रविवार, 7 फ़रवरी 2010

नायक भेद पर एक फगुनही पोस्ट

नायिका भेद श्रृंखला के समापन पर सुधी मित्रों /पाठकों के अनुरोध को शिरोधार्य करते हुए मैंने वायदा किया था कि कभी मैं  नायक भेद प्रबंध काव्य का पारायण भी कराऊंगा आप सब को ...फिर इसके लिए फागुन से उपयुक्त अवसर भला और कौन मिलेगा -कहते हैं कि इस महापर्व पर जाने अनजाने कुछ गुस्ताखी हो भी जाय तो वह अनदेखी हो जाती है -उसकी नोटिस विज्ञ जन नहीं लेते .इस फागुन इम्यूनिटी कवच को धारण कर मैं अवसर का भरपूर लाभ उठा नायक भेद प्रसंग को निपटा ही लेना चाहता हूँ -पाई समय जिमि सुकृत सुहाये ......मुझे पता नहीं यह नायक विमर्श एक पोस्ट में ही सिमट जायेगा या लम्बा खिचेगा क्योकि नायिकाओं के मुकाबले नायक -चर्चा छ्ठांश भी नहीं है .और दूसरे मैं इस विषय के एक "ले परसन" की तरह ही यह चर्चा आपसे करना  चाहता हूँ -जग जाहिर है मैं इन विषयों का न तो शास्त्रीय और न ही साहित्यिक विद्वान् हूँ ,चूकि ज्ञान के सरलीकरण/ लोकगम्यता का प्रबल पक्षधर हूँ इसलिए अपने अल्पज्ञान और अर्धज्ञान को भी लोगों से बाँटने को उतावला हो जाता हूँ यद्यपि यह खतरनाक है ,कहा भी गया है अधजल गगरी छलकत जाय .मगर  मौसम फागुन का हो और मदन अभिलाषाएं जोर पकड़ रही हों तो फिर गगरी आधी क्या पूरी की पूरी उलीच जाने को अकुला उठती है .


नायक भेद पर आचार्यों के मतानुसार नायिका के प्रति व्यवहार के आधार पर  जो  नायक - वर्णन मिलता है  वही सबसे सीधा और सरल है .उत्तम नायक वह है जो हर प्रकार से नायिका को प्रसन्न रखता है .मध्यम वह जो न तो नायिका को प्रसन्न रखने और न ही उसे रुष्ट करने के प्रति प्रयत्नशील होता है .और अधम वह है जो नायिका के मान  के प्रति उपेक्षाशील रहता है-
उत्तम तिय को लेत रस ,मध्यम  समय विचार ,अधम पुरुष सो जानिये निलज्ज निशंक आगार (उद्धरण:सुधानिधि )
कुछ  विद्वानों ने नायकों को मानी ,चतुर, अनभिग्य आदि नामों से भी जाना है  -चतुर के दो भेद हैं जिनमे वचन व्यंग -समागमचतुर और च्येष्ठाव्यंगसमागमचतुर आते हैं मतलब एक तो केवल वाग्विलास तक ही सीमित रहकर आनंदानुभूति करता है दूसरा क्रियारत भी होता है -इसलिए सहज सरल भाषा में एक वचन चतुर और दूसरा क्रियाचतुर कहा  गया है.एक विद्वान् हुए हैं ब्रह्मदत्त ,उन्होंने तो नायकों का विभाजन  कतिपय गूढ़  निहितार्थों के साथ वृषभ, मृग तथा अश्व के रूपों  में किया है और यह कामसूत्र/शास्त्र से पूर्णतया प्रभावित है .अब फागुन  और होली  पर विज्ञजन निहितार्थों को समझेगें ही ,विस्तारण कदाचित आवश्यक  नहीं है . 



यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि नायक भेद का विवेचन भी प्रुरुष के दृष्टिकोण से ही  है और इसलिए पुरुष की काम विषयक फंतासियों से वह अछूता नहीं है .इसमें नारी की भावना का प्रतिबिम्बन निश्चय ही सहज और सटीक रूप में नहीं हुआ लगता है क्योंकि आधुनिक मनोविज्ञान और यौनविज्ञान  भी अब यह मानता है कि पुरुष की अपेक्षा नारी का रति संबंधी मनोभाव बहुत जटिल और विषम है -बहुधा  अगम्य सा है (नारी ब्लागरों से ज्ञानार्जन की दृष्टि से इस पर प्रकाश डालने का अनुरोध है -बुरा न मानो होली है के रक्षा कवच के साथ हा हा ) .
आज बस इतना ही -आग लगाने {अंतराग्नि} के लिए  इतना ही क्या काफी नहीं है?

27 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर सरगार्वित पोस्ट. आभार सर

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  2. बुरा न मानो होली है के रक्षा कवच के साथ ) ...
    रक्षा कवच की जरूरत फागुन में भी???

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  3. नायिका - वर्णन का परिणाम दिख रहा है .. इस फागुन में फगुनातुर हैं सब ..
    नायक - वर्णन का परिणाम कहीं ''अंधे - सावन - साँड़ों '' को सूखी घास भी हरी
    मान कर न चरवा/चबवा दे !
    वो दिन आज से भी ज्यादा मनोहारी होगा !
    '' लाजिम है की हम भी देखेंगे '' !
    क्या मजा आता अगर नायक - वर्णन में नायिकाएं ' चपल-दूर-दृष्टि ' का भी
    परिचय देतीं !
    ऐसा संयोग बनाएँ आर्य ! आभार रहेगा !!!

