बुधवार, 21 दिसंबर 2011

क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

 ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो आज के वर्तमान में भी  वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की क्रमिकता/ऐतिहासिकता  का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमांचित  और आह्लादित होता हूँ...क्या नहीं है यहाँ -साहित्य की ज्ञात और नवोन्मेषित कितनी ही विधाएं यहाँ अपनी ओर ललचाती सी हैं ..कहानी है ,कविता है ,व्यंग है ,हास परिहास है ,संस्मरण है, आशय कि सचमुच क्या नहीं है यहाँ ..मगर यहाँ केवल लेखक बने रहने और पाठकों की प्रतीक्षा करते रहने से काम नहीं चलने वाला है ...यहाँ तो सभी लेखक हैं ...और वही पाठक भी हैं ...हाँ चेतना ,बौद्धिकता के विभिन्न स्तर जरुर हैं ..मगर खुद एक लेखक बने रहने और अपने को पढ़ाते रहने की ही प्रवृत्ति या अपेक्षा यहाँ नहीं चलने वाली ....
जैसे अपनी कविता तो कवि जी ने पकड़ पकड़ के अनेक हिकमतों  से ,प्यार मनुहार और चाय तक पिला के सुनाई  मगर जब मेरी सुननी हुई तो जनाब भाग खड़े हुए ..यहाँ यह आत्मकेंद्रिकता  की मानसिकता नहीं चलने वाली ..ऐसे कितने ही स्वनामधन्य और स्वयंभू यहाँ आये और चलते बने ...शायद वे ज्यादा ही आत्म गौरव के बोध से  त्रस्त थे-ब्लॉग जगत ने उन्हें रास्ता दिखा दिया ..रास्ता नापो भैया....बड़े साहित्यकार हो तो अपने घर के, यहाँ दाल नहीं गलने वाली ...मैं देखता हूँ कि कई ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरणों के बाद भी अभी भी कुछ लोग अपनी अहमन्यता से बाज नहीं आ रहे हैं ....वे चाहते तो हैं कि उनका ब्लॉग हाथो हाथ ले लिए जायं  ,उनकी हर पोस्ट पर पाठकों की इतनी भीड़ आ जुटे कि शीशी चटखने वाला मुहावरा चरितार्थ हो जाय  मगर कभी खुद किसी के यहाँ  नहीं तशरीफ़ रखेगें ....हम भी आखिर कब तक वहां जाने की सदाशयता दिखाते रहेगें.. विनम्रता ,औदार्य ,शालीनता की आखिर कोई सीमा भी तो है या नहीं?
अब लोगों को कौन समझाए भैया ब्लॉग लेखन एक दुतरफा संवाद का माध्यम है ,यहाँ महज अपनी ढपली अपना राग नहीं चलने वाला ....यहाँ का सरोकार है दूसरे के कहे को भी सुनना,समझना और भागीदार बनना  ..उनके  यहाँ आते जाते रहना ...फिर अपनी भी कहना ...लेकिन मगरूर लोगों को कौन समझाए ....खुद को अर्श पर होने और बाकी को फर्श पर पड़े होने की समझ से भी ब्लॉगजगत जूझता रहा है ..अच्छी बात है कि ऐसे कई सारे तो किनारे को आ गए हैं..कुछ घोषित करके विनम्रता या बेहयाई से तो कुछ   अपनी औकात और सीमाओं को समझ बिना घोषित, बिना गीत गवनई के चुपचाप चलते बने  .....मतलब बिना बताये ही टंकी पर चढ़ अपने ब्लागीय जीवन का उत्सर्ग कर लिया ....इस अर्थ में ब्लॉग लेखन केवल "बड़कवा" लेखक बने रहने की आत्ममुग्धता नहीं है ,यह एक सामजिक  सरोकार का  संवाद मंच भी है ....डायरी लिखनी है तो तोप ढक के रखिये न यहाँ काहें उघारे फिरते हैं ?  सही है ब्लागजगत में कोई फन्ने खा नहीं है ....साधारण बनने और जुड़ने की तमन्ना हो तो ठहरिये वर्ना अपना बोरिया बिस्तर अच्छा हो खुद उठा के पतली गली से निकल लीजिये नहीं तो बाद में कहीं यह न कहना सुनना पड़े ..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले ...
एक जमाना हुआ करता था हमें भी अपने एक बड़े लेखक होने का गुमान था ..बिना दमड़ी लिए लिखते न थे....एक अजब सा गुमान,बेखुदी  और मदहोशी तारी थी ....लोग अब किताबें लिखने ,छपने की चर्चा करते हैं यहाँ तो मुझे उन पर दया आती है ..भैया इस गुमान में न रहियो यहाँ ....हमने तो यह रहस्य पहले ही भांप लिया था और तभी बिना दमड़ी की अपेक्षा के यहाँ झख मार रहे हैं .. जो चीज है यहाँ वो कहीं पे नहीं ....तो यहाँ रुकने लिखने आपके विचार जानने,यथा संभव लोगों के यहाँ पहुँचते रहने की ,संवाद बनाए रखने की मेरी कोशिश ही रहती है ....बाकी कुछ रूठे हुए लोग भी है उनके प्रति भी मन में कभी कभी प्यार सा उमड़ा आता है मगर वे खुद उस उमड़ते प्यार को रोपने कटोरा लेकर नहीं आते तो वह व्यर्थ ही बह जाता है .. :) 
 हमने लेखन से बहुत कमाया है रोजी रोटी चल सकने लायक नहीं (उसके लिए एक अदद नौकरी तो है ही) ..मगर बहुत कम भी नहीं ..इस अर्थ में कि जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान..इस ब्लॉग लेखन की अपार्च्यूनिटी कास्ट बताऊँ तो आप निरा बावरा समझेगें मुझे ....इस ब्लॉग जीवन में दो पुस्तकों को लिखने की पेशगी ठुकरा चुका हूँ ..अब ब्लॉग जीवन से फुरसत तो मिले.... है न यह पागलपन? मगर मुझे तो जो ब्रह्मानंद की प्राप्ति यहाँ होती है वह कहीं नहीं ...खुद को अभिव्यक्त करने की ही नहीं दूसरों को पढने और वहां उनके संवाद में भागीदार होने में ...यह घनानंद तो कभी कभी शब्दों में व्यक्त होने की सीमा के बहुत बाहर हो रहता है .....
तो जनाब लुब्बे लुआब यह कि यहाँ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका .....क्या समझे?  नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :) 
नोट: यह पोस्ट लिखी  जिस भी जेंडर में हो इसे कामन जेंडर में समझा जाय ! 

