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रविवार, 18 जनवरी 2015

पी के-अपने पूर्वाग्रहों को हाल के बाहर ही छोड़ आएं!

1  सितम्बर 2012 को बनारस से ट्रांसफर होकर जब से सोनभद्र आया नए स्थान की कटु कुटिल चुनौतियों से जूझते हुए और नयी परिस्थितियों में खुद को ढालते हुए समय कुछ ऐसा बीता कि मनपसंद कई बातें, कई शौक बिसरा बैठे। यहाँ तक कि कोई फिल्म भी नहीं देख पाये। अब कहाँ बनारस के माल में फिल्म देखने का एम्बिएंस और कहाँ यहाँ सोनभद्र के कस्बाई मुख्यालय  रॉबर्ट्सगंज के जजर्र सिनेमाघर! जाने की हिम्मत भी नहीं जुटी। और मुझे यह भी नहीं लगा कि वहां "इज़्ज़तदार आदमी"(!)  को देखने वाली वाली फिल्मे भी लगती होंगी। इस  बीच कितनी अच्छी अच्छी फ़िल्में आईं और चली गयीं।  मन मसोसता रहा और फिल्मों के  दीवाने अपने एक प्रिय सर को कनविंस करने का असफल प्रयास भी कि सर मैं इन कारणों से फिल्म नहीं देख पा रहा।  
मगर जब पी के की चर्चा और उस पर मचे हो हल्ले की खबर सुनायी पड़ने लगी तो संकल्प किया कि इसे देखनी है और वह भी बनारस चल के।  इसमें एक अंतरिक्ष वासी के धरती पर आने और यहाँ के हालात से जूझने के कथानक ने भी आकर्षित किया। मैं इस फिल्म को इस नज़रिये से भी देखना चाहता था कि क्या   यह साइंस फिक्शन के फ्रेम में आ सकती है?बहरहाल कल वह सुदिन आ गया और हम मियाँ बीबी फिल्म बनारस के आई पी माल में देख ही आये. 
ठीक ठाक फिल्म है। थीम धार्मिक पाखंड है।  मगर कई और भी संकेत हैं।  कहानी को बंम्बईया चाशनी में लपेटा गया है -प्रेम सीन है ,धमाका है ,विछोह है ,फैमिली ड्रामा है।  यह सब कोई नया नहीं है।  और धर्म के पाखण्ड पर कटाक्ष करने के मामले में भी यह फिल्म कोई नयी नहीं है।  बस नया है तो एक एलियन का नज़रिया।  सुदूर अंतरिक्ष से धरती पर शोध करने आया शोधार्थी असहज स्थितियों में एक सर्वथा अजनबी संस्कृति से साक्षात्कार करता है। मैं जैसे सोनभद्र आकर अपने शौक भूल गया वैसे ही बिचारे के साथ आते ही  एक ऐसी त्रासदी हुयी कि उसे अपना मकसद ही भूलना पड़ा।  उसका वह यंत्र  उससे छीन लिया गया जिससे उसे यान को वापस बुलाना था।  अब घबराहट और घर जाने की फ़िक्र में कोई शोध ठीक से भला कैसे हो पाता।  अगर एक एलियन की निगाहों से आप इस फिल्म को देखे तो आनंद आएगा -अपने पूर्वाग्रहों को हाल के बाहर के स्ट्रांग रूम  में जमा कर दें! 
ईश्वर सार्वभौम नहीं है।  केवल धरती पर है। धर्म केवल धरती पर है। संस्कृति  धरती पर है।कम से कम ये सब एलियन की धरती पर तो जैसे यहाँ हैं वैसा नहीं है।  और फिर धर्म को लेकर फैले पाखंड का जो अतार्किक  स्वरुप एक एलियन की नज़र देखती है उससे वह स्तब्ध और भ्रमित हो रहता है. मजे की बात तो यह है कि धर्म के जिस पाखंड पर फिल्म चोट करती है बिल्कुल उसी की पुनरावृत्ति इस फिल्म को लेकर मूर्खजन करते हैं और हास्य का पात्र बनते हैं। और तो और स्वामी रामदेव जी भी इस फिल्म को लेकर आक्रामक हो गए थे संभवतः बिना देखे ही।  फिल्म ने विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के पाखंड पर चोट की है और उनके अतार्किक अंतर्विरोधों को दिखाया है।  एक एलियन के साथ धरतीवासियों का इनट्रैक्शन रोचक है -उसे पियक्कड़ समझ लिया जाता है -नाम पी के पड जाता है। 
आपमे जायदातर लोगों  फिल्म अब तक देख ली होगी सो कहानी बताने की जरुरत नहीं।  धर्म की प्रासंगिकता को लेकर चुटीले और सार्थक संवाद हैं।  धर्म और पाखंड के अंतर को बताने का प्रयास है -मगर थीम कोई नयी नहीं।  ओह माई गाड़ इसी अधिक प्रभावशाली तरीके से विषय को रखती है।  इसमें कई फूहड़ कॉमेडी है जो कुछ ख़ास तरह के दर्शकों को ज्यादा भाएगी।  जैसे बच्चों और महिलाओं को और कुछ दृश्य उन्हें असहज भी करेगें। हाल की खिलखिलाहट और स्तब्धता से भी  मैंने यही समझा।  

अब यह फिल्म विज्ञान  कथा की श्रेणी में रखी जा सकती है या नहीं ? विचार विमर्श फेसबुक पर चल रहा है।  हाँ थोड़े से दृश्य और कोण  फिल्म में जरा हट के और डाल दिए गए होते तो यह शर्तिया मुख्यधारा की साइंस फिक्शन कही जा सकती थी -अभी तो थोड़ा हिचकिचाहट सी है। काश निदेशक ने मुझसे संपर्क किया होता? :-) मुझे अपनी लिखी पहली विज्ञान कथा गुरुदक्षिणा की याद ज़ीशान ने दिलाई और कहा कि फिल्म तो शुरू में आपकी कहानी सी लगती है।ना ना मैं निदेशक या फिल्म राईटर पर कोई आक्षेप नहीं लगा रहा हूँ :-) 

शनिवार, 25 अगस्त 2012

फुल इंटरटेनमेंट पैकेज 'प्रीक्वेल' फिलम 'एक था टाईगर'


एक रूमानी अहसास है यह फिल्म. प्यार होना कतई कोई टेढ़ी खीर नहीं है .यह सरे राह चलते चलते ऐसे ही यूं भी /ही हो जाता है ...केवल एक छोटी सी चहलकदमी साथ साथ और टाईगर (सलमान खान ) तथा जोया (कटरीना कैफ ) एक दूसरे को दिल दे बैठे ...दर्शकों को यह रील पर नहीं सहजता से घटता प्रसंग लगता है और शायद इसके लिए उन्हें दोनों सितारों की नजदीकियों की ख़बरों के द्वारा कंडीशन किया जाता रहा है .दोनो किरदार अपने अपने देशों (भारत पाकिस्तान ) की मानी जानी ख़ुफ़िया एजेंसियों  के नुमायिंदे हैं -रा और आई एस आई ...पहले इस बात से बेखबर ..अब प्यार तो दीवाना है, पगला है यह सब कहाँ देखता है ...."साले टाईगर को एक पाकिस्तानी जासूस ही मिली थी प्यार करने को " यह तात्क्षणिक उदगार होते हैं रा के मुखिया के ......दोनो अपने अपने देश -दायित्वों को छोड़ भाग चलते हैं .....और आज तक भाग ही रहे हैं ..देश दर देश शहर दर शहर .....और दोनो देशों की  ख़ुफ़िया एजेंसियां उनके पीछे पडी हैं ..फिल्म का यह अंतहीन अंत निश्चिय ही इसके सीक्वेल को प्लान करके गढ़ा गया है हालांकि निर्माता निर्देशक इस संभावना से इन्कार कर रहे हैं ..

फिल्म के लोकेशन,चित्रांकन लाजवाब है ... कटरीना बला की खूबसूरत लगी हैं और अब तो उन्हें अदाकारी भी आ गयी है -उनके चेहरे के भाव कहानी की मांग को एकदम सटीक तरीके से पूरा करते हैं ..उनके कई स्टंट सीन लगता तो नहीं कि उन्होंने किये होंगे मगर फिल्म देखते वक्त यह भी नहीं लगता कि उन्होंने नहीं किये होंगे ...और मार धाढ और विध्वंस के सीन भी बहुत जीवंत हैं और हालीवुड फिल्मों की प्रतीति कराते हैं...रोमांटिक दृश्य बहुत ही सहज और साफ़ सुथरे और दिल को छू लेने वाले हैं ....एक दृश्य में टाईगर जोया को उल्कों की बरसात(मीटियार शावर)  का दृश्य दिखाता  है जो  बहुत ही नयनाभिराम है . फिल्म के एक प्रोफ़ेसर का किरदार यद्यपि अल्पावधि  के लिए है मगर प्रोफ़ेसर -स्टीरियोटाईप के बहु प्रचारित जुमले को बारीकी से  दृश्यांकित करते हैं .......
फिल्म की कहानी नहीं बता रहा क्योकि  अपनी ओर से यह सिफारिश है आप यह फिलम  देख सकते हैं ...पारिवारिक फिल्म है -बच्चों कच्चों के साथ किसी दिन थियेटर- माल में जाने का पूरा मौका है ....और कहानी में भी रुमान का रंग छाया हुआ है और मार धाड, धर -पकड़ की तो पूरी ग़दर ही मची है फिल्म में ..पहला हाफ तो इतना कसा हुआ है कि इंटरवल होने पर दर्शक चौकते हैं ...हाँ इंटरवल के बाद बस कुछ मिनटों के लिए कहीं कहीं फिल्म झोल खाती है मगर फिर तुरत फुरत संभलती भी है ....गाने मुझे तो कोई नहीं भाए..मगर इस तरह के फिल्मों में गाने वाने ज्यादा मायने नहीं रखते ....थ्रिलर और लव स्टोरी का उम्दा ब्लेंड है यह फिल्म ....प्रेम महिमामंडित हुआ है -देश और फर्ज भी प्रेम के आगे कुर्बान है -यह मुद्दा तनिक विचारणीय तो है मगर यह फिल्म है भाई -हकीकत नहीं और हकीकत में भी तो क्या इससे कम हुआ है कभी -फिल्म ने बड़ी चतुराई से दोनो देशों के कुछ हवा में तैरते ऐसे ही एकाध किस्से को थीम बनाया है जो कुछ समय पहले सुर्खियों में थे -एक पाकिस्तानी नागरिक ऐसी ही फ़रियाद लेकर भारत में दर दर भटक रही थी .....
फिल्म के मुताबिक़ जासूसी  दुनिया के असली किरदारों के बीच बहुत कुछ ऐसा घटता है जो चर्चा का विषय नहीं बनता ...रा के कौन लोग हैं और आई एस आई के कौन चेहरे हैं हम कहाँ देख पाते हैं? जबकि वे अपने आस पास ही किसी न किसी नागरिक -पड़ोसी, पात्रों के रूप में मौजूद होते हैं -हाँ उनकी एक अलग दुनिया है जो हमें नहीं दिखती जिसके बस एक पहलू को इस फिल्म के जरिये उजागर किया गया है ......तो कब देख रहे हैं सपरिवार यह फिल्म आप? वैसे तो मैंने अकेले ही निपटा दी है ...मगर घर की फरमाईश बनी हुयी है ..अब सलमान के फैन घर घर हैं न ..और हर उम्र के भी :-( इस बात की भी फिल्म में चुटकी ली गयी है .....और सलमान ने अब तक शादी क्यों नहीं की इसकी भी .......

रविवार, 8 जुलाई 2012

गैंग्स आफ वासेपुर देखने जाना हो या न जाना हो, यह पढ़ जरुर लीजिये!

हिन्दी फिल्मों में एक  ट्रेंड तेजी से अब स्थायी रूप लेता जा रहा है -वह है गालियों का खुल्लमखुला प्रयोग ,तेरी माँ की..... ,बहन**,मादर**.भो*****,गाँ*, ला*, झा*...  सारी पूर्वी गालियाँ अब बालीवुड के जरिये जगजाहिर हो रही हैं! मगर जब अनावश्यक रूप से इन भदेस गालियों का बात बात पर बिना बात  के भी इस्तेमाल होगा तो वे वैसी     सम्प्रेषणीयता या  हास्य मूलकता खो देगीं जैसा कि पीपली लाईव की कुल जमा एक दो गालियों की थी.या नो वन किल्ड जेसिका की माहिला पात्रों से दिलवाई बेलौस गालियाँ . . तबसे तो मानो फिल्मों में गालियों का एक धडल्ला प्रचलन ही चल चुका है. गैंग्स आफ वासेपुर अपनी मौके बेमौके की गालियों के चलते सन्नाम हो रही है..यह सही है कि कभी कभार तो रियल ज़िंदगी के पात्र भी गालियाँ बूकते हैं मगर इतना नहीं जितना निर्देशक अनुराग कश्यप इस फिल्म में हर रहीम शहीम पात्र से बोलवाते चलते हैं..इस फिल्म में गालियाँ मानो  पात्रों की संवाद अदायगी की टेक सी बन गयी हों -हाँ कहीं कहीं पर वे सहज भी लगी है और वहां दर्शकों के ठहाके भी गूजे हैं! 


