सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

माई नेम इज खान के बाद अब आने वाली फिल्म है माई नेम इज हनुमान!

आज देखी माई नेम इज खान! बिलकुल बेहूदा बकवास .अमेरिका में पता नहीं सचमुच इस फिल्म ने धमाल मचाया हुआ है या फिर यह पब्लिसिटी प्रमोशन का ही कोई स्टंट है  -याद होगा पिछले वर्ष खान को अमेरिका में आव्रजन अधिकारियों द्वारा जाँच पड़ताल के लिए रोक लिए जाने पर हंगामा खड़ा किया गया था -शायद वह भी इस फ़िल्म के प्रोमोशन का ही कोई स्टंट रहा हो .टाईम्स आफ इण्डिया ने जब इस फिल्म को अपने पॉँच के पाँचों स्टार लुटा दिए तो उत्कंठा हो आई कि आखिर है क्या इस फिल्म में -सो आफिस का काम काज निपटा कर पास के ही एक माल में घुस गया अकेले ही यह फिल्म देखने -इसलिए भी की कुछ आनंदमय देखने को मिल जाय - मतलब -" अ थिंग(कुछ)  आफ ब्यूटी इज ज्वाय फार ईवर"  -मगर घोर निराशा लगी .

फ़िल्म में अमेरिका के ट्रेड सेंटर के आतंकी हमलो के बाद मुसलमानों को लेकर वहां के मूल निवासियों में फैले  आक्रोश जनित हालातों पर फोकस है और यह बताये जाने की हास्यास्पद कोशिश कि  सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते -वह साहब वाह, हद है, यही बताने के लिए आपने मेरे २०० रूपये और तीन घंटे बर्बाद कर दिए ? और न जाने कितने लोगों की जेबों को खाली करवा रहे हैं!क्या यह कोई एक ऐसे राज की बात थी कि इसके लिए फिल्म बनाने की नौबत आन पडी ? आखिर यह सत्य कौन नहीं जानता? मजे की बात तो यह है कि पूरी फिल्म में नायक कुरआन की आयते पढ़ पढ़ कर लगातार यह साबित करने की कोशिश करता रहता है कि दुनियावालों ,इस्लाम की सही समझ के मुताबिक़ वह एक शांति और सौहार्द का मजहब है और अंत में एक आतंकी ही इस्लाम के नाम पर उसे छूरा घोप देता है -कितना हास्यास्पद ? आप जब किसी रेलिजन को जस्टीफाई करते हैं और बार बार  करते हैं तो वह खुद कटघरे में आ जाता है -विश्वसनीयता खोने लगता है .इस फिल्म में अनावश्यक रूप से इस्लाम को बार बार जस्टीफाई किया गया है -महज यह सूत्रवाक्य समझाने के लिए कि सभी मुसलमान आतंकी नहीं होते -जैसे यह दुनिया पहले से ही मानती   है कि सारे मुसलमान आतंकी है .हमारे जैसे करोडो लोग है जो अब तक तो बिना इस फिल्म के देखे ही यही मानते रहे हैं कि नहीं भैया संभी मुसलमान आतंकी नहीं होते -मगर इस फिल्म को देखने के बाद तो यकबारगी ऐसा ही लगने लगा कि नहीं .हो न हो सभी मुसलमान आतंकी होते ही होंगे तभी यह बेचारी फिल्म कितनी जी तोड़ मेहनत कर इसका उलटा समझाने में लगी है .अपने ब्लागजगत और इतर भी कई मुसलमान  मित्रों के चेहरे भी  सहसा दिमाग में कौंधने लगे -खीझ हो आई इस फिल्म की केन्द्रीय सोच पर -जो नहीं है अब आप उसे पैदा कर दो ....
.
श्रेष्ठ साहित्य की एक कसौटी है यह भी है कि वह  यथार्थ के  करीब हो  -सामाजिक कहानियां वही यादगार बनती हैं जिसमे सच का  वर्णन बहुत ही विश्वसनीय तरीके से किया गया हो -यह फ़िल्म इस दिशा में भी कोई छाप नहीं  छोडती -सारे के सारे दृश्य यथार्थ से बहुत दूर है -एक रूमानी कल्पना भर -इस्लाम के आदर्शों को स्थापित करने का एक सिनेमाई अंदाज -नायक महोदय की गाडी छूट  रही है ,उनके  नमाज पढने का वक्त हो आया -एक विनम्र और होशियार मुस्लिम दंपत्ति उन्हें सलाह देता है -मियां जगह और लोगों को देखकर नमाज पढनी चाहिए -आप क्या कर रहे हैं ? तो यह जवाब कि  जगह और लोग नहीं बल्कि नमाज ईमान से पढी जाती है, वे नमाज अता करने में लीन  हो गए -इस डायलाग पर कुछ तालियाँ तो मिल गयीं, मगर जरा आप बताईये कि आपका प्लेन छूट रहा हो तो आप एरोड्रम पर नमाज अता करने लग जायेगें ? यह  है अनायास  ही किसी रेलिजन का माखौल उड़ाया जाना . हम कहते हैं कि अगर मानव जीवन तर्कों और सामान्य बुद्धि के सहारे बेहतर तरीके से जीया जा सकता है तो फिर रेलिजन  के शरण में अनावश्यक और निरर्थक जाना ही क्यों  चाहिए .