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  4. अरे! वाह.... घोरा समुद्दर पे परक परक दोर रहा है.... अच्छा ...ई बताइए.... घोरा का फोटुवा काहे दिए हैं? आजकल मेडिकल स्टोरवा पर पोस्टरवा ज्यादा निहार रहे हैं... ला गा ता .... आज आप कुछ ज्यादा ही फंतासी करा दिए हैं.... आग लगा के छोर देना कोई आपसे सीखे.... अग्निशमन यन्त्र भी छाप देते.... कम से कम आगवा त बुझाए देते...

    ई पोस्ट बहुते धांसू है... बहुते फागुनी.... होलिये पे बहुते गाली खाए हैं हम....

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  6. महफ़ूज अली से सवा निन्यान्बे प्रतिशत सहमत।

    मैं सोच रहा हूँ कि नायकों की एक 'गदहा' श्रेणी भी होनी चाहिए।
    हा हा हा जोगीरा.. . .

    घोड़ा दउड़े सगर किनारे
    हम देखीं भकुआया
    बिस्तर पर भी घोड़े दउड़ें
    मानुख रहा बिलाया ।
    मानुख रहा बिलाया
    जो फागुन है अब आया
    साँवरिया की राधा खोई
    गली गली उठि धाया।
    हाँ जोगीरा स र र र र ।

    शुभ रात्रि।

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  7. वाह !! नायक-भेद के बारे में नई बात जानने को मिली. हम तो केवल संस्कृत के नायिका और नायक-भेद के विषय में जानते थे. थोड़ा और विस्तार से वर्णन करें तो बात बने.

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  8. जहां वचन और कर्मों से नायकत्व की संभावना ना हो वहां चक्षु विलासियों की प्रायिकता तो है ही : )

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  9. वाकई बहुत अच्छी सार गर्भित पोस्ट है ....
    सादर
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  10. प्रविष्टि के साथ तस्वीरों का संचयन बता रहा है कि आपको एक बार फिर से अदाजी की मदद ले ही लेनी चाहिए .....!!

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  11. रक्षा कवच आपकी रक्षा करे. फ़ागुन मे यही शुभकामना है.:)

    रामराम.

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  12. अरविन्द जी फगुवा पोस्ट पठाना
    फागुन इम्युनिटी कवच बचाना
    अरे नर के करी उ बहुत बखाना
    नर-नारी दिए टिप्पणी नाना
    महफूज़ के शामक यंत्र पहुँचाना
    गिरिजेश की भी सहमती पाना
    बचवा अमरेन्द्र फगुवाये महाना
    सब दीखे मोहे तुरंग समाना
    अब एगो फोटो गधा का लगाना
    कहो तो तस्वीर हम फट पहुँचाना
    हा हा हा हा
    हाँ जोगीरा स र र र र .....

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  13. तस्वीरें बहुत कुछ कह रही हैं।

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  14. फगुनाहट का भाव बन रहा है, संकल्प पूरे हो रहे हैं ।
    नायक-भेद आपके संकल्पों में था न !
    कुछ और भी ढंके-छुपे-खुले संकल्प हों तो आश्रय-’होली है..’ के तले पूरा कर डालें !

    खूबसूरत प्रविष्टि । आभार ।

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  15. हम्म...नायक भेद पर फगुनाहट का असर ही ज्यादा दिख रहा है. :)...देखें आगे और कौन कौन से नायकों के प्रकार आप चुन कर लाते हैं..

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  16. बहुत छुपे रुस्तम निकले आप..

    फागुन की फगुनागट में मीठे-जहरबुझे बाण छॊड़ने की तैयारी है..! भगवान बचाये..

    गिरिजेश भैया तो होपलेस केस हो चुके, आचारज जी भी मस्तायमान हैं.. अब आपो एहि भाँति ब्यौहार करेंगे, तो हमारे जैसे नन्हे-मुन्नों पर क्या असर होगा?

    वैसे फागुन में तो सौ खून माफ.. वो कहते हैं ना, फागुन भर बाबा देवर लगे

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  17. " हाथी घोडा पालकी,
    जय, कन्हैया लाल की "
    आप सबों को
    फागुन आने की खुशी होगी --
    यहां तो हरसू बर्फ ही बर्फ है !

    - लावण्या

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  18. ..लगता है इस घोड़े को मालूम है!.. तभी दौड़ा जा रहा है!

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  19. ये नायक भेद पर अच्छी जानकारी के लिये धन्यवाद।

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  20. उत्तम नायक वह है जो हर प्रकार से नायिका को प्रसन्न रखता है .मध्यम वह जो न तो नायिका को प्रसन्न रखने और न ही उसे रुष्ट करने के प्रति प्रयत्नशील होता है .और अधम वह है जो नायिका के मान के प्रति उपेक्षाशील रहता है
    ------------
    ओह, हम तो नालायक ही निकले इस परीक्षण में!

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