64 टिप्‍पणियां:

  1. मगर मुझे तो जो ब्रह्मानंद की प्राप्ति यहाँ होती है वह कहीं नहीं ...खुद को अभिव्यक्त करने की ही नहीं दूसरों को पढने और वहां उनके संवाद में भागीदार होने में ...यह घनानंद तो कभी कभी शब्दों में व्यक्त होने की सीमा के बहुत बाहर हो रहता है .....
    Sahmat hun!

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  2. ब्लॉग लेखन में लेखक में ही पाठक है पाठक में ही लेखक है.आपकी ये पोस्ट बुद्धुओं और नए नवेलों दोनों के लिए .ब्लॉग के माध्यम से से विचारो, भावनाओ का साझा बहुत उर्जा प्रदान करता है.

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  3. कॉमन जेंडर में ये सिक्सर लाजवाब है...

    जय हिंद...

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  4. आपकी इस पोस्ट से कई भ्रम टूटे और कई नए रास्ये खुलते हैं ... अपना कुछ लिखा दूसरों को पढवाने के लिए उनके पास तो जाना ही पढ़ेगा ... और इसमें शर्म या कोई मुगालता क्यों पाला जाय ... जाने पर हर बार कुछ न कुछ नया ही मिलता है जो फिर साझा करने को प्रेरित करता है ...
    ब्लॉग लेखन की कई परतों और मनस्थिति को उधेड़ता है ये लेख ...

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  5. हमारी तो यों ही गुजर रही थी, अब क्‍या कहें कुछ जानकार शुभचिंतकों ने ब्‍लाग बना दिया, ना-हां कहते राह भी पकड़ ली हमने, इसी तरह चलती रहे गाड़ी.

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  6. पंडित जी,
    अब तो यह भी नहीं कहेंगे कि हमारे मुंह की आप छीन लिए.. वरना आप कहेंगे कि भैया ई बतिया तो हम घरे से मुंह में धरे थे.. तुम कहाँ से आ गए.. अब तो अपनी भी एक पोजीसन बन गयी है, बड़े लोग माने न माने...
    ऐसी कोइ ओपोर्चुनिटी तो हमें नहीं मिली (हम उस लायक ही नहीं थे) जो आपने ठुकरा दी.. मगर रिश्ते मिले.. वही बोनस है.. और कहीं जाने न जाने पर तो पंडित जी अपना सीधा उसूल है:
    किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र क्या करना,
    खुदा के घर भी न जायेंगे, बिन बुलाये हुए!
    यहाँ रईस से शायर का तात्पर्य पाएदार लेखक से है, जिनकी महिमा आपने बखानी है!!

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  7. @ साधारण बनने और जुड़ने की तमन्ना हो तो ठहरिये वर्ना अपना बोरिया बिस्तर अच्छा हो खुद उठा के पतली गली से निकल लीजिये
    सही बात ..यही खासियत है ब्लॉगजगत की.

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  8. यहाँ तो सभी लेखक हैं ...और वही पाठक भी हैं ...हाँ चेतना ,बौद्धिकता के विभिन्न स्तर जरुर हैं ..मगर खुद एक लेखक बने रहने और अपने को पढ़ाते रहने की ही प्रवृत्ति या अपेक्षा यहाँ नहीं चलने वाली ....

    यह बात तो बिल्कुल सही कही है ... भले ही लोग इसे टिप्पणियों का आदान प्रदान कहें ... लेकिन चाहते सब हैं ..

    लोग अब किताबें लिखने ,छपने की चर्चा करते हैं यहाँ तो मुझे उन पर दया आती है

    अब हरेक को तो किताब लिखने का ऑफ़र मिलता नहीं है और ना ही सबको छपवाने के लिए किसी साहित्यिक संस्था से मदद ही मिलती है तो छपास की भड़ास किताब छपवा कर पूरी कर ली जाती है ..अब छपवाई है तो लोगों को बताना भी पड़ेगा ही न ... तो चर्चा भी करनी होती है ..

    ब्लॉग जगत में सोने, खाने ,रोने ,तू तू -मैं मैं सबकी चर्चा होती है तो पुस्तक की क्यों नहीं ?
    कृपया इस बात पर दया मत कीजिये :):)

    आपकी बात पूरी तरह से समझ में आगई है ..कम से कम बुद्धू नहीं कहायेंगे :):)

    सार्थक पोस्ट

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  9. एक क्षण में लेखक, दूसरे में पाठक, बुद्धि का यह लचीलापन भा रहा है।

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  10. मेरी टिप्पणी भी नहीं दिख रही ..कभी कभी वो स्पैम में भी चली जाती है:) .

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  11. क्या समझे ...
    समझे यही कि आप हमसे बिन बात किये नहीं रह सकते....
    जिसको ब्लॉग-लेखन और पठन का आनंद मिल गया उसके लिये सारे सुख, सारा ऐश्वर्य धूल के समान है...
    ब्लॉग लिखकर ही संतुष्ट होने वाले विरले ही होते हैं..
    खैर आपकी तो कई अनुवाद पुस्तकें पब्लिश हैं.. आपको अब नाम की भूख (छपास) कहाँ रह गयी होगी?
    बातें बनाने में आपका कोई सानी नहीं... फिर भी बातें बनाने में और हलके-फुल्के मज़ाक के लिये मैं सञ्जय अनेजा जी को प्रथम स्थान देता हूँ और आपको सीरियसली लेता हूँ...

    इस बार आपकी पोस्ट पढ़कर सचमुच बुद्धू बन गया.. :)

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  12. जय हो महराज जी की....बहुत दिनों से कोई भारी चीज़ नहीं आई थी,लगता है आप इसी इन्तेज़ार में थे.ऐसा लिखना ,सच्चा लिखना और उस पर विमर्श होना इस मुई ब्लोगिंग में ही है,तभी तो यह पूर्ण-लेखन से अलहदा है.
    यहाँ का आलम यह है कि आप भले ही अच्छे लिक्खाड़ हैं,पर कहीं तिपियोगे नहीं तो सारा खुमार जल्द उतर जायेगा,और कुछ भी लिखकर ,सब जगह अपनी कॉपी-पेस्ट टीप को हवा में लिए घुमते रहो,जहाँ कमेन्ट-बक्सा दिखे ,वहीँ सता दो,आप अधिकाधिक टीप अर्जित कर लेंगे.सबसे सस्ता जुगाड तो यह है कि अगर न लिखना आता है न पढ़ना तो टंकी पर चढ जाइए,कई भाई,पिता,ननद-भाभी जैसे रिश्तेदार आप को लहालोट कर देंगे !

    ब्लॉगिंग से कई नजदीकी रिश्ते बनते हैं और ये उतने ही संवेदनशील भी होते हैं.अगर दो-चार पोस्टों को आपने मिस कर दिया तो उन्हें सेंटियाने में देर नहीं लगेगी !

    फिर भी,शुरू में मुझे लगता था कि ज़्यादा लोग पढ़ें,पर अब लगता है कि कम ही पढ़ें ,मगर उसमें विमर्श हो,औपचारिकता नहीं.

    कुछ महान ब्लॉगर्स अभी भी ओट में खड़े होकर देख रहे हैं,पर मैं कहता हूँ कि वे ज़रूर हम जैसों को मिस करेंगे....हम तो ब्रह्मानंदी हैं जी.

    आपकी पोस्ट शायद कुछ लोगों का भरम तोड़ सके !

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  13. अब क्या कहें भाई । संतोष त्रिवेदी जी ने सब कह दिया ।
    वैसे किस को मिस कर रहे हैं मिश्र जी ? :)

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  14. इस ब्लॉग जीवन में दो पुस्तकों को लिखने की पेशगी ठुकरा चुका हूँ
    दो ये और दो वो जो आपके किसी मित्र ने आपको अंधेरे में रखकर अपने नाम से छपवा लीं। इस तरह कुल चार किताबें आपके नाम से महरूम हो गयीं। :)

    और जहां तक रही बात टिप्पणियों की तो आज से तीन साल कुछ महीने पहले लिखा था टिप्पणी_ करी करी न करी। उसई के कुछ अंश आपके श्रम को भुलाने के लिये पेश-ए-टिप्पणी हैं:

    १.टिप्पणी को अपने प्रति प्रेम का पैमाना न बनायें। बहुत लोग हैं जो आपसे बहुत खुश होंगे लेकिन आपके ब्लाग पर टिपियाते नहीं। टिप्पणी तो क्षणिक है जी। प्रेम शाश्वत है। आराम से प्रकट होगा।
    २. बहुत दिन के अपने अनुभव से बताते हैं कि टिप्पणी किसी पोस्ट पर आयें या न आयें लिखते रहें। टिप्पणी से किसी की नाराजगी /खुशी न तौले। मित्रों के कमेंट न करने को उनकी नाराजगी से जोड़ना अच्छी बात नहीं है। मित्रों के साथ और तमाम तरह के अन्याय करने के लिये होते हैं। फ़िर यह नया अन्याय किस अर्थ अहो?
    ३. हमारे लिये टिप्पणी तो मन की मौज है। जब मन , मौका, मूड होगा -निकलगी। टिप्पणी का तो ऐसा है- टिप्पणी करी करी न करी।

    अगर आपने यह लेख न पढ़ा हो तो अवश्य बांचे। ये लिखते हैं-

    अयं कः।
    अयं ब्लागरः
    ब्लागरं किं करोति
    कटपट-पश्यति-खटपट- पश्यति, क्लिकति पुनपुनः मूषकम्।

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  15. @जिन ब्लागरों की किताबे हाल ही में आयी हों अपने को तुर्रम खां न मान लें ,चुपचाप ब्लागिंग करते रहें ! यश यहीं मिलना है ... :)

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  16. @अनुवाद पुस्तकें
    आशय स्पष्ट करेगें प्रतुल जी ,इसलिए कि अनुवाद -सत्कर्म तो मैंने किया ही नहीं आज तक यह मेरे बायोडाटा में क्योंकर जुड़े! ?

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  17. @अनूप जी,
    मेरी अन्तः प्रेरणा थी कि मेरे इस टोटके को आप जरुर लांघेगें और मैं सच निकला ..हा हा हा ..अब झेलियेगा :)
    मेरी पोस्ट केवल टिप्पणी पाने और लेने को लेकर ही नहीं है कई बिन्दुओं -मनुष्य की अहमन्यता ,आत्मरति को भी लिए हुए है ..बाकी तो आप ब्लागिंग के मेरे बुजुर्ग है और तब भी टिके हुए हैं तो प्रणम्य तो हैं हीं !

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  18. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बृहस्पतिवार 22-12-2011 के चर्चा मंच पर भी की या रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  19. @@ये मिस करने वाला मामला भी बड़ा नाजुक है डॉ दराल साहब ..कभी जिक्रे मिस /यार भी होगा .जब हम आप और वे मिल बैठेगें किसी शाम...गलत होगा गम और होगें चंद जाम .... :)

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  20. ओये होए मिश्र जी ! फिर तो लोग कहेंगे --

    इक शोर सा उठा है मयखाने में ,
    फिर कोई दीवाना होश खो बैठा ।

    अब तो मामले की नज़ाकत हम भी देखेंगे !

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  21. आज तो सारी कसर निकल दी.... बहुत ज़रूरी थे ये विचार जो सच का आइना हम सबको दिखा सकें....मैं तो बस ब्लॉगर ही बनी हुई हूँ.... लेखक होने का कोई भ्रम नहीं..... इसीलिए कोई शिकायत भी नहीं....

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  22. यह पोस्ट लिखी जिस भी जेंडर में हो इसे कामन जेंडर में समझा जाय !
    ...उभय लिंग को समर्पित मस्त पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें।

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  23. अरविन्द जी,
    मैं अब तक समझता रहा कि आप श्रेष्ठ समीक्षक के साथ एक अच्छे अनुवादक भी हैं... मैंने एनसीईआरटी के पुस्तकायल में कुछ साइंस की पुस्तकें देखीं जो किसी 'अरविन्द मिश्र' द्वारा अनुदित थीं... मैंने तुरंत आपकी छवि मन में बसा ली... क्या पता था यह कोई दूसरा भी हो सकता है.... चलिए इस ब्लोगमयी बातचीत से ही धीरे-धीरे आपका परिचय भी मिलता चलेगा.
    _____________
    कई दिन से घरेलू नेट काम नहीं कर रहा था, फोन लाइनें खुदी पड़ी हैं... अचानक काम करने लगा तो लगा शायद कोई जुदा हुई तार थोड़ी देर के लिये मिल गयी है. ..सोचा बतिया ही लें...

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  24. ब्रह्मानंद...

    किताब पर बोलने का मतलब सीधा है न? वैसे कुछ अन्दाजा हो रहा है।

    नोट शानदार रहा।

    पहिला बात तो ई इस ब्लाग-जगत में ब्लाग पर हर सप्ताह कोई-न-कोई लिख ही देता है।

    दूसरा- अपने ५० बरस के हो गए तो बच्चों को काहे समझाते हैं कि खिलौना बेकार होता है। तनी खेल लेने दीजिए। ऊ खुदे समझ लेगा। (फुरसतिया के यहाँ भी यही दोनों, पहिल और दूसरा वचन लिख आये हैं। इसका सही अर्थ लगाया जाय। ब्लॉग-जगत में सही अर्थ लगाने की परम्परा कुछ ज्यादे ही है!)

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  25. 'उसके मष्तिष्क का प्रतिबद्धता भाग लुप्त हो जाता है, विवेक भाग उत्तरोत्तर क्षीण होता है, अपने वर्तमान स्तर की सुरक्षा व प्रगति हेतु चेष्टा करने वाला भाग ग्रीष्म के वायु की भांति प्रलयंकर हो जाता है। तो क्या निर्धन, विकलांग, स्त्रियां, बालक या पण्यविहीन वनों में रहने वाले संन्यासी ब्लागिंग नहीं कर सकते यदि करें तो उनके विचार कैसे होंगे?'..........................हारमोनियम पर यह मिला, जिसका पता फुरसतिया जी ने दिया है।

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  26. ब्लॉगिंग में लेखन के साथ संवाद भी आवश्यक है , ख़ुशी है कि आजकल ब्लागिंग संख्यात्मक दृष्टि से चाहे कम हो गयी है , गुणवत्ता और परिपक्वता बढ़ रही है !

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  27. आत्मकेंद्रित :)
    स्वनामधन्य :)
    स्वयम्भू :)
    आत्म गौरव बोध से त्रस्त :)
    बड़े साहित्यकार :)

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  28. bahut kuch kah raha hai aapka aalekh baton baton me.main to pahli bar aapke blog par aai hoon aakar bahut achcha laga.milte rahenge.

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  29. nisandeh ek achhi post.......vichar evam vyabhar pe vimarsh 'blogging' ke
    pran-va-oo hain......

    'rishte' ..... jisne...jitne jiye honge.........o yahan bhi utna hi jiyega.....

    mahan hona, kahlana achhi baat hai...lekin, uska ahmanyata achhi nahi.......

    aur jahan tak tippani ka sawal hai
    "tippan kari-kari na kari" sahi hai....

    dil karta hai apne sabse bare bhai ka ek photo yahan sata doon....aapko 'sonpur ke mele me bichra bhai mil jayega'...........

    pranam.

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  30. अब हम का कहें? आपके शीर्षक ने ही सब कह दिया।

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  31. हम बुद्दु नही है जी सब समझ गये………हम तो पाठक बने हुये हीहैं।:):)

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  32. ब्लॉग जगत में जुटे रहने और डटे रहने के लिए क्या क्या करें, समझ में आ रहा, मेरी भी बुद्धि खुली. बहुत बढ़िया आलेख. सच में ब्लॉग के माध्यम से अभिव्यक्ति को आकश भी मिलता है और कभी कभी भीड़ में गुम भी हो जाता है. धन्यवाद.

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  33. .यहाँ यह आत्मकेंद्रिकता की मानसिकता नहीं चलने वाली ..ऐसे कितने ही स्वनामधन्य और स्वयंभू यहाँ आये और चलते बने ...शायद वे ज्यादा ही आत्म गौरव के बोध से त्रस्त थे-ब्लॉग जगत ने उन्हें रास्ता दिखा दिया ..रास्ता नापो भैया....बड़े साहित्यकार हो तो अपने घर के, यहाँ दाल नहीं गलने वाली ...मैं देखता हूँ कि कई ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरणों के बाद भी अभी भी कुछ लोग अपनी अहमन्यता से बाज नहीं आ रहे हैं ....
    baidya samyik chintan-manan karati prastuti..dhanyavad.

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  34. इस पोस्ट के जरिये बहुत कह गए आप फिलहाल सबने इतना कुछ कह दिया है कि मेरे पास कहने को कुछ बचा ही नहीं मगर हाँ मैं दिगंबर नवासा जी कि बात से सहमत हूँ। समय मिले कभी तो आयेगा मेरी भी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  35. पहली बार आपके ब्लाग पर आना एक सुखद अनुभूति बना । आपका आलेख रोचक शैली में हमें सच्चाई से रू-ब-रू करवाता है। हम तो ब्लोगर बनकर खुश हैं कोई खुशफ़हमी नहीं पाली हमने ! पढ़ने और पढ़वाने का आनंद ही एकमात्र ध्येय है !

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  36. दमडी-धेले का ज़माना गुज़र गया श्रीमान। अब तो नये पैसे का भी युग बीत चला है डॉक्टर साहब... हम तो शाम को घर लौटनेवालों में से हैं :)

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  37. जूझ रहा हूँ. लल्लू बने रहने में ही सार दिख रहा है.

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  38. इस बिंदास अंदाज़ और इन बिंदास बोलों पर कौन मर न जाए .सहमत हैं ज़नाब अरविन्द भाई साहब आपसे .आप हैं तो हम हैं .मैं ,तू ,तुमे तू तू में में .....सब कुछ है जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवाय जाना कहाँ ....भाई अरविन्द जी अपने पास एक चीज़ बहुत कम है: धैर्य नहीं है कल के लिए संभाल के रखने का जो भी माल उत्पादित होता है सब निकाल दिया जाता है रोज़ कमाना रोज़ खाना हम हैं ब्लोगिया दिहाड़ीदार इसीलिए हिग्स बोसोंन में सेहत के नुश्खें हैं और सेहत के नुश्खों में वैज्ञानिक पद्धति के उपयोग हैं .

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  39. .
    .
    .
    ...तो जनाब लुब्बे लुआब यह कि यहाँ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका .....क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

    किस पर बरस रहे हैं देव ? बात आपकी सही भी लग रही है,पहली नजर में, पर ब्लॉगिंग का माध्यम बहुत उदार, बहुत बड़े दिल वाला व सबको अपने आगोश में समेटने वाला है यहाँ सबके लिये जगह है/ होनी भी चाहिये...चाहे लेखक हो या लेखक होने का मुगालता पाले कोई, यहाँ सबके लिये जगह थी, है और बनी रहेगी... मेरे लिये भी, आपके लिये भी और आपकी इस पोस्ट के 'कारण' के लिये भी... :))


    ...

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  40. @मित्रश्रेष्ठ प्रियवर प्रवीण शाह जी ,
    कभी कार्य कारण se इतर भी न सोचा करिए :)
    कई "कारण" हैं एक नहीं ...और इसलिए इसे "प्रवृत्ति" करक पोस्ट मानिये मित्र !
    नाम लें आप जानते हैं अनावश्यक वितंडा शुरू करना होगा !

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  41. arvind jee
    kasam se aap un bloggers mein se ek hai mere liye jinki har post ka mujhe bahut besabri se intezaar rehta hai!

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  42. अभी दो-तीन पारा ही पढ़ा है - पर यह कहने से रोक नहिं पा रहा अपने आपको कि क्या दिन की बात कही है आपने। कई तो मेल या चैट में आकर कह जाएंगे कि समय ही नहीं मिलता टिप्पणी करने को .. पढ़ा ज़रूर था।
    जैसे हम ही निट्ठल्ले बैठे हैं, बाक़ी सारे लोग व्यस्ततम हैं।

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  43. दूसरे भाग में ...

    कुछ लोग लिख रहें हैं, छप भी रहे हैं तो हमारे ही मित्र बंधु हैं, हमें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। पढ़ के देखिए कई काफ़ी अच्छी पुस्तकें भी हैं।

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  44. बहुत सही कहा है आपने .. बेहतरीन प्रस्‍तु‍ति ।

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  45. हाँ ,लगता तो ठीक है ,
    आगे जितना जिसके पल्ले पड़े !

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  46. @मनोज कुमार जी,
    मैंने यह देखा है कि कुछ ब्लागर पुस्तकों के प्रकाशन के व्यामोह और उसके उपरान्त अहमन्यता के ऐसे शिकार हुए कि कब ब्लागिंग उनके फ्रिप से फिसल गयी उन्हें पता नहीं चला ....निसंदेह कई किताबें अच्छी आयी हैं मगर ब्लागिंग तो उससे बिलकुल अलग है और इसमें भी कोई कम यशलाभ नहीं है !

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  47. कई लोग तो बेचारे अपराध-बोध के मारे टिपियाये भी नहीं होंगे !

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  48. सच कह रहे हैं - पर गिरिजेश जी का ब्लॉग न भूलियेगा | वे कहीं पढ़ें न पढ़ें, उन्हें सब पढ़ते हैं |

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  49. @शिल्पा जी, गिरिजेश जी के बारे में यह कहना ज्यादा सही है कि कोई उनकी पढ़े या न पढ़े वे सबकी पढ़ते रहते हैं हाँ खबर नहीं लेते सबकी ....

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  50. आत्मकेंद्रिकता की मानसिकता का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए दोतरफा संवाद को सौम्यता से व्याख्यायित किया है आपने . निराली समानता का सुन्दर सन्देश भी दिया है और स्वयं को विस्तारित करने का स्पष्ट सूत्र भी . हर ह्रदय की बात करके सार्थक बहस को बढ़ावा दिया है . इस आलेख को ब्लॉगजगत में मील के पत्थर की तरह देखा जाएगा . हार्दिक आभार .

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  51. जी blogar बन के ही आये हैं .....
    लेखक तो हम कभी थे ही नहीं .....:))


    कभी जिक्रे मिस /यार भी होगा .जब हम आप और वे मिल बैठेगें किसी शाम...गलत होगा गम और होगें चंद जाम .... :)

    ओये होए ....!!

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  52. आपसे सहमत हूँ निश्चित ही ब्लॉग्गिंग का अपना आनंद है.

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  53. @ क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

    --सबसे पहले तो स्वीकार कर दूँ कि समझ गया। :)

    @ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका ....

    --लेखक मुगालताखोर हिमालय की खोह में क्या करेंगे? उन्हें तो किसी प्रकाशन ग्रह की खोह खंगालनी होती है। और बियावान की वीथिका पर जाने से तो अच्छा है दामन ब्लॉगिंग में ही तार तार किया जाय!! :)

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  54. नहीं समझे जी :-(

    (लिंक टिकाने से बेहतर है बुद्धू बने रहना)

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  55. ब्लॉग जगत में दोतरफा संवाद की अहमियत शायद समझनेवालों ने समझ ली हो इस पोस्ट से...

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  56. चलिए कुछ शैर हो जाएं -हाथ मलते लोगों पर जो मुगालता पाले रहे ....
    मेरे घर उनका आना जाना था ,क्या मोहब्बत थी क्या ज़माना था ....
    मैं उसके घर नहीं जाता ,वो मेरे घर नहीं आता ,
    मगर इन एहतियातों से ताल्लुक मर नहीं जाता .
    यहाँ ब्लॉग दुनिया में आत्म मुग्धता का कोई ठौर नहीं ....
    चित्र कूट का घाट है चिठ्ठाकारी और चिठ्ठाकार .....एक कोलाहल भरा प्लेटफोर्म .एक लदी.. हुई ट्रेन ,एक जनरल डिब्बा ,जो चढ़ गया वह चढ़ गया ,जो रह गया वह रह गया ...

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  57. कुछ कुछ तो हमको भी समझ आ रहा है :)))

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