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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

देवगढ़ के शैल चित्र पुकारते हैं!

सोनभद्र जनपद में ट्रांसफर के पश्चात इस जनपद की प्राकृतिक सम्पदा -समृद्धि और रहस्यात्मक परिवेश ने मुझे अचानक ही आकर्षित किया। मत्स्य व्यवसाय की मेरी विभागीय जिम्मेदारी से दीगर मैंने इस आदिवासी बाहुल्य, कैमूर पर्वत श्रृंखला युक्त और विशाल भूभाग वाले नक्सल गतिविधि सहिष्णु इस जनपद का एक पुनरान्वेषण शुरू किया।  यह श्रृंखला इस ब्लॉग पर चल रही है।  मुझे लगा कि शीघ्र ही इस जनपद के सभी मुख्य आकर्षणों को मैं अपने नज़रिये से देख पाउँगा और आप तक पहुंचा दूंगा।   जानकारी बांटने  की मेरी प्रवृत्ति जो ठहरी . मगर शीघ्र ही इस जनपद ने  मुझे अपनी लघुता का बोध करा दिया -ज्ञान की ऐसी विविधता यह जनपद समेटे हुए है कि यहाँ तो पूरा जीवन ही बीत जाए  -करोड़ो वर्ष पहले यहां सागर लहराता था -सलखन के जीवाश्म जिसका अकाट्य प्रमाण देते हैं ,बेलन घाटी की आदि सभ्यता यही पाली बढ़ी  , पग पग पर पहाड़ और झरनों की बिखरी सुषमा,वन्य जीवन, प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के बिखरे स्मृति शेष -क्या नहीं है यहाँ? चन्द्रकान्ता संतति के तिलिस्म की अनुभूति  यहाँ विजयगढ़ दुर्ग में साक्षात होती है जहाँ का भ्रमण रहस्य और रोमांच से भरा है जहाँ से नायिका चंद्रकांता  के प्रवास की अमर कथा ने जन्म लिया। 
कौन जंतु? बूझिये तो जाने! 

                                                                 डॉ नौटियाल  और मैं

एक बार जब मैं मुख्यालय के निकट ही शाहगंज कस्बे के करीब महुअरिया नाम स्थान पर गया और वहां शैल भित्ति चित्रों को देखा तो इसके जिक्र पर शासकीय सहधर्मी जिला आपूर्ति अधिकारी श्री अजय सिंह ने मेरी भेंट श्री जितेन्द्र कुमार सिंह 'संजय' से कराई जो यहाँ घोरावल तहसील के देवगढ़  ग्राम के निवासी है।जितेन्द्र  जी ने  सोनभद्र  पर  मुझे स्वलिखित पुस्तक भेंट की तो  यहां के पुराणेतिहास की मेरी दृष्टि व्यापक हुयी।  इसी  के साथ मुझे जितेन्द्र जी की सृजनात्मक मेधा और उनके  एक अन्य शौक   से भी रूबरू हुआ। मुझे जानकारी हुयी कि इन्हे शैल चित्रों में बड़ी दिलचस्पी है। दरअसल इन्होने अपनी आँखें ही देवगढ़ की सुरम्य उपत्यका में खोलीं और बचपन से ही इनके घर के चारो ओर बिखरी पहाड़ी गुफाओं ने इनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। जितेंद्र जी बताते हैं कि हाईस्कूल की पढ़ाई  के दौरान अक्सर वे इन गुफाओं में  आ जाते और यहाँ की नीरवता में इम्तहान की तैयारी होती।  यहीं उन्होंने शैल चित्रों को भी बारीकी से देखा समझा और आह्लादित हुए।  शैल चित्रों पर इनसे चर्चा  होती रही। 
देवगढ़ का एक शैलाश्रय और अध्ययनरत टीम  


तभी मुझे विज्ञान संचार में  समान रूचि वाले मित्र और बीरबल साहनी पुरावनस्पति  विज्ञान संस्थान लखनऊ में वैज्ञानिक  मित्र  डॉ चंद्रमोहन नौटियाल  से पता चला कि उन्हें सोनभद्र के शैल चित्रों पर अध्ययन की अगुवाई का जिम्मा भारत सरकार के संस्कृति विभाग के अंतर्गत इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स ((IGNCA)) ने दिया है. उन्होंने  मुझे  शैल चित्रों के स्थानीय किसी अच्छे अध्येता का नाम संदर्भित करने को कहा । बस मैंने उन्हें जितेंद्र जी का नाम सुझा दिया। जल्दी ही दिसम्बर 2014 में शैल चित्रों पर लखनऊ में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशिविर में जितेंद्र  ने प्रतिभाग किया।  आज उसी की फलश्रुति है की कि सोनभद्र में विगत 13 अप्रैल 2015 से एक अंतर्विभागीय बहु सदस्यीय टीम डॉ नौटियाल की अगुवाई में यहाँ अवस्थान  कर रही है जिसमें प्रमुख सदस्य हैं -प्रोफ़ेसर ऐस बाजपेयी (निदेशक, बीरबल साहनी पुरावानस्पतिक  संस्थान ),  डॉ बी एल मल्ला (निदेशक IGNCA) प्रोफ़ेसर डी पी तिवारी (इतिहास विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय) ,डॉ  पी उपाध्याय ( बी एच यू ) ,प्रोफ़ेसर के के अग्रवाल (लखनऊ विश्वविद्यालय) और  प्राणिविज्ञानी तथा एक  शैलचित्र  प्रेमी के तौर पर मैं भी। . मुझे तो डॉ नौटियाल जी  ने मित्र धर्म के चलते टीम  में शामिल किया है। 

