गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

पुस्तक लोकार्पण: मैंने किया,मेरी हुई!

यह तो आप जानते ही हैं और न जानते हों तो जान लीजिये, लखनऊ में भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन पर एक राष्ट्रीय कार्यशिविर अभी अभी आयोजित हुआ जिसमें इस बन्दे की भी भागीदारी हुई ....रुकिए रुकिए मैं यहाँ विज्ञान  पर आपका माथा नहीं चाटने जा रहा ...बल्कि लोकार्पण समारोह से जुड़े चंद जज्बात साझा कर लेना चाहता हूँ ...अंगरेजी के  पुस्तक 'रिलीज ' या 'अनवीलिंग' सेरेमनी  को हिन्दी जगत में विमोचन /लोकार्पण कहने का  प्रचलन है ....नेशनल बुक ट्रस्ट (एन बी टी )  दिल्ली ने मुझे 'इसरो की कहानी' पुस्तक के लोकार्पण सत्र में पुस्तक पर एक आलेख वाचन के दायित्व के साथ आमंत्रित किया था ..पुस्तक जाने माने प्रक्षेपक /प्रक्षेपास्त्र विज्ञानी वसंत गोवारीकर द्वारा मराठी में लिखी गयी है जिसका हिन्दी अनुवाद एन बी टी ने अभी अभी प्रकाशित किया है ..
साईंस फिक्शन इन इण्डिया का लोकार्पण : बाएं से मैं ,मुख्य अतिथि अनिल मेनन ,वरिष्ठ साहित्यकार हेमंत कुमार ,डॉ चन्द्र मोहन नौटियाल और सुप्रसिद्ध विज्ञान कथाकार देवेन्द्र मेवाड़ी 

इसके साथ ही दो और पुस्तकें लोकार्पित होनी थी -जीनोम यात्रा -लेखिका विनीता सिंघल और विज्ञान और आप -लेखक  डॉ. पी जे लवकरे....इस तरह तीन किताबें दुल्हनों की तरह सज धज के समारोह में लाईं गयीं थीं ..एन बी टी के सहायक सम्पादक पंकज चतुर्वेदी ने बच्चों को मंच पर बुलाकर पुस्तकों का विमोचन- घूंघट उठवाया और पुस्तकों का आमुख देखकर बच्चे दीवाने हो चले ..और दीवानगी का आलम यह कि प्रकाशक से बिना एक एक पुस्तकों का उपहार लिए वे मंच से नहीं उतरे ...

मगर एक दो पुस्तकें और भी थी जिसे विश्वप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक अनिल मेनन ने लोकार्पित किया ...एक तो साईंस फिक्शन इन इंडिया जिसका सम्पादन खुद मैंने और मित्रों ने किया है तथा दूसरी हास्य विज्ञान उपन्यासिका बुड्ढा फ्यूचर जिसे जीशान हैदर ज़ैदी ने लिखा है .....विज्ञान कथा की कार्यशाला में इन पुस्तकों के विमोचन की धूम मची रही ...बाकी एक से एक दिग्गज विज्ञान कथाकार इस आयोजन में जुटे जिसकी रिपोर्ट जाकिर अली 'रजनीश ने तस्लीम पर डाल दी है  सो दुहराव की जरुरत नहीं है ....
एन बी टी की पुस्तकों को बच्चों ने खुद लोकार्पित और आत्मार्पित किया: मंच पर बच्चों के साथ पुनः मैं ,लेखिका विनीता सिंघल और देवेन्द्र मेवाड़ी  

इस आयोजन में बहुत आनंन्द आया ..एक नागवार बात भी गुजरी ..जहाँ हम रुके थे ..सप्रू मार्ग पर, सरकारी देखरेख के होटल गोमती में ,वहां अतिथियों के कमरों में अंगरेजी अखबार देने का ही रिवाज है ..मैं जब रिसेप्शन पर गया और हिन्दी अखबार की मांग की तो मुझे अजीब नज़रों से देखा गया ..बताया गया  यहाँ हिन्दी अख़बार नहीं दिए जाते ...यह हाल हिन्दी प्रदेशों के ह्रदय स्थली की है ....बेहद आपत्तिजनक और अफसोसनाक ....कोई सुन रहा है जो इस मामले में हस्तक्षेप करने की कूवत रखता हो? हाय बेचारी हिन्दी अपने ही लोगों के बीच बेगानी हो गयी है ...! 

अब हम वापस तो आ गए है बनारस मगर विधान सभा सामान्य निर्वाचन का कार्यक्रम घोषित हो चुका है और अब अगले दो ढाई माहों के लिए मुझे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है ...इसे आप अर्ध टंक्यारोहण  भी कहना चाहें  तो सहर्ष कह सकते हैं ..जो लोग इस ब्लॉग लिंगो से परिचित नहीं हैं वे ब्लॉग निघंटु के ज्ञाता किसी भी टिप्पणीकार से पूछ सकते हैं .....ऐसे कुछ ब्लॉग भाषा शास्त्री यहाँ टिपियाने तो आयेगें ही ...... 

रविवार, 25 दिसंबर 2011

जलेबीबाई, किसी मिठाई का नाम लो!

बहुत दिनों से यह पोस्ट लिखने को सोच रहा था .आज लगा कि मिठाईयों की चर्चा कर पिछली पोस्ट की कड़वाहट थोड़ी मिटाई जाय .. मिठाई के प्रति प्रेम सर्वव्यापी है ..यहाँ तक कि ईश्वर के भोग में मिठाई ही प्रमुख है ..लोकमंगल के अधिष्ठाता अपने गणेश तो मोदक/लड्डू प्रेमी हैं ही और इसलिए बिचारे डायिबिटीज के निवारण के लिए कपित्थ जम्बू जैसे सुन्दर (चारू) फलों का भी नियमित सेवन करते हैं ..सुना है इनमें डायबिटीज निवारक गुण होते हैं ...कपित्थ यानीं कैंत और जम्बू यानी जामुन! पता नहीं कितनो ने  कैंत  देखी है ,मगर इस पर हम कभी फिर चर्चा कर लेगें ..आज तो सुबह सुबह कुछ मीठा वीठा हो जाय ....तो आप आज अपनी पसंद की कोई मिठाई बताएगें ...

मुझे याद पड़ता है कुछ दिनों पहले जर्मनी वाले राज भाटिया जी ने फेसबुक पर भारत की राष्ट्रीय मिठाई के नामांकन की बात छेड़ी थी मगर उन दिनों जलेबीबाई की धूम मची हुयी थी इसलिए बात बस जलेबी के लटको झटकों से आगे नहीं बढ़ पाई....मैंने उस परिचर्चा में भाग लेते हुए अपनी पसंद लड्डू ही बताई थी ....मेरी निगाह में तो यही भारत की राष्ट्रीय मिठाई बनने  लायक है ,कन्याकुमारी से कश्मीर तक लड्डू का ही जलवा है ....मगर यहाँ आपको राष्ट्रीय नहीं अपनी पसंद की मिठाई बतानी है ताकि हिन्दी ब्लागजगत की पसंदीदा मिठाई की पहचान हो सके.... वैसे अपनी  जलेबीबाई को मैंने मेल भेजकर उनकी भी पसंद पूछी है ..उनका जवाब आता ही होगा ..डर यही है कि नाम के साथ अगर फरमाईश भी हो गयी तो? :) 
किसिम किसिम की मिठाईयां मगर ब्लागजगत की पसंद कौन? 

वैसे मुझे मिठाई से ज्यादा चाट पसंद है और इस मामले में मेरी रसना बड़ी देशज है ..भारत के अलावा चाट के चाहने वाले दीगर देशों ,दुनिया जहान में बहुत कम हैं ...यहाँ तो चाट पर चर्चा शुरू हो जाय तो क्या कहने एक से एक बढ़कर आईटम हैं ..यम.. यम.. सी.. सी ..और यह मेरी कमजोरी भी है.. तो इस पर भी चर्चा आज स्थगित कर ही देते हैं ,वैसे सुना है बहुत सी कोमलान्गियों को भी चाट प्रिय है और जाहिर है वे मुझे भी प्रिय हैं बिना कहे ही ...मगर मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कतिपय देवियों को भी मिठाई पसंद है और मिठाई से उन्हें रिझाने का एक गौरवशाली इतिहास रहा है .. :) 


हमने बड़े बूढों के मुंह यह सुना है कि जब नागरी बसाहटें उतनी वजूद में नहीं थीं और मानव सभ्यता गाँव गिरावों में आँखें मुलमुला रही थी तब कुछ ख़ास गोत्रों के श्रेष्ठ जन अगल बगल की ईख या अरहर की घनी फसलों में एक ख़ास किस्म की तत्कालीन जलेबी जिसे आज भी "चोटहिया जलेबी"  के नाम से भारत के इस पूर्वांचल में जाना जाता है सरे शाम छोड़ आते थे..और घोर आश्चर्य यह कि सरे सुबह वह वहां से अछ्छन्न (अदृश्य) हो जाती थी ..यह किसी मानवेतर प्राणी का काम नहीं होता था ..बल्कि आधी दुनिया का कोई खूबसूरत नुमायिन्दा इस काम को अंजाम दे देता था और यह सिलसिला चल पड़ता था और फिर मडवे तले  तर्ज पर एक गुनगुनी सी प्रेम कहानी जन्म ले लेती थी जिस पर आगे चल के विदेशिया आदि फ़िल्में तक बनी ....ज्ञानी जन प्रसंग और सन्दर्भ समझ गएँ होगें और नहीं तो फिर ब्लागजगत के रसिक जनों (नाम जानबूझ कर नहीं ले रहे हैं ..,नाराज हो गए तो ? ) से पूछ पछोर सकते हैं ...

आज तो हम उस ज़माने की चोटहिया जलेबी ,गुड गट्टा ,खील बताशों के मीठे संसार से बहुत आगे आ गए हैं ..अब तो डिजाईनर मिठाईयों का क्रेज है और उनके अजीबो गरीब नाम हैं .मगर आपसे इन के तनिक पहले की पारम्परिक मिठाई का नाम पूछ रहे हैं ..जैसे रसगुल्ला ...पहली बार जब मैं  कलकत्ता (आज का कोलकाता ) गया तो देखा वहां  एक साथ कई कई रसगुल्लों को गड़प करने का रिवाज है ..हम बहुत अचम्भित हुए मगर एक साथ मैंने भी कई रसगुल्लों को उदरस्थ कर एक नया अनुभव हासिल किया ..तो समझिये मेरी भी पसंद यही है ...आपको अपने नाम बताने हैं .....आप बेशक कोई प्रतिक्रया  भी इस पोस्ट पर कर सकते हैं मगर अपनी पसंद की मिठाई का नाम जरुर लिख दें... ताकि यह रायशुमारी पूरी हो जाय और एक ब्लॉग जगत की मिष्ठान्न निर्देशिका तो बन ही जाय ..सर्व पसंद मिठाई का निर्धारण भी हो जाय ... तो तैयार हैं न आप ? तो बस शुरू हो जाईये !  

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

 ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो आज के वर्तमान में भी  वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की क्रमिकता/ऐतिहासिकता  का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमांचित  और आह्लादित होता हूँ...क्या नहीं है यहाँ -साहित्य की ज्ञात और नवोन्मेषित कितनी ही विधाएं यहाँ अपनी ओर ललचाती सी हैं ..कहानी है ,कविता है ,व्यंग है ,हास परिहास है ,संस्मरण है, आशय कि सचमुच क्या नहीं है यहाँ ..मगर यहाँ केवल लेखक बने रहने और पाठकों की प्रतीक्षा करते रहने से काम नहीं चलने वाला है ...यहाँ तो सभी लेखक हैं ...और वही पाठक भी हैं ...हाँ चेतना ,बौद्धिकता के विभिन्न स्तर जरुर हैं ..मगर खुद एक लेखक बने रहने और अपने को पढ़ाते रहने की ही प्रवृत्ति या अपेक्षा यहाँ नहीं चलने वाली ....
जैसे अपनी कविता तो कवि जी ने पकड़ पकड़ के अनेक हिकमतों  से ,प्यार मनुहार और चाय तक पिला के सुनाई  मगर जब मेरी सुननी हुई तो जनाब भाग खड़े हुए ..यहाँ यह आत्मकेंद्रिकता  की मानसिकता नहीं चलने वाली ..ऐसे कितने ही स्वनामधन्य और स्वयंभू यहाँ आये और चलते बने ...शायद वे ज्यादा ही आत्म गौरव के बोध से  त्रस्त थे-ब्लॉग जगत ने उन्हें रास्ता दिखा दिया ..रास्ता नापो भैया....बड़े साहित्यकार हो तो अपने घर के, यहाँ दाल नहीं गलने वाली ...मैं देखता हूँ कि कई ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरणों के बाद भी अभी भी कुछ लोग अपनी अहमन्यता से बाज नहीं आ रहे हैं ....वे चाहते तो हैं कि उनका ब्लॉग हाथो हाथ ले लिए जायं  ,उनकी हर पोस्ट पर पाठकों की इतनी भीड़ आ जुटे कि शीशी चटखने वाला मुहावरा चरितार्थ हो जाय  मगर कभी खुद किसी के यहाँ  नहीं तशरीफ़ रखेगें ....हम भी आखिर कब तक वहां जाने की सदाशयता दिखाते रहेगें.. विनम्रता ,औदार्य ,शालीनता की आखिर कोई सीमा भी तो है या नहीं?
अब लोगों को कौन समझाए भैया ब्लॉग लेखन एक दुतरफा संवाद का माध्यम है ,यहाँ महज अपनी ढपली अपना राग नहीं चलने वाला ....यहाँ का सरोकार है दूसरे के कहे को भी सुनना,समझना और भागीदार बनना  ..उनके  यहाँ आते जाते रहना ...फिर अपनी भी कहना ...लेकिन मगरूर लोगों को कौन समझाए ....खुद को अर्श पर होने और बाकी को फर्श पर पड़े होने की समझ से भी ब्लॉगजगत जूझता रहा है ..अच्छी बात है कि ऐसे कई सारे तो किनारे को आ गए हैं..कुछ घोषित करके विनम्रता या बेहयाई से तो कुछ   अपनी औकात और सीमाओं को समझ बिना घोषित, बिना गीत गवनई के चुपचाप चलते बने  .....मतलब बिना बताये ही टंकी पर चढ़ अपने ब्लागीय जीवन का उत्सर्ग कर लिया ....इस अर्थ में ब्लॉग लेखन केवल "बड़कवा" लेखक बने रहने की आत्ममुग्धता नहीं है ,यह एक सामजिक  सरोकार का  संवाद मंच भी है ....डायरी लिखनी है तो तोप ढक के रखिये न यहाँ काहें उघारे फिरते हैं ?  सही है ब्लागजगत में कोई फन्ने खा नहीं है ....साधारण बनने और जुड़ने की तमन्ना हो तो ठहरिये वर्ना अपना बोरिया बिस्तर अच्छा हो खुद उठा के पतली गली से निकल लीजिये नहीं तो बाद में कहीं यह न कहना सुनना पड़े ..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले ...
एक जमाना हुआ करता था हमें भी अपने एक बड़े लेखक होने का गुमान था ..बिना दमड़ी लिए लिखते न थे....एक अजब सा गुमान,बेखुदी  और मदहोशी तारी थी ....लोग अब किताबें लिखने ,छपने की चर्चा करते हैं यहाँ तो मुझे उन पर दया आती है ..भैया इस गुमान में न रहियो यहाँ ....हमने तो यह रहस्य पहले ही भांप लिया था और तभी बिना दमड़ी की अपेक्षा के यहाँ झख मार रहे हैं .. जो चीज है यहाँ वो कहीं पे नहीं ....तो यहाँ रुकने लिखने आपके विचार जानने,यथा संभव लोगों के यहाँ पहुँचते रहने की ,संवाद बनाए रखने की मेरी कोशिश ही रहती है ....बाकी कुछ रूठे हुए लोग भी है उनके प्रति भी मन में कभी कभी प्यार सा उमड़ा आता है मगर वे खुद उस उमड़ते प्यार को रोपने कटोरा लेकर नहीं आते तो वह व्यर्थ ही बह जाता है .. :) 
 हमने लेखन से बहुत कमाया है रोजी रोटी चल सकने लायक नहीं (उसके लिए एक अदद नौकरी तो है ही) ..मगर बहुत कम भी नहीं ..इस अर्थ में कि जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान..इस ब्लॉग लेखन की अपार्च्यूनिटी कास्ट बताऊँ तो आप निरा बावरा समझेगें मुझे ....इस ब्लॉग जीवन में दो पुस्तकों को लिखने की पेशगी ठुकरा चुका हूँ ..अब ब्लॉग जीवन से फुरसत तो मिले.... है न यह पागलपन? मगर मुझे तो जो ब्रह्मानंद की प्राप्ति यहाँ होती है वह कहीं नहीं ...खुद को अभिव्यक्त करने की ही नहीं दूसरों को पढने और वहां उनके संवाद में भागीदार होने में ...यह घनानंद तो कभी कभी शब्दों में व्यक्त होने की सीमा के बहुत बाहर हो रहता है .....
तो जनाब लुब्बे लुआब यह कि यहाँ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका .....क्या समझे?  नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :) 
नोट: यह पोस्ट लिखी  जिस भी जेंडर में हो इसे कामन जेंडर में समझा जाय ! 