हाल में घुसते ही देखा कि दर्शकों की अच्छी खासी भीड़ है . बाक्स आफिस पर फिल्म अपना सिक्का जमा चुकी है .तो क्या यह भीड़ केवल गालियाँ सुनने वालों की है?नहीं यह भीड़ अपने ही बीच के  एक अंधेरी हकीकत को परदे पर भी देखने को आतुर है .जहाँ रोशनी नहीं है केवल रात ही रात है -जरायम है,सेक्स है ,खून खराबा है ,जुगुप्सा है, दहशत है और मजे की बात कि ज़िंदकी की धड़कने तब भी वहां बदस्तूर कायम है . दृश्यों का फिल्मांकन जबर्दस्त हुआ है -फिल्म के अनुसार वासेपुर झारखंड का एक वास्तविक गाँव है जहाँ दो गुटों का प्रतिशोध ,खून खराबा -गैंगवार पुश्तनी है .ताज्जुब है यह गैंगवार दो मुस्लिम गुटों के बीच है -अरे सिया सुन्नी नहीं बल्कि कुरेशी (कसाई) और खान समुदायों के बीच में मचा घमासान  जिसमें राजनीति  भी घुसपैठिया  है. अब कसाईयों की बस्ती है तो जगह जगह कटे जानवरों के भयानक दृश्य वितृष्णा /जुगुप्सा उत्पन्न करते हैं जो बहुत लोगों को आपत्तिजनक लग सकते हैं . 
कहानी एक लबे कालक्रम के फलक पर चलती है जिसमें गुलाम भारत से लेकर स्वतंत्र भारत और आज तक कहानी की निरंतरता बनाए रखने के लिए  निदेशक को काफी मशक्कत करनी पडी है -धनबाद कोयला खदान -माफिया फिर ट्रेंड यूनियनों की दादागीरी ,अंग्रेजों के बाद खदानों पर स्थानीय दबंगों का कब्ज़ा, फिर इस्पात -स्क्रैप का धंधा और काफी बाद में माफिया गैंगों द्वारा मछली -व्यवसाय के हथियाने के दंद फंद फिल्म की थीम है .इन्ही में कितनी हत्याएं हुयी हैं ,ताबड़तोड़ गोलियां और बम चले हैं -लाशों पर लाशें बिछती गयीं है -एक चालबाज नेता कसाईयों को अपने प्रतिशोध के लिए इस्तेमाल करता चलता है . और अंत में उनका भी खात्मा करवाता है . दरअसल इसी दृश्य से फिल्म की स्तब्धकारी शुरुआत होती है और सारी फिल्म फ्लैशबैक में चलती है .नैरेशन और डाक्यूमेंट्री शैली के सहारे. बीच बीच में पूर्वांचल के देशी गीत गवनई की भी रह रह कर छौंक है . कहीं कहीं इससे संवाद आदायगी को सुनाने में भी खलल पड़ती है .

फिल्म के पात्रों के चरित्र चित्रण पर काफी मेहनत की गयी है  . मुख्य पात्र सरदार की भूमिका में मनोज वाजपेयी एक वहशी ,कुछ  मनोरोगी   ,नारी देह के दीवाने और क्रूर निर्मम  हत्यारे के मिश्रित चरित्र के निर्वाह में जी जान से लगे दिखते हैं .फिल्म के नारी पात्र अनुराग कश्यप की फंतासी की 'ख़ास च्वाईस' लगती हैं ....अपने पति की नारी देह की भूख की चारित्रिक वृत्ति को स्वीकार करती हुयी सरदार की पत्नी उसे मछली का एक अतिरिक्त मुंडा खाने को देती हुयी यह फिकरा /ताना भी कसती है कि 'ठीक से खाया करो .... उसके सामने कहीं  बेईज्जती मत करवा बैठना" जबकि सरदार की फिलासफी यह है कि पुरुष जितनी नारियों को उपकृत करता है कम से कम उतने परिवार का भरण पोषण तो होता रहता है . एक बंगालन बेसहारा हिन्दू लडकी के पीछे पड़कर सरदार का  कामुक हाव भाव प्रदर्शन अभिनेता में ऐसे पात्र मानो प्रविष्ट कर देता है -अभिनेता और पात्र का चरित्र  यकसां  हो जाते हैं -लाजवाब अभिनय! .उधर अभिनेत्री भी कुछ कम नहीं है -लगता है दोनों पात्र एक दूसरे को फंसाते है -एक को सहारा चाहिए और एक को काम पिपासा का अहर्निश शमन ....इस नयी नारी पात्र के चलते सरदार कुछ समय के लिए अपना परिवार भी छोड़ देता है . सरदार के बाद उसके दोनों बेटे भी लड़की पटाने और उनको व्याहने का हुनर बदस्तूर जारी रखते हैं . नारी पात्रों के चयन और उनके प्रति पुरुष फंतासियों को सेल्यूलायड पर उतारना तो कोई अनुराग से सीखे .
मैं पशोपेश में हूँ -फिल्म के लिए रिकमेंड करूँ या न करूँ -फिल्म की सिलसिलेवार कहानी मैं इसलिए  बताता नहीं कि आप का मजा किरकिरा न हो और आप अपना खुद का निर्णय ले सकें ....मगर हाँ अगर आप को हिंसा ,गाली गलौज और खुद अपनी ही धरती-देश काल में  पर  गन्दगी,फूहड़ता पसंद नहीं तो मत जाईये देखने .....और हाँ यह भी न पूछिए कितना स्टार मेरी ओर से इस फिल्म को मिल सकता है  .....मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ .....हाँ तीन के ऊपर तो किसी कीमत पर नहीं.. अभी यह फिल्म का पहला पार्ट है -पार्ट टू अगस्त में आने वाली हैं जिसकी कुछ झलकियाँ बतौर प्रोमो इस फिल्म के आखीर में है ...और उसे देखने के लोभ में दर्शकों को हाल से निकलते निकलते सहसा खड़े होकर काफी देर तक प्रोमो -दृश्यों को देखना दर्शकों को नागवार लगता है. 

शुक्रवार, 29 जून 2012

आज जाकर देख पाया राऊडी राठौर


यह तय ही नहीं हो पा रहा था कि फिल्म कैसी है -कुछ लोग ठीक ठाक बता रहे थे तो कुछ बिलकुल कूड़ा .तभी यह भी मालूम हुआ कि फिल्म तो करोडो का कारोबार कर चुकी है .आखिर मैंने भी फिल्म को देखने का जुगाड़ कर लिया .अभी अभी लौटा हूँ .समीक्षा लायक तो कुछ है नहीं .मगर हमेशा यह विचार रहता है दूसरों का कीमती समय और पैसा बचे  तो कुछ पुण्य मेरी झोली में आ जाय . तो मत जायिये इसे देखने जबकि और बेहतर विकल्प मौजूद हैं .
 इस फिल्म में आकर्षण का एक कारण सोनाक्षी सिन्हा हैं और यह सच है -वे और एकमात्र वे ही इस फिल्म को देखने का वैलिड और सॉलिड रीजन हैं ...वे सम्पूर्ण और सर्वांग दर्शनीय हैं (संजय मो सम कौन यह वाक्य लिखते सहसा आपकी याद आयी :-) उनकी अदाएं भी सीधे दिल पर आती हैं और कम से कम हम पूर्वांचलियों के सौन्दर्य बोध के हिसाब से  बिल्कुल टंच हैं .इस फिल्म में भी उनके लटके झटके ..बलखाती कमर और मटकाते कूल्हे हैं . मगर दबंग के मुकाबले कमजोर दिखी हैं -शायद अक्षय कुमार के साथ केमिस्ट्री न बैठा पाने का मामला हो ....या फिर सौन्दर्य के उपभोक्ताओं पर भी ला आफ डिमिनिशिंग रिटर्न का प्रभाव होता हो ..
फिर भी अगर सोनाक्षी के लिए जाना चाहते हैं जाईये ....और उन पर आपका फिक्सेशन नहीं है तो दूसरी तीसरी फिल्म देखिये .अक्षयकुमार का डबल रोल है -जबरदस्त स्टंट  है ,मार धाड़ है और कल्पना को भी धता बताते दृश्य हैं .पटना के माफिया से भिडंत है मगर फिल्म रियल्टी के बजाय रील में ही कैद होकर रह गयी .....पटना के डान माफिया पर एक से एक यथार्थ फ़िल्में  आ चुकी हैं .हाँ एकाध दृश्य जरुर भव्य और कलापूर्ण बन उठे हैं जैसे दशमी के अवसर पर दशानन के पुतले के पीछे से अकस्मात माफिया डान का प्रगट हो जाना .
 हेराफेरी के बाद लगातार अक्षय अपनी हास्य भूमिकाओं में वह नकली मगर सहज मासूमियत नहीं ला पा रहे हैं जो दर्शकों को बरबस हंसा देती है . यहाँ इसलिए वे एक हलके फुल्के हंसोड़ की भूमिका में हैं तो दूसरे कड़क पुलिस आफिसर -राऊडी राठौर के रूप में - राऊडी का डिक्शनरी अर्थ उपद्रवी ,हुल्लड़बाज ,दंगाई या गुंडा है और फिल्म में इस अर्थ के साथ ही इंस्पेक्टर राठौर को हिम्मती मौत से पंगा लेने वाला दिखाया गया है.कड़क राऊडी भूमिका में अक्षय बेहतर दिखे हैं .

मैं दो स्टार दे रहा हूँ और यह किसलिए संजय मो सम भाई तो कम से कम समझ ही जायेगें! 

शुक्रवार, 11 मई 2012

दशक के शुरुआत की एक श्रेष्ठ फिल्म -विकी डोनर


विकी डोनर फिल्म की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है .पहली बार एक ऐसी बालीवुड मूवी देखने का  सौभाग्य मिला है जो भारत की सांस्कृतिक समृद्धता वाले परिवेश में एक वैज्ञानिक नज़रिए को स्थापित करने की  जद्दोजेहद करती नज़र आयी और अपने मकसद में सफल होती हुयी भी लगी और वह भी बिना दर्शकों को मिलने वाले फ़िल्मी मनोरंजन से समझौते किये हुए . मुझे लगता है यह इस नए दशक के शुरुआत की एक बहुत अच्छी मनोरंजक ,समाजोपयोगी फिल्म है जिसकी चर्चा लम्बे समय तक होती रहेगी . 

नियोग के जरिये गर्भधारण की एक प्राचीन पद्धति रही है जिसे कतिपय दिखावटी अनुष्ठानों की आड़ में वीर्यदान के जरिये ऋषि मुनि संपादित करते रहे .हमारे रामायण काल और महाभारत काल के कई चरित्र /पात्र इसी विधि से जन्में थे .आज वैज्ञानिकों ने उसी तकनीक को इन विट्रो फर्टीलायिजेशन के रूप में आम जन के उपयोगार्थ ला दिया है . और उन दम्पत्तियों के लिए जो निःसंतान हैं के लिए यह तकनीक वरदान है .मगर इसकी सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर अभी भी कई तरह के संकोच और अवरोध हैं .अब इन क्लीनिकों को चलाने के लिए वीर्य चाहिए -और चाहिए वीर्य डोनर ... मगर वीर्यदान आज भी हमारे समाज में कहाँ प्रचलन में है? . नेत्रदान ,रक्तदान आदि तो फिर भी ठीक है मगर वीर्यदान ....न बाबा न यह तो घृणित कार्य है ,फिल्म इसी सोच को बदलने के लिए उद्यत है .


हम आपको कहानी नहीं बताने जा रहे .बस इतना बता दें कि एक नवयुवा किस तरह स्पर्म डोनर बनता है -विकी डोनर ....और कैसे उसका परिवार सामाजिक निंदा का दंश झेलता है -कैसे वैवाहिक जीवन भी संकट में आ जाता है और फिर कैसे वह इन सभी स्थितियों से उबरता है- यह सब देखते हुए दर्शक  अपने को फिल्म से पूरी तरह बंधा हुआ पाता है.एक ऐसी ही दिल्ली स्थित क्लिनिक के  संचालक डॉ. चड्ढा किस तरह से वीर्यदान से जुडी सामाजिक असहमतियों को पूरे संकल्प के साथ दूर करते नज़र आते हैं यह फ़िल्म का एक प्रभावपूर्ण पक्ष है . 

विकी डोनर की सद्य परिणीता पत्नी भी जब अपने पति के स्पर्म डोनर की बात पता लगते ही उससे विमुख हो जाती है तो कहानी एक संवेदनशील मोड़ पर पहुँच जाती है ..एक पढी लिखी माडर्न औरत के भी ख़याल आधुनिक नहीं है -उसके बंगाली पिता उसे सही तरह से शिक्षित करते हैं ,जानकारी देते हैं .फिल्म काफी इमोशनली चार्ज्ड भी है ..विकी डोनर की पत्नी खुद गर्भधारण न कर पाने की अक्षमता की जानकारी होने पर आहत हो जाती है,और तभी उसे पता लगता है कि उसका पति तो स्पर्म डोनर रहा है और कितने ही कोखों को वह आबाद कर चुका  है -छिः यह काम ? और इससे भी बढ़कर उसके अहम को चोट भी कि एक वह है जो बच्चे पैदा नहीं कर सकती और दूसरी ओर उसका पति कितनी कोखों को भर चुका  है .वह प्रत्यक्ष  रूप से यह कहकर कि उसके पति द्वारा यह बात छुपाने के कारण वह उसका साथ छोड़ रही है ,वापस अपने पिता के घर आ जाती है -मगर उसका पिता यह पूछता है कि -" तुम्हे बुरा क्या लगा ...उसका स्पर्म डोनर होना या यह बात छुपाना या उसमें कमीं न होकर कमी तुम्हारे में होना " .यह सीन बहुत  टची है. 

फिल्म का अंत सुखद है क्योकि विकी डोनर के ही स्पर्म से उत्पन्न एक बच्ची  के माता पिता के एक्सीडेंट में मर जाने के कारण  उसे ही यह नायक -नायिका दंपत्ति गोद लेता है . सभी ने बेमिसाल अभिनय किया है . फिल्म भारत के सांस्कृतिक दूरियों, टकराहटों को भी हंसी मजाक के जरिये इंगित करती है ...कैसे एक पंजाबी अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ समझता है तो कैसे एक बंगाली अपने सामने किसी को कुछ आंकता नहीं ...मगर तमाम सांस्कृतिक असहमतियों , अलगावों और बेमेलता के बाद भी आम भारतीय किस तरह  हैपी इंडिंग तक जा पहुँचता है यह देखने इस हंसी मजाक की  किन्तु वैज्ञानिक भावना से भरी  फिल्म को जरुर देखें -एकाध दृश्य थोडा अनुचित से हैं मगर फिर भी यह परिवार के साथ देखी जा सकती है -मैंने पत्नी और मां के साथ यह फिल्म देखी.....पूरे  पांच स्टार ...


सोमवार, 23 अप्रैल 2012

हेट स्टोरी -एक "पर्दाफाश" फिल्म!