 कुछ पल का विश्राम -जितेंद्र और स्थानीय पथ प्रदर्शक परदेशिया 
 शैल चित्रों में सबसे अधिक चित्र पशु पक्षियों के ही होते हैं ,फिर मनुष्य और तब जाकर अन्य प्रकार की संरचनाएँ और डिजाइन।  मैं शैल चित्रों में पशु आकृतियों पर घ्यान केंद्रित कर रहा हूँ -हिरन और मृग ,सूअर और भालू और उनके  एकल और सामूहिक शिकार इनमें चित्रित हुए हैं -भैंस और बैल  के भी चित्र दिखे हैं। कई चित्रों पर विवाद है -एक साही  या गिरगिटान का चित्र है स्पष्ट नहीं हो पा रहा।यहाँ आज भी कृष्ण मृग पाये जाते हैं और ये शैल चित्रों में भी दिखते हैं. बहुत से चित्र चित्रकार की कल्पना की उपज  लगते हैं जैसे जिराफ की गर्दन जैसी बहुत लम्बी गर्दन लिए पशु -अब हम सभी जानते हैं जिराफ तो इस  भू भाग पर थे ही नहीं  -हाँ जब भू स्थल जुड़े(पंजिया ) हुए  थे तब? मगर तब तो होमो सैपिएंस ही नहीं थे।  यह भी  सकता है कि चित्रों में दिख रहा कोई पशु अब इस क्षेत्र  लुप्त हो चला हो? ये सारी अटकलबाजियां अंतिम निष्कर्ष तक चलती रहेगीं। 

 इन्हे भी पहचानिये 
शैल चित्र आदिमानवों द्वारा  हमें दी गयी अद्भुत और अमूल्य विरासत है। इन  चित्रों में एक ख़ास सौंदर्यबोध तो है ही, साथ ही ये मनुष्य के विकास और प्रवास, उनके आदि रहवासों तथा संस्कृति के अब तक के अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर कर सकते हैं।  इसलिए ही विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के सम्मिलित प्रयास से इनके अध्ययन की यह पहल की गयी है। अभी आरम्भिक तौर पर केवल चित्रों  का अभिलेखन और संग्रह हो रहा है और आगे इनकी व्याख्या पर ध्यान केंद्रित होगा।  सोनभद्र के घोरावल तहसील  के अंतर्गत देवगढ़ इस  लिहाज से बहुत समृद्ध है और यहाँ निरंतर ध्यान केंद्रित करने की जरुरत है।  ऐसे शैलाश्रयों जहाँ के चित्र अभिलिखित हो चुके हैं उन्हें तत्काल  संरक्षित रखने का भी प्रयास होना चाहिए! अकादमीय दृष्टि से इनका महत्त्व तो है ही इन्हे आज के परिप्रेक्ष्य में व्यावसायिक नजरिये से शैल चित्र पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है।    


सोमवार, 5 अगस्त 2013

चन्द्रकान्ता के लोक में -एक सैर विजयगढ़ दुर्ग की .....(सोनभद्र एक पुनरान्वेषण - 7)


बाबू देवकी नंदन खत्री की अमर तिलिस्मी कृति चन्द्रकान्ता के प्रेरणा स्रोत रहे एक अद्भुत फंतासी की दुनिया के मौजूदा ध्वंसावशेष और आज भी रहस्यमयी विजयगढ़ दुर्ग पर कल हमने ट्रेकिंग कर ही लिया -किला फतह हुआ एक बार फिर कुछ साधारण से मनुष्यों द्वारा . देवकी नंदन खत्री के चन्द्रकान्ता उपन्यास की नायिका बेहद सुन्दरी राजकुमारी चंद्रकांता यहीं विजयगढ़ की थीं -इस कृति को दूरदर्शन ने काफी ख्याति दिलाई और कुछ और भी कल्पनाशीलता का  सहारा लिया . जिन्होंने यह धारावाहिक देखा होगा उन्हें याद होगा कि विजयगढ़ के पास के ही नौगढ़ ( जो आज चंदौली जनपद में है ) के राजकुमार वीरेंद्र सिंह की प्रेम कथा में विजयगढ़ दरबार का  ही क्रूर सिंह विलेन बना और अपने मकसद में सफल न होने पर समीपवर्ती चुनारगढ़ (अब मिर्जापुर ) के राजा शिवदत्त को विजयगढ़ पर आक्रमण के लिए उकसाया .खैर यह सब तो फ़साना है मगर हकीकत भी कुछ कम रोमांचकारी और रहस्यभरा नहीं है .