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

फेसबुकिया दोस्तों तुम्हे सलाम!

कल फेसबुक पर शाम को मैंने टिपियाया,"जब तक कि मेरे कल के जन्मदिन की बधाईयों का ताता एक मंद झोके  से बड़े बवंडर का रूप यहाँ ले ले ,आप सभी को अग्रिम धन्यवाद और शुभकामनाओं के साथ यहाँ से मैं फूटता हूँ मित्रों ...अपना ध्यान रखें और मस्त रहें ..... :)" ..फिर सचमुच वहां  से फूट लिया ..मगर तब तक वहां आंधी आ चुकी थी और बधाईयों की बौछार अब चक्रवात का रूप लेने वाली  थी ...अब तक सैकड़ों बधाईयाँ जन्मदिन की फेसबुक पर मिल चुकी हैं और मेरे लिए मुश्किल क्या एक चुनौती है उन सभी का अलग अलग जवाब दे पाना ...उनमें से ज्यादातर तो मेरे कहने भर के मित्र हैं -वे मगर मानवीय सौहार्द और भातृत्व का प्रदर्शन करने में जी जान से जुटे हुए हैं ...आज मनुष्य ऐसे ही पृथ्वी जेता नहीं बन बैठा है -कुछ तो है इस प्रजाति में -और यह वही प्रजाति -एकजुटता है,दूसरे का साथ निभाने की अकुलाहट है जिसे हम प्रेम ,आत्मोत्सर्ग (altruism ) जैसे कितने ही रूपों में जानते आये हैं ...न कोई ख़ास जान पहचान मगर शुभकामनाएं देनें को तत्पर... 

मेरी लम्बी उम्र और स्वास्थ्य को वेद की ऋचायें पढी जा रही हैं ....तरह तरह से मनुष्य की आप्त -कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति दी जा रही है ...और मैं सच में अभिभूत हूँ ..इसलिए भी कि भावनाओं का यह अंनत प्रवाह मुझमें ऊर्जा भर रहा है ..मुझे जीवंत बनाए रखने का भरोसा दे रहा है -जबकि आज की इस त्रासद दुनिया में कितने ही विश्वास टूट रहे हैं इतने धोखे मिल रहे हैं और जीने के मायने धुंधलाते जा रहे हैं ...मनुष्यता का यह उज्जवल पक्ष ही जीवन में भरोसा भरता है  ,आश्वस्त करता है  ....शुभचिंतकों की कमी नहीं है यहाँ ..यहीं ब्लॉग जगत में कल तक के कई बेहद अपने आज बेगाने हो गए मगर दुनिया कहाँ अपनत्व से खाली हुई? अनजाने अजाने लोगों की शुभकामनाएं तो साथ है ....यहाँ भी और वहां भी!

हम तो देहाती आदमी ठहरे ...जहां आज भी जन्मदिन मनाने का कोई रिवाज नहीं है और न ही इन अवसरों का कोई महत्त्व ही ...दिन आते जाते ऐसे ही सारा जीवन बीत जाता है ....मैं भी अपना बर्थ डे कहाँ याद कर पाता था इस रूप में, मगर अंतर्जाल और फेसबुक से जुड़कर तो  मानो यह एक उत्सव बन गया है -एक अनुभूति की हम तो अभी भी जिन्दा हैं ,याद किये जा रहे हैं ....नहीं तो हालत उस जुमले की तरह होती जा रही थी ..."मौत से आप नाहक परेशान हैं आप जिन्दा कहाँ हैं जो मर जायेगें :)" मगर फेसबुक पर उमड़ती शुभकामनाओं की लहरें मुझे मेरी जीवन्तता का अहसास दिला रही हैं -शुक्रिया फेसबुक और शुक्रिया मेरे फेसबुकिया दोस्तों ,आपने मुझे जीने का एक नया अहसास दिया है ....सलाम! 

जब से पाबला साहब ने  जन्मदिन के  ब्लॉग के समापन की घोषणा की है ..यह जिम्मेदारी भी तो खुद भी अपुन पर आ गयी है ..नहीं तो मेरे ब्लागीय मित्र कहते कि आपने तो बताया  ही नहीं कि आपका जन्मदिन है -जैसे बता देने पर मेरी सारी गुस्ताखियाँ माफ़ हो जायेगीं  और लोग मुझे गले लगाने दौड़ पड़ेगें :) मगर न बताना भी तो अब ठीक नहीं है जब एक और आंधियां चल पडी हों तो इधर तितलियाँ कुछ तो पंख फड़फडायें ( I mean butterfly effect) ....दोस्तों क्या अब कहना  भी पड़ेगा कि आज मेरा जन्मदिन है ? :)

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

भारतीय साड़ियों की दुशासन ब्रांड!

फैशन के नाम पर तन उघाडू संस्कृति के  पोषक पश्चिमी जगत का अगर कोई जाना माना डिजाईनर भारतीय साड़ी संस्करण लांच करे तो साड़ियों की उस खेप को मैं दुशासन ब्रांड ही कहूँगा या आपके पास कोई और मौलिक सुझाव है? टाईम पत्रिका से मुझे जानकारी मिली कि 174 वर्ष पुराने  पारसी फैशन हाउस हेर्मेस ने  भारतीय साड़ियों की पहली खेप जारी की है जो बेहतरीन फ्रेंच सिल्क और भारतीय पारंपरिक कला और शिल्पकारिता की अद्भुत मिसाल के रूप में प्रचारित की जा रही है . मगर यह पहली खेप तो भारतीय नारियों को ललचाने के लिए है जैसा कि हेर्मेस के भारतीय अध्यक्ष बेरट्रेंड मिचौड का कहना है ....मगर इन साड़ियों का मूल्य ६००० से ८००० डालर  के बीच है -मतलब तीन   से चार  लाख रुपये फी साड़ी....फिर तो इसे और भी दुशासन ब्रांड कहने का मन हो आया क्योंकि यह तो  अमूमन भारतीय नारी के तन को घेरने  वाली नहीं है ...बस फैशन शोज में दिखावे का आईटम बनके रह जायेगी जहां कपडे कम शरीर की नुमाईश ज्यादा होती है ..


इस ब्लॉग-पोस्ट के जरिये मैं हेर्मेस  को यह सलाह देना चाहता हूँ कि इन साड़ियों को वे दुशासन ब्रांड का नामकरण देकर यहाँ के परिवेश के एक ख़ास उपभोक्ता वर्ग में इन्हें ज्यादा लोकप्रिय बना सकते हैं ....कहते हैं इसी वर्ग ने इन दुशासन ब्रांड की पहली खेप को हाथोहाथ खरीद लिया ....भारतीय पहनावों और खासकर साड़ी के धंधे में भारतीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से मुकाबला आसान नहीं है ...यहाँ तक कि चीन ,ब्राज़ील और रूस के उपभोक्ता तक पश्चिमी फैशन डिजाईनरों /हाउसों के नए नए उत्पादों -फैशन पहनावों   को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं मगर भारतीय जनता इन्हें घास नहीं डालती -क्योकि आज भी यहाँ पारम्परिक परिधानों का ज्यादा बोलबाला है -देशी पसंद है .ऐसे परिवेश में हेर्मेस का यह साड़ी -उद्यम एक बड़े साहस का ही काम लगता है ...जो भी हो अभी तो इन 'दुशासनी'  साड़ियों की पहली खेप यहाँ बीते अक्टूबर में उतारी जा चुकी है और दावे हैं कि सभी की सभी बिक भी चुकी हैं ....
भारतीय नारी अपने पारम्परिक छवि में 
(फोटो पत्नी की पसंद है) 

फ्रेंच साड़ियों की इस खबर पर मेरी नज़र एक बनारसी होने के कारण भी पड़ी -अब बनारस की साड़ियों  की एक अपनी अलग क्रेज है और अपुष्ट आकड़ों पर अगर कुछ भी भरोसा किया जाय तो यहाँ बनारसी साड़ियों का सालाना कारोबार करोड़ से अरब तक जा पहुंचता है -जबकि धंधे के मंदी की बात हर साड़ी दुकानदार और व्यवसाय से जुड़े लोगों की जुबान पर रहता है ...बनारसी साड़ियों की मांग व्याह शादी के अवसरों पर कई गुना बढ़ जाती है क्योकि फैशन से दीगर इनका अपना एक सांस्कृतिक महत्व भी है ....बरात में वधू से लेकर आधी दुनिया की पूरी नुमायन्दगी जब इन लक दक बनारसी साड़ियों में सज धज के होती है तो लगता है इन्द्रपुरी ही धरा पर उतर आयी हो ...और यह शुभ -सगुन की प्रतीक तो है ही ....नारी मन इन साड़ियों के साथ ही कल्पना /फंतासी के कितने ही ताने बाने बुनती रहती है .अभी अभी देखी फिल्म द डर्टी पिक्चर के आख़िरी दृश्य में  बिस्तर पर लाल रेशमी साड़ी में आत्महत्या -मृत  हीरोईन का शरीर अरमानों की मौत का दर्शक के लिए न भूल पाने वाले  दर्दनाक मंजर को उभारता है.....

भारतीय साड़ी नारी के अरमानों और फंतासियों से जुडी है ...और भारतीय सौन्दर्य भी इस परिधान में सौन्दर्य का जो प्रगटन पाता है वह एक आम  भारतीय के लिए किसी विदेशी परिधान में मूर्त नहीं हो पाता ....वैसे उदात्त सौन्दर्य  परिधान का मुहताज हो भी क्यों यह रसिक जनों का एक अलग  विषय है ....बात  साड़ी की हो रही है तो यह भारतीय नारी परिधानों में निश्चय ही बेजोड़ है....तभी तो जब हेंडा सेल्मेरान वाराणसी आयीं तो यहाँ के साड़ी आवेष्टित नारी सौन्दर्य पर ऐसी फ़िदा हुईं कि खुद साड़ी पहनने का जिद कर बैठीं ....उनकी तमन्ना हमने शौक से पूरी कराई और उन्हें साड़ी का उपहार भी दिया ....

आप भी  जब कभी  बनारस  आयें हम अपनी बेगम से आपको साड़ी खरीद में मदद की सिफारिश कर देगें ...अब तो वे कुछ भन्नाती हैं मगर यहाँ आने वाले परिजन पर्यटकों के लिए यह समाज सेवा वे खुशी खुशी करती थीं यद्यपि सेवा शुल्क मुझे चुकाना पड़ता था हर बार  उनके खुद के किसी साड़ी के बिल को अदा करने के रूप में -उनके सामने तो मैं खुद को कितना  वस्त्र निर्धन समझता हूँ जब भी उनका साड़ी वार्डरोब मेरे सामने खुलता है तो आँखे भी चुधियाती हैं और दिल अपनी वस्त्र -निर्धनता की स्थति पर धक से कर जाता है -हम तो मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तौर पर उनके वस्त्र भण्डार की बराबरी कई जन्मों तक भी न कर पायें ..ओह यह विषय विचलन .....हाँ तो यहाँ १००-१५० रूपये की साड़ी से साठ पैसठ हजार की साड़ियाँ मैंने खुद शो रूमों में सामने पसरते देखी हैं ..शादी सगुन पर हजार बारह सौ और एकाध बार दस हजार तक की खरीदनी पड़ी है ..मगर यहाँ साड़ी का असली दाम किसी को  भी शायद पता नहीं होता .गोदौलिया के साड़ी के अपरम्पार दुकानों में मोलभाव की आवाजें गूंजती रहती है -मगर समय और अनुभव के साथ हमने ऐसी दुकानों का चयन कर लिया है जहां मोलभाव बिलकुल नहीं है ...और इस तरह ज्यादा ठगे जाने का अहसास भी नहीं होता ....

