रविवार, 9 अक्तूबर 2011

फूली फूली चुन लिए काल्हि हमारी बार ....एक नए सदर्भ में ...!

वैसे तो अंगरेजी भाषा की  क्रिया -"टू वेजिटेट'' एक निष्फल सी, झाड झंखाड़ सी उगती जाती ज़िंदगी की  ओर इशारा करती है मगर एक आम जुझारू ज़िंदगी के साथ भी बहुत से खर पतवार किस्म की चीजें इकठ्ठा होती चलती  हैं , वे इसलिए और भी इकठ्ठा होती जाती हैं कि उनके प्रति हम एक आसक्ति भाव लिए रहते हैं ...जबकि कुदरत का एक 'जीवनीय' सूत्र हमें हमेशा अनेक माध्यमों से सन्देश देता रहता है कि बहुत कुछ पुराने धुराने को हमें टिकाते भी रहना चाहिए ....इसलिए कि 'पुराणमित्येव न साधु सर्वं' (यह पुराना है इसलिए श्रेष्ठ है यह बात हमेशा सही नहीं है)...प्रकृति में भी तो देखिये कई जीव जंतु तो अपने पुराने चोले को हर वर्ष त्यागते रहते हैं और त्यागकर और अधिक आकर्षक हो उठते हैं -सांप समुदाय इसमें निष्णात है ..पुरानी केंचुली उतारी नयी ओढ़ ली .....और भी कातिल सौन्दर्य हासिल कर लिया ....हमें कुदरत से बहुत बातों को सीखते रहना चाहिए खुद अपनी बेहतरी के लिए ...दत्तात्रेय नामके ऋषि ने तो इसलिए पशु पक्षियों को अपना गुरु मान लिया था ....इस पुरानी धुरानी चीजों की साफ़ सफाई को आप जानते ही हैं अंगरेजी में वीडिंग कहते हैं ...दीपावली के पूर्व घरों में वीडिंग अभियान जोरो शोरों से चलाया जाता है ..आफिसों में लाल फीतों में लिपटे कबाड़ को वीड करने के तरीकों पर तो बाकायदा शासनादेश हैं ....

मैं भी अपने साथ एक भरे पूरे उगते उस झाड झंखाड़ से आजिज आता जा रहा था जिससे कभी  मुझे बेहद लगाव था ..यह था मेरी चलती फिरती लाइब्रेरी का हर साल समृद्ध होता जाता हिस्सा जो पत्र  पत्रिकाओं का प्रतिनिधित्व करता रहा है .नौकरी के पहले और बाद के करीब तीन दशक का पत्रिका साहित्य उसमें जुड़ता गया  है, अनवरत बिना नागा के ..इनसे सबसे बड़ी मुसीबत तो पत्नी जी की ही रही है जो अनेक ट्रांसफरों के समय इनकी पैकिंग को लेकर जूझती और नए जगह पर इन 'फालतू चीजों' द्वारा घर के कई कोनों को कब्जियानें पर खीजतीं -मैं लाख मनाता कि आज मैं अदना सा ही सही जो कुछ भी हूँ और जो कुछ उनके हाथ में हर महीने लाकर रख देता हूँ इसमें इनका बड़ा योगदान रहा है,तब भी एक असहमति का भाव उनके चेहरे पर से हटने का नाम ही नहीं लेता..और मैं अपनी प्रिय पत्रिकाओं,जर्नलों से जुदा होने की कल्पना मात्र से सिहर उठता ..हो सकता है कि कोई अंक कभी ज्ञान पिपासा को शांत करने में काम आ ही जाय ...और मेरी रूचि भी पागलपन के हद तक  विज्ञान के प्रचार प्रसार की रही है ...साईब्लॉग,साईंस फिक्शन इन इण्डिया और साईंस ब्लागर्स असोशिएसन ब्लागों के लिए ही कभी इनमें से कोई काम न आ जायं!कोई पुराना संदर्भ खोजने में ही मददगार न बन जायं ...लिहाजा इन्हें इकट्ठा करता रहा ...  भले ही हमेशा एक बड़ी उधेड़बुन बनी रहती ...कारण वही, पत्नी जी की प्रबल असहमति भाव ..कई बार पूरी सख्ती से प्रतिरोध भी करना पडा है कि खबरदार इनमें से कभी भी कुछ भी रद्दी में बेचा गया तो खैर नहीं ...(अब कौन जाने समुद्र से कुछ बूंदे निकल ही  गयीं हों तो!) ...यह ऐसा  उहापोह रहा कि मैं लोगों से इस समस्या के निपटान के बारे में सत्परामर्श भी लेता रहा हूँ इन बीते सालों में ....

सबसे उपयोगी सलाह  मिली डॉ. मनोज पटैरिया जी से जो भारत सरकार में विज्ञान संचार के एक ऊंचे ओहदे पर हैं ..पिछले वर्ष दिल्ली प्रवास में उन्होंने मेरे बिना पूछे ही बता दिया था  कि उन्होंने ऐसे संग्रहीत साहित्य से बड़ी बेकदरी और निर्दयी भाव से नाता छुड़ा लिया है और यह निर्दयी भाव वहां तक जा पहुंचा जब उन्होने अपने  प्राईमरी तक की मार्कशीटें भी  रद्दी के हवाले कर दीं और उनकी स्पष्टवादिता तो देखिये (या बडप्पन!) कि उन्होंने यह भी तस्दीक कर दिया कि उस ढेर में मेरा पहला कहानी संग्रह 'एक और क्रौच वध' भी था ..मैं मानों पहाड़ से गिरा ......क्या मेरे कहानी संग्रह, वह भी पैलौठी के,  की यही नियति थी ....आँखे खुल गयीं मेरी ...तभी मैंने कुछ फैसले ले लिए थे ....फिर आज इन्टरनेट के ज़माने में  शायद यह  धरोहर कोई बहुत उपयोगी नहीं रह गयी है .ज्ञान का खजाना तो अब सामने ही है ....की बोर्ड पर उंगलियाँ फिराने की देर भर है ...
कुछ यूं हुयी रुखसती :(


 पहले तो मैंने सोचा कि यहाँ इस बारे में विज्ञापित कर दूं कि जिसे भी पिछले तीन दशकों के विज्ञान प्रगति,साईंस रिपोर्टर,टाइम ,रीडर्स  डाइजेस्ट, विज्ञान और सायिन्टिफिक अमेरिकन पत्रिकाएं चाहिए वो अपने हर्ज़े  खर्चे पर यहाँ से उठा ले  जाय मगर फिर सोचा कि अपनी बला किसी और पर डालना कहाँ की नैतिकता है? अब अपनी दीवानगी पढने के मामले में कुछ अलग टाईप की थी जो इलाहाबाद में पढाई और नौकरी के भी दौरान  कटरा की सकरी  सड़क के फुटपाथों पर सजी बिछी दुकानों से किताबी मोती चुगते रहते थे.... 

आखिर एक  अप्रिय फैसले को अमली रूप देने का दिन आ ही पहुंचा ..कल अपनी  ही दशकों  तक की  प्रिय पत्र पत्रिकाओं की रुखसती भरे मन से करनी पडी ...उनका भी वक्त एक दिन आना ही था ....उनके प्रति आसक्ति भाव  भावुकता कई बातों /लोगों पर भारी पड़  रही थी ..मालकिन ने बताया कि रद्दी एक कुंतल से कुछ ही अधिक थी ...किस मोल बेंचा उस अनमोल थाती को यह तो नहीं बताया और मुझे पूछने की हिम्मत भी नहीं है जो दिल पर गुज़र रहा  है मैं ही जानता  हूँ! दिल को दिलासा दे रहा हूँ कि अतिशय  संग्रह कोई भी अच्छा नहीं होता ...पैसे या किताब किसी का  भी...मगर मैं इन किताबों का क्या करूं जो शेल्फ से अभी अभी गुजरे जलजले को जैसे  बड़ी मायूसी से निहार रही थी...फूली फूली चुन लिए काल्हि  हमारी बार ....
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जनसत्ता में पुनर्प्रकाशन 

40 टिप्‍पणियां:

  1. छुटकारा पाने से जनित यह खेद केवल कुछ दिन ही सालता है. उसके बाद तो जीवन अपने ढर्रे पर लौट आता है और मन में एक संतोष समा जाता है.
    मैंने इन स्थितियों का सामना कई बार किया. अनेक बार घर बदले गए और सहेजी हुई चीज़ों को विदाई देनी पडी. बाद में जब उनकी कमी कभी नहीं खली तो निर्ममता से वीडिंग करने को अपना नियत कर्म बना लिया.

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  2. हमारे विभागीय ट्रांसफर ने हमें केंचुल बदलने वाला सरीसृप बना रखा है.. इस बार ही लगता है कि कुछ ज़्यादा समय हो गया... वैसे कुछ दिनों तक सालता है और कुछ दिनों तक उस बाबुल की दुआएं लेकर विदा की गयी बेटियाँ भी याद आती हैं.. फिर मन मान लेता है कि वे ससुराल में खुश हैं!! ऐसे ही तो किसी को ससुराल मिलता है इलाहाबाद के कटरा, दिल्ली की नयी सड़क, पटना के अपना बाज़ार,कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में!!
    अब आंसू पोंछ भी लीजिए पंडित जी!!

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  3. पिछले आठ सालों ने जाने कैसे अपनी छाती पर लादे घूम रहे हैं सोच रहे हैं कि एक बार सही ठौर ठिका पता बन जाए तो उनके जीवन मरण का फ़ैसला भी कर ही डालें । अब तो अखबारों का नंबर ही साप्ताहिक बेसिस पर आता है , फ़िर मैथिली शरण , दिनकर और नागार्जुन बाबा की व्यथा क्या कहें

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  4. मैंने एक चीज नोटिस की है कि हिन्दी के पाठक अपनी पढ़ी किताबों के प्रति, ज्यादा ही भावुक होते हैं। अंग्रेजी आदि के पाठक उतनी भावुकता नहीं दर्शाते। अलमारी भरी कि रद्दी में सौपना शुरू। बहरहाल आपकी भावुकता समझ सकता हूं। इस दौर से मैं भी दो चार हो चुका हूं :)

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  5. आपने सही कहा इन्टरनेट के इस जमाने में एक क्लिक के साथ सब कुछ स्क्रीन पर ही उपलब्ध है ...बरसों से सँजोई पुस्तकें, पत्रिकाएँ अब रद्दी के सिवाय कुछ ना रहीं ।

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  6. सभी का दर्द बयान कर दिया आपने। मेरे पास भी यही हाल है। देखता हूँ कि क्या करना है। कुछ काट-छांट तो करनी ही पड़ेगी।

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  7. डाक टिकटों, पुरानी अप्रचलित करेन्सी, सिक्कों, 1947 से पहले छपी ग़ैर-धार्मिक हिन्दी पुस्तकों, आदि को निकालने की बारी आने से पहले एक बार मुझसे सम्पर्क करने की कृपा करें।

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  8. आपने देर से ही सही ठीक कदम उठाया !पढ़ने-लिखने वालों की यही बीमारी होती है कि वह किताबों से ,पत्र-पत्रिकाओं से दीवानगी कि हद तक प्यार करते हैं.कहीं पर भी अपनी छपी हुई छोटी-सी कतरन को भी सहेजने,उसे छाती से लगाने का जतन करते रहते हैं.अमूमन इसमें पत्नी जी का भीषण-असहयोग रहता है,गोया वे उनकी 'सौत' हों !

    सामयिक पत्र-पत्रिकाओं को टरकाना कम दुखद है,पर यही काम कथा-कहानी की पत्रिकाओं का हो या साहित्यिक पुस्तकों का,तो वह असम्भव-सा होता है,अनुचित भी !समय के अनुसार जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं,'बुद्धत्व-सा' प्राप्त कर लेते हैं तो अपना ही 'गोल्डन-कलेक्शन' एक घटिया-सा रचना-कर्म लगने लगता है !

    हमने अभी भी छोटे-से घर में किताबों के बड़े-से ठीहे बना रखें हैं और कबाड़ी के आने पर श्रीमतीजी की 'गिद्ध-दृष्टि' के बावज़ूद (हालाँकि गिद्ध तो विलुप्त हो गए हैं पर शायद 'नेत्रदान' कर गए हैं ) उन्हें छतिया रखा है !

    और हाँ, ई कबाड़ी वाले को पतै नहीं कब मजाक-मजाक में ऊ 'इंटरनैशनल' बन गवा है !

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  9. छोड़ दीजिये, कब तक मोह रखेंगे। हल्के होकर अच्छा ही लगेगा।

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  10. सरस्वती पुत्र के लिए रद्दी निपटान वाकई कष्टकारक होता है.

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  11. बरसों से सँजोई पुस्तकों, पत्रिकों की समस्या की नब्ज़ पर जिस विश्लेषणात्मक ढंग से तथ्य प्रस्तुत किए हैं वह प्रशंसनीय है.

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  12. मुश्किल तो है...पर ऐसा करना जरूरी हो जाता है...फेंग शुई में तो खासकर कहते हैं...घर को हमेशा clutter free रखें.

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  13. अपरिग्रह से अधिक कठिन होता है त्‍याग और निर्मोह, अक्‍सर परिस्थितिवश ही सधता है.

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  14. सच में मुझे भी बड़ा मुश्किल लगता है रद्दी निपटान..... बार बार लगता इसमें से क्या क्या रख लूँ....

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  15. मुश्किल होता है वर्षों से संभाल कर रखी गयी पुस्तकों और पत्रिकाओं को निकल्नाला ...गृहिणियों की मुश्किल तो और भी ज्यादा होती है उन्हें पुराने समान की भी छंटाई करनी पड़ जाती है!

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  16. पुरानी पुस्तकें काम की हैं या रद्दी यह तो अलग-अलग लोगों की समझ पर ही निर्भर करता है। मेरे पिताजी ने अपने घरेलू लाइब्रेरी में संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी के अनेक दुर्लभ ग्रंथ संग्रह कर रखे थे। उनकी देखभाल करना और उन्हें संभाल कर रखना उनकी दैनिक चर्या का एक अंग बन चुका था। मुझे भी उस संग्रह से बहुत लगाव था। किन्तु उनके स्वर्गवास के बाद मेरे ही सहोदरों ने उस संग्रह को बोरियों में भर कर घर के कबाड़खाने में डाल दिया और कब उन्हें दीमक चाट गईं मुझे पता तक न चला क्योंकि मैं अपनी नौकरी के सिलसिले मे रायपुर से बाहर ही रहता था। उस दुर्लभ संग्रह के नष्ट हो जाने की टीस आज भी मेरे भीतर विद्यमान है। इसीलिए आपकी पीड़ा को शायद मैं समझ सकता हूँ।

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  17. सोचा था कि पूछूंगा कि कल किसकी बारी है ? पर ख्याल आया कि उससे पहले जान लूं कि फूली फूली चुन लिए जाने के शुभ अवसर पर कितनी मुद्राएं किसके हाथ रहीं :)

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  18. ओह ! आपने रद्दी के हवाले क्यों किया ? मेरी समझ से किताबें अभी भी काफी उपयोगी हैं उनके लिए जो सही में पढ़ना चाहते हैं. मेरे पास भी बहुत जमा हो जाता है तो जिसकी ज्यादा जरुरत होती है या जिससे ज्यादा प्यार होता है उसे रखकर बाकी को किसी छोटे से पुस्तकालय में दे आती हूँ. जिसे कोई वित्तीय मदद नहीं मिला करती है. मेरा निवेदन है कि आगे से आप किसी गाँव के विद्यालय या पुस्तकालय को दे दें. फिर आपका संग्रह ..मैं कल्पना कर सकती हूँ. कैसा होगा...

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  19. पुरानी किताबें /पत्रिकाएँ समस्या होते हुए भी कभी -कभी बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं |लेकिन गीता का एक श्लोक है वासांसि जीर्णानि .....एक दिन तो पुराना शरीर भी साथ छोड़ देता है |

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  20. जीवन के इस पडाव पर हम भी अपनी नांव हल्की करते जा रहे हैं:)

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  21. मैंने एक तरीका अपनाया है मै इन की प्रदर्शनी लगता हूं कुछ किताबे मैगजीन्स बच्चे चुपके से सटका लेते है बाकी मै वापिस ले आता हूं.

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  22. अब तो बस यही प्रश्न है कि क्या चल रहा है इस छुटकारे के बाद : मलाल या राहत ?

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  23. अब तो जो किया सो किया लेकिन अगर ब्लाग पर आगर कभी इस बारे में चर्चा की होती तो बहुत से लोग यह सलाह देते कि किसी पुस्तकालय को अपनी रद्दी दे दीजिये। (जैसा अमृता तन्मय जी ने कहा)

    यह भी हो सकता है कि आपकी किताब किसी पाठक के पास ही गयी हो!

    शीर्षक अगर रहीम के दोहे को याद करके लिखा है तो गलत है। दोहे का सही अंश है:

    फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि

    "टू वेजिटेट'' की जगह "टु वेजिटेट"होना चाहिये।

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  24. मान्यवर अनूप जी,
    अंगरेजी के "to" को आप हिन्दी में टू लिखते हैं या टु यह लिखने वाले पर निर्भर करता है -मैं टू
    लिखता हूँ और यही सही भी होना चाहिए ..अब तो कोई आचार्य किशोरी दास वाजपेयी ही इसका सही रूप निर्धारित कर सकते हैं ...
    मैंने तो बचपन से जिस रूप में उक्त दोहे को पढ़ा, याद बनी रही और मेरी अल्प जानकारी में जो कबीर का है,वही लिख दिया ..
    अब आप इसे रहीम का बता रहे हैं और संदर्भ दे रहे हैं यह भी बड़ा अजीब ही है ..
    कुछ चीजें जन्म से ही साथ होती हैं उनके लिए संदर्भ आदि बेमानी हैं!

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  25. @ अनूपजी आप नाहक उलझ गए हैं ! मिसिरजी ने जो शीर्षक दिया है वह रहीम जी का सन्दर्भ लेकर नहीं किया और न ही उन पर शोध-पत्र लिख रहे थे.हाँ,उन्होंने ज़रूर अपने सुभीते की ख़ातिर किताबों को स्त्रीलिंग समझकर(जैसा कि वे हैं भी ) 'फूले' की जगह 'फूली' चुन लिया क्योंकि इस वर्ग के प्रति उनमें ख़ास तरह का लगाव दीखता है.वे चयन करने में भले ही माहिर न हों पर चुगने में अच्छे-खासे उस्ताद हैं ! इसलिए मुझे तो लगता है कि ऐसा उन्होंने जानबूझकर किया होगा.

    @अरविन्द मिश्र जहाँ तक 'पेटेंट' का सवाल है तो ये पंक्तियाँ अभी भी रहीमदास जी के नाम पर हैं,ताज़ा 'ज़र्नल' में अगर कबीर आ गए हों तो नहीं पता !

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  26. अरविंदजी,
    आप to को जैसे मन आये वैसे लिखें।
    शीर्षक जो मन में आये वो लिखें। लेकिन यह दोहा रहीम का ही है। बाकी आपकी मर्जी। सुधार करें या और बिगाड़ लें! आपको आपकी मर्जी के खिलाफ़ करने के लिये कहने की किसकी हिम्मत!

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  27. @संतोष जी थोड़ा गूगलिंग कीजिये

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  28. @अनूप जी ,
    यह दोहा कबीर का है -गूगल से मदद लीजिये ..बाकी जिस अशुद्धि की ओर आप इशारा कर रहे हैं आप सरीखे वैसी गलती बहुत लोग करते हैं ....इसलिए आप भी करते रहिये हिन्दी बड़ी उदार भाषा है !

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  29. SAKHIS OF GURU KABIR
    http://members.shaw.ca/kabirweb/sakhis.htm
    doha number-33

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  30. बीस साल से अधिक पुरानी पत्रिकाओं का संग्रह फेंकना बहुत मुश्किल काम है ....आज भी बहुत सारा " कूड़ा " फेंका नहीं जा सकता ...एक गहरा लगाव है पुरानी स्म्रतियों और इन चिंदियों से !
    शुभकामनायें !

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  31. अरविंद जी,
    ये गूगल भी डबलपना दिखाता है। कहीं रहीम दिखाता है कहीं कबीर। लेकिन कबीरदास का दोहा है यह तो जब हिंदी अध्यापक कह रहे है तो मानने में कोई हर्ज नहीं। लेकिन जो लिखा है वह गलत है।

    जब दोहा खोजा तो रहीमदास का मिला सो हमने बताया। लेकिन यह गलत लिखा है इसमें मुझे कोई संदेह नहीं।

    माली आते देखे देखकर कलियां हल्ला मचाती हैं कि इसने आज फ़ूले-फ़ूले (खिले-खिले) फ़ूल चुन लिये। कल हमारा भी वही हश्र होगा।

    बाकी आप जैसा समझें।

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  32. जहां से आपने दोहा बताया वहां दोहे की दूसरी पंक्ति है:
    fule fule chun liye, kal hamari bari

    fule को आप फ़ूली पढ़ना चाहें तो पढिये। हिन्दी सच में बहुत उदार है। :)

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  33. @अनूप जी,
    आप भी खासे ईश्वर के ही बनाए हुए हैं :)
    मसि कागज़ छुयो नहीं कबीर ने यह दोहा लिखा नहीं भाख दिया रहा होगा ..
    और यह कई रूपों में विद्यमान है ..जिसे जैसा सुहाया वैसा उसने कहा ....
    अब इस ओर भी आप अपनी से बाज नहीं आ रहे हैं ..
    यह सब विवाद आपने रचा ...हम तो सच और स्रोत दिखा रहे हैं ...

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  34. अरविंदजी,
    हां यह तो हो सकता है। हो सकता है कि कबीरदास ने ’फ़ुलाये फ़ुलाये’ या कुछ और कहा हो/भाखा हो। बाद में समय के साथ घिसकर फ़ूली और फ़िर फ़ूले हो गया हो।

    वैसे अगर आपको मिले तