मंगलवार, 25 जनवरी 2011

तिरंगे का अपमान हमारा खुद का अपमान है ....


जम्मू कश्मीर के दो झंडे हैं -एक राज्य का झंडा और दूसरा झंडा है अपना तिरंगा! अपने तिरंगे को वहां दोयम दर्जा मिला हुआ है. लाल चौक पर हमारे आन  बान शान   की निशानी तिरंगे को  फहराने को  लेकर गतिरोध  कायम है -मुल्ला उमर  कृत -संकल्पित हैं कि वे इसे फहराने नहीं देंगे और वह भी गणतंत्र दिवस के दिन ..यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है ....मतलब हम अपने ही देश में अपना तिरंगा नहीं फहरा सकते ...मुट्ठी भर अलगाववादियों के आगे वहां की सरकार ने घुटने टेक दिए हैं ....नए नए तर्क गढ़े जा रहे हैं ..नई पेशबंदियाँ और दुरभिसंधियाँ बन रही है ..सारा राष्ट्र इसे बेबसी और बेकसी से देख रहा है ..यह भारत की संप्रभुता पर फिर एक प्रहार है.

ब्लॉगर मित्रों ,ऐसे समय शुतुरमुर्गी व्यवहार के नहीं होते ..एक राष्ट्रवादी होने के नाते आप इसका विरोध नहीं करते तो  आप अपनी मातृभूमि और अपने जमीर के साथ धोखा करते हैं ...अन्यान्य विमर्श तनिक स्थगित कीजिये ..राष्ट्र के आह्वान पर कुछ तो बोलिए ..यह समय चुप रहने का नहीं है मुखर हो जाने का है ... अगर हम लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहरा सके तो स्वतंत्र भारत का यह काला दिन होगा ....चाहे जो भी हो, अपने ही देश में  अपने स्वाभिमान के प्रतीक झंडे को सम्मान न दिला पाने के विरोध में दिए गए सारे तर्क भोथरे हैं ....

मुझे याद है १९९२ में मुरली मनोहर जोशी ने महज यह सन्देश देने के लिए कि कश्मीर भारत का ही एक अविभाज्य अंग है लाल चौक और फिर १९९३ में गणतंत्र दिवस पर कन्याकुमारी में  गांधी मंडप पर  तिरंगा फहराया था ..मेरा सौभाग्य था कि मैं उस समय कन्याकुमारी में मौजूद था ...सच मानिए मित्रों रोम रोम पुलकित हो गया था -यह अनुभूति ही कि कश्मीर से  कन्याकुमारी तक  भारत एक है मन  प्राण को एक उमंग और रोमांच से भर देता है ...यह यात्रा भारत की एकात्मता की प्रतीक यात्रा थी ...एक सन्देश कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक हम एक हैं ...ऐसे क़दमों  के राजनीतिक निहितार्थ भले हों मगर इनका एक मकसद निश्चित ही अलगाव वादी ताकतों के सामने अपनी एक जुटता प्रदर्शित करने का है ..

न न मित्रों यहाँ कोई लफ्फाजी नहीं है बस आपसे एक अपील कि चुप न रहिये मुखर होईये और लाल चौक पर तिरंगा फहराने का विरोध करने वालों के विरुद्ध जनमत तैयार कीजिये -तिरंगे का अपमान हमारा खुद का अपमान है ....

92 टिप्‍पणियां:

  1. आपका कहना सही है।
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

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  2. तिरंगा हमारा मान है, हमारी पगड़ी है, लेकिन पगड़ी को हर कहीं नहीं पहना जाता है। उसे हर कहीं नहीं उछाला जाता है। यहाँ तो तिरंगे को सरे आम उछाला जा रहा है जो घोर निंदनीय है। कोई कहेगा कि मैं तो 15 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा पहनाउंगा तो क्या उसे यह इजाजत दी जा सकती है? देश की सारी समस्याएँ हल हो चुकी हैं, अब केवल लाल चौक पर तिरंगा पहनाना शेष है। आज यहाँ कोटा में भाजपा लोग कलेक्ट्री पर धरना दिए बैठे थे। उन का नगर अध्यक्ष बहरूपिये की तरह पीली कमीज पहने भाषण दे रहा था। धरनार्थियों की संख्या देख खुद भाजपा को शर्म आयी होगी। कोई उस का भाषण सुनने को तैयार नहीं था।
    यह भाजपा की अत्यंत निम्न स्तरीय राजनीति है। लोगों का ध्यान उन की वास्तविक समस्याओं की ओर से भटकाना और कृत्रिम मुद्दों को उछालना इस का उद्देश्य है। तिरंगे के नाम पर जनविरोधी कृत्य है। जनता इसे पहचानती है, इस का सबूत आज के धरनों में जनता का विलगाव है।
    लाल चौक पर तिरंगा पहराना ही था तो उस की घोषणा की जरूरत क्या थी। सौ-पचास लोग बिना सूचना के लाल चौक पहुँचते और तिरंगा फहराते। उन का उद्देश्य वस्तुतः तिरंगा फहराना नहीं बल्कि उसे न फहराना था। किसी की जेवनार बिगाड़नी हो तो वहाँ किसी बात को ले कर उत्तेजना पैदा कर दो, जिस से वहाँ लोग जाएँ नहीं या फिर बिना भोजन किए लौट आएँ। कोई भी सच्चा देशभक्त भाजपा की इस कीचड़ राजनीति का समर्थन नहीं कर सकता। हाँ,कुछ भावुक लोग इस का शिकार हो सकते हैं, यह राजनीति अलगाववादियों को ही मदद कर रही है। वैसे भी भाजपा और उन की राजनीति में अंतर भी क्या है?
    राजनीति तो वह होनी चाहिए, जिस का परिणाम यह हो कि कश्मीरी खुद शान से लाल चौक पर तिरंगा फहराएँ।

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  3. आपकी बात से पूरी सहमति है| कश्मीर बेचने वाले नेता तिरंगे को रोकने के बजाय अगर तिरंगा फहराने वालों को पूर्ण सुरक्षा और सम्मान देने का वचन देते तो जनता, कश्मीर और सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रति उनका सम्मान और मुद्दों के प्रति उनकी परिपक्वता ही दिखाई देती. मगर जो इनके पास है नहीं वह लायें कहाँ से?

    विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
    झंडा ऊँचा रहे हमारा

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  4. @दिनेश जी ,शुक्र कीजिये इन भाजपाईयों के कारण कईयों को तिरंगे की याद तो आ जा रही है ..नहीं तो हम इतने गए गुजरे और जमीर से खाली हो चुके हैं कि अपनी रोजमर्रा की लूट खसोट की बेहयाई भरी जिन्दगी में तिरंगे की कौन कहे अपनी माँ और मातृभूमि तक को भूल चुके हैं -आखिर उसी चक्की का आंटा दाल वे भी खाते हैं और उसी ठेले की सब्जी भी जहाँ से हम खाते हैं -मगर उनके खून में उबाल आता है और हमारा ठंडा पद गया है -
    मैं इस मुहिम के साथ हूँ -अगर कल लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहरता तो मेरे लिए और तमाम राष्ट्रवादियों के लिए यह काला दिन होगा !

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  5. प्रतीक है हमारे गौरव का, प्रतीक है हमारी सम्प्रभुता का।
    यदि अब भी न फ़हरा सके तिरंगा देश के सभी कोनों में तो क्या खाक गर्व महसुस करते हैं देश की एकता कश्मीर से कन्याकुमारी का?

    तिरंगा वहाँ फ़हराने का गौरव है जहाँ सम्प्रभुता खतरे में है। यदि यह साहस भी हम में न आया तो क्या खाक़ गौरव गान गाया?

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  6. व्यर्थ का उन्माद है ये, और कुछ नहीं। लाल चौक का नाम जोड़ना ही इस बात का साक्ष्य है मिश्र जी कि बात त्तिरंगे को फहराने की नहीं, वरन उसके नाम पर राजनीति करने की है। भाजपा का प्रबल समर्थक होते हुये भी मैं नहीं समर्थन करता इस कदम की। शांति के ओर बढ़ते कश्मीर को और अशांत करने का प्रयास है, जो किसी भी कीमत पर स्वीकर नहीं होना चाहिये। लाल चौक का नाम क्यों लिया जा रहा है बार-बार? वो आयें और उमर अब्दुला के साथ शान से बख्शी स्टेडियम में शामिल हों झंडोतोलन में?

    द्विवेदी जी से शत-प्रतिशत सहमति।

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  7. तिरंगें में राजनीति नहीं, निश्चयनीति हो।

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  8. अरविंद जी,
    ये भाजपा वाले पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में तिरंगा फहराने जाएँ तो मैं भी साथ जाने को तैयार हूँ।
    ये वही लोग हैं जो एक बार नहीं अनेक बार तिरंगे को अपने पैरों तले रोंद चुके हैं। क्या कहते हैं, उसे? नौ सौ चूहे खाय के बिल्ली हज को जाय।

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  9. लाल चौक पर तिरंगा फहराए जाने का विरोध कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी है और अब्दुल्ला परिवार तो नेहरु के ज़माने से ही नेहरु-गाँधी परिवार के पिछलग्गू रहे है . कश्मीर आजाद हिंदुस्तान का अभिन्न अंग है और वहा तिरंगा फहराना हमार अधिकार और कर्तव्य भी . उम्मीद है कल तिरंगा शान से फह्रेगा लाल चौक पर .

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  10. @मेजर साहब मन की बात कह डालने के लिए शुक्रिया ,मगर एक नागरिक के रूप में मुझे एक सैनिक से यह बात सुन कर घोर निराशा हुयी है -आपका तो प्रोफेसनल दायित्व ही देश के शौर्य को बनाए रख्नने का है -... एक दिन पाकिस्तान का झंडा लाल किले पर फहराएगा -लाल चौक की बात ही छोड़ दीजिये -आखिर लाल चौक पर भी तिरंगा क्यों नहीं ?

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  11. दिनेश जी ,
    मैंने तो भाजपा की बात ही नहीं की है ,आपने उल्लेख किया ...
    मैं तो केवल लाल चौक पर तिरंगा फहराए जाने का पक्षधर हूँ !

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  12. ...और दिनेश जी आप तो लाल चौक से ही विमुख हो गए -पी ओ के की तो बात ही दूर की है !:)

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  13. साहेब, आज २० दिन बाद की-बोर्ड पर टाइप कर रहा हूं मात्र ये दर्शाने के लिए की आपके आलेख पर साधुबाद कहना चाहता हूं.... सेहमत हूँ.......

    @दिनेश राय जी, क्या घर बैठ जाने भर से देश की सभी समस्याने समाप्त हो जायेंगी......... तो बिठा दीजिए युवा मोर्चा को घर में.......... लेकिन आप कम से कम ये तो सोचिये कि वो राष्ट्र ध्वज लेकर लाल चौक जा रहे हैं...... अगर आपको आज ऐतराज है तो कल पाकिस्तान लाल चौक को अपने नक़्शे में दिखाए तो .... किसे क्या कहेंगे.....

    हम लोग खुद ही हार गए हैं और कश्मीर पड़ोसियों को परोस दिया है........ ये हकीकत है.

    जय हो भारत भाग्य विधाता............

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  14. आपके ब्लॉग की आज के पूर्व की अंतिम टीप में जिस श्लोक का जिक्र किया था , उसी को रख रहा हूँ :
    '' सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥''
    प्रसंगतः भी तिरंगा और लोगों के बीच के सुख-सम्बन्ध पर भी विचार किया जा सकता है ! तिरंगे पर धूमिल की कविता भी याद की जा सकती है ! बेहतर होगा !

    तिरंगे का अपमान नहीं होना चाहिए ! रही बात लाल चौक सन्दर्भ की तो पहले उसकी पूर्ण जटिलता को जानने के बाद ही कुछ कहना उचित होगा ! राष्ट्र शब्द के नाम लेने भर से हमें तिरंगा और भगवा एक नहीं कर देना चाहिए ! दोनों की वैचारिकी अलग है ! आभार !

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  15. यक़ीनन .... वहां तिरंगा ना फहराया जाने का अर्थ तो देश की संप्रभुता पर ही सवाल है .... आपसे सहमत हूँ...

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  16. Bade afsos kee baat hai..
    Gantantr diwas kee dheron shubhkamnayen!

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  17. आपका कहना सही है।.
    अफ़सोस जनक यह है की राष्ट्रवाद को भी राजनीति से जोड़ा जाने लगा है,समझ में नही आता की अब ये मुद्दे भी हम सब को आंदोलित नहीं कर पा रहे हैं.
    हम पढो-लिखों से अच्छे वे अनपढ़ हैं जो सीमा का महत्व और शान समझते है ,चाहे वह उनकी घर -खेत-खलिहान की सीमा हो या फिर देश की सीमा.
    और देश के इलेक्ट्रानिक मीडिया को क्या कहें वह भी इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनितिक पेट्रोल ही डालनें का काम कर रहा है,अफ़सोस जनक -बेहद अफ़सोस जनक.

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  18. मिश्र जी, बात तो वही निकली आपने कहा "भी"...मैं कह रहा हूं, लाल चौक "ही" क्यों?

    लाल चौक कोई चौक न हुआ कोई अभेद्य किला हो गया मानो। श्रीनगर का एक व्यस्त मार्केट भर है ये। सब के सब जाने क्यों इसे देश के आन-बान-शान से जोड़े जा रहे हैं। हँसी आ रही है मुझे।

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  19. गौतम जी ,
    मैं यह कह रहा हूँ -लाल चौक क्यों नहीं ?
    आप लोग देश के मनास की बात क्यों नहीं समझ पाते!
    तो क्या वह हिस्सा पाकिस्तान में आता है ?
    आपको हंसी क्यों आ रही है हमें तो क्षोभ है ...
    आप शायर भले लगते हैं :)

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  20. राष्‍ट्रीयता और देशप्रेम, सक्रियता के साथ ही शोभता है.

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  21. बहुत सही बात कही अरविन्द जी आप ने...राजनीति तिरंगे फहराने पर नहीं हो रही इसे नहीं फहराने देने पर हो रही है....अगर राजनीति होती तो भाजपाई ये नहीं कहते की कोई भी फहरा दे हमें बस तिरंगे के लाल-चौक पे फहराने से मतलब है. चाहे वो मनमोहन सिंह फहरा दें या फिर ओमर अब्दुल्ला.

    @गौतम जी कह रहे हैं की जो तिरंगा फहराना चाहते हैं वो बख्शी स्टेडियम में फहराएं....
    अरे अब्दुल्ला साहब लाल-चौक पे अगर तिरंगा फहरा देते तो देश वासियों को भरोसा हो जता..और विदेशियों को भी ये पता चल जता की कश्मीर और कश्मीरी के मन में क्या है.....
    मगर मुझे बड़ी बड़ी आशंका है....की कश्मीर भारत से दूर होता जा ....
    ये कांग्रेस ने अब हिन्दू और मुसलमान दोनों को आतंकी करार दे दिया है......
    इनके हिसाब से (और अन्य पश्चिमी मुल्कों के भी) सिर्फ इसाई ही आतंकी नहीं हैं...बाकी सब....
    सुधर जाओ नहीं तो सिधार जाओगे.....
    झंडे की यात्रा रोकने वाले मालूम नहीं क्या पा लेंगी यात्रा रोक के....
    जिन्हें रोकना चाहिए उनको तो रोकते नहीं.....
    ये रोकना ऐसे ही है.....जैसे विनाशकाले विपरीत-बुध्दी.
    कहा गया है...."जब नाश मनुज पे छाता है, पहले विवेक मर जाता है."

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  22. राजेश जी ,
    देखिये न भाई शांतिप्रिय(!) और व्यावसायिक बुद्धि के लोग यही चाहते हैं कि काहें को झगडा टंटा मोल लो ..अब लाल चौक में ही तो पाकिस्तानी झंडा फहरा रहे हैं ....कोई लाल किले पर थोड़े ही .....वाजिद अली शाह के नुमायिन्दों को कोई तो समझाए अगर ऐसे ही रहा तो दिल्ली भी कोई दूर नहीं ......
    अब अगर लाल चौक पर खुदा न खास्ता तिरंगा न भी फहरा तो कौन सी बड़ी बात हो जायेगी ?
    बी जे पी को उभरी नस दिख रही है वह उसे दबा कर जन मानस को जगा रही है ..मगर यहाँ तो खर्राटे लिए जा रहे हैं ..

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  23. अरे वाह इसीलिए तो मै आपको अपना गुरुजी नामता हूँ । अभी आज सोच ही रहा था कि कुछ लिखूं इसपर कि आपकी पोस्ट आ गयी वह भी मेरे विचारों से मिलता जुलता । बहुत सही कहा आपने । जिस कश्मिर के लिए कितनी माँओ ने अपना बेटा कितनो ने सुहाग और कितनो ने भाई खोया है उस कश्मिर में हम झण्डा नहीं फहरा सकते हद है , बहुत गुस्सा है लेकिन कोशिश कर रहा हूँ कि शांती से कमेंट करुं । कश्मिर भारत का है और रहेगा और...... यहीं आपके ब्लोग पर कहता हूँ जिस दिंन कश्मिर को भारत से अलग किया जायेगा तनिक भी देरी नहीं लगेगी इन हाथों को हथियार उठाने में । साला हद हो गई है कमीना पन की , कश्मिर को जो कुछ मिलता है वह भारत से ही है और कहीं से नहीं । इसी कश्मिर में आये दिंन पाकिस्तान के झंडे लहराएं जाते है, पाकिस्तान जिंदा बाद के नारे लगाये जाते , लगता है जैसे हम पाकिस्तान मे हों । तब कोई चू नहीं बासता , फिर वह चाहे गौतम राजरिशी जी हो या दिनेश राय जी हो , आपसे पूरी तरह सहमत हूं । हम इसके पक्ष में मात्र इसलिए नहीं कि ये भारतिय जनता पार्टी कर रही है, ये भारत की आम आवाज है जो चाहती है कि झंडा फहरे तो फहरे ।

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  24. अजीब सी स्थिति है
    भारतीय जनता पार्टी आज तक अरविन्द मिश्र जैसे भटकौओं के बिना पर ही जीवित है. यह बात क्यूँ नहीं समझ आती कि यह पार्टी सिर्फ जनता की भावनाओं के साथ खेलना जानती है. देश में उन्माद का वातावरण उत्पन्न हो, उनका यही प्रयास रहता है.
    आखिर भाजपाई शासन भी रहा था देश में. बताओ तो कि क्या उखाड़ा था लाल चौक में ? मानता हूँ कि यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है लेकिन इस पर यह रवैया सिर्फ एक राजनैतिक स्टंट मात्र है. वैसे भी भा०जा०पा० का हमेशा से यही प्रयास रहा है कि देश में कैसे बवंडर लाया जाए.
    भारतीय जनता पार्टी एक दोगली पार्टी है. इसको न राम मंदिर से वास्ता है और न ही देश की संप्रुभता से.

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  25. अब बेनामी भाई आ गए -मुंह छिपा के -अब ऐसों से तो झंडा उठने से रहा ...लाल चौक इनकी सात पीढियां नहीं पहुँच पाएगीं !

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  26. आपसे सहमत हूँ की ये काला दिन है......इतनी उदासीनता अच्छी नहीं किसी भी राष्ट्र के लिए. कांग्रेस को भारत का झंडा फहराने से परहेज है ....अरे वहाँ भारत का नहीं तो क्या पाकिस्तान का फह्रेगा.....या ये लोग इटली का झंडा फहरेने की सोच रहे हैं.........
    कांग्रेस ना जाने कब गुलामी की मानसिकता से उबरेगी....
    जब ३ दिन राम ने प्रतीक्षा की थी तब तक समुद्र ने रास्ता नहीं दिया था जब बल प्रयोग की ठानी तब मार्ग मिल गया....
    कांग्रेस और अब्दुल्ला को कोई परेशानी नहीं होती अगर तिरंगे में "चक्र" की जगह "पंजा" होता....
    नमक-हरामी की हद है.....

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  27. आपसे सहमत हूँ की ये काला दिन है......इतनी उदासीनता अच्छी नहीं किसी भी राष्ट्र के लिए. कांग्रेस को भारत का झंडा फहराने से परहेज है ....अरे वहाँ भारत का नहीं तो क्या पाकिस्तान का फह्रेगा.....या ये लोग इटली का झंडा फहरेने की सोच रहे हैं.........
    कांग्रेस ना जाने कब गुलामी की मानसिकता से उबरेगी....
    जब ३ दिन राम ने प्रतीक्षा की थी तब तक समुद्र ने रास्ता नहीं दिया था जब बल प्रयोग की ठानी तब मार्ग मिल गया....
    कांग्रेस और अब्दुल्ला को कोई परेशानी नहीं होती अगर तिरंगे में "चक्र" की जगह "पंजा" होता....
    नमक-हरामी की हद है.....

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  28. @@@द्विवेदी जी आप अपने देश में झंडा फहरा नहीं पा रहें है या फिर कहें कि नहीं फहराना चाहते और पाकिस्तान मे फहराने की बात कह रहे हैं , क्या बात है ।

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  29. मैं दिनेश जी और गौतम जी की बात से सहमत हूँ. तिरंगे को फहराना शान की बात तब हो जब स्वयं कश्मीर के लोग अपने मन से उसे फहराएँ. किसी से बलपूर्वक सम्मान नहीं लिया जा सकता और अपने राजनीतिक लाभ के लिए तिरंगे को माध्यम बनाकर भाजपा वस्तुतः उसका अपमान कर रही है. मैं भाजपा के इस कदम का समर्थन नहीं करती.

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  30. @मुक्ति ,
    आपके विचार का मैं मुखर विरोध करता हूँ और आपको एक राष्ट्र द्रोही के समकक्ष रखता हूँ -
    दिनेश जी प्रछन्न कम्युनिस्ट हैं और मेजर राजरिशी कोर्ट मार्शल के तुल्य !
    ये मेरे स्पष्ट विचार हैं इनसे मैं हरगिज समझौता नहीं करूँगा !

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  31. उमर अब्दुल्ला (मुख्य मंत्री) कहते हैं कि इस आडम्बर के लिये वो लालचौक ख़ाली करवा देंगे.. कमाल है, झण्डारोहण आडम्बर है!
    मनमोहन सिंह(प्रधान मंत्री)का कथन है कि यह मुद्दा राजनैतिक हिसाब बराबर करने का नहीं है. कमाल है, ध्वजारोहण एक राजनैतिक मुद्दा है!!
    वैचारिक दिवालियेपन की यह पराकाष्ठा है!!

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  32. @ठीक कह रहे हैं सलिल जी -ऐसे लोग हैं जिनके लिए कहा जाता है की खून ठंडा है -बस मजे से जिन्दगी कटती रहे ...न कोई निज गौरव और न ही स्वाभिमान -थू है ऐसी जिन्दगी पर !

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  33. अगर भाजपा के समर्थको के तिरंगे फहराने से शांति भंग हो रही है तो जम्मू और कश्मीर की सरकार या फिर केंद्र सरकार को झंडा फहराने चाहिए, ताकि कम से कम पाकिस्तान और चीन को तो पता चले की यह भारत का अभ्भिन अंग है, जो मानने से इंकार करते है. ताकि भविष्य में वहा घुसपैठ न हो सके, staple visa न जरी हो. अगर ऐसा न हो सका तो अगली बरी अरुणाचल प्रदेश की है, तैयार हो जाओ वहा भी शांति भंग हो जाएगी. रही पार्टियों की पहचान की बात तो देश की जनता तीनो पार्टियों को अच्छी तरह जानती है.

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  34. अब तो यह प्रश्न करने का समय आ गया है कि क्या जम्मू कश्मीर भारतवर्ष का अविभाज्य अंग है?? अगर इसका उत्तर हाँ है तो इतना हंगामा क्यों.. राष्ट्रीय पर्व पर, राष्ट्रीय ध्वज को राष्ट्रीय भौगोलिक सीमा के अंदर फहराना अपराध कब से हो गया..
    और अगर इस प्रश्न का उत्तर ना में है तो वास्तव में कर्नाटक से दिल्ली आ रही गाड़ी के सवारियों केसाथ हुआ,वो उचित था!!

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  35. कमाल है राष्ट्र के नाम पर भाजपा को अछूत बनाना....बहुत बुरी बात....
    अब तक के घटना क्रम को देख कर एक बात मैं जरूर समझ गया हूँ....
    अगर यही झंडा फहराने का काम गौर भाजपा दल कर रहे होते तो किसी को कोई आपत्ती नहीं होती.....
    सबने ईमान को बेच खाया है......
    दोषी तो अब्दुल्ला और मनमोहन (मौनमोहन) हैं ना की भाजपा.....
    भाजपा की जगह कोई भी फहरा दे वहाँ झंडा झंझट ही ख़तम हो जाए....
    ऐसा क्यों नहीं करते.....
    क्या करें ये जानवरों के दूध पीने वालो के बोल हैं.....
    माँ के दूध पीने वाले ऐसा नहीं का करते.....
    अमरनाथ जी की बात से सहमत....

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  36. अरे आपस मे क्यो बहस करते हो भाई, सम अपनी अपनी राय तो दे सकते हे, तो फ़िर टकराव केसा? क्या हम बिना बहस के कोई सलाह नही कर सकते, दिनेश जी ओर गोतम जी ने सब हम सब को अगाह किया हे कि हमे इन नेताओ की बातो मे नही आना चाहिये, ओर यह काम जजवात मे आ कर नही दिमाग से किये जाते हे,दिल तो हम सब का जलता हे इन सब खबरो को सुन कर, लेकिन इन बातो से असली बात दब जाती हे, ओर हमे सरकार को मजबूर कर देना चाहिये कि काशमीर के बारे आर पार की बात करे दोगली बात ना करे, ओर जो यह लाल चोक की बात हे यह असली मुद्दे से भटकाने वाली बात हे, इस का लाभ हम सब को या देश को नही मिलने वाला..... इस का लाभ इन नेताओ को मिलेगा,

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  37. एक गणतांत्रिक स्वतंत्र देश में कही भी झंडा फहराने की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए ...उक्त स्थान पर यदि हम झंडा नहीं फहरा सकते तो हमें यही मान लेना चाहिए की वह हमारे देश में है ही नहीं ...फिर क्यों उसकी सुरक्षा व्यवस्था में जन -धन का बलिदान किया जा रहा है..

    मगर किसी भी राजनैतिक दल का इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किये जाने की मैं विरोधी हूँ ...यह जनमानस की आवाज होनी चाहिए...देश प्रेम का प्रतीक है तिरंगा ,लहराए हमेशा शान से मगर सिर्फ तिरंगा लहरा देना ही देश प्रेम नहीं है ..

    और सिर्फ लाल चौक ही नहीं , देश में ऐसे बहुत से स्थान बनते जा रहे हैं जहाँ तिरंगा नहीं फहराया जा सकता है ...और इसके लिए सिर्फ कोई एक सरकार या राजनैतिक दल जिम्मेदार नहीं है..इस राजनीति ने बहुत शर्मशार किया है हमें..

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  38. @वाणी जी ,
    हमें ऐसे अवसरों पर घुमाफिरा कर नहीं स्पष्ट विचार रखने चाहिए -लाल चौक पर तिरंगा फहरना चाहिए ..राजनीति के बिना और बावजूद भी -और अगर कोई भी इसका विरोध करता है अपने बौद्धिक क्लैव्यता या सुविधाभोगिता के कारण तो उसकी भी कड़े शब्दों में भर्त्सना होनी चाहिए -एक गणतंत्र के लिए राष्ट्र के लिए ये आत्मघाती स्वर हैं ....
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं के साथ आज हमारा संकल्प हो की हम लाल चौक पर तिरंगा फहराएगें और अगर ऐसा नहीं हो सका तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों को उनकी औकात बता कर रहेगें ...यह निज गौरव और अस्तित्व की बात है ...

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  39. मैंने घुमा फिराकर बात कही है ...?
    बिलकुल नहीं ...

    मैंने साफ़ ही कहा है की देश में कही भी झंडा फहराए जाने का मौलिक अधिकार हर देशवासी का है ...और यदि वह स्थान हमारा नहीं है तो हमें उसपर अपना अधिकार छोड़ देना चाहिए ...

    मैंने घुमा फिराकर बात कही है ...?
    बिलकुल नहीं ...
    मैंने साफ़ ही कहा है की देश में कही भी झंडा फहराए जाने का मौलिक अधिकार हर देशवासी का है ...और यदि वह स्थान हमारा नहीं है तो हमें उसपर अपना अधिकार छोड़ देना चाहिए ...उस स्थान की सुरक्षा के लिए हम अपने बच्चों का बलिदान क्यों कर रहे हैं !!

    लेकिन राजनैतिक दलों को देशप्रेम दिखाने के और अवसरों को भी ज़ाया नहीं करना चाहिए ...क्यों नहीं राजनैतिक दलों को यह नियम बना लेना चाहिए की किसी भी दल की सदस्यता के लिए उनके परिवार का एक व्यक्ति फौज में जरुर होना चाहिए और उनकी पोस्टिंग सीमा पर !

    उत्तर देंहटाएं
  40. @@@@@मुक्ति जी
    क्या बात कही है आपने , जोर जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए बहुत खूब , जरा सोचिए अगर आपके जैसी सोच हमारे वीर क्रान्तीकारियों के रहें होते तो हम आज भी गुलाम ही होते , लहू बहाए हैं वीरों ने देश को आजाद करवाने के लिए , खूद की आजादी जब मांगने पर नहीं मिली तब छिनना पड़ा , खैर आप मुझसे बेहतर जानती होंगी । शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को अपने देश में ही ध्वजारोहण का विरोध कर रहे हैं , मेरा मानना है कि ऐसे लोगों पर भी देशद्रोह का केस होना चाहिए ।

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  41. कमाल है मिश्र जी, आप ने तो विनम्रता का दामन भी छोड़ दिया। कश्मीर में क्या हो या नहीं हो, इसकी बात दिल्ली और लखनऊ में बैठ कर करना बड़ा ही आसान है। कई साल लगे हैं इस लाल चौक का माहौल एक आम चांदनी चौक जैसा करने में। कई दोस्तों को शहीद होते देखा है इसी जगह पर और अब जाकर नौबत आई है कि श्रीनगर के इस व्यस्त बाजार से हमजैसे लोग अपने जरूरत की चीजें खरीद सकें। लेकिन उसे फिर से महज स्यूडो पेट्रियोटिज्म के नाम पर तूफ़ान में डालना कितना उचित है, सोचने की बात है।

    दूबे जी और मिश्र जी की बड़ी-बड़ी बातें और व्यर्थ का आक्रोश है जो कश्मीर को कभी सहज नहीं होने देगा। वास्तविकता से कोसों दूर उन्माद भरी टिप्पणियां और कुछ न करेंगी, बल्कि हालात को और मुश्किल ही बनायेंगी नार्मेलसी बहाल करने में।

    कोर्ट मार्शल वाली बात सुनकर मुस्कुरा रहा हूँ। कभी जवाहर सुरंग को पार कीजिये और आइये घुमिये फिरये यहाँ लाल चौक पर...बड़ी अच्छी शापिंग करवाऊंगा...निमंत्रण आपको और दूबे जी, दोनों के लिये खुला है।

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  42. लल्लो-चप्पो नहीं बोलूंगा मैं... लाल चौक हो या हरा चौक या पीला चौक देशं की मिट्टी के किसी भी टुकड़े पर तिरंगा फहराने का हक हर भारतीय का है चाहे वो भाजपा का सदस्य हो या किसी और दल का... इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि इसके पीछे भाजपा का अपना राजनीतिक स्वार्थ है पर राजनीतिक स्वार्थ किस पार्टी का नहीं होता.. हर पार्टी अपनी विचारधारा को कई तरीकों से जनता तक पहुंचाना चाहती है... फिर भाजपा अगर अपनी कट्टर राष्ट्रवादी छवि को डंके की चोट पर दिखाना चाह रही है तो इसपर तिलमिलाहट क्यों... रही बात कि 'लाल चौक ही क्यों?' की तो मैं कहूँगा कि लाल चौक क्यों नहीं? वो किसी की बपौती है क्या?
    एक कुतर्क दे रहे हैं लोग कि इससे वहाँ अशांति फ़ैल सकती है, तनाव बढ़ सकता है... राजधानी दिल्ली में आकार कोइ आपकी संप्रभुता को ठेंगा दिखाकर कश्मीर को भारत से अलग बताकर चला जाता है... उससे सरकार को तनाव बढ़ने का डर नहीं लगता... कई राज्यों में अनपढ़ गरीबों-आदिवासियों को बहला-फुसला कर बन्दूक बांटे जा रहे हैं... दिल्ली के प्रमुख विश्वविद्यालय में भारत के खिलाफ सशत्र लड़ाई लड़ने के खुलेआम भाषण दिए जा रहे हैं.. इनसे तनाव भडकने का डर नहीं लगता सरकार को.. तिरंगा फहराने से तनाव फ़ैल जाएगा... तनाव तो वहाँ सेना के रहने से भी फ़ैल रहा है तो उसे भी हटा लिया जाए वहाँ से... हद है नपुंसकता की....

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  43. आपसे सहम्त हैं। आपको गनतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें।

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  44. अपने कमेन्ट के साथ ही मैं दिनेश राय दिवेदी जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। हमारे नेता भी बहुरूपिये हैं इन पर विश्वास नही रहा अब। और गौतम राज रिशी ने इसका सही हल सुझा दिया है। उन से बेहतर वहाँ की स्थिति कौन जानता है। शुभकामनायें।

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  45. गौतम जी ,
    अगर स्पष्टवादिता और मुंहदेखी बात न करना विनम्रता का दामन छोड़ना है तो है मुझे यह आरोप जो कोई नया नहीं है बार बार स्वीकार है ,एक ख़ास तरह की मानसिकता वाले यह आरोपण मेरे ऊपर करते रहते हैं -ताज्जुव है कई दोस्तों की शहादत के बाद भी आपकी खून सर्द है जुबान लकवा मार गयी है -एक सीमा प्रहरी यह बोल रहा है! और अलगाववादियों की खुलकर तरफदारी कर रहा है -यहाँ कोई क्षद्म देशभक्ति नहीं बल्कि आप मुट्ठी भर लोग जो कर रहे हैं वह क्षद्म निरपेक्षता से भी बढ़ कर देश की अखंडता और संप्रुभता के साथ कम्प्रोमायिज है ....आश्चर्य है देश के प्रहरी अब ऐसा सोचने लगे हैं जिनके पीछे करोड़ों लोगों के अरमान और आकांक्षायें गिरवी रखी होती हैं ..निश्चय ही ऐसे विचार आपके अपने निजी हैं भारतीय सेना की नुमायन्दगी नहीं करते होंगें ...
    हमारा आक्रोश कोई व्यर्थ का आक्रोश नहीं है मान्यवर -यह क्या रंग खाएगा यह आपको कश्मीर में रहते ही पता चल जाएगा ..डरिये मत मेजर साहब .....हम आप जैसो की कमी भी पूरी करेगें ....आज नहीं तो तिरंगा वहां फहरेगा ही ....
    और हम वहां शापिंग करने आयेगें तो अब आप जैसे दुभाषियों के बुलावे पर तो नहीं ही आयेंगे ---
    हमें अब अपने बीच के ही परायों की पहचान करना आ गया है ....

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  46. मेरी इस बात से पूरी सहमति कि जो इलाका हमारा है वहां पर तिरंगा फहराना ही चाहिये। लेकिन इसके पीछे हो रही भाजपा की भावनात्मक राजनीति की बात भी उतनी ही सच है जितनी कि कांग्रेसी तुष्टीकरण की नीति।

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  47. लाल चौक समेत देश के हर कोने में तिरंगा फहराने से सहमत !

    तिरंगे की आन बान शान की ओट में दलगत राजनीतिक उद्देश्य और कोई छुपे हुए मंतव्य ,यदि हों तो उन्हें भी तिरंगे का अपमान मानूंगा !

    आपने अपनी भावनायें खुल कर लिखी मैंने उनसे सहमति जताई पर एक असहमति भी नोट करिये आप अपने टिप्पणीकार मित्रों के प्रति 'हार्श' हो जाते हैं यह उचित नहीं है उनके पाइंट आफ व्यू से असहमत होना अलग बात है पर उन्हें देश विरोधी करार देना जंचता नहीं ! मुझे नहीं लगता कि उनमे से किसी ने भी तिरंगे के प्रति कोई अवांछित टिप्पणी की है ! अगर वे राष्ट्रवाद के प्रतीकों के उपयोग की नीयत पर सवाल खड़े कर रहे हों तो उनके सवाल और उनकी शंकाएं उनका अधिकार है चूंकि आपने संवाद शुरू किया है अतः आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप शंकाओं का समाधान करें या फिर असहमत बने रह कर भी संयत रहें !
    मुझे लगता है कि आप द्विवेदी जी /मेजर राजरिशी एवं सुश्री मुक्ति के शब्दों और भावनाओं को विमर्श का सहज अंग माने ! सुझाव ये है कि फतवों और विमर्श का अंतर भी यहीं से शुरू होता है !

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  48. राजरिशी जी बहुत-बहुत आभार आपका निमंत्रण के लिए । अगर सब कुछ ठिक ठाक रहा मेरे साथ तो मार्च-अप्रैल में कश्मीर आने का प्रोग्राम है , आपके साथ जवाहर सुरंग जरुर पार करना चाहेंगे ।

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  49. आदरणीय प्रोफ़ेसर साहब,
    1) आपकी पोस्ट की मूल भावना से पूर्ण एवं ठोस सहमति…
    2) दिनेशराय जी से घोर असहमति…
    3) मेजर गौतम जी से भी असहमति
    4) मेजर के प्रति आपकी भाषा से भी असहमति…
    5) अली साहब ने पते की बात कही है…

    कुल मिलाकर, जबरदस्त पोस्ट और कमेण्ट भी…

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  50. गौतम राजर्षि जी
    आपने पूछा कि आखिर लालचौक ही क्यो ?
    तो इसका उत्तर ये है क्यो कि अलगाववादियो ने इसी लालचौक पर पाकिस्तानी झंडा फहराया है.
    दूसरा कारण अलगाववादि यासीन मलिक ने इसी लालचौक पर तिरंगा फहरा के दिखाने की चुनौती दी.
    इस लिये बीजेपी लाल चौक पर ही तिरंगा फहराने की बात कर रही है .

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  51. गौतम जी वहाँ काफी समय तक रहे हैं.. वहाँ के माहौल को नजदीक से देखा है... वो कह रहे हैं तो उनकी बात में कुछ न कुछ तो होगा... पर जो भी हो अगर देश के लोग अपनी जमीन पर झंडा न फहरा रहे हों तो यह देश का दुर्भाग्य और वहाँ की सरकार के लिए डूब मरने की बात तो है ही...

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  52. कुछ लोग कहते है कि वहाँ तिरंगा फैलाने से तनाव फैलेगा
    अगर वहाँ तिरंगा फैलाने से तनाव फैलता है तो सर माथे पर ऐसा तनाव.
    ऐसी तनाव तब तक फैलता रहना चाहिये जब तक वहाँ असली शांति न हो.
    ऐसी नकली शांति का क्या फायदा जो तिरंगा फहराने से भंग होती हैँ.
    क्या भारत की जनता के टैक्स का सबसे ज्यादा भाग कशमीर पर इसी" नकली शांति" के लिये खर्च किया जा रहा है ?
    क्या हमने वहाँ रह रहे पाकिस्तानी विचारो वाले लोगो (जिनको तिरंगा से नफरत है) को पालने का ठेका लिया हुआ है.

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  53. अरविन्द जी,

    गौतम जी,मुक्ति, दिनेश जी सहित हर भारतवासी के दिल में तिरंगे के प्रति सम्मान और लगाव है...और सबकी तहेदिल से तमन्ना है कि देश के हर चौक पर फहराया जाए चाहे,वह कश्मीर का लाल चौक हो या हमारी कॉलोनी का गणेश चौक.

    मान लेते हैं,तिरंगा फहरा दिया गया...लेकिन कश्मीर में हिंसा भड़क उठी.कई जानें गयीं...जिसमे तिरंगा फहराने का विरोध करनेवाले और हमारे जवान भी मारे गए. यह मंजूर होगा,आपको?? तिरंगा तो एक दिन शान से लहरा गया...टी.वी. पर देख हम भी आह्लादित हो गए,ख़ुशी के आँसू आ गए हमारी आँखों में ....पर बाद में ,उन्ही तिरंगो में लिपटे जवानो के शव को देखना कैसा लगेगा??..आँसू तब भी आएँगे...तब इसका जिम्मेवार कौन होगा?

    जिन घरों के चिराग बुझे ,उनके मन में यह सवाल नहीं उठेगा कि काश उस दिन वहाँ तिरंगा फहराने की जिद नहीं की गयी होती तो आज उनके घर का चिराग नहीं बुझता. क्या उनके मन में ,ऐसे सवाल उठने के लिए उन्हें देश-द्रोही करार दे दिया जायेगा??

    अभी जरूरत जोर-जबरदस्ती से तिरंगा फहराने की नहीं...उन कश्मीरवासियों के मन में तिरंगे के प्रति प्यार और सम्मान पैदा करने की है. अलगाववाद की भावना उनके मन से निकालने की है ताकि वे खुद आगे बढ़कर तिरंगा फहराएं.
    हम सब दुआ करें कि अगले साल या पंद्रह अगस्त तक ही स्थिति इतनी सुधर जाए कि इस तरह की पोस्ट ना लिखनी पड़े.

    कश्मीर हमारा है तो वहाँ के रहनेवाले भी हमारे हैं...और उनकी सुरक्षा ही हमारी प्राथमिकता होनी चहिये ना कि ये बच्चों सी जिद कि हम तो अपने मन की करेंगे ...परिणाम चाहे जो भी हो. कोई जख्मी हो या किसी की मौत हो तो हमें क्या...हमने तो अपने देश-प्रेम का परचम लहराया.

    देखूं, मेरे लिए आपके शब्दकोष में कौन से शब्द इंतज़ार कर रहे हैं??

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  54. जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने
    इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने
    -शहरयार

    तिरंगा फहरे या न फहरे पर इस बहाने मिश्राजी इतना फायदा तो जरूर हुआ कि सयंमित से लगने वालो चेहरों से उनकी असलियत जरूर झलक गयी. वो गरीबी भी भली जो हमे अपने करीबी लोगो की असलियत से वाकिफ करवा दे. इस तरह के अवसर या ऐसी बहसों से तात्कलिक लाभ यही होता है कि ये समझ में आने लगता है कि सभ्य से दिखने वाले चेहरे अन्दर से कितने मक्कार और भ्रष्ट होते है. मिश्राजी आप बहुत सिम्प्लिस्टिक है कुछ लोगो के प्रति. उम्मीद है इन बहसों में जो नहीं दिखता उसको अपने अनुभव में शामिल करके ही भविष्य में इनसे उसी अंदाज़ में बात करेंगे.


    आश्चर्य है कि यह तो ख़राब लगा रहा है कोई ब्लॉगर किसी ब्लॉगर के दृष्टिकोण को सिरे से खारिज कर दे पर ये "हार्श" नहीं लग रहा है कि कोई राष्ट्र के स्वाभिमान से जुड़े प्रतीकों कि ऐसी कि तैसी कर दे और हम खामोश बैठे रहे.भावनाओ का भी विचित्र स्वरूप होता है. राष्ट्र भावना के सम्मान से जुड़ा तो पानी समान और अपनी क़द्र से जुड़ा तो लहू सरीखा कीमती हो गया.

    कंमेंट मिश्राजी लम्बा हो गया जैसा कि मेरे साथ अक्सर होता है सो उसे अलग पोस्ट के रूप में रख रहा हू. यहाँ पर बस इतना ही.

    Arvind K.Pandey

    http://indowaves.instablogs.com/

    http://indowaves.wordpress.com/

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  55. रश्मि जी ,
    तो यह बात है..... कितनी बहनों की राखियाँ नहीं बांध पाएगीं और कितनी मांगे सूनी हो जायेगीं -यह तर्क है जो लाल चौक पर तिरंगा फहराने से रोक रहा है -संभतः यही डर मेजर साहब को भी है -आपका एक सामान्य नागरिक होने के नाते यह दर जायज हो सकता है मगर एक राज्य अगर इस तरह का रोना रोये तो उसे बर्खास्त होन चाहिए -हम केवल यह कहना चाहते है कि वहां कुछ लोग क्यों तिरंगा नहीं फहराना चाहते ? इसका सीधा सा अर्थ यह है की वे भारत के संविधान को नहीं मानते -जाहिर है देशद्रोही है और उनके समर्थन में खड़े लोग जयचंद की कटेगरी के है -यह भैया बाबू का मामला नहीं है -एक बड़ी कार्यवाही की जरूरत है -राजनैतिक या फिर सैन्य!
    मुझे ऐसा कश्मीर नहीं चाहिए जहां भारत का संविधान लज्जित होता हो और तिरंगे का अपमान होता हो -नहीं तो इन मुट्ठी भर अलगाववादियों को वहां से खदेड़ा जाय ..और अमन चैन का राज्य स्थापित हो ..

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  56. राजेश नचीकेता जी...सर झुका कर सलाम है आप को...

    आप ने जो लिखा उससे सहमत और तारीफ़ के काबिल है --आप ने लिखा--
    '' सुधर जाओ नहीं तो सिधार जाओगे.....
    झंडे की यात्रा रोकने वाले मालूम नहीं क्या पा लेंगी यात्रा रोक के....
    जिन्हें रोकना चाहिए उनको तो रोकते नहीं.....
    ये रोकना ऐसे ही है.....जैसे विनाशकाले विपरीत-बुध्दी.
    कहा गया है...."जब नाश मनुज पे छाता है, पहले विवेक मर जाता है."

    --बहुत ही पसंद आया .
    इस भारत देश का हर हिस्सा चाहे वह व्यस्त मार्केट का हो या बक्षी स्टेडियम का...
    हर हिन्दुस्तानी का अधिकार है कि वह वहाँ तिरंगा झंडा फहरा सके.
    आज अपने ही देश में हम पराये हो गए हैं,इस तथ्य को बड़े अफ़सोस के साथ स्वीकारते हैं.

    अगर लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहरा सके तो अर्थ येही है कि यह देश आज भी आजाद नहीं है ,

    अब तो इस देश को लोकतंत्र कहना भद्दा मज़ाक है!
    -

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  57. इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि अपने ही देश में अपने ध्वज को दोयम दर्जा मिला हुआ है ...
    सार्थक चिंतन

    उत्तर देंहटाएं
  58. .
    .
    .
    सबसे पहले तो अली सैयद साहब से उधार लेकर कुछ लिख रहा हूँ...आशा है कि उनकी अनुमति रहेगी...

    मेरी यह असहमति नोट करिये कि आप कभी कभी अपने टिप्पणीकार मित्रों के प्रति 'हार्श' हो जाते हैं यह उचित नहीं है उनके पाइंट आफ व्यू से असहमत होना अलग बात है पर उन्हें देश विरोधी करार देना जंचता नहीं... मुझे नहीं लगता कि उनमे से किसी ने भी तिरंगे के प्रति कोई अवांछित टिप्पणी की है... अगर वे राष्ट्रवाद के प्रतीकों के उपयोग की नीयत पर सवाल खड़े कर रहे हों तो उनके सवाल और उनकी शंकाएं उनका अधिकार है... चूंकि आपने संवाद शुरू किया है अतः आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप शंकाओं का समाधान करें या फिर असहमत बने रह कर भी संयत रहें...
    आप द्विवेदी जी /गौतम राजरिशी एवं सुश्री मुक्ति के शब्दों और भावनाओं को विमर्श का सहज अंग मानें...
    ध्यान रहे कि फतवों और विमर्श का अंतर भी यहीं से शुरू होता है ।


    एक बात और यहाँ बताना चाहूँगा जो मेरे विचार में बहुतों को पता नहीं होगी... वह ये है कि सेना की किसी भी इकाई में १५ अगस्त या छब्बीस जनवरी को अलग से ध्वजारोहण का कोई कार्यक्रम नहीं होता... कारण सिर्फ यह है कि हर ईकाई के शस्त्रागार पर साल के ३६५ दिन राष्ट्रध्वज व कोर/रेजीमेंट का ध्वज फहराता है... यह भी कह सकते हैं कि हमारा हर फौजी जीता-मरता-साँस भी लेता है... तिरंगे की छांव तले...

    (जारी है)


    ...

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  59. कृपया ये लेख देखे :

    "तिरंगा फहरे या ना फहरे भला ये भी क्या एक मुद्दा हो सकता है ? "

    Source:

    http://indowaves.wordpress.com/

    Arvind K.Pandey

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  60. @मित्रों चर्चा के बीच अभी अभी यह खबर मिली है -
    प्रवीण शाह जी आप के लिए ख़ास तौर पर -हाँ आप जारी रहें ...
    "अभी अभी हमारे केरेल और कर्नाटक के दो वीरों नें प्रयास किया है,, आह... ये भारत है,, मैनें अभी भारत के सैनिकों को भारत का झंडा, भारतियों से छीनते हुये देखा है... ये वही सैनिक हैं जो इसी झंडे के लिये अपनीं जान न्योछावर करते हैं.. "

    उत्तर देंहटाएं
  61. अरविन्द जी आपने बड़ी मार्के की बात कही है -यह मुद्दा तो राजनीति के बिना और बावजूद भी एक राष्ट्रीय मुद्दा है ...भारत में ही दो संविधान और दो झंडे -एक म्यान में दो तलवार ? तिरंगे का अपमान करने वाले ,उसे जला दिए जाने के दृश्य इन महानुभावों को क्यों नहीं दिख रहे -आपने बहुत सही कहा कि इतने बड़े मुद्दे से लोग मुकर जा रहे हैं मगर यह दिखाई पड़ रहा है कि किसी को कोई अपशब्द बोल दिया गया है -अभी तो कुछ नहीं बोला गया है -अभी तो इन्हें बहुत कुछ बोला जाएगा -गद्दार कहा जायेगा ,नपुंसक कहा जायेगा .और भी बहुत कुछ .......

    उत्तर देंहटाएं
  62. .
    .
    .
    अब आता हूँ आपकी पोस्ट के मुद्दे पर...

    जहाँ तक मुझे पता है यह बात शुरू हुई है पाकिस्तानी व अरबी पेट्रो डॉलर पर पलते कश्मीरी अलगाववादियों की इस चुनौती से जिसमें उन्होंने कहा कि लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराने दिया जायेगा...

    आदर्श स्थिति तो यह होती कि हमारा सारा तंत्र इस चुनौती को स्वीकार करता व कश्मीर का मुख्यमंत्री स्वयं वहाँ ध्वजारोहण करता... पर जब राजनीति में सब अपनी अपनी बचाने में लगे हैं तो इन दोगलों से कोई उम्मीद तो थी ही नहीं...

    अच्छा लगा कि भाजपा ने इस चुनौती को कबूल किया... परंतु जिस तरह से वो इस काम के लिये चले वह सही रणनीति नहीं थी... उन्हें उमर अब्दुल्ला की सरकार रोक देगी यह निश्चित था... और ऐसा करके वह सरकार बहुत से 'ब्राउनी प्वायंट' भी अर्जित कर लेगी यह भी तय था...

    सैलानी बन कर दो तीन सौ कार्यकर्ता जाते लाल चौक पर... ऐन मौके पर मीडिया/कैमरा टीमों को सूचित करते... और फहरा देते 'तिरंगा'... जो भी होता उसके बाद देखा जाता... आसमान भी टूट पड़ता तो क्या...देखी जाती!

    मैं उन लोगों से कतई सहमत नहीं जो शांति के नाम पर या स्थितियों को सामान्य रखने के नाम पर या खून-खराबा न होने देने के नाम पर कश्मीरी अलगाववादियों की इस तिरंगा न फहराने देने की चुनौती को नजरअंदाज करने की बातें कर रहे हैं... गलत नजीर होगी यह...

    देश की अखंडता और खास तौर पर धर्म के नाम पर विदेशी ताकतों के सहारे उसे तोड़ने की साजिश रचने वालों को कोई रियायत नहीं देनी चाहिये...

    खून आज नहीं तो कल बहेगा ही... कश्मीर को 'आजाद' भी यदि कर दोगे तो भी ये धर्म/जिहाद के नाम पर पलते रक्तपिपासु दरिंदे भारत के नागरिकों का व भारतीय फौजों का खून बहाना जारी ही रखेंगे, यह तय है...

    यह केवल एक ही भाषा समझेंगे जो पुतिन ने चेचन्या में व चीन ने जिनजियाँग प्रान्त के उग्युर में समझाई थी... देर सबेर हमारी सरकार को भी यही करना ही होगा... नहीं तो हाथ से निकल जायेगा हमारा मुकुट...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  63. @वाह प्रवीण जी
    आपने तो फिर सर ऊँचा कर दिया हमारा -जो अपने ही बीच के अलागववादियों की तकरीरों से शर्म से झुकता जा रहा था ...
    आपके इस बात का अनुमोदन की वहां सख्ती और सख्त सख्ती की जिससे इनके होश फाख्ता हों -
    जारी रहें !

    उत्तर देंहटाएं
  64. .
    .
    .
    जो लोग रिस्ट्रेन बरतने की बातें कर रहे हैं...वे मुझे केवल इतना समझा दें कि पाकिस्तान ( नाम के लिये वह भी लोकतंत्र ही है ) मे यदि कोई समूह कहे कि फलाना-फलाना जगह पर १४ अगस्त को हम पाकिस्तानी झंडा नहीं फहराने देंगे... तो क्या होगा उनका ?

    पाकिस्तान तो केवल उदाहरण के लिये कह रहा हूँ... दुनिया का कोई भी आत्मसम्मानी देश यह स्थिति स्वीकार नहीं करेगा...

    छोटे से देश लंका से सीखो कुछ... LTTE के पास तो टैंक, बख्तरबंद गाड़ियाँ व हवाईजहाज तक थे... कैसे किया उनकी सेना ने... निकाल बाहर किये सब... मानवाधिकरवादी, शांति वादी, अहिंसावादी और हेडलाईनवादी मीडिया भी... सारे इलाके को घेर लिया व एक खास दिन की डेडलाइन दे दी... "जो भी लंका की अखंडता में यकीन करता है वह इस दिन तक इस घेरे से बाहर आकर हमारे बनाये कैंप में आ जाये"... साफ-सफाई होने तक उसका पूरा ध्यान रखा जायेगा... जो हमारे बनाये घेरे के अंदर ही रूका है डेडलाईन खत्म होने के बाद भी... वह लंका का दुश्मन है... और दुश्मन के साथ लंकाई सेना ने वही सलूक किया जिसके वह लायक था...

    नतीजा आप देख ही लीजिये... पूरी तरह से शांत व सुरक्षित है हमारा यह पड़ोसी... यह और बात है कि इस सब में एक तिहाई से ज्यादा सेना की बलि देनी पड़ी उसे... मुझे पूरा यकीन है कि कश्मीर में इससे बहुत कम में हमारी सेना यह काम पर सकती है...

    है हमारे राजनीतिक नेतृत्व में यह दम ?


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  65. अरविन्द जी तबियत खुश हो गई पोस्ट पढकर.कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं देख कर आश्चर्य भी हुआ पर लगा की अरुंधती राय भी तो इसी देश की वासी हैं और उनके भी तो ढेर सारे समर्थक हैं. जहां तक मेरी प्रतिक्रिया की बात है मुझे तो बस यही कहना है कि -
    "हिन्दोस्तां वतन है हिन्दुस्तानी हम सभी
    हर स्वार्थ छोड़ उठ खड़े हो साथ हम सभी
    लहराएगा तिरंगा हर चौक पर सदा
    देनी पड़े या लेनी पड़े जान दोस्तों."

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  66. अच्छा लगा कि चर्चा आज भी जारी है.....
    अरविन्द जी आपको प्रणाम करता हूँ कि आपने सभी कमेंट्स की सटीक और सीधे शब्दों में टिप्पणी की...
    जो लोग शांति कि बात कह रहे हैं....वो ये बताएं कि किस कीमत की शांति आपको प्रिय है.....इस पर मेरा एक मुक्तक है...मैं यहाँ उधृत करना चाहूंगा :

    "प्रेम की बात ही अच्छी" हमें सब लोग कहते हैं.
    नहीं संग्राम हो कोई, अरे हम भी ये कहते हैं.
    इससे क्या बात हो अच्छी अगर ना हो समर कोइ.
    शान्ति के रास्ते हों बंद, तभी हम युद्ध करते हैं
    अन्य मुक्तक आपको http://swarnakshar.blogspot.com/ पर मिल जायेंगे....
    राजेश...

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  67. हाँ एक बात और कहना चाहता हूँ.....
    बहुत से नाम मुझे यहाँ इस चर्चा पर नहीं दिख रहे.....मुझे आश्चर्य है.....उनकी टिप्पणियाँ भी चर्चा को कुछ और आयाम देती....क्योकी ये प्रश्न सिर्फ हां या ना का नहीं है.....

    उत्तर देंहटाएं

  68. डॉ अरविन्द मिश्र ,

    आज आप गुस्से में हैं. अगर बात देश हित की हो तो सब आपके पीछे खड़े हैं वहां कैसा विरोध ??

    मगर अली सय्यद साहब की बात में गलती कहाँ हैं ? कृपया शांत मन से विचार करें !

    गौतम राजरिशी के प्रति कहे शब्द उचित नहीं हैं उम्मीद है आप अपने मित्रों की बात पर दुबारा गौर करेंगे ....

    गौतम वहां तैनात हैं और यकीनन उग्रवादियों के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक हैं , उनकी बात पर शक करने के बजाय समझने की आवश्यकता है और जिसे शायद विस्तार दिए बिना टिप्पणियों के द्वारा समझना असंभव होगा !

    मगर यह एक बहुत पुराना मुद्दा है जिस पर गौतम शायद आर्म्ड फोर्सेस में होने के कारण खुल कर लिखने में असमर्थ होंगे !
    सादर

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  69. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  70. मेरी जानकारी में प्रवीण भईया ने पहली बार जबदस्त कमेंट किया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  71. आपकी बातों से लगता है कि एक भाजपा देशभक्त है और उसके हर कदम का आँख मूँदकर समर्थन करना ही सच्ची देशभक्ति है. मैंने ये कहा था कि तिरंगे का अपने लाभ के लिए प्रयोग करना उसका अपमान करना है. सभी ये जांते हैं कि भाजपा ने पहले धर्म का राजनीति में प्रयोग करके राम जैसे सर्वपूज्य देवता को साम्प्रदायिक बना दिया और अब राष्ट्रीय प्रतीक का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है. और आप लोग बिना आगा-पीछा सोचे कोरी भावुकता में उनका समर्थन करने लगते हैं. उन्माद को देशभक्ति का नाम नहीं दिया जा सकता.
    दिनेश जी ने कहीं ये नहीं कहा कि तिरंगा नहीं फहराना चाइये, उन्होंने कहा कि सौ-पचास लोग चुपचाप जाकर तिरंगा फहरा देते और फिर उसका जश्न मनाते. और प्रवीण जी ने भी यही बात कही है. पर भाजपा को लाल चौक पर झंडा फहराना ही नहीं था. उसे इस बात को सार्वजनिक करके उसका राजनीतिक लाभ लेना था, गिरफ्तार होकर सरकार को भला-बुरा कहना था और उसने वही किया.
    मुझे आप राष्ट्रद्रोही कहिये या कुछ और पर मैं राजनीति विज्ञान की छात्र हूँ और राजनीतिक दलों के लोकलुभावने मुद्दों की असलियत के बारे में खूब जानती हूँ. मुझे अपने देशभक्ति को प्रमाणित करने के लिए किसी प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं है.

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  72. @ मिथिलेश, तुम भगत सिंह के बारे में बोल रहे हो. क्या तुम्हें नहीं मालूम कि उन्होंने खुद मरने से ठीक पहले अपने रास्ते के बारे में पुनर्विचार किया था. मैं अपने देश के क्रान्तिकारियों का बहुत सम्मान करती हूँ और इसे मुझे चिल्ला-चिल्लाकर बताने की ज़रूरत नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  73. मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ मिश्रा जी .... जब कश्मीर हमारे देश का अभिन्न अंग है तो क्यूँ वहाँ तिरंगा नहीं फिराया जा सकता ?? ... आपकी पोस्ट पर हुई प्रतिक्रियाओं से हैरान हूँ और निराश भी :( ....

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  74. मित्रों ,खेद है आपके विचार थोड़ी देर तक माडरेट बक्से में रहे ...यह मुद्दा समाप्त नहीं हुआ ..यह चलता रहेगा जब तक एक निर्णायक परिणति न पा जाय ..भारत की राष्ट्रीय अस्मिता ,हमारी संप्रभुता के लिए श्रेयस्कर यही है कि यह मुद्दा यथाशीघ्र निर्णीत हो ....मैं राष्ट्रीय गौरव और सम्मान को लेकर मिमियाती बोलियों को बर्दाश्त नहीं कर पाता ..और यह तो मुझे कतई बर्दाश्त नहीं है की अपनी सेना का एक अधिकारी जिससे करोड़ों लोगों की भावनाएं जुडी हुयी हैं ऐसे प्रश्नों पर यदि वह मुखर हो रहा है तो मिमियाने लगे -उचित तो यह है कि वह फिर न ही बोले ...असमय की क्लैव्यता शोभा नहीं देती ..यहाँ तो युद्धाय कृत निश्चय का अवसर है ...
    राजेश कुमार नचिकेता जी मैं आपका आभारी हूँ आपने भी इस मुद्दे पर अपने स्पष्ट विचार रखे ....यह मुद्दा ही ऐसा है कि हमें इस पर मुखर और दृढ होना होगा ...प्रवीण शाह जी हमेशा की ही तरह अपने विचारों से मुझे ही नहीं सभी चर्चा भागीदारों को मुग्ध कर गए ....उनकी तार्किकता प्रणम्य है ...ब्लॉग जगत के विभूति हैं प्रवीण जी ...उन्होंने समग्र परिप्रेक्ष्य में इस मामले को विवेचित और परिभाषित किया ,हमें सावधान किया और इसके निश्चयात्मक हल के रास्ते भी बता दिए हैं -मुझे भी लगता है उनके बताये रास्तों के सिवा अब कश्मीर समस्या को हल करने का कोई रास्ता शयद नहीं बचा है -मगर हमें अपने ही लोगों से ही खतरा सदा रहा है और रहेगा ...
    राष्ट्रीय सामान्य हित और सरोकारों को समझने और अपने मत को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के लिए किसी को भी राजनीति शास्त्र की पोथी पढना जरूरी नहीं होना चाहिए ..मुक्ति जी राजनीति शास्त्र पढ़कर राजनीतिक टिप्पणियाँ कर रही हैं यह अपने में ही एक हास्यास्पद बात है ...हमें राष्ट्र की प्रतिष्ठा से जुड़े मुद्दे पर किताब पढ़कर या किसी खेमे में जाकर अपनी बात कहने का हुनर नहीं आता -सीधे सादे गंवार मनई है बेलौस बोलते हैं ....
    अप सभी का बहुत बहुत आभार! मैं यह अवश्य जो दूं मेरे विचार एक राष्ट्रप्रेमी के विचार हैं और किसी भी पार्टी से मेरा लेना देना नहीं है -मेरे लिए सदैव विचार महत्वपूर्ण रहे हैं व्यक्ति और खेमें नहीं ..विचारों को आगे वैयक्तिक स्थूलता का मेरे सामने कौड़ी भर मूल्य नहीं है !

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  75. पुनश्च :
    उपर्युक्त टिप्पणी के अंतिम पैराग्राफ को कृपया फिर से यूं पढ़ें -
    आप सभी का बहुत बहुत आभार! यहाँ मैं यह भी अवश्य जोड़ दूं कि मेरे विचार सहज ही एक राष्ट्रप्रेमी के विचार हैं और किसी भी पार्टी से मेरा लेना देना नहीं है -मेरे लिए विचार ही सदैव महत्वपूर्ण और प्राथमिक रहे हैं ,व्यक्ति और खेमें नहीं ..विचारों के आगे वैयक्तिक स्थूलता मेरे सामने सदैव गौंड रही है और उसका कौड़ी भर मूल्य नहीं है! आप सबका पुनः आभार !

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  76. @ अरविन्द जी ,
    टिप्पणियों पर एक और प्रतिक्रिया दर्ज कराने की इच्छा हुई थी ! उसे लिखा भी पर ...


    @ प्रवीण शाह जी ,
    आपकी टिप्पणी में कुछ एडिशन का ख्याल था जो तर्क किया ! अब केवल एक टुकड़ा आरजू जो किसी काम आये तो ?

    "है हमारे राजनीतिक नेतृत्व में यह दम ?"

    सेना पर राजनैतिक नेतृत्व की प्रभुता का सत्य स्वीकारने के बाद भी फ़ौजी पर सवाल ? क्या मानूं इसे :)

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  77. @@@@मुक्ति जी
    अच्छा लगा जानकर कि आपको अपने देश से बहुत प्यार है , काश कि सब बिना बताये जान जाते तो आपको ये भी कहने की जरुरत नहीं पड़ती । लोग समझ ही नहीं पाते शहिद भगत सिंह जी को अपने देश से बहुत प्यार था , शायद उस समय और भी बहुत से लोग होंगे ऐसा कहते होंगे , लेकिन अफसोस हमें तो बस शहिद भगत सिंह जी का नाम ही पता है ।

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  78. सोचा था कि अब टिप्पणी नहीं दूंगा, किंतु आपकी उत्तेजित अवस्था देखकर रहा नहीं गया। टिप्पणी बक्से के ऊपर आपको संदेशे में लिख देना चाहिये कि मेरे पोस्ट में व्यक्त विचारों के विरुद्द जानेवाले टिप्पणीकर्ताओं के साथ मैं शालीन नहीं रह पाता, अतः टिप्पणी सोच-विचार कर दें। जिसे यूं होगा कि हम जैसे मिमयाने वाली बकरियां दूर ही रहें आपके ब्लौग से....

    इस मुद्दे पर तो फैसला हो चुका और जो कश्मीर के हित में था वही हुआ। हाँ, आप इस पोस्ट से इस बात पर खुश हो सकते हैं कि आपको मेरा असली चेहरा दिख गया...एक देशद्रोही, कमजोर, डरपोक और मेमियाता हुआ मेरा चेहरा।

    शुभकामनायें!!! चुंकि आपने एलान किया है कि कभी न कभी आप खुद ही लाल चौक पे तिरंगा फहरायेंगे। अभी अगले एक और साल तक तो मैं यहीं हूँ...आगे फिर वापस आना ही है यहाँ पर दो साल के उपरांत, इतला कर दीजियेगा वक्त रहते। इसी बहाने आपसे मुलाकात हो जायेगी...वैसे आपके जैसा शेर इस बकरी से मिलना चाहेगा क्या? सोच में हूँ....

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  79. hans raha hoon klant man se......vimarsh...mudde...ye...o....
    maryada......etc etc etc.......

    hazaron baton me ek baat....'kashmir
    bhart ka aang hai' haan to kisi ke jhanda pharane se kyon roka jaye....

    koi rajnitik-kutnitk ganit are ate hain ..... to kya sarkar ko lakwa mar gaya hai.....

    jawaw ek hi ya to hai ya nahi hai......aur koun si party kya hai
    ye batane ki yahan kouno jaroorat nahi hai....party ki maro goli.....
    ek vaykti ke roop me bolo..........

    thanx to praveen sah.

    pranam.

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  80. यह पृष्ठ बहुत महत्वपूर्ण हो गया है... आगे के लिए भी .... चर्चा जारी रहे...

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  81. गौतम राजरिशी जी ,
    जैसा कि हममे से बहुतों का है आपका दो परसोना है -एक गजलकार /शायर का दूसरा एक सीमा प्रहरी का -मुझसे आपके दूसरे परसोना से जो अपेक्षा थी बस उसके अनुरूप आपको नहीं पाया ...सेना में मेरे घनिष्ठ मित्र भी हैं उनको भी प्रगटतः कभी इतना लचीला नहीं पाया -कुछ मानव ट्रेट नैसर्गिक होते हैं -निज कुल /जाति/समाज /देश स्वाभिमान का जज्बा भी बहुत कुछ नैसर्गिक होता है -लोग आन बाण शान के लिए प्राणोत्सर्ग कर जाते हैं -कहीं मेरा मोहभंग हुआ है -और आपके लाल चौक में झंडा न फहराए जाने की वकालत से मुझे गहरा धक्का लगा है ....नाट अगेन फ्रेंड .......मैं कभी भी एक सेनाधिकारी को इस परसोना में देखूँगा -उससे जन जन की आकांक्षाएं जुडी होती हैं ..हम अपने शौर्य और अभिमान को सेना में सुरक्षित मान संतुष्ट रहते हैं ....यह विश्वास टूट जाय तो ...वही हुआ है ..बहरहाल जब सैनिक अपना कम नहीं करेगा तो जनता तो करेगी ही ..पहले भी उदाहरण प्रस्तुत हो चुका है ......मुझे अब इस बिंदु पर आपसे और कुछ नहीं कहना है ..मुझे किसी तरह की चिपकी नहीं लगानी अपने ब्लॉग पर -उतना तो कुख्यात वैसे ही हो चुका हूँ -बहुत लोग पहले ही किनारा कर लिए हैं ..... :) यह घर है ईश का खाला का घर नाहि....... :)

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  82. मित्रो जरा यह भी देखिये केंद्र सरकार और जम्मू कश्मीर राज्य की सरकारों ने हुर्रियत कांफ्रेंस की इस रैली की अनुमति ११ सितम्बर ,२०१० को दी जिसमें खुलेआम पाकिस्तानी झंडे लहराए गए ....
    http://hinduexistence.wordpress.com/2011/01/26/lal-chowk-is-a-place-to-unfurl-the-tri-colour-not-the-pak-flag/
    मगर दुर्भाग्य कि तिरंगे को फहराने को जबरदस्ती रोक दिया गया !

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  83. यदि राजनितिक दलों की अपनी दकियानूसी बातों को नज़रंदाज़ कर दिया जाए, तो राष्ट्र के भीतर कहीं भी तिरंगा न फहराने देना संप्रभुता को चुनौती देना है , क्योंकि यदि असंतोष की भावना को लगन व् धैर्य से रचनात्मक शक्ति में न बदला जाए तो वह खतरनाक भी हो सकती है ! कश्मीर की जो समस्या है वह पूरी तरह राजनीतिज्ञों के द्वारा गढ़ी गयी है और आज की स्थिति का जिम्मेदार भी कमोवेश राजनितिक दलों के छुटभैये ही हैं ! गौतम राजरिशी जी का कहना उचित है कि कई साल लगे हैं इस लाल चौक का माहौल एक आम चांदनी चौक जैसा करने में। कई दोस्तों को शहीद होते देखा है इसी जगह पर और अब जाकर नौबत आई है कि श्रीनगर के इस व्यस्त बाजार से हमजैसे लोग अपने जरूरत की चीजें खरीद सकें, किन्तु अरविन्द जी की जो पीड़ा है वह एक आम भारतीय की पीड़ा है ! राष्ट्र शब्द के नाम लेने भर से हमें तिरंगा और भगवा एक नहीं कर देना चाहिए ! दोनों की वैचारिकी अलग है !तिरंगें के मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए !

    जहां तक वैचारिकी का प्रश्न है, तो हमारी शक्तिशाली भावनाएं ही हमारे कर्मों में/ कर्तव्यों में अभिव्यक्त होती है ! विचार एक शक्ति है और यदि इसे देश हित में सुव्यवस्थित न कर लिया जाए तो यह शक्ति विश्व पटल पर हमारी कमजोरी को दर्शाती रहेगी हमेशा !

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  84. यह संभवतः विश्व का अनूठा मामला है जिसमें इस बात पर बहस हो जाती है कि राष्ट्रीय ध्वज उस राष्ट्र के किसी किसी चौक पर फहरना चाहिए या नहीं...विपक्षी पार्टी इस बात पर आंदोल खड़ा कर सकती है...सत्ता पक्ष उसे रोकती है..और राष्ट्र भक्त आपस में उलझ कर रह जाते हैं।

    अरंविद जी की चिंता समस्त राष्ट्र भक्त की चिंता है । इस पोस्ट पर मेजर साहब का कमेंट न आता तो चर्चा इतनी सार्थक न होती मगर दुर्भाग्य कि कवि ह्रदय होने के कारण, चर्चा में भाग लेने कारण उन्हें वह कुछ सुनना पड़ा जिसकी कल्पना किसा भी देश भक्त को नहीं होगी। मेजर तो वही करता है जो उसे आदेश मिलता है। व्यक्ति के तौर पर वहाँ के हालात को दृष्टिगत रखते हुए, उन्होने अपने विचार व्यक्त किये हैं। अपने मन की बात रखने का सभी को अधिकार है। विरोध में उठ रहे विचारों का भी स्वागत किया जाना चाहिए।

    कभी न कभी वह दिन जरूर आयेगा जब तिरंगा फहराना बहस का मुद्दा नहीं सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र भक्ति होगी।

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  85. मेरे ख्याल से अब सारी पुरानी बातें ही repeat हो रहीं हैं और कोई भी कुछ भे नया नहीं कह रहा..
    रवींद्र जी और देवेन्द्र जी ने काफी अच्छे से इसे समेटने की कोशिश की....
    एक बात मैं इसमें और जोड़ दूं....
    अगर सरकार का दायित्वा वहाँ शांति स्थापित करने की आड़ में अलगाववादियों को उकसाना से रोकना है तो क्या उसका दायित्वा देश के लोगो की भावनाओं का सम्मान करना नहीं है?
    एक बात और मैं समझ गया हूँ की यही कार्यक्रम अगर किसी और दल द्वारा किया गया होता तो किसी को कोई आपत्ती नहीं होती.....
    तथाकथित बुद्धीजीवी की समस्या ही यही है की उसने एक पार्टी-विशेष को अछूत सा मान लिया है....
    जब श्री लालूजी राष्ट्रगान के समय बैठे रहते हैं और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री राष्ट्रगान के बीच में उठ कर चले जाते हैं तो media को कोई आपत्ती नहीं होती. क्योकी उनके भाड़े में मिली स्याही की कीमत चुकानी होती है....
    एक बात जो मेरे मन में २-३ दिन से घुमड़ रही है वो कहता हूँ....

    "माँ के मस्तक से बारूदी-धुंआ उठ रहा.
    उठो देश के वीरों माँ का मुकुट लुट रहा."
    राजेश

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  86. मिमियाती बकरियां और शेर बस रामराज्य में एक ही घाट पर पानी पीते हैं -चलिए थोडा इंतज़ार करते हैं गौतम राजरिशी जी !

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  87. मिश्र जी ! छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी १५ अगस्त और २६ जनवरी को कई जगह तिरंगे की जगह काला झंडा फहराया जाता है ...कितने लोगों को पता है ? ज़ो रोक सकते हैं इसे वे खुद हथियार सप्लाई करते हैं नक्सलियों को .......मैं नाम नहीं लूंगा किसी का ...पर यहाँ सबको पता है कौन क्या कर रहा है.

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  88. और चाहे जो भी हो यह आयोजन उमर सरकार द्वारा अपनी पिछली असफलताओं को भावनात्मक मुद्दे (जो थाल में परोस कर - इस दल द्वारा हर बार की तरह - ला दिया गया) के रूप में दबाकर अपनी पीठ खुद थपथपाने का एक मौका तो बन ही गया.

    (स्क्रीनप्ले अमिताभ - नाना पाटेकर की ड्रामाई 'कोहराम' से लिया गया नहीं लगता! हमारे नेताओं के पास स्क्रिप्ट का भाव!!! मुद्दों का हो तो कोई बात भी है. खैर.)

    सिर्फ अपनी जानकारी के लिए पूछना चाहता हूँ - 1992 की एकता यात्रा के बाद भी क्या यह पार्टी नियमित रूप से यह यात्रा कराती रही है ?

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  89. अगर बहस करने का ज़्यादा वक्त/मूड ना हो तो हम भाजपा, कांग्रेस, या मिश्रा जी के बजाय मेज़र गौतम पर ही आँख मूँद कर भरोसा कर सकते हैं...
    मेज़र के बारे में ''यहाँ''' पर जो भी पढ़ा, तो ज़्यादा हैरानी नहीं हुई...हम मिश्रा जी की आदत जानते हैं...

    वो बस, ऐसे ही हैं...

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