 अभी तो आधा रास्ता भी नहीं हुआ 
यहाँ सोनभद्र में आने के बाद देखे जाने वाली जगहों की सूची में विजयगढ़ का दुर्ग भी था मगर मुश्किल यह थी की यह चार सौ फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ पर स्थित  है . और काफी चढ़ाई है . एक तरफ से तो करीब पांच किमी ट्रेकिंग करनी पड़ती है जो किले के मुख्य दरवाजे से प्रवेश दिलाता है मगर एक वाहन का रास्ता भी कालान्तर में वजूद में आ गया जो किले की एक खिड़की (गवाक्ष ) के नीचे तक जा पहुंचाता है. मगर यहाँ से सीधी चढ़ाई है और कोई व्यवस्थित मार्ग भी नहीं है -बस पत्थरों पर पैर रखते हुए सीधे खिड़की तक पहुँच जाईये - मैं इसी से घबरा रहा था -शरीर और उम्र का तकाजा ........मगर इस किले के रहस्य ने उत्साह भरा और चन्द्रकान्ता का नाम ले हम भी आखिर दुर्ग में प्रवेश कर ही लिए.भारतीय लिहाज से यह एक एडवेंचर यात्रा रही।
 जन श्रुतियों का साक्षात रामसागर 
राबर्ट्सगंज के नगवां ब्लाक में मुख्यालय से करीब तीस किमी पर  मऊकलां गाँव में यह दुर्ग सबसे ऊंचे पहाड़ पर है।  मऊकलां गाँव में बुद्ध से जुड़े अवशेष , गुफा चित्र भी  हैं और अब यहाँ एक संग्रहालय भी है जिसे हम अगली बार देखने के लिए छोड़ कर आगे बढे। वाहन वाले रास्ते को चुना और खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों को  देखते हुए किले के पीछे की खिड़की के ठीक नीचे जा  पहुंचे। सिर उठा कर ऊंचाई देखी तो एक बार गहरी निराशा हो आयी।किले ऐसे ही सुरक्षित बनते थे ताकि दुश्मन की फौजे कहीं से भी आसानी से चढ़ न पायें।  प्रियेषा सबसे पहले आगे बढीं मगर जोर से चिल्ला कर आगाह किया कि पापा आप चढ़ नहीं  पायेगें। आज के युवा  अपने बुजुर्ग पीढी को ऐसे ही अंडरइस्टीमेट करते हैं.हुंह! मैंने तत्क्षण चढ़ने का फैसला कर लिया।कुछ मत पूछिए, साँसे धौकनी हुई और  एक  दो जगहं  बैठ गए तो बैठ गए। मैं, पत्नी और डेजी बुजुर्ग थे और डेजी तो  मनुष्य की उम्र के हिसाब से एक सौ  चालीस साल यानि चौदह साल की। प्रियेषा ने डेजी को गोंद में  ले लिया और अब उसके लिए भी चढ़ाई मुश्किल हो गयी थी। आखिरकार हम खिड़की तक पहुँच गए और चौखट डांकते ही एक विशाल मैदान सामने था -थोड़ी देर तो भ्रम सा हो आया कि हम पहाड़  पर वाकई थे -यह इस इलाके का सबसे ऊंचा पहाड़ था।
 चढ़े तो हम पिछवाड़े की खिड़की से मगर मुख्य दरवाजे तक आ पहुंचे 
यद्यपि किले की प्राचीनता के बारे में बहुत प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती मगर कहते हैं कि इसका निर्माण पांचवी शती में कोल राजाओं ने कराया था।  इतिहासकारों का दावा है कि इसका निर्माण पंद्रह सौ  वर्ष पूर्व में ही भट्ट शासकों द्वारा हो चुका था।  कालांतर में अन्य राजाओं ने इस पर अधिपत्य किया। काशी के राज चेत सिंह  अंग्रेजों के समय तक इस पर काबिज थे. चंदेलों द्वारा भी यहाँ से राज काज संभालने का उल्लेख  है. यहाँ के सप्त सरोवर आज भी दर्शनीय हैं - इतने ऊपर होने के बाद भी इनमें पानी कहाँ से आता है और कैसे दो सरोवरों में आज भी पानी सूखता नहीं विस्मित करता है।  इनमें से एक राम सागर को लेकर तो कई दन्त कथायें प्रचलित हैं।  कहते हैं कभी इसमें हाथ डालने पर  बर्तन  मिल जाते थे और लोग उसी में खाना  बनाते थे।  ये इतने गहरे हैं कि इनकी गहराई आज तक  पता न लग पाने की  बात कही जाती है.
रानी बुर्ज -एकमात्र यही संरचना कुछ ठीक है
आज दुर्ग बहुत खराब स्थिति में है।  यहाँ पता नहीं कब एक मजार बन गयी और पास में ही एक कमरे का  शिव मंदिर और एक तालाब हिन्दू का हो गया और एक मुस्लिम का। और एक ओर  सालाना उर्स तो दूसरी ओर सावन में कांवरियों का मेला -आज बस दुर्ग की यही पहचान रह गयी है।  कुछ और स्थापत्य के नमूने - बुर्ज रनिवास ,कचहरी ,शिला लेख आदि भी हैं। जनश्रुति यह भी है कि यह किला महज एक तिलस्मी भूल भुलावा है -एक दूसरा किला  इस किले में  छुपा  है। काश मल्हार वाले सुब्रमन्यन साहब या राहुल सिंह जी भी साथ होते।
 हिल टाप पर बसा है किला - एक लांग शाट 
हम पहाड़  की चोटी पर चहलकदमी करते हुए किले के मुख्य दरवाजे पर जा पहुंचे। यहाँ से विशाल नयनाभिराम धन्धरौल जलाशय और चुर्क की कई किमी दूर की सीमेंट फैक्ट्री भी दिखती है. किले के मुख्य द्वार पर झाड झंखाड़ उगे हैं -एक काला नाग हमारे सामने  से सरसराता गुज़र गया।  प्रियेषा  ने फोटो तो ली मगर  उसका आधा हिस्सा गायब हो चुका था।  मुख्य द्वार के समीप की  प्राचीन कचहरी में उर्स के भंडारे की इंतजामिया कमेटी का  कब्ज़ा है. बगल में हजरत मीर शाह बाबा की मजार है और उससे लगा प्राचीन तालाब मीर सागर। यहाँ प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह में उर्स का भारी मेला लगता है। अब तक हम काफी थक चुके थे अतः वापस चल  पड़े।  किले से उतरना भी कम दुष्कर नहीं है -सीधी चढ़ाई के बजाय सीधी उतरन में ज्यादा सावधानी की जरुरत रहती है।
फिर आयेगें विजयगढ़ !
 यह पूरा क्षेत्र - मऊ कलां गाँव पुरातात्विक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।भारत सरकार का पुरातत्व विभाग इधर ध्यान दे यह अपेक्षा है! प्राचीन इतिहास के छात्रों के लिए यह एक महत्वपूर्ण भ्रमण स्थल है।  हमें मुक्खा फाल भी  देखना था जो विपरीत दिशा में करीब अस्सी किमी दूर था इसलिए हम डेढ़ बजे दोपहर के बाद किले से आगे चल पड़े ! 