बनारस के साड़ी प्रतिष्ठानों में अभी भी दुशासन ब्रैण्ड साड़ियों का इंतज़ार है . 


बुधवार, 14 दिसंबर 2011

एक काफी कथा......

अभी उसी दिन इस फिलम को देखने अपने एक हैण्ड इन ग्लव  मित्र एम एल गुप्ता जी के साथ जब टिकट विंडों पर पहुंचा तो सारी व्यग्रता धरी रह गयी ..कारण फिल्म साढ़े बारह के बजाय  डेढ़ बजे शुरू होनी थी ..पहले से हमें मालूम  समय बदल चुका था ....पूरा एक घंटा व्यग्रता के साथ काटना पहाड़ सरीखा लगा तो मैंने मित्रवर को काफी पीने का आमंत्रण दिया और जे एच वी मॉल के आधार तल पर अभी हाल ही में खुले कैफे काफी डे   तक हम जा पहुंचे ..यहाँ पूर्णतः सेल्फ सर्विस है ....हमने मीनू मंगवाया और मित्र से अपनी रूचि के मुताबिक़ आर्डर देने का अनुरोध किया ..उन्होंने  कहा बस एस्प्रेसो काफी पीते हैं ....मीनू /मेन्यू  कार्ड  में एस्प्रेसो काफी के साथ दिए चित्र में काफी फोम -झाग का दृश्य आमंत्रण भरा था .... मुझे याद है आर्डर  लेते समय काउंटर ब्वाय ने कुछ जिरह करने की भी हिमाकत की थी जिसे हमने कैफे काफी डे की सौजन्यता में एक माईनस प्वायंट के रूप में देखा था ....हमने एक न सुनी और निश्चयात्मक आवाज में जो आर्डर दिया गया है उसी को सर्व करने को कहा ...काश हमने उसकी बात  ध्यान से सुन ली होती ...मगर इसके बजाय  इन नए नए खुल रहे प्रतिष्ठानों  में प्रोफेसनलिज्म की कमी क्यों है इस मुद्दे पर हम बौद्धिक मंत्रणा करने लगे और इसी बीच काफी सर्व हो गयी ..कप में काफी की अत्यल्प मात्रा देख हम भौचक से रह गए .. लगभग ८० एम एल के काफी के मिनिएचर मगों में बस २५ एम एल काफी? एम एल गुप्ता मेरे मित्र भड़क उठे ....  बस इत्ती सी काफी और पूरा खाली पड़ा कप ... जैसे किसी कुएं में हम झुक कर देख रहे हों  की पानी कितना नीचे है :)  इत्ती तो लोग चाय के कपों में नफासत से छोड़ देते हैं ..और इतनी हमें सर्व हो रही थी ...यह हमारी तौहीन सी लग रही थी हमें! ..


यह क्या मजाक है मित्र बिफर पड़े ..कम से कम पूरे कप को भर कर काफी देनी थी ....कहीं इस तरह से खाली कप भी सर्व किया जाता है? यह तो अशिष्टता है मित्र ने कहा और मेरा भी उनसे इत्तिफाक था कि पांच सितारा होटेलों तक में इस तरह से तो काफी सर्व नहीं होती -क्या  कैफे काफी डे की  यह कोई नयी काफी संस्कृति  विकसित हुयी थी? ..मित्र कह रहें थे कि काफी की एस्प्रेसो मशीन पर भी झागदार काफी पीने को मिलती है और यह थी बिलकुल काली काफी और फिर हल्का सा सिप करके बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा ओहो यह तो बड़ी कडवी भी है ..हम तो न पी पायेगें उन्होंने काउंटर की ओर देखकर  किसी को आने का इशारा किया ..
काफी में पानी मिलाकर सिप करते करते मुझे अचानक   याद आयी की यह फोटो ले लूं ताकि बता सकूं  इत्ती सी ही काफी सर्व हुयी थी हमें ! 

मैं हालात को समझने और उस पर नियंत्रण का प्रयास कर रहा था ..कहीं कोई शिष्टाचार से जुडी सामाजिक असहजता (faux pas)  न उत्पन्न हो जाय ..एकाध अगल बगल बैठे लोग कनखियों से अब देखने लगे थे....बहरहाल उत्पन्न संवादहीनता को भांप काउंटर से एक जिम्मेदार कैफे काफी डे बंदा आया और पूरी विनम्रता से अपनी बात समझाने लगा ..उसकी बात का लुब्बे लुआब यह कि एस्प्रेसो काफी ऐसी ही नीट/ सान्द्र होती है ..इसमें दूध नहीं मिलाया  जाता ..मगर वह मेरे मित्र की इस बात का वह माकूल जवाब नहीं दे पा रहा था कि फिर  मीनू में एस्प्रेस्सो काफी के कप का काफी से भरे झागदार चित्र क्या  कस्टमर को बरगलाने  के लिए हैं  ....बहरहाल मैंने हस्तक्षेप किया और कहा कि थोडा गरम पानी लाओ ...अब इतना सीन क्रियेट हो जाने पर उसके पास भी कोई चारा नहीं था ..

काफी कैफे डे के एक कोने को सुशोभित करते मेरे मित्र 
कुछ पलों में छोटे छोटे से क्यूट से सर्विंग कपों में गरम पानी आ गया ..हमने उसे काफी में मिलाया ..मेरे मित्र ने चीनी का एक और शैसे  मंगाया ,मिलाया और किसी तरह रह रह कर काफी को हलक के नीचे उतार पाए ...और फिर कभी काफी कैफे डे की और रुख न करने की कसम खायी....यह एक संवादहीनता थी जो सी सी डे और उपभोक्ता /कस्टमर की बीच हुयी थी ... मगर इसका जिम्मेदार कौन था? ...क्या  विज्ञापन संस्कृति या हमारी अज्ञानता? मुझे लगता है दोनों!मगर आज के उपभोक्ता जागरूकता  के महौल में यह सी सी डे सरीखे नए नए उभर रहे प्रतिष्ठानों की भी जिम्मेदारी बनती है कि उनका कस्टमर ठगा सा न महसूस करे ..क्योकि इसमें तो नुक्सान उनका ही है ....

हमने वापस आकर काफी साहित्य पर  काफी शोध संधान किया जिसका एक विस्तृत व्योरा आप यहाँ देख सकते हैं मगर फिलवक्त इतना कह दूं कि एस्प्रेसो काफी वह नहीं है जैसा कि अक्सर जनता, हम और आप समझते हैं -यह दूध वाली झागदार /फेनवाली काफी तो बिलकुल नहीं है ....यह काफी के बारीक दानों में से बड़े दबाव पर उबलते पानी को गुजार कर बस कुछ औंस सर्व कर दी जाने वाली काफी कंसंट्रेट है ...और इसका    काफी कल्चर के दीवाने ही लुत्फ़ उठाते हैं ...हमारी सरीखी जनता जब सी सी डे सरीखे उपक्रम में जाय तो उसे एस्प्रेसो के बजाय कैप्यूचिनो या कैफे मोचा या फिर एस्प्रेस्सो मैकियाटो का आर्डर देना चाहिए जिनमें  दूध मिला होता है और वे इतनी कड़वी नहीं होतीं या फिर ब्लैक काफी का आनंद  उठा सकते हैं ....मगर भूलकर यहाँ एस्प्रेसो का आर्डर न दें या आर्डर देने के पहले खूब दरियाफ्त कर लें ....जिससे आप ठगा हुआ सा महसूस न करें .....

काश यह पोस्ट लहरे फेम की पूजा उपाध्याय जी पढ़तीं जो जैसा कि इसी काफी काण्ड के समापन/अध्ययन  पर ज्ञात हुआ  वे सी सी डे में ही बंगलूरु में सीनियर ईक्झेक्यूटिव हैं..क्या बात है :)....  तो ब्लॉगर उपभोक्ताओं की बात उन तक पहुँचती और हमारा भी ज्ञानार्जन,मार्गदर्शन  होता .....

बहरहाल शो  का वक्त  हो गया था और  हम ऊपरी  मंजिल की ओर बढ़ चले थे.....

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

आखिर कितनी गंदी है यह 'गंदी फिल्म"?

द डर्टी फिल्म* * * * 

आप परिवार वाले हैं तो ऐसी फिल्म देखने के लिए जिगरा चाहिए....वैसे कोई जिगरा वाला भी पूरे परिवार के साथ  इस फिल्म को नहीं देख सकता ...उम्र की अधेड़ता को उघाड़ता पहला ही हाट बेड सीन बहुत आपत्तिजनक है ..कहाँ आकर फंस गए ..यही कोफ़्त हुई..मगर इस नकारात्मक सीन का एक  अलग एंगल  था जैसे  वह गौण सा हो और अभी बहुत कुछ दिखना सुनाना बाकी हो ...और यही सच भी था... अभी तो पूरी फिल्म बाकी थी ..पूरी बात अभी बाकी थी ....

मैं कहानी नहीं सुनाने जा रहा हूँ -बस एक छोर पकड़ा दूं ...एक अति साधारण परिवेश की लेकिन महत्वाकांक्षी लडकी की कहानी है जिसका आदर्श वाक्य यही है कि अहम फैसलों के लिए जिन्दगी दुबारा नहीं मिलती ..वह अपने शरीर को ही अपनी सबसे बड़ी पूजी मानकर खुद को पुरुषों के वर्चस्व और दोहरे मानदंडों वाली चकाचौध की व्यावसायिक दुनिया को समर्पित कर देती है ....और सफलता की सीढियां चढ़ती जाती है ....उसे यह मुगालता रहता है कि वह  लोगों को जो वे चाहते हैं देकर अपना मुकाम पा लेगी ...मगर विडंबना यह कि शोषण तो खुद उसी का होता है...और अंत में उसके पास केवल गंदी (पोर्न ) फिल्मों का विकल्प बचा रहता है -दैहिक भूख का बाज़ार ही ऐसा है जहाँ  मनुष्य की मनुष्यता  उससे छीन ली जाती है,  उसकी चेतना को कुंद करती  है, खुद को  खुद से अलग कर देती  है ..मैरिलिन मोनरो के साथ यही हुआ,दक्षिण की उस अभिनेत्री सिल्क  के साथ भी यही हुआ (जिस पर इस फिल्म को आधारित कहा जा रहा है ) ..... इस फिल्म की हीरोइन के किरदार ने  अंत में जब आत्महत्या कर ली  तो  यह एक दुखान्त और मार्मिक फिल्म बन जाती है ..मन संजीदा हो उठता है ....सारा गंदापन, सारी काम लोलुपता ,कामोद्दीपकता की चाह काफूर हो उठती है ...बल्कि एक क्षोभ सा भाव  ,एक कसक सी तारी हो उठती है सारे तन मन पर,पूरे वजूद पर  ......

फिल्म के कितने ही दृश्य गंदे या आपत्तिजनक भले हैं   मगर वे फिल्म का मुख्य प्रतिपाद्य /सबब नहीं बने हैं जो निर्देशक की कुशलता को बयां करते हैं ..सच कहूं तो यह निर्देशक की फिल्म है जिसने फिल्म के कंटेंट और अभिनेताओं के अभिनय को पटरी से उतरने नहीं दिया  ..हाँ इंटरवल के बाद कहीं कहीं कुछ दृश्य उबाऊ से हैं मगर यह फिल्म  का उत्तरार्ध ही है जो फिल्म के मूल मकसद को सामने ला पाने में पूरी तरह सफल साबित होता  है. फिल्म का संदेश बिलकुल लाउड एंड क्लीयर है -प्रेम जैसी उदात्त भावना सर्वोपरि है  ... देह का उत्सव मन के राग के आगे फीका है ....मानवीयता के इसी  शाश्वत पहलू की पुरजोर  प्रस्तावना और पुनरूस्थापना  करती दिखती है फिल्म और इसलिए चिर स्थाई  छाप छोड़ जाने में सफल होती है .....देह का आकर्षण ,वासना की भूख, प्रेम की एक महीन अनुभूति के आगे कितनी बौनी पड़ जाती है फिल्म ने इस पहलू को बहुत ही भावभीने और कलात्मक ढंग से उभारा है ....
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फिल्म के संवाद द्विअर्थी भले हैं मगर उनकी मार सटीक है...चुटीले हैं और दर्शकों के मुंह से वाह की आवाज बरबस निकलती है या फिर ठहाके गूंजते हैं ....विद्या बालन ने फिल्म में जान लगा दी है ....शायद उन्हें इसी फिल्म का एक डायलाग शिद्दत से याद रहा हो कि अभिनेता को धनाढ्य बनने में कई फिल्मों का योगदान होता है मगर भिखारी बनाने के लिए बस एक ही फिल्म काफी है ....इस नग्न सत्य के बाद भी परिणीता की इस गरिमायुक्त अभिनेत्री ने ऐसा चुनौती भरा रोल और वह भी पूरी ठसक के साथ किया है -यह सचमुच प्रशंसनीय है ..मैं विद्या बालन `का फैन नहीं रहा मगर उनके अभिनय का लोहा मान गया हूँ .......

फिल्म के इंटरवल तक इसे दो या ढाई स्टार देने को सोच रहा था मगर फिल्म के आधे उत्तरार्ध के बाद यह तीन में आ गयी और तेरे वास्ते मेरा इश्क सूफियाना के फिल्मांकन के साथ ही यह फिल्म चार स्टार तक जा पहुंची ..पांचवा स्टार पाने से यह फिल्म कुछ बेहद गलीज नागवार दृश्यों के चलते रह गयी जिनके बिना भी यह एक सफल व्यावसायिक फिल्म बनी रहती .....मगर फिल्म निर्माता कुछ ऐसे दर्शकों का मोह नहीं छोड़ पाए .......कुछ भी हों, फ़िल्में पैसा बनाने/कमाने  के लिए  बनायी जाती हैं केवल आदर्श ही बघारने को नहीं -फिल्म में  इस विवाद को भी लिया गया है.  मगर इस आड़ में ही आपत्तिजनक दृश्यों को परोसने की चलाकी भी दिखाई गयी  हैं ....फिल्मों में गलीज और गंदे दृश्य हो या न हों इसी विवाद को एक पात्र इमरान हाशिमी ,जो फिल्म में एक आदर्शवादी निर्देशक की भूमिका में है और फिल्म की अभिनेत्री के जरिये दिखाया गया है ...और फिल्म का यही निर्देशक फिल्म को फ्लैशबैक में सुनाता रहता है ......यह निर्देशक लगभग पूरे फिल्म में अभिनेत्री से घृणा करता है मगर आख़िरी दृश्यों में उसकी सारी घृणा प्रेम की उदात्तता से भर उठती है ..मगर तब तक अभिनेत्री सिल्क साड़ी के पारंपरिक परिधान में एक  गरिमाभरी  मौत (आत्महत्या) को अंगीकार कर उठी होती है ..कुछ अतृप्त इच्छाओं का यह सांकेतिक प्रगटन था ......आखिरी सीन में यही निर्देशक और अभिनेत्री की माँ उसकी चिता को अग्नि का स्पर्श देते दीखते हैं ..फिल्म हमारे  संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के जयघोष के साथ समाप्त होती है ......सिफारिश ही सिफारिश है ..मगर फिर आगाह करना है -यह पारिवारिक फिल्म नहीं है ....

