रविवार, 14 अप्रैल 2013

नवरात्र की शुभ बेला और शक्ति पीठों का सांस्कृतिक पर्यटन (सोनभद्र एक पुनरान्वेषण-६)

कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर अब हम विन्ध्य पर्वतमाला की और बढ़ चले थे. सोनभद्र और मिर्जापुर जनपदों में कैमूर एवं विन्ध्य पर्वत मालाएं साथ साथ हैं। आज भी यहाँ की पहाड़ियां खूब वनाच्छादित हैं -उत्तर प्रदेश के उत्तराँचल विभाजन के बाद सबसे अधिक वन क्षेत्र यहीं है .अकेले सोनभद्र जिले में ही चार डिविजनल फारेस्ट आफीसर(डी ऍफ़ ओ ) के पद हैं जबकि प्रत्येक जनपद में मात्र एक ही डी ऍफ़ ओ होते हैं . इसी से आप यहाँ के वनाच्छादित अंचल  के महत्व का अंदाजा लगा सकते हैं . कभी यह क्षेत्र बहुत दुर्गम था और मात्र आदिवासी और गिरिजन ही यहाँ रहते थे .खान खदान और खनिजों के दोहन के लिए बाकी आबादी बाद में आती गयी .
देखिये विषयांतर होने लगा क्योंकि मैं बात अपने सांस्कृतिक भ्रमण -संस्मरण की करने वाला था . हम मिर्ज़ापुर जनपद की ओर बढ़ चले थे -यह भी बता दूं कि अभी विगत ढाई दशक पहले तक सोनभद्र मिर्ज़ापुर जनपद का ही एक हिस्सा था .बाद में स्वतंत्र जिला बना . हम मिर्ज़ापुर के प्रसिद्ध त्रिकोण दर्शन के अभिलाषी थे. मतलब प्राचीनतम विन्ध्याचल देवी ,अष्ठभुजा और काली खोह स्थान जिन्हें मिलाकर त्रिकोण दर्शन का उल्लेख -महात्म्य है. मेरी दृष्टि इन स्थानों की प्राकृतिक सुषमा ,प्राचीनता के आकलन -अवलोकन का था जबकि साथ के भक्त जनों को देवी के आशीर्वाद -प्रसाद की ज्यादा अभिलाषा थी . मैं अपने लिहाज से इसलिए ऐसे स्थलों को सांस्कृतिक पर्यटन की श्रेणी में रखता हूँ -आप चाहें तो इसे धार्मिक पर्यटन भी कह सकते हैं .

