शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

सोनभद्र सफारी के वे अविस्मरणीय क्षण (सोनभद्र पुनरान्वेषण श्रृंखला -5 )

झाड़ियों झुरमुटों से रेंगती हमारी जीप अब हमें सोन प्वाईंट ले आयी जहाँ से सोन नदी बहुत सुन्दर दिखती है -ख़ास तौर पर शाम को सूर्य के अस्त होने का नज़ारा बड़ा दिलकश होता है यहाँ .मगर  एक और स्थल बहुत मजेदार है यहीं जिसे इको(echo-point)  प्वाईंट कहते हैं -पारिस्थितिकी वाला इको नहीं बल्कि अनुगूंज वाला इको . यहाँ भी एक विशाल गहरी खायीं हैं जिसके उस पार के पहाडी काफी ऊँची है -यहाँ से आवाज लगाने पर प्रतिध्वनि बिना गुणवत्ता में खराबी के वापस लौटती है -ध्वनि के इस अनुगूंज का आनन्द उठाने लोग आते रहते हैं . हमने भी खूब चीख पुकार मचाई -कई ब्लागरों का नाम लेकर पुकारा और प्रतिध्वनि सुनी? काश एक का नाम वहीं गुम हो गया होता सदा सदा के लिए :-) मगर नहीं मेरी आशाओं को धता बताते हुए वह नाम उतनी ही तेजी से मेरी ओर लपकता हुआ बार बार वापस आया ! यह ध्वन्यात्मक खेल ज्यादा देर नहीं चला और जल्दी ही इसमें रूचि ख़त्म होने को  आयी . अब भूख भी लग आयी थी .हम वापस डांक बगले की ओर  लौटने लगे .
इको(echo-point)

रास्ते में अब तक अनदेखी एक प्यारी सी चिड़िया दिखी . पहले तो वह तीतरनुमा दिखी मगर फिर फुर्र से उड़कर काफी ऊंचाई पर पहुँच गयी -उड़ते वक्त दिखा कि वह जोड़े में थी -तीतर को इतना ऊपर अमूमन उड़ते मैंने नहीं देखा था . इसलिए इस चिड़िया को लेकर जिज्ञासा बढ़ चली . बिटिया ने उड़ने से ठीक पहले जीप के बंद शीशे से ही एक तस्वीर उतार ली थी .आप क्या इस चिड़िया को पहचानने में मेरी मदद करेगें? पेंडुकी/घुघूती /फाख्ता? नहीं नहीं यह तो चेस्ट नेट बेलीड सैंड ग्राउज( भात तीतर ) निकली -थैंक्स सालिम अली ,थैंक्स गूगल!

   कौन सी चिड़िया?   
जीप आगे बढी तो ठीक बीच रास्ते एक गीदड़ साहब आराम फरमाते मिले -हमने उनकी आरामतलबी में खलल डाल दिया था . वे बहुत अलसाए से उठे तो मगर बीच रास्ते ही ठस हो गए -हमारे मुंह से बरबस ही निकल पड़ा बड़ा ढीठ सियार है यह तो! बिटिया को भी फोटो उतारनी थी सो जीप रुकी और उसने इत्मीनान से फोटो उतारने का वक्त दिया -फिर मानो यह मंशा थी  उसकी कि भाई फोटो सोटो  तो उतार ली, अब रास्ता नापो -मगर हमें तो उसी रास्ते से आगे जाना था .लिहाजा कुछ देर की जिच के बाद वे खरामा खरामा  रास्ते से हट के किनारे लग लिए .
 श्रृंगाल सर!

डांक बंगले पर पहुँचने के पहले एक म्यूजियम भी देखा गया -प्राकृतिक चित्रण केंद्र . मतलब नेचुरल हिस्ट्री कलेक्शन सेंटर -यहाँ कुछ दुर्लभ वन्य जीवन के चित्र और मृत जानवरों के संरक्षित अवशेष आदि दिखे -कांसेप्ट तो बहुत अच्छा था मगर इसका विकास उस तरीके से नहीं हो पाया जो इसके संस्थापक की सोच रही होगी -सरकारी सेवाओं में लीक से हट कर कल्पनाशील और सुरुचिपूर्णता लिए कम ही आफीसर होते  हैं . 
 विजिटर्स बुक में भी अपने विचार दर्ज कर दिए ताकि सनद रहे
इस वन्य विहार को व्यावसायिक पर्यटन के एक आकर्षक केंद्र में बदला जा सकता है -प्रवेश शुल्क भी लगाया जा सकता है -एक साथ इतने मनोरंजन के स्थल को संजोये यह वन क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है . एक बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति ही इसे इस दुर्दशा से उबार सकती है . या तो इसे निजी प्रबंधकों को ही सौंप देना चाहिए  . डांक बंगले में हम वन विभाग के स्थानीय सद्भाव,शिष्टाचार से सेवित हुए और धन्यवाद ज्ञापन किया . आज की हमारी सफारी पूरी हो गयी थी . अब हमें सांस्कृतिक पर्यटन पर विन्ध्याचल पहाड़ियों पर पहुंचना था तो हमने कैमूर पर्वत श्रृंखला को टा टा बाय बाय कहा और आगे चल पड़े .

27 टिप्‍पणियां:

  1. सर सियार वाकई में डटे हुए लग रहे हैं. चिड़िया की तस्वीर थोड़ी दूर से ली हुए है इसलिए ठीक से पता नहीं चल पा रहा. विन्ध्याचल पहाड़ियों के अनुभवों का इंतज़ार रहेगा.