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

वी आई पी ब्लागों का बी पी आई(ब्लॉग पापुलरिटी इंडेक्स यानि चिठ्ठा लोकप्रियता सूचकांक )

 आप सोच रहें होंगे कि कहीं मेरा माथा तो सनक नहीं गया है अलाय बलाय लिख मारा है ..आप सच सोच रहे हैं ...मगर पहले बी पी आई के बारे में बता दूं ...बी पी आई बोले तो ब्लॉग पापुलैरिटी इंडेक्स ...अब इसकी कौन जरुरत आन पडी? हुआ दरअसल यह कि विज्ञान पर लिखने वाले अपने दर्शन लाल जी मेरे साथ एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मलेन में  पर्चा पढने के लिए आमंत्रित हुए हैं मगर पर्चा मूल्यांकन कमेटी ने पर्चे का सारांश स्वीकार करने के बाद भी यह नुक्स निकाल दिया कि पेपर में कोई सांख्यिकीय मूल्यांकन नहीं है....पेपर विज्ञान के ब्लागों द्वारा वैज्ञानिक मनोवृत्ति के संचार पर आधारित है ....वैज्ञानिक शोध पत्रों में सांख्यिकीय गणनाएं और तदनुसार निष्कर्ष एक तरह से अनिवार्य होने प्रचलन है ....अब हम मुसीबत में थे....तीस नवम्बर तक पूरा पर्चा भेजना था ...अब कौन सी सांख्यिकी भिड़ाई जाय ....मुझे  गणित और सांख्यिकी कभी भी पल्ले नहीं पडी और उन लोगों को पूज्य समझता हूँ जिनकी इस विधा में अच्छी गति रहती है .....सवाल यह था  कैसे यह मान लें कि अमुक ब्लॉग फला ब्लॉग से ज्यादा पापुलर है ....मतलब अगर हम सीधे सीधे यह कहें कि समीर लाल जी ,ज्ञानदत्त जी से ज्यादा पापुलर हैं तो वे कहेंगें कि हम ऐसे ही थोड़े ही मान लेगें -आपके इस निष्कर्ष का आधार क्या है ..हम लाख कहें कि हिन्दी का सारा ब्लॉग जगत यही बात डंके की चोट पर कह रहा है तो पर्चा कमेटी कहती है माई फुट ..हमें तो इस बात का सांख्यिकीय आधार चाहिए.

 ...लो कर लो बात, जो बात जग ज़ाहिर है अब उसके लिए भी सांख्यिकीय प्रमाण?  ..सूरज पूर्व में उगता है भला इसके लिए भी सांख्यिकीय प्रमाण चाहिए ... ? मगर वे तो ऐसे ही सनकी हैं ..बात जब बहस पर जा पहुंची तो पर्चा कमेटी ने आख़िरी हथियार उठा लिया -कोई सांख्यिकीय आधार दीजिये वरना ये पर्चा हम अस्वीकृत कर देगें ..मरता क्या न करता ..अब हमें तो यह हुनर आता नहीं मैंने अनुज गिरिजेश भैया को एस ओ एस किया मगर उन्होंने भी टका सा जवाब दे दिया,  कहा अभिषेक ओझा जी की शरण में जाईये वही कल्याण करेगें ..अभिषेक जी भी अपुन के पुराने पहचानी हैं ,उनसे मदद की गुहार करते तो वे मदद करते भी मुला वक्त निहायत कम था ....अब क्या हो? दर्शन जी ने कहा ई सब लफड़ा आप ही झेलिये हम बच्चों  की पढाई में व्यस्त हैं ...
सांख्यिकी: बाप रे :)  

अपुन को तो ये विद्या कुछ आती जाती नहीं ..इसलिए मैंने एक ले मैन स्टैटिस्टिक्स का ईजाद किया और फार्मूला बनाया ....अध्ययन में लिए गए पोस्टों में से प्रत्येक के १२ पोस्ट बटे उन सभी बारहों पोस्टों पर आई कुल टिप्पणियों की संख्या गुणे सौ और परिणाम को नाम दिया ब्लॉग पापुलैरिटी इंडेक्स ....इस तरह कुल चुने गए ब्लॉगों का तुलनात्मक अध्ययन के लिए हमारे पास कुछ सांख्यिकीय संख्याएं मिल गयी थीं और हमने अपना पेपर फाईनल कर भेज दिया  और फिर से पर्चा अनुश्रवण कमेटी के निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं .जी धुकधुका रहा है कि नामालूम यह तीर तुक्का स्वीकार भी होगा या नहीं? 

अभिषेक भैया आप क्या कहते हैं तनिक फरियायिये न ....अब अपनी ही तरह के गणित में कमजोर ब्लॉगर साथियों को हम उदाहरण देने के वास्ते  समय बर्बादी का एक ठो  काम किये हैं ..हिन्दी के कुछ  नामचीन ब्लागरों को भी इसी फार्मूले पर तौल दिया है  ..यह मेरा दुस्साहस ही कहा जाएगा कि जो ब्लॉग जगत की अतुलनीय शख्सियतें हैं उन्हें भी मैंने तौलने की हिमाकत कर डाली -वे मुझे क्षमा करेगें इसलिए डरते डरते विशाल ह्रदय /हृदया ब्लागरों को केवल इस अध्ययन का  उदाहरण देने के लिए चुना है ..कोई और छुपी बात नहीं है ....वे इसे हलके फुल्के में लेगें और बाकी लोग भी यह देखेगें कि सांख्यकीय परिणाम कितने हास्यास्पद हो सकते हैं ....भला इस आधार पर ब्लागों की गुणवत्ता कैसे व्यक्त  हो सकती है? 

बहरहाल यह बताता चलूँ कि यहाँ जो परिणाम आगे दिए जा रहे हैं उनमें जिनका मान कम है वे ज्यादा पापुलर ब्लॉग हैं ....अर्थात ज्यादा मान वाले अपेक्षाकृत कम पापुलर ....अब इत्ती से बात कहने के लिए बी पी आई जैसी कवायद की क्या जरुरत है ?:) इन नामचीन हिन्दी ब्लागरों के मौजूदा वर्ष के १२ ब्लाग पोस्टें रैंडम आधार पर चुनी गयीं और आरोही क्रम में उनकी बी पी आई  (यहाँ ब्लागरों के नाम दिए जा रहे हैं जो अपने किसी एक ब्लाग के कारण प्रमुखता से जाने जाते हैं  ) यह रही  .....डॉ. मोनिका शर्मा जी  को १.१ ,समीरलाल जी उर्फ़ उड़नतश्तरी को १.३५,प्रवीण पाण्डेय जी को १.४७,  शिखा वार्ष्णेय जी को १.५, अनूप शुक्ल जी फुरसतिया  को २.८३, ज्ञानदत्त जी को ३.१२ का  बी पी आई मान मिला है ....अब इनके निहितार्थों पर चर्चा की जा सकती है ....डॉ. मोनिका शर्मा जी को लगे हाथ बधाई दे दूं ..औपचारिकता है भाई !

इस अध्ययन विधि और परिणाम पर चर्चा आमंत्रित की जाती है .... :) 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मटर की घुघुरी कैसे बनी?

इधर  दो चार दिनों से तबीयत नासाज हो जाने से घर पर ही हूँ और मन की करने की आजादी मिली हुयी है ....ब्लॉग से दीगर कुछ पठन पाठन चल रहा है और खाने पीने के आईटमों को भी खुद ट्राई किया जा रहा है ..इन दिनों यहाँ मटर की बहार है मटर की ताज़ी ताज़ी फलियाँ ठेलों और सब्जी की दुकानों में सजी हैं ....इधर मटर की खेत से तुड़ी ताजी फलियाँ छिम्मी कहलाती हैं ....मुझे मटर की घुघुरी (घुघुनी ) बहुत पसंद है -आज खुद बनायी और खाई -अपनी लिखी कविता और अपना बनाया व्यंजन आखिर किसे अच्छा नहीं लगता -सो आज की घुघुरी उदरस्थ तो हुयी ही उसकी एक फोटो फेसबुक पर भी जा पहुँची जहाँ लोगों के मुंह में पानी आता जा रहा है ..लोगों ने पूछा कि कैसे बनेगी तो मैंने वादा भी किया कि आज की पोस्ट का यही विषय रहेगा ...अपने विवेक रस्तोगी जी भी सुबह से ही इस पूर्वांचली नाश्ता विधि का इंतज़ार कर रहे हैं ..उन्हें और तरसाना ठीक नहीं है ...

मैं कोई प्रोफेशनल पाक शास्त्री तो हूँ नहीं ..अपने तरीके से बनाता हूँ और वैसे ही आपको बता भी देता हूँ -आप घर में किसी को  परेशान हैरान न करे, खुद हाथ आजमायें ....एक किलो हरी मटर की फली की इकाई रखते हैं ...कम बेसी मात्रा होने पर उसी हिसाब/अनुपात  से आप अन्य सामग्री घटा बढ़ा सकते हैं -वैसे कोई बड़ी फेहरिस्त नहीं है -एक किलो फली को छील कर दाने अलग कर लें ,एक पाव नया आलू भी लेकर छील कर उसे काट ले ...यहाँ लगे  चित्र की साईज के हिसाब से या थोडा और पतला ....कडाही में बस दो चम्मच सरसों का तेल डालकर गरमाएं और उसमें कटे हुए हरे लहसुन और हरे मिर्च का तड़का देकर मटर के दाने और कटे आलू को डाल कर बस हलके आंच में पकाएं -एक दो बार चलायें ताकि नीचे न लगने पाए ...मुश्किल से दस मिनट में तैयार ...पानी नहीं डालना है ....यह खुद में  जज्ब पानी में पकता है ...   स्वाद के मुताबिक़ नमक डालना मत भूल जाईयेगा ...हरी धनिया की कटी पत्तियों से सजावट भी कर सकते हैं ....लीजिये तैयार है गरमागरम घुघुरी ...घरवाली और बच्चों के साथ मिल बाँट कर  खाईये और आनंद उठाईये .....धर्मपत्नी को भी अपनी पाक विद्या में पारंगत होने पर इम्प्रेस कीजिये..वैसे मेरे पास एक पक्की खबर है कि  कैसे एक पूर्वी भैये ने एक खूबसूरत दिल्ली की माडर्न पंजाबन को यही घुघुरी  खिला खिला कर पटा लिया था और आज पंजाबन उसी पूर्वी भैये के बच्चों की मां है .....मगर बच्चे इस घुघुरी को तरस गए हैं ..अमरीका में बसे हैं जो बिचारे ... 
घुघरी जो मैंने बनायी 

मुझे भी जरुर बताईयेगा कि आपकी घुघुरी कैसी बनी? बल्कि टिप्पणी तब तक के लिए मुल्तवी कर सकते हैं ....आज ही शाम की खरीददारी में लाईये न हरी मटर ......

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

कौए की निजी ज़िंदगी

बात यहाँ से शुरू हई यानि  रावेन मिथ  पर कौए पर संपन्न चर्चा से....  यह एक कनाडियन विदुषी और मेरी नयी नयी बनी फेसबुक मित्र  का ब्लॉग है ...उन्हें मिथकों में जीवन्तता दिखती है और मुझे भी ....समान रुचियों वाले और समान धर्मा लोगों के बीच मेल जोल सहज ही हो जाता है ...इसी ब्लॉग पोस्ट पर काक मिथक की सर्व व्यापकता को लेकर विस्तृत जानकारी के साथ ही टिप्पणियों में कौए के बारे में चाणक्य की एक उक्ति का उल्लेख  भी हुआ है ....चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य को तमाम पशु पक्षियों से कुछ न  कुछ सीखना चाहिए और कौए से यह सीखना चाहिए कि यौन संसर्ग सबकी नजरों से  अलग थलग बिलकुल एकांत में करना चाहिए - ...और यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि कौए की  प्रणय लीलाएं और संसर्ग आम नज़रों से ओझल रहती हैं ....यह एक विचित्र पक्षी व्यवहार है .
जंगली कौआ 

खुद ग्राम्य परिवेश का होने के बावजूद मैंने आज तक कौए की इस निजी जिन्दगी का अवलोकन नहीं किया जबकि पक्षी व्यवहार में मेरी रूचि भी रही है ...कहीं इधर उधर घूमते हुए भी मेरी नज़रे बरबस ही आस पास के पेड़ों और पक्षी बसाहटों की ओर उठती रहती हैं -मुझे अक्सर लोगों की यह टोका टोकी भी सुनने को मिलती है कि मैं चलते समय नीचे क्यों नहीं देख कर चलता ..मगर यह विहगावलोकन जैसे मेरा सीखा हुआ सहज बोध सा है . गरज यह कि अपने परिवेश के पक्षी और पक्षी व्यवहार पर पैनी नज़र के बावजूद भी मैंने आज तक कौए के नितांत निजी व्यवहार को देखने में सफलता नहीं पायी है ...मगर बड़े बुजुर्गों की राय में यह मेरा सौभाग्य है ..

अब मेरा सौभाग्य क्यों? इसलिए कि लोक जीवन में 'काक -संभोग'   देखना बहुत ही अशुभ माना गया है . अंतर्जाल पर भी कुछ चित्र और वीडियो हैं मगर मैथुन का दृश्य नहीं है ....एक तो कतई काक मैथुन नहीं लगता बल्कि काक युद्ध सरीखा है ... और मैं उन्हें यहाँ लगाकर मित्रों के लिए किसी भी प्रकार का अशुभ नहीं करना चाहता क्योकि   लोक मान्यता यह भी है कि ऐसा देखना मृत्यु सूचक है ..एक बड़ा अपशकुन है,दुर्भाग्य है . 

पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि कौए खुले में मैथुन नहीं करते ...और इसलिए उनका यह जैवीय कृत्य लोगों की आँखों से प्रायः ओझल रहता है ....मगर वे ऐसा क्यों करते हैं ..उन्हें किससे लज्जा आती है?  और क्या उनका दिमाग लज्जा जैसी अनुभूतियों तक विकसित हो चुका है -ऐसे प्रश्न आज भी पक्षी विशेषज्ञों के लिए पहेली बने हुए हैं -यह खुद की मेरी जिज्ञासा रही है इसलिए इस रोचक पक्षी व्यवहार को आज आपसे साझा कर रहा हूँ ....कौए बाकी पक्षियों से बहुत बुद्धिमान हैं ..एक प्यासे कौए का घड़े से पानी निकालने के लिए उसमें कंकड़ डालते रहने की काक कथा केवल कपोल कल्पित ही नहीं लगती -क्योंकि काक व्यवहार पर नए अनुसन्धान कई ऐसे दृष्टान्तों को सामने रखते हैं जिसमें कौए ने औजारों का प्रयोग किया और उन्हें मानों यह युक्ति कि  " बिना उल्टी उंगली घी  नहीं निकलता " भी मालूम है और वे जरुरत के मुताबिक़ औजारों का आकार प्रकार चोंच और पैरों की मदद से बदल देते हैं -तारों को मोड़ कर ,गोला बनाकर खाने का समान खींच लेते हैं ....वे कुछ गिनतियाँ भी कर लेते हैं ....जैसे अमुक घर में कितने लोग रहते हैं ये वो जान जाते हैं और सभी के बाहर जाने के बाद वहां आ धमकते हैं..पक्के चोर भी होते हैं ..घर से चमकीली चीजें उठा उठा कर ये अपने घोसले को अलंकृत करते रहते हैं ...मुम्बई में एक बार एक कौए के घोसले से कई सुनहली चेन वाली घड़ियाँ बरामद हुयी थीं ....
घरेलू कौआ (दोनों चित्र विकीपीडिया ) 
लोक कथाओं के रानी के नौ लखे हार को कौए ने चुराया था -यह भी कथा बिल्कुल निर्मूल नहीं लगती  ....मतलब यह कि काक महाशय बड़े शाणा किस्म के प्राणी हैं -अपने आस पास कोई काक दम्पति देखें तो भले ही आप उनसे बेखबर रह जायं वे आपको लेकर पूरा बाखबर और खबरदार रहते हैं ... :) और तो और पक्षी विज्ञानी बताते हैं कि इनका एकनिष्ठ दाम्पत्य होता है मतलब जीवन भर एक ही जोड़ा रहता है इनका .....अब इतनी खूबियों और कुशाग्रता के बाद हो न हो इन्हें खुले में यौनाचार करने में शर्मिन्दगी आती हो, कौन जाने? आश्चर्यजनक है अभी तक इस आश्चर्यजनक काक -व्यवहार की व्याख्या पर मैंने किसी भी पक्षी विज्ञानी को कुछ लिखते पढ़ते नहीं सुना है ...आखिर वे आड़ में मैथुन क्यों करते हैं? 

कौए के व्यवहार के और भी बड़े रोचक पहलू हैं ..राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'भारत के पक्षी " (प्रकाशन विभाग ) में लिखा है कि भारत में चित्रकूट और कोडैकैनाल (दक्षिण भारत ) में कौए नहीं पाए जाते ..मुझे यह बात पता नहीं थी ..नहीं तो चित्रकूट तो कई बार जाना हुआ है ..ध्यान से देखते !....अब चित्रकूट में वे क्यों नहीं मिलते इसकी एक मिथक -कथा है . वनवास के समय सीता की सुन्दरता से व्यामोहित इंद्र के बेटे जयंत ने कौए का रूप धर उनके वक्ष स्थल पर चोंच मारी थी.  कुपित राम ने उसे शापित किया था -लोग आज भी कहते हैं इसी कारण कौए चित्रकूट में नहीं मिलते --मगर इसका वैज्ञानिक कारण क्या हो सकता है समझ में नहीं आता क्योंकि चित्रकूट तो एक वनाच्छादित क्षेत्र रहा है ....वहां से भला कौए क्यों पलायित हो गए? 

कौए की कोई छः प्रजातियाँ भारत में मिलती हैं ..सालिम अली ने हैन्डबुक में दो का ही जिक्र किया है -एक जंगली कौआ(कोर्वस मैक्रोरिन्कोस ) तथा दूसरा घरेलू कौआ( कोर्वस स्प्लेन्ड़ेंस)...पहला तो पूरा काला कलूटा किस्म वाला है दूसरा गले में एक भूरी पट्टी लिए  होता है -शायद इसी को देखकर तुलसीदास ने काग भुशुंडि नामके अमर मानस पात्र की संकल्पना की हो ... जिसके गले में कंठी माला सी पडी है ....यह काक प्रसंग अनंत है -फिर कभी अगले अध्याय की चर्चा की जायेगी ....
पुनश्च:
गिरिजेश जी ने एक काग साहचर्य का अनुपम उदाहरण फोटू यहाँ दिया है ....

रविवार, 27 नवंबर 2011

अब हमारे बीच में है शब्द की दीवार ........

बच्चन जी मेरे मेरे प्रिय कवियों में रहे हैं .आज उनका जन्मदिन है .मेरा मन भी कल से ही उझ-बुझ सा उद्विग्न है ...तो क्यों न आज उनकी यह कविता आपसे मैं साझा कर लूं -यह कहा भले ही जाता हो कि कवितायेँ बड़ी व्यक्तिपरक,व्यष्टिगत  होती हैं मगर उत्कृष्ट रचनाएं दरअसल समष्टि -जन जन की पीड़ा-मनोभावों से जा जुड़ती हैं और इस अर्थ में कालजयी बन जाती हैं -बच्चन जी की निम्न कविता कुछ इसी श्रेणी की कविता है -

क्षीण कितना शब्द का आधार! 

मौन तुम थीं ,मौन मैं था,मौन जग था, 
तुम अलग थीं और मैं तुमसे अलग था ,
जोड़-से हमको गए थे शब्द के कुछ तार 
क्षीण कितना शब्द का आधार! 

शब्दमय तुम और मैं,जग शब्द से भरपूर ,
दूर तुम हो और मैं हूँ आज तुमसे दूर 
अब हमारे बीच में है शब्द की दीवार 
क्षीण कितना शब्द का आधार! 

कौन आया और किसके पास कितना ,
मैं करूं अब शब्द पर विश्वास कितना 
कर रहे थे   जो  हमारे  बीच छल व्यापार 
क्षीण कितना शब्द का आधार! 

(हरिवंश राय बच्चन,२७ नवंबर १९०७ – १८ जनवरी २००३ 
कवि कर्म कौशल से सर्वथा विहीन मुझ जैसे व्यक्तियों का क्या हुआ होता जो अगर बच्चन सरीखे कवि न जन्मे होते, तब  अपने मन के भावों को कभी व्यक्त ही न कर पाते हम -आज ये कालजयी युग द्रष्टा कवि घोर पीड़ा ,दिशाहीनता और हताश क्षणों में  हमारी वाणी बन जाते हैं ...और अभिव्यक्ति  का सहारा  बन मानो  व्यथा को कुछ पल के लिए ही हर लेते  हैं ......शत शत नमन ......

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

तीस वर्षों बाद ननिहाल की एक अतीत यात्रा

मशहूर ब्रितानी विज्ञान फंतासी लेखक एच जी वेल्स की फंतासी -जुगत टाईम मशीन में ही नहीं वास्तविक संसार में भी स्थान परिवर्तन करके आप अतीत गमन की अनुभूति बटोर सकते हैं -अतीत विरही हो सकते हैं ..खुद को समय में पीछे गया हुआ पा सकते हैं -डेजा वू या जामिया वू जैसी झुरझुरी महसूस कर सकते हैं -ऐसा ही कल कुछ हुआ जब मैं अपने मूल जनपद के ही एक उस भौगोलिक हिस्से में पंहुचा जो मेरी ननिहाल है ...और पूरे तीस साल बाद मैं  वहां एक श्राद्ध अनुष्ठान जिसे गया का भात कहते हैं और जो पुरखों की स्मृति में किया जाता  है  में हिस्सा लेने पहुंचा ..मेरा ननिहाल जौनपुर शहर से दस किलोमीटर दक्षिण की ओर है जहां  बगल से जौनपुर -इलाहाबाद  रेलमार्ग गुजरता है -सटा हुआ रेलवे स्टेशन सल्खापुर है ....मैं बिलकुल बचपन में भी ननिहाल में नहीं रहा ...और नाना के सानिध्य सुख से ज्यादातर वंचित ही रहा यद्यपि उनका गौर वर्ण और लम्बी कद काठी  मुझे आकर्षित करती  -वे प्रायः मेरे घर पर (अपने समधियान ) ही आते रहते ...मेरे दादा जी और उनमें कहीं कुछ संवादहीनता सी थी ....और मुझे जान से भी ज्यादा प्यार करने वाले दादा जी को यह गुजारा नहीं था कि मैं ऐसे बीहड़ जगह जो तब चम्बल के बीहड़ों की सी प्रतीति कराता था जाऊं ....मगर यह कोई बात हुयी भला? ननिहाल से भी भला कोई बच्चा जहां उसकी माँ का जन्म हुआ हो पृथक किया जा सकता है ..मगर तब के अनुशासन बहुत कठोर थे -उन्हें तोड़ने की हिम्मत किसी को न थी ..मगर मैं भी तो कोई कम नहीं..बचपन से ही जड़ परम्पराओं का विद्रोही! ..जैसे ही स्नातक की शिक्षा पूरी हुयी नैतिकता और बुद्धि का आवेग उभरा ,मैं ननिहाल जाने लगा बिना माँ के साथ ही ...
 यह दृश्य दिखते ही छठी हिस ने ननिहाल पहुँचने का संकेत दे दिया
और माँ ही कहाँ मायका प्रेमी थी और हैं ,आज भी? शायद विश्व की अकेली माँ हैं मेरी जो  मायका प्रेम से सर्वथा मुक्त हैं कम से कम प्रगटतः तो अवश्य ही ....और यहीं वह धुर विरोधाभास भी है माता जी और पत्नी के व्यवहार का  -पत्नी जी धुर मायका प्रेमी हैं -मैं वास्तव में इस मामले में तटस्थ रहने की कोशिश करता हूँ - मेरा झुकाव ननिहाल की ओर ही रहता है ..ननिहाल प्रेम मेरे वन्शाणुओं (जींस) में ही है... बचपन में विवश था वहां जा नहीं सकता था ...नाना घर ही आ जाते थे -मुझसे ही मिलने आते होगें ..विजयप्रकाश मामा भी आते और खूब साईकल पर घुमाते और फिर चले जाते मगर मुझे ननिहाल जाने की  मनाही थी ...परवश मैं भला क्या करता ....इसलिए थोड़ा होशियार होते ही खुद ही ननिहाल जाने लगा  ....जौनपुर के भंडरिया स्टेशन पर अल्लसुबह पांच बजे जा इलाहबाद पसेंजर (ऐ जे ) पकड़ता और अगले १० मिनट में सल्खापुर स्टेशन से पैदल मटरगश्ती करता ननिहाल जा पहुँचता .....उन्ही दिनों मेरे एक मामा जी जो बडौदा गुजरात में रेलवे के ऊँचे पद पर थे के कान्वेंटी स्कूल के पढ़े लिखे समवयी   बेटे प्रमेश चौबे से मुलाकात हुयी जो  बज्र देहात  में भी मेरी सोहबत में सकून पाने लगे  ...और वे आगे हर छुट्टियों में मामा के साथ आने लगे और हमारी जोड़ी जमने लगी ....उनका कान्वेंटी होना और मेरा बज्र देहाती होना कभी संवादहीनता का कारण नहीं बना बल्कि यह शायद सम्बन्धों के लिए सिनेर्जिक बन गया .....आज भी .....इस बार का बुलावा भी  उन्ही की तरफ से था.....
पितरों के श्राद्ध का अनुष्ठान समापन हवन:मेरी एक मामी श्रीमती सत्यप्रकाश जी पूरे घूंघट में

मेरा विवाह हुआ तो शायद मेरे स्वजनों की आशा जगी थी कि मेरी ननिहाल की उत्कट उन्मुखता कम होगी -मगर मैं  अपने सर्वप्रिय कवि संत तुलसी की इस बात -'ससुरार पियार भई जबसे रिपु रूप कुटुंब भये तबसे' के भी विपरीत हो रहा और ननिहाल प्रेम बना रहा ....हाँ  नौकरी में आने के बाद तो ननिहाल स्वप्न सा हो गया ....लेकिन जब प्रमेश ने यह बताया कि वे सपरिवार एक  अनुष्ठान में हिस्सा लेने गाँव पधार रहे हैं तो मेरा फिर से वही सुषुप्त ननिहाल प्रेम उमड़ पडा ..माता जी से फोन पर बात हुयी... वे सहज ही अनुत्सुक लगीं मगर मैं गाँव गया और उन्हें लेकर ननिहाल पहुंचा ...रास्ता भूलते भटकते ....लेकिन जैसे ही बीहड़ जिसे यहाँ की बोलचाल की भाषा में नार खोर कहते हैं दिखा मेरी छठी हिस सजग हो गयी -माता जी से बोल पडा ..देखिये हम आ पहुंचे -और सामने ही तो घर दिखा मगर वो पुराना मकान  नहीं, नए नए निर्माण ..मामा लोग जो रिटायर होकर आ गए हैं उनके ....एक मामा तो लखनऊ में हैं शिक्षा विभाग से रिटायर हुए हैं प्यारे मोहन जी -कितना आग्रह किया है कि मैं लखनऊ आऊँ ..माता जी के बिना कहे मैंने अनुष्ठान में ५०० रुपये का निमंत्रण दिया तो उन्होंने मुझे १०००/ रूपये वापस किया -बड़ी धरहरिया (आर्गूमेंट ) होने लगी मगर वे अडिग रहे की घर की बेटी के न्योता की वापसी का यही रिवाज है ...वाह रे भारतीय सामाजिकता कितने ही प्रवंचनो के बावजूद भी रीति रिवाज निभाये जा रहे हैं ..प्रमेश कोटा में फाईबर केबल बिछाने वाली और भारतीय रेलवे के  एक उपक्रम में बड़े अफसर हैं दोनों बेटों को लेकर आये थे..मेरे दूसरे मामा रजनीश बडौदा से आये थे .....माता जी को मिली बडौदा की कीमती साड़ी पर उनकी दोनों बहुओं की आह निकल गयी -माँ का मायका /नैहर आज भी देनदारी में नंबर वन पर है -हंसी ठिठोली  हुई:) 
 एक मामा प्यारेमोहन जी और उनके बाएं प्रमेश तथा अन्य कुटुम्बजन  हविदान करते हुए
सब अपनी जड़ों की देख भाल के लिए वापस लौट रहे हैं और मेरे ननिहाल की रौनक फिर बढ़ने लगी है .....पूर्वजों के श्राद्ध को सब मामा और उनके पुत्रों ने मिलकर किया है ..उसी के क्रम में गया के भात का बड़ा अनुष्ठान था जिसमें नात रिश्तेदारों को निमंत्रित किया गया था....यह एक नेक काम था इसलिए यहाँ भागीदारी मैं अपना सौभाग्य समझ रहा था ....अतीत की कितनी ही स्मृतियाँ उमड़ घुमड़ आयी हैं मगर यहाँ व्यक्त कर पाना दूभर हो रहा है ....कभी रेखा श्रीवास्तव जी ने मुझसे गर्मियों की छुट्टियों पर  संस्मरण मांगे थे ....मैं वही लिंक देना चाहता हूँ ....अतीत गमन से वापस वर्तमान में आ चुका हूँ ....