हेट स्टोरी एक 'पर्दाफाश फिल्म' है- जिस्म फरोशी ही नहीं यह दिल्ली 'सल्तनत' की परदे के पीछे की कई  कारगुजारियों का भी पर्दाफ़ाश करती है..केवल एक इरोटिका फिल्म के रूप में इसे देखना फिल्म का अवमूल्यन है . मैंने यह फिल्म कल ही यानी तब देखी जब एक सेक्स वीडिओ की धूम फेसबुक पर मची हुयी है जिसमें  एक ऊंचे ओहदे पर नियुक्ति की सिफारिश लेने के लिए शरीर के सौदे का बारह मिनट का पूरा एक्सपोजर है . इस पृष्ठभूमि में अचानक ही मुझे यह फिल्म जंच गयी -यह वह सब कुछ एक्सपोज करती है - सत्ता ,पावर, सेक्स,औद्योगिक घरानों और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की मिली भगत,दलाली, भारी भ्रष्टाचार ,सरकारी इमदाद की लूट ,विदेशी मदद की भारी भरकम राशि की बंदरबांट ...सब कुछ! अब एक ही फिल्म में रोचक स्टोरी ,मनोरंजन ,चुटीले संवादों के साथ यह सब भी परोस उठे तो दर्शकों के जायके में इजाफा तो होगा ही ...महज कामोद्दीपन के लिए भी इस फिल्म का एक दर्शक वर्ग है मगर फिर उस दर्शक वर्ग के लिए इस फ़िल्म से कुछ ज्यादा चाहिए होता है और उसके अनेक जुगाड़ भी हैं ...ऐसा दर्शक वर्ग इस फिल्म से संतुष्ट नहीं होगा ..इस फिल्म में बोल्ड सीन कहानी की तारतम्यता के मुताबिक़ हैं ,मांग हैं -हो सकता है कहीं कहीं ज्यादा बोल्ड  हो गए हों मगर फिल्म का हेतु वह नहीं है .

कहानी शुरू होती है एक जुनूनी युवा महिला पत्रकार काव्या कृष्णा  के द्वारा एक औद्योगिक डील  में जज को घूस देने के मामले के पर्दाफ़ाश से ..औद्योगिक घराने के उस कम्पनी का  युवा सी ई ओ सिद्धार्थ पत्रकार की इस 'हरकत' को बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसे सबक सिखाने के लिए एक न ठुकराए जा पाने वाला आफर उसके सामने रखता है ..अपनी सीमेंट कंपनी में उसे तीन गुने अधिक के वेतन पर नौकरी ....काव्या अपने दोस्त पत्रकार की अनिच्छा के बावजूद इतने आकर्षक प्रस्ताव को ठुकरा नहीं पाती ...सिद्धार्थ उसे एक सपनीली दुनियाँ में ले चल पड़ता है -महंगी घड़ी,हीरे की अंगूठी आलीशान होटल में मौज मस्ती,एक जान  छिडकने वाले मैको इमेज  बिजनेस टायकून का साथ   -फिल्म यहाँ ज्यादातर लड़कियों द्वारा  ऐसी सपनीली दुनियाँ की चाहत को इंगित करती है -ऐसे माहौल में काव्या अपने पत्रकार दोस्त जो वास्तव में उसे प्रेम करता है को भूलकर सिद्धार्थ के प्रेम पाश में बधती है और हमबिस्तर हो जाती है ..और तुरत बाद ही सिद्धार्थ उसे नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाता है -उसका फेवरिट जुमला है -"आई फक द पीपल हू फक विद मी .." असहाय स्तब्ध काव्या फिर अपनी पुरानी फुटपाथ की जिन्दगी पर लौटती है मगर अब तो उसके पास नौकरी भी नहीं है ...मगर एक संकल्प उसके मन में कौंधता है और वह प्रतिशोध की राह पर चल पड़ती है ....

फिल्म अब सिद्धार्थ और काव्या के एक दूसरे को बर्बाद कर देने के मंसूबों ,कारगुजारियों की लुकाछिपी फोकस करती है जिसमें दिल्ली दरबार के परदे के पीछे का सारा अनर्गल परत दर परत दर्शकों के सामने खुलता जाता है -औद्योगिक डील के एवज में अरबों रुपये डकारते हमारे सफेदपोश रहनुमा,नारी तन को रौंदते यौन बुभुक्षी नेता -मंत्री,हुक्मरान  लोग और बदले में बड़े पदों पर होती नियुक्ति की सिफारिशें ...ताज्जुब होता है फ़िल्में कहाँ कहाँ से ला देती हैं अन्दर की कहानी ...काव्या अपने पेट में सिद्धार्थ के ही पलते भ्रूण की बिना पर उसके बिजनेस में आधा हक़ मांगती है तो उसे अपने भ्रूण ही नहीं गर्भाशय तक से हाथ धोना पड़ता है -उसका ममत्व  छीन लिया जाता है ..वह और हिंस्र हो उठती है -शहर की सबसे बड़ी रंडी बनने की ट्रेनिंग लेती है -टाप काल गर्ल बन जाती है-एलान करती है कि 'अगर औरत खुद  अपनी इज्ज़त बेचने पर उतारू हो जाय तो किसी भी आदमी को खरीद सकती है ' ...आखिर सिद्धार्थ को गबन और धोखाधड़ी के आरोप में जेल भिजवा कर ही वह दम लेती है -भले ही दिल्ली की सबसे बड़ी प्रास्टीच्यूट का तमगा उसे मिल उठता है ... 

फिल्म का आख़िरी सीन कहानी की सहूलियत के हिसाब से है -नाटकीय है ..काव्या का मर्डर ..अंत ....एक जुझारू युवा पत्रकार का अंत ...उसका एक गलत कदम ,एक गलत निर्णय उसके सारे सपनों पर भारी पड़ा ..फ़िल्म आज के युवा वर्ग को एक गहरा सन्देश दे जाती है ......बाकी विवरण यहाँ देख सकते हैं .... एक ट्रेलर भी जो कहानी के सीक्वेंस की एक झलक  देगा ..बाकी आप देखें  या न  देखें निर्णय आपका -खासी एडल्ट फिल्म है -अब तक की बालीवुड की सबसे एडल्ट और बोल्ड .....



सोमवार, 19 मार्च 2012

ये कैसी 'कहानी' है?

बिद्दा ( विद्या बालन)  की यह नयी मूवी मैंने कुछ दिनों पहले ही देख ली थी मगर इस पर कुछ लिखने का मन नहीं हुआ ..एक साधारण सी फिल्म लगी थी मुझे. मगर ब्लागजगत और फेसबुक के ज्यादातर मित्रों ने इसे एक अच्छी फिल्म माना है और उनकी यह दावेदारी ईमानदारी से की गयी लगती है... मगर फिर भी बहुत सोचने विचारने के बाद भी मैं इसे एक साधारण फिल्म से ऊपर नहीं पाता....यही कोई दो ढायी  स्टार लायक... विद्या बालन को लेकर कई प्रचार प्रमोशन कंपेन के जरिये दरअसल लोगों को 'कंडीशन' किया जा रहा है ...और जब हम 'कहानी' को देखते होते हैं तो हमारा अवचेतन कंडीशन हुआ मन विद्या बालन की  फिल्म के बारे मे कुछ भी निषेधात्मक स्वीकार नहीं करने देता ... यह वही कंडिशनिंग ही है कि एक अन्यथा झेलाऊ फिल्म का बेड़ा बिद्दा(फिल्म में विद्या को लोग बाग़ बिद्दा  ही कहते हैं )  पार लगा गयी हैं....

फिल्म की कहानी/पटकथा  पश्चिमी सस्पेंस कथाओं से बेहद प्रभावित है ...मगर अपने देश में ,यहाँ के परिवेश और लोकेशन में ये कथायें सहज नहीं लगतीं .... अब कलकत्ता की पुलिस  कितनी उदार है ,कितनी भद्र है ..कलकत्ता ही क्यों पूरे भारत की ही, यह हम जानते हैं ..भारतीय पुलिस और सदाशयता? शिष्टाचार? यह स्काटलैंड नहीं है. मगर फिल्म की कलकतिया  पुलिस  आश्चर्यजनक तौर से बड़ी   भद्र और शिष्ट दर्शित की गयी है! उलटे केन्द्रीय आई बी का मुलाजिम बेहद अशिष्ट दर्शित हुआ है जबकि हकीकत ठीक उलट है  ..कहना यह है कि फिल्म में कम से कम यहाँ तो यथार्थ का चित्रण नहीं हो पाया ..

इधर फिल्मों में  एक चलन फिल्म की लोकेशन /पृष्ठभूमि को भी एक पात्र के रूप में प्रस्तुत करने की है -पिछले सालों की कई फिल्मों जैसे धोबीघाट इत्यादि में मुंबई को इस तरह चित्रांकित किया गया है जैसे वह शहर भी एक पात्र सरीखा हो ...यह बात यहाँ कोलकता के बारे में दुहराई गयी  है ....यानी यहाँ भी कोई नवीनता नहीं है ....कोलक़ता के बारे में जो कुछ हम जानते हैं -दुर्गापूजा की धूम आदि वही यहाँ भी है ...सब दुहराव केवल दुहराव ....बल्कि कोलकता के भद्र बंगाली मोशाय नहीं दीखते ....बस यहाँ पुलिस ही भद्र है ....कहानी का यह डायलाग हकीकत की चुगली करता लगता है कि " कोलकाता से भाग जाओ यह बड़ा डैन्जेरस शहर है " भले ही कहानी की जबरन मांग हो, ऐसे अनावश्यक डायलाग अनपेक्षित हैं ...क्योकि यह बात तो फिर किसी भी शहर के साथ की जा सकती है ...

हाँ कोलकाता के दृश्यांकन के दौरान कैमरा अँधेरे कोनो को ही फोकस करता रहा -घोर अमानवीय स्थति ,गरीबी, गन्दगी ..यह एक कुटिल रणनीति है फिल्म को विदेशी व्यूअर्स पुरस्कारों के लिए क्वालीफाई कराना ...अब कहानी का क्या?  सस्पेंस कथाएं और भी लिखी फिल्मांकित की गयी हैं ....यह उनके  सामने भी नहीं ठहरती ... सस्पेंस क्रियेट करने के लिए अनावश्यक असम्बद्ध दृश्य भी कैमरे के एंगिल में है और दर्शक को भ्रमित करते हैं  ..कहानी के  कई छोटे सिरे ऐसे बिखरे हैं कि दर्शक उन्हें जोड़ता ही रह जाता है ..आरम्भिक दृश्य में ट्रेन के भीतर एक बच्चा अपने बस्ते को भींचे बैठा है ..उसके दोस्त उससे बस्ता खींचते हैं ...बगल की एक महिला का भी बस्ता (झोला ) उसके जाते ही लावारिस हो जाता है और एक दूध की बाटल उसमें से गिरती है और जहरीली गैस फ़ैल जाती है ....इस दृश्य को पता नहीं क्यों इतना जटिल बना दिया गया है . क्या केवल इसलिए कि दर्शकों को एक सस्पेंस फिल्म देखने को तैयार किया जा सके?

हाँ बिद्दा ने फिल्म को संभाल लिया है ...वन वूमन शो है यह फिल्म .....कहानी आप कहीं भी पढ़ सकते हैं ..यहाँ भी ....वैसे सस्पेंस फिल्मों की पूरी कहानी तो आपको पढने को मिलेगी  नहीं ..समीक्षक की भी अपनी प्रोफेशनल आनेस्टी /मजबूरी होती है :) (समीक्षक की ,मेरी नहीं )   अगर किसी फिल्म को  अच्छा माना जाता  हैं तो उसका कोई वस्तुनिष्ठ मापदंड होना चाहिए -मनोरंजन ? शिक्षा सन्देश? समस्या का हल? या किसी समस्या पर फोकस? सामाजिक सरोकार?  अब मनोरंजन तो बेहद  सब्जेक्टिव मामला है ..और मनोरंजन छोड़  दिया जाय तो यह फिल्म अन्य पहलुओं पर औंधे मुंह गिरती है...बाक्स आफिस पर भी  शुरुआती भीड़ भले ही दिखी हो अब हाल खाली जा रहे हैं .....बनारस में तो यही स्थिति है .....कोई और च्वायस हो तो इसे देखने जाना न.... जाना न ... :) बस यह प्रोमो भर देख लीजिये जो जान है फिलम की ....

पुनश्च: भारत के अभिजात्य बौद्धिक वर्ग ने अपने कई 'मेक बिलीव' बना रखे हैं,जिसके तहत वह सहज बोध के विपरीत अपनी पसंदगी नापसंदगी का निर्धारण करता है -फिल्मों के बारे में राय बनाने में भी यही मानसिकता है -चालाक निर्देशक यह बात बखूबी जानते हैं और इस तबके से भी पैसा वसूल कर लेते हैं -इस वर्ग के कुछ मेक विलीव यह हैं-
१-फिल्म सेट पैटर्न से अलग हो ..
२-तीसरी दुनियां की फिल्थ कचरा गलीजता पर कैमरे का फोकस हो 
३-महिला पात्र केन्द्रीय भूमिका में हो 
४-गानों का अलग से फिल्मांकन न हो ..ऐसे ही बेतरतीब पार्श्व गायन हो तो चलेगा 
५-परदे पर कहानी साफ़ सपाट न हो ,दर्शकों को बेतरतीब धागों को सुलझाना पड़े -मतलब जिगसा पजल सा ..
आदि आदि फिलहाल ऊपर के लगभग सभी बिन्दुओं का समावेश कहानी में हुआ है .....
हम भी पिछले पचपन साल से श्रेष्ठ कहानी के प्रतिमानों में इन्ही को वरीयता देते आये हैं ...
मगर अब सहज होना चाहते हैं! :) 

रविवार, 4 मार्च 2012

बांधे रखती है फिल्म पान सिंह तोमर!

जी हाँ फिल्म के प्रमुख किरदार का नाम ही फिल्म का नाम भी है . दरअसल एक  असली किरदार के 'रियल लाईफ' का ही रील वर्जन है यह फिल्म . पान सिंह तोमर कभी सेना में दौड़ प्रतिस्पर्धाओं के नेशनल चैम्पियन हुआ करते थे ...मगर जमीन जायदाद और पट्टीदारी के चक्कर में ऐसा उलझे कि उन्हें चम्बल के बीहड़ों में शरण लेनी पडी और अंत में मुठभेड़ में उनकी जान  चली गयी ....नहीं..नहीं...यह फिल्म चम्बल के डाकुओं का महिमा मंडन या गौरव गान नहीं करती जबकि उन विवशताओं को जरुर उजागर करती है जिस खातिर एक सीधा सरल सच्चा व्यक्ति भी बीहड़ के रास्ते चल पड़ता है ...

फिल्म पर पिपली लाईव का प्रभाव स्पष्ट है -कई कलाकार भी उसी फिल्म के हैं -ग्राम्य परिवेश का चित्रण करने में फिल्म पिपली लाईव का अनुसरण करती दिखती है ...फिल्म की पटकथा कसी हुई है ...एक सेकेण्ड को भी फिल्म बोरिंग नहीं हुई है जबकि पूरे सवा दो घंटे की फिल्म है ....संवाद प्रभावित करते हैं और सबसे अधिक प्रभावित मुख्य पात्र इरफ़ान खान करते  हैं जिन्होंने इस फिल्म में अपने अभिनय के झंडे गाड़ दिए हैं ...एक जगह पान सिंह तोमर से  सेना के अधिकारी पूछते हैं कि क्या उसका सम्बन्ध डाकुओं के परिवार से है तो वह कहता है  साब! डाकू नहीं बागी कहिये ..डाकू तो भारत के पार्लियामेंट   में पाए  जाते  हैं {लगता है अरविन्द केजरीवाल इसी डायलाग से प्रभावित हुए हैं जिसका इस्तेमाल वे धड़ल्ले से हाल की अपनी तकरीरों में कर रहे हैं .. - :) } ..

पीपली लाईव के बाद इस फिल्म ने एक बार फिर भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था -ला एंड आर्डर के नकारे- निकम्मेपन ,असंवेदनशीलता और नाकाबिलियित को फोकस किया है ..किस तरह पुलिस निकम्म्मी और पक्षपाती है ,यहाँ तक कि एक बेहद संगीन और नाजुक मौके पर खुद जिले का कलेक्टर समस्या का निराकरण न कर कहता है कि दोनों पक्षों में चंबल के खून की गरमी है आपस में खुद निपट लो और घटनास्थल से चल पड़ता है ....पानसिंह तोमर की विवशता उसे चम्बल का राह दिखाती है .. जहाँ एक नेशनल खिलाड़ी के रूप में उसे कोई पूछता नहीं ,इलाके का थानेदार तक उसका मेडल फेक देता है, बागी बन जाने  पर उसकी फोटो अखबार के पहले पन्ने पर छपती है ....लोग उसके नाम से थर्राते हैं ...इसी विडंबना को लेकर वह व्यथित है .

खैर जो भी हो पान सिंह तोमर ने कानून को अपने हाथ में लिया तो फिल्म के अंतिम दृश्य में हुयी मुठभेड़ में उसका एनकाउंटर भी हो जाता है ...मगर फिल्म इस मामले का कोई हल नहीं दिखा पाती कि आखिर समस्या का समुचित समाधान /विकल्प क्या है ? क्या  पान सिंह तोमर का रास्ता ही अंतिम विकल्प है और नहीं तो फिर विकल्प क्या है? शायद आज की मौजूदा भ्रष्ट और नाकारा व्यवस्था में सचमुच कोई विकल्प नहीं दीखता? और फिल्म इसी मोड़ पर समाप्त होती है -आखिर कोई हल हो तो वह सुझाये! 

फिल्म बहुत अच्छी है .पटकथा  चुस्त दुरुस्त .अभिनय बेमिसाल! देख सकते हैं! साढ़े तीन स्टार! दीगर विवरण यहाँ देख सकते हैं !

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

आखिर कितनी गंदी है यह 'गंदी फिल्म"?

द डर्टी फिल्म* * * * 

आप परिवार वाले हैं तो ऐसी फिल्म देखने के लिए जिगरा चाहिए....वैसे कोई जिगरा वाला भी पूरे परिवार के साथ  इस फिल्म को नहीं देख सकता ...उम्र की अधेड़ता को उघाड़ता पहला ही हाट बेड सीन बहुत आपत्तिजनक है ..कहाँ आकर फंस गए ..यही कोफ़्त हुई..मगर इस नकारात्मक सीन का एक  अलग एंगल  था जैसे  वह गौण सा हो और अभी बहुत कुछ दिखना सुनाना बाकी हो ...और यही सच भी था... अभी तो पूरी फिल्म बाकी थी ..पूरी बात अभी बाकी थी ....

मैं कहानी नहीं सुनाने जा रहा हूँ -बस एक छोर पकड़ा दूं ...एक अति साधारण परिवेश की लेकिन महत्वाकांक्षी लडकी की कहानी है जिसका आदर्श वाक्य यही है कि अहम फैसलों के लिए जिन्दगी दुबारा नहीं मिलती ..वह अपने शरीर को ही अपनी सबसे बड़ी पूजी मानकर खुद को पुरुषों के वर्चस्व और दोहरे मानदंडों वाली चकाचौध की व्यावसायिक दुनिया को समर्पित कर देती है ....और सफलता की सीढियां चढ़ती जाती है ....उसे यह मुगालता रहता है कि वह  लोगों को जो वे चाहते हैं देकर अपना मुकाम पा लेगी ...मगर विडंबना यह कि शोषण तो खुद उसी का होता है...और अंत में उसके पास केवल गंदी (पोर्न ) फिल्मों का विकल्प बचा रहता है -दैहिक भूख का बाज़ार ही ऐसा है जहाँ  मनुष्य की मनुष्यता  उससे छीन ली जाती है,  उसकी चेतना को कुंद करती  है, खुद को  खुद से अलग कर देती  है ..मैरिलिन मोनरो के साथ यही हुआ,दक्षिण की उस अभिनेत्री सिल्क  के साथ भी यही हुआ (जिस पर इस फिल्म को आधारित कहा जा रहा है ) ..... इस फिल्म की हीरोइन के किरदार ने  अंत में जब आत्महत्या कर ली  तो  यह एक दुखान्त और मार्मिक फिल्म बन जाती है ..मन संजीदा हो उठता है ....सारा गंदापन, सारी काम लोलुपता ,कामोद्दीपकता की चाह काफूर हो उठती है ...बल्कि एक क्षोभ सा भाव  ,एक कसक सी तारी हो उठती है सारे तन मन पर,पूरे वजूद पर  ......

फिल्म के कितने ही दृश्य गंदे या आपत्तिजनक भले हैं   मगर वे फिल्म का मुख्य प्रतिपाद्य /सबब नहीं बने हैं जो निर्देशक की कुशलता को बयां करते हैं ..सच कहूं तो यह निर्देशक की फिल्म है जिसने फिल्म के कंटेंट और अभिनेताओं के अभिनय को पटरी से उतरने नहीं दिया  ..हाँ इंटरवल के बाद कहीं कहीं कुछ दृश्य उबाऊ से हैं मगर यह फिल्म  का उत्तरार्ध ही है जो फिल्म के मूल मकसद को सामने ला पाने में पूरी तरह सफल साबित होता  है. फिल्म का संदेश बिलकुल लाउड एंड क्लीयर है -प्रेम जैसी उदात्त भावना सर्वोपरि है  ... देह का उत्सव मन के राग के आगे फीका है ....मानवीयता के इसी  शाश्वत पहलू की पुरजोर  प्रस्तावना और पुनरूस्थापना  करती दिखती है फिल्म और इसलिए चिर स्थाई  छाप छोड़ जाने में सफल होती है .....देह का आकर्षण ,वासना की भूख, प्रेम की एक महीन अनुभूति के आगे कितनी बौनी पड़ जाती है फिल्म ने इस पहलू को बहुत ही भावभीने और कलात्मक ढंग से उभारा है ....
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फिल्म के संवाद द्विअर्थी भले हैं मगर उनकी मार सटीक है...चुटीले हैं और दर्शकों के मुंह से वाह की आवाज बरबस निकलती है या फिर ठहाके गूंजते हैं ....विद्या बालन ने फिल्म में जान लगा दी है ....शायद उन्हें इसी फिल्म का एक डायलाग शिद्दत से याद रहा हो कि अभिनेता को धनाढ्य बनने में कई फिल्मों का योगदान होता है मगर भिखारी बनाने के लिए बस एक ही फिल्म काफी है ....इस नग्न सत्य के बाद भी परिणीता की इस गरिमायुक्त अभिनेत्री ने ऐसा चुनौती भरा रोल और वह भी पूरी ठसक के साथ किया है -यह सचमुच प्रशंसनीय है ..मैं विद्या बालन `का फैन नहीं रहा मगर उनके अभिनय का लोहा मान गया हूँ .......

फिल्म के इंटरवल तक इसे दो या ढाई स्टार देने को सोच रहा था मगर फिल्म के आधे उत्तरार्ध के बाद यह तीन में आ गयी और तेरे वास्ते मेरा इश्क सूफियाना के फिल्मांकन के साथ ही यह फिल्म चार स्टार तक जा पहुंची ..पांचवा स्टार पाने से यह फिल्म कुछ बेहद गलीज नागवार दृश्यों के चलते रह गयी जिनके बिना भी यह एक सफल व्यावसायिक फिल्म बनी रहती .....मगर फिल्म निर्माता कुछ ऐसे दर्शकों का मोह नहीं छोड़ पाए .......कुछ भी हों, फ़िल्में पैसा बनाने/कमाने  के लिए  बनायी जाती हैं केवल आदर्श ही बघारने को नहीं -फिल्म में  इस विवाद को भी लिया गया है.  मगर इस आड़ में ही आपत्तिजनक दृश्यों को परोसने की चलाकी भी दिखाई गयी  हैं ....फिल्मों में गलीज और गंदे दृश्य हो या न हों इसी विवाद को एक पात्र इमरान हाशिमी ,जो फिल्म में एक आदर्शवादी निर्देशक की भूमिका में है और फिल्म की अभिनेत्री के जरिये दिखाया गया है ...और फिल्म का यही निर्देशक फिल्म को फ्लैशबैक में सुनाता रहता है ......यह निर्देशक लगभग पूरे फिल्म में अभिनेत्री से घृणा करता है मगर आख़िरी दृश्यों में उसकी सारी घृणा प्रेम की उदात्तता से भर उठती है ..मगर तब तक अभिनेत्री सिल्क साड़ी के पारंपरिक परिधान में एक  गरिमाभरी  मौत (आत्महत्या) को अंगीकार कर उठी होती है ..कुछ अतृप्त इच्छाओं का यह सांकेतिक प्रगटन था ......आखिरी सीन में यही निर्देशक और अभिनेत्री की माँ उसकी चिता को अग्नि का स्पर्श देते दीखते हैं ..फिल्म हमारे  संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के जयघोष के साथ समाप्त होती है ......सिफारिश ही सिफारिश है ..मगर फिर आगाह करना है -यह पारिवारिक फिल्म नहीं है ....

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

बच्चों को और उनकी माँ को भी जरुर दिखाईये रा.वन!

अभी अभी रा.वन देखकर लौटा हूँ और सिफारिश करता हूँ बच्चों को जरुर दिखाईये  ...यह एक विज्ञान फंतासी  है और रोबोट (एन्थिरान) के बाद लगभग उसी स्टाईल की फिल्म है ...भारत में विज्ञान कथा फिल्मों,साहित्य के साथ एक मजाक यह बना हुआ है कि यहाँ इसे  बच्चों का साहित्य मान लिया जाता है और कई फिल्म निर्माता पुस्तक प्रकाशक भी इस विधा के साथ अन्याय करते हुए इसे बच्चों के लिए बनाते और प्रचारित करते हैं ....जबकि हालीवुड में बनने वाली साईंस फिक्शन फ़िल्में अनिवार्यतः बच्चों के लिए ही नहीं होती बल्कि कामन आडियेंस /सभी के लिए होती है ..अब अवतार क्या बच्चों के लिए ही थी? मगर ताज्जुब है अपने  फिल्म निर्माताओं /निर्देशकों को कि वे अच्छी खासी थीम वाली साई फाई फिल्मों को भी बच्चा संस्करण बना देते हैं जैसा कि रा. वन को बना दिया गया है .और मैं लहरें वाली पूजा उपाध्याय के इस विचार से अब सहमत हूँ कि यह फिल्म बच्चों के लिए है ..यह सचमुच ही बच्चों के लिए काट छाट दी गयी है ....जबकि जब तक इसे नहीं देखा था इसी खुशफहमी में  था कि ऐसी कोई चिपकी इस पर नहीं लगी होगी.....मगर एक लिहाज से इन फिल्मों का बच्चों के लिए होना भी ठीक है क्योंकि यही पीढी इस तरह की  अभिरुचि के लिए संस्कारित हो और भारत में भी कभी ऐसी मौलिक फिल्मों की क्रेज बढे ....



फिल्म एक शाश्वत भारतीय  सोच "बुराई पर अच्छाई की जीत' का टेक लेती है और यद्यपि रा .वन नाम एक कम्प्यूटर प्रोग्राम का संक्षिप्ताक्षर है यह हमारे मिथकीय रावण की प्रतीति कराता  है ..फिल्म का रा.वन दरअसल रावण सरीखा एक महा खलनायक है जिसे मारना आसान नहीं है ..फिल्म की एक रोचक संकल्पना यह भी है कि कम्प्यूटर गेम अनिवार्य रूप से नायक (सुपर हीरो) प्रधान ही क्यों हों? खलनायक प्रधान क्यों नहीं? कम्प्यूटर गेम एक्सपर्ट का बेटा खलनायकों और उनकी ढिशुंग ढिशुंग का दीवाना है और अपने पापा से एक खलनायक प्रधान गेम के लिए मनुहार करता रहता है ....और पुत्र प्रेम में पड़कर पिता एक ऐसा ही गेम बड़ी तैयारी के साथ बना देता है मगर जो पात्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता लिए होता है ....बिना बिचारे जो करे सो पीछे पछताय वाली कहावत तब चरितार्थ हो जाती है जब गेम का खलनायक कृत्रिम  बुद्धि  के सहारे  खेल की आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में आ धमकता है ....और इस खेल को खेलते हुए पहले ही स्तर पर  इसे  बीच में छोड़ कर चले गए कम्प्यूटर गेम विशेषज्ञ के बेटे को प्रतीक को (खेल में ल्यूसिफर ) को खोजता फिरता है -तब मुझे रावण की याद आती रही जो अपने प्रतिद्वंद्वियों के पास जाकर ललकार ललकार के कहता है -युद्धं देहि युद्धं देहि .....ऐसा ही रा. वन है जो अधूरा खेल छोड़कर चले गए खिलाड़ी को ललकारते  हुए आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में आ धमकता है ....और हश्र बहुत बुरा होता है..और सबसे पहले अपने सर्जक कम्प्यूटर गेम विशेषज्ञ को ही मार डालता है ..अरे अरे यह तो पश्चिमी सोच है ..यहाँ तो  भस्मासुर शंकर को  कहाँ  मार पाया था?  ....हाँ मेरी शेली के फ्रैन्केंनस्टीन में जरुर खेल खेल  में वजूद में आ गए दानव ने अपने ही सर्जक को सपरिवार मरने को अभिशप्त कर दिया था ..यहाँ भी कुछ ऐसा होता है और अपने सर्जक को निपटाने के बाद रा.वन उसके कम्प्यूटर खेल प्रेमी  बेटे और माँ के पीछे लग जाता है और उनके वतन (भारत ) वापसी तक उनका पीछा करता है -वह तो उसके विनाश का एक और प्रति -खलनायक (नायक ) जी वन भी उसी कम्प्यूटर विशेषज्ञ द्वारा  बनाया गया होता है जिसे उसका बेटा खोज निकालता है और अपने बुद्धिचातुर्य तथा जी वन के पावर के सहयोग से  से अंततः रा. वन का विनाश कर करता है ..फिल्म हैपी एंडिंग लिए हैं ...

हाँ यह फिल्म उन लोगों को जरुर चूं चूं का मुरब्बा लगेगी जो हालीवुड फिल्मों को देखते आये हैं -कई फिल्मों से सीन चुराए गए हैं ..यहाँ तक कि एक  मार धाड़ दृश्य में रोबोट के चिंटी खुद भी फ्रेंडली अपेयिरेंस में पधार गए हैं ....फिल्म में भारतीयता का पूरा टच  देने की सोच से देशी त्योहारों -करवा चौथ और दशहरा के रोचक सीन हैं और कम्प्यूटर गेम वाले रावन और मिथकीय रावण को एक ही फ्रेम में फिट करने की दृश्य रोचकता भी है जिससे एक तरह के काल विपर्यय (एनाक्रोनिज्म ) का प्रभाव पैदा किया गया है जो साईंस फिक्शन में एक आम  बात है ....यह फिल्म बच्चों को तो निश्चित ही पसंद आयेगी और केवल उन्हें बिलकुल नापसंद होगी जिन्हें विज्ञान कथाओं का ककहरा भी पता नहीं है ...हाँ , विज्ञानकथा फिल्मों के शौक़ीन  इसे औसत दर्जे की साई फाई फिल्म मानेगें ....

एंथिरान (रोबोट ) में  विशेष दृश्य प्रभावों को डालने वाले स्टेंन विंस्टन ने इस फिल्म में भी चमत्कारी दृश्य प्रभाव डाले हैं ...और मैंने तो थ्री डी वर्जन नहीं देखा मगर उसकी कल्पना कर सकता हूँ ...थ्री डी तो बहुत जबरदस्त होगी ....फिल्म अच्छी है ..बच्चों को  और उनकी माँ को भी जरुर दिखाईये..आप बोनस में देखिएगा और बच्चों की  किलकारी में अपने आनन्द की तलाश करियेगा!  

रविवार, 18 सितंबर 2011

दिमाग झन्ना गया है 'दैट गर्ल इन येलो बूट्स' देखकर..


पिछले कई बार से बहुत झेलू फिल्म देख देख कर काफी कोफ़्त हो रही थी तो आज सोचा एक कोई घोषित  "लीक से हटकर " फिल्म देखी जाय....सो चला गया " दैट गर्ल इन येलो बूट्स" देखने..अनुराग कश्यप  की यह फिल्म लीक से इतनी हटी कि हटने लायक नहीं हटी:) दिमाग झन्ना गया.यह फिल्म कई कई अन्तराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखायी जा चुकी है और रणनीति यही लगती है कि इसे पूरी तरह अभारतीय/अंतर्राष्ट्रीय आडियेंस के लिए -अवार्ड ,पुरस्कारों के लिए ही प्रदर्शित किया जाय..भारतीय आम दर्शकों ने भी इससे किनारा कर लिया है -हाल में बमुश्किल १०-१२ लोग थे. दमघोटू सन्नाटा था ..लोग स्तब्ध ,हैरान और अवाक थे.दृश्य दर दृश्य जो गुजर रहा था उसे सहज ही ग्राह्य कर पाना बहुत मुश्किल था ......

एक ब्रितानी लड़की रुथ(कल्कि कोएचलिन) अपनी पंद्रह वर्षीया बहन की हत्या और माँ की मौत के बाद भारत जा चुके अपने पिता के एक पत्र से प्रेरित होकर मुंबई आती है ..टूरिस्ट वीसा पर ..एकमात्र मकसद पिता की तलाश ..जीविकोपार्जन के चलते एक मसाज सेंटर में काम करने लगती है मगर महज वीसा के आधार पर प्रवास के दौरान काम न करने की कानूनी मजबूरी के चलते वीसा -अधिकारियों,वर्क परमिट अधिकारियों को 'दान' देती रहती है ताकि एन केन  प्रकारेण वह भारत में रहकर अपने पिता को ढूंढ सके.वह अधिकारियों को आये दिन 'दान' देने के लिए पैसे की जुगाड़ में एक मसाज सेंन्टर में काम करती है.  और इच्छुक ग्राहकों को मसाज से अलग आनंद के लिए 'हैंडशेक' की  सिफारिश कर फी ग्राहक  हजार रूपये लेती है और काम में तटस्थ भाव रखकर  अर्जित किया गया  यह पैसा वह अपने पिता की खोज से जुडी औपचारिकताओं पर स्वाहा करती चलती है -यहीं वह एक नशाखोर पात्र प्रकाश (प्रशांत प्रकाश) से  अन्तरग होती है . मगर वह भी  केवल अपने  पिपासा को ही शांत करने को उद्यत रहता है ...एक दृश्य बहुत झकझोरने वाला है जो इंगित करता है कि बिना नारी के विश्वास को जीते उससे सहज यौन सम्बन्ध नहीं बनाया जा सकता. कहानी में एक जबरदस्त विलेन चितियाप्पा गौड़ा(गुलशन देवैया ) भी है जो दुर्धर्ष जीवट से कमाए रुथ के हजारों रूपये छीन लेता है ...कारण इसका वही नशाखोर प्रेमी है जिस पर चितियाप्पा का बड़ा कर्ज है ...


मुबई या दूसरे  महानगरों  का भी एक भीषण अँधेरा पहलू है जिसे उजागर करने में कई फिल्म निर्देशक जुटे हुए हैं -धोबी घाट  की भी याद इस फिल्म को देखते हुए आयी और डेल्ही बेली की भी ...कितना गलीज भरा हुआ है हमारे महानगरों में... एक गोरी चमड़ी और पीले बूट वाली लडकी के शरीर का हिस्सा हिस्सा  नोंचने में लगे हैं काले जाहिल भारतीय .......कहीं  ऐसे एंगल फिल्मों को एक इमोशनल बायस और रंगभेद का तड़का देकर पुरस्कार खींचने का जतन तो नहीं हैं?..अंत में जब पिता की खोज पूरी होती है तो  उबकाई लेने वाली हकीकत सामने आती है -खुद पिता ही जानबूझ कर अपनी ही लडकी का ग्राहक बना है .....इस दुखांत मोड़ पर फिल्म ख़त्म हो जाती है -बदहवास,  विक्षिप्त लडकी इस सच से साक्षात्कार कर मूल देश को पलायन कर जाती है .....इस तरह यह फिल्म बाल यौन शोषण का एक घिनौना सच उकेरती है ..जहाँ यौन विकृतिग्रस्त'पीडोफायिल' पिता ने पहले तो विदेश जाकर किशोरावस्था की देहरी पर खड़ी एक लडकी इमिला को बरगलाकर अपनी हवस का शिकार बनाया और इस काम में सुभीते के लिए उसकी माँ से विवाह तक रचा लिया ....लडकी के गर्भवती होने पर उसकी ह्त्या कर दी ....बाद में भारत आकर इमोशनल पत्र लिख कर झांसे में रख रुथ को भी मुम्बई बुला लिया ..रुथ अपने पिता को ढूँढती रही जबकि  वह उसका ही नियमित ग्राहक बना रहा ...

बाल यौन शोषण पर आधारित यह फ़िल्म दरअसल अनुराग कश्यप और  उनकी पत्नी कल्कि कोएचलिन का ही भोगा हुआ यथार्थ है -यह बात दोनों जन स्वीकार करते हैं -कहानी दोनों ने मिलकर लिखी है-कई दृश्य इतने घृणित और आपत्तिजनक हैं कि ताज्जुब होता है कि उन्हें फिल्माया  कैसे गया होगा -एक निदेशक ने खुद अपनी पत्नी से ही ऐसे दृश्य कैसे कराएं होंगें -शायद प्रोफेसन से कोई समझौता न करने  वाली मनोवृत्ति यहाँ रही होगी..... फिल्म देखने की सिफारिश करने में संकोच है -जाना है तो अपने रिस्क पर जांय ..स्तब्ध हताश खिन्न होकर वापस लौटेंगें -फिल्म देखने के दौरान  हाल की स्तब्धता भी आपको सालती रहेगी सो अलग ......तीन स्टार!

बुधवार, 7 सितंबर 2011

बिग बोर बाडीगार्ड

जब सुना कि अकेले ईद के ही दिन बाडीगार्ड ने कई करोड़ का व्यवसाय कर लिया तो दबंग अभिनेता की इस नयी फिल्म में सहज ही रूचि  हो आयी ..घरवाली भी इस अभिनेता की फैन हैं ...सो कल देख ही आयी फिल्म...और बेहद निराश हुआ ....बड़ी बोर फिल्म है ....केवल सलमान खान के फैन बिरादरी की जेबें खाली करने के शुद्ध व्यावसायिक मनोवृत्ति का ही परिणाम है बाडीगार्ड! 

मैं इस फिल्म को यहाँ समीक्षा के योग्य ही नहीं पा रहा था किन्तु केवल और केवल इस उद्येश्य से कि मेरे मित्र ब्लॉगर बन्धु कहीं अपनी जेबें और समय इस पर खाली न कर आयें यह आगाह पोस्ट है -समीक्षा  नहीं! बगल के आडी की कोई और फिल्म भले ही चुन लें जो इससे बेहतर ही होगी ...इस फिल्म के मार धाड़ के सीन भी ज्यादा रोमांचित नहीं करते .....

कहानी पिटी पिटायी है -फिल्म के ख़तम होते होते निर्देशक की कुछ मेहनत जरुर दिखी है लेकिन तब तक पूरी फिल्म ग्रिप से फिसल चुकी थी ....कहीं कोई तर्क नहीं, कहीं कोई तारतम्य नहीं ..फंतासी ही बनानी थी तो भैये फिर काहें को एक सुबक सुबक कथा ठूंसा  ....?और वह भी हास्यास्पद ..झोल दर झोल .... हीरोइन  करीना अपनी ताजगी खो चुकी हैं ,हाँ शुरुआती आईटम सांग -डांस में कैटरीना कैफ का जलवा जरुर दिखा मगर फिर वे फिल्म में कहीं नहीं दिखीं .....तो एक यह आशा की एक  किरण भी लुप्त हो रही ...
मत कीजियेगा पैसा बर्बाद -इसलिए ही यह आगाह पोस्ट! 
एकाध स्टार कहें तो दे दूं!  


रविवार, 3 जुलाई 2011

मेरी मानिए तो मत जाईये डेल्ही बेली देखने -बेहद गंदी, गलीज और बकवास फिल्म है!

कल देखी डेल्ही बेली ..बकवास ..पूरा पैसा बर्बाद ..टोटल ट्रैश! आमिर ने कई अच्छी फिल्मे दी हैं बीते दिनों ..पीपली लाईव जैसी धांसूं और धोबी घाट जैसी प्रयोगधर्मी ..मगर यह तो बिलकुल पटरी से उतरी हुयी है ....गंदे अश्लील दृश्य, बात बात पर गंदी गालियाँ ...कला और सृजन के नाम पर भद्दगी ,फूहड़पन और भडन्गई!और इस फिल्म के नकारात्मक पहलुओं को ही प्रचार का मुद्दा बनाकर मीडिया के जरिये अभियान ..और समाज के सबसे स्फूर्त ,कल्पनाशील युवाओं को जाल में फांस कर उनकी जेब खाली करने की कवायद ..यही है डेल्ही बेली बस! यह परम्परा और संस्कृति से कटे लोगों का रुग्ण विलास है ....और एक कुचक्र युवाओं के उर्वर मन को संदूषित करने का ...यह बर्दाश्त के काबिल नहीं है ..

फिल्म में कहने भर को एक स्टोरी है मगर की नयापन नहीं ...हीरे की स्मगलिंग ,पैकेट का गलत हाथों में पहुंचना और फिर मारामारी ....कामुक दृश्य ,भोडे सेक्स का प्रदर्शन जिसके बारे में लिखना ही संभव नहीं -कैसे बेहूदे लोगों ने इसे सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए परदे पर उतारा है ...क्या सेक्स इतना ही गन्दा,  गलीज है?  एक मोटा पात्र तो पूरी फिल्म में केवल अधोवायु निकालता रहता है ...और कामेडी फिल्म के नाम पर प्रचारित हो रही इस फिल्म की पूरी कामेडी बस यहाँ  से शुरू होकर लैट्रिन तक समाप्त होती है ....नारी समलैंगिकता ,कनिलिंगस  ,अधेड़ उम्र की वैश्यावृत्ति आदि दृश्यों के सहारे फूहड़ हास्य कुरेदने की नाकाम कोशिश की गयी है ...इतनी बदतर फिल्म कैसे बनायी गयी मुझे इस पर आश्चर्य है ...एक पात्र (हीरो? )के  पैंट के जिपर वाला हिस्सा   एक  सेक्स सेशन में सहसा उठा तो कैमरे  का फोकस  वहां! मुख मैथुन के दृश्यांकन के दौरान  लडकी (हीरोईन ) की शिकायत कि मूछे सफाचट करो !युवाओं को यह सतही वाहियात  कामुक सनसनी देकर क्या चाहती है  आमिर और उनकी पार्टी ? 

भला हो उस विंडो कन्या का जिसने टिकट लेते ही अप्रत्याशित और अभूतपूर्व रूप से मुझे आगाह किया कि फिल्म बेहद गंदी है और गालियों से भरी है ...उसकी इस चेतावनी को अनसुना कर एक बौद्धिक दंभ के अंदाज में मैंने केवल इतना कहा ,"मुझे पता है " ..उसने हताशा भरे चेहरे से टिकट मुझे सौप दिया ,साथ में पत्नी जी भी थीं जो फिल्म को ज्यादा देर नहीं झेल पायीं और हाल से निकल चलने का आग्रह किया ..और यह प्रस्ताव भी रखा कि टिकट को दूसरी फिल्म के लिए बदल दिया जाय -ऐसे अनुभव मेरे लिए जीवन में पहली बार हो रहे थे...मैं ठगा सा बस केवल फिल्म की बेहूदी टीम को कोसता रहा ..शिव शिव कर फिल्म पूरी हुयी और बेहद बुझे मन से हम हाल के बाहर निकले ...काश उस विंडो कन्या बात मान ली होती मैंने ....

यह फिल्म तो बैन होनी चाहिए ..हम कला और सृजन की अभिव्यक्ति के नाम पर भद्दगी का ऐसा नंगा नाच कैसे कर सकते है ..आखिर कोई तो श्लील अश्लील की सीमा रेखा बचे ..इस फिल्म ने तो धड़ल्ले से सब मिटा डाला ...और वह भी यूथ के नाम पर ..क्या भारत का यूथ इतना अशिष्ट और मार्बिड हो उठा है ? हमारे बच्चे ऐसे माहौल के पात्र  हैं -नहीं नहीं यह  सही नहीं हो सकता ...जरुर फिल्मकारों ने एक अतिरंजित दृश्य सामने रखा है ....इस फिल्म में ट्रेंड के नाम पर एक आईटम डांस खुद आमिर ने किया है जिससे ज्यादा पकाऊ कुछ नहीं हो सकता ..बस फूहड़ उछल  कूद ....हो सकता है इसकी मूल कृति /स्क्रिप्ट कलात्मक रही हो मगर उसके फूहड़ दृश्यांकन ने इसकी हवा निकाल दी है!

मत जाईये देखने ,बात मानिये नहीं तो जाकर पछ्तायेगें! पहली बार हुआ है कि किसी फिल्म को मुझे एक भी स्टार देने का मन नहीं है ...
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शुक्रवार, 3 जून 2011

मेरी पहली थ्री डी फिल्म -हान्टेड!

हान्टेड देख कर लौटा हूँ .विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित यह थ्री डी फिल्म है -आँखों पर एक ख़ास चश्मा लगाकर देखना होता है इन फिल्मों को .मुझे याद है भारत में पहले भी ३ डी दृश्यों युक्त फिल्मे जैसे शिवा का इन्साफ ,छोटा चेतन ,सामरी आदि बन चुकी हैं मगर कुछ ऐसा संयोग ही रहा कि मैं उन्हें नहीं देख पाया ...बच्चों ने रिकमेंड किया तो मैंने आउट आफ क्यूरियासटी हान्टेड देखने का मन बना लिया कि देखें थ्री डी फ़िल्में कैसी होती हैं ...और सचमुच गजब का अनुभव रहा ...फिल्म के कई दृश्यों ने तो सचमुच यह अनुभव करा दिया कि शरीर में झुरझुरी फैलना किसे कहते हैं -पूरी फिल्म में मैंने महसूस किया कि कम से कम आधा दर्जन बार  ऊपर से नीचे तक झुरझुरी ,सिहरन सी फ़ैल गयी ...एक तीव्र ग्रामी रोलर कोस्टर पर बैठने के  रोमांच से  कुछ कमतर नहीं ....मुझे याद नहीं कि सारे शरीर में इसके पहले कब ऐसी झुरझुरी फ़ैली  थी ....यह   एक आपात रिस्पांस सा होता है जब शरीर किसी अचानक आपदा ,खतरे के प्रति खुद को तैयार करता है -धमनियों के जरिये ऐड्रेनालीन नामक हारमोन पूरे शरीर में फ़ैल जाता है ....इस फिल्म को देखने का अहसास कुछ ऐसा ही है ..भले ही आप मेरी तरह भूतों प्रेतों पर विश्वास नहीं करते हों ,घोर तार्किक हों मगर इस फिल्म को देखते हुए आपका तंत्रिका तंत्र आपके चैतन्य दिमाग का साथ छोड़ देगा ... क्योकि मनुष्य को आसन्न खतरे  से बचाने के लिए उसकी इन्द्रियाँ नैसर्गिक रूप से ऐसी ही प्रोग्रामड हैं जो मानव मात्र की अस्तित्व रक्षा से जुदा एक  उपाय है ...



थ्री डी प्रभाव में आप सामने के दृश्यों की गहराई /दूरी भी देख सकते हैं ..मतलब कैमरे के ठीक सामने की वस्तु और फोकस में दूर की वस्तु के बीच का फासला साफ़ दीखता है ..कई बार तो ऐसा लगता है कि परदे पर दिख रही वस्तुओं में से कुछ तो  हाल तक बढ़ती चली आ रही हैं.  इसी फिल्म में  दीवार ढहने पर ऐसा लगा कि एक ईंट तेजी से हाल में लपकती हुयी आ पहुँची ..सभी दर्शकों को तत्काल डक करना पड़ गया अपना थोबड़ा बचाने के लिए ..नायक के हाथ का पंजा भी हाल के भीतर घुसता हुआ लगा -एक सांप ने जब एक कैरेक्टर पर अपने  फन का प्रहार किया तो सभी सिहर से उठे ..लगा यह वार दर्शकों पर ही हुआ है ...अब ऐसे दृश्यों की भरमार क्यों न दिल की धड़कन और शरीर की सिहरन बढ़ा दे..

हान्टेड जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एक  बड़े भुतहे बंगले/हवेली  का नाम है ..जिसकी खरीददारी का मामला चल रहा होता है ...यह बना तो १९३६ में  था मगर  इसका वर्तमान मूल्य ४०० करोड़ रूपये हैं...रियल स्टेट बिजिनेसमैन    का बेटा जो विदेशों में पढ़ा है भूत प्रेत पर विश्वास नहीं करता...वह  बंगले में भूत प्रेत की अफवाहों की हकीकत  जानने आता है जिससे बंगले की डील में कोई बाधा न आने पाए .. और वहां घट रही अजब गजब घटनाओं ,पंजों के निशान,सिर कटी लाश आदि से खौफ खाता है ..और तभी उसकी मुलाक़ात एक सूफी संत से होती है जो उन घटनाओं के पीछे आत्माओं की ही भूमिका बताता है -

फ्लैश बैक में जो कहानी चलती है उसमें संगीत सीखने   वाली   एक लडकी  से  उसके   संगीत शिक्षक  की जोर जबरदस्ती और लडकी द्वारा आत्मरक्षा में शिक्षक की हत्या,शिक्षक की रूह का  लडकी के साथ खौफनाक बरताव और फिर उस लडकी का परिस्थितियों से हारकर आत्महत्या करने के दर्दनाक दृश्य है -ये सभी दृश्य दर्शकों की साँसों को सहसा रोक लेने में कामयाब हुए हैं -शरीर में कंपकपीं इन्ही दृश्यों से छूटती है ...फिल्म का सबसे रोचक हिस्सा वह है जब नायक बीते समय में -  १९३६ में जाकर  शिक्षक की हैवानियत से उस लडकी जो अब नायिका के रोल में आती है को बचाता है .बड़ी आपाधापी ,मार धाड़ के बाद वह कामयाब भी होता है -फिल्म का यह हिस्सा एक विज्ञान फंतासी (साईंस फैंटेसी ) सा है मगर जहाँ विज्ञान फंतासी का नायक टाईम मशीन से समय यात्रा करता है इस भुतही फिल्म में यह काम नायक से सूफी संत के चिलम का धुंआ  ही कर दिखाता है....

फिल्म को वैज्ञानिक नजरिये को ताक  पर रखकर महज मनोरंजन की दृष्टि से देखने में  ही मजा है ...फिल्म में थ्री डी दृश्य तो अद्भुत ही बन पड़े हैं ..लगभग सारी फिल्म ही थ्री डी में है ....अतीत में पीछे जाकर इतिहास के प्रवाह को बदलना विज्ञान फंतासियों का जाना माना विषय रहा है -इसी से वैकल्पिक इतिहास/दुनिया  की धारणा भी जुडी हुयी है ....अब जैसे इसी फिल्म में एक इतिहास वह है जिसमें नायिका आत्महत्या कर लेती है और दूसरी में नायक द्वारा वह बचा ली जाती है,शादी करती है ,पूरा जीवन गुजारती है  -लीजिये हो गए  न ये दो समान्तर संसार ...एक में १९३६ के बाद नायिका का  वजूद नहीं है दूसरी दुनिया में वह बाद में भी है और उसकी वंश परम्परा भी है -हिन्दी फिल्म दर्शकों को यह सब कुछ अटपटा  जरुर लगेगा मगर इस फिल्म का वैल्यू  एडीशन तो यही है ...

अतीत के दृश्यों में ,विंटेज मोटरों ,बंगलों आदि के लुभावने दृश्य हैं ....एक दो गीत भी कर्णप्रिय है ...जिस्म से रूह तक है  तुम्हारे निशां   इस ट्रेलर में सुन लीजिये ...फिल्म से जुड़े कुछ और उल्लेखनीय विवरण चवन्नी चैप   (पहले भी पूछा है कि यह चवन्नी  छाप क्यों नहीं है चवन्नी चैप क्यूंकर  हुआ?) और विकीपीडिया पर हैं !  फिल्म का एक बड़ा झोल यह है कि जब नायक रेहान ने भूतकाल में जाकर नायिका मीरा को रूह के प्रकोप से मुक्त ही कर दिया था तो बंगले में उस समय (वर्तमान में ) क्यों अजीब हरकतें हुयी जब रेहान ने उसमें प्रवेश किया ? जब कारण ही नहीं रहा तो फिर अकारण ही बंगला भुतहा कैसे बना रहा? बावजूद इसके फिल्म देखिये ..जरूर देखिये ..बच्चा पार्टी के साथ देखिये ....मैंने दिया साढ़े तीन स्टार! 

मंगलवार, 1 मार्च 2011

सात खून माफ़ उर्फ़ सुसन्ना'ज सेवेन हस्बैंड्स:एक लीक से हटी मगर बाक्स आफिस पर पिटी फिल्म

ऐसा संयोग ही रहा कि बहुत कम समय के अंतराल पर दो लीक से हटी मगर बाक्स आफिस पर पिटी फिल्मे झेलनी पडीं -एक तो धोबीघाट और अब दूसरी यह सात खून माफ़ जो दरअसल भारत में रच बस गए ब्रितानी लेखक रस्किन बांड की कहानी सुसन्ना'ज सेवेन हस्बैंड्स पर आधारित है -दीगर फ़िल्मी डिटेल्स यहाँ देख सकते हैं. फिल्म घोर आर्टिस्टिक  और बारीक मनोभावों की सेल्युलायिड -प्रस्तुति है और एक ख़ास तरह की संवेदना के  साहित्यिक और 'अभिजात्य 'अभिरुचि के दर्शकों को ही पसंद आयेगी ...

 कहानी एक सच्चे प्रेम की प्यासी औरत की कहानी है जिसने अपने छह  पतियों को उनसे मिली बेरुखी और बेवफाई के चलते मौत की नींद सुला दिया ...और अंत में जीसस क्राईस्ट से ही निकाह कर एक रूहानी /सूफियाना प्रेम को समर्पित हो गयी .यह फिल्म साहित्य की डार्क कामेडी विधा की नुमायन्दगी करती है जिसमें जीवन के नग्न सत्यों की कटाक्ष और परिहास पूर्ण प्रस्तुति की जाती है -जहां विद्रूप  हास्य और  नग्न सत्य का  मिला जुला प्रभाव   एक पीडा भरी अनुभूति  दे  जाता है और जीवन की निरुद्येश्यता और निस्सारता  का बोध भी करा देता  है ....सुजैना की केन्द्रीय भूमिका में  प्रियंका  चोपड़ा ने एक अभिशप्त नारी के त्रासदपूर्ण लम्बे जीवन  को बहुत प्रभावशाली तरीके से अभिनीत किया है ...सच्चे प्रेम की अभिलाषी एक नारी का सपना पहले ही विवाह में चूर चूर हो जाता है जब उसका सेनाधिकारी पति अपनी संतानोत्पत्ति की कमी को पौरुष दंभ के तहत स्वीकार न कर पत्नी पीडक बन जाता है और पत्नी का जीवन नारकीय बना देता है ...उसे एक हिंस्र काले तेंदुएं के आगे झोक कर सुजैना उससे मुक्त हो लेती है ...फिर तो पतियों का आया राम गया राम का एक सिलसिला ही शुरू हो जाता है ,अब एक सिंगर पति को अपनी बेवफाई और नशे के सेवन के चलते जान से हाथ  धोना पड़ता है  तो  एक शायर पति ऊपर से तो बड़ा नाजुक मिजाज मगर निजी जीवन में  परपीडक कामुकता ( सैडिस्टिक मैसोकिज्म ) का शिकार है जिसे गहन निजी क्षणों में बिना पत्नी को पीटे यौनिक आनन्द नहीं मिलता -उसे भी जिन्दा कब्र में सुलाने के बाद पारी आती है एक पुलिस आफीसर की जिसे लगातार हो रही पतियों की मौत से कुछ शंका हो जाती है मगर  वह भी शादी के जाल में खुद को डाल पाने से रोक नहीं पाता जबकि एक विवश पूर्व पतिहंता नारी उसे बार बार अबाध यौन सुख दे देकर संतृप्त करती रहती है ....मगर मुर्गी के सुनहले  अंडे के बजाय पूरी मुर्गी हडपने को कामातुर यह हतभाग्य पति भी अपने वियाग्रा प्रेम की भेंट चढ़ जाता है -मादक पेय में चोरी से एक बड़ी वियाग्रा डोज के चलते मैसिव हार्ट अटैक से उसकी भी इहलीला समाप्त हो जाती है ..अगला  पति बेवफाई के चलते कोबरा से कटवाकर मार दिया जाता है ....और उसके भी अगले का भेजा गोली से उड़ा दिया जाता है ..प्रतिशोध सुन्दरी का कहर उसके पतियों पर टूटता रहता है...... 
प्रतिशोध सुन्दरी!