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  2. For a larger view please visit Facebook( https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200844515172544&set=a.2133874383791.2135089.1153981790&type=1&theater )

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  3. यात्रा विवरण रोचक है।
    हमें भी तीतर लग रहा है
    .
    .गुरुमाता को प्रणाम ।

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  4. बच्चों को स्नेह भी बोलिए अकेले गुरुमाता ही ही नहीं हैं यहाँ -बैड मैनर्स :-(

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    1. आपका शिष्यत्व आसान नहीं है भाई जी :))
      और शिष्य भी तगड़ा है !

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  5. यात्रा वृत्तान्त बहुत रोचक चल रहा है जिज्ञासा बनी रहती है ....
    कबूतर प्रजाति का ही पक्षी लगता है....
    धन्यवाद सर.....

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    1. हमें भी यही भ्रम था मगर पास से देखने पर यह फाख्ता/ पेंडुकी /डव /घुघूती दिखी मगर एक अलग प्रजाति -घर लौट के सालिम अली को कंसल्ट किये तो पता लगा कि यह फाख्ता की अलग प्रजाति रिंग डव ??है मैंने पहली बार देखी -

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    2. नहीं नहीं यह तो चेस्ट नेट बेलीड सैंड ग्राउज निकली -थैंक्स सालिम अली ,थैंक्स गूगल !
      http://www.visualquotient.net/index.php/chestnut-bellied-sandgrouse-male/

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  6. पुनश्च;---प्राकृतिक सोंदर्य के धनी इस देश में अपनी धरोहरों के लिए कोई चिंता नहीं कोई योजना नहीं .चाहे वह पुरातत्व हों या पर्यटन से सम्बंधित .......यही विडंबना है इस देश की .....हममे से ही कुछ
    इन्हें हानि पहुंचाने से भी नहीं चूकते ,कभी-कभी तो....

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  7. कर्नाटक का मॉडल बड़ा ही दमदार लगा, उस पर लिख रहा हूँ।

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  8. बहुत कुछ है भारत में प्राकृतिक जिसे पर्यटन के लिए अनुकूल बनाया जा सकता है..पर..
    रोचक रही यात्रा.

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  9. @ काश एक का नाम वहीं गुम हो गया होता सदा सदा के लिए :-) मगर नहीं मेरी आशाओं को धता बताते हुए वह नाम उतनी ही तेजी से मेरी ओर लपकता हुआ पहुंचा!

    यह अवश्य गुरु घंटाल ही होंगे :))
    जिन्होंने आपका साथ न छोड़ने की कसम खा रखी है डॉ अरविन्द मिश्र !!

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  10. बहुत बढ़िया श्रीमान, बिटिया,बेटा,पत्‍नी संग आपको देख ईश्‍वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि आप लोग ऐसे ही खुशहाल रहें। बहुत बढ़िया।

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    1. इस भावपूर्ण शुभकामना के बहुत बहुत आभार! Vikesh Badola JI

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  11. श्रृंगाल सर के दर्शन पाकर धन्य हुए :)

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  12. रोचक वृतांत ... ऐसे प्राकृतिक स्थलों पर जाना ही चाहिए ....
    ये पक्षी तीतर ही लग रहा है

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  13. यह सब पढकर मुझे अपनी अम्मा की सुनायी हे सारी बातें याद आने लगती हैं और कुछ आँखों देखी जगहें रिवाइंड होने लगती हैं.. और फिर आपका वर्णन होता भी तो जीवंत है!!
    आभार पंडित जी!!

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  14. इको पॉइंट'से आवाज़ वापस आती ही है यह जानते बूझते आप दोस्तों के नाम के साथ उन नाम की आवाज़ें लगाते रहे!साबित होता है ..दुश्मनी करते हैं तो वो भी शिद्दत से कि उन्हें भी दोस्तों सा याद रखा करते हैं!
    यह शृंखला यहाँ समाप्त हुई ,अभी तो नदी की कहानी जानना बाकि है.
    ......
    आश्चर्य नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश में रहने वाले कुछ लोग तो सोनभद्र के नाम से ही वाकिफ नहीं है ..यहाँ के पर्यटन स्थल का ज्ञान होने की तो बात ही अलग है.प्रचार ही नहीं सही ढंग से तो यहाँ आएगा कौन..आएगा नहीं तो देखरेख/मेटेनेंस काहे करेंगे?

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  15. अच्छा रहा आपका ये यात्रा वृतांत।
    इस तरह किसी ब्लोगर को वहीँ खड्डे में धकेल कर आ जाना अच्छी बात नहीं। हम जैसों पर तो कृपा ही रखियेगा, बाल-बच्चेदार हैं हम :)

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  16. परिवार के साथ खूबसूरत वादियों में भी आपको धकियाने वाले ब्लॉगर याद आते हैं ...भेरी बैड !
    मनोरम दृश्यों का बेतकल्लुफ विवरण रोचक है !

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  17. लगातार बढ़िया संस्मरण रोचक शैली में सुना रहें हैं आप .पारिवारिक झलकियों के संग .

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  18. एेसा बिरले ही होता है कि नौकरी के दौरान आप एक पर्यटक के से जीवन का आनंद भी ले पाते हैं. पर यह समय बहुत तेज़ी से बीत जाता है.

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  19. अति सुंदर। आपकी यात्रा का आनंद आ गया।

    पर दुनिया में आपकी तरह सच्‍चे और ईमानदार लोगों की कमी नहीं। इसीलिए तो बंदे को कहना पड रहा है कि खुसदीप भाई, आप सफेद झूठ बोल रहे हो।

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  20. आपका ये अविस्मरणीय क्षण अनुगुंजित हो रहा है..

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  21. सुन्दर चित्रों ने यात्रा को रंगीन बना दिया बच्चे संग बिताया खुबसूरत पल ...

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