रविवार, 14 अप्रैल 2013

नवरात्र की शुभ बेला और शक्ति पीठों का सांस्कृतिक पर्यटन (सोनभद्र एक पुनरान्वेषण-६)

कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर अब हम विन्ध्य पर्वतमाला की और बढ़ चले थे. सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों में कैमूर एवं विन्ध्य पर्वत मालाएं साथ साथ हैं। आज भी यहाँ की पहाड़ियां खूब वनाच्छादित हैं -उत्तर प्रदेश के उत्तराँचल विभाजन के बाद सबसे अधिक वन क्षेत्र यहीं है .अकेले सोनभद्र जिले में ही चार डिविजनल फारेस्ट आफीसर(डी ऍफ़ ओ ) के पद हैं जबकि प्रत्येक जनपद में मात्र एक ही डी ऍफ़ ओ होते हैं . इसी से आप यहाँ के वनाच्छादित अंचल  के महत्व का अंदाजा लगा सकते हैं . कभी यह क्षेत्र बहुत दुर्गम था और मात्र आदिवासी और गिरिजन ही यहाँ रहते थे .खान खदान और खनिजों के दोहन के लिए बाकी आबादी बाद में आती गयी .
देखिये विषयांतर होने लगा क्योंकि मैं बात अपने सांस्कृतिक भ्रमण -संस्मरण की करने वाला था . हम मिर्ज़ापुर जनपद की ओर बढ़ चले थे -यह भी बता दूं कि अभी विगत ढाई दशक पहले तक सोनभद्र मिर्ज़ापुर जनपद का ही एक हिस्सा था .बाद में स्वतंत्र जिला बना . हम मिर्ज़ापुर के प्रसिद्ध त्रिकोण दर्शन के अभिलाषी थे. मतलब प्राचीनतम विन्ध्याचल देवी ,अष्ठभुजा और काली खोह स्थान जिन्हें मिलाकर त्रिकोण दर्शन का उल्लेख -महात्म्य है. मेरी दृष्टि इन स्थानों की प्राकृतिक सुषमा ,प्राचीनता के आकलन -अवलोकन का था जबकि साथ के भक्त जनों को देवी के आशीर्वाद -प्रसाद की ज्यादा अभिलाषा थी . मैं अपने लिहाज से इसलिए ऐसे स्थलों को सांस्कृतिक पर्यटन की श्रेणी में रखता हूँ -आप चाहें तो इसे धार्मिक पर्यटन भी कह सकते हैं .

यह तय हुआ कि सबसे पहले हम त्रिकोण के एक कोण पर विराजमान अष्टभुजा देवी का दर्शन करगें  कंस के नाश की उदघोषणा करने वाली देवी यही हैं ऐसा कहते हैं  .गनीमत थी नवरात्र का आरम्भ एक दिन बाद होने वाला था इसलिए भीड़ नहीं थी . प्राकृतिक सौन्दर्य के लिहाज से यह स्थल बहुत रमणीक है -गंगा के किनारे की एक ऊंची चोटी पर मां विराजमान हैं -यहाँ से गंगा जी दिखती हैं और अपनी सुरम्य उपस्थति से मन मोहती हैं . अब यहाँ वाहन  द्वारा बिलकुल मंदिर तक जा सकते हैं मगर बीते दशकों में पैदल चढ़ाई ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था .बगल में खूबसूरत अष्टभुजा गेस्ट हाउस है जो उच्च प्रशासनिक अधिकारियों और माननीयों के लिए प्रायः बुक रहता है . कभी मुख्य मूर्तियाँ पहाड़ की खोह में हुआ करती थीं मगर अब वहां तक पहुँचने के लिए आसान सी सीढियां हैं .मतलब मैं भी मां अष्टभुजा का आराम से दर्शन कर सकता था -इससे उत्साहित मैं परिवार सहित सीढ़ियों से नीचे उतर चला .
 अष्टभुजा देवी के भक्तगण 
मगर यह क्या रास्ते में दुकानदारों और पंडों के नोच खसोट से मन खिन्न होने लगा . दर्शनार्थियों का ये यहाँ बहुविध शोषण करते हैं , एक दुकानदार ने कहा माँ की ओढनी ले लीजिये .चलो ले लिया ,आगे बढ़ते ही दूसरा बोल उठा -माँ की चुनरी ले लीजिये ,अब मुझे इन वस्त्रों का फर्क नहीं समझ आ रहा था मगर धर्म परायण भक्त जन  इसी खरीद फरोख्त में निमग्न रहे  -और यह क्रम माँ के सौन्दर्य -पूजन विधान के हिसाब से चलता ही रहा और मंदिर आ गया -मैं इन सबसे निरपेक्ष माँ  की मूर्तिगत विशेषताओं -पुरातत्व परिवेश को निहार रहा था -
माँ अष्टभुजा के पृष्ठ में अविरल  गंगा 
एक रहस्यात्मक भयमूलक अनुभूति भी निश्चित तौर पर थी वहां जिसका वहां के पण्डे नाजायज फायदा उठाते हैं .दुकानदार द्वारा पूजा हवन सामग्री में विविध वस्तुएं दी गयी थीं और पण्डे उनका उपभोग यहाँ वहां करने को हठ कर रहे थे .पत्नी तो सब मंत्रमुग्ध करती जा रही थीं मगर मुझे कठोर होना पड़ा .  एक और गुफा के भीतर भी कोई प्राचीन मूर्ति थी और पत्नी जी वहां जाने को उद्यत थीं मगर मैंने हठात रोका .  पंडों ने इतना क्षुब्ध कर दिया था मैं सीढ़ियों पर वापस ऊपर बढ़ चला . पीछे मुड़कर देखा तो पत्नी बिटिया भी ऊपर आ रही थीं . बाद में पत्नी ने मुझे बहुत कोसा भी कि  अन्दर वाली गुफा  देवी का दर्शन उन्हें नहीं करने दिया जिन्हें पूजने बचपन में वे अक्सर बड़ी और खडी चढ़ाई चढ़ कर आती थीं . उन्होंने यह सुनाया भी कि आपके साथ तो दर्शन करने आना ही नहीं चाहिए .अब कौन कहे दुष्ट पंडों ने इन स्थानों को दर्शन लायक छोड़ा ही नहीं -ये व्यवसाय के अड्डे बन गए हैं . अष्टभुजा देवी दर्शन के बाद पत्नी जी का चेहरा कान्तिमान लग रहा था -मैंने स्मृति के लिए एक फोटो उतार ली -बिटिया थोड़ी खीझी सी  लग रही है -कुछ मेरा स्वभाव पा गयी है -पंडों और दुकानदारों से वह भी क्षुब्ध थी . 
 काली खोह की माँ काली 