यह कहानी एक युवा डी एन ये  वैज्ञानिक और चिकित्सक  अपनी पत्नी को सुनाता चलता है जिसे सुजैना ने ही आर्थिक मदद देकर उसकी शिक्षा दीक्षा पूरी कराई है ...और एक दिन जीवन से पूरी तरह  निराश और हताश और मोहभंग हो उठने की मनःस्थिति में  सुजैना उसे ही अपना शरीर सौंपने को तत्पर हो उठती है जबकि उम्र में काफी कम और  उसका ही पाल्य युवा डाक्टर  यह पेशकश तीव्र आक्रोश से ठुकरा देता है यद्यपि वह भी सुजैना के प्रति आकर्षित है मगर उसका प्यार रूहानी है और उसके मन में सुजैना के प्रति अपार सम्मान भी है -इस युवा डाक्टर के ठुकरा दिये जाने के बाद सुजैना जीवन से पूरी तरह विमुख अपनी अंतिम शादी एक चर्च में जीसस से एक पादरी की उपस्थिति में करती है जो स्वयं रस्किन बांड द्वारा ही अभिनीत पात्र है. मतलब लेखक महाशय खुद अपनी कहानी में ही एक किरदार बनकर नमूदार हो जाते हैं ...

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है उसका लचर निर्देशन जो पात्रों के जबरदस्त अभिनय के बाद भी दर्शकों को बांध पाने में असफल रहती है  ...एक तो कहानी में कोई उत्सुकता का भाव नहीं है ..सभी यह जानते रहते हैं कि अगले पति को भी हलाल होना ही है ...मगर हाँ ,फिल्म इसाई ,इस्लामी और हिन्दू रीति रिवाजों,प्रतीकों,संस्कृति के विविध आयामों के आमेलन की प्रभावशाली प्रस्तुति से एक अलग ही छाप छोडती है ..रस्किन बांड एक वृत्तांत और मजमा प्रेमी लेखक हैं जिन्हें भारतीय कोबरा ,जंगल में शिकार ,मशरूम की एक मादक प्रजाति से एक लगाव सा रहा है ....और जीवन के कुछ नग्न यथार्थों और छलावों /मुगालतों की ओर इशारा करना वे अपना लेखकीय दायित्व मानते हैं -मूल कृति निश्चित ही एक क्लासिक है मगर उसका फिल्मांकन ठीक से नहीं हो पाया है ....लचर निर्देशन ने कहानी की रेड़ मारकर रख दी है ...जबकि दृश्यांकन खूबसूरत हैं ...सुजैना का  एक डायलाग कि दुनिया की हर औरत कभी न कभी अपने पति का कत्ल करने की सोचती है होठों पर बरबस ही एक विद्रूप मुस्कान ला देती है ....

कहानी के बजाय अगर आपकी रूचि दृश्य -विभोरता में हो   तो जाईये देख आईये यह फिल्म ...तीन स्टार तो मुझे देना ही होगा इसे ...

रविवार, 23 जनवरी 2011

आम दर्शकों के लिए धोबीपाट है धोबीघाट !

भारतीय  क्लासिक कुश्ती -कला का एक मशहूर दांव है धोबीपाट जिसमें जब तक प्रतिद्वंद्वी को कुछ समझ आये वह  चारो खाने चित्त हो रहता  है और भकुआये घबराए यह देखता है कि आखिर हुआ क्या ? आमिर खान की नई फिल्म धोबीघाट दर्शकों को ऐसे ही चारो खाने चित्त करती है ...घोर कला फिल्म है , समान्तर सिनेमा की एक  एंटिक पीस /मिसाल(या  दर्शको पर लक्षित मिसाईल!) . यह निश्चय ही आम भारतीय  दर्शक समूह के लिए नहीं है और   इसलिए इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर टोरंटो इंटर नेशनल फिल्म फेस्टिवल  में पिछले वर्ष हो चुका है और अब पूरी तरह हिन्दी में डब किया गया वर्जन पिछले २१ तारीख ,२०११ को भारत में जारी किया गया है.धोबीघाट मुम्बई में विश्व का सबसे बड़ा कपडा धोने का धोबियों का समूह कार्य स्थल है जिसे देखने का शौक विदेशी सैलानियों को रहता है .

कहानी कुछ यूँ  है -एक भारतीय मूल की अमेरिकी लडकी शाई /शाय  (मोनिका डोगरा ) एक अध्ययन अवकाश/ टूर (sabbatical ) और परिवेश बदलाव की खातिर मुम्बई  आती है ..फोटोग्रैफी शौक है उसका ...वह  अमेरिका की भावना विहीन और  मशीनी होती जिन्दगी से  अलग कुछ नया अनुभव बटोरना चाहती है,मानवीय रिश्तों की मौलिकता /सहजता का अहसास चाहती है .और उसकी यह चाह इतनी गहन है कि इसके लिए वह स्वछन्द /अविवेकी(promiscuous) यौन सम्बन्धों की मौज मस्ती से भी परहेज नहीं रखती .अपनी बीबी को तलाक दे चुके पेंटर अरुण (आमिर खान ) से पहली मुलाकात में ही यौन सबंध बना लेने में वह नहीं हिचकती .अगली सुबह वह इसी रिश्ते को सहजता से आगे ले जाना चाहती है मगर तलाकशुदा ,एकांतवासी का जीवन जी रहे अरुण को यह  गवारा नहीं है -वह बीती रात के संसर्ग  को  नशे की भूल मानते हुए पश्चाताप के मूड में है .और फिर से अपने एकांतवास की  ओर लौट जाना चाहता है   ...जबकि शाय बीती रात की  घनिष्ठता को   एक सहज और स्वाभाविक बात ही मानती है   और यही दोनों ,शाय  और अरुण में न चाहते हुए भी एक संवादहीनता उभर आती है ...और अब शाय  की  मुलाक़ात मुन्ना (प्रतीक बब्बर )  से होती है जो अनेक सपने लिए बिहार से मुम्बई आया हुआ है और जीविकोपार्जन के लिए दिन में धोबीघाट पर कपडे धोता है और रात में मुम्बई मेट्रो की पटरियों पर चूहे मारता है .वह मुन्ना की  फ़िल्मी दुनिया की साध  पूरा करने के लिए उसकी प्रमोशनल फोटो उतारती है ,फोलियो बनाती है ..और उसके साथ भी घनिष्ठ होती जाती है..मगर उसका मन अरुण के लिए ही व्यग्र रहता है .

उधर एकांतवासी जीवन जी रहे अरुण को एक नए मकान में शिफ्ट करने पर पुराने किरायेदारों की भूल से छूटी कुछ वीडिओ लग जाती है जिसमें एक दुर्भाग्य की मारी लडकी (कीर्ति  मल्होत्रा )  की कहानी है जो वीडियो रिकार्डेड  संदेशों में अपने भाई को अपनी कहानी कहती है और इस रहस्योघाटन के साथ कि उसके  पति का सम्बन्ध किसी और से है  , खुदकुशी कर लेती है ....इस तरह अनेक पात्रों के समानांतर प्रेम ज्यामिती की जटिलताओं /जाल में उलझती  फिल्म आगे बढ़ती है ...मुन्ना की  ओर एक दूसरी  फ़्लैट की अधेड़ धनाढ्य महिला आकर्षित है  ... मगर मुन्ना तो शाय  के प्रेम में गिरफ्त है ....और शाय  उसके घनिष्ट सामीप्य के बाद भी मन से अरुण से अनुरक्त है ...अरुण को एक दूसरी महिला चाहती है जो उसके पेंटिंग्स की प्रमोशनल शोज विदेशों में कराने की जुगाड़ में है ...मतलब यहाँ प्रेम का पूरा गड़बड़झाला है!   या यूं कहिये फिल्म प्रेम का  पाईथागोरस प्रमेय बन गयी  है ....निर्देशिका ने प्रेम को ही इस यथार्थवादी फिल्म का थीम बनाया है और इस  विलक्षण मानवीय अनुभूति के बड़े ही सूक्ष्म पहलुओं को सेल्युलायिड पर उतारने की जी तोड़ कोशिश की है ...उसके मुताबिक़ प्रेम का अन्तस्थ भाव एक होते हुए भी समाज में उसका प्रगटीकरण व्यक्ति समाज और परिवेश जाति /वर्ग के सापेक्ष है -किन्तु महानगर की आपाधापी और दुनियावी भागदौड़ के बीच भी सहज प्रेम अभी भी स्पंदित है , जीवित है -मेरी समझ में फिल्म की यही निष्पत्ति है!

 धोबी घाट के किरदार 

फिल्म दरअसल दृश्यावलियों का एक खूबसूरत कोलाज बन पडी है - बरसात के दृश्य ,एकांतवासी अरुण के सिगरेट पीने के दृश्य इतने प्रभावी बन पड़े हैं   कि लगता है कि आडिटोरियम   में ही बरसात हो रही है और सिगरेट का धुंआ दर्शकों तक पहुँच रहा है .पार्श्व दृश्यों के साथ बेगम अख्तर /शोभा गुर्टू (?) की आवाजों में क्लासिकल गायकी  एक अजब सी मायूसी,अवसाद का सृजन करती हैं .इस तरह के कई समान्तर  दृश्यों   का समुच्चय फिल्म के अंतिम दृश्य में होता है जब मुन्ना , अरुण के प्रति शाय  के सच्चे प्रेम को देखकर  कर खुद  शाय  के प्रति सच्चे प्रेम की अनुभूति करता है  ...और अरुण के   निवास का सही पता शाय  को सौप देता है ...उसे अरुण का पता मालूम रहता है,वह उसका धोबी जो रहा है  ....

पूरी फिल्म प्रेमाभिव्यक्ति की बारीकियों में सराबोर  है ...मगर एक ख़ास संवेदनशीलता वाले आडियेंस के लिए ही है...दर्शक अपनी समझ का लिटमस टेस्ट अपने रिस्क पर कर सकते हैं :) .हाँ यह जनता जनार्दन के लिए तो बिकुल नहीं है -तासीर काफी गाढी है -हाल से बाहर निकलने पर फिल्म के दृश्य दर दृश्य सिर पर सवार होने लगते हैं.मोनिका डोगरा का पात्र और उनका अभिनय प्रभावित करता है -प्रतीक  बब्बर ने बहुत चुनौतीपूर्ण प्रशंसनीय भूमिका निभायी है ...आमिर के लिए कुछ ख़ास नहीं है फिल्म में -एक एकांतवासी की भूमिका का वे सहजता से निर्वाह कर ले गए हैं .फिल्म बेहद स्लो मोशन में है .हिम्मत करके देखी जा सकती है अगरचे आप की रूचि कला फिल्मों में हो तभी !फिल्म में इन्टरवल नहीं है शायद   निर्देशिका  को डर रहा हो कि इंटरवल (अंतराल) के बाद कहीं दर्शक पूर्वार्ध की कहानी ही न भूल जायं ...समीक्षा के लिए भी यह फिल्म किसी चुनौती से कम नहीं -इति सिद्धम...
* * *
बैनर : आमिर खान प्रोडक्शन्स
निर्माता : आमिर खान, किरण राव
निर्देशक : किरण राव
कलाकार : प्रतीक, मोनिका डोगरा, कृति मल्होत्रा, आमिर खान
सेंसर सर्टिफिकेट : ए * 1 घंटा 35 मिनट * 10 रील 
कतिपय  और  डिटेल्स  के  लिए यह समीक्षा भी पढ़ सकते हैं
चवन्नी चैप पर इस फिल्म की समीक्षा
पोस्ट स्क्रिप्ट!
फिल्म को देखते हुए मुझे भर्तृहरि विरचित यह  बहु उद्धृत श्लोक याद आ  गया -प्रेम आज भी दरअसल कहाँ विवेचित हो पाया है ,इसकी गति न्यारी है ..तभी तो इसे बार बार परिभाषित और व्याख्यायित करने की जरुरत रहती है -
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता।
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या।
                      धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च।।
(भर्तृहरि कहते हैं कि मुझे जिससे प्रेम है उसे किसी और से प्रेम है और जिससे उसे प्रेम है  उसे भी किसी अन्यत्र से प्रेम है और फिर उस अन्यत्र को  मुझसे प्रेम है -इन सभी को, कामदेव को और मुझे भी धिक्कार है)पूरा भावार्थ यहाँ पढ़ सकते हैं , तनिक स्क्राल करना पड़ेगा ..तो फिर करिए न ..प्रेम के लिए कुछ भी ...!)


मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

बोर और बोगस है तीसमारखां!

संशय तो पहले से ही था,मगर फिल्म ने सारे संशयों को मिटा कर साबित कर दिया कि वर्ष २०१० के सबसे बोर फिल्मों में तीसमारखां  ने भी अपना नाम दर्ज कर लिया.पैसे और वक्त दोनों की बर्बादी है तीसमारखां . रही बात शीला की जवानी का आईटम डांस तो वह  पहले से ही तमाम चैनलों पर कोहराम मचाये हुए है .इसके बारे में भी यही समझ लीजिये कि दबंग के मुन्नी  बदनाम के आगे   यह मसाला आईटम  भी पनाह और पानी मांगता नजर आता है और गीत के अश्लील बोल की बात तो अलग है ही .

न जाने शुरू से ही क्यों फिल्म झोल खाती नजर आती है ,निर्देशन का कसाव तो फ़िल्म में कहीं है ही नहीं और शायद इसका अहसास निर्देशक फरहा खान को हुआ और इंटरवल के बाद उन्होंने मेहनत दिखाई मगर मामला हाथ से फिसल चुका था .हाँ एक गीत वल्लाह रे वल्लाह कर्णप्रिय जरुर है और मुस्लिम रहन सहन/परिवेश के अनुकूल है .मगर  इतना तड़क भड़क और रंगों साज इस्लाम के अनुकूल तो नहीं -इस विरोधाभास पर दिमाग चलता रहा और फिल्म की रील आगे खिसकती रही .

