रविवार, 23 जनवरी 2011

आम दर्शकों के लिए धोबीपाट है धोबीघाट !

भारतीय  क्लासिक कुश्ती -कला का एक मशहूर दांव है धोबीपाट जिसमें जब तक प्रतिद्वंद्वी को कुछ समझ आये वह  चारो खाने चित्त हो रहता  है और भकुआये घबराए यह देखता है कि आखिर हुआ क्या ? आमिर खान की नई फिल्म धोबीघाट दर्शकों को ऐसे ही चारो खाने चित्त करती है ...घोर कला फिल्म है , समान्तर सिनेमा की एक  एंटिक पीस /मिसाल(या  दर्शको पर लक्षित मिसाईल!) . यह निश्चय ही आम भारतीय  दर्शक समूह के लिए नहीं है और   इसलिए इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर टोरंटो इंटर नेशनल फिल्म फेस्टिवल  में पिछले वर्ष हो चुका है और अब पूरी तरह हिन्दी में डब किया गया वर्जन पिछले २१ तारीख ,२०११ को भारत में जारी किया गया है.धोबीघाट मुम्बई में विश्व का सबसे बड़ा कपडा धोने का धोबियों का समूह कार्य स्थल है जिसे देखने का शौक विदेशी सैलानियों को रहता है .

कहानी कुछ यूँ  है -एक भारतीय मूल की अमेरिकी लडकी शाई /शाय  (मोनिका डोगरा ) एक अध्ययन अवकाश/ टूर (sabbatical ) और परिवेश बदलाव की खातिर मुम्बई  आती है ..फोटोग्रैफी शौक है उसका ...वह  अमेरिका की भावना विहीन और  मशीनी होती जिन्दगी से  अलग कुछ नया अनुभव बटोरना चाहती है,मानवीय रिश्तों की मौलिकता /सहजता का अहसास चाहती है .और उसकी यह चाह इतनी गहन है कि इसके लिए वह स्वछन्द /अविवेकी(promiscuous) यौन सम्बन्धों की मौज मस्ती से भी परहेज नहीं रखती .अपनी बीबी को तलाक दे चुके पेंटर अरुण (आमिर खान ) से पहली मुलाकात में ही यौन सबंध बना लेने में वह नहीं हिचकती .अगली सुबह वह इसी रिश्ते को सहजता से आगे ले जाना चाहती है मगर तलाकशुदा ,एकांतवासी का जीवन जी रहे अरुण को यह  गवारा नहीं है -वह बीती रात के संसर्ग  को  नशे की भूल मानते हुए पश्चाताप के मूड में है .और फिर से अपने एकांतवास की  ओर लौट जाना चाहता है   ...जबकि शाय बीती रात की  घनिष्ठता को   एक सहज और स्वाभाविक बात ही मानती है   और यही दोनों ,शाय  और अरुण में न चाहते हुए भी एक संवादहीनता उभर आती है ...और अब शाय  की  मुलाक़ात मुन्ना (प्रतीक बब्बर )  से होती है जो अनेक सपने लिए बिहार से मुम्बई आया हुआ है और जीविकोपार्जन के लिए दिन में धोबीघाट पर कपडे धोता है और रात में मुम्बई मेट्रो की पटरियों पर चूहे मारता है .वह मुन्ना की  फ़िल्मी दुनिया की साध  पूरा करने के लिए उसकी प्रमोशनल फोटो उतारती है ,फोलियो बनाती है ..और उसके साथ भी घनिष्ठ होती जाती है..मगर उसका मन अरुण के लिए ही व्यग्र रहता है .

उधर एकांतवासी जीवन जी रहे अरुण को एक नए मकान में शिफ्ट करने पर पुराने किरायेदारों की भूल से छूटी कुछ वीडिओ लग जाती है जिसमें एक दुर्भाग्य की मारी लडकी (कीर्ति  मल्होत्रा )  की कहानी है जो वीडियो रिकार्डेड  संदेशों में अपने भाई को अपनी कहानी कहती है और इस रहस्योघाटन के साथ कि उसके  पति का सम्बन्ध किसी और से है  , खुदकुशी कर लेती है ....इस तरह अनेक पात्रों के समानांतर प्रेम ज्यामिती की जटिलताओं /जाल में उलझती  फिल्म आगे बढ़ती है ...मुन्ना की  ओर एक दूसरी  फ़्लैट की अधेड़ धनाढ्य महिला आकर्षित है  ... मगर मुन्ना तो शाय  के प्रेम में गिरफ्त है ....और शाय  उसके घनिष्ट सामीप्य के बाद भी मन से अरुण से अनुरक्त है ...अरुण को एक दूसरी महिला चाहती है जो उसके पेंटिंग्स की प्रमोशनल शोज विदेशों में कराने की जुगाड़ में है ...मतलब यहाँ प्रेम का पूरा गड़बड़झाला है!   या यूं कहिये फिल्म प्रेम का  पाईथागोरस प्रमेय बन गयी  है ....निर्देशिका ने प्रेम को ही इस यथार्थवादी फिल्म का थीम बनाया है और इस  विलक्षण मानवीय अनुभूति के बड़े ही सूक्ष्म पहलुओं को सेल्युलायिड पर उतारने की जी तोड़ कोशिश की है ...उसके मुताबिक़ प्रेम का अन्तस्थ भाव एक होते हुए भी समाज में उसका प्रगटीकरण व्यक्ति समाज और परिवेश जाति /वर्ग के सापेक्ष है -किन्तु महानगर की आपाधापी और दुनियावी भागदौड़ के बीच भी सहज प्रेम अभी भी स्पंदित है , जीवित है -मेरी समझ में फिल्म की यही निष्पत्ति है!

 धोबी घाट के किरदार 

फिल्म दरअसल दृश्यावलियों का एक खूबसूरत कोलाज बन पडी है - बरसात के दृश्य ,एकांतवासी अरुण के सिगरेट पीने के दृश्य इतने प्रभावी बन पड़े हैं   कि लगता है कि आडिटोरियम   में ही बरसात हो रही है और सिगरेट का धुंआ दर्शकों तक पहुँच रहा है .पार्श्व दृश्यों के साथ बेगम अख्तर /शोभा गुर्टू (?) की आवाजों में क्लासिकल गायकी  एक अजब सी मायूसी,अवसाद का सृजन करती हैं .इस तरह के कई समान्तर  दृश्यों   का समुच्चय फिल्म के अंतिम दृश्य में होता है जब मुन्ना , अरुण के प्रति शाय  के सच्चे प्रेम को देखकर  कर खुद  शाय  के प्रति सच्चे प्रेम की अनुभूति करता है  ...और अरुण के   निवास का सही पता शाय  को सौप देता है ...उसे अरुण का पता मालूम रहता है,वह उसका धोबी जो रहा है  ....

पूरी फिल्म प्रेमाभिव्यक्ति की बारीकियों में सराबोर  है ...मगर एक ख़ास संवेदनशीलता वाले आडियेंस के लिए ही है...दर्शक अपनी समझ का लिटमस टेस्ट अपने रिस्क पर कर सकते हैं :) .हाँ यह जनता जनार्दन के लिए तो बिकुल नहीं है -तासीर काफी गाढी है -हाल से बाहर निकलने पर फिल्म के दृश्य दर दृश्य सिर पर सवार होने लगते हैं.मोनिका डोगरा का पात्र और उनका अभिनय प्रभावित करता है -प्रतीक  बब्बर ने बहुत चुनौतीपूर्ण प्रशंसनीय भूमिका निभायी है ...आमिर के लिए कुछ ख़ास नहीं है फिल्म में -एक एकांतवासी की भूमिका का वे सहजता से निर्वाह कर ले गए हैं .फिल्म बेहद स्लो मोशन में है .हिम्मत करके देखी जा सकती है अगरचे आप की रूचि कला फिल्मों में हो तभी !फिल्म में इन्टरवल नहीं है शायद   निर्देशिका  को डर रहा हो कि इंटरवल (अंतराल) के बाद कहीं दर्शक पूर्वार्ध की कहानी ही न भूल जायं ...समीक्षा के लिए भी यह फिल्म किसी चुनौती से कम नहीं -इति सिद्धम...
* * *
बैनर : आमिर खान प्रोडक्शन्स
निर्माता : आमिर खान, किरण राव
निर्देशक : किरण राव
कलाकार : प्रतीक, मोनिका डोगरा, कृति मल्होत्रा, आमिर खान
सेंसर सर्टिफिकेट : ए * 1 घंटा 35 मिनट * 10 रील 
कतिपय  और  डिटेल्स  के  लिए यह समीक्षा भी पढ़ सकते हैं
चवन्नी चैप पर इस फिल्म की समीक्षा
पोस्ट स्क्रिप्ट!
फिल्म को देखते हुए मुझे भर्तृहरि विरचित यह  बहु उद्धृत श्लोक याद आ  गया -प्रेम आज भी दरअसल कहाँ विवेचित हो पाया है ,इसकी गति न्यारी है ..तभी तो इसे बार बार परिभाषित और व्याख्यायित करने की जरुरत रहती है -
यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता।
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या।
                      धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च।।
(भर्तृहरि कहते हैं कि मुझे जिससे प्रेम है उसे किसी और से प्रेम है और जिससे उसे प्रेम है  उसे भी किसी अन्यत्र से प्रेम है और फिर उस अन्यत्र को  मुझसे प्रेम है -इन सभी को, कामदेव को और मुझे भी धिक्कार है)पूरा भावार्थ यहाँ पढ़ सकते हैं , तनिक स्क्राल करना पड़ेगा ..तो फिर करिए न ..प्रेम के लिए कुछ भी ...!)


47 टिप्‍पणियां:

  1. सिर्फ पहला और अंतिम पैराग्राफ पढ़ा है. बीच वाला पढ़ लेता तो फिल्म देखने में मजा नहीं आता :)
    देखने के बाद बाकी पढूंगा... उम्मीदें बढ़ गयी हैं फिल्म से.. :)

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  2. फिल्म चाहे जैसी हो समीक्षा की शैली लाज़वाब है। इसे पढ़कर सहज ही समझा जा सकता है कि कितना कठिन कार्य है इस फिल्म को ध्यान से देखना और उसकी समीक्षा करना। लिखने के अंदाज से यह भी लग रहा है कि यदि समीक्षा का संकल्प न होता तो आप बीच में ही लौट कर घर आ जाते।
    फिल्म के लिए...न..न..प्रेम के लिए....अरे हम सबके प्रेम के लिए आपने जो दुरूह कार्य किया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है।

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  3. देवेन्द्र जी -
    अचूक वार किये हैं लगता है सुबह से शाम तक कोई और नहीं दिखा !

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  4. .
    .
    .
    हा हा हा हा,

    अब यह भी खूब रही... आप स्वयं तो १० रील लगातार 'धोबीपाट' झेले हैं और अब हमें भी कला फिल्मों में रूचि के नाम पर पर इस 'धोबीपाट' को झेलने की 'हिम्मत' बंधा रहे हैं...

    एक शब्द में अगर वर्णन करूँ तो देव आपकी समीक्षा के अनुसार फिल्म 'धोबीघाट' है- ' अझेल '



    ...


    ...

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  5. समीक्षा के लिए बधाई! फिल्म चाहे विशेष संवेदनशीलता के दर्शकों के लिए भले ही हो। पर मुझे लगता है कि सामान्य संवेदनशीलता के लोग भी इस में अपने लिए बहुत कुछ तलाश लेंगे। देखते हैं बॉक्स पर इस का क्या हाल रहता है।
    मैं इस फिल्म को अवश्य देखना चाहूंगा।

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  6. पता नही क्या संयोग है की मई जो फिल्म देखने की सोचती हूँ उसकी समीक्षा पहले ही इस ब्लॉग पर आ जाती है :) वैसे लिखा बहुत अच्छा है और मै इसे देखूँगी जरूर.

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  7. रोचक है प्रेम की यह श्रृंखला.

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  8. @मीनू जी ,आगे से मैं आपसे पूछ लिया करूंगा !:)

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  9. @प्रवीण शाह जी ,
    ऐसा मैंने कब कहा भाई ..अब आप सरीखे बुद्धिजीवी भी नहीं दिखेंगे तो पिक्चरवा बनाने का खरचावा कैसे निकलेगा माई बाप !

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  10. समीक्षा पढ़ कर झेलने की कोशिश करेंगे ...शायद अच्छी लगे यह फिल्म ...बेहतरीन समीक्षा की है ..

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  11. मिश्रा जी मेरा विरोध दर्ज किया जाए । मै पिछले कुछ महिनें से इस फिल्म का इंतजार कर रहा था , और अब आपने सांसत में फसा दिया है । क्या करुं पैसे का सवाल है । लेकिन आपने बड़ी मेहनत की है भईया वसूली के चक्कर में पूरी पिक्चर देख डाली आपको सलाम ।

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  12. मुझे तो फिल्म भी नहीं देखनी है... अब आमीर ने पूछा तो कह दूँगा कि पंडित जी ने मना किया था..

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  13. बहुत अच्छी समीक्षा ..... शायद उद्देश्य पुरस्कार समारोह ही हों ......

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  14. सुंदर समीक्षा जी, लेकिन अपने पास इतना समय नही, इस लिये साल मे एक आध फ़िल्म ही देख सकते हे

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  15. संयोग ही है की कल ही किरण राव की जबानी इस फिल्म की पूरी कहानी सुनी ...
    आजकल फ़िल्में देखना समय और पैसे दोनों की ही बर्बादी लगती है इसलिए नहीं देखती , अतः समीक्षा उपयोगी है ...

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  16. @वाणी जी ,
    सही कह रही हैं ,उस वक्त को ब्लागिंग में जाया कर सकते हैं :)
    रही पैसे की बात तो वह तो हाथ का मैल है ही !

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  17. चलिए जब यह धोबीपाट ही है तो फिर क्या देखना.

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  18. अरविंद जी हम तो फिल्म जरूर देखेंगे। आमिर खान के नाम पे झेल भी लेंगे। और इसीलिए आपकी पूरी समीक्षा नहीं पढ़ी।

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  19. @सोमेश भाई ,बहुत तेजू खां मत बनिए ..समीक्षा पूरी पढ़ के जाइए फिल्म को समझने में सुविधा होगी और ज्यादा एंजाय करेगें ..बड़ों की बात मान लेनी चाहिए:)

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  20. समीक्षा भी पढ़ लिया और देखने भी जा रहा हूँ.. :)

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  21. पी डी भैया इसे ही कहते हैं अक्ल की बात -न जाने कयूं लोग समझ नहीं पाते -अब देखिएगा कित्ता मजा आता है ई पिक्चरवा मा..लौट के बतयियो जरुर!और डोगरा कैसी लगें अभिनय में यह भी ! और ऊ बब्बर से आयिडेन्टीफायी तो नहीं कर लिए यह भी -इन्तजार करूंगा !

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  22. समीक्षा पढ़कर लग रहा है फिल्म झेली जा सकती है हा हा हा हा , जाते हैं झेलने और क्या...
    regards

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  23. blog-kar se ubren to na film-kar tak
    pahunche........dekhiyega.....ise bhi
    dekh lengen..............


    pranam.

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  24. अरविन्द जी, मुझे नहीं लगता आमिर खान कोई बहुत अच्छी फिल्म बनाते हैं, हाँ प्रचार जरूर ऐसा होता है जैसे भारतीय सिनेमा में ऐसी मूवी न कभी बनी न बनेगी |

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  25. मिश्रा जी आपने तो दिल पे ले लिया. मैंने ये तो नहीं कहा था कि आपकी समीक्षा अच्छी नहीं है.
    मैंने तो बस इसलिए नहीं पढ़ा था क्योंकि फिल्म की कहानी जान लेने के बाद उसे देखने का मजा कम हो जाता है.
    मैं अपने सीमित बुद्धि से फिल्म समझने और एंजॉय करने की कोशिश करूंगा यदि असुविधा हुई तो फिर आप तो हैं ही सहायता के लिए :)

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  26. अब आप भी न सोमेश भाई -पढ़ कर जायेगें तो ज्यादा आनंद उठायेगें -सच्ची -यह कहानी के लिए नहीं मगर फिल्मांकन की खूबियों के लिए जानी जायेगी !

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  27. चलिए आप का कहा मान लिया है हमने. आपकी समीक्षा भी पढ़ ली और चवन्नी चैप वाली भी. सच में इन पहलुओं को जानना जरूरी था.

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  28. जितना सुना था मन तो नहीं है देखना का ..पर आपकी समीक्षा पढकर लग रहा है एक बार झेलने की कोशिश कि जाये.

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  29. सीमा जी ,शिखा जी ,
    आमिर खान दम्पति ने यह एक ऐसी चाशनी उतारी है जिसे जो न चखे वह पछताए और जो चख ले वह तो खैर पछतायेगा ही :)

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  30. चाहे जैसी हो देखनी है इसीलिये पोस्ट नहीं पढ़ी.

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  31. पंडित जी , धोबी घाट को छोडिये ।
    कल टी वी पर एक फिल्म देखि --फंस गए ओबामा ।
    एक बार ज़रूर देखिये ।

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  32. हम तो देखने जाने वाले थे लेकिन किरण राव का स्टेटमेंट पढ़ के नहीं गए. पसंद आ जाती तो उनके टार्गेट ऑडीएंस बन जाते. इस बात पर हमने फैसला किया कि उनके खाते में अपनी चवन्नी भी नहीं जाने देंगे :) अब आराम से कुछ दिनों बाद देखी जायेगी.

    भर्तृहरि वाला श्लोक बढ़िया है. उस ज़माने में भी लव पेंटागन होते थे ? बहुत खूब.

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  33. `मगर एक ख़ास संवेदनशीलता वाले आडियेंस के लिए ही है...'

    हम उस केटेगेरी में नहीं आते डॊक्टर साहब :)

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  34. बढ़िया समीक्षा है..
    फिल्म देखनी तो है ही...क्यूंकि एक सामान रूचि वाली सहेली ने इस फिल्म को देखने के बाद SMS किया....loved it.intense,great acting....great editing, good portrait of Mumbai...I was engrossed..
    देखूं ,मुझे कितना engrossed कर पाती है....यह फिल्म.

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  35. "intense,great acting....great editing, good portrait of Mumbai"
    रश्मि जी ,
    आपके मित्र ने इस फिल्म के लिए सटीक शब्द प्रयोग किये हैं -इसका नाम भी मुंबई डायरी है मगर पोर्ट्रेट ज्यादा सही शब्द है !

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  36. अरविन्द जी ,
    "मन लै गई रे धोबनियां रामा कैसा जादू डार के"
    वाला रंग उतरे तो किरण / आमिर / प्रतीक / मोनिका / कीर्ति वाले धोबीघाट के पार्श्व से उदभूत बे-धोबन से प्रेम प्रमेय देखने / हल करने, की सोचें :)

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  37. अरे यहाँ तो नयी पोस्ट भी है ... मैंने लगता है पिछली पोस्ट पे क्लिक कर दिया था पहले ... पर मैं इस पोस्ट को अभी नहीं पढूंगी मिश्र जी ... मैंने अभी फिल्म देखि नहीं है ... और अगर आपने स्टोरी लिखी होगी तो मुझे फिल्म में मज़ा नहीं आएगा ... हाहाहा .... तो पोस्ट पर कमेन्ट बाद में .. :)

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  38. अगर यह मानवीय सम्बन्धों की सहजता का वर्णन है तो हमें मात्र घास छीलना आता है! :(

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  39. Behtareen sameeksha. Amir Khan ki pehli movie jo dobara nai dekhna chahunga.

    -Mayank

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  40. संयोग से अत्यंत व्यस्त था और व्यस्तता कम होने पर यह फिल्म देखने की योजना बना रहा था. मेरे लिये क्या सलाह है?

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  41. आपकी समीक्षा पढ़ ली, अब मूवी को समझने में आसानी होगी. कहीं सुना था "यह कहानी किरण राव की डायरी है और फिल्म आमिर का किरण के लिए प्यार." दर्शक तो बस यूँ ही हैं, आते - जाते रहते हैं.

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  42. @वर्मा जी ,
    कहानी पढ़ कर ही जाईयेगा ....केवल दृश्यों ,मनुष्य के व्यवहार -हाव भावों का आनन्द उठाने के लिए ....
    बिना कहानी पढ़े गए तो आप जानिए आपका काम

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