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गुरुवार, 11 सितंबर 2014

पारम्परिक मीडिया बनाम सोशल मीडिया: नए आयाम, नई चुनौतियां! ( परिप्रेक्ष्य: हिन्दी दिवस)


मानव के विकास में उसके शिकारी जीवन के आदि हुंकरणों से शुरू हुई अभिव्यक्ति की महायात्रा के भाषाई पड़ावों का अध्ययन बहुत रोचक है। मनुष्य ने संवाद की दिशा में संकेतों/शिकारों ,हाव भाव(gestures ) का सहारा लेते हुए भाषिक संवाद की भी जो क्षमता विकसित की वह समूचे जीव जगत की अनूठी घटना है। एक सामजिक प्राणी के रूप में भाषाई ईजाद ने बोलियों वाक्यों की संरचना मार्ग प्रशस्त किया और मनुष्य आपसी संवाद समन्वय से विकास की एक अनन्य मिसाल कायम कायम की। अब उसके पास भावों के आदिम प्रगटन की भाव भंगिमाओं और अभिव्यक्ति के शैल चित्रीय या भोजपत्रीय माध्यमों के अलावा एक तेजी से विकसित हो रही भाषा का भी सहारा था जिसमें विश्व के प्राचीनतम वैदिक साहित्य की वाचिक और श्रुति परम्परा से आरम्भ होकर आज के डिजिटल मीडिया तक का इतिहास समाहित है। वाचिक / श्रुति परम्पराओं से आगे लेखन और मुद्रण तक का इतिहास सहज ही ज्ञेय है। मुद्रण माध्यमों ने जहां समाचार पत्र पत्रिकाओं,पुस्तको के जरिये जन संवाद का नया अध्याय शुरू किया वहां प्रसारण माध्यमों में दृश्य और श्रव्य दोनों तरीकों का खूब विकास हुआ -सिनेमा और आकाशवाणी ने जन संवाद की नई मिसालें कायम की। मीडिया के इन विविध रूपों से आम समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर तरह तरह आशंकाएं भी उठती रही हैं।
मीडिया और जन मानस

मीडिया के बारे में अक्सर यह बात कही जाती रही है कि वह जन विचारों को प्रभावित कर सकती है और समूह 'ब्रेन वाश' करने में भी सक्षम है। यहाँ तक कि विचारों को भी एक केंद्रीय कंट्रोल /कमांड के जरिये संचालित और नियमित भी किया सकता है. इन कथानकों पर कई कई साइंस फिक्शन फ़िल्में और उपन्यास आधारित हैं जो जनमानस और मीडिया के पारस्परिक अंतर्सबंधों की विविध संभावनाएं प्रगट करते हैं। जार्ज आर्वेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 1 9 8 4 में 'बिग बास इज वाचिंग यू' जैसे दहशत भरे तकनीकी दुरूपयोग की ओर इशारा किया था। विगत डेढ़ दशक से नई मीडिया -डिजिटल मीडिया का वर्चस्व दिन दूनी रात चौगुनी दर बढ़ा है जिसकी ऑफशूट है -सोशल मीडिया। सोशल मीडिया कम्प्यूटर क्रान्ति की देन है। डिजटल दुनिया का एक नया जिन! अब सोशल मीडिया की लोक गम्यता क्या क्या गुल खिला रही है यह छुपा नहीं है. खाड़ी देशों की सद्य संपन्न जन क्रांतियाँ गवाह हैं। अभी संपन्न सामान्य निर्वाचन में भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल हुआ है। जिसके जन प्रभावोत्पादकता के मुद्दे पर बहस अभी भी जारी है।

चिट्ठे और सोशल मीडिया

अंतर्जाल पर जब हिन्दी ब्लॉगों का प्रादुर्भाव कोई एक दशक पहले नियमित तौर पर शुरू हुआ तो लगा अभिव्यक्ति के नए पर उग गए हैं। सृजनशीलता और अभिव्यक्ति जो अभी तक 'क्रूर' संपादकों के रहमोकरम पर थी सहसा एक नयी आजादी पा गयी थी। कोई क़तर ब्योंत नहीं -अपना लिखा खुद छापो। अंतर्जाल ने लेखनी को बिना लगाम के घोड़े सा सरपट दौड़ा दिया। खुद लेखक खुद संपादक और खुद प्रकाशक। लगा कि अभिव्यक्ति की यह 'न भूतो न भविष्यति' किस्म की आजादी है। अब संपादकों के कठोर अनुशासन से रचनाधर्मिता मुक्त हो चली थी ,लगने लगा। किन्तु आरंभिक सुखानुभूति के बाद जल्दी ही कंटेंट की क्वालिटी का सवाल उठने लगा. हर वह व्यक्ति जो कम्प्यूटर का ऐ बी सी भी जान गया पिंगल शास्त्री वैयाकरण बन बैठने का मुगालता पाल बैठा। नतीजतन 'सिर धुन गिरा लॉग पछताना' जैसी स्थिति बन आई. ब्लॉग को साहित्य मान बैठने का भ्रम टूटने लगा है -यह एक माध्यम भर है या फिर साहित्य की एक विधा इस विषय पर भी काफी बहस मुबाहिसे हो चुके।

क्या हिन्दी ब्लॉगों के अवसान की बेला आ गई ?

लगता है हिन्दी ब्लॉगों का अवसान आ पहुंचा है? -उनकी पठनीयता गिरी है -कई पुराने मशहूर ब्लॉगों के डेरे तम्बू उखड चुके हैं -वहां अब कोई झाँकने तक नहीं जाता। हाँ यह जरूर हुआ कि कई रचनाकारों को ब्लॉग और फेसबुक के चलते पारम्परिक मुद्रण मीडिया में पहचान मिली और उन्होंने इस नए मीडिया को लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया। किन्तु अंतर्जाल पर अपने चुटीले कार्टूनों से ब्लॉग जगत में विशिष्ट पहचान बनाने वाले काजल कुमार का कहना है कि "ब्‍लॉग और सोशल मीडि‍या आज भी अत्‍यंत सशक्‍त माध्‍यम हें. आज भी तथाकथि‍त ग्‍लैमर वाला मीडि‍या, ब्‍लॉगों और सोशल मीडि‍या की ख़बरों के बि‍ना जी नहीं पा रहा है. जब कुछ घटता है तो लोग उसी समय नवीनतम जानकारी के लि‍ए सोशल मीडि‍या पर लॉगइन करते हैं क्‍योंकि‍ यह त्‍वरि‍त है.बात बस इतनी सी है कि‍ जो लोग अख़बारों/पत्रि‍काओं में छप नहीं पा रहे थे उनके लि‍ए ब्‍लॉग एक नई हवा का झोंका लाया, ब्‍लॉगिंग को उन्‍होंने स्‍प्रिंगबोर्ड की तरह प्रयोग कि‍या और फि‍र वे यहां-वहां छपने लगे. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. दूसरे, आत्‍मश्‍लाघापीड़ि‍तों ने परस्‍पर-प्रशंसा के लि‍ए अपने-अपने गुट बना लि‍ए और मि‍ल-बांट कर आपस में छप और पढ़ रहे हैं. यह स्‍टॉक एक्‍सचेंज की ऑटोकरेक्‍शन जैसा है. इन सबसे, बहुत ज्‍यादा कुछ अंतर नहीं आने वाला... ब्‍लॉगिंग की अपनी जगह है बरसाती मेढक आते-जाते ही रहते हैं." अखबार भी जन मानस में पैठ बनाये हुए हैं। हाँ व्यापक रीडरशिप पाने के लिए कई मीडिया समूह अब अंतर्जाल पर भी जाकर अपना वर्चस्व बना लिए हैं।

डिजिटल डिवाईड

अंतर्जाल की सुविधा सहूलियत कितनो के पास है ? यह सवाल मौजू है। कितने लोगों के पास कम्प्यूटर और कनेक्टिविटी है ? बिजली की क्या उपलब्धता है -यही वे कारण हैं जिनसे यह आशंका बलवती हुयी की तकनीकी संचार से दो तरह की दुनिया वजूद में आ रही है -एक जिसके पास अंतर्जाल तक की पहुँच है और एक जिसके लिए अभी भी अंतर्जाल एक स्वप्न है -समाज में विषमता की एक नयी खाईं गहराती नज़र आ रही है -और जन सुविधाओं का आबंटन भी कहीं इस डिजिटल डिवाईड पर आधारित न हो जाय ? वह प्रौद्योगिकी ही क्या जो जन सुलभ और बहुजन सुखाय बहुजन हिताय न हो ? ये सारे सवाल आज विचार मंथन के मुद्दे बने हुए हैं। यह सही है कि पारम्परिक मीडिया भी ऐसी सम्भावनाओं की आहट पाकर अब अपने को अंतर्जालीय संस्कृति की ओर मोड़ रहा है मगर यह भी सच है कि अंतर्जाल तक अभी भी जान सामान्य की पहुँच नहीं हो पायी है। मगर सोशल मीडिया ने एक संचार क्रान्ति का बिगुल जरूर फूँक दिया है!

फेसबुक का बढ़ता वर्चस्व

फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को आंक नहीं पाए थे जबकि इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का ध्यान आकर्षित किया गया था। आज भी यह बल देकर कहा जा सकता कि कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं . वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

नाम अनेक काम एक 
दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते!

पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ . आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

सोशल मीडिया की अनेक नेटवर्किंग साईट या फिर ब्लॉग अपने कंटेंट/ फीड की नेट वर्किंग के चलते एक प्रमुख सोशल मीडियम बन कर उभरा है . यहाँ कोई ख़ास प्रतिबन्ध नहीं है या बिल्कुल भी प्रतिबन्ध नहीं है .किन्तु यही खतरे की सुगबुगाहट है .....इसके दुरूपयोग की संभावनाएं हैं -साईबर आतंकवाद की भयावनी संभावनाएं हैं .जिसकी एक बानगी अभी हम बड़ी संख्या में शहरों से लोगों के असम पलायन के रूप में देख चुके हैं -एक दहशतनाक मंजर! ...ऐसी अफवाहें और भी संगठित रूप से किसी भी मसले को लेकर फिर फैलाई जा सकती है -सारे देश में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है -यह साईबर आतंकवाद की एक छोटी सी मिसाल है ,झलक है .हमें सावधान रहना है .

इंटेलिजेंट मशीनें
तकनीक के दुरूपयोग को भयावह दानव का मिथकीय रूप दिया जा सकता है ...इस अर्थ में तकनीक को हमेशा चेरी की ही भूमिका में रहने को नियमित करना होगा ,कभी भी स्वामिनी न बने वह ..(जेंडर सहिष्णु लोग इसे स्वामी या दास शब्द के रूप में कृपया गृहीत कर लें) ..और अब तो स्मार्ट प्रौद्योगिकी वाली इंटेलिजेंट मशीनें भी आ धमकने वाली हैं जिसके पास खुद अपने सोचने समझने की क्षमता होगी -आगे चल कर इनमें संवेदना भी आ टपकेगी ...तब तो इन पर नियंत्रण और भी मुश्किल होगा -दूरदर्शी विज्ञान कथाकारों ने ऐसी भयावहता को पहले ही भांप लिया था ...इसाक आजिमोव ने इसलिए ही बुद्धिमान मशीनों पर लगाम कसने का जुगत लगाया था अपने थ्री ला आफ रोबोटिक्स के जरिये -जिसका लुब्बे लुआब यह कि कोई मशीन मानवता को नुकसान नहीं पहुंचा सकती ..मनुष्य के आदेश का उल्लंघन भी कर सकती है अगर मानवता का नुकसान होता है तो ....वैज्ञानिक ऐसी युक्तियों पर काम कर रहे हैं जिससे मशीनें बुद्धिमान तो बनें मगर मनुष्यता की दुश्मन न बने ....ऐसे नियंत्रण जरुरी हैं खासकर आनेवाली बुद्धिमान मशीनों के लिए .मगर आज भी जो मशीनें हैं ,अंतर्जाल प्रौद्योगिकी की कई प्राविधि -सुविधाएं हैं उन पर भी एक विवेकपूर्ण नियंत्रण तो होना ही चाहिए -मगर यह हम पर ही निर्भर हैं -हम इसका सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग!


आज सोशल मीडिया अपने शुरुआती स्वरुप यानी निजी संपर्क /अभिव्यक्ति से ऊपर आ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ चुका है .आज कितने ही सामुदायिक ब्लॉग हैं और विषयाधारित ब्लॉग हैं -साहित्य ,संगीत ,निबंध, कविता ,इतिहास ,विज्ञान, तकनीक आदि आदि के रूप में ब्लागों/फेसबुक आदि का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य निखार पा रहा है .....मानवीय अभिव्यक्ति उद्दाम उदात्त हो उठी है ....मानव सर्जना विविधता में मुखरित हो उठी है ... मगर एक बात मैं ख़ास तौर जोर देकर कहना चाहता हूँ -ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम भर नहीं रह गए हैं अब यह अभिव्यक्ति के एक खूबसूरत और सशक्त विधा के रूप में भी पहचाने जाने की दरख्वास्त भी करते हैं.

माध्यम या विधा
विधाओं के अपने पहचान के लक्षण होते हैं -जैसे कहानी का अंत अप्रत्याशित हो ,ख़बरों का शीर्षक अपनी और खींचता हो ,प्रेम कथाओं में प्रेम पसरा पड़ा हो ....सस्पेंस कथाओं में द्वैध भाव हो ,कहानी(शार्ट स्टोरी ) एक बैठक में खत्म होने जैसी हो ....आदि आदि ..तो ऐसे ही सोशल मीडिया में लेखन की विशेषताओं की भी पहचान और इन्गिति होनी चाहिए --क्या हो ब्लॉग विधा के पहचान के लक्षण ? ? -हम इस पर चर्चा कर सकते हैं -जैसे ब्लॉग पोस्ट ज्यादा लम्बी न हों ,ब्रेविटी इज द सोल आफ विट ....गागर में सागर भरने की विधा हो ब्लॉग ...कुछ लोग लम्बी लम्बी कवितायें ,निबंध ब्लागों पर डाल रहे हैं -कितने लोग पढ़ते हैं? -इसलिए कितने ही नामधारी साहित्यकार यहाँ असफल हो रहे हैं क्योकि उनकी पुरानी हथौटी लम्बे लेखों विमर्शों की है ....एक बार शुरू करेगें तो कथ्य का समापन और क़यामत एक ही समय आये ऐसा जज्बा होता है उनका :-) माईक पकड़ेगें तो छोड़ेगें नहीं..
निष्पत्ति
सोशल मीडिया का लेखन ऐसी ही कुशलता की मांग करता है कि कम शब्दों में अपनी बात सामने रखें ....और यह अभ्यास से सम्भव है ..अनावश्यक विस्तार की गुंजाईश इस विधा में नहीं है .... लेखक की लेखकीय कुशलता का लिटमस टेस्ट है सोशल मीडिया में लेखन ...ट्विटर तो १४० कैरेक्टर सीमा में ही अपनी बात कहने की इजाजत देता है ......किसी ने कहा था यहाँ तो मीडिया और मेसेज का भेद ही मिट गया है ..यहाँ मीडिया ही मेसेज है ...

ब्लॉग भी एक ही पोस्ट में लम्बे चौड़े अफ़साने सुनाने का माध्यम /विधा नहीं है ....हाँ जरुरी लगे तो श्रृंखलाबद्ध कर दीजिये पोस्ट को ...मुश्किल यही है ब्लागिंग के तकनीक के सिद्धहस्त जिनकी संख्या बहुत अधिक है यहाँ ,इसे बस माध्यम समझ बैठने की भूल कर बैठे हैं ....जबकि यह एक विधा के रूप में अपार पोटेंशियल लिए है हम इसकी अनदेखी कर रहे हैं .....आज ब्लागों के विधागत स्वरुप को निखारने का वक्त आ गया है ......हाऊ टू मेक अ ब्लॉग से कम जरुरी नहीं है यह जानना कि हाऊ टू राईट अ ब्लॉग? ....

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

हंगामा है क्यूं बरपा? डोयिचे वेले पुरस्कारों पर दो टूक!

हिन्दी ब्लॉगर अपनी औकात एक बार फिर दिखा दिए.डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कारों में इस बार हिन्दी के शामिल होते ही बखेड़ा खड़ा हो गया है . जो वैश्विक समुदाय के सामने यह फिर साबित करता है कि हिन्दी वाले और अब खासकर हिन्दी के ब्लॉगर कभी परिपक्व नहीं हुए और न  होंगें .हिन्दी के साथ विवाद का चोली दामन का सम्बन्ध बना हुआ है और शुद्ध हिन्दी में कहें कि यह एक अन्योनाश्रित सम्बन्ध बन गया है . डोयिचे वेले की तरफ से कहीं कुछ गलत नहीं हुआ . और न परिकल्पना की ही ओर  से कुछ गलत था . यह हम हैं जो अपनी निजी खुन्नसों और निहितार्थों के चलते इन्हें विवादास्पद बनाते हैं . हिन्दी भाई कई लोग तो ऐसे होते हैं कि सम्मान पुरस्कारों की तब तक आलोचना करते हैं जब तक कि वही सम्मान उन्हें खुद नहीं मिल जाता . फिर चुप लगा जाते हैं .
डोयिचे वेले अंतर्जाल सक्रियता पर एक वैश्विक पुरस्कार आयोजन पहले से भी करती आयी है .बस इस बार उसमें हिन्दी जुड़ गयी और कुछ श्रेणियों में नामांकन मांगे गए . इसकी पहली सूचना ज्यादातर लोगों को खुशदीप जी की पोस्ट से मिली थी, सक्रिय लोगों ने नामांकन कर दिए . मैं नामांकन के जरिये पुरस्कार -सम्मान के पक्ष में कभी नहीं रहा -यह मुझे भीख का कटोरा लेकर कुछ मांगने जैसा लगता है भले ही कोई दूसरा ही आपका  नामांकन क्यों न करे . मगर यह मेरा अपना बहुत निजी विचार है मगर तमाम चयन की प्रक्रियाओं में यह भी एक प्रक्रिया है और मैं इसी रूप में इसे लेता हूँ . हाँ सम्मान तो जो सम्मान लायक हो -किसी क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किया हो उसे अपने स्रोतों के माध्यम से सम्मानकर्ता व्यक्ति /संस्था को चुन लेना चाहिए - मगर नोबेल पुरस्कार तक नामांकन मांगते हैं तो अगर डोयिचे वेले ने भी यही रास्ता अपनाया तो यह उसका निर्णय है,उसकी शर्त है . कतिपय हिन्दी ब्लागरों ने चुपके से अपने ब्लागों को नामित कर दिया या करा दिया . कुछ लोगों ने दूसरे ब्लागों को घोषित तौर पर नामांकित किया -वास्तव में किया या खुद अपना कर गए कौन जानता है? :-)  . अब यह तो भारतीय सूचना आधिकार के तहत डोयिचे वेले से पूछा भी नहीं जा सकता और उसे बताने की भी कोई बाध्यता नहीं है . अब जो ब्लॉग नामांकित हुए होंगें उन ही में से कुछ चयनित भी होने थे सो हो गये. हमें भी शुरू में और अब भी लगता है कि चयनित ब्लागों से कितने ही बहुत बेहतर ब्लॉग छूट गए हैं मगर क्या कीजियेगा जब वे नामांकित ही नहीं हुए . 
एक मैं ही अकेला नकचढ़ा फक्कड़ थोड़े ही हूँ जो खुद नामांकन से दूर रहा . विज्ञान / भ्रमण की कटेगरी में उन्मुक्त सरीखा ब्लॉग जहाँ प्रामाणिक प्रथम स्रोत की जानकारी  लिए है और जहां  बेहतरीन पोडकास्ट भी है  या मेरा अपना साईब्लाग ही है विज्ञान संचार के समर्पित प्रयास हैं . मगर ये तो नामंकित ही नहीं हुये. हाँ तस्लीम को अवश्य नामांकित किया गया  और यह भी एक नियमित ब्लॉग है जिसमें शुरुआती योगदान मेरा भी कुछ कम नहीं रहा -नामकरण,अवधारणा और लगभग सौ शुरुआती पहेलियों जिनसे यह ब्लॉग निगाह में आया- मैं केवल इसलिए इससे जुडा रहा क्योकि आम आदमी तक विज्ञान संचार मेरे अस्थि -मज्जा में समाहित है . इसकी आरंभिक पहेलियों के जरिये ब्लागरों में विज्ञान में अभिरूचि जगाने का बीड़ा मैंने उठाया था -यहाँ यहाँ यहाँ और अनेक पोस्टों में यह इतिहास दर्ज है .
सर्प संसार में आज भी साँपों से जुड़े अपने फर्स्ट हैण्ड अनुभवों को निरंतर साझा करता रहता हूँ . मेरे करीब के लोग जानते हैं कि सापों में मेरी बहुत रूचि है .लोगों को याद होगा एक ब्लॉग भारतीय भुजंग था जिसकी माडरेटर लवली कुमारी हुआ करती थीं मगर उन्होंने पता नहीं किस रुष्टता से यह ब्लॉग बंद कर दिया और मेरे कितनी ही पोस्टें पब्लिक डोमेन से हट गयीं। मैंने उसे अनुरोध भी किया कि मुझसे व्यक्तिगत रुष्टता की सजा आप पाठकों को क्यों दे रही हैं -यह तो अन्याय है पर उन्होंने मेरी एक न सुनी और ब्लॉग ही बंद कर दिया . मैं अंततः  व्यक्ति को महत्वपूर्ण नहीं मानता उसके काम को प्राथमिकता देता हूँ . अब भारतीय भुजंग से मेरी छुट्टी के बाद मुझे शिद्दत से महसूस हुआ कि मेरे वे पाठक बिचारे जो भारतीय भुजंग से जुड़े थे और कितनों के मेरे पास फोन तक आते थे उनके लिए कुछ किया जाना चाहिए .अब चूंकि मैं अन्य तमाम कामों में उलझा रहता हूँ और मेरी दूसरी आदत है लोगों को विज्ञान लेखन में प्रोत्साहित करते रहने का मैंने जाकिर जी से यह अनुरोध किया और इस तरह सर्प संसार अस्तित्व में आया .
खुशदीप जी की ही दूसरी पोस्ट से मुझे बाब्स के लिए हिन्दी की श्रेणियों में चयनित ब्लागों की जानकारी हुयी तो मुझे आश्चर्यमिश्रित आह्लाद हुआ कि अच्छे कार्य कभी न कभी पहचाने जरुर जाते हैं . मैंने तुरंत फोन पर जाकिर जी को बधाई दी , मगर उसके बाद की घटी घटनाएँ मुझे पीड़ित कर गयीं और ऐसे अनुभव मेरे साथ होते ही रहे हैं अनगनित . सो मुझमें इम्युनिटी आ  गयी हैं -हुआ यह कि जाकिर जी के सौजन्य से लखनऊ के अखबारों में जाकिर जी के फोटो सहित यह समाचार छापे  गए कि उनके दो ब्लागों को बाब्स  पुरस्कारों के लिए चुन लिया गया है -आदि आदि , मुझे धक्का लगा -दोनों ही सामूहिक ब्लॉग हैं और ईमानदारी तो सभ्य/अकादमिक जगत में बरती ही जानी चाहिए -खबर तब भी बनती और डॉ जाकिर अली 'रजनीश'  का सम्मान भी कुछ कम न होता . वैसे भी ब्लॉग के माडरेटर वहीं हैं -बान जाने का उनका ही हक़ है और वे जायेगें भी .सर्प संसार के लिए भी यद्यपि उन्होंने मुझे जाने का आग्रह किया है मगर मैं तो उन्हें ही अधिकृत करता . मगर यहाँ जाकिर भाई से मानव स्वभावगत चूक हुयी। और उसी दिन मैंने अपने स्वभावगत मजबूरी से इस पुरस्कार अभियान से  खुद को तटस्थ कर लिया . मुझे हमेशा आगे देखने की आदत है.
मगर इस मुद्दे पर  फुरसतिया महराज मुझे  कोंचते जा रहे हैं और पोस्ट दर पोस्ट लिखते जा रहे हैं .अजीब सा गलचौर सा माहौल बन रहा है। लाबीयिंग चगल रही है .और तस्लीम तथा नारी को एक दूसरे के नाकारात्मक वोट (नेगेटिव वोटिंग ) मिल रहे हैं -मतलब जिसे नारी (कृपया पढ़ें सुश्री रचना सिंह ) अन्यान्य कारणों से पसंद नहीं है वो तस्लीम को वोट कर रहा है और जिसे तस्लीम(कृपया पढ़ें डॉ जाकिर अली 'रजनीश' ) पसंद नहीं वह नारी को वोट दे रहा है .खेमेबाजी प्रत्यक्ष हो गयी है. काश ये ब्लॉग सकारात्मक वोट ही हासिल करते और इतने खराब भी नहीं हैं  . इस खेमेबाजी के चलते मोर्चाये हुए लिंक भी उभर आये या उधिरा गए हैं जो चिटठा चर्चा की नवीनतम पोस्ट पर देखे जा सकते हैं .
 अब जबकि मैं तटस्थता से निकल आया हूँ तो यह स्पष्ट कर दूं (ताकि कोई मुगालता किसी को न रहे) कि सबसे अच्छे नामंकित हिन्दी ब्लॉग  में मैं तस्लीम को और मोस्ट क्रिएटिव ब्लॉग में सर्प संसार को और निजी ब्लागों में दुधवा लाईव को समर्थन कर रहा हूँ और मित्रों से इन्हें वोट करने की अपील करता हूँ!
अंत में निष्कर्षतः मैं यह अवश्य कहता हूँ कि डोयिचे वेले के बाब्स पुरस्कार के आयोजक धन्यवाद के पात्र हैं और मैं उनका व्यक्तिगत रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने हिन्दी को एक मौका दिया है , उनकी प्रक्रिया में सायास कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं की गयी है -मुझे खुशदीप जी  के इस कथन पर हैरत है कि ये पुरस्कार फिक्स्ड हैं . हाँ एक आदमी अगले चौबीस घंटों में दुबारा वोट कर सकता है और अपनी कई आई डी से कर सकता है यह उचित नहीं है -यह तो फिर थोक के भाव में लोगों से वोट कराने का मामला बन जाता है . मगर यही प्रक्रिया तो और भी भाषाओं के साथ है ! मैं जूरी से अपील करता हूँ कि हिन्दी वालों की हाय हाय से विचलित हुए बिना वे अपने निर्णय को अंजाम देगें!

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

एक अपील!

सदाबहार खुशदीप जी की इस पोस्ट ने मेरा ध्यान सहसा आकर्षित किया जिसमें जर्मनी के प्रसिद्ध रेडियो प्रसारण प्रतिष्ठान डॉयचे वेले (Deutsche  Welle)  द्वारा दिए जाने वाले हिन्दी ब्लागों के नामांकन में तस्लीम और सर्प संसार का उल्लेख था . गहरे संतोष हुआ कि मौलिक विचार और श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जाते .
यद्यपि मुझे चयन का मौका मिला होता तो इन दोनों ब्लागों के बजाय मैं और कहीं ढूंढता भटकता फिरता
और घर में छोरा नगर में ढिंढोरा की कहावत चरितार्थ करता . इसलिए ऐसे निष्पक्ष चयन पर एक तो पहले
विश्वास ही नहीं हुआ मगर आँखें मल मल कर देखा खबर सोलहो आने सच थी . तुरंत 'रजनीश' को बधाई दी।
खबर सुनकर वे आह्लादित हुए उनका मनोबल भी हाई हो गया . 
 तनिक देखिये दोयिचे वेली की जूरी ने  इन दोनों ब्लागों के बारे में  क्या राय जाहिर की है -तस्लीम के बारे में यह प्रतिष्ठित प्रसारण संस्थान लिखता है कि  -
"TSALIM is a science blog/website run by several scientists trying to promote interest in science through their various blog projects." ( तस्लीम एक वैज्ञानिक ब्लॉग/वेबसाईट  है जो अनेक वैज्ञानिकों द्वारा संचालित है और अपने कई ब्लॉग परियोजनाओं के जरिये लोगों में विज्ञान के प्रति अभिरुचि को बढ़ावा दे रही है "
सर्प संसार के बारे में दोयिचे वेली की यह टिप्पणी है -
"A website full of information about snakes made for a country where superstitions about the reptiles abound. World of Snakes works to demystify snakes and do away with irrational beliefs by confronting them with hard, scientific facts. Facts like: no matter what impression Bollywood might try to make, humans cannot turn into snakes and snakes cannot turn into humans."
(एक वेबसाईट जो सापों के बारे में जानकारियों से परिपूर्ण है और ऐसे देश के लिए है जहाँ सरीसृपों के बारे में अंधविश्वासों की भरमार है। सर्प संसार सापों से जुड़े रहस्यों का अनावरण करता है और लोगों में व्याप्त अतार्किक विश्वासों को वैज्ञानिक  तथ्यों के जरिये दूर करता है -ऐसे तथ्य जो भले ही  बालीवुड पर कोई प्रभाव न छोड़ें -  मनुष्य  सांप में और  सांप  मनुष्य में भला कैसे तब्दील हो सकते हैं?
तस्लीम(टीम फॉर साईंटिफिक अवेयरनेस ओन लोकल इश्यूज इन इंडियन मासेज )और सर्पसंसार दोनों मेरे मानस पुत्र हैं-विचार और नामकरण सहित,हाँ अग्रेतर संचालन और प्रबंध जाकिर अली 'रजनीश' जी ने बखूबी संभाला है और वे एक जिम्मेदारी के रूप में  जन विज्ञान संचार के इस मुहिम का निर्वाह कर रहे हैं .यद्यपि दोनों सामूहिक ब्लॉग हैं और मैंने  रचनात्मक योगदान भी दोनों ब्लागों के लिए  किया है मगर सक्रिय  माडरेटर जाकिर जी ही हैं! तस्लीम से कुछ वैचारिक असहमति के चलते मैं अलग हो गया हूँ -तथापि दोनों ब्लॉग मेरे मानस पुत्र हैं -और पुत्र तो मनुष्य की आत्मा का ही प्रतिरूप होता है -आत्मा  वै जायते पुत्रः !
 अंग्रेजी में एक कहावत है न, लेबर नेवर गोज बिहाईंड -सो एक श्रम सार्थक होता दिखाई दे रहा है मगर बिना आपके सहयोग के यह मुकाम तक नहीं पहुंचेगा .यह अपील आपसे है और यह दस्तूर  भी है कि मित्रों की मदद मौके दर मौके माँगी जाय . 
 मित्रों अपने मानस पुत्रों के लिए आपसे सहयोग मांग रहा हूँ -आप अपना वोट इन दोनों ब्लागों के लिए जरुर करिए . वोट कैसे करना है इस बारे में कोई असमंजस हो तो यहाँ जाकर समझ लीजिये -फिर देर काहें कि मित्रता निभाने का वक्त आ पहुंचा है और हम पहली बार आपसे कुछ मांग रहे हैं!

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

कौन सा भारत,किसका भारत?


बलात्कार भारत में नहीं इण्डिया में होते हैं भागवत  के इस बयान ने  एक बार फिर इंडिया दैट इज  भारत के निहितार्थों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया . यहाँ मैं बलात्कार कहाँ होते हैं इस विषय का विवेचन करने नहीं जा रहा हूँ बल्कि कुछ बातें आपसे इस विषय पर साझा करना चाहता हूँ कि यह भारत बनाम इण्डिया का मामला है क्या?बात भारत और इण्डिया की ही नहीं हिन्दुस्तान की भी है . मतलब देश एक नाम तीन तीन .गोली एक आदमी तीन की तर्ज पर . मगर निशाना कहाँ है? एक देश के तीन तीन  नाम  क्यों हैं .  क्या ऐसा विश्व के किसी और देश के बारे में भी है -फिर भारत ही के साथ ऐसी विडंबना क्यों?  
हमारे संविधान निर्माण करने वाले महानुभावों ने भी इस बिंदु पर विचार न किया हो ऐसा कैसे कहा जा सकता है? आखिर वे विद्वान ,अच्छे खासे पढ़े लोग थे. बहरहाल यह सामान्य सी बात तो हम सभी को पता ही है कि भारतीय सभ्यता मूलतः सिन्धु नदी की सभ्यता है जिसकी कभी सात सहायक नदियाँ हुआ करती थीं और नाम था सप्तसिन्धु -यहीं सिन्धु घाटी की प्राचीनतम सभ्यता पनपी मगर दुर्भाग्य से कुछ पुरात्तात्विक अवशेषों के अलावा इस सभ्यता के बारे में हमारी जानकारी बहुत सीमित है। जैसे कौन थे सैन्धव? क्या वे द्रविण-भारत के मूल वासी  थे? अनार्य थे ? आदि आदि .यह पूरी की पूरी सभ्यता का  नामों निशाँ तक मिट गया और आर्य भारत में स्थापित हो गए . मगर वे भी सिन्धु के आँचल में ही आबाद हुए.पारसियों और आर्यों के  चोली दामन के साथ के तमाम अंतर्साक्ष्य मौजूद हैं -इरानी आदि ग्रन्थ अवेस्ता और आर्यों के ऋग्वेद में अद्भुत साम्य है। अब इरानी जुबान में 'स' का उच्चारण 'ह; है तो आर्यों के समय से ही सिन्धु नदी के किनारे बसने वाले हिन्दू कहलाये और इसी आधार पर यह देश हिन्दुस्तान कहलाया . पहले यह एक भौगोलिक नामकरण था -कालांतर में आर्यों के विस्तार से यह सांस्कृतिक भी बना -हम हिन्दुस्तान के वासी हुए आज भी चाहे हमारा धर्म ,पूजा पद्धतियाँ कुछ भी हों -हिन्दू ,मुस्लिम, सिख ,ईसाई, पारसी सभी हिन्दुस्तानी हुए या कुछ और छूट ले लें तो ये सभी भौगोलिक लिहाज से हिन्दू हैं !
यूनानियों ने सिंधु / हिन्दु (Hindu) से एच हटाया और नदी का नया नामकरण दे दिया इंडोस (indos) -लैटिन में इंडोस बन गया इंडस (Indus) और यूरोपीय लोगों ने इस नदीय सभ्यता के लोगों के  देश का नया नामकरण कर डाला -इंडिया! और यह शेष दुनिया में ऐसा चल पडा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भी इसी नाम को प्राथमिकता दे दी . मगर सबसे बड़ी पहेली -भारत की पहेली तो आज भी बरकरार ही है? इस देश का नाम भारत क्यों पड़ा?आज के ज्यादातर  बच्चे हो सकता है इसका जवाब न दे सकें मगर हमारी पीढी के लोग दन  से कहेगें कि शकुंतला -दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत/भारतवर्ष पड़ा . मगर यह सही नहीं है . 
दुष्यंत शकुंतला का काल ऋग्वेद के बहुत बाद का  है। और ऋग्वेद में 'भरतों' का बहुत बार उल्लेख है!  दरअसल मनु के वंश में एक प्रतापी राजा भरत हुआ है -मत्स्य पुराण में उल्लेख है -'मनुर्भरत उच्यते' -मनु को ही भरत की संज्ञा दी गयी है . यह कहा गया -'वर्ष तत भारतं स्मृतं' अर्थात मनु से ही भारत नाम आया है . दरअसल ऋग्वेद में जो 'भरताः' नाम  आया है वह मनु के वंशज का है न कि दुष्यंत के बेटे भरत का . आर्यों की दो शाखाएं हैं सूर्यवंशी आर्य और चन्द्र वंशी आर्य .वे भरत जिनके नाम  पर इस देश का नामकरण हुआ उनका सम्बन्ध सूर्यवंशी आर्यों से है न कि चंद्रवंशी आर्यों से ...दुष्यंत चंद्रवंशी आर्य हैं .मजे की बात यह भी है कि राम के भाई भरत भी हैं मगर उनके नाम पर भारत का नाम पड़ा यह भी कहीं उल्लिखित नहीं है। आशा है यह पहेली अब कुछ सुलझी होगी या और उलझ गयी ? :-) 
  

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

शंख बोली बलाय टली ...

दिल्ली की घटना ने सहसा इतना दुःख संतप्त और दिमाग को कुंद कर रखा था कि कुछ लिखने पढने का मन ही नहीं हुआ -ज्यादातर वक्त टीवी देखते गुजरा ,जिसने मन को निरंतर और भी विक्षुब्ध किया। मानवता को शर्मसार करते  एक घिनौने जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी न लेकर उसके विरोध में सहज ही सड़कों पर उतर आये छात्र छात्राओं और अभिभावकों पर पुलिस का निर्मम बल प्रयोग दिल को सालता रहा . अब आशा बंधी है कि यौन अत्याचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में कुछ ठोस कार्यवाही हो सकेगी .और इस सोच ने मुझे और भी प्रफुल्लता से शंख ध्वनि के लिए प्रेरित किया . मैं प्रति दिन गीता के पांच श्लोकों के पाठ पूरा होने पर शंखनाद करता हूँ। कुछ एक अनुष्ठान की पारम्परिक प्रक्रिया के  तहत तो कुछ फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए .
शंख एक अद्भुत आदि -नैसर्गिक वाद्य यंत्र है . आप सभी जानते ही हैं कि यह वस्तुतः बिना रीढ़ के मोलस्क संघ   का समुद्री प्राणी है जो  इस मजबूत खोल में अपनी रक्षा करता है . हिन्द महासागर में पाया जाने वाला शंख - टरबिनेला पायिरम( Turbinella pyrum )  धार्मिक अनुष्ठानों का शंख है .

शंख वादन को  आदि मानवों ने शुरू किया होगा -अपने आस पास के घने जगंलों से खतरनाक पशुओं को दूर रखने के लिए . आग और शंख ध्वनि ही उन प्राचीनतम उपायों में रहे होंगें जिनसे आदि मानवों ने हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा की होगी -बाद में कई दूर तक मार करने वाले अश्त्र शस्त्र -धनुष ,भाले बरछे भी ईजाद  हुए होंगें . कह सकते हैं मनुष्य की आत्मरक्षा में शंख का योगदान प्राचीनतम है। मनुष्य की कल्पनाशीलता और कला प्रियता ने शंख के कई और भी उपयोग कालांतर में ढूंढ निकाले। धर्मयुद्धों के पूर्व शंखनाद की एक परिपाटी ही बन गयी . भारत वर्ष के सबसे बड़े युद्ध महाभारत की शुरुआत ही महा शंखनाद से हुयी -पांचजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय : पौंनड्रम   दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः मतलब श्रीकृष्ण ने पांचजन्य ,अर्जुन ने देवदत्त ,भीमसेन ने पौण्ड्र नामके शंख बजाकर धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी . फिर तो शंखों के नाद की एक श्रृखला ही शुरू हो गयी ...युधिष्ठिर ने अनंत विजय और नकुल सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामके शंख बनाए -फिर तो अनेक योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजकर तुमुल घोष किये।
शंखनाद! 