अब हम त्रिकोण के अगले कोण यानि काली खोह मंदिर के लिए चल पड़े -बमुश्किल कुछ किलोमीटर पर -कभी यहाँ एक दुर्गम कन्दरा हुआ करती थी मगर अब तो एक आधुनिक मंदिर हैं यहाँ . वाहन भी मंदिर के गेट तक जा पहुंचते हैं मगर काफ़ी आगे से ही  पण्डे और उनके मुस्तंडे आपके वाहन को साधिकार  रोकने लगते हैं।  आप रुके तो वहीं से काफी पैदल चलना पड़ेगा और जगहं जगहं आपकी जेब ढीली होती जायेगी . मंदिर के अन्दर भी लूट खसोट मची हुयी थी . मैं निर्विकार भाव से दर्शन कर लौट आया .रास्ते में लंगूरों को कुछ चने खिलाया .एक पेड़ की खोह में सचमुच के जीवित हनुमान जी (स्वांग) से बोला बतियाया भी -वह तब तक रुष्ट रहे  जब तक मेरे हाथ में दस रुपये की नोट नहीं देख पाए  -बाद में दयार्द्र होकर मेरे सर पर गदा पटक कर आशीर्वाद दिया -गनीमत रही सर सलामत रहा! इन उपक्रमों से ये सब  दर्शनार्थियों को भयभीत करते हैं . जिससे उनकी बन आती है . इन स्थलों पर निहित स्वार्थों वश पूजा भाव में भय का संचार करना संभवतः सदियों से चला आ रहा है .यहाँ की काली देवी की विशिष्टता यह दिखी कि उनकी जीभ बाहर नहीं निकली थी।  
 प्राचीनतम माँ विंध्यवासिनी(चित्र साभार: माँ विंध्यवासिनी 

अब हम त्रिकोण के शिखर बिंदु पर माँ विंध्यवासिनी के मंदिर की ओर  चल पड़े थे जिनका बहुत महात्म्य वर्णित है -यह अत्यंत प्राचीन पूजा स्थल है यह और नवरात्र में यहाँ भारी भीड़ रहती है -दिल्ली और हावड़ा के बीच की सारी रेलें यहाँ रुकने लगती हैं . मैं विन्ध्याचल देवी का बहुत बार दर्शन कर चुका हूँ इसलिए अपनी कुतिया डेजी जो हर तीर्थाटन में पिछले चौदह वर्ष से हमारे साथ रहती आयी है के साथ ही रुका रहा और बाकी भक्तजन देवी के दर्शन को बढ़ गए . और एक घंटे के बाद ही लौटे . इस प्राचीनतम पूजा स्थल का जिक्र इआन मैकडोनाल्ड ने अपनी प्रसिद्ध विज्ञान कथा-कृति रीवर आफ गाडस  में भी किया है.
 चोपन के निकट माँ वैष्णों देवी का भव्य  मंदिर 
 ऐसा लगता है सोनभद्र और मिर्ज़ापुर के आदिवासियों के मातृसत्तात्मक समाज के चलते ये क्षेत्र देवी पूजा के  विशेष शक्ति पीठ बने होंगे -कई सौ किलोमीटर दायरे के इस आदिवासी बहुल क्षेत्र  में देवी पूजा की प्रधानता है . पिपरी (रेनुकूट) में एक प्राचीन वन देवी का मंदिर भी विख्यात है. हमने इसी सांस्कृतिक यात्रा के अंतिम पड़ाव में उनका भी दर्शन किया मगर सुखद आश्चर्य कि वहां पंडों की लूट खसोट का नाम निशान तक नहीं था .पंडित के हाथ में चढ़ावा देने पर उन्होंने उसे हमारे सामने ही दानपात्र में डाल  दिया . मुझे इस मंदिर में सचमुच प्रशांति का अनुभव हुआ . आप कभी रेनुकूट जाएँ तो दर्शन करें! राबर्ट्सगंज और रेनुकूट मार्ग पर चोपन के पास ही मूल वैष्णो देवी की अनुकृति के एक भव्य मंदिर में भी हमने मत्था टेका .कहते हैं कि जम्मू के वैष्णों देवी के स्थान से प्रदीप्त अग्नि मशाल यहाँ लाई गयी थी .यह मंदिर भी देखने लायक है। बहरहाल शक्तिपीठों के दर्शन का यह सिलसिला वन देवी के दर्शन पर विराम पा गया .

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

सोनभद्र सफारी के वे अविस्मरणीय क्षण (सोनभद्र पुनरान्वेषण श्रृंखला -5 )

झाड़ियों झुरमुटों से रेंगती हमारी जीप अब हमें सोन प्वाईंट ले आयी जहाँ से सोन नदी बहुत सुन्दर दिखती है -ख़ास तौर पर शाम को सूर्य के अस्त होने का नज़ारा बड़ा दिलकश होता है यहाँ .मगर  एक और स्थल बहुत मजेदार है यहीं जिसे इको(echo-point)  प्वाईंट कहते हैं -पारिस्थितिकी वाला इको नहीं बल्कि अनुगूंज वाला इको . यहाँ भी एक विशाल गहरी खायीं हैं जिसके उस पार के पहाडी काफी ऊँची है -यहाँ से आवाज लगाने पर प्रतिध्वनि बिना गुणवत्ता में खराबी के वापस लौटती है -ध्वनि के इस अनुगूंज का आनन्द उठाने लोग आते रहते हैं . हमने भी खूब चीख पुकार मचाई -कई ब्लागरों का नाम लेकर पुकारा और प्रतिध्वनि सुनी? काश एक का नाम वहीं गुम हो गया होता सदा सदा के लिए :-) मगर नहीं मेरी आशाओं को धता बताते हुए वह नाम उतनी ही तेजी से मेरी ओर लपकता हुआ बार बार वापस आया ! यह ध्वन्यात्मक खेल ज्यादा देर नहीं चला और जल्दी ही इसमें रूचि ख़त्म होने को  आयी . अब भूख भी लग आयी थी .हम वापस डांक बगले की ओर  लौटने लगे .
इको(echo-point)