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

सनी लियोन के बहाने बदलती भारतीय यौनिकता पर एक बहस(A)..

नोटिस:यह पोस्ट शुचितावादी नैतिकता  आग्रही बन्धु बांधवियों को आपत्तिजनक लग सकती है!अतः वे इसे अपनी जोखिम पर पढ़ें!  लिंक भी आपत्तिजनक हो सकते हैं!पारिवारिक परिवेश में कृपया उद्धृत लिंक को न खोलें! 


 बिग बॉस सीजन पांच की गिरती टी आर पी को संभालने के लिए आयोजकों /निर्माताओं को  कैलिफोर्निया की हार्ड कोर पोर्न स्टार  सनी लियोन को आमंत्रित करने का  फैसला करना पडा है जिसके अपने स्पष्ट निहितार्थ हैं. मजे की बात यह है  कि बिग बॉस के घर में बचे सदस्यों को सनी लियोन के बारे में  पता ही  नहीं है कि वे एक पोर्न स्टार हैं और एक तरह से निर्माताओं ने घर के सदस्यों से  छल किया है ....बिग बॉस में पहले पामेला एंडरसन आ चुकी हैं मगर उनका पोर्न स्टार जैसा  कोई खुला स्टेटस नहीं रहा है हालांकि उनके भी कई अश्लील अवैधानिक चित्र/वीडिओ  अंतर्जाल पर मौजूद हैं ...एक आम  संवेदनशील भारतीय दर्शक को पामेला की 'सुन्दरता ' वीभत्स लग सकती है जबकि लियोन  खूबसूरत हैं और सौन्दर्य के भारतीय प्रतिमानों के अनुकूल भी ..आपके दर्शन सुख के लिए उनका एक सात्विक चित्र नीचे लगा रहा हूँ .. उनकी  आफिसियल वेबसाईट पर भी कहीं कोई दुराव छुपाव नहीं है सब बातें पारदर्शी है बिंदास हैं, खुल्लमखुल्ला हैं ....वे दर्शकों को एक पूर्वावलोकन का आमंत्रण देकर कहती हैं कि अगर आपको और ज्यादा देखना हो तो फिर मेरी वेबसाईट पर पंजीकृत होईये मगर वहां प्रतिदिन के हिसाब से डालरों में भुगतान की व्यवस्था है ...जाहिर है यह सब  सौन्दर्य को, यौन क्रीडा प्रदर्शनों  को भी भरपूर भुना लेने की व्यावसायिक मानसिकता लिए है  ....यौनिकता के व्यवसाय का यह खुला खेल /दुष्चक्र /धंधा  पश्चिम के लिए कोई नया नहीं है मगर भारतीय संदर्भ में स्वच्छन्द यौनिकता का यह आह्वान गले नहीं उतरता ....बिग बॉस के निर्माता /निर्माताओं की यह जुगत उन पर भारी पड़ने वाली है ऐसा मुझे लगता है -दोष सनी लियोन का नहीं है क्योकि वहां तो कोई दुराव छुपाव है ही नहीं, सब कुछ शीशे सा साफ़ है ...मगर बिग बॉस के लोगों की नीयत में स्पष्ट खोट है जिनका साध्य और साधन सब कुछ गन्दी मानसिकता लिए लग रहा है ....

बिग बॉस के घर में घुसते ही वहां पहले से ही मौजूद सदस्य पूजा बेदी ने सहज ही लियोन से पूछ लिया कि उनका प्रोफेसन क्या है तो असमंजस से  लियोन  ने कहा माडलिंग /टी वी शोज ... यहाँ घर के सदस्यों को   यह पता नहीं कि उनका साहचर्य अब किसके साथ है ....यह तो सरासर छल है, आपत्तिजनक है ..गैर कानूनी भले न हो मानवीय संचेतना के विरुद्ध है और इसलिए अनैतिक है ....उन्हें कैसा लगेगा जब यह पता लगेगा कि वे अपने सरीखे  कोई   नए मेहमान नहीं बल्कि एक हार्ड कोर पोर्न  स्टार के साथ समय बिताये हैं? तब क्या  वे खुद को छला हुआ महसूस नहीं करेगें? या फिर वे भी कुछ वैसी ही शख्सियतें रखते हैं?

हाँ दर्शकों को अब लियोन के बारे में सब कुछ पता है -थैंक्स टू मीडिया और अंतर्जाल! उनके भारत आगमन पर मीडिया और नेटवर्क साईटों में सुगबुगाहट शुरू हो गयी ...सवालों के बौछारों में लियोन वैश्या  और पोर्न स्टार के फर्क को समझाती रहीं -झल्ला कर कहा मैं वैश्या नहीं हूँ!पैसे लेकर उन्मुक्त कामक्रीड़ा की संलग्नता के बावजूद वे वैश्या नहीं हैं यह बात भारतीय आडियेंस को कैसे गले उतर सकती है ....मैंने इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए विकीपीडिया के इस पृष्ठ का अध्ययन किया जो पोर्न स्टार की परिभाषा और वैधानिक सावालों का पर्याप्त उत्तर देता है ....पश्चिम में भी खुले व्यभिचार /अश्लीलता को रोकने के कड़े कानून हैं ....और पोर्न स्टार और वैश्या के अन्तर्सम्बन्धों  को बखूबी परिभाषित किया गया है! वहां भी व्यावसायिक अश्लीलता को वैश्यावृत्ति के बराबर ही मानने के  वैधानिक दृष्टांत  हैं ...अगर यौन आमंत्रण तथा यौन क्रिया के लिए भुगतान की शर्त है तो यह वैश्यावृत्ति है और अगर यह सृजनात्मक कार्यों -फिल्म आदि में नग्न देह प्रदर्शन या  यौनक्रिया का  अभिनय प्रदर्शन है तो यह वैश्यावृत्ति नहीं है -ऐसा एक  विभेद कैलीफोर्निया  राज्य के विधायी प्रावधानों के अंतर्गत है ...मगर इन बारीक भेदों का फायदा उठा वहां अश्लीलता का व्यवसाय खूब फल फूल रहा है ....स्पष्ट है लियोन कह भले कुछ लें वे देह व्यापार में ही लिप्त हैं ...मगर न जाने क्यों वे इस बात को भारतीय मीडिया के सामने छुपा रही हैं जबकि अंतर्जाल पर सब कुछ साफ़ साफ़ दिख रहा है ...

मुझे भी  ऐसा खुला दैहिक प्रदर्शन ,वासना का खेल पसंद नहीं है ...यह एक व्यसन है एक व्यभिचार है .. ....यह खुलापन  भारतीय मन स्वीकार नहीं कर सकता ...लियोन जहाँ हैं वहीं ठीक हैं -इस तरह उन्हें भारतीय टी वी शो में लाकर दर्शकों में  परोसना एक कुत्सित मानसिकता है ..और निश्चय ही बिग बॉस का यह सीजन बुरी तरह फ्लाप होने वाला है ...क्योकि टी वी एक पारिवारिक परिवेश का अंग है और यहाँ ऐसे शो स्वीकार्य नहीं हो सकते ...जहां उन्मुक्त यौन सबंध की पक्षधर, उसकी एक ब्रैंड अम्बेसडर सामने हो और रियल्टी शो में जम कर भागीदारी कर रही हो ....मगर हाँ भारतीय संदर्भ में लियोन के पदार्पण ने यहाँ की संभ्रमित नारी नारीवादियों का जरुर पुरजोर आह्वान कर दिया है  जिसमें वे नारी उन्मुक्तता आधुनिकता और जीवन जीने, रहन सहन के अधिकार से जुड़े कई प्रश्नों का उत्तर ढूंढ सकती हैं और आश्वस्त हो सकती हैं ....

रविवार, 20 नवंबर 2011

एक अतुकांत कविता ...युगांतर की आस!

कविता लय  ताल यानि छंद बद्ध अर्थात  तुकबंदी युक्त होनी चाहिए या फिर बिना तुकबंदी के, इस पर विद्वानों के बीच निहायत साहित्यिक /अकादमिक किस्म के गंभीर वाद विवाद होते रहते हैं -कोई कहता है जब कविता लय ताल बद्ध होती है तो वह प्रकृति के ही लय ताल से जुडती है और ऐसी  उपलब्धि बहुत साधना के बाद हासिल होती है ....उनके लिए लयताल निबद्ध कविता ब्रह्म के नाद सौन्दर्य से तालमेल करती नज़र आती है और मन को निसर्ग से जोड़ने में सफल होती है ..वहीं छंद मुक्त  कविता के समर्थक तुकबंदी की कविताओं में  भावनाओं के उन्मुक्त बहाव को बाधित हुआ पाते हैं ..बहरहाल बहस जारी है और इसी की आड़ में मैं एक अतुकांत कविता आपको झेलने के लिए यहाँ पोस्ट कर देता हूँ .... :) 
युगांतर की आस
फूलों की वादियाँ 
बुलाती हैं  मुझे बार  बार 
खिंचता उनके मोहपाश में
पहुंचता हूँ जब उनके पास 
तो अचानक वे ओढ़ लेती हैं 
बर्फानी चादरें,
फूलों की घाटी तब्दील 
होती जाती है बर्फानी वादियों में
और मैं हतप्रभ  बर्फ के  ढेर को 
अपनी उँगलियों से
 कुरेदता हूँ इस चाह में कि
 नीचे दबे उन मोहक फूलों का
 दीदार हो सके 
मगर नीचे तो एक 
धधकता ज्वालामुखी सा 
आकार  लेता दीखता है 
और मैं फिर डरता हुआ 
हठात उँगलियों को खींचता 
देता हूँ खुद को दिलासा 
कि कभी तो हटेगीं 
ये बर्फानी चादरें,
नीचे दबा ज्वालामुखी
 कभी तो शांत होगा
बहारें कभी तो आयेगीं ..
और मैं ठहर जाता हूँ 
एक युगांतर की आस लिए ...
अब यह पूछने की हिम्मत या बेहयाई कैसे करूँ कि कविता कैसी है? 

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

हुई ब्लॉग की वापसी -कृतज्ञता ज्ञापन!

परसों यानि १६ नवम्बर   की बात है जब शाम को नेट पर एक बहुत जरुरी (ब्लागिंग नहीं!) काम कर रहा था और अचानक एक पाप अप खिड़की खुली और सन्देश मिला कि मेरा जी मेल अकाउंट डिसेबल कर दिया गया है ..मैंने इसे एक स्पैम माना और मेसेज डिलीट कर दिया ...काम पूरा करके जो दरअसल यहाँ के लिए एक संक्षिप्ति (सारांश )  थी ...जैसे ही  भेजना चाहा अपने अकाउंट में लागिन नहीं कर पाया और वही सन्देश फिर आया कि आपका जी मेल अकाउंट डिसेबल कर दिया गया है ...एक अनहोनी का अहसास कंपकपी सा दे गया ...तो यह समस्या वास्तविक थी .....जी हाँ सौ फीसदी वास्तविक और मेरे पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी ..मैं घबराहट के मोड में आ चुका था ....आनन फानन ब्लॉगों का हालचाल लेने गया और वहां प्रमुखता से जो सन्देश उभरा उसने मेरा रहा सहा धैर्य भी किनारे कर दिया -'आपके ब्लाग को रिमूव कर दिया गया है' सन्देश ने मेरी सिट्टी पिट्टी गुम कर दी...ब्लॉग क्या, पूरा ब्लॉगर  डैश बोर्ड ही गायब था ....मैंने इधर उधर कुछ प्रयास किये मगर मामला गंभीर होने का अहसास मुझे हो गया -कोई बड़ी अनहोनी हो चुकी थी ...

अब हम आपको क्या बताएं क्या क्या न हो गया चंद पलों में ...लगा यह संसार नश्वर है ..लगा कि आभासी दुनियाँ में से मैं चल बसा ...कहीं इस सदमे से वास्तविक दुनियाँ से भी नाता न छूट जाय इसलिए अपनी उन तमाम जीवनीय शक्तियों का आह्वान किया जो अब तक के बहुत बुरे वक्त में मेरे काम आयी हैं और अपने को संभाला ...लेकिन ऐसा जरूर आभास हो गया कि मेरी एक टेम्पररी मौत हो चुकी है और अगर अब और देर पी सी पर रहा तो बड़ी घटना घट सकती है इसलिए उसे तुरंत आफ कर दिया -इस वक्त भी उन क्षणों को याद कर सारे शरीर में एक झुरझुरी सी फ़ैल जा रही है ....मुझे सबसे बड़ी चिंता ईमेल अकाउंट की हो रही थी जिस पर कितने ही लेबल ,डाक्यूमेंट ,बुकमार्क सेव थे और मैं अब पूरी दुनियाँ से कट चुका था -मेरा पूरा प्रोफाईल गायब था ,पिछले तीन -चार सालों की मेहनत मिट्टी में मिल चुकी थी ....सभी ब्लॉग -साईंस फिक्शन इन इंडिया ,साईब्लाग और क्वचिदन्यतोपि  गायब थे....फिर दिल और दिमाग का खुद को तसल्ली देने का सिलसिला शुरू हुआ -"क्या है तुम्हारे लिए लेखन ....यह तो हाथ का मैल रहा है ...लिखा जैसे हथेली को रगड़ा और मैल को फेक दिया ..अपने लिए तो था नहीं लेखन(इदं न मम)  दूसरों के लिए था गया सो गया उसके लिए क्या सोच! आदि आदि " अब केवल समस्या मेल अकाउंट की थी जो भीषण लग रही थी ... घबराहटें गतिविधियों की एक चेन प्रतिक्रिया शुरू करा देती हैं ..मैंने उससे सायास बचने की कोशिश तो की मगर पूरी तरह सफल नहीं हुआ ..

उसी समय उम्मतें वाले  अली भाई का फोन आया तो उन्होंने बी एस पाबला जी से फ़ौरन सलाह लेने की बात की ..मैंने उन्हें फोन मिलाकर समस्या बताई तो उन्होंने पहले तो बड़ी खरी खोटी सुनायी कि उनके बार बार सलाह के बाद मैंने बैक अप क्यों नहीं लिए थे-मगर अब इन बातों का कोई फायदा नहीं था ...यह वे भी समझ गए और बात को आखिरी मुकाम पर लाते हुए मुझसे ई मेल आई डी और पासवर्ड माँगा ...वक्त की नजाकत और  पाबला जी की इंटिग्रिटी को देख मैंने उनके सलाह के  मुताबिक़ उन्हें सौप दी ....अब जो होगा देखा जाएगा की राह पर आ गया था ....एक मजे की बात है कि आकस्मिक अवसाद  के क्षणों में मुझे नींद आने लगती है -यह एक विचित्र व्यवहार है मगर मेरे लिए सदैव जीवनदाई रहा है..शायद  मेरे मस्तिष्क  ने खुद को ऐसा प्रोग्राम्ड  कर रखा है ..मैं सो गया ....पत्नी का कहना था कि उनके वैवाहिक जीवन का वह पहला मौका था जब मैंने रात का खाना नहीं  खाया था -ये मुई ब्लागिंग जो न करा दे ....उन्हें इस मौके की बेसब्री से तलाश थी कि कोई रात तो मैं उन्हें महिला श्रम से मुक्त कर दूं -और यह सुनहरा मौका उनके जीवन में आन पहुंचा था ....सुबह तीन बजे ही नींद खुल गयी ..कम्यूटर की ओर  देखने का भी मन नहीं हो रहा था ..उजड़ी दुनियाँ को भी कोई मुड़ कर देखना चाहता  है भला! बेमन बिस्तर पर पड़े करवटें बदलता रहा -गूगल की गुंडागर्दी पर कुढ़ता रहा ...मन मार कर उठा,कंप्यूटर आन कर सीधे फेसबुक पर गया ..सोचा चलो यहाँ तो अपुन का वजूद है ..अपने हादसे को वहीं लिख मारा ....सुबह मेरी प्यारी रोजाना की सुबह -सुबहे बनारस आ पहुँची थी -तय किया अब वर्डप्रेस में जाकर नया ब्लॉग बनायेगें -सुबहे बनारस .....फिर सोचा नहीं नहीं अब ब्लागिंग से बिना टंकी पर चढ़ने के आरोपण के कुछ राहत तो मिलेगी -यह सब तो छुपा हुआ वरदान -अंगरेजी में बोलें तो 'ब्लेसिंग इन डिज्गायिज ' है -इस मौके का मुझे लाभ उठाना चाहिए ...ऐसे न जाने कितने ही विचारों की रेल पूरी ताकत से दिमाग में दौड़ रही थी ....

इस बीच मित्रों के फोन आने शुरू हो गए थे ..संतोष त्रिवेदी जी इसमें आगे रहे और मास्टर ब्लास्टर ब्लॉगर प्रवीण त्रिवेदी जी ..अनुराग जी का फोन पिट्सबर्ग से आया ...गिरिजेश जी दिल्ली प्रवास  पर होने के बाद भी फोनियाये और हम लोग काफी देर तक आभासी जीवन की निस्सारता पर विचार मग्न रहे ...अनूप शुक्ल जी ने एस एम् एस भेजकर मुझे एक लिंक के सहारे मेरे ब्लागों की हूबहू आर्काईव ही सौंप दी ...कल शाम उनका भी फोन आया ....फेसबुक पर अल्पना वर्मा जी ,आराधना चतुर्वेदी जी ,रैंडम स्क्रिबलिंग वाली ज्योति मिश्र ने, अपने उन्मुक्त जी ने ,राजेन्द्र स्वर्णकार जी ,रायकृष्ण तुषार,पंकज मिश्र,  ..  और भी कई सुहृदों ने ऐसे नाजुक मौके पर मेरा हौसला बनाये रखा और कुछ और भी मित्राणियों ने नामोल्लेख न करने की रिक्वेस्ट के साथ अपने सुझाव और हौसले दिए(वे ऐसी गोपनीयता क्यों बरतती हैं :( )  ....शिव मिश्रा जी ने फेसबुक पर मेसेज भेजकर हालात का जायजा लिया .....अमरेन्द्र जी ने अनुभवों को आपसे बाँटने को प्रेरित किया ...बेटे कौस्तुभ ने अपनी बड़ी व्यस्तता के बावजूद भी बंगलौर से फोन पर जरुरी टिप्स दिए ..बेटी प्रियेषा ने दो टूक कहा कि पापा इस मौके का फायदा उठा आप व्यायाम को प्राथमिकता देकर पहले अपना मोटापा दूर कीजिये ....हाँ उसे भी मेरे ब्लाग्स के गायब होने का बड़ा मलाल था ....पत्नी ने कल शाम को बताया कि मुझे बुखार भी हो आया है ....बहरहाल अब किस्सा  कोताह यह कि मित्रों की मदद और शुभकामनाओं के चलते  २४ घंटों के भीतर मेरा मेल अकाउंट बहाल हो गया है और सुबह सुबह ब्रह्म बेला में जयकृष्ण तुषार जी ने फोन करके अति प्रिय सूचना दी की मेरे ब्लागों की वापसी हो चुकी है ....लगा जैसे जन्नत की वापसी हो गयी हो ...उनकी मिठाई ड्यू हो गयी है ..हाँ अब यह मुद्दा मेरे और सभी के लिए बहुत मौजू बना है कि अंतर्जालीय वजूद में रहने के लिए  हमारी सावधानियां और तरीके बड़े पुख्ता किस्म के होनी चाहिए .....बाकी कुछ और विवेचन टिप्पणियों में होंगे ही ...
मित्रों बहुत आभार आपका 

रविवार, 13 नवंबर 2011

आप किस बच्चे को ज्यादा प्यार करते हैं?

टाईम पत्रिका के ताजे अंक (नवम्बर १४,२०११) की आमुख कथा बच्चों के प्रति माँ-बाप के भेदभाव पर केन्द्रित है ....क्या हम अपने बच्चों में किसी को कम किसी को ज्यादा चाहते हैं? क्या इसका कोई जैवीय /जीनिक आधार भी है या फिर सामाजिकता और परिवेश ऐसे निर्णयों पर हावी हैं ? टाईम का आलेख निर्णायक  नहीं है ....बल्कि संभ्रमित अधिक करता है ....वह पशु पक्षियों पर किये अध्ययनों का सहारा लेता है -जहां श्रेष्ठ की उत्तरजीविता ज्यादा मायने रखती है और इसलिए वहां वही ज्यादा प्यार दुलार पाता है जो बलिष्ठ ,हृष्ट पुष्ट होता है और संतति संवहन में सर्वथा समर्थ लगता है -आखिर वही तो वंश परम्परा का संवाहक है! इसलिए ही पेंगुइनें छोटे और कमज़ोर अंडे को खुद पैर से ढकेल बाहर करती है और ईगल(गरुंड) पक्षी की एक प्रजाति की माँ अपने ही एक बलशाली बच्चे को अपने से कमज़ोर का चीथड़ा उड़ाते देखकर भी चुपचाप रहती है .....तो क्या मनुष्य में भी कोई ऐसी ही प्रवृत्ति अंतर्निहित  है?  क्या वह भी अपने होनहार बच्चे को ही ज्यादा मानता है? उस पूत को जिसके पाँव पालने में ही दिख जाते हैं? 



लेखक जेफरी क्लुगर ने एक अध्ययन के हवाले से कहा है कि ७० फीसदी पिताओं और ६५ फीसदी माताओं में बच्चों के प्रति ऐसे भेदभाव के प्रमाण मिले हैं हालाँकि वे ऐसी किसी बात को प्रत्यक्षतः प्रगट नहीं करते ....पिता के मामले में प्रायः उसकी सबसे छोटी बिटिया और माँ के मामले में उसका सबसे बड़ा लड़का ..यानी 'पैलौठी" -पहला बच्चा -लड़का!..पैलौठी के बच्चे को पसंद करने का एक और कारण अध्ययन में  बताया गया है जिसे   जिसे "रूल आफ संक कास्ट"(rule of sunk cost) कहा गया है और जो कारपोरेट जगत का माना जाना नियम है -जिस प्राडक्ट पर जितना अधिक धन -संसाधन लगता है उसे व्यवसाय जगत ज्यादा फलना फूलना देखना चाहता है ....सबसे बड़ा बच्चा ऐसा ही एक कैपिटल है माँ बाप के  लिए ....मगर क्या मानव सम्बन्ध ठोस व्यावसायिकता से प्रेरित हैं? 

अपने एक लंगोटिया मित्र  से बिना उनकी अनुमति के क्षमा याचना  सहित  उनके   बचपन की  एक बात यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ. उनकी माँ  ने उनसे एक बार कहा था  -" पैलौठी के बच्चे को तो जन्म लेते ही मर जाना चाहिए, जीवन भर उसे जिम्मेदारियों का बोझ और तरह तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं " कहना न होगा कितना खराब लगा था तब उन्हें यह सुनकर मगर माँ का  प्रसाद मानकर मेरे मित्र ने  यह ग्रहण किया था  ....लेकिन  क्या यह वाकई सच है? पता नहीं ये  इमोशनल बातें यहाँ उठाना भी चाहिए या नहीं मगर मेरे मन में बैठा विज्ञानी इन सबसे पूरी तरह तटस्थ है और वह तथ्यान्वेषण को ज्यादा तवज्जो देता है? ऐसे  उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें सबसे कमजोर बच्चे के प्रति माँ बाप का स्नेह (माँ का विशेष ) ज्यादा होता है और इसका आधार भावात्मक है ...इस व्यवहार का  एक नजीर पक्षी जगत में एक  पनडुब्बी (कूट ) में भी देखने को मिलता है जो बच्चों में सबसे बाद के निरीह बच्चे का ज्यादा ध्यान रखती है और उसे खाने खिलाने में ज्यादा व्यस्त रहती है ....कूट्स के सभी बच्चे एक सा ही दीखते हैं मगर सर की सबसे चटख गुलाबी कलंगी सबसे छोटे वाले को  अलग करती है ....मतलब मनुष्य में भी इन मामलों में कोई एक निश्चित व्यवहार प्रतिरूप विकास यात्रा में नहीं उभरा है बल्कि यहाँ कई प्राणियों के मिश्रित  व्यवहार ही अवतरित होते दीखते हैं ...

भारत की तो बात ही मत पूछिए यहाँ तो देश काल परिस्थितियों में लड़का लडकी को लेकर जबरदस्त बायस देखा जाता रहा  है ...घुघूती बासूती जी ने अनचाही बच्चियों के जन्म पर उनसे किये जाने वाले भेदभाव पर एक रिपोर्ट  दी है!  यहाँ बड़े पैमाने पर तो लड़कों को लड़कियों के बजाय ज्यादा तवज्जो दिया जाता रहा है ...मगर यह सहज जैवीय व्यवहार नहीं है क्योकि परिवेश और सोच के बदलाव से  ऐसी बातें कम होती जा रही हैं ....किन्तु  यहाँ अच्छे पढ़े लिखे परिवारों में  क्या बिना जेंडर भेद के भी बच्चों के बीच  ऐसा कोई पक्षपात किया जाता है? मैंने एक वाकया अपने एक अन्य मित्र से और भी सुना है जब कमासुत बच्चे (कमाने वाल बच्चा ) को ज्यादा तवज्जो दिया जाता है ...उसके खान पान में ज्यादा ध्यान दिया जाता है ..प्रेम के प्रतीक के रूप में उसे परसी गयी दाल में देशी घी की मात्रा ज्यादा डाली जाती है जबकि बगल का बेरोजगार बच्चा इस देशी -घी प्रेम से वंचित रह जाता है .....और  प्रायः पिता की ओर से  ताने भी सुनता  है -न काम का न काज का ढाई सेर आनाज का ....हमारे मिथकीय पात्रों में एक राजा पुरु हुए हैं जिन्होंने अपने पिता के कहने भर से उन्हें अपनी जवानी सौंप दी थी जबकि उनके  दूसरे बेटो ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया था ..यहाँ भी एक ख़ास लाडले  पुत्र और  पिता के सम्बन्ध का एक पहलू उभरता है ....

जो भी हो अपना तो यह मानना है कि मानव व्यवहार बहुत जटिल है और ऐसे अध्ययन अंतिम नहीं कहे जा सकते ..हाँ वे इन विषयों की ओर अकादमिक/ अन्वेषण की  रूचि जरुर जगाते हैं ..और अन्वेषण तो मनुष्य की मूलभूत चाह ही है ! 

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एक उदास शाम,देव दीपावली और पुण्य श्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज बनारस का एक लख्खी मेला देव दीपावली है ..लख्खी का मतलब जहाँ कम से कम एक लाख की भीड़ होती हो ....यहाँ पहले से कई लख्खी मेले विख्यात हैं -जैसे नाटी इमली का भरत मिलाप ,चेतगंज की नक्कटैया ,तुलसीघाट की नाग नथैया तथा सिगरा के पास की रथयात्रा जिसके नाम पर एक चौराहे का ही नामकरण हो गया है ....इन सभी अपार जनसमूह वाले मेलों में लगभग एक दशक से देव दीपावली का भी नाम आ जुड़ा है और इसे वैश्विक पर्यटन का आकर्षण दे दिया गया है -देश विदेश से पर्यटकों का एक बड़ा हुजूम आज यहाँ आ पहुँचता है ...और बनारस के गंगा घाटों पर असंख्य दीप जगमगा उठते हैं ....आतिशबाजी भी होती रहती है और अस्ताचल को बढ़ते चंद्रमा की रश्मियाँ गंगा जी में एक स्वर्ण पट्टी बिखेरती चलती हैं ....

देव दीपावली पर बनारस के बस एक घाट का नज़ारा (सौजन्य गूगल ) 

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद घाट (पारम्परिक दशाश्वमेध घाट)  पर गंगा आरती का दृश्य और पार्श्व में शिव तांडव स्त्रोत का पाठ - अद्भुत  दृश्य और अध्यात्मिक अनुभव -जीवन का एकबारगी का समग्र अनुभव देता है ....मैं स्वजनों के साथ, परिवार के साथ ,राज्य अतिथियों के साथ पिछले लगभग हर वर्ष इस मेले का आनन्द उठाता आया हूँ -इस बार न बच्चे हैं ,न घर (तेलितारा ,जौनपुर)  से कोई आया और न ही कोई मेहमान ही सो मेले में नहीं गया हूँ और बैठे ठाले विगत जीवन के कुछ सिंहावलोकन की ओर अनायास उन्मुख हो इस शाम को ही उदास कर बैठा हूँ -लोगों के बनावटी पन,चालाकी ,मित्रों के विश्वासघात,ब्रीच आफ ट्रस्ट आदि के मंजर अचानक ही याद हो आये हैं -कोई बच्चा मेला जाने से बिछुड़ गया हो तो वह ऐसी ही कई विचारों,अकेलेपन और असहायता  से गुजरता है ..बस समझ लीजिये ऐसा ही कुछ बेहद खराब सा अनुभव हो रहा है ...
देवेन्द्र  पांडे जी ने मेले से लौट कर  देर रात भेजा यह  चित्र -देखिये स्वर्ण पट्टी  


कहते हैं देव दीपावली के कई मिथकीय कारणों के साथ ही इस समारोह को महारानी अहिल्याबाई होलकर से भी जोड़कर देखा जाता है ...मैं आज से अच्छा और उचित अवसर कोई और नहीं समझता जब इस अवसर पर मैं इस महान भारतीय नारी के बारे में आपसे कुछ साझा न  करूं..महारानी लक्ष्मीबाई से यहाँ का बच्चा बच्चा परिचित है -उन पर कवियों की खूब लेखनी चली है ....फ़िल्में और सीरियल भी आयें हैं मगर आश्चर्य है कि अहिल्याबाई होलकर के बारे में ज्यादातर लोग बहुत कम जानते हैं ...विकीपीडिया के अंगरेजी और हिन्दी संस्करणों ने इस महान महिला के बारे में यहाँ और यहाँ जानकारी दी है -अंगरेजी की जानकारी प्रभूत और पर्याप्त है ..अगर आपके समय हो तो अवश्य चंद मिनट वहां दें ..कई प्रान्तों में हिन्दू मंदिरों का पुनरोद्धार इन्हीने कराया ..काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर का एक तरह से जीर्णोद्धार ही इनके द्वारा हुआ ..गया के विष्णुपाद मंदिर को भी इनकी ही कृपा से नया रूप रंग मिला ....
पुण्य श्लोक राजमाता अहिल्याबाई होलकर 

इसके बावजूद एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार काशी के लालची पंडों  ने इनके विश्वनाथ मंदिर में घुसने के समय इनके मार्ग पर हीरे जवाहरात बिछाए ताकि शूद्र के चरण से स्पर्शित हो पवित्र स्थल अपवित्र न हो जाय और बाद में मंदिर के गर्भगृह और आस पास के  प्रांगण  को  गंगा जल से धुलवाया ....तत्पश्चात महारानी ने यहाँ के पोंगा पंडितों को तब सीख दी जब वे गंगा स्नान के बाद जल धारा  से बाहर नहीं निकल रही थीं -अपनी सेना भेजकर उन्होंने उन्ही लालची पंडों को बुलाया और कहा अब तो मेरे स्नान के बाद  पूरी गंगा ही अपवित्र हो गयीं है इसे पवित्र करो तभी मैं बाहर आऊँगी ....लज्जित पंडों ने उनसे माफी मांगी ....ऐसी ही पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर ने हजारा दीपस्तम्भ से यहाँ के एक गंगा घाट -पञ्चगंगा घाट पर देव दीपावली की शुरुआत की जो आज एक वैश्विक मेला बन चुका है .
लख्खी मेले पर उमड़ा जन सैलाब (यह चित्र भी देवेन्द्र पांडे जी के सौजन्य से ) 

केवल इस मेले को ही देखकर आप बनारस आने का औचित्य साध सकते हैं और जीवन को धन्य कर सकते हैं ...मेरी बात का भरोसा कीजिये एक अनिर्वचनीय अनुभव के साथ आप वापस जायेगें ...और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपने संस्मरण छोड़ जायेगें ..इस पोस्ट को पूरी करते करते मैं अपने अवसाद से मुक्त हो रहा हूँ .....बाकी तो बेचैन आत्मा एलियास देवेन्द्र पाण्डेय जी ने आश्वस्त किया है कि इस बार  मेरे संती (हिस्से का ) भी मेला वे देखेगें और उसकी चौचक रिपोर्ट आपको  तक पहुचायेगें  ......मुझे उन्होंने फोटो उपलब्ध करने का भी वादा किया है मगर मुझे सब्र कहाँ और इस उदास शाम के गम को गलत करने का कोई और सहारा भी तो नहीं था -सो थोड़ी सृजनात्मकता का सहारा ले लिया और यह पोस्ट लिख दी है ......
शुक्रिया देवेन्द्र पाण्डेय जी आपके फोटो अवदान के लिए 
और देर रात आयी देवेन्द्र जी की यह आँखों देखी टटकी रिपोर्ट 

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

मेरे पसंदीदा शेर -सेशन 4

कई  सेशन पहले भी हो चुके हैं  ..कुछ बीते अफ़साने फिर से याद आने लगे हैं और हम भूले बिसरे चंद शेर फिर से गुनगुनाने लगे हैं ..मुलाहिजा फरमाएं ...
न जाने क्यों तेरा मिलकर बिछड़ना याद आता है 
मैं रो  पड़ता हूँ जब  गुज़रा ज़माना याद  आता  है 
नहीं  भूला  हूँ  अब  तक  तुझे  ऐ  भूलने  वाले 
बता तुझको भी क्या मेरा फ़साना याद आता है 
तेरी तस्वीर को बस देखते ही बेवफा मुझको 
मुझे वो प्यार का मौसम सुहाना याद आता है 
न कर गम मेरी बरबादियों का भूलकर इशरत 
मुझे अब भी तेरी कसमों का खाना याद आता है 
(इशरत अंसारी ) 
अब आईये एक और शेड में चलें ...
कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को 
न जाने कैसे खबर हो गयी ज़माने को 
सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे 
कहो  तो  आज  सजा  दूं  गरीबखाने  को 
दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल मिले 
कहीं  जगह  न  रही मेरे आशियाने  को 
दबाके कब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम 
ज़रा  सी  देर  में  क्या  हो  गया  ज़माने को
(मुन्नी बेगम ने गाया है किसका है पता हो तो बताएं )  
और अब यह भी ......
अशआर  मेरे  यूँ  तो  ज़माने के लिए  हैं 
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं 
आँखों में जो भर लेगें तो काँटों से चुभेगें 
ये ज़ख्म तो पलकों पे सजाने के लिए हैं 
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजें  से  लगाने  के लिए  हैं 
ये  इल्म  का  सौदा  ये रिसाले ये किताबें 
एक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं 
इस  सेशन में बस इतना ही .... शेरो सुखन के अगले सेशन में फिर मुलाकात होगी ...जाते जाते यह बात फिर कि महीन भावों की अदायगी का जो जज्बा और ताकत उर्दू जुबान में है वह शायद दुनिया की किसी भी लैंग्वेज में नहीं है .....इसलिए थोडा उर्दू की शेरो शायरी का आनन्द उठाईये और इस जीवन को तनिक तो भावनाओं से लबरेज कीजिये .....
और मेरी बहुत प्रिय गायिका मुन्नी बेगम जिनसे कभी क्रश तक हुआ था उनकी आवाज में यह भी सुन लीजिये ...

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

बच्चों को और उनकी माँ को भी जरुर दिखाईये रा.वन!

अभी अभी रा.वन देखकर लौटा हूँ और सिफारिश करता हूँ बच्चों को जरुर दिखाईये  ...यह एक विज्ञान फंतासी  है और रोबोट (एन्थिरान) के बाद लगभग उसी स्टाईल की फिल्म है ...भारत में विज्ञान कथा फिल्मों,साहित्य के साथ एक मजाक यह बना हुआ है कि यहाँ इसे  बच्चों का साहित्य मान लिया जाता है और कई फिल्म निर्माता पुस्तक प्रकाशक भी इस विधा के साथ अन्याय करते हुए इसे बच्चों के लिए बनाते और प्रचारित करते हैं ....जबकि हालीवुड में बनने वाली साईंस फिक्शन फ़िल्में अनिवार्यतः बच्चों के लिए ही नहीं होती बल्कि कामन आडियेंस /सभी के लिए होती है ..अब अवतार क्या बच्चों के लिए ही थी? मगर ताज्जुब है अपने  फिल्म निर्माताओं /निर्देशकों को कि वे अच्छी खासी थीम वाली साई फाई फिल्मों को भी बच्चा संस्करण बना देते हैं जैसा कि रा. वन को बना दिया गया है .और मैं लहरें वाली पूजा उपाध्याय के इस विचार से अब सहमत हूँ कि यह फिल्म बच्चों के लिए है ..यह सचमुच ही बच्चों के लिए काट छाट दी गयी है ....जबकि जब तक इसे नहीं देखा था इसी खुशफहमी में  था कि ऐसी कोई चिपकी इस पर नहीं लगी होगी.....मगर एक लिहाज से इन फिल्मों का बच्चों के लिए होना भी ठीक है क्योंकि यही पीढी इस तरह की  अभिरुचि के लिए संस्कारित हो और भारत में भी कभी ऐसी मौलिक फिल्मों की क्रेज बढे ....



फिल्म एक शाश्वत भारतीय  सोच "बुराई पर अच्छाई की जीत' का टेक लेती है और यद्यपि रा .वन नाम एक कम्प्यूटर प्रोग्राम का संक्षिप्ताक्षर है यह हमारे मिथकीय रावण की प्रतीति कराता  है ..फिल्म का रा.वन दरअसल रावण सरीखा एक महा खलनायक है जिसे मारना आसान नहीं है ..फिल्म की एक रोचक संकल्पना यह भी है कि कम्प्यूटर गेम अनिवार्य रूप से नायक (सुपर हीरो) प्रधान ही क्यों हों? खलनायक प्रधान क्यों नहीं? कम्प्यूटर गेम एक्सपर्ट का बेटा खलनायकों और उनकी ढिशुंग ढिशुंग का दीवाना है और अपने पापा से एक खलनायक प्रधान गेम के लिए मनुहार करता रहता है ....और पुत्र प्रेम में पड़कर पिता एक ऐसा ही गेम बड़ी तैयारी के साथ बना देता है मगर जो पात्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता लिए होता है ....बिना बिचारे जो करे सो पीछे पछताय वाली कहावत तब चरितार्थ हो जाती है जब गेम का खलनायक कृत्रिम  बुद्धि  के सहारे  खेल की आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में आ धमकता है ....और इस खेल को खेलते हुए पहले ही स्तर पर  इसे  बीच में छोड़ कर चले गए कम्प्यूटर गेम विशेषज्ञ के बेटे को प्रतीक को (खेल में ल्यूसिफर ) को खोजता फिरता है -तब मुझे रावण की याद आती रही जो अपने प्रतिद्वंद्वियों के पास जाकर ललकार ललकार के कहता है -युद्धं देहि युद्धं देहि .....ऐसा ही रा. वन है जो अधूरा खेल छोड़कर चले गए खिलाड़ी को ललकारते  हुए आभासी दुनिया से वास्तविक दुनिया में आ धमकता है ....और हश्र बहुत बुरा होता है..और सबसे पहले अपने सर्जक कम्प्यूटर गेम विशेषज्ञ को ही मार डालता है ..अरे अरे यह तो पश्चिमी सोच है ..यहाँ तो  भस्मासुर शंकर को  कहाँ  मार पाया था?  ....हाँ मेरी शेली के फ्रैन्केंनस्टीन में जरुर खेल खेल  में वजूद में आ गए दानव ने अपने ही सर्जक को सपरिवार मरने को अभिशप्त कर दिया था ..यहाँ भी कुछ ऐसा होता है और अपने सर्जक को निपटाने के बाद रा.वन उसके कम्प्यूटर खेल प्रेमी  बेटे और माँ के पीछे लग जाता है और उनके वतन (भारत ) वापसी तक उनका पीछा करता है -वह तो उसके विनाश का एक और प्रति -खलनायक (नायक ) जी वन भी उसी कम्प्यूटर विशेषज्ञ द्वारा  बनाया गया होता है जिसे उसका बेटा खोज निकालता है और अपने बुद्धिचातुर्य तथा जी वन के पावर के सहयोग से  से अंततः रा. वन का विनाश कर करता है ..फिल्म हैपी एंडिंग लिए हैं ...

हाँ यह फिल्म उन लोगों को जरुर चूं चूं का मुरब्बा लगेगी जो हालीवुड फिल्मों को देखते आये हैं -कई फिल्मों से सीन चुराए गए हैं ..यहाँ तक कि एक  मार धाड़ दृश्य में रोबोट के चिंटी खुद भी फ्रेंडली अपेयिरेंस में पधार गए हैं ....फिल्म में भारतीयता का पूरा टच  देने की सोच से देशी त्योहारों -करवा चौथ और दशहरा के रोचक सीन हैं और कम्प्यूटर गेम वाले रावन और मिथकीय रावण को एक ही फ्रेम में फिट करने की दृश्य रोचकता भी है जिससे एक तरह के काल विपर्यय (एनाक्रोनिज्म ) का प्रभाव पैदा किया गया है जो साईंस फिक्शन में एक आम  बात है ....यह फिल्म बच्चों को तो निश्चित ही पसंद आयेगी और केवल उन्हें बिलकुल नापसंद होगी जिन्हें विज्ञान कथाओं का ककहरा भी पता नहीं है ...हाँ , विज्ञानकथा फिल्मों के शौक़ीन  इसे औसत दर्जे की साई फाई फिल्म मानेगें ....

एंथिरान (रोबोट ) में  विशेष दृश्य प्रभावों को डालने वाले स्टेंन विंस्टन ने इस फिल्म में भी चमत्कारी दृश्य प्रभाव डाले हैं ...और मैंने तो थ्री डी वर्जन नहीं देखा मगर उसकी कल्पना कर सकता हूँ ...थ्री डी तो बहुत जबरदस्त होगी ....फिल्म अच्छी है ..बच्चों को  और उनकी माँ को भी जरुर दिखाईये..आप बोनस में देखिएगा और बच्चों की  किलकारी में अपने आनन्द की तलाश करियेगा!  

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