कालान्तर  में यजमानी वाले पुरोहित  पंडितों ने इसे अपना कुल वाद्य यंत्र ही बना लिया और हर कथा वार्ता के अंत में शंखनाद करना आरम्भ किया . सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय की सम्पूर्ति पर शंख बजाने का चलन है . हमारे कुल पुरोहित  पंडित जी के पास एक पुश्तैनी शंख हैं,वह कई पीढ़ियों से उनके  पास है .  सत्यनारायण संतोषी माँ सरीखे काफी बाद के अन्वेषित देवता है और विष्णु   के स्वरुप लगते हैं .विष्णु  को शंख बहुत प्रिय है . उनके एक हाथ में शंख है -सशंख चक्रम  सक्रीट  कुण्डलं... हमलोग शंख की आवाज सुनकर  बचपन में भोग- प्रसाद और चरणामृत लेने पूजा स्थल पर पहुँच जाते थे , लोकजीवन में शंखनाद शुभ, कुशल क्षेम के आगत  का प्रतीक है . राबर्ट्सगंज के मेरे नए पड़ोसी 90 वर्षीय वृद्ध मेरे शंख बजने पर खुश होकर बोल पड़ते हैं -शंख बोली बलाय टली ...

मैंने भारत के समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों जैसे रामेश्वरम ,कन्याकुमारी,पुरी अदि की यात्रा पर वहां से शंख खरीदे हैं और पंडितों को शंख -दान किये हैं जिन्हें उन्होंने प्रफुल्लित होकर स्वीकार किया है . शंख केरल का राज्य प्रतीक चिह्न ऐसे ही नहीं बनाया गया है . भारत में अब फिर से एक बार तुमुल शंखनाद आरम्भ हो गया है -निहितार्थ आप सुधीजन समझ ही रहे होंगें -इसी तुमुल नाद में एक कोमल स्वर मेरा भी है!  

शुक्रवार, 18 मई 2012

शूर्पणखा:एक शोध!


अब कैसे कैसे शोध के विषय भी हिन्दी की प्राध्यापिकाएं चयनित करती हैं -इसका उदाहरण मुझे एक उच्च महिला विद्यालय में जाने पर दिखा -एक कथित रूप से माडर्न हिन्दी प्राध्यापिका ने अपनी पी एच डी में पंजीकृत छात्र को एक अद्भुत विषय दे रखा था ."शूर्पणखा के व्यवहार एवं उसके अधिकारों का एक समाजशास्त्रीय विवेचन " ...हद है ....मैंने सोचा अजीब खब्ती टीचर है ....अपनी स्टूडेंट का पूरा जीवन चौपट करने वाली है ..मैंने थोडा हस्तक्षेप करना चाहा ...यह कैसा विषय है? जवाब था कि जब कैकेयी पर काव्य लिखा जा सकता है तो शूर्पणखा पर क्यों नहीं? मैं बहस में नहीं पड़ना चाहता था ....मगर इतना कह ही गया कि एक घिनौनी, बदसूरत,बेडौल, बेहद हिंस्र प्रवृत्ति की राक्षसी पर हिन्दी शोध से अगर हिन्दी का कुछ भला होने वाला हो तो जरुर करिए ....
"मेरी माँ ने त्रिजटा पर शोध किया था" ..वे बेसाख्ता बोल पडीं -हूँ तो यह मामला खानदानी था ....तो हिन्दी की रोटी तोड़ने का काम यहाँ पुश्तैनी था ..कितनी भाग्यहीना है बिचारी हिन्दी कैसे कैसों को झेलती आयी है :( 


फिर वे तफसील से बताने लगीं ...देखिये शूर्पणखा एक आजाद ख्यालों वाली बम्बाट नारी थी ....अपने विचार बिंदास प्रगट कर सकती थी ....और चेहरे से क्या होता है ...माना वह बड़ी ही बदसूरत थी ,सच कहें तो घिनौनी थी, मगर दिल की स्वतंत्र और साफ़ थी .."ओहो तभी तो सीता जी को कच्चा चबाने को वह उद्यत हो गयी थी .. ?" मैंने हठात रोका ...मगर वे जारी रहीं ....अब क्या करती वह ,राम उसे बरगला क्यों रहे थे ..वह एक आजाद ख्याल वाली नारी थी ..लेकिन राम ने उसे रिजेक्ट कर दिया ...और फिर लक्ष्मण ने उसे रिजेक्ट कर दिया ..भाई साहब आप ही बताईये कुछ ही पलों में दो दो रिजेक्शन भला कोई कैसे बर्दाश्त कर सकता है ...."हूँ यह तो है" ..मैं अब मैदान छोड़ने की मनोदशा पर आ गया था ....वैसे भी इस तरह के उत्साही ऊर्जित नारीवादियों से मुझे डर लगती आयी है ..कब किसी को क्या न कह दे ..कब किसी का चरित्र चौराहे पर नीलाम कर दें -इनका क्या भरोसा -अब इन्हें तो रिजेक्शन की पीड़ा आजीवन सताए रहती है शूर्पणखा की भांति.. इन्हें तो सारी दुनिया ही वैसी दिखती है ...मैंने भी पीछा छुड़ाते हुए कहा कि आप रिसर्च विसर्च तो कराईये मगर एक बात अच्छी नहीं लगी आपने मुझे भाई साहब जो कहा ..मैं दुनिया के हर किसी का भाई बनने का माद्दा नहीं रखता और न ही ऐसी कोई सदाशयता पालता हूँ ..मित्रों का चयन बहुत ढूंढ ढाढ के करता हूँ लाखो में एक ....वे भले छोड़ जायं, मैं कभी किसी को नहीं छोड़ता ....वे हतप्रभ होकर मुझे देखने लगीं और मैं वापस चल पड़ा ..

कई खयालात मन में उभर रहे हैं ....कैसे कैसे शोध के विषय लिए जा रहे हैं ..इसलिए ही तो शोध का स्तर दिन ब दिन गिरता जा रहा है .मैं यह भी मानता हूँ कि शूर्पणखा शायद कोई व्यक्ति भर ही नहीं प्रवृत्ति की परिचायक थी जो आज भी धड़ल्ले से सीना ताने समाज में घूम रही है ...लाख लाख रिजेक्ट हुयी ,अपमानित हुयी ,शील भंग हुआ मगर फिर भी वह नित नए राम की तलाश में दर दर भटक रही है .इस आस में शायद किसी युग में राम अथवा उनके सलोने गौरवर्णी भ्राता उसका उद्धार कर जायं ..मगर आप ही बताईये क्या राम कभी शूर्पणखा का उद्धार करने की सोच भी सकते हैं ..अहल्या तर गयीं ....मगर शूर्पणखा के पाप उसे कभी नहीं तरने देगें ........वह राम की त्याज्य है!

शनिवार, 5 मई 2012

मुए 'फीड' ने बड़ा दुःख दीना


विगत दिनों से एक अजीब से असमंजस और उहापोह की स्थिति में रहा -एक तकनीकी समस्या ने दुखी कर दिया .हुआ यह कि मैंने वक्ष सुदर्शनाओं वाली विगत पोस्ट के बाद एक हलके हास्य की पोस्ट लंगोट महात्म्य पर भी लिखी थी ,मगर वह प्रकाशित होने के कई घंटों बाद भी जब संकलको पर नहीं दिखी तो यह असहज सा लगा .मैंने अपने ब्लॉगर सेटिंग में जाकर जब फीड बर्नर में उसकी स्थति चेक की तो पता चला वह अपडेट ही नहीं हुयी है -फीड अपडेट न होने के बारे में एच टी एम ल का कोई दोष बताया गया.मैंने लाख कोशिश की मगर कोई फायदा नहीं हुयी ..बहुत कुछ पढ़ा,देखा सुना समझा मगर नतीजा सिफर ...कारण यह है कि मैं खुद कम्प्यूटर की भाषा से बेखबर हूँ -एच टी एम एल पल्ले नहीं पड़ता ...ब्लॉग लिखने और ई मेल पढ़ लिख लेने भर का अर्थ यह नहीं है कि हम  कम्यूटर को भी साध सकते हैं...हलांकि कम्प्यूटर तकनीक विशेषज्ञ तमाम यूजर फ्रेंडली अप्लिकेशन्स मुझ जैसे कम्प्यूटर अज्ञानी के लिए आये दिन जारी कर रहे हैं मगर फिर भी बिना बेसिक्स की समझ के हम कई सामान्य सी समस्याओं को हल नहीं कर सकते ....गूगल का फीड बर्नर बार बार फीड को वैलीडेट करने का आप्शन सुझाता मगर जब मैं जब यह करता तो तो इस अप्लिकेशन का जवाब होता कि एच टी ऍम एल की गड़बड़ी दुरुस्त किये बिना फीड अपडेट नहीं हो सकती ..और मामला यहाँ तक आकर टाय टाय फिस हो जाता ..

मैं इसी असहजता और खुद पर खीजने में समय जाया कर रहा था कि ब्लॉग जगत के केतु संतोष त्रिवेदी जी का उलाहना ..."ये लंगोट वन्गोट  जैसी पोस्ट न डाला करो -कोई पढ़ नहीं रहा है ..ऐसे विषयों पर किसी की रूचि नहीं .." जबकि पहला कमेन्ट ब्लॉग जगत -दिग्गज अनूप शुक्ल जी कर चुके थे जो एक सेलेक्टिव पाठक हैं ..जाहिर है बात कुछ और थी ...और मैं यह पहले तो आत्मग्लानि में ही डूब गया कि देखो इस ब्लॉग की भी क्या गति दुर्गति हो गयी ..पाठकों ने अस्वीकार कर दिया ब्लॉग को ....फिर सोचता, हो सकता है लोग विषय को देखकर टिप्पणी  देने से बंच रहे हो और फिर टिप्पणी से पोस्ट की गुणवत्ता का कोई लेना देना नहीं है -ऐसा ब्लॉग विद्वान गण सिद्ध कर चुके हैं मगर टीस तो उभर ही रही थी और फिर संतोष जी का गर्वोन्मक्त उदगार कि ऐसे  विषयों पर न लिखो --सारे जहाँ में खुद को इस नाचीज का चेला कहते फिरते हैं मगर यहाँ कान काटने को उद्यत दिखे... क्या समय आ गया है अब चेले ही गुरु का अंगूठा क्या हर अंग प्रत्यंग काट डालने पर उतारू हैं....समय और जरुरत के मुताबिक़:) 

किस्सा कोताह यह कि मुझे मन मसोस कर रहना पड़ा ..कुछ ने सुझाया कि लाल बुझक्कड़ से सम्पर्क करो मामला सलटा लो ...मगर अब मुझे यह गंवारा नहीं ..गूगल दादा काफी है .इनसे मिला तो कहने लगे कि तुमने जरुर कहीं और से खासकर माईक्रोसाफ्ट वर्ड्स पर पोस्ट लिख कर फिर वहां से कट पेस्ट किया है ब्लॉगर बक्से में -अरे हाँ यही तो किया था मैंने ...अन्तर्यामी गूगल बाबा जान गए थे ...उन्होंने आगे के लिए चेताया कि ब्लॉगर पर पोस्ट सीधे वही लिखने से ये पोस्ट अपडेट की समस्या नहीं आती .मगर जब से मैंने ब्लॉगर सुविधाओं को अपडेट किया है मुझे हिन्दी लिप्यंतरण का आप्शन "अ''  दिखता ही नहीं ...तो कहीं से पोस्ट लिख कर वहां पेस्ट करना  पड़ता है ....अभी तो गूगल इंडिक ट्रांसलेशन से यह पोस्ट लिख रहा हूँ .....

मैंने थक हार कर आखिर समस्या की जड़ लंगोट को ही हटा दिया -यानी उस पोस्ट को जो इतना लहक कर मैंने लिखी थी ... मगर जो मेरे मित्र और सुधी पाठकों को दिखी तक नहीं उसकी बलि देनी पडी और यह कृत्य करके मैंने एक टेस्ट पोस्ट लिखी कि मित्रों मेरा ब्लॉग नए पोस्ट फीड अपडेट नहीं कर रहा है इसलिए यह टेस्ट पोस्ट डाल रहा हूँ ..और चमत्कार हो गया -मित्रों के कमेन्ट आने लगे कि पोस्ट दिख रही है -कलेजे का बोझ मानो उतर गया ....अंगरेजी कहावत याद आयी व्हेन गोइंग गेट्स टफ देन टफ गेट्स गोइंग ....

मेरी अपील है कि जानकार मित्र अपनी टिप्पणी में आर एस एस फीड और एटम  फीड के बारे में पाठकों को जरुर बताएं और हाँ वह लंगोट पोस्ट भी पोस्ट करेगें दुबारा मगर यहाँ तनिक मामला कंट्रोल में आ जाय तब ....