रास्ते में अब तक अनदेखी एक प्यारी सी चिड़िया दिखी . पहले तो वह तीतरनुमा दिखी मगर फिर फुर्र से उड़कर काफी ऊंचाई पर पहुँच गयी -उड़ते वक्त दिखा कि वह जोड़े में थी -तीतर को इतना ऊपर अमूमन उड़ते मैंने नहीं देखा था . इसलिए इस चिड़िया को लेकर जिज्ञासा बढ़ चली . बिटिया ने उड़ने से ठीक पहले जीप के बंद शीशे से ही एक तस्वीर उतार ली थी .आप क्या इस चिड़िया को पहचानने में मेरी मदद करेगें? पेंडुकी/घुघूती /फाख्ता? नहीं नहीं यह तो चेस्ट नेट बेलीड सैंड ग्राउज( भात तीतर ) निकली -थैंक्स सालिम अली ,थैंक्स गूगल!

   कौन सी चिड़िया?   
जीप आगे बढी तो ठीक बीच रास्ते एक गीदड़ साहब आराम फरमाते मिले -हमने उनकी आरामतलबी में खलल डाल दिया था . वे बहुत अलसाए से उठे तो मगर बीच रास्ते ही ठस हो गए -हमारे मुंह से बरबस ही निकल पड़ा बड़ा ढीठ सियार है यह तो! बिटिया को भी फोटो उतारनी थी सो जीप रुकी और उसने इत्मीनान से फोटो उतारने का वक्त दिया -फिर मानो यह मंशा थी  उसकी कि भाई फोटो सोटो  तो उतार ली, अब रास्ता नापो -मगर हमें तो उसी रास्ते से आगे जाना था .लिहाजा कुछ देर की जिच के बाद वे खरामा खरामा  रास्ते से हट के किनारे लग लिए .
 श्रृंगाल सर!

डांक बंगले पर पहुँचने के पहले एक म्यूजियम भी देखा गया -प्राकृतिक चित्रण केंद्र . मतलब नेचुरल हिस्ट्री कलेक्शन सेंटर -यहाँ कुछ दुर्लभ वन्य जीवन के चित्र और मृत जानवरों के संरक्षित अवशेष आदि दिखे -कांसेप्ट तो बहुत अच्छा था मगर इसका विकास उस तरीके से नहीं हो पाया जो इसके संस्थापक की सोच रही होगी -सरकारी सेवाओं में लीक से हट कर कल्पनाशील और सुरुचिपूर्णता लिए कम ही आफीसर होते  हैं . 
 विजिटर्स बुक में भी अपने विचार दर्ज कर दिए ताकि सनद रहे
इस वन्य विहार को व्यावसायिक पर्यटन के एक आकर्षक केंद्र में बदला जा सकता है -प्रवेश शुल्क भी लगाया जा सकता है -एक साथ इतने मनोरंजन के स्थल को संजोये यह वन क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है . एक बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति ही इसे इस दुर्दशा से उबार सकती है . या तो इसे निजी प्रबंधकों को ही सौंप देना चाहिए  . डांक बंगले में हम वन विभाग के स्थानीय सद्भाव,शिष्टाचार से सेवित हुए और धन्यवाद ज्ञापन किया . आज की हमारी सफारी पूरी हो गयी थी . अब हमें सांस्कृतिक पर्यटन पर विन्ध्याचल पहाड़ियों पर पहुंचना था तो हमने कैमूर पर्वत श्रृंखला को टा टा बाय बाय कहा और आगे चल पड़े .