शीला की जवानी वाला आईटम  भी फिल्म के शुरू होते ही डाल दिया गया और उसके ख़त्म होते ही लग जाता है कि अगर इस बहु प्रचारित दृश्य का यह हाल है तो फिर पूरी फिल्म का क्या होगा -और आशा के अनुरूप ही फिल्म  बाँध  नहीं पाई -हाँ आठ दस वर्ष के बच्चे जरुर नायक की उल जलूल हरकतों पर किलकारियां मार रहे थे-मगर मुझे तो अक्षय कुमार की कलाबाजियां और बेहूदी संवाद अदायगी पर कुढ़न हो रही थी .

फिल्म की कहानी एक चोरों के सरताज की है जो एक पूरी ट्रेन को लूटने का तामझाम अंजाम देता है जिसमें सरकार के अन्टीक -पुरातात्विक महत्त्व के दुर्लभ खजाने भरे हैं .कहानी की मूल सोच दुरुस्त है मगर उसे ठीक से फिल्माया नहीं जा सका है ..छोटे मोटे दृश्य बच्चों के मनोरंजन के लिए बढियां बन पड़े हैं -जैसे अद्भुत ब्रेसलेट के जरिये  चोर का गायब होना और बिना सर वाले घुड़सवार भूत का आतंक .

मेरी ओर से एक स्टार ...बच्चों को भेज सकते हैं मगर वहां भी शीला की जवानी रोड़े अटकाए हुए हैं ...निर्णय आपका! 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

हालीवुड की प्रशंसनीय नक़ल के लिए रोबोट को मिलते हैं तीन स्टार ...

मेरे कुछ ब्लॉग मित्र यह आस लगाए बैठे हैं कि मैं रोबोट (तमिल एन्धिरन ) फिल्म देख लूं और सिफारिश कर दूं तो वे भी देख लें ....अब परमारथ के कारण साधुन धरा शरीर के चलते आज मैटनी शो देख ही डाला ..मिले जुले विचार हैं इस फिल्म के बारे में ..मगर आप को कोई फिल्म देखना ही हो तो   कोई और फिल्म भले देख लें .....इसकी सिफारिश मैं अपने ब्लॉग मित्रों को नहीं करता -हाँ अपने बच्चों को वे इजाजत दे सकते हैं कि अकेले देख आयें ...इसलिए कि यह एक साईंस फिक्शन मूवी होने के नाते उनकी सोच को थोडा कुरेद सकती है ....बाकी आप इसकी बजाय कोई और हालीवुड की परिपक्व साई फाई फिल्म देख लें .....इसमें एक पढ़े लिखे और संजीदा आदमी के लिए कुछ ख़ास नहीं है ...

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अब रोबोट क्या है इसे कुछ इस तरह समझ लीजिये कि हालीवुड की बासी कढी में  मुम्बईया फ़िल्मी मसालों ,लटको झटकों को तड़का मारकर परोस दिया गया है ...बाप रे पूरे तीन घंटे की मुकम्मल फिलम ...हम तो पूरा  ऊब गए ....न तो यह एक अच्छी रूमानी या एक्शन  फिल्म ही बन पाई है और न ही एक साई फाई फिल्म  ही ..बोले तो बिल्कुल चूँ चूँ का हलवा या मुरब्बा बन के रह गयी है .ताज्जुब यह है कि अकेले ६० वर्षीय मगर चिर युवा दक्षिणी  अभिनेता रजनीकांत के  दम ख़म पर रीलें आगे भागती हैं ....ऐश्वर्या ज़रा भी प्रभावित नहीं करतीं ....पता नहीं मगर हो सकता है अब उन्हें ऐसी ही फ़िल्में मिल रही हों .फिल्म   में  एक से एक बोर करने वाले गाने /सीक्वेंस भरे पड़े हैं ..कोई गीत लोकप्रिय होने वाला नहीं है ...

कहानी की थीम इतनी पुरानी है कि खुद को शर्म सी लगती है कि अपना देश विज्ञान कथाओं के नाम पर अभी भी सौ साल पुराने पश्चिमी साईंस फिक्शन के विचारों को अपना रहा है -रोबोट शब्द मूलतः चेक भाषा का शब्द है जिसे कैरेल चैपक ने १९२१ में अपनी कहानी आर यूं आर (रोसम्स युनिवर्सल रोबोट )  में पहली बार इस्तेमाल में लाया था और जहाँ इसका मतलब कृत्रिम बन्धुआ मजदूरों से था जो मनुष्यों के गुलाम होते हैं मगर उनमें भी विद्रोह भड़क  उठता है और वे सारी मनुष्य जाति को मिटा देते हैं ....यह रोबोट भी ऐसी ही एक कहानी है जिसमें नायक (रजनीकांत )  अपना हमशक्ल रोबोट बनाता हैं मगर उसमें जब इमोशंस उत्पन्न होते हैं तो वह नायक की ही महबूबा को हथियाने पर आमादा हो जाता है और अपने निर्माता के आदेश को भी नहीं मानता ...मशीनें  खतरनाक हो सकती हैं अगर उन पर कठोर नियंत्रण न रखा गया ....और यही कारण है कि अमरीकी विज्ञान कथाकार आईजक आजीमोव ने रोबोटिक्स के तीन नियम बनाये जिसमें  अनिवार्य रूप से एक शर्त थी... जो भी रोबोट बनें उनमें मानव जाति/मानवता को हानि न पहुचाने का स्पष्ट निर्देश हो ....क्या मशीने मानव को विस्थापित  कर सारा राज काज खुद संभाल लेगीं ? तब मनुष्य क्या उनका गुलाम बन उठेगा ? ऐसी फ़िल्में इसी दुश्चिंता के प्रति आगाह करती हैं और इस थीम पर हालीवुड में सैकड़ों फ़िल्में बन चुकी है -तरह तरह के कथानक के साथ ..तो एक विज्ञान कथा प्रेमी के रूप में यह फिल्म मुझे तो कोई खास नहीं लगती ..हाँ जिन लोगों को यह पता नहीं है कि आखिर साई फाई किस चिड़िया का नाम है उन्हें यह कुछ अलग सी लग सकती है ...

फिल्म की जांन  इसके कुछ आख़िरी दृश्य हैं जिन्हें  हालीवुड की अभी हाल में ही आई साई फाई फिल्म ट्रांस्फार्मर्स  से उड़ाया गया है मगर चूंकि सारे स्पेशल इफेक्ट्स भारत में ही तैयार हुए हैं ...हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि अब सिनेमा के विशेष प्रभावों के लिए हम केवल हालीवुड की ओर ही नजरे उठाये नहीं रह सकते ....फिल्म में नायक के हजारों प्रतिकृतियों में तैयार हो उठना और क्षण क्षण में अनेको छोटे बड़े और अति विशाल रूपों का धारण   कर लेना पूरे आडियेंस को स्तंभित कर देता है ..पूरा हाल स्तब्ध अवाक सा हो रहता है ..मैंने केवल इन्ही दृश्यों के आधार पर इस फिल्म को तीन स्टार दिए हैं .तो बच्चों को भेज दीजिये और आप मियां बीबी घर की नीरवता का आनंद उठाईये ...बस यही कहना है .
   बैनर: सन पिक्चर्स
डायरेक्टर: शंकर
कलाकार: रजनीकांत, ऐश्वर्या राय बच्चन और डेनी डेन्जोंगपा







गुरुवार, 16 सितंबर 2010

बदनाम नहीं ,झंडू बाम लगी मुन्नी -पैसे वसूल !

अभी अभी लौटा हूँ मुन्नी बदनाम अर्रर दबंग को देखकर -धर्मपत्नी की जिद पर और कुछ अपनी क्यूरियासिटी के चलते ..मुझे आज तक नहीं पता कि पत्नी जी ने कभी भी किसी फिल्म को देखने की इतनी इच्छा दिखायी हो -मुझे भी यह लक्ष्मी --इच्छा  देखकर पता नहीं कुछ कुछ स्ट्रेंज सा लग रहा था तो आज टिकिट मंगा ही लिए मुन्नी बदनाम के दीदार के लिए ...आखिर गृह मंत्रालय की उपेक्षा की भी तो नहीं जा सकती ...मैंने जब यह खबर उन्हें सुनायी तो दोपहर के खाने की चिंता छोड़ तुरंत तैयार हो गयीं सिनेमा गृह आने के लिए ...मैंने भी आज अपना लंच मुन्नी पर कुर्बान  कर दिया -दोपहर का शो था और लंच करने का मतलब फिल्म छूटती - मुन्नी की बदनामी का चश्मदीद  बनने की ललक ने लंच छुडवा ही दिया ....वह तो हम रोज ही करते हैं ..मुन्नी बार बार कहाँ बदनाम होते दिखती है -कुछ मत पूछिए बस इसी एक गाने से फिल्मबाजों की बोलचाल में कहें तो पैसा वसूल हो गया ...मैंने शायद   पहली बार शिद्दत से महसूस किया कि आखिर पैसा वसूल होना किसे कहते हैं -पहले ऐसी शब्दावली बोलने वालों को मैं हेय  नजर से देखता था ...अनकल्चर्ड भदेस लोग - -जो ऐसा बोलते हैं- -लेकिन आज सचमुच लगा कि पैसा वसूल होने का अर्थ क्या  है -अब मुझसे भाष्य मत कराईये खुद देख आईये न ! 

 मुन्नी बदनाम ....
मुन्नी ने आते आते देर तो बहुत की मगर इंटरवल के बाद आते ही छा ही गयी - सारा हाल जो पहले से ही 'हाउस फुल' था लगा कि एक हुजूम का हिस्सा हो गया है ...फिराक ने अपनी माशूका को कहा था -वो जुलूसे जिन्दगी होके निकलती है ..सच मानिए परदे पर अचानक  ही अवतरित हुई मलाईका जूलूसे जिन्दगी ही बनकर ही जलवा फरोस हुईं -और अपने टैलेंट और मेहनत का लोहा मनवा दिया ...आम पब्लिक अपने जीवन के बिम्बों ,रोजमर्रा के लटको झटकों में ही मनोरंजन को ढूंढती है ....और इस आईटम डांस में इन सभी पहलुओं का समुच्चय  कर  निर्देशक /कोरियोग्राफर ने समाँ  बाँध दिया ...कनखियों से देखा श्रीमती जी अनिर्वचनीय आनंद  में किलक रही थीं -बरबस ही होठों पर मुस्कराहट तिर आई -पैसा सामने वसूल होता दिख रहा था .....और हाय रे तभी दबंग -सलमान खान ने मुन्नी को परे ढकेल कर कमान फिर अपने हाथों में ले लिया -जो शुरू से उन्ही की हाथ में थी -बस मुन्नी ने थोड़ी देर के लिए मानो  उनसे झपट लिया था ...अमिया से आम हुई सुनते ही मुझे सतीश भाई और किसी और की भी याद भी हो आई -क्यों ? यह जानने के लिए सतीश भाई का प्रोफाईल फुरसत में पढ़ लीजियेगा .

.... और दो दबंग 
अब देखिये हम कौनो पेड़ या पेशेवर फिल्म समीक्षक नहीं हैं बस इतना बता देते हैं  कि थोड़ी देर लाईट मूड में होने और केवल मनोरंजन के लिहाज से दबंग देख आईयेगा तो पैसे वसूल हो जायेगें ....यह पूरी फिल्म ही सलमान खान एंड फैमिली के टैलेंट प्रदर्शन का एक शो था और इसमें वे सफल हुए हैं -बाकी के कलाकार भी अच्छे हैं -हिरोईन प्रधान फिल्म न होने के कारण इसमें उसका कोई ख़ास रोल न होने के बावजूद वह सुन्दर लगती है ...अब उसका नाम क्या है मैंने ध्यान नहीं दिया -किसी ने कहा कि शत्रुघ्न सिन्हा की पुत्री है ...अरे हाँ, सोनाक्षी सिन्हा , उसमें टैलेंट तो लगा लेकिन सलमान खान को ही फिल्म फोकस करती रही .बाकी  अपने जमाने के एक से एक बड़े कलाकार इसमें दिखते हैं -अनुपम खेर ,ओमपुरी ,विनोद खन्ना,डिम्पल कपाडिया  आदि मगर लगता है जैसे उनसे हाथ जोड जोड कर  पहले ही विनती कर ली गयी हो कि भैया यह सल्लू मियाँ की फिलम है तनिक  अपना टैलेंटवा दबाकर रखियेगा ...बस विलेन की छोड़ दी जाय तो किसी भी दूसरे अभिनता को फिल्म में उभरने नहीं दिया गया है -क्योंकि शायद  यह पक्का विश्वास था कि सल्लू अकेले इसकी नैया पार लगा देगें और उन्होंने खूब जम के नाव खेई भी है -बोरियत तो फटकी ही नहीं भले ही सल्लू मियाँ की देह यष्टि और उनकी अजीब गरीब हरकतें बकवास सी (केवल मुझे ) लगती रही हों !

तो मन मसोस कर बैठे न रहिये ,जाईये दबंग और मुन्नी का बदनाम हुलिया देख आईये ...झंडू बाम की सी राहत  देती हैं मलाईका ! गाने भी अच्छे है -जुबान पर सहज ही चढ़ जाते हैं ....तेरे मस्त मस्त दो नैंन ....और एक तो बच्चों से ठिठोली करने के लिए हुड हुड  दबंग जैसा कुछ है ...पूरा एन्टरमेंट का इंतजाम है ...हाँ बौद्धिक बन के मत जाईयेगा देखने इसे -उसे हाल के बाहर ही छोड़ दीजियेगा तभी असली आनंद उठा पाईयेगा  पब्लिक के साथ ....

दबंग -
मुख्य कलाकार : सलमान खान, सोनाक्षी सिन्हा, सोनू सूद, अरबाज खान, माही गिल, विनोद खन्ना, डिंपल कपाडि़या, महेश मांजरेकर आदि।
निर्देशक : अभिनव सिंह कश्यप
तकनीकी टीम : निर्माता-अरबाज खान, मलाइका अरोरा खान, ढिल्लन मेहता, कथा-पटकथा-अभिनव सिंह कश्यप, दिलीप शुक्ला, गीत-फैज अनवर, जलीस शरवानी, ललित पंडित, संगीत-साजिद-वाजिद



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