दस मिनट बेकार करते हैं ?


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. @Pravin Shah,
    Bahut din bad dikhe yahaan!posts ki vividhata pathkon ki vividhata ke chalte hai...aap aaye n :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. रोचक शैली में लिखा गया यह आलेख प्रभावित करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वैसे हो पक्के गुरू,कल रात दस बजे ही वार्तालाप हुआ था,पर इधर-उधर की बातें तो हुईं,इस पोस्ट के बारे में नहीं बताया.अभी सुबह देखा तो मन किया कि गुरु की प्रातःकालीन वंदना कर ली जाय !

    ...शिष्य तो बिला शक हमीं हैं,पर आज के गुरु-शिष्य सम्बन्ध पहले जैसे नहीं रहे.आज हम दोस्ताना हो लिए हैं.इसलिए दोनों सम्बन्ध अपनी जगह सही हैं.हाँ,एकलव्य और द्रोण का रिश्ता अंगूठे का था,यहाँ दिल का हैऔर ऐसे रिश्ते आजमाए नहीं समझे और महसूसे जाते हैं.
    आपने पहले कई सारे चेले थोक में बनाए बाद में उनकी कब्रगाह भी खुद बना दी,सो इस वास्ते थोड़ा सतर्क रहा करो.इत्ती जल्दी गुरुमंत्र मत दिया करो और अगर किसी को एक बार दफ़न कर दिया तो उसमें संजीवनी छिडकने की भी ज़रूरत नहीं है.उसमें दम होगा तो न कोई झील सूखेगी और न कोई ब्लॉगर चर्चाकार बनेगा.गुरु घंटाल के यहाँ चिट्ठाकारी करना भी मजबूरी है.कुछ वैसा ही सीन है,'न उनके और,न हमरे ठौर'

    रही बात गुरुघंटाल की तो इस बारे में मैं कुछ कहूँगा तो लोग कहेंगे की देखो,'आज का लड़का खुरपेंच कर रहा है'सो इस बारे में कोई खुलासा नहीं.

    ...आजकल के चेलों से सावधान रहना,ये बड़े निर्मोही भी होते हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  6. गुरू को कितनी गुरुता से उपयोग में लाया जाये, काश यह भी कोई गुरु से ही सीख ले..

    उत्तर देंहटाएं
  7. ऐसी बहुत सी पोस्ट से पहले खोजी बुद्धि का प्रयोग करना पड़ता है ... दिमाग के घोड़े दौडाने पड़ते हैं ... मोहरे बदल बदल के फिट करने पड़ते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. ब्लाग जगत के कई दूसरे अफ़साने मसलन ...?

    क्या आपने संतोष जी को प्रोमोट करने का फैसला कर लिया है :)

    उत्तर देंहटाएं
  9. गुरु तो गुरु ही है, हर बात में गुरु , और फिर गुरुघंटाल के क्या तो क्या कहने !
    संतोष त्रिवेदी कि बात में दम है कि चेलों को कम ना समझना :)

    उत्तर देंहटाएं
  10. ब्लॉग जगत का अफ़साना लिख दिया है बड़े रोचक तरीके से .. गुरू-पद पर आसीन होने के लिए बधाई जो कि वाकई तलवार की धार समान है..

    उत्तर देंहटाएं
  11. गुरू घंटाल के लिए आपकी अद्भुत सुखानुभूति बनी रहे

    उत्तर देंहटाएं
  12. खून मेवे डालकर खीर बनवाई?

    की-बोर्ड पर अंग्रेजी के B N आजू बाजू होने से कित्ती गलती हो जाती है

    बैराग का गाना याद आ गया -पीते पीते कभी कभी जाम बदल जाते हैं :-)

    उत्तर देंहटाएं
  13. पाबला जी ये रही अगली लाइन ...

    खून मेवे डालकर खीर बनवाई?
    फिर उसे ही जबरिया खिलवाई :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. @पाबला जी,
    यह भी खूब गलती पकड़ी आपने :-)
    संशोधत कर दिया हुज़ूर!

    उत्तर देंहटाएं
  15. @अली सा,
    आपकी असली मंशा समझ न आयी..आप संतोष त्रिवेदी मेरे स्वयम्भू आत्मघोषित शिष्य के प्रमोशन पर चिढ क्यों रहे हैं -
    और खीर खाने वाला भी आपकी नज़रों में चढ़ा हुआ है :-)

    उत्तर देंहटाएं
  16. अरविन्द जी ,
    मित्र के गुरुकुल से चिढ़ कैसी :)

    सिर्फ याद दिला रहा हूं कि प्रमोशन आपकी कुंडली के षष्टम स्थान पर है :)

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत सुंदर जी . कोई छोटा और बड़ा नहीं , गुरु चेला दोनों सामान है.
    मगर चेले को इस भावना को समझना होगा की जिसे गुरु कह दिया तो कह दिया . . बड़ा बराबरी का दर्जा दे तो यह उसका बड़प्पन है, चेले का अधिकार नहीं. . . . बहुत खूब जी

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव