रविवार, 29 दिसंबर 2013

क्या करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट था वह (सेवा संस्मरण -१६)

कहते हैं न कि याददाश्त बड़ी खराब दोस्त है ऐन मौके पर साथ छोड़ देती है। झांसी की यादों के साथ भी ऐसा ही कुछ है। कोई भी एक मुकम्मल याद नहीं सब बिखरी बिखरी सी यादे हैं कोलाजनुमा और आज आपसे उन्हीं में से कुछ साझा करूँगा। मैंने अर्थशास्त्र का विधिवत अध्ययन नहीं किया मगर मुझे अपने आचरण में हमेशा यह देखकर संतोष होता आया है कि मैं खुद और परिवार पर हमेशा अर्थशास्त्र के इस सुनहले सिद्धांत के अनुसार ही व्यय करता रहा हूँ कि "संसाधन हमेशा सीमित रहते हैं और रोजमर्रा के खर्च को अनेक विकल्पों में से चुनना और सीमित करना होता है " .मैं शायद बचपन  से ही  एक संतोषी जीव रहा और अब तो जीवन के सुदीर्घ अनुभवों ने परम संतोषी बना दिया है -मुझे भौतिक चमक दमक और सुविधाओं की कभी शौक नहीं रहा। और न कभी इसका कोई गिल्ट ही। झान्सी के आफिसर होस्टल में भी वैसी ही सन्यासी ज़िंदगी,साधारण सी कुर्सियां एक मेज और हाँ तब चूंकि ऐक्वेरियम रखना एक विभागीय 'ट्रेडमार्क' सा था तो एक बड़ा सा रंगीन मछलियों का ऐक्वेरियम भी।  

श्रीमती जी को जो भी लगता रहा हो मगर मेरे स्वभाव से उन्होंने जल्दी ही अनुकूलन बना लिया था।  आफिसर होस्टल के दूसरे अधिकारियों जिसमें सेल्स टैक्स ,इंजीनियर ,प्रशासनिक अधिकारी आदि थे के लिविंग रूम वैभवपूर्ण और सुसज्जित होते थे और साथ ही उनके पास आधुनिक सुख सुविधा और मनोरंजन के साजो सामान भी  और कुछ की खुद की अपनी गाड़ियां भी। मगर मुझे यह सब देखकर किंचित भी हीन भावना नहीं होती थी. उस समय (1987 -89) तक मेरे पास न तो टी वी थी और न ही फ्रिज आदि। मगर मुझे यही लगता था कि कि ये फालतू चीजें हैं।  पत्नी ने कम से कम एक टी वी खरीद लेने का प्रस्ताव रखा।  मगर मुझे अपनी एक वचनवद्धता याद थी। जो मैं अपनी बहन के विवाह के वक्त ऐसा परिजनों का दावा था कि  मैंने दूल्हेराजा को एक रंगीन टीवी देने का वादा खिचड़ी खाने के मान मनौवल वाली रस्म के दौरान किया था।  अब बिना बहन को दिए खुद अपनी टीवी कैसे खरीद सकता था?  

उन दिनों अपट्रान के रंगीन टीवी बाज़ार में आये थे।  दाम पता किया तो 6 हजार -हिम्मत जवाब दे गयी. इतनी तो मेरी तीन महीनों की तनखाह  थी।  अब क्या किया जाय।  मेरे एक स्टाफ ने तुरंत सुझाव दिया कि मैं अपने जी पी एफ से लोन ले सकता हूँ। बात सुलझ गयी. मुझे कई आसान किश्तों की वापसी के आधार पर छह हजार रूपये मिल गए और मैंने रंगीन टीवी खरीद लिया और उसे सीधे बहन को भिजवा दिया।  अब जब तक यह लोन था दूसरी टीवी खरीदने की हिम्मत ही नहीं थी। मैंने टीवी अपने इलाहाबाद पोस्टिंग में १९९० में ली और वह भी मित्र  मुक्तेश्वर मिश्र की पहल पर।  और  फ्रिज तो 1997  में देवरिया में! 

झांसी  के आफिसर्स होस्टल में मेरे बगल के कक्ष संख्या 17 में ही उन दिनों एक नए आई ए  एस आफिसर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट की पहली पोस्टिंग पर आये।  उनमें एक बात विलक्षण थी ,उनके आई  ए  एस के पेपर्स में एक सांख्यिकी था और दूसरा उर्दू। एक साहित्य तो दूसरा एकदम नीरस विषय।  मेरी उनके साथ खूब जमी। साहित्य की बैठकें होती मगर एक ऐंटी क्लाइमेक्स तब आया जब उनकी एक गोपनीय जांच मुझे डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने सौंप दी और कहा कि मैं जांच करके रिपोर्ट  उसी दिन भले ही रात हो जाय मैं उन्हें सौंप दूं -अब मुझे तो काटो तो खून नहीं , दोनों आई ए  एस एक बॉस एक नया नया बना मित्र।  क्या  करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट।

बहरहाल मैंने जांच पूरी की जिसके लिए मुझे दिन भर मुख्यालय से बाहर कोई सत्तर पचहत्तर किलोमीटर दूर जाना पड़ा था -वापस लौटा तो जाड़े की रात के ग्यारह बज चुके थे. सीधे डी एम रेजिडेंस पर पहुंचा।  चौकीदार ने कहा साहब सो चुके हैं।  मिल नहीं सकते।   मैंने उसे खुद डी एम साहब का आदेश सुनाया और कहा कि यदि तुमने उन्हें बताया नहीं तो वे तुमसे नाराज हो जायेगें।  उसने बड़ी हिम्मत कर टेलीफोन के बेडरूम कनेक्शन का बज़र बजाया।  डी एम  साहब नाईट सूट में बाहर आये और मैंने उन्हें जाँच का लिफाफा सौंपा -उन्होंने जिज्ञासा से कुछ पूछा तो मैंने कहा सर सब कुछ रिपोर्ट में है।  और गुड नाईट कर वापस हो लिया।  उनके अपने ऊपर के विश्वास और एक मित्र के विरुद्ध की गयी जांच की एक अजीब सी मानसिक स्थिति से उबरने का प्रयास कर रह था मैं -ओह यह कैसा धर्म संकट था आज भी वह घटना याद आती है तो दिल में एक हूक सी उठ जाती हैं। 

झांसी प्रवास ने मुझे बेटे कौस्तुभ और बेटी प्रियेषा  के जन्म की सौगात भी दी। यद्यपि कौस्तुभ का जन्म स्वरुप रानी मेडिकल कालेज में और प्रियेषा का जन्म कमला नेहरू हास्पिटल इलाहाबाद में हुआ। कौस्तुभ के पहले जन्म दिन पर सेलेस्टियल रांडीवू यानि आफिसर्स होस्टल के कक्ष संख्या 18 में एक उत्साहपूर्ण जन्मदिन का आयोजन हुआ-उन दिनों वाल्ट डिस्ने के मिकी माऊस के जन्म जयन्ती की धूम थी तो कौस्तुभ के जन्म पर भी वही थीम था, वही रंग छाया हुआ था। कौस्तुभ के  घर का नाम मिकी रखा गया।  
अभी झांसी में एक और बड़ी जिम्मेदारी निभानी थी। .... जारी!

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना!

भरा था स्नेह में उसके कभी जो

बेसुधी रहती थी  हर रोज छाई

बेरुखी से अब उसी के संतप्त होना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना  

 

संयोग होगा न ऐसी अब आस कोई

मौन हैं वसंत के स्वर न उजास कोई

उसी की टेर में अब क्यों वक्त खोना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना

 

सुधि न ली मेरी कभी भी लौटकर
था मुग्ध मैं सर्वस्व जिसको सौंपकर
अब उसी पाषाण की क्या चाहना
ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना  

 

है प्रतीक्षा अब नए इक मीत की

इंद्रधनुषी कामना, नई इक प्रीति की

लौट के ना आयेगी वह क्रूर छलना

ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

चोरी और सीनाजोरी एक साथ? सेवा संस्मरण -15

एक दिन मैंने एक दूरस्थ जलाशय जिसका नाम पहाड़ी है का निरीक्षण करना चाहा। वहाँ के विशाल पहाड़ी उपत्यकाओं से घिरे जलाशय के निरीक्षण के बाद उसी दिन लौटना सम्भव नहीं था।  इसलिए हमने रात वहीं रुकने को ठानी।  उस समय एक मेटाडोर थी जिससे हम  मैदानी भ्रमण करते थे।  मुझे बताया गया कि पिछले कई वर्षों से किसी ने वहाँ रात्रि निवास नहीं किया है।  और जगह  भी निरापद नहीं है। मुझे अब याद नहीं है कि  वहाँ सिचाई विभाग का डाक बंगला हुआ करता था या खुद मत्स्य विभाग का  आवास मगर रात वहीं रुकने का तय हुआ। रात रुकने का सुनकर मेरे साथ  चलने वाले एक दो कन्नी काट गए।  एक अपने ही जिले के टी एन तिवारी जी इंस्पेकटर थे, जो मेरी रिश्तेदारी भी जोड़ लिए लिए थे।  भारत में हर जाति का व्यक्ति चाहे तो आसानी से अपनी जाति के किसी दूसरे दूर -निकट के व्यक्ति से अपनी  कोई न कोई रिश्तेदारी ढूंढ और साबित कर सकता है!  

 अपने एक तेज तर्रार बाबू  को भी मैंने आदेश कर  अपने साथ कर लिया और अपने उच्च कार्यालय के एक खुर्राट बाबू जो मत्स्य भोजी भी थे साथ लटक लिए।  वे मछली खाने के मामले में सदा चिर प्रवंचित ही  अपने को व्यक्त करते थे यद्यपि कोई भी शायद ही ऐसा दिन होता हो जब उनका मत्स्याहार न होता हो। अब झांसी जलाशयों का समुद्र है तो उनकी अभिलाषा सहज ही पूरी होती रहती थी। मगर मछली की उनकी चिर  बुभुक्षिता  बनी ही रहती थी।  मैंने कहा बड़े बाबू आप को तो घर बैठे ही मछली मिल जाती है तो काहें इतनी दूर जाने का कष्ट उठा रहे हैं -"साहब, पहाड़ी की मछली कभी नहीं खायी।" उनके चेहरे पर उग आयी एक अजब बेचारगी पर मैंने उन्हें भी चलने की अनुमति दे दी।  वैसे वे बिना अनुमति के भी रुकने वाले नहीं थे। 

आखिर हमारा  कारवां औचक निरीक्षण के लिए चल पड़ा।  उन दिनों मोबाईल तो थे नहीं और फोन सेवायें भी सहज नहीं थी तो औचक निरीक्षण अपनी पूरी शुचिता और प्रभाव लिए ही होते थे। पहाड़ी सेंटर पर पहुँचने पर वहाँ अपेक्षानुसार हलचल मची।  प्रभारी नागेश पाण्डेय (वही महाशय जो लखनऊ के पिकनिक  स्पॉट घटना के पात्र थे ) प्रगटे।  विस्मित से।  साहब और उनके साथ चार  पांच लोगों की टोली देख उनका माथा ठनका।  मैंने कहा, "चलिए जलाशय के लैंडिंग सेंटर (जहाँ ठेकेदार द्वारा जलाशय की पकड़ी मछलियां लायी जाती हैं और तौल होती है ) आप यहाँ आफिस में क्या कर रहे हैं।  आपको तो वहीं लैंडिंग सेंटर पर होना चाहिए था अभी।" वे बहानेबाजी पर उतर आये। मैंने कहा चलिए अब मेरे साथ। अब वे मुझे समझाने लगे कि साहब आप वहाँ तक नहीं पहुँच सकते बहुत दुर्गम रास्ता है , पैदल जाना होगा।  गाड़ी नहीं जा सकती।  मैंने पूछा  कितनी दूर है तो ठीक से बता नहीं पाये।  मेरा ड्राइवर भी मछली की आस लगाये बैठा था।  कह पड़ा चलिए साहब मैं ले चलता हूँ बहुत पहले के साहब के साथ मैं आया था।   मुझे रास्ता पता है।  मुझमें नयी नौकरी का जोश और साथ मत्स्य प्रेमियों का दल तो फिर कारवां कहाँ रुकता ? हम  चल पड़े।  

अभी कालोनी से निकल कर हम थोड़ी दूर ही मुख्य सड़क पर आगे बढे थे कि सामने से एक ट्रैक्टर ट्राली के साथ  आता दिखा। पीछे बैठे मत्स्य भोजी बोल पड़े, "साहब साहब सामने के ट्रैक्टर से मछली की ढुलाई हो रही है। " जलाशय परिसर में मछली के परिवहन को अनुबंध के मुताबिक़ चेक  किया जाना चाहिए था।  सो मैंने ट्रैक्टर रुकवा दिया।  पूरी ट्राली में मछली भरी हुयी थी। मेरे सिपहसालारों ने उसे चारो ओर  से घेर लिया।  मैंने चालान माँगा। अब चालान काटने वाले पाण्डेय तो मेरे साथ ही बैठे थे।  बिना तौल और बिना चालान मछली का मुख्य मार्ग पर परिवहन अनुबंध का खुला उल्लंघन था।  अब मुझे जब्ती की कार्यवाही करनी थी।  फिर मछलियों का  नीलाम कर प्राप्त  पैसा सरकारी खजाने में जमा करने की जिम्मेदारी। एक बड़ा टास्क! मेरे डांटने के  बावजूद मेरे साथ के स्टाफ ने अपनी मछली का इंतजाम कर लिया।  और मुझसे अगली कार्यवाही के लिए उत्कंठित हो प्रतीक्षा करने लगे।  उनका लक्ष्य पूरा हो गया था।  मगर वे अब पूरी स्वामिभक्त के साथ अधिकारी के अगले आदेश के अनुपालन में मुस्तैद और तत्पर लगे यह मुझे अच्छा लगा।  अब मुश्किल यह थी कि मछली की तौल कहाँ हो? पहली बार मुझे पता लगा कि मुख्य मार्गों पर धर्मकांटे भी होते हैं।  

 संयोग से एक धर्मकांटा पास ही था।  इन धर्मकांटों पर पूरी ट्रक /ट्रैक्टर ही तौल उठती है।  एक बार माल के साथ और एक बार माल उतार कर तो माल की सही तौल हो जाती है।  इस तरीके से मछली की तौल हो गयी।  अब बी क्लास (डेढ़  किलो से कम वजन की मेजर कार्प मछलियां जिन्हे प्रजनन का पहला  मौका नहीं मिला हो )  की मछलियां अलग की गयीं क्योकि इन पर अलग से फाईन थी।  यहीं मैंने पहली बार बड़ी बड़ी छिलकों (स्केल्स) वाली महाशेर मछली देखी।  यह मूलतः ठन्डे -पहाड़ी क्षेत्रों की मछली है और आखटकों की पहली पसंद (स्पोर्ट फिश)  है मगर नर्मदा में अपवाद तौर पर इनकी कुछ प्रजातियां मिलती हैं. पहाड़ी मध्य पदेश की सीमा पर है और महाशेर नर्मदा से पहाड़ी जलाशय तक पहुँच आती हैं। 

 महाशेर के प्रथम दर्शन पर मैं अभिभूत था मगर मुझे बहुत देर तक उसके आकर्षण में नहीं  रहना था -एक बडा काम आगे था।  मैंने नागेश पांडे को बी क्लास का पूरा विवरण बनाने को कहा।  एक एक मछली का ब्यौरा क्योकि प्रति मछली उन दिनों पांच रुपये जुर्माना   था. और वजन का मूल्य अलग. ठेकदार के चेहरे पर  हवाईयां उड़ रही थी।  वह हतप्रभ था कि यह क्या अनहोनी हो रही है -ऐसा तो  कभी हुआ ही नहीं।  अब तक उसे लग गया था कि यह नौसिखिया अधिकारी मानेगा नहीं और उसका भट्ठा बैठाये बिना नहीं छोड़ेगा।  उसने मेरे साथ के स्टाफ से खुसर पुसर शुरू की।  थोड़ी देर  बाद तिवारी जी आये और अपनी रिश्तेदारी के  दमखम   पर मुझसे बोले साहब पांच हजार रुपये दे रहा है।  (उस समय पांच हजार एक अच्छी रकम थी ) मैंने तिवारी जी से पूरी दृढ़ता से कह दिया  कि आप लोगों का टारगेट तो पूरा हो गया अब मुझे अपना टारगेट पूरा करने दीजिये।  अब मैं उन्हें यह कैसे समझा सकता था कि इतने आगे आने के बाद पीछे नहीं लौटा जा सकता था. और मुझे तब और आज भी बदनामी से बहुत डर लगता है। 

बहरहाल ठीकेदार ने भी कुछ समय बाद समर्पण कर दिया था।  उसे नोटिस सर्व की गई। जुर्माने की रसीद काटी गयी।  मछली की  नीलामी हुयी। अब तक रात हो गयी थी। हमें कालोनी में ही रुकना पड़ा।  स्टाफ ने वहीं मछली बनायी खायी और जश्न किया। बची मछलियां बर्फ में सुरक्षित कर ली गयीं।   मैं सो गया।  सुबह आँखे खुली तो कुछ उत्तेजित सी मगर फुसफुसाहट सी आवाजे सुनायी दीं।  पता लगा कि रात  में कुछ गुंडे आये थे और स्टाफ से कुछ झगड़ा झंझट हुआ और गोलियों का फायर भी हुआ था।  गोलियों के निशान दीवालों पर दिख रहे थे।  मुझे कुछ पटाखों जैसी आवाजे सुनायी तो दी थीं मगर दीवाली बिल्कुल नजदीक थी तो मैंने उसे पटाखेबाजी ही समझी। समझ में आ गया कि यह मुझे और स्टाफ को डराने की जुगत थी कि कहीं मैं आज भी न  लैंडिंग सेंटर पर जाऊं।  मगर मैं गया।   रास्ता बहुत दुर्गम  था मगर मेरी वाहन लैंडिंग सेंटर तक पहुँच ही गयी।  मगर आज वहाँ कुछ नहीं था. होना भी नहीं था।  एक बेकायदा उद्धत अधिकारी से कौन निपटता।  आज सोचता हूँ तो आश्चर्य होता है कि मैं ऐसा कदम कैसे उठा पाया था। वो अंगरेजी की एक मशहूर कहावत है न कि मूर्ख वहाँ तक  चले जाते हैं जहाँ बुद्धिमान कम से कम दो बार सोच कर जाते हैं।  

विजयी  टीम दूसरे दिन रात तक वापस झांसी पहुँची और स्टाफ के परिवार भी मत्स्य भोज से आनंदित हुए।
मगर दूसरे दिन अल्ल सुबह बड़े साहब (डिप्टी डाईरेकटर ) का बुलावा आ पहुंचा।  मैं कुछ चिंतन मग्न उनके पास पहुंचा।  "यह क्या कर डाला आपने? उनकी तीखी आँखें भी मुझसे जवाब मांग रही थी।  आप समझते नहीं , इन लोगों की पहुँच कहाँ तक है " लम्बा डिस्कसन हुआ , मैंने पूरी दृढ़ता से आख़िरी जवाब दिया था कि "सर चोरी सीनाजोरी की तरह नहीं की जानी चाहिए , लबे सड़क चोरी का माल ले जाया जाना पूरे विभाग की बदनामी है " और इस बात पर वे निरुत्तर हो गए थे.

 

रविवार, 15 दिसंबर 2013

अथ चापलूसी महात्म्य


मनुष्य की अनेक प्रतिभाओं में एक है चमचागीरी/चापलूसी। वैसे तो इस क्षमता में दक्ष लोगों में यह प्रकृति प्रदत्त यानी जन्मजात है मगर कुछ लोग इस कला को सीखकर भी पारंगत हो लेते हैं। चारण और चमचागीरी में बारीक फर्क है।चारण एक पेशागत कार्य रहा है जिसमें भांटगण मध्ययुगीन राजा महराजाओं की विरुदावली गाते रहते थे -उनका गुणगान करते रहना एक पेशा था। मगर मध्ययुगीन भांट लड़ाईयों में भी राजाओं के साथ साथ रणक्षेत्र में जाते थे और इसलिए भट्ट कहलाते थे -भट्ट अर्थात वीर! लगता है भट्ट से ही भांट शब्द वजूद में आया हो। आज भी जो ज्यादा भोजन उदरस्थ करने का प्रताप दिखाता है भोजन भट्ट कहा जाता है। 

अब वैसे तो चारण का  हुनर एक पेशागत कर्म नहीं रहा मगर आज भी  लोग बेमिसाल उदाहरण अपने स्वामी/ आका को खुश करने के लिए देते ही रहते हैं. ताजा उदाहरण एक राजनेता का है जिसमें उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को सारे राष्ट्र की माता का अयाचित, अनाहूत दर्जा दे दिया। लोगबाग़ विस्मित और उल्लसित भी हो गए चलो चिर प्रतीक्षित राष्ट्रपिता की कोई जोड़ी तो बनी।

चापलूसी थोडा अधिक बारीक काम है। यह प्रत्युत्पन्न बुद्धि, हाजिरजवाबी या वाग विदग्धता(एलोक्वेन्स )  की मांग करता है।वक्तृत्व क्षमता (रेटरिक )  के धनी ही बढियां चापलूस हो सकते हैं। परवर्ती भारत में बीरबल को इस विधा का पितामह कह सकते हैं। वे अपने इसी वक्तृता के बल पर बादशाह को खुश करते रहते थे। पूर्ववर्ती भारत में तो यह विधा सिखायी जाती थी। महाभारत में ऐसे संकेत हैं।आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चापलूसी के उदाहरण मिलते ही रहते हैं मगर उनका स्तर घटिया सा हो चला है। 

बॉस को खुश करने के लिए ऐसे बेशर्मी से भरे खुले जुमले इस्तेमाल में आते हैं कि आस पास सुनने वाले को भी शर्मिदगी उठानी पड़ जाती है -अब चापलूसी में वक्तृता का पूरा अभाव हो गया है। और वैसे ही आज के  बॉस हैं, जो चाहे राजनीति में  हों या प्रशासनिक सेवा में बिना दिमाग के इस्तेमाल के कहे गए "सर आप बहुत बुद्धिमान हैं " जैसे वाक्य पर भी  लहालोट हो जाते हैं. मतलब गिरावट दोनों ओर है -चापलूसी करने वाले और चापलूसी सुनने वाले दोनों का स्तर काफी गिर गया है।


वैसे शायद ही कोई होगा जिसे अपनी प्रशंसा अच्छी न लगती हो। मगर वह सलीके से की तो जाय। बेशर्म होकर केवल चापलूसी के लिए चापलूसी तो कोई बात नहीं हुयी। यह एक कला है तो कला का कुछ स्तर तो बना रहना चाहिए। कभी कभी मुझे कुछ लोग कह बैठते हैं 'मिश्रा जी आप बहुत विद्वान् आदमी हैं' मैं तुरंत आगाह हो उठता हूँ कि ऐसी निर्लज्ज प्रशंसा का आखिर असली मकसद क्या है? कोई न कोई स्वार्थ जरुर छिपा होता है इस तरह की स्तरहीन चापलूसी में। मगर मैं हैरान हो रहता हूँ जब मैं पाता हूँ कि कई ऐसे सहकर्मी अधिकारी हैं जिन्हे अपने मातहत से  चापलूसी सुने बिना खाना ही हजम नहीं होता। उन्हें चापलूसी करवाते रहने की आदत सी पडी हुयी हैं। कुछ तो चापलूसी करने वाले स्टाफ को अपने साथ ही लगाए रहते हैं और उसे अवकाश पर भी जाने देने में हीला हवाली करते हैं। बिना चापलूसी के दो शब्द सुने उनका दिन ही नहीं कटता। 
चापलूसी सुनने का ऐसा व्यसन भी तो ठीक नहीं !