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

चिर यौवन और अमरता की हमारी ललक(पुराण कथाओं में झलकता है भविष्य-2)


धरती के जन्मे को एक न एक दिन मृत्यु का वरण करना ही है-इसलिए ही पृथ्वी को मृत्युलोक कहा गया है .मगर मृत्यु चाहता कौन है? कहते हैं जनमत मरत दुसह दुःख होई ...और यह भी कि मनुष्य की लोकेष्णायें ,चाहनायें उसे जीते रहने को प्रेरित करती रहती हैं . ग़ालिब साहब  देखिये क्या कह गए हैं -.गो हाथ को जुम्बिश नहीं, आँखों में तो दम है, रहने दो अभी सागरों-मीना मेरे आगे ...गरज यह कि यह जीने की तमन्ना आदमी को ठीक से मरने भी नहीं देती ...वह अमरता का सपना देखता रहता है - वह चिर यौवन का आनंद उठाना चाहता है .यह आज की नहीं हमारी आदिम सोच है . चिर यौवन और अमरता की हमारी ललक कई पुराण कहानियों में दिखाई देती है। अब समुद्र मंथन को ही लें- यहां से भी चौदह रत्नों में से एक अमृत कलश था जिसे देवताओं ने पिया और वे अजर-अमर हो गये। च्यवन ऋषि ने ऐसा माजूम बनाया और खाया कि वे फिर से युवा बन गये। संजीवनी बूटी की कथा भी अमरता से जुड़ी है। कहते हैं कि संजीवनी विद्या असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास थी... देवताओं ने एक कुचाल रच कर अपने गुरु बृहस्पति के पुत्र कच को यह विद्या सीखने शुक्राचार्य के पास भेजा।

अब कच असुरों के गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में रहकर संजीवनी विद्या सीखने लगा। मगर जल्दी ही असुर आश्रमवासियों को यह जानकारी प्राप्त हो गई और वह सब मिलकर कच का वध करके उसके शरीर के टुकड़े वन में ही विचरते एक भेड़िए को खिला दिए। शुक्राचार्य की बेटी देवयानी कच का बहुत ध्यान रखती थी। घर से गौए चराने के लिए कच के शाम बीत जाने के बाद भी न लौटने पर देवयानी को चिंता हुई। उसने पिता से अपनी चिंता व्यक्त की। शुक्राचार्य ने ध्यानस्थ होकर यह जान लिया गया कि राक्षसों ने कच को मारकर उसके अंगों को भेड़ियों को खिला दिया है। शुक्राचार्य ने उसी संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच जीवित हो उठा। मगर कुछ ही दिन में फिर असुरों ने मिलकर कच को मार डाला। यही नहीं मारने के बाद कच को जलाया गया और उसकी राख असुर गुरु शुक्राचार्य की मदिरा में ही मिला दी गई। अब बड़ी मुश्किल! कच का पुनर्जीवित होना अब दुष्कर कार्य था। देवयानी ने कहा कि वह बिना कच के जी नहीं सकती। शुक्राचार्य ने कच को पुकारा। भयभीत कच ने उनके पेट से ही अपनी दशा बताई। तब जाकर शुक्राचार्य ने कच को पूरी संजीवनी विद्या बताई जिसे पेट में ही सीखकर कच बाहर आ गया और फिर उसने उसी विद्या से शुक्राचार्य को जिला दिया।

अमरता की यह चाह आज भी मनुष्य को वैसे ही सालती रहती है। वैज्ञानिक आज भी प्रयोगशालाओं में ऐसे अनेक प्रयोगों में जुटे हैं जिनमें या तो मनुष्य की उम्र घटा देने की युक्ति है या फिर उसे अमरता के पास तक पहुंचा देने की ज़िद है। असाध्य रोगों से जूझ रहे मरीजों को क्रायोनिक कैप्सूलों में क़ैद कर लंबे समय तक उन्हें सस्पेंडेड एनिमेशन में रखने की जुगत तो जैसे बस कुछ वर्षों में ही सुलभ हो जाएगी। जब असाध्य रोगों का इलाज ढूंढ लिया जाएगा तब इन जिंदा लाशों को कैप्सूलों से आज़ाद कर उन्हें नया जीवन अदा कर दिया जाएगा। एक समुद्री जीव जेलीफिश की कोशिका का अध्ययन जारी है जो अमरता का वरदान पाए हुए है। जिस दिन उसकी कार्य पद्धति को वैज्ञानिक समझ जाएगें अमरता की कुंजी हमारे हाथ होगी। कुछ शोधार्थी गुणसूत्रों पर काम कर रहे हैं जिसमें एक हिस्सा टीलोमीयर उम्र बढ़ने के साथ ही घिसता जाता है। प्रयास यह है कि इस हिस्से को घिसने न दिया जाए और मनुष्य को चिर युवा बने रहने दिया जाए।

पुराणों की हमारी सोच आज विज्ञान की नई खोजों को दिशा दे रही है।

पुनश्च: मित्रों अब क्वचिदन्यतोपि की व्याप्ति नवभारत टाइम्स आनलाईन पर भी है!   

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

 ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो आज के वर्तमान में भी  वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की क्रमिकता/ऐतिहासिकता  का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमांचित  और आह्लादित होता हूँ...क्या नहीं है यहाँ -साहित्य की ज्ञात और नवोन्मेषित कितनी ही विधाएं यहाँ अपनी ओर ललचाती सी हैं ..कहानी है ,कविता है ,व्यंग है ,हास परिहास है ,संस्मरण है, आशय कि सचमुच क्या नहीं है यहाँ ..मगर यहाँ केवल लेखक बने रहने और पाठकों की प्रतीक्षा करते रहने से काम नहीं चलने वाला है ...यहाँ तो सभी लेखक हैं ...और वही पाठक भी हैं ...हाँ चेतना ,बौद्धिकता के विभिन्न स्तर जरुर हैं ..मगर खुद एक लेखक बने रहने और अपने को पढ़ाते रहने की ही प्रवृत्ति या अपेक्षा यहाँ नहीं चलने वाली ....
जैसे अपनी कविता तो कवि जी ने पकड़ पकड़ के अनेक हिकमतों  से ,प्यार मनुहार और चाय तक पिला के सुनाई  मगर जब मेरी सुननी हुई तो जनाब भाग खड़े हुए ..यहाँ यह आत्मकेंद्रिकता  की मानसिकता नहीं चलने वाली ..ऐसे कितने ही स्वनामधन्य और स्वयंभू यहाँ आये और चलते बने ...शायद वे ज्यादा ही आत्म गौरव के बोध से  त्रस्त थे-ब्लॉग जगत ने उन्हें रास्ता दिखा दिया ..रास्ता नापो भैया....बड़े साहित्यकार हो तो अपने घर के, यहाँ दाल नहीं गलने वाली ...मैं देखता हूँ कि कई ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरणों के बाद भी अभी भी कुछ लोग अपनी अहमन्यता से बाज नहीं आ रहे हैं ....वे चाहते तो हैं कि उनका ब्लॉग हाथो हाथ ले लिए जायं  ,उनकी हर पोस्ट पर पाठकों की इतनी भीड़ आ जुटे कि शीशी चटखने वाला मुहावरा चरितार्थ हो जाय  मगर कभी खुद किसी के यहाँ  नहीं तशरीफ़ रखेगें ....हम भी आखिर कब तक वहां जाने की सदाशयता दिखाते रहेगें.. विनम्रता ,औदार्य ,शालीनता की आखिर कोई सीमा भी तो है या नहीं?
अब लोगों को कौन समझाए भैया ब्लॉग लेखन एक दुतरफा संवाद का माध्यम है ,यहाँ महज अपनी ढपली अपना राग नहीं चलने वाला ....यहाँ का सरोकार है दूसरे के कहे को भी सुनना,समझना और भागीदार बनना  ..उनके  यहाँ आते जाते रहना ...फिर अपनी भी कहना ...लेकिन मगरूर लोगों को कौन समझाए ....खुद को अर्श पर होने और बाकी को फर्श पर पड़े होने की समझ से भी ब्लॉगजगत जूझता रहा है ..अच्छी बात है कि ऐसे कई सारे तो किनारे को आ गए हैं..कुछ घोषित करके विनम्रता या बेहयाई से तो कुछ   अपनी औकात और सीमाओं को समझ बिना घोषित, बिना गीत गवनई के चुपचाप चलते बने  .....मतलब बिना बताये ही टंकी पर चढ़ अपने ब्लागीय जीवन का उत्सर्ग कर लिया ....इस अर्थ में ब्लॉग लेखन केवल "बड़कवा" लेखक बने रहने की आत्ममुग्धता नहीं है ,यह एक सामजिक  सरोकार का  संवाद मंच भी है ....डायरी लिखनी है तो तोप ढक के रखिये न यहाँ काहें उघारे फिरते हैं ?  सही है ब्लागजगत में कोई फन्ने खा नहीं है ....साधारण बनने और जुड़ने की तमन्ना हो तो ठहरिये वर्ना अपना बोरिया बिस्तर अच्छा हो खुद उठा के पतली गली से निकल लीजिये नहीं तो बाद में कहीं यह न कहना सुनना पड़े ..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले ...
एक जमाना हुआ करता था हमें भी अपने एक बड़े लेखक होने का गुमान था ..बिना दमड़ी लिए लिखते न थे....एक अजब सा गुमान,बेखुदी  और मदहोशी तारी थी ....लोग अब किताबें लिखने ,छपने की चर्चा करते हैं यहाँ तो मुझे उन पर दया आती है ..भैया इस गुमान में न रहियो यहाँ ....हमने तो यह रहस्य पहले ही भांप लिया था और तभी बिना दमड़ी की अपेक्षा के यहाँ झख मार रहे हैं .. जो चीज है यहाँ वो कहीं पे नहीं ....तो यहाँ रुकने लिखने आपके विचार जानने,यथा संभव लोगों के यहाँ पहुँचते रहने की ,संवाद बनाए रखने की मेरी कोशिश ही रहती है ....बाकी कुछ रूठे हुए लोग भी है उनके प्रति भी मन में कभी कभी प्यार सा उमड़ा आता है मगर वे खुद उस उमड़ते प्यार को रोपने कटोरा लेकर नहीं आते तो वह व्यर्थ ही बह जाता है .. :) 
 हमने लेखन से बहुत कमाया है रोजी रोटी चल सकने लायक नहीं (उसके लिए एक अदद नौकरी तो है ही) ..मगर बहुत कम भी नहीं ..इस अर्थ में कि जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान..इस ब्लॉग लेखन की अपार्च्यूनिटी कास्ट बताऊँ तो आप निरा बावरा समझेगें मुझे ....इस ब्लॉग जीवन में दो पुस्तकों को लिखने की पेशगी ठुकरा चुका हूँ ..अब ब्लॉग जीवन से फुरसत तो मिले.... है न यह पागलपन? मगर मुझे तो जो ब्रह्मानंद की प्राप्ति यहाँ होती है वह कहीं नहीं ...खुद को अभिव्यक्त करने की ही नहीं दूसरों को पढने और वहां उनके संवाद में भागीदार होने में ...यह घनानंद तो कभी कभी शब्दों में व्यक्त होने की सीमा के बहुत बाहर हो रहता है .....
तो जनाब लुब्बे लुआब यह कि यहाँ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका .....क्या समझे?  नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :) 
नोट: यह पोस्ट लिखी  जिस भी जेंडर में हो इसे कामन जेंडर में समझा जाय ! 

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

फूली फूली चुन लिए काल्हि हमारी बार ....एक नए सदर्भ में ...!

वैसे तो अंगरेजी भाषा की  क्रिया -"टू वेजिटेट'' एक निष्फल सी, झाड झंखाड़ सी उगती जाती ज़िंदगी की  ओर इशारा करती है मगर एक आम जुझारू ज़िंदगी के साथ भी बहुत से खर पतवार किस्म की चीजें इकठ्ठा होती चलती  हैं , वे इसलिए और भी इकठ्ठा होती जाती हैं कि उनके प्रति हम एक आसक्ति भाव लिए रहते हैं ...जबकि कुदरत का एक 'जीवनीय' सूत्र हमें हमेशा अनेक माध्यमों से सन्देश देता रहता है कि बहुत कुछ पुराने धुराने को हमें टिकाते भी रहना चाहिए ....इसलिए कि 'पुराणमित्येव न साधु सर्वं' (यह पुराना है इसलिए श्रेष्ठ है यह बात हमेशा सही नहीं है)...प्रकृति में भी तो देखिये कई जीव जंतु तो अपने पुराने चोले को हर वर्ष त्यागते रहते हैं और त्यागकर और अधिक आकर्षक हो उठते हैं -सांप समुदाय इसमें निष्णात है ..पुरानी केंचुली उतारी नयी ओढ़ ली .....और भी कातिल सौन्दर्य हासिल कर लिया ....हमें कुदरत से बहुत बातों को सीखते रहना चाहिए खुद अपनी बेहतरी के लिए ...दत्तात्रेय नामके ऋषि ने तो इसलिए पशु पक्षियों को अपना गुरु मान लिया था ....इस पुरानी धुरानी चीजों की साफ़ सफाई को आप जानते ही हैं अंगरेजी में वीडिंग कहते हैं ...दीपावली के पूर्व घरों में वीडिंग अभियान जोरो शोरों से चलाया जाता है ..आफिसों में लाल फीतों में लिपटे कबाड़ को वीड करने के तरीकों पर तो बाकायदा शासनादेश हैं ....

मैं भी अपने साथ एक भरे पूरे उगते उस झाड झंखाड़ से आजिज आता जा रहा था जिससे कभी  मुझे बेहद लगाव था ..यह था मेरी चलती फिरती लाइब्रेरी का हर साल समृद्ध होता जाता हिस्सा जो पत्र  पत्रिकाओं का प्रतिनिधित्व करता रहा है .नौकरी के पहले और बाद के करीब तीन दशक का पत्रिका साहित्य उसमें जुड़ता गया  है, अनवरत बिना नागा के ..इनसे सबसे बड़ी मुसीबत तो पत्नी जी की ही रही है जो अनेक ट्रांसफरों के समय इनकी पैकिंग को लेकर जूझती और नए जगह पर इन 'फालतू चीजों' द्वारा घर के कई कोनों को कब्जियानें पर खीजतीं -मैं लाख मनाता कि आज मैं अदना सा ही सही जो कुछ भी हूँ और जो कुछ उनके हाथ में हर महीने लाकर रख देता हूँ इसमें इनका बड़ा योगदान रहा है,तब भी एक असहमति का भाव उनके चेहरे पर से हटने का नाम ही नहीं लेता..और मैं अपनी प्रिय पत्रिकाओं,जर्नलों से जुदा होने की कल्पना मात्र से सिहर उठता ..हो सकता है कि कोई अंक कभी ज्ञान पिपासा को शांत करने में काम आ ही जाय ...और मेरी रूचि भी पागलपन के हद तक  विज्ञान के प्रचार प्रसार की रही है ...साईब्लॉग,साईंस फिक्शन इन इण्डिया और साईंस ब्लागर्स असोशिएसन ब्लागों के लिए ही कभी इनमें से कोई काम न आ जायं!कोई पुराना संदर्भ खोजने में ही मददगार न बन जायं ...लिहाजा इन्हें इकट्ठा करता रहा ...  भले ही हमेशा एक बड़ी उधेड़बुन बनी रहती ...कारण वही, पत्नी जी की प्रबल असहमति भाव ..कई बार पूरी सख्ती से प्रतिरोध भी करना पडा है कि खबरदार इनमें से कभी भी कुछ भी रद्दी में बेचा गया तो खैर नहीं ...(अब कौन जाने समुद्र से कुछ बूंदे निकल ही  गयीं हों तो!) ...यह ऐसा  उहापोह रहा कि मैं लोगों से इस समस्या के निपटान के बारे में सत्परामर्श भी लेता रहा हूँ इन बीते सालों में ....

सबसे उपयोगी सलाह  मिली डॉ. मनोज पटैरिया जी से जो भारत सरकार में विज्ञान संचार के एक ऊंचे ओहदे पर हैं ..पिछले वर्ष दिल्ली प्रवास में उन्होंने मेरे बिना पूछे ही बता दिया था  कि उन्होंने ऐसे संग्रहीत साहित्य से बड़ी बेकदरी और निर्दयी भाव से नाता छुड़ा लिया है और यह निर्दयी भाव वहां तक जा पहुंचा जब उन्होने अपने  प्राईमरी तक की मार्कशीटें भी  रद्दी के हवाले कर दीं और उनकी स्पष्टवादिता तो देखिये (या बडप्पन!) कि उन्होंने यह भी तस्दीक कर दिया कि उस ढेर में मेरा पहला कहानी संग्रह 'एक और क्रौच वध' भी था ..मैं मानों पहाड़ से गिरा ......क्या मेरे कहानी संग्रह, वह भी पैलौठी के,  की यही नियति थी ....आँखे खुल गयीं मेरी ...तभी मैंने कुछ फैसले ले लिए थे ....फिर आज इन्टरनेट के ज़माने में  शायद यह  धरोहर कोई बहुत उपयोगी नहीं रह गयी है .ज्ञान का खजाना तो अब सामने ही है ....की बोर्ड पर उंगलियाँ फिराने की देर भर है ...
कुछ यूं हुयी रुखसती :(


 पहले तो मैंने सोचा कि यहाँ इस बारे में विज्ञापित कर दूं कि जिसे भी पिछले तीन दशकों के विज्ञान प्रगति,साईंस रिपोर्टर,टाइम ,रीडर्स  डाइजेस्ट, विज्ञान और सायिन्टिफिक अमेरिकन पत्रिकाएं चाहिए वो अपने हर्ज़े  खर्चे पर यहाँ से उठा ले  जाय मगर फिर सोचा कि अपनी बला किसी और पर डालना कहाँ की नैतिकता है? अब अपनी दीवानगी पढने के मामले में कुछ अलग टाईप की थी जो इलाहाबाद में पढाई और नौकरी के भी दौरान  कटरा की सकरी  सड़क के फुटपाथों पर सजी बिछी दुकानों से किताबी मोती चुगते रहते थे.... 

आखिर एक  अप्रिय फैसले को अमली रूप देने का दिन आ ही पहुंचा ..कल अपनी  ही दशकों  तक की  प्रिय पत्र पत्रिकाओं की रुखसती भरे मन से करनी पडी ...उनका भी वक्त एक दिन आना ही था ....उनके प्रति आसक्ति भाव  भावुकता कई बातों /लोगों पर भारी पड़  रही थी ..मालकिन ने बताया कि रद्दी एक कुंतल से कुछ ही अधिक थी ...किस मोल बेंचा उस अनमोल थाती को यह तो नहीं बताया और मुझे पूछने की हिम्मत भी नहीं है जो दिल पर गुज़र रहा  है मैं ही जानता  हूँ! दिल को दिलासा दे रहा हूँ कि अतिशय  संग्रह कोई भी अच्छा नहीं होता ...पैसे या किताब किसी का  भी...मगर मैं इन किताबों का क्या करूं जो शेल्फ से अभी अभी गुजरे जलजले को जैसे  बड़ी मायूसी से निहार रही थी...फूली फूली चुन लिए काल्हि  हमारी बार ....
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जनसत्ता में पुनर्प्रकाशन 

बुधवार, 27 जनवरी 2010

अगले कुछ दिन मेरे लिए मेरे लिए बहुत हेक्टिक होने वाले हैं!

आज से पॉँच दिनों के लिए लखनऊ निकल रहा हूँ -एक शुभ कार्य के लिए .जब यह पोस्ट प्रकाशित होगी मैं लखनऊ पहुँच चुका रहूँगा और लखनऊ के ब्लागरान के डिस्पोजल पर होऊंगा .अगले पॉँच दिन तो ब्लागिंग बंद ही रहेगी ....काम का बोझ जो रहेगा. हाँ एक दिन ब्लॉगर मीत भी जुटेगें ही शामे  अवध 'मीट' में ! संयोजन मित्र ज़ाकिर अली रजनीश करेगें !संभवतः ३० जनवरी को शामे अवध एक बार और गुलजार होगी..... ब्लागमय हो उठेगी.

मैं एक परियोजना जो मेरे मन  की उपज है पर भी अवध रिसर्च फाउन्डेशन से बात करूंगा -वह है राम वन गमन पथ पुनरुद्धार परियोजना .याद है ,अटल जी के समय में एक स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का सूत्रपात हुआ था जो आज भी प्रगति पर है .मगर मुझे इन  राजनयिकों की सूझ पर भी तरस  आता है कि ये इस धर्म प्राण देश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अपने चरित नायको की स्मृति में राम वन गमन पथ पुनरुद्धार जैसी परियोजना या फिर भव्य  राम पथ का निर्माण करने का संकल्प क्यों नहीं लेते . भारत का बच्चा बच्चा श्रीराम के लिए आज भी सब कुछ न्योछावर कर देगा ..वोट तो वोट एक ठोस काम भी हो जायेगा -अपने सांस्कृतिक धरोहरों का अनुरक्षण होगा सो अलग.  .

अभी युनिवेर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने एक ऐसी ही परियोजना पर अपनी मुहर लगाई है "ऐ स्टडी ऑफ़ ग्रोथ एंड डेवेलोपमेंट ऑफ़ रेलिजस टूरिज्म इन नार्थ इंडिया विथ स्पेशल रिफरेन्स टू प्लेसेज ऑफ़ रामायण " .यह अध्ययन डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय द्वारा इंस्टीच्यूट आफ टूरिज्म एंड होटल मनेजमेंट /डिपार्टमेंट के सहयोग से किया जायेगा .मेरा कहना है कि उसके उपरान्त राम पथ का सही निर्धारण  हो जाने के बाद एक भव्य पथ भी बने जो एक बार फिर उत्तर से  दक्षिण तक भारत का सांस्कृतिक सेत बन्धु बने और अपने एक गौरवमयी अतीत की याद दिलाये . इस पर विस्तार से फिर कभी मगर अभी तो इतना ही कि मेरे अगले  दिनों की दिनचर्या में यह मुद्दा भी शामिल होगा .

मंसूबे तो और भी बहुत हैं मगर कुछ के लिए मनाही जारी हो चुकी है गृह विभाग और ब्लोगर वर्ल्ड से भी ..तो उनकी चर्चा  भी क्या करना .अगले कुछ  दिन मेरे लिए मेरे लिए बहुत हेक्टिक होने वाले हैं .

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

मन का ट्रांसप्लांट!

न जाने क्यूं नए वर्ष की पूर्व संध्यां से मन  बहुत क्लांत ,खिन्न खिन्न सा है -बेबस, व्यग्र और अधीर सा -गुस्साया हुआ सब पर और खुद पर भी. सुबह ही अचानक एक ब्लॉग मित्र से चैट पर ही कह बैठा -मैं निजात चाहता हूँ इस बेहूदे मन से जो इन दिनों हर वक्त भुनभुनाया हुआ है परायों से ही नहीं अपनों से भी -क्या इसका ट्रांसप्लांट नहीं कराया  जा सकता ? मित्र भौचक! हा हा हा .दैया रे! अब क्या मन  का भी ट्रांसप्लांट होगा ?क्यूं  नहीं ? अगर मन  ऐसा सोच सकता है तो ऐसा हो भी सकता है. आखिर मैं सोचता  हूँ तो इसका मतलब ही  है कि मैं हूँ ,मेरा वजूद है. तो अगर मन ऐसा सोचता है कि उसका ट्रांसप्लांट हो सकता है तो क्यूं नहीं हो सकता -चलिए आज नहीं तो कल होगा और कल नहीं तो परसों होगा ,परसों नहीं तो नरसों..होगा जरूर -आखिर ययाति ने जब अपने बेटे से जवानी उधार ले ली और खूब जीभर कर जवानी जी भी ली तो यह भी  तो  कुछ ऐसा ही मामला है. अब जब भेजा तंग करने लगे तो उसे गोली थोड़े ही मार दी जायेगी -खालिस और भोंडे बालीवुड   स्टाईल में-गोली मारो भेजे में भेजा तंग करता है -हाऊ फुलिश! ये कोई  मानवीय तरीका है समस्या से निजात का ..हाँ मन  जब बहुत उधम करे तो दुष्ट का ट्रांसप्लांट ही क्यूं  न करा लो. मुफीद ,निरापद तरीका लगे हैं यह मुझे !

मगर फिर किसका मन ट्रांसप्लांट के लिए निरापद होगा ? शर्तियाँ किसी मासूम से बच्चे का ..मगर मैं वो लेने सा रहा ,अब इतना स्वार्थी और अमानवीय भी नहीं है मेरा मन  कि किसी मासूम का भविष्य ही खराब हो जाय .फिर किसी नारी का ? चल सकता है क्योंकि कहते हैं नारियों का मन बहुत सुकोमल होता है -यहाँ ब्लागजगत में भी कईं हैं न  -बिलकुल सच्ची -नो पन -आपकी कसम. हाँ नारीवादी मन न हो -बहुत डर लगता है ऐसे मन का और न जाने मेरे तन का भी वह क्या हाल कर डाले ....मगर ऐसी मनफेक कौन होगी नारी यहाँ सभी तो मुझसे खार खाए बैठी हैं -भला  वे क्यों देने लगी अपना मन  मुझे -कुछ पा  जायं ठांव कुठाँव तो भुरकुस बना डालें मेरे मन तन का -तो वहां से पूरी ना  उम्मीदी ही है ...फिर पुरुष मनों पर मन  जाता है तो कई नादान दिखते हैं और कई दानेदार भी हैं .वे देने को भी तैयार हो सकते हैं मगर मेरा मन ही उनका ट्रांसप्लांट नहीं चाहता दुष्ट -सहसा ही श्रेष्टता बोध से ग्रस्त हो उठता है -कहता है जो भी हैं उनसे तो मैं खुद ही हर हाल में अच्छा हूँ .तब आखिर हे दुष्ट तुम्हे कैसा मन  चाहिए जल्दी से बोल और मेरी जिन्दगी को और नारकीय मत बना!