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

मेरी सोनभद्र की खोज यात्रा -1


शोण भद्र से कालान्तर में सोनभद्र शब्द बना. यहाँ आने के बाद यहाँ की संस्कृति,आबो हवा में मेरे अनुकूलित होने का सप्रयास क्रम जारी है. यहाँ कितना कुछ जानने  समझने को है.उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल के अलग हो जाने के बाद सोनभद्र ही वह अकेला जिला है जहाँ आज भी वनों का आच्छादन ५३ फीसदी है .बड़े बड़े बाँध,झीलें और जलाशय है .अकूत वनौषधि और खनिज तथा खनन संपदा है. मगर दुर्भाग्य से आज भी यह एक बहुत ही पिछड़ा हुआ अंचल है. विकास के आधुनिक मानदंडों पर इसे अभी हाल में ही हुए एक सर्वे (पंचायती राज मंत्रालय )में उत्तर प्रदेश ही नहीं देश का सबसे पिछड़ा जिला पाया  गया है. मगर इतना कुछ होने के बावजूद भी इसकी अपनी कुछ विशिष्टतायें हैं -यह देश की  ऊर्जा राजधानी है .जल विद्युत और ताप विद्युत की कई परियोजनाएं यहाँ पर हैं .जल प्रपात और प्राकृतिक धरोहरों के मामले में सोनभद्र का अनूठा स्थान है .एक विश्वविख्यात जीवाश्म क्षेत्र (फासिल बेड ) यहाँ है . प्रागैतिहासिक शैल चित्र भी हैं . सोन और कर्मनाशा नदियाँ हैं . सोन दरअसल एक पुरुष "नदी" है और इसलिए इसे वस्तुतः नदी नहीं नद कहा जाता है-सोन नद ..रेनुकूट में हिंडालको के विश्वप्रसिद्ध एल्मूनियम कारखाने के साथ ही कई औद्योगिक गतिविधियाँ यहाँ की एक अलग पहचान हैं ,
राबर्ट्सगंज के सोन इको प्वायंट से  सोन घाटी का एक विहंगम दृश्य 
 सोनभद्र से मेरा संवेदित होना अभी शुरू ही हुआ है . बहुत कुछ अभी जानना समझना शेष है जिसे आपके साथ साझा करता रहूँगा .ज्ञान जी को गंगा जिस भाति मिल गयीं हैं अन्वेषण पुनि पुनरपि पुनरान्वेषण के लिए, मैं समझता हूँ मेरी झोली में अब सोनभद्र उसी तरह आ गया है और मैं कृत्यार्थ हो उठा हूँ . अभी तो सोनभद्र के नामकरण को लेकर मन में उथल पुथल मची हुयी है . अग्निपुराण में आया है -नमस्ते ब्रह्मपुत्राय शोणभद्राय ते नमः कालांतर  में शोण ही सोन बन गया है ..किन्तु शोण का शाब्दिक अर्थ क्या है ? क्या शोणित का शाब्दिक अर्थ खून तो नहीं है? कोई संस्कृत का विद्वान मेरा मार्गदर्शन करेगा? .कभी कोई भयंकर युद्ध तो इस नदी के किनारे नहीं हुआ जिससे इसका रक्त रंजित जल दूर दूर तक लाल हुआ हो और नाम शोणभद्र हो गया हो -मगर भद्र का अर्थ कुशलता से है .अर्थात शोणित होकर भी जन कल्याण करने वाली नदी -शोणभद्र! ये बस विचारभर है और मुझे किसी गुरु की खोज है जो मुझे दिशा दिखाये! लेकिन यह तो तय है कि जिले का नाम सोनभद्र सोंन  नदी के कारण ही है .कहीं आल्हा की व्याहता सोनवा के नाम से तो सोनभद्र का कोई कनेक्शन नहीं है ? यहाँ की चंदेलों के वक्त की कुछ लड़ाईयां आल्हा की अगुवाई में हुयी हैं -पास के चुनार के किले में सोना के विवाह मंडप में कितने ही योद्धा मार दिए गए थे . 
वाराणसी -सोनभद्र मार्ग पर अहरौरा बांध का एक मंत्रमुग्ध करता दृश्य 
यहाँ आदिवासियों का भी बाहुल्य है, उनकी कई जातियां उपजातियां हैं. यहाँ का करमा  नृत्य मशहूर है .  पत्नी जो मिर्जापुर की मूल वासी है (यह जिला मिर्ज़ापुर से ही पिछले नवे दशक में अलग हुआ था ) बता रही है कि सोनभद्र के एक तहसील घोरावल के घड़े मशहूर हैं. यह जानकारी देने का उनका छुपा मंतव्य हो सकता है कि मैं एक   घड़ा यथाशीघ्र उनके लिए ले आऊँ :-)
बनारस सोनभद्र मार्ग मध्य का एक नयनाभिराम जल प्रपात -लखनियां दरी 
यहाँ की लोक परम्परा में पत्नियां मोतीझील की मेहन्दी के साथ बहुत कुछ अपने पिया से मांगती रही हैं और अब उस फेहरिस्त में घोरावल का  घड़ा भी जुड़ गया है! यहाँ आल्हा के बाद के दूसरे लोक विख्यात जननायक लोरिक की कथायें भी जन श्रुतियों में व्याप्त हैं -एक विशाल शैल खंड राबर्ट्सगंज -शक्तिनगर मुख्य मार्ग पर ही है जिसे लोरिक पत्थर कहा जाता है और मान्यता है कि उसे महा लोकनायक लोरिक ने अपने खड्ग वार से दो  भागों में विभक्त कर दिया था ... यह वृत्तांत भी मैं तफसील से आपके सामने लाऊंगा! 
अभी तो मेरी सोनभद्र की खोज यात्रा बस शुरू ही हुयी है!  

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