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

झांसी में कबूतरों का आतंक और मछलियों का क्लोज सीजन - (सेवाकाल संस्मरण -14 )

झांसी में तनहा रहते हुए कुछ समय ही बीता था कि पत्नी को  साथ रखने का कर्त्तव्यबोध/इंस्टिंक्ट  तीव्र हो उठा। संयोग से एक इलाहाबादी मित्र के सम्पर्क सहयोग से सीपरी के पास आवास विकास कालोनी में तीन कमरे का आवास मिल गया  और मैंने  घर से पत्नी को लाकर अपनी दिनचर्या नियमित कर ली। मगर तब वहाँ चोरियां बहुत होती थीं और चोरों का डर हमेशा बना रहता।  पास में ही पहुंज जलाशय था जिसमें  मछली मारने का ठेका मत्स्य विभाग देता था।  लोग बताते कि वहाँ 'कबूतरों' का अड्डा है जो रात  बिरात कालोनी तक भी धावा बोल देते हैं .आये दिन अख़बारों में भी  छपता कि कबूतरे ये ले उड़े, वे ले उड़े। 

एक दिन सुबह सुबह पहुंज जलाशय का एक मछुआ भागता हुआ आया और हाँफते हाँफते बोला साहब कबूतरे जाल (मछली का जाल ) उड़ा  ले गए. मुझे सहसा तो माजरा ही समझ में  नहीं आया और वो चित्रमय कहानी याद आ गई जिसमें एक बहेलिये के पूरे जाल को कबूतर ले उड़े थे। मगर  बाद में बात समझ आयी कि झांसी में कबूतरे दरअसल लूट मार कर जीविका  चलाने वाले आदिवासी समूह हैं जिनका उस समय आतंक रहता था। पता नहीं अब भी वे हैं या नहीं। मगर उनका एक आभार है मुझ पर। 

 एक दिन मैंने  जिलाधिकारी महोदय से बड़े ही अनुरोधपूर्वक कबूतरों के करतूतों का हवाला देते हुए  अपने लिए सरकारी आवास ऐलाट करने की दुबारा गुहार लगायी। इस बार सुनवाई आखिर हो ही गई।  और मुझे आफिसर्स होस्टल एलाट हो गया -कक्ष संख्या अट्ठारह, द्वितीय तल जिसका मैंने नाम रखा था -"द सेलेस्टियल राण्डिवू (आकाशीय मिलन -स्थल ) . आफिसर्स होस्टल की लोकेशन बहुत अच्छी है। बगल में जिलाधिकारी आवास और सर्किट हाऊस यानि वी वी आइ पी लोकेलिटी। सरकारी आवासों की एक अच्छी बात है कि वहाँ सरकारी कर्मियों का एक 'मर्यादित' और निःशंक परिवेश मिलता है।  जबकि अन्यत्र रहने पर न  जाने कैसे कैसे लोगों की आवाजाही आस पास बनी रहती है। आप तब ईजिली अप्रोचेबल होते हैं. पत्नी भी अब काफी खुश थीं -उनका महिला साम्राज्य अब विकसित होने लगा था और अब वे  आवास विकास कालोनी के नीरस परिवेश से मुक्त हो गयी थीं।  पड़ोसनों का दैनिक 'बात व्योहार' आरम्भ हो गया था। एक दो की याद तो पत्नी को अभी भी है और मुझे भी ।
झांसी संस्मरणों के लिहाज से मेरे लिए आज भी बहुत समृद्ध है।  मगर दुविधा यही है कि क्या छोडूं क्या जिक्र करूं? और बहुत सम्भव है कि बहुत कुछ भूला भी हो जो महत्वपूर्ण हो और कम जरूरी बातें याद हों।  याद आता है कि तब कांग्रेस की सरकार सूूबे में थी और हमारी कैबिनेट मंत्री थीं श्रीमती बेनी बाई जी जो वहीं झांसी शहर की ही रहने वाली थीं।  मुझे कोई ऐसा वाकया याद नहीं पड़ता जिसमें उनके नगरागमन पर हमें कोई असहजता या समस्या झेलनी पडी हो।  वे प्रायः घर आतीं मगर उनका यह दौरा निजी ही होता था और सरकारी अमला जामा बस प्रोटोकाल में आते जाते  बस उन्हें नमस्कार करने की ही जहमत उठाता। यह नहीं कि अनावश्यक भीड़ भाड़ और उसे सम्भालने, खाने पीने की जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों की रहती ।  तब सरकारी सेवायें एक हद तक अनेक आडम्बर और अनुचित आग्रहों से मुक्त थीं -कम से कम मत्स्य विभाग तो उनके आने पर चैन की वंशी बजाता  रहता।  

हाँ एक बार मैं तलब किया गया था. बात यूं थी कि उत्तर प्रदेश मत्स्य अधिनियम 1948 में उन प्रजननकारी  मेजर कार्प मछलियों के शिकार पर माह जुलाई और अगस्त में प्रतिबन्ध था जो डेढ़ किलो से नीचे थीं और जिन्हे एक बार भी पहले प्रजनन का मौका न मिला हो।  यह मत्स्य संरक्षण के लिए एक जरूरी प्रावधान था और अपने अकादमीय रूचि के कारण मैं इस प्रावधान को कड़ाई से लागू करने के लिए सक्रियक की भूमिका में आ गया।  जबकि अनुभव ने  बार बार यह सिखाया है कि सरकारी नौकर को अपने दायरे का अनावश्यक अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।  मैंने ऐसी मछलियों की बाजार में भी बिक्री पर कड़ाई से प्रतिबन्ध लागू किया।  औचक छापे मारे।  जुर्माने लगाये और रसीदें दीं - पहली बार झांसी के मछली बाजार में हड़कम्प मच गया।  मेरे मंडलीय अधिकारी वीरेंद्र कुमार जी ने मेरी  अति सक्रियता पर थोडा लगाम लगाना चाहा -मगर तब तो नया जोश और कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। 

 मेरा अभियान चलता गया।  मेरे पास आकर्षक आफर आने लगे।  मत्स्य व्यवसायियों ने 'प्रिवी पर्स' का प्रस्ताव दिया।  कई बार मन भी डिगा।  मगर नैतिकता कचोटती -क्या इसी के लिए इतना आगे बढे थे।  मैंने दृढ हो सभी प्रलोभनों को ठुकराया। और तब थक हार कर मछुआ समुदाय के लोग माननीय मंत्री जी के पास फ़रियाद लिए जा पहुंचे और उन्हें मछली के मुसलमान व्यवसायियों ने भी सपोर्ट किया।  मेरी पेशी हुयी।  मैं  किंचित घबराते हुए मंत्री जी के पास गया  मगर उन्होंने बहुत ही सहज आत्मीय तरीके से कहा कि " ऐ डी एफ (असिस्टेंट डाइरेक्टर फिशरीज ) साहब, आप गरीबों को क्यों सता रहे हैं? उन बिचारे लोगों के पेट पर लात मत मारिये "  अब मैं उन्हें कैसे समझाता कि कि अगर इसी  तरह प्रजनन काल में मछलियों को मारा जाता रहा तो एक दिन इन मछुआ परिवार के वंशजों को नदियों में मछली ही नहीं मिलेगी  और उनका जीवन निर्वाह मुश्किल हो जाएगा -पर्यावरण की कोई भी क्षति आखिरकार मनुष्य को ही प्रभावित करती है।  मगर इतना तो विवेक मुझे था कि यह बात लोकतंत्र के चुने प्रतिनिधियों को न तब और न अब भी समझा पाना मुश्किल है।बहरहाल मैंने कोशिश तो की मगर शायद सफल नहीं हुआ और यह मामला डी एम  साहब के छोर पर जा पहुंचा।  और मेरी पेशी वहाँ भी हुई। 

अब तक नए डी एम  साहब पी उमाशंकर जी आ चुके थे तो आंध्र प्रदेश मूल के आइ ए  एस थे और उन्हें  वस्तुस्थिति से अवगत कराना मुझे आसान सा लगा।  मैं ऐक्ट की प्रति उनके सामने ले गया था और प्रावधानों को उन्हें दिखाया और तब उन्होंने जिले के पुलिस अधीक्षक को भी यह कह दिया कि प्रजननकारी मछलियों को पकड़ने बेंचने में अगर मत्स्य विभाग का कोई कर्मी मदद मांगता है तो पर्याप्त आवश्यक पुलिस बल भी दिया जाय। मेरा मनोबल बढ़ा। मेरी शिकायत तत्कालीन निदेशक वीरेंद्र कुमार जौहरी साहब के यहाँ भी हुयी और उन्होंने जिलाधिकारी से जांच की अपेक्षा की और जिलाधिकारी महोदय ने मुझे क्लीन चिट  दे दिया।  यह तब की बात थी जब ज्यादातर उच्च अधिकारी अपने मातहतों के मनोबल  को ऊँचा बनाये रखने का यत्न करते थे।  मुझे याद है इसी आपाधापी में अगस्त बीत गया। और प्रतिबंधित काल(क्लोज सीजन ) ख़त्म हो गया. मगर इस घटना की गूँज बनी रही और मैंने जिलाधिकारी का विश्वास जीतने में कामयाबी पायी 
जारी ...।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान

विगत लगभग एक साल से नारी अस्मिता और सम्मान को तारतार करने के ऐसे अप्रिय और शर्मनाक मामले मीडिया के जरिये चर्चित हुए हैं कि हमें खुद के सभ्य  होने पर शंका होने लगी है।  सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि कठोर दंड के प्रावधानों के बावजूद भी इन घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है। ऐसा नहीं  है कि ये मामले अशिक्षित, गंवार और जाहिल लोगों के बीच के हैं बल्कि नारी की अस्मिता से खिलवाड़ का आरोप लोकतंत्र के लगभग सभी स्तम्भों के नुमाइंदों पर लगा है -जज ,विधायक-सांसद  ,अधिकारी और पत्रकार सभी इस के दायरे में है जो खासे पढ़े लिखे और शिक्षित हैं। आखिर सामजिक स्थापनाओं की एक अहम् कड़ी बल्कि कर्णधारों  पर ऐसे आरोपों  का सबब क्या है ?

.... और आधी दुनिया पर भारत में यह क़यामत क्यों बरपा हुयी है। इस अत्यंत ही विषम समस्या के  पहलुओं पर गहन विचार विमर्श और उनके कारणों और निवारण पर उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यवाही समय की मांग है।  मात्र  कानूनी प्रावधान -दंड व्यवस्था के बल पर इससे निजात मिलना मुश्किल लगता है।  इस समस्या के मूल कारणों के सभी सामाजिक ,आर्थिक और जैवीय पहलुओं को गम्भीरता से समझना होगा।  मीडिया ट्रायल या नारी समर्थकों की अति सक्रियता भी इसे प्रकारांतर से उभार ही रही हैं ऐसा लगता है। 

 मुझ पर अपनी बातों की बार बार पुनरावृत्ति के आरोप की कीमत पर भी जैवीय पहलुओं को यहाँ इंगित करना मैं जरूरी समझता हूँ -नारी का प्राचीन मानवीय सभ्यता में घर के भीतर तक सीमित रहने का रोल सभ्यता की प्रगति के साथ तेजी से बदला है।  अब नारी का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित न रहकर उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत हो चला है -डेजमांड मोरिस जैसे विश्व प्रसिद्ध जैव व्यवहार विद के शब्दों में कहें तो नारी अब पुरुष के बाहरी विस्तृत  "आखेट के मैदान " में उसकी बराबर की सहभागी बन रही है।  यह एक बड़ा रोल रिवर्जल है। उसका नित एक्सपोजर अब एक बड़े " आखेट के मैदान" में हो रहा है।  और यहाँ उसका सामना विभिन्न हैसियत के पुरुषों से हो रहा है। 

मनुष्य का विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। पुरुष ऐसे जैवीय आकर्षणों या यूं कहिये "जैव कांपों" (बायो ट्रैप ) से बच नहीं पाता, सहज ही फंसता है ।  इस मामले में उसका आचरण ज्यादा मुखर  होता है।  प्रकृति ने उसे सम्भवतः ऐसा ही बनाया है क्योंकि ऐसा होने में उसके सामने कोई जैवीय या सामाजिक रिस्क नहीं है।जबकि नारी का लम्बा प्रसव काल और  शिशु के लम्बे समय तक पालन पोषण उसके लिए सबसे बड़ा बंधन है , इसलिए प्रकृति ने उसे विपरीत सेक्स के प्रति जब तक कि उसकी संतति के लालन पालन के लिए एक जिम्मेदार सहचर न मिल जाय प्रायः उदासीन ही बना रखा है।  मगर पुरुष की ऐसी  किसी बाध्यता के न होने से उसके यौनिक आग्रह प्रायः ज्यादा मुखर होते हैं।  यह एक बड़ी असहज स्थिति है.  जानवरों में तो मादा के चयन के लिए बाकायदा भयंकर शक्ति का प्रदर्शन होता है और जो सबसे बलिष्ठ होता है वही मादा को हासिल करता है।  वहाँ  पूरी तरह जैवीय -कुदरती व्यवस्था लागू है। मगर मनुष्य ने शादी विवाह के कई सामाजिक पद्धतियों को वजूद में ला दिया है।   वह आज भी एक तरह से अपनी उसी आदि आखेटक की भूमिका और बलिष्ठ नर होने का गाहे बगाहे प्रदर्शन का 'कु -प्रयास' कर बैठता है। 
 
 मनुष्य ने विकास क्रम में अपनी एक सामाजिक व्यवस्था  विकसित की है और कई कायदे क़ानून बनाये हैं।  स्त्री पुरुष के ऐसे ही जैवीय लिहाज से भी अनुचित संसर्गों से बचने के लिए धर्म में  स्त्री के पर्देदारी ,यौनिक दृष्टि से परिपक्व विपरीत लिंगियों यहाँ तक कि पिता पुत्री तक के एकांतवास पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं।  धार्मिक साहित्य में स्त्री से दूर रहने के लिए ऐसे तमाम निषेध हैं और उसे जानबूझकर कर दुखों और अपयश की खान तक कह  डाला गया है।  कहा गया है कि नारी संसर्ग/प्रसंग पुरुष के ज्ञान -बुद्धि सभी को नष्ट भ्रष्ट कर देने वाला है।  इसका अभिप्राय केवल यही लगता है कि विज्ञ जन नारी से दूर रहें -उनके आकर्षण से बचें।  

पूरी दुनिया में नारी के पुरुष से कंधे से कंधा मिलाकर चलने के चलन ने हमें 'सभ्य युग' के  कई शिष्टाचार के पाठ भी पढ़ाये हैं।  कंधा से कंधा मिलाना महज एक अलंकारिक उक्ति है जबकि सामाजिक रहन सहन में उंगली भी छू जाय तो शिष्टाचार का तकाजा है कि तुरंत सारी बोला जाय।  मगर बायोट्रैप का क्या कहिये, बसों रेलों में ईव टीजिंग की घटनाएं होती रहती हैं।  जाहिर है पुरुषों के लिए जैव कांपों से खुद को बचने का सलीका अभी आया नहीं है।  बहुत प्रशिक्षण और कठोर पारिवारिक संस्कारीकरण की जरुरत बनी हुयी है. ऐसे में कार्य स्थल जो मनुष्य के आदिम आखेट स्थलों के नए स्वरुप हैं में नारियों को भी कई सुरक्षा और सावधानियों का अपनाना जरूरी है। यहाँ मैं नारीवादियों की उन्मुक्त रहन सहन के बड़े दावों से सहमत नहीं हूँ।  अनेक दुखद घटनाएं हमें बार बार चेता रही हैं कि आज कार्यस्थलों पर नारी के भी आचरण को मर्यादित रखने के प्रति सजग होना होगा। अनावश्यक प्रदर्शनों जिसके कि अनजाने ही गलत अर्थ -जैवीय संकेत निकलते हों के प्रति सावधानी अपेक्षित है।  

पुरुषों के लिए तो खैर कार्यस्थलों पर आचार विचार के लिए कठोर दण्ड के कानूनी प्रावधान लागू हो ही गए हैं मगर साफ़ दिख रहा है कि इससे भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।  इस समस्या की जड़ें कही और है और हम  कहीं और समाधान के प्रयास कर रहे हैं।  भारत में कार्यस्थलों पर विशाखा प्रावधानों के लागू होने के बाद तो स्थिति पुरुष सहकर्मियों के लिए काफी निषेधात्मक और चेतावनीपूर्ण हो गए हैं।महिला सहकर्मी के किस हाव भाव या उपक्रम को गलत समझ कर प्रतिवाद हो जाय यह भी असहज सम्भावना बनी हुयी है।  इसलिए आज पुरुष सहकर्मियों को भी कार्यस्थलों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरुरत है। बस काम से काम उनका मंतव्य हो, जैवीय 'काम' से बस दूर से ही नमस्कार! अन्यथा बस फजीहत ही फजीहत है। नारी प्रसंग से बचिए श्रीमान! 

रविवार, 1 दिसंबर 2013

कोई अधिकारी ऐसा तो है जो मुझसे बहस करने की हिम्मत रखता है( सेवाकाल संस्मरण -13)

यादों के वातायन में वापस लौटता हूँ वर्ष 1988 में,झांसी। मैं इस मामले में शायद अतिरिक्त रूप से सजग था कि "झांसी गले की फांसी" है, मगर इस बारे में आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह  कहावत है क्यों?   जिस किसी से पूछता वह अपनी अलग व्याख्या देता।  कोई कहता कि बुंदेल खंड में ट्रांसफर होने के बाद पूरे सर्विस पीरियड में वहीं रह जाना पड़ता है।  मेरे सामने ऐसे मामले आये जिसमें 14 साल यानी एक पूरी  वनवास  अवधि कई स्टाफ वहीं गुजार चुके थे जबकि वे रहने वाले पूर्वांचल के थे।  पूर्वांचल का मैं भी था तो मुझे भी आशंका होती कि कहीं मैं भी वहीं का न होकर रह जाऊं।  मुझे वहाँ सहायक निदेशक का प्रभार मिला था जिसके आहरण और वितरण का दायित्व उप निदेशक मत्स्य को था -एक तरह से यह  अनुचित आदेश था क्योकि मैं खुद एक राजपत्रित अधिकारी था।  मगर मौलिक पद व्याख्याता का होने के कारण उच्च अधिकारी मुझे आहरण वितरण का दायित्व देने से कतराते थे जबकि वित्तीय नियमों के अधीन यह एक स्पष्ट व्यवस्था है कि आप जिस पद का काम करेगें आपको उस पद का वित्तीय अधिकार भी होना चाहिए। 

 उन दिनों और अब भी लगभग सभी जनपदों में वर्ल्ड बैंक के सहयोग से एक और योजना आरम्भ हुयी थी -मत्स्य पालक विकास अभिकरण जिसके अध्यक्ष जिलाधिकारी (अब जिला पंचायत अध्यक्ष ) होते थे और मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक सचिव होते हुए इस स्वयं शासी संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी ई ओ ) होते थे /हैं।  मुझे तब इस पद यानि सी ई ओ का पूरा वित्तीय अधिकार दिया गया था।  तब किसी भी संस्थान का सी ई ओ एक तोप  माना जाता था।  मैंने ठाठ से इस पदनाम से एक विजिटिंग कार्ड भी छपवा लिया था।  तब तो कई साध और शौक और भी थे  और साथ थी पूरी  अपरिपक्वता :-) ।  लोग बाग़ सुनते कि मैं कहीं का सी ई ओ हूँ तो ज्यादा तवज्जो देते और व्याख्याता कहने पर कोई ख़ास तवज्जो नहीं देते।  धन्य है हमारा परिवेश और समाज! 
हलाँकि तब मेरे मंडलीय अधिकारी /उप निदेशक मत्स्य वी कुमार साहब जो आगे चलकर निदेशक मत्स्य उत्तर प्रदेश हुए,  मीठी झिड़की देते हुए  कहते कि मुझे सहायक निदेशक मत्स्य ही लिखना और प्रगट करना चाहिए मगर  मेरा  जवाब रहता कि उस  पद का पूरा अधिकार ही मेरे पास कहाँ था।  वे कहते कि नहीं पूरे जनपद का प्रभार आपके पास ही है।  और मुझे इस द्वंद्व में नहीं रहना चाहिए अन्यथा मेरी कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।   मगर कहने से क्या होता था, मुझे असलियत तो पता ही थी।  मेरे बाबुओं ने आखिर एक दिन इस मामले में एक असहज स्थिति उत्पन्न कर ही  दी.  उन्होंने मुझे पता नहीं कैसे यह कन्विंस कर लिया कि सहायक निदेशक मत्स्य के रूप में मैं चतुर्थ श्रेणी यानि  मछुआ के पदों पर कार्यरत कर्मियों का ट्रांसफर कर सकता हूँ और मुझसे एक दो नहीं कोई आधा दर्जन मछुओं का ट्रांसफर करा दिया।  हड़कम्प मचना ही था सो मचा।  बाबूओ ने ट्रांसफर हुए स्टाफ पर अपनी खुन्नस मेरे जरिये निकाली थी।  आदेश के एक दो दिन बाद ही वी कुमार साहब ने मुझे तलब कर लिया।
आपने यह क्या कर डाला? मैंने दृढ़ता से उत्तर दिया 'सर, जनपदीय अधिकारी के अधिकार से मैंने वे ट्रांसफर किये हैं ,अब क्या जनपदीय अधिकारी को यह भी अधिकार नहीं है ? " वे कन्विंस नहीं थे ," यह अधिकार केवल उप निदेशक और उच्च अधिकारियों को है, सहायक निदेशक को नहीं " अब मैं असहज सा हुआ, "यानि कि सहायक निदेशक को जिस पर पूरे जनपद की जिम्मेदारी है को अपने चतुर्थ श्रेणी के कर्मियों को एक जगहं से दूसरी जगह पदस्थ करने का अधिकार नहीं है ? " "बिलकुल नहीं है और यह करके आपने अधिकार सीमा का ऊल्लंघन किया है और यह दंडनीय है " अब मुझे काटो तो खून नहीं और विस्मित सा अलग।  "चलिए मैं इसे अनदेखा करता हूँ मगर आईन्दा आप अपने अधिकारों के ऊपर जाकर काम नहीं करेगें और बाबुओं के प्रस्ताव पर सजगता से और विभागीय निर्देशों की पूरी जानकारी करके ही निर्णय लिया करिये।" मेरी नयी नौकरी पर यह उनका उदार निर्णय था।  वे अभी भी हैं हालांकि सेवा निवृत्त और कभी कभी फोन पर मेरी हाल चाल लेते रहते हैं।
उनसे कई बार बहस भी हो जाती थी क्योकि मत्स्य विभाग में सहायक निदेशक यानि जनपदीय अधिकारी को जिम्मेदारी तो बहुत दी गयी है मगर कोई भी प्रशासनिक अधिकार नहीं है -न तो किसी भी तरह दंड देने का और न ही ट्रांसफर करने का।  उस पर अपेक्षा यह की जाती है कि वह अपने अधीनस्थ पर यथेष्ट नियंत्रण रखे।  और यह व्यवस्था विगत तीस वर्षों में जस की तस है, जो प्रशासनिक समस्या मेरे सामने तीस वर्ष पहले थी वही आज भी है।  इन्ही मुद्दों को लेकर मेरी तत्कालीन उप निदेशक वी कुमार साहब से तल्ख़ बहसें भी हो जाती थीं मगर वे एक परिपक्व और बड़े विजन के अधिकारी थे और मुझे डांटने के बजाय दूसरों से मेरी बड़ाई ही करते और कहते ," कम से कम कोई अधिकारी ऐसा तो है जो मुझसे बहस करने की हिम्मत रखता है " और मैं जब यह सुनता तो लज्जित सा हो उठता।

उनके साथ मेरे संबंध उत्तरोत्तर अच्छे बनते गए थे और जब वे निदेशक बने तो भी उनका वही स्नेह मुझे मिलता। एक बार तो लखनऊ जाने पर मुझे अपनी राजकीय कार में बिठा कर हजरतगंज ले गए और जनपथ की तब एक निर्जन  सी  चाट के दुकान  पर मुझे गोलगप्पे खिलाये और खूब बतकही की -मैं तब बनारस  जनपद में सी ई ओ था मगर उनके हाव भाव में कहीं भी निदेशक होने का भाव नहीं था -एक गाइड एक अभिभावक के रूप में ही वे दिखे बल्कि  मित्रवत भी।  ऐसे अधिकारी अब कितने कम से कमतर होते गए हैं।
जारी ……

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