फ़िल्म में इस्लाम को मजबूती से स्थापित करने का बचकाना प्रयास किया गया है और कोई आश्चर्य नहीं कि इसी के जोड़ की जल्दी ही कुछ ऐसे नाम वाली फ़िल्म भी न आ  जायं  -माई नेम इज हनुमान -या आ भी न चुकी हो शायद! आमिर ने तारे जमीं पर में जबसे एक जन्मजात जेनेटिक विकलांगता ग्रस्त बच्चे के साथ  अभिनय किया है नकलची बालीवुड बस ऐसे ही पात्र से दर्शकों  की सहानुभूति बटोरने की कोशिश में रहता  है -इस फिल्म में ऐसी  सहानुभूति दर्शको में शाहरुख़ खान खुद  उत्पन्न करने की कोशिश में हैं. यहाँ भी  मौलिकता नहीं है .एक दृश्य में यह दिखाने की बनावटी कोशिश में कि कतिपय जेनेटिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों में मानवीय भावनाएं होती है -नायक का नवविवाहिता पत्नी (काजोल ) के साथ यौन सम्बन्ध  की आतुरता को बार बार बहुत आपत्तिजनक और भौंडे तरीके से दिखाया   गया है -नायक एक पुस्तक का आमुख ही दर्शकों की ओर करके नायिका को कनविंस करने का प्रयास  करता है जिसपर लिखा रहता है -इंटरकोर्स मेड इजी जैसा कुछ ! हद है कोई  माँ बाप अपने बेटे बेटी के साथ इस भारतीय परिवेश में वह दृश्य कैसे झेल सकता है ?

टोटल घटिया है यह फ़िल्म -बस एक स्टार  काजोल के अभिनय के कारण इस फिल्म को दिया जा सकता है -नाट रिकमेंडेड .
पुनश्च : फिल्म का गीत संगीत रूमानी है -आनंदित करता है  मगर फिर फिर वही मजहबी ड्रामा शुरू हो जाता है -गीत संगीत के लिए एक स्टार और दिया एक टिप्पणीकर्ता स्प्रिन्ग्मेलाडीज  के हस्तक्षेप पर -उनके द्वारा अपने   ब्लाग पर दिए गीत को जरूर सुन लीजिये  .
कुल **

43 टिप्‍पणियां:

  1. ठाकरे से खुन्नस निकालने के कारण हमने भी ये फिल्म देख डाली, आपने 200 खर्च किये हमने महाशिवरात्रि के दिन 500 रुपये खर्च कर डाले...

    इस फिल्म के बारे में हमारे आपके विचार एकदम मिलते हैं, एकदम बकबास, बीमार मानसिकता के लोगों ने रोती कराहती, बीमार फिल्म बनाई है,

    इस विषय पर खुदा के लीये और आमिर बहुत अच्छी फिल्में है, इनसे बहुत आगे...