यह तय हुआ कि सबसे पहले हम त्रिकोण के एक कोण पर विराजमान अष्टभुजा देवी का दर्शन करगें  कंस के नाश की उदघोषणा करने वाली देवी यही हैं ऐसा कहते हैं  .गनीमत थी नवरात्र का आरम्भ एक दिन बाद होने वाला था इसलिए भीड़ नहीं थी . प्राकृतिक सौन्दर्य के लिहाज से यह स्थल बहुत रमणीक है -गंगा के किनारे की एक ऊंची चोटी पर मां विराजमान हैं -यहाँ से गंगा जी दिखती हैं और अपनी सुरम्य उपस्थति से मन मोहती हैं . अब यहाँ वाहन  द्वारा बिलकुल मंदिर तक जा सकते हैं मगर बीते दशकों में पैदल चढ़ाई ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था .बगल में खूबसूरत अष्टभुजा गेस्ट हाउस है जो उच्च प्रशासनिक अधिकारियों और माननीयों के लिए प्रायः बुक रहता है . कभी मुख्य मूर्तियाँ पहाड़ की खोह में हुआ करती थीं मगर अब वहां तक पहुँचने के लिए आसान सी सीढियां हैं .मतलब मैं भी मां अष्टभुजा का आराम से दर्शन कर सकता था -इससे उत्साहित मैं परिवार सहित सीढ़ियों से नीचे उतर चला .
 अष्टभुजा देवी के भक्तगण 
मगर यह क्या रास्ते में दुकानदारों और पंडों के नोच खसोट से मन खिन्न होने लगा . दर्शनार्थियों का ये यहाँ बहुविध शोषण करते हैं , एक दुकानदार ने कहा माँ की ओढनी ले लीजिये .चलो ले लिया ,आगे बढ़ते ही दूसरा बोल उठा -माँ की चुनरी ले लीजिये ,अब मुझे इन वस्त्रों का फर्क नहीं समझ आ रहा था मगर धर्म परायण भक्त जन  इसी खरीद फरोख्त में निमग्न रहे  -और यह क्रम माँ के सौन्दर्य -पूजन विधान के हिसाब से चलता ही रहा और मंदिर आ गया -मैं इन सबसे निरपेक्ष माँ  की मूर्तिगत विशेषताओं -पुरातत्व परिवेश को निहार रहा था -
माँ अष्टभुजा के पृष्ठ में अविरल  गंगा 
एक रहस्यात्मक भयमूलक अनुभूति भी निश्चित तौर पर थी वहां जिसका वहां के पण्डे नाजायज फायदा उठाते हैं .दुकानदार द्वारा पूजा हवन सामग्री में विविध वस्तुएं दी गयी थीं और पण्डे उनका उपभोग यहाँ वहां करने को हठ कर रहे थे .पत्नी तो सब मंत्रमुग्ध करती जा रही थीं मगर मुझे कठोर होना पड़ा .  एक और गुफा के भीतर भी कोई प्राचीन मूर्ति थी और पत्नी जी वहां जाने को उद्यत थीं मगर मैंने हठात रोका .  पंडों ने इतना क्षुब्ध कर दिया था मैं सीढ़ियों पर वापस ऊपर बढ़ चला . पीछे मुड़कर देखा तो पत्नी बिटिया भी ऊपर आ रही थीं . बाद में पत्नी ने मुझे बहुत कोसा भी कि  अन्दर वाली गुफा  देवी का दर्शन उन्हें नहीं करने दिया जिन्हें पूजने बचपन में वे अक्सर बड़ी और खडी चढ़ाई चढ़ कर आती थीं . उन्होंने यह सुनाया भी कि आपके साथ तो दर्शन करने आना ही नहीं चाहिए .अब कौन कहे दुष्ट पंडों ने इन स्थानों को दर्शन लायक छोड़ा ही नहीं -ये व्यवसाय के अड्डे बन गए हैं . अष्टभुजा देवी दर्शन के बाद पत्नी जी का चेहरा कान्तिमान लग रहा था -मैंने स्मृति के लिए एक फोटो उतार ली -बिटिया थोड़ी खीझी सी  लग रही है -कुछ मेरा स्वभाव पा गयी है -पंडों और दुकानदारों से वह भी क्षुब्ध थी . 
 काली खोह की माँ काली 

अब हम त्रिकोण के अगले कोण यानि काली खोह मंदिर के लिए चल पड़े -बमुश्किल कुछ किलोमीटर पर -कभी यहाँ एक दुर्गम कन्दरा हुआ करती थी मगर अब तो एक आधुनिक मंदिर हैं यहाँ . वाहन भी मंदिर के गेट तक जा पहुंचते हैं मगर काफ़ी आगे से ही  पण्डे और उनके मुस्तंडे आपके वाहन को साधिकार  रोकने लगते हैं।  आप रुके तो वहीं से काफी पैदल चलना पड़ेगा और जगहं जगहं आपकी जेब ढीली होती जायेगी . मंदिर के अन्दर भी लूट खसोट मची हुयी थी . मैं निर्विकार भाव से दर्शन कर लौट आया .रास्ते में लंगूरों को कुछ चने खिलाया .एक पेड़ की खोह में सचमुच के जीवित हनुमान जी (स्वांग) से बोला बतियाया भी -वह तब तक रुष्ट रहे  जब तक मेरे हाथ में दस रुपये की नोट नहीं देख पाए  -बाद में दयार्द्र होकर मेरे सर पर गदा पटक कर आशीर्वाद दिया -गनीमत रही सर सलामत रहा! इन उपक्रमों से ये सब  दर्शनार्थियों को भयभीत करते हैं . जिससे उनकी बन आती है . इन स्थलों पर निहित स्वार्थों वश पूजा भाव में भय का संचार करना संभवतः सदियों से चला आ रहा है .यहाँ की काली देवी की विशिष्टता यह दिखी कि उनकी जीभ बाहर नहीं निकली थी।  
 प्राचीनतम माँ विंध्यवासिनी(चित्र साभार: माँ विंध्यवासिनी 