तूने मुझे कहाँ फंसा दिया ..न ब्लोगिंग छोड़ने दे रहा है और न वह करने जो करने मैं यहाँ आया था ..जहां हरी घांसे हैं वहां कोई घास नहीं डाल रहा ...जहां बियाबान है वहां गधे तू जाना नहीं चाहता. आखिर क्या चाहता है तू बोल दे आज -सुना है इस ब्लागजगत में बहुत सहृदय भी हैं तेरी मनसा पूरी कर देगें -अपना मन  देकर तेरा पीछा तुझसे छुडा देगें -पर बेअक्ल तूं कहा जायेगा ? तुझ सड़े गले गलीज को तो कोई लेने को तैयार नहीं होगा.  चलो अपने किसी वैज्ञानिक मित्र से बात करते हूँ वे तुम्हे तबतक किसी जीवन दायक घोल में रखेगें जब तक तूं फिर तरोताजा ,नया सा नहीं हो जाता जैसा तूं चालीस वर्ष पहले हुआ करता था -उमंगों ,चाहतों से लबरेज .दुनिया को बदल डालने के जज्बे से भरा हुआ -प्राणी  मात्र से प्रेम की आकांक्षा लिए हुए ...
अब तो तू बिलकुल दुष्ट हो चुका है -सारा ब्लागजगत भी तुझे शरारती मान चुका है -इसलिए अब तूं छोड़ साथ मेरा और यह सोच किसके मन से तुझे ट्रांसप्लांट करुँ -जल्दी कर ,ढूंढ ढांढ बता दे -फिर उससे निगोशिएट किया जाय -हो सकता है बात बन ही जाय .

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......समर शेष है!

 कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

कितनी अच्छी बात है दिनकर समग्र की चर्चा हो रही है दिनकर विशेषज्ञों द्वारा ब्लागजगत में ...मैंने तो  कहीं दिनकर की उक्त  बहुउद्धृत  पंक्ति ही फिर से उद्धृत कर दी थी -कई बार कह चुका हूँ ,फिर दुहराता  हूँ कि साहित्य  की मेरी समझ अधकचरी है और ज्ञान पल्लवग्राही -मैं साहित्य के अलिफ़ बे का भी विद्यार्थी नहीं हो पाया और यह दुःख मुझे जीवन भर सालता रहेगा.बस विद्वानों की सोहबत का दुर्व्यसन न जाने से कहाँ से छूत सा लग गया मुझे ...बहरहाल ....

 मैंने तो  दूसरी पंक्ति को ही साभिप्राय उद्धृत  करना चाहा था मगर पहली लाईन भी काफी अर्थबोधक है इसलिए उसे भी साथ ले लेने का लोभ छोड़ नहीं पाया .यानी यह लाईन -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!
मगर इसका अर्थ क्या है ? यह दिनकर विशेषज्ञ ही बता सकते हैं अपने बूते का तो नहीं .इसलिए दिनकर व्याख्यान पर ये टिप्पणी चेप आया हूँ -
"अब लगे हाथ  दिनकर स्पेशलिष्ट पहली वाली लाईन का मतलब भी  बता दें ....
तो शागिर्दगी कर लूँगा नहीं तो ...अब खुदैं फैसला कर लें अपने बारे में अब कुंजी वुन्जी मत देखियेगा भाई लोग.... यह ब्रीच आफ ट्रस्ट नहीं ब्लाग्वर्ल्ड में ..(..शागिर्दगी का मतलब जीवन भर टिप्पणी करता रहूँगा ऐसे विद्वान् की पोस्ट   पर जो इसका सटीक अर्थ बता देगा -मूल टिप्पणी में नहीं है यह वाक्य . )
नीचे क  सरल लाईन क व्याख्याकार और भाष्यकार कौनो कम नहीं हैं ,यानी बहुत हैं
मगर असली तेजाबी परीक्षा त  ई लाईन में है -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!"

-पूरी कविता पढनी चाहें तो यहाँ मौजूद है .तो भैया कौनो है सरस्वती क लाल या दिनकर साहित्य विद्वान् जो इस दिनकरी ढाई आखर का अर्थ बता दे .....
मुझे इंतज़ार रहेगा .......

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

शादी व्याह के निमत्रण पत्रों की हिन्दी !

इन दिनोंअपने हिन्दी ब्लॉग जगत में हिन्दी के स्तर को लेकर बहस मुबाहिसों का महौल गरम है -बाहर के ४५ डिग्री सेल्सियस से भी शायद ज्यादा गरम .कुछ ब्लागरों ने तो धमकी तक दे डाली है कि वे कथित " क्लिष्ट " हिन्दी के ब्लागों से गुरेज करने में भी नही हिचकेंगें ! ! मजे की बात है की सबसे पहले मुझे क्लिष्ट जैसे 'क्लिष्ट 'शब्द की जानकारी ही एक ऐसे सज्जन से हुयी थी जिनकी हिन्दी बस माशा अल्लाह ही थी ! तब मैंने उनसे पूंछा था कि जब उन्हें हिन्दी के कठिन (?) शब्दों से परहेज है तो वे "क्लिष्ट" शब्द ही इतनी सरलता से कैसे जान गए हैं ! क्योंकि यह तो स्वयं में ही एक क्लिष्ट शब्द है ! इसका सरल समानार्थी है कठिन ! और मैंने जब उनसे यह जानना चाहा था कि जैसे उन्होंने क्लिष्ट शब्द को जिह्वाग्र कर डाला है दूसरे कथित कठिन शब्दों को क्यों नही सीखते जाते -क्योंकि शब्द के अर्थ को जब ठीक से आत्मसात /हृदयंगम कर लिया जाता है तो वे फिर कठिन रह ही कहाँ जाते हैं ? मुझे याद है कि मेरे सवाल का माकूल उत्तर न देकर वे बगले झाकने लग गए थे !

स्तरीय हिन्दी से आप में से अधिकांश बिदकने वाले लोगों की भी कहानी वैसी ही है जो क्लिष्ट जैसे क्लिष्ट शब्द को तो हिन्दी से अपनी आलस्य जनित दूरी बनाये रखने के ढाल स्वरुप सहज ही सीख लेते हैं और धडल्ले से आत्मरक्षा में इसका इस्तेमाल करते फिरते हैं मगर "स्तरीय " हिन्दी सीखने की ओर एक भी कदम नही उठाते ! ठीक है हिन्दी के बोलचाल की भाषा के हिमायती बहुत हैं ,मैं भी हूँ ! तुलसी ने तो यहाँ तक कह डाला -भाषा भनिति भूति भल सोयी ,सुरसरि सम सब कर हित होई ! ( भाषा ,कविता यश -प्रसिद्धि वही अच्छी है जिससे गंगा नदी की भांति सबका हित हो ! ) मगर ख़ुद तुलसी के भाषाई पांडित्य पर क्या कोई उंगली उठा सकता है ? वे संस्कृत के भी प्रकांड विद्वान् थे ! संदेश साफ़ है किसी भी भाषा को गहराई तक जानिए मगर जन सामान्य के लिए उनसे उनकी ही बोली भाषा में संवाद कीजिये ! इन दिनों हिन्दी को भ्रष्ट करने की मानो एक मुहिम ही चल पडी है ,कई विद्वान् भी चलताऊ भाषा की पुरजोर वकालत कर रहे है ! हिंगलिश का बोलबाला है ! पर इससे हिन्दी के रूप सौन्दर्य और भाषाई शुचिता का कितना नुकसान हो रहा है -क्या कोई भाषा विज्ञानी बता सकेंगें ? बात क्लिष्ट और सरल हिदी की नही है -बात भाषा के नाद सौन्दर्य का है -वह बनी रहे भले ही उसमें कथित क्लिष्ट शब्द हो या न हों ! मैंने प्रायः देखा है कि विज्ञता के अभाव में सरल शब्दों का इस्तेमाल करने वाले लोग भाषा का कबाडा कर देते हैं और दंभ भरते हैं कि वे सरल हिन्दी के प्रति प्राणपण से समर्पित हैं -वहीं ऐसे भी ब्लॉग लेखक हैं जो सहज हो भाषाई प्रयोग करते हैं और इस बात को लेकर जरा भी असहज नही होते कि वे क्लिष्ट या सरल शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं -फलतः भाषा का एक सहज स्वरुप कल कल बहती नदी या झरने सदृश आ उपस्थित होता है -मन मोह लेता है ! ओह भूमिका लम्बी हो गयी ! मैंने यह विमर्श ( यह भी शब्द प्रचलन में कोई एक डेढ़ दशक से ही ज्यादा है ) एक खास मकसद से शुरू किया था ! वह बात ऐसी है न कि इन दिनों शादी व्याह का मौसम है तो तरह तरह के रंग बिरंगे निमंत्रण कार्ड मिल रहे हैं और वे भी जिनका भषाई सरोकार से कुछ भी लेना देना नही है ऐसे लच्छेदार भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं कि बस कुछ मत पूछिए !

बचपन में शादी के निमत्रण कार्डों का यह मजमून आज भी रटा हुआ सा है -
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हे बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को
कितनी सुंदर अभिव्यक्ति है -मगर अब इस तरह का भाषाई व्यवहार थोडा आउट डेटेड सा है ! बैकवर्ड सा ! क्यों ?
मगर भावों की सुन्दरता आज भी इन पंक्तियों में वैसी ही है ! अब जो यह नही जानते या जानने की कोशिश नही करेंगें कि आमंत्रित को मानस का राजहंस क्यों कहा जा रहा है, वे भला इन पंक्तियों का आनंद कैसे उठा सकते हैं ? -अब इसमें कहाँ कोई क्लिष्ट शब्द है -पर हमारी एक साहित्यिक मान्यता यहाँ विद्यमान है जिसमें मानस के हंस में नीर क्षीर विवेक की क्षमता दिखायी गयी है ! नीर क्षीर की क्षमता बोले तो विद्वता का उत्कर्ष !

ऐसे ही इन दिनों गरमी में बार बार के बिजली के चले जाने से उत्पन्न असहायता और खाली समय के कुछ सदुपयोग के लिहाज से मैंने निमंत्रण कार्डों पर एक नजर डाली है ! अब उपर्युक्त सरीखे दोहे तो प्रचलन में नही हैं -अब ज्यादातर गणेश जी से जुड़े संस्कृत के श्लोकों से काम चलाया जा रहा है ( फिर वे तो और भी क्लिष्ट हुए ) ! मगर जरा निमंत्रण के इस भाषाई सौन्दर्य पर भी तो दृष्टिपात कीजिये - " ........के पावन परिणयोत्सव की मधुर बेला पर पधार कर अपने स्नेहिल आशीर्वाद से नवयुगल को अभिसिंचित कर हमें अनुगृहीत करें......" या फिर इधर गौर फरमाएं - " ...के पाणिग्रहण ( कैसा क्लिष्ट शब्द है ?) संस्कार में आनंद और उल्लास के इस मांगलिक अवसर पर उपस्थित होकर हमें आतिथ्य का सुअवसर प्रदान करने की कृपा करें ..." या फिर ....." ....के मंगल परिणयोत्सव की मधुरिम बेला में पधार कर अपने आशीर्वाद की मृदुल ज्योत्स्ना से नव युगल के जीवन पथ को आलोकित करें ॥"

ये सभी " क्लिष्ट शब्द ही तो हैं मगर देखिये तो वे हमारे मांगलिक क्षणों की साथी हैं ! पता नही कैसे वे लोगों को क्लिष्ट लगते हैं ! मतलब तो समझ लीजै श्रीमान ! जब आप सीखने का जज्बा लायेंगें तो यही शब्द आपको अच्छे लगने लगेगें ! हाँ बहुत से बुद्धिजीवी अब यह कहते भये हैं कि आडम्बर पूर्ण भाषा का इस्तेमाल न किया जाय ! मगर भाषा हमारी जीवन शैली ,रीति रिवाजों -मतलब संस्कृति से गहरी जुडी है ! यदि हम भाषा को क्लिष्टता के सतही आधार पर खारिज करेंगें तो शायद हमें अपने कई अनुष्ठानों , कार्यों से भी तौबा करना या काफी बदलाव करना होगा !

और अंत में मैंने एक मांगलिक अवसर पर आज यूँ स्नेहकामना की है -

परिणय दशाब्दि जयंती पर एकनिष्ठ दाम्पत्य की अनंत शुभकामनाएं !

क्या अब भी आप इसे क्लिष्ट मानते हैं ?

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

मतदाता ब्लागर्स के लिए कुछ टिप्स !



मुझे जानकारी नहीं है कि ब्लागर्स के उम्र वर्ग का कोई अध्ययन उपलब्ध है या नही मगर अनुमान तो यही है कि ज्यादातर ब्लॉगर अट्ठारह वर्ष के ऊपर ही होंगें ! लोकसभा सामान्य निर्वाचन के पहले चरण में कई प्रान्तों में दिनांक १६ अप्रैल को मतदान होने जा रहा है ! ऐसे ही मन में बात आ गयी कि क्यों न मतदान करने की प्रक्रिया की जानकारी को आपसे साझा किया जाय ! वैसे तो भारत निर्वाचन आयोग मतदाताओं को भी मतदान प्रक्रिया की जानकारी देने में सक्रिय रहा है-मगर मतदान के प्रोसीजर को लेकर थोड़ी अज्ञानता लोगों में बनी रहती है -और बहुत से लोग इसे झन्झट का काम मानकर वोट ही देने नही जाते !भला ऐसी बेरुखी से लोकतंत्र की जड़ें कैसे मजबूत रह पाएंगीं ? बहुत से पढ़े लिखे लोगों में भी मतदान करने के प्रति अनिच्छा का भाव ही देखा जा रहा है ! क्या लोकतंत्र के लिए यह शुभ लक्षण है ?

जहाँ तक वोट देने /मतांकन की प्रक्रिया की बात है वह बहुत ही सरल है ! बस आप यह सुनिश्चित कर लें कि आपका नाम मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल ) में है ! अब १६ अप्रैल को जहाँ पहले चरण का मतदान है और आगे के चरणों में भी मतदान के समय जो ज्यदातर जगहों पर सुबह सात बजे है से थोड़ा पहले -१० मिनट पहले ही जिस मतदान स्थल (पोलिंग स्टेशन ) के लिए आपका नाम मतदाता सूची में हो वहाँ पहुच जायं ! जितना देर करेंगें आपको धूप गर्मीं में लाईन में खडा होना पड़ सकता है ! वैसे ७ बजे सुबह से से पाँच बजे शाम तक मतदान अनवरत चलेगा और अपनी सुविधानुसार आप इस अवधि में कभी भी मतदान कर सकते हैं !

आप जब निर्धारित मतदान स्थल के लगभग दो सौ मीटर दूर ही रहेंगें आपको विभिन्न दलों द्वारा स्थापित चुनाव कैम्प सहजता से दिख जायेंगें जो दरअसल मतदाताओं यानि आपकी सहायता के लिए ही होते हैं -आप अपना मतदान जो गोपनीय है किसी को करें लेकिन विभिन्न पार्टियों के द्वारा लगाए गए किसी भी पार्टी के कैम्प में जाकर अपना नाम मतदाता सूची में खोजने में उनकी मदद ले सकते हैं -वे आपको एक सफ़ेद पर्ची भी देंगें जिसमें केवल आपका नाम और मतदाता सूची में आपका क्रमांक लिखा होगा ! इसमें पार्टी या प्रत्याशी का नाम या चुनाव चिन्ह भी नही होता ! इसे लेकर या बिना इसके भी आप मतदान स्थल के मुख्यद्वार पर बेहिचक पहुँच जायं ! अपने साथ कोई अस्त्र शस्त्र न रखें और ना ही मोबाईल फोन ! यह जमा किया जा सकता है ! साथ ही आपके पास किसी भी पार्टी की ऐसी कोई भी प्रचार सामग्री बिल्ला ,टोपी आदि नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह मतदान स्थल के १०० मीटर की परिधि -मतदान परिसर में मान्य नहीं है !

मुख्य द्वार से अन्दर घुसते ही आपको मतदान अधिकारी प्रथम (पोलिंग आफीसर फर्स्ट ) एक मतदाता सूची में आँख गडाए दिख जायेंगें ! यह मातादाता सूची जो इस अधिकारी के पास होती है वह मतदाता सूची की चिह्नित प्रति (मार्केड कापी आफ इलेक्टोरल रोल ) कहलाती है ! मार्क्ड कापी इसलिए कि इसमें मतदाता का नाम मिल जाने पर उसके नाम पर चिह्न लगा दिया जाता है ! यह अधिकारी आपका नाम यदि आप पर्ची ले गएँ हैं तो उससे या फिर आप से सीधे पूंछ कर मतदाता सूची में ढूंढेगा ! वह आपका मतदाता फोटो पहचान पत्र -इपिक ( इलेक्टोरल फोटो आईडेनटिटि कार्ड ) भी देखेगा या उसके न होने पर कई और पहचान के विकल्प जैसे आपका पासपोर्ट / ड्राविंग लाईसेंस /पासबुक /पैन कार्ड /आपकी नियोक्ता संस्था द्बारा जारी परिचय पत्र /आर्म्स लाईसेंस /आदि वैकल्पिक पहचान पत्रों से आपकी पहचान सही मतदाता के रूप में करेगा और अपने सामने रखे मतदाता सूची में आपके नाम के बॉक्स में एक लाल तिरछी रेखा बना देगा और अगर आप महिला हैं तो वह तिरछी रेखा के साथ ही आपके मतदाता क्रमांक को लाल रंग से राउंड भी कर देगा ! मतलब आपकी पहचान स्थापित हो गयी !

अब आप आगे बढ़ें -बगल में ही मतदान अधिकारी द्वितीय आपको दिखेंगें जो झटपट आपकी बाईं तर्जनी ( इंडेक्स फिंगर ) पर अमिट स्याही लगा देंगें जो तुंरत ही सूख कर जल्दी न मिटने वाला निशान बना देती है ! यही अधिकारी आपके बारे में एक रजिस्टर में जानकारी भरेगा और आपके हस्ताक्षर कराने के साथ आपके पहचान पत्र के अन्तिम चार अंकों को भी उसमें लिखेगा और आपको एक पर्ची भी उसी के आधार पर बना कर देगा ! इस काम में दो मिनट से ज्यादा वक्त नही लगता ! आप उस पर्ची को लेकर मतदान अधिकारी तृतीय के पास जायेंगें जो आपसे वह पर्ची लेकर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ई वी एम् ) के अपने सामने के कंट्रोल यूनिट के नीले बैलट बटन को दबा कर मशीन को आन कर देगा और आप से कहेगा कि आप वोटर कम्पार्टमेंट में जाकर अपने पसंद के प्रत्याशी को वोट दे दें !

वोटर कम्पार्टमेंट चारो ओर से ढंका रहेगा और आप गोपनीय तौर पर सामने बैलट यूनिट में अपनी पसंद के मतदाता सामने नाम और उसके चुनाव चिन्ह के सामने की नीली बटन को दबा दें -एक बीप की लम्बी आवाज आयेगी ! बस हो गया आपका मतदान ! और आप निकास द्वार से बाहर हो लें ! बस यही तो करना है मतदान में ! बिल्कुल न हिचकें और मतदान में जरूर हिस्सा लें ! सुरक्षा की भी अभूतपूर्व व्यवस्था हो रही है -लगभग सभी मतदान स्थल पर केन्द्रीय पुलिस फोर्स को तैनात किया जा रहा है !




मतदान प्रक्रिया के बारे में आपकी किसी भी जिज्ञासा का स्वागत है !

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

अनूप शुक्ल जी की टिप्पणी और तुलसीदास का आत्म प्रक्षेपण !

अपने (अ ) लोकप्रिय से चिट्ठाकार चर्चा स्तम्भ में अभी अभी मैंने कुश की चर्चा की .इस पर अनूप शुक्लजी ने अपने स्वभावानुकूल सहज ही यह टिप्पणी की -

"बहरहाल अरविन्दजी ने कुश के बारे में चर्चा की। इसके पहले भी मिश्रजी ने कई चिट्ठाकारों की चर्चा की है। उनका अपना अंदाज है। उस पर सवाल उठाना उचित नहीं होगा। लेकिन एक पाठक की हैसियत से जो मैंने महसूस किया वह यह है कि उनके प्रस्तुतिकरण में चिट्ठाकार से उनका खुद का तुलनात्मक वर्णन प्रमुखता लिये रहता है। अगले की तारीफ़ करने के लिये अपनी बुराई करना जरूरी तो नहीं। किसी को बुद्धिबली, प्रतापी बताने के लिये खुद को बुड़बक, भकुआ सा जाहिर करना जरूरी है क्या?

अरविन्दजी का यह आत्मप्रक्षेपण का अंदाज उनकी हर चिट्ठाकार चर्चा में मैंने देखा है। जैसा महसूस किया वह बता रहा हूं।"

.....और उनके द्बारा सायास या अनायास यह स्पष्ट भी कर दिया गया कि उक्त टिप्पणी पाठकीय हैसियत से की गयी है ! बहुत अच्छी बात ,बिल्कुल स्वीकार्य ! अब मेरी मुश्किल यह है कि -किसी के बारे में कोई भी चर्चा परिप्रेक्ष्यों और संदर्भों में ही तो की जा सकती है -उनसे पृथक (आईसोलेट ) करके तो नही ! भगवान् राम के चरित गायन के लिए जरूरी है रावण को दुर्धर्ष दुष्ट दिखाया जाना -वह जितना ही क्रूर करमा दिखेगा भगवान् राम का उतना ही उदात्त चरित सामने लाया जा सकेगा ! बहरहाल आज की दुनिया और संदर्भों में मैं राम रावण की खोज कहाँ करुँ ?और किसे बलि का बकरा चुनूं ! सो मैंने ख़ुद का ही बलिदान देना उचित समझा -भला और किसकी बलि दूँ ? किससे तुलना करुँ ? क्या अनूप जी से ही तुलना करना शुरू कर दूँ ? मैंने बिल्कुल यही टिप्पणी भी प्रश्नगत चिट्ठाचर्चा में कर दी और अपनी वापसी पोस्ट में अनूप जी ने ऐसी हिमाकत न करने के लिए मुझे चेता भी दिया -"भाई हमसे काहे की तुलना करेंगे? हर व्यक्ति अपने में खास होता है। उसकी किसी से तुलना क्यों की जाये?"

अनूप जी मुझे यह मालूम था कि आप या कोई और भी छीछालेदर की ऐसी अनुमति मुझे क्यों देने लगें , इसलिए मैंने अपनी पसंद के ब्लागर की तुलना ख़ुद से करना समीचीन समझा ! अब मेरे इस विवशता पर भी दूसरों को क्यों कष्ट हो गया -बात कुछ हजम नही हुई ! अनूप जी ने अपनी पहली वाली टिप्पणी में यह भी लिखा है -"अगले की तारीफ़ करने के लिये अपनी बुराई करना जरूरी तो नहीं। किसी को बुद्धिबली, प्रतापी बताने के लिये खुद को बुड़बक, भकुआ सा जाहिर करना जरूरी है क्या?अरविन्दजी का यह आत्मप्रक्षेपण का अंदाज उनकी हर चिट्ठाकार चर्चा में मैंने देखा है। "

क्या ये दोनों वाक्य परस्पर विरोधाभासी नही लगते ? अब कोई अगर ख़ुद को बुडबक कह रहा है तो यहाँ तो आत्मदया (maudlin ) की बात मानी जा सकती है मगर आत्म प्रक्षेपण ( सेल्फ प्रमोशन ) ? यह कैसा नजरिया है भाई ? अगर ख़ुद को दूसरों के ख़ास गुणों के परिप्रेक्ष्य में दीन हीन मानना आत्म प्रक्षेपण है तो फिर मध्ययुगीन संत कवि तुलसीदास ने भी तो यही किया है -मैं उस महान संत कवि के पद नख के धूल कण के बराबर भी नही हूँ ( आत्म प्रक्षेपण ! ) मगर देखिये तो वे क्या कहते हैं -

कवि न होऊँ न वचन प्रवीनूं ,सकल कला सब विद्या हीनू ( मैं न तो कवि हूँ और न ही वक्तृता में कुशल ,दरअसल मैं सब कलाओं और विद्या से रहित हूँ !)

यह भी देखिये -

कवि विवेक एक नही मोरे ,सत्य कहऊँ लिख कागद कोरे ( मैं तो कवि के विवेक से सर्वथा वंचित हूँ यह कोरे कागज़ पर लिख कर देता हूँ )

और यह भी -
बंचक भगत कहाई राम के ,किंकर कंचन कोह काम के
तिन में प्रथम रेख जग मोरी ,धींग धरमध्वज धंधक धोरी

( जो भगवान राम के भक्त कहकर लोगों को ठगते हैं और जो धन क्रोध और काम के गुलाम हैं -और इस कारण धींगामुश्ती करने वाले और धर्म की झूठीं ध्वजा फहराने वाले हैं उनमें सबसे पहले तो मेरी ही गिनती है )
इसलिए -
जौ अपने अवगुन सब कहऊँ .बाढहिं कथा पार नहि लहऊँ
ताते मैं अति अलप बखाने थोरे महुं जानिहहिं सयाने

( अगर मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूं तो यह कथा बहुत बढ़ जायेगी और मैं पार नही पा सकूंगा ! इसलिए अपने अवगुणों का बहुत कम वर्णन किया है -बुद्धिमान लोग थोड़े में ही समझ लेगें )

कोई भी बताये कि यह क्या तुलसी का आत्म प्रक्षेपण है -यह हमारी मानसिकता हो सकती है कि हम उस कवि के इस आत्म कथ्य को उसका आत्म प्रक्षेपण मान लें क्योंकि आज उसे एक विश्व कवि होने का दर्जा प्राप्त है -मगर जब इन पंक्तियों को तुलसी लिख रहे थे तो उनकी मनोदशा क्या रही होगी ?

अनूप जी , यह विनम्रता है ,शालीनता है ,कुलीनता है -इसे पहचानने में कदापि भूल नही होनी चाहिए -मुझे आत्म प्रवंचना करने को यही विरासत उकसाती है -इसी विराट व्यक्तित्व का अनुकरण कर पाने को मैं विवश हो जाता हूँ ! तो अगर मैं आत्म प्रक्षेपण की आप द्वारा कथित विकार का दोषी हूँ तो इसके जिम्मेदार वही बाबा तुलसी हैं -वही जानें ! उनका स्मरण करके मैं आपका यह प्रसाद ग्रहण कर ले रहा हूँ !

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