    जब सारे अखबारों, टीवी चैनलों ने इसे अच्छा बताया तो पहले मैंने सोचा कि शायद मुझे अच्छी फिल्म की अक्ल नहीं है लेकिन जब बाद में मेरे साथ के लोगों ने बताया कि उन्हें भी ये फिल्म पसंद नहीं आयी तो लगा कि मैं तो उतना बेबकूफ नहीं हूं

    आपका ये रिव्यू पढने के बाद तो मैं निश्चिंत हूं कि मैं बिल्कुल भी बेबकूफ नहीं हूं

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  2. अब हम तो देखे हैं नहीं ....
    इसलिए क्या कहेंगे ?
    अरे आप भी तो परमोसन ही कर दिए न अरविन्द जी....मत देखो बोल के
    अब का करें देखना पड़ेगा..ई जानने के लिए की आखिर ई फिल्म ख़राब क्यूँ है ..?
    हाँ नहीं तो ...

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. चलो जी..........

    अपने तो पैसे भी बच गये और समय भी नहीं बिगड़ा........

    धन्यवाद अरविन्द जी !

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  5. चलिए इस फिल्म के बारे में स्पष्ट राय तो मिली,अब का देखना....

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  6. हमें तो फिल्म देखे हुए बीस साल हो गए हैं.... हॉल की शक्ल ही भूल गए हैं.....


    बहुत टाइम वैस्टैज लगता है.....

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  7. हाँ! इंटरकोर्स मेड इज़ी....हम इंटर में पढ़ लिए थे.... स्कूल में लास्ट बेंच में पीछे बैठ कर ..... ३० साल पुरानी किताब है.... और सिर्फ टाइटल ही खराब है.... (वैसे...अपनी अपनी सोच)..... अन्दर से बहुत अच्छी किताब है.....लेकिन बहुत अच्छा साइकोलॉजिकल एनालिसिस किया गया है....

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  8. आप ब्लॉग लिखने के लिए घरेलू बजट के पैसे इससे पहले भी बर्बाद कर चुके हैं !

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  9. पर कारण जौहर की फिल्म से अपेक्षा भी क्या की जाती है??...उनकी हर फिल्म इसी तर्ज़ पर बनी होती है....फिल्म देखने जाने के पहले ही पता होता है कि विदेशी लोकेशन होंगे,बढ़िया कॉस्ट्यूम्स होंगे, ग्लिसरिनी आंसू होंगे,सतही डायलॉग होंगे,कुछ मेलोड्रामा होगा
    और बड़े बड़े स्टार होंगे...हर फिल्म में यही होता है....और आजकल अखबारों की समीक्षा और 4, 5 star पर कोई विश्वास नहीं करता...सबकुछ पूर्वनियोजित रहता है...

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  10. शुक्रिया, काफी टाइम और पैसा खोटी होने से बचा लिया.

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  11. अच्छा है फिल्मों पर भी जानने को मिल रहा है ...

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  12. वाह सर बिल्कुल टाईम से आपने लिखा और हमने पढ भी लिया , पैसा और टाईम दोनों ही सचमुच बच गए इत्ते में तो पोस्ट और टीप दोनों ही बहुत सी हो जाएंगी ....हा हा हा
    अजय कुमार झा

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  13. आपको धन्यवाद इस सच्ची और पारदर्शी चर्चा के लिए। कल परसो रवीश कुमार जी की समीक्षा पढ़कर पछता रहा था कि नाहक उस प्रायोजित पोस्ट पर समय खराब किया।

    वे वेतन के अलावा कोई पैसा नहीं लेते हैं इसपर विश्वास कर भी लिया जाय तो वे पूर्वनिर्धारित एजेण्डा पर काम नहीं करते यह नहीं विश्वास होता।

    हर मुसलमान आतंकी नहीं होता यह हम सभी मानते हैं फिर भी खान बेचारे अपनी दिवालिया सोच के वशीभूत इसी का ढिढोरा पीटने को व्याकुल हैं।

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  14. Aapki pichli recommended films dekhin (Kuch mahine der se hi sahi); nirash nahin hua. Aasha hai is unrecommended film ka na dekh pana bhi nirash nahin karega. Dhanyavad.

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  15. आप का धन्यवाद मेरा समय बचा दिया, भारत आते समय ओर वापसी मै प्लेन मै भारतीया तीन तीन फ़िल्मे थी, लेकिन हम भी सात घंटे बोर होते रहे लेकिन फ़िल्म नही देखी
    अमेरिका मै धामल मचा दिया, जर्मनी मै हजार € की टिकट बिकी यह सब बकवास है पब्लिसिटी प्रमोश का ही चक्कर है, कोई बक्वास फ़िल्म के लिये १ € ना खर्च करे.
    आप का धन्यवाद फ़िर से

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  16. हमने भी अभी तक ये फ़िल्म नहीं देखी है और पता नहीं क्यों देखने की इच्छा भी नहीं हुई. वैसे भी मुझे तो करण जौहर की फ़िल्में बहुत बनावटी लगती हैं. फ़्री में देखने को मिले तो देखी जा सकती है, पर खुद का पैसा लगाकर कभी नहीं. वैसे इस मुद्दे पर मुझे भी आमिर फ़िल्म बहुत अच्छी लगी थी.

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  17. अरविन्द जी सच कहा आपने वाकई किसी भी चीज़ को जस्टिफाई करने की जरुरत नहीं है ...ये फिल्म हमें भी कोई खास नहीं लगी बाकी की करन जोहर की फिल्म की तरह इसमें भी सभी मसाले हैं....परन्तु जहाँ तक बात ये कहने की है की हर खान मुसलमान नहीं होता ...तो हमारा साहित्य कहिये या मिडिया या फिल्म्स हालातों और हमारी जिन्दगी के इर्द गिर्द ही घुमती हैं .सो इस फिल्म के वो वाकये भी सच ही हैं WTC के उस हादसे के दौरान हम USA में ही थे और ये सच है की उसके बाद हर मुसलमान लगने वाले इंसान को शक की नजर से देखा जाने लगा था .. .औरतों का हिजाब पहनना दुश्वार हो गया था और बच्चों का स्कूल जाना..ये सच है की पड़े लिखे लोग सब ये समझते हैं फिर भी एक दरार तो आ ही गई थी न.
    .हमारी जानकारी में बहुत से मुस्लिम मित्र थे जिन्होंने सच ही इस सबके चलते हिजाब पहनना बंद कर दिया था .तो इस लिहाज़ से फिल्म तकनिकी दृष्टि से कमजोर होते हुए भी सन्देश तो ठीक ही देती है मेरे ख्याल से..

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  18. नहीं देखेंगे..नहीं देखेंगे..नहीं देखेंगे..बस्स!!

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  19. बहुत बहुत धन्यवाद अब तो कतई नहीं देखेंगे

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  20. अभी बच्चों के साथ कंप्यूटर पर इसका पाईरेटिड वर्ज़न डाउनलोड कर के देखा और देखने के बाद पछताया कि इससे तो अच्छा था कि कुछ लिख-पढ़ लेता

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  21. इधर बहुत सी फिल्में रिकमेंड कर दीं थीं आपने, देखनी पड़ीं । इसे ना करके ठीक किया !

    वैसे शाहरुख ठीक लगते हैं मुझे DDLJ के जमाने से ।

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  22. बार-बार अपने होने को साबित करना खुद को कमजोर बना देता है...!
    सहमत हूँ आपसे..!
    आभार...!

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  23. खराब फिल्म की अच्छी समीक्षा.

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  24. @शिखा जी ,
    हाँ सच है अमेरीकी आड़ीएंस के लिए फिल्म ठीक है और वे जो उन दिनों वहां रहे .
    बाकी आडियेंस के लिए बकवास है

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  25. आप समीक्षा पढ़कर फ़िल्म देखते हैं? टाइम्स ऑफ़ इन्डिया में निख़त काज़मी लिखा करती हैं. इन मोहतरमा ने कई साल पहले बॉर्डर (सनी देओल वाली) जैसी फ़िल्म को सिर्फ़ दो स्टार यह कहकर दिये थे कि युद्ध पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म को युद्ध विरोधी ही दिखना चाहिये. (हालांकि उस फ़िल्म में जावेद अख्तर का एक बेहतरीन नग्मा इसी तर्ज पर भी था.) हमने तभी से इन्हें पढ़ना छोड़ दिया था. गाहे - बगाहे कभी नजर डाली भी तो वही मूर्खता पूर्ण स्थिति नजर आई. ये हिडन इस्लामिक अजेंडा की ही झंडाबरदार शख्सियत हैं. इनकी कुछ समीक्षाएं पढ़ते ही यह बात स्पष्ट हो जाती है.

    अखबारों में समीक्षा पढ़ने का जमाना अब गया. सबसे बेहतर फ़िल्म समीक्षाएं अब इंटरनेट पर लिखी जा रही हैं जहां आप अपनी राय से समीक्षक को भी अवगत करा सकते हैं और वे उसको सुनते भी हैं, जवाब भी देते हैं. अखबार जैसे एक तरफ़ा संचार माध्यम के मट्टी कुटने के दिन हैं.

    एक लिंक देता हूं, मुझे इनकी लिखी समीक्षाएं पसन्द आती हैं (हालांकि फ़िल्में मैं बहुत ही कम देख पाता हूं, पिछले वर्ष सिर्फ़ तीन देखी थीं).

    http://wogma.com/movies/summary/

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  26. देखेंगे..देखेंगे...और जरुर देखेंगे!!! और उसका बिल आपको भिजवायेंगे.

    ना भी देखते तो अब हमे तो देखनी ही पडेगी. काहे से कि हम बना रहे हैं "MY NAME IS TAAU"...तो खान मे जो कमियां हैं वो ना रहे...तो हम आज ही जारहे हैं देखने.

    रामाराम.

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  27. बिलकुल सही समय पर हमने भी आपकी ये समीक्षा पढ़ ली, मूड हो रहा था देखने का..अब पता नही कब देखेंगे, या नही देखेंगे।
    धन्यवाद।

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  28. "My name is Tauu - म्हारा ताऊ नाम" तो हम भी देखेंगे भाई.

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  29. @भूत विध्वंसक(भंजक क्लीश होता जा रहा है )दिए गए लिंक का आभार
    "still belong to Utopia " इसी का विस्तार कर दिया मैंने .
    हाँ फ़िल्में किसी ने उत्प्रेरण पर ही देखी जाती हैं -दोस्तों की सलाह ,विज्ञापन आदि आदि
    पढने लिखने वाले घोंघे पत्र पत्रिकाओं की समीक्षा से क्लू ले लेते हैं -
    मगर निखत आजमी से मेरा भी अब मोहभंग हुआ

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  30. काफी समय पहले किसी समीक्षक ने गोविंदा की पिक्चरों के लिए कहा था कि हॉल में घुसते समय कृपया अपना दिमाग बाहर रख दें। मेरी समझ से यह बात लगभग सभी हिन्दी फिल्मों के लिए लागू होती है।

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  31. There was nothing wrong in this movie.One of the best movie of the Year.
    SRK was best in this movie ,acted so well as autistic person and a lover who goes beyond everything to show/proove his love to Kajol.

    There was NO VULGARITY,NO VIOLENCE,NO BLOOD SHED,NO NUDITY,NO ITEM SONG,NO cheap double meaning jokes...is this the reason you all are saying this movie bad???A Book on sex education in SRK ' hands--which was shown for seconds only...you made a big issue here!whereas in movie no physical closeness [even ]shown between two lovers!

    SRK delivers message very well that there are only two types of people on this earth--good and bad!
    NO where he mentioned that only muslims are good or hindu is bad??
    No scene where unnecessary any religion is pictuirised.
    Only a love story was highlighted ..yes he wanted to say taht not all muslims are bad....whats wrong in that...it is true!
    Islamic people all are not terrorist.
    -Even he report about a Doctor who was misguiding youth by giving wrong meaning of sacrifice of son of pubh mohd.He even clarifies correct meaning of the incident to people--and hope this message goes very well to misguided muslims all over world.

    I never like SRK before but after this movie Yes,he is great actor has great potential to pull the crowd.

    Only Hindu and Muslim fanatics will not like this movie.

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  32. for me...hangover is still there...
    romance..love...unspoken feelings...what not is there...!
    just go and watch!

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  33. @thanks Anon- Springmelodies!,
    Erudite and prudent!
    But as you know perceptions regarding the work of art and literature differ from person to person-Its all subjective!
    Very right ,film is romantic and songs are very soothing, like the one you referred (Thanks!)
    But the mixing of a sublime experience with the bogus fanatic hue and cry certainly dampen the momentum and have caused more harm than good to this movie.
    But yes your this spirited write-up
    has compelled me to add a note about the kind and quality of songs incorporated in the movie.
    Thanks again!

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  34. dekh chuki hun.
    Aap ne kaha--'film is romantic and songs are very soothing'
    ***Bahut sahi..yahi bandhe rakhta hai film mein
    -----------------
    ' mixing of a sublime experience with the bogus fanatic hue and cry certainly dampen the momentum and have caused more harm than good to this movie'
    --yahan 100% sahmat!
    -----------------
    It is super duper [bumper]hit in UAE.
    Iski Abu dhabi mein Special screening bhi hui hai.

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  35. अरे सर जी हम तो देखने वाले थे , बढिया हैं कि आपने पहले बता दिया कि फिल्म घटिया है ।

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  36. जाकिर अली की बात से सहमत।
    वैसे भी हम तो फिल्म देखते समय दिमाग का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करते।
    इसलिए पता ही नहीं चलता की अच्छी है या बुरी है।

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  37. यूँ भी कोई ख़ास उत्सुकता नहीं थी इस फिल्म को देखने की..और अब आपने यहाँ विवेचना दे ही दी,तो रही सही उत्सुकता भी साफ़ हो गयी....
    आभारी हूँ... आपने हमारे पैसे बचा दिए....

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  38. यह सच है की सभी मुसलमान आतंकी नहीं होते. किंतु उनका इतिहास कहता है इन सभी को आतंकी होना चाहिए. इसी अंतर्द्वंद का उत्पाद लगती है यह फिल्म और इस्लाम के सभी शांतिपाठ.

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  39. फ़िल्में कब दिमाग लगाकर देखी जाती हैं ...रोमांटिक फिल्म होते हुए भी आपको अच्छी नहीं लगी ...ये तो होना ही था ...अकेले जो गए थे देखने ....श्रीमती जी को साथ ले जाना था ....
    शाहरुख़ की सभी फिल्मे देख ही लेती हूँ ..इसलिए देखूंगी तो जरुर ...हालाँकि DDLJ सहित कुछ फिल्मे मुझे अच्छी नहीं लगी ..

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  40. पब्लिसिटी के लिए जिस तरह का 'अश्लील', हाँ मैं अश्लील ही कहूँगा स्यापा और नौटंकी की गई उससे जुगुप्सा हो गई।
    आप को साधुवाद कि आप ने वह देखा जो अन्ध-फैन और बिके हुए समीक्षक या तो देख नहीं पाते या देखते हुए भी नहीं देखते।
    बंसल जी की बात में दम है। जब तक दिम्मी, क़ाफिर और विश्वासी
    (?) का भेद संहिताबद्ध रहेगा और उसे न मानने का विकल्प मृत्यु के आँगन खुलता होगा, समस्या रहेगी।
    बाकी शाहरुख वगैरह तो एक बहुत बड़े षड़यंत्र के मोहरे भर हैं। कोई नहीं जानता(या सब जानते हैं) कि शिवसेना के विरोध के पीछे असल कारण क्या थे और फिल्म इंडस्ट्री में पैसा आता कहाँ से है।

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  41. आप ने बता दिया कण्डम है फिल्म! बस खतम बात! वैसे भी कौनसा अपन को देखनी थी! :)

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  42. हमने ऐसे भी शाहरूख की पिछली तीन फिल्मे नहीं देखी है, भला इसे क्यों देखेंगे?

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