अब हम त्रिकोण के शिखर बिंदु पर माँ विंध्यवासिनी के मंदिर की ओर  चल पड़े थे जिनका बहुत महात्म्य वर्णित है -यह अत्यंत प्राचीन पूजा स्थल है यह और नवरात्र में यहाँ भारी भीड़ रहती है -दिल्ली और हावड़ा के बीच की सारी रेलें यहाँ रुकने लगती हैं . मैं विन्ध्याचल देवी का बहुत बार दर्शन कर चुका हूँ इसलिए अपनी कुतिया डेजी जो हर तीर्थाटन में पिछले चौदह वर्ष से हमारे साथ रहती आयी है के साथ ही रुका रहा और बाकी भक्तजन देवी के दर्शन को बढ़ गए . और एक घंटे के बाद ही लौटे . इस प्राचीनतम पूजा स्थल का जिक्र इआन मैकडोनाल्ड ने अपनी प्रसिद्ध विज्ञान कथा-कृति रीवर आफ गाडस  में भी किया है.
 चोपन के निकट माँ वैष्णों देवी का भव्य  मंदिर 
 ऐसा लगता है सोनभद्र और मिर्ज़ापुर के आदिवासियों के मातृसत्तात्मक समाज के चलते ये क्षेत्र देवी पूजा के  विशेष शक्ति पीठ बने होंगे -कई सौ किलोमीटर दायरे के इस आदिवासी बहुल क्षेत्र  में देवी पूजा की प्रधानता है . पिपरी (रेनुकूट) में एक प्राचीन वन देवी का मंदिर भी विख्यात है. हमने इसी सांस्कृतिक यात्रा के अंतिम पड़ाव में उनका भी दर्शन किया मगर सुखद आश्चर्य कि वहां पंडों की लूट खसोट का नाम निशान तक नहीं था .पंडित के हाथ में चढ़ावा देने पर उन्होंने उसे हमारे सामने ही दानपात्र में डाल  दिया . मुझे इस मंदिर में सचमुच प्रशांति का अनुभव हुआ . आप कभी रेनुकूट जाएँ तो दर्शन करें! राबर्ट्सगंज और रेनुकूट मार्ग पर चोपन के पास ही मूल वैष्णो देवी की अनुकृति के एक भव्य मंदिर में भी हमने मत्था टेका .कहते हैं कि जम्मू के वैष्णों देवी के स्थान से प्रदीप्त अग्नि मशाल यहाँ लाई गयी थी .यह मंदिर भी देखने लायक है। बहरहाल शक्तिपीठों के दर्शन का यह सिलसिला वन देवी के दर्शन पर विराम पा गया .

32 टिप्‍पणियां:

  1. इस श्रृंखला की सभी नई किश्तें पढ़ डालीं। चौथी, पांचवी किश्त अधिक जोरदार लगी। लगता है एक बार फिर घूमना पड़ेगा।

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  2. ...अष्टभुजा देवी और उनकी बुजुर्ग भक्त को प्रणाम !

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  3. अच्छी चल रही हैं यात्राएं. जारी रहें.

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  4. पंडित जी! आपका वृत्तान्त उस स्थान को सर्वथा नया लुक प्रदान करता है.. उन स्थानों का इतिहास और वर्णन पढने के बाद लगता ही नहीं ये वही जगह है जहाँ हम बरसों से लगातार जाया करते रहे हैं.. जैसे विन्ध्याचल का अष्टभुजा मंदिर.. हमने उस स्थान को जंगल से कंक्रीट बनते देखा है.. सीढ़ियों पर चढ़कर काली खोह पहुँचना, वहाँ बंदरों को चने खिलाना, मंदिर के सामने वाले चबूतरे पर सपरिवार गंगा जी के बैकग्राउंड में फोटो खिंचवाना..
    वास्तव में इलाहाबाद, विन्ध्याचल, बनारस और रेणुकूट हमारे लिए घर के जैसा था.. रेणुकूट का वनदेवी मंदिर हम रिहन्द बाँध पार करके जाते थे.. उस समय वह एक पेड़ के नीचे एक छोटा सा मंदिर सा होता था. बाद में जब २००५ में गए तो देखा पक्का हो गया है.. रेनुकेश्वर महादेव और राम मंदिर (बाद में बना) ये सब आज भी याद आते हैं..
    कभी अवसर मिले तो रिहन्द का कैचमेंट एरिया घूम आइये.. नौका विहार का आनद और चारों ओर घना जंगल (पता नहीं अब है कि नहीं).. मज़ा आ गया.. और हाँ, बंटी और बबली फिल्म का गाना भी चोपन पुल पर फिल्माया गया है!! 

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    1. मैंने भी लंगूरों को चने खिलाये -हो सकता है बंदरों को लंगूरों ने विस्थापित किया!

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    2. कपि मानुष सम्बन्ध -मैंने काली खोह,मिर्जापुर के मंदिर के लंगूरों को नाश्ता कराया
      https://www.facebook.com/photo.php?fbid=447804545294312&set=a.184403388301097.46591.100001943122053&type=1&theater

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  5. नवरात्र में इससे पढ़ने से अलौकिक अनुभव हुआ...

    जय हिंद...

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  6. भिखमंगों और पंडों को हम मुंह नहीं लगाते हैं दरअसल हिन्दू धर्म के इस स्वरूप में मन कभी पैठा ही नहीं .हम तो ब्रह्माकुमार बन रहें हैं अब धीरे धीरे वैसी ही चर्या और संस्कार लेने के लिए पुरुषार्थ रत भी हैं इन दिनों यहाँ २ ४ ,गीतांजलि कोम्प्लेक्स ,रेडिओ क्लब कोलोनी ,कोलाबा ,मुंबई शाखा में .पर्यटन और नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए यूं हम दो मर्तबा तिरु पति देवस्थानं ,बालाजी ,आंध्र प्रदेश भी हो आयें हैं .

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  7. everytime I go to some mandir of devi..
    I wonder why all of them chose to reside on a hill top :P

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  8. सुन्दर संस्मरण. ऐसा लगा जैसे मैं भी दर्शन में सम्मिलित था. पंडों द्वारा लूट खसोट का चित्र आपने प्रस्तुत किया उससे दस वर्ष पहले की स्मृतियाँ याद आ गयीं. मैं हिमाचल प्रदेश में ज्वालामुखी मंदिर तथा पालमपुर के निकट कई और मंदिरों में गया था. वहां भी बिलकुल यही आलम था.

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  9. बहुत ही अलौलिक, परंतु आपने लंगूरों को ही चने खिलाए...चिंपैंजी(ताऊ) को क्यों नहीं?:)

    रामराम.

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    1. ताऊ नामके प्राणी यहाँ नहीं मिलते :-(

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  10. धार्मिक स्थलों का भी अपना ही आकर्षण है | अच्छा लगता है वहां जाना और कुछ जानना| हाँ, कुछ समस्याएं भी होती ही हैं ,जैसा आपने बताया :) .... सुंदर ढंग से प्रस्तुत विवरण

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  11. पंडितों की लूट खसोट लगभग हर प्रमुख धार्मिक स्थल पर अच्छी खासी मुसीबत हो जाती है . दर्शन से ज्यादा चिंता इस बात की होती हैकी इनसे कैसे निपटा जाए , मगर फिर यह भी ख्याल आता है कि आखिर इनके भरण पोषण का यही जरिया है . घोडा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या !
    देवी मूर्तियों के साथ ही साक्षात् देवी के दर्शन भी अति लुभावने लगे !

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  12. चलिए, हम भी दर्शन करते चल रहे हैं, साथ-साथ। पता नहीं ट्रेन से दिल्ली या मुंबई से राँची आते वक्त, एक स्टेशन आता है रेनुकूट, देखा है मैंने। कहीं ये वही रेनुकूट तो नहीं ?

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  13. गंगा का दृश्य तो अभिभूत कर गया, पंत की नौका विहार की पंक्तियाँ याद आ गयीं।

    सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल,
    तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल,
    लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल!

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  14. पंडों को हड़काने का जिक्र थोड़ा और होता तो अच्‍छा लगता। मुन्‍शी प्रेमचन्‍द ने इन्‍हीं पंडों को अपने उपन्‍यासों में पंडित बताकर निरीहों और नीच जातियों पर इनके जुल्‍मों की व्‍याख्‍या की है। तात्‍पर्य यह कि विशुद्ध ब्राह्मण पंडों के कारण बदनाम हो गए। आगे की यात्राएं निष्‍कंटक (पंडाविहीन) रहने की कामना के साथ।

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  15. देवी देवताओं का खज़ाना भरा पड़ा है हमारे देश में। लेकिन भक्तों की श्रद्धा और पांडों की लूट खसोट और दुकानदारों की रोजी रोटी देखकर विरोधाभास का अनुभव होता है। इसलिए हम तो बाहर से ही फोटो आदि लेकर लौट जाते हैं।

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  16. संस्मरण पर सटीक विश्लेषण बढ़िया यात्रा वृत्तांत झांकियों और शब्द चित्र सौन्दर्य लिए .

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  17. माँ विन्ध्यवासिनी को कैमरे की आँख से देखने में आप छा गए हैं .

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  18. रहस्यमयी भयमूलक ...ऐसे स्थानों पर ही तो पंडे खूब कमाया करते हैं.
    ऐसा सिर्फ़ अपने उत्तर में ही नहीं है कभी दक्षिण के मंदिरों में जा कर देखें!तौबा कर लेंगे !
    ..........
    तस्वीरें और वृतांत बहुत अच्छा लगा.हमें भी इस माध्यम से देवी के दर्शन हो गए.
    आभार.

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  19. जय माता दी | जय हो | नवरात्री की शुभकामनायें |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  20. भाव अर्थ भाषिक सौन्दर्य और रूप रचाव लिए बढ़िया रचना पढ़वाई आपने भाई विक्रम की .शुक्रिया आपका . का अपना अंदाज़ है दो टूक बे -लाग ,बे -लिहाज़ ,जेबकतरों (पंडों )का बढ़िया चित्र प्रस्तुत किया है आपने .यह व्यक्ति को उसकी आत्मिक स्थिति से गिरा देते हैं .उसकी स्थिति खराब कर देते हैं .ये एक प्रकार की धार्मिक ठगी है .छद्म रूप है यह धर्म का शुद्ध कर्म कांडी .

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  21. अष्टभुजा देवी के पृष्ठ में गंगा मैय्या - कितना सुरम्य है.

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  22. अच्छी यात्रा रही सर।
    आपके सौजन्य से इस अंचल के बारे में अच्छी जानकारी मिल रही है।

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  23. सुन्दर संस्मरण....सुंदर ढंग से प्रस्तुत विवरण

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  24. पवित्र आनंद को संचारित करता आलेख..एक नवीन दिव्य सौन्दर्य से..

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  25. मजा आ गया ऐसा लगा कि आपकी जगह पर हम घूम रहे है और देवी माँ के दर्शन का लाभ ले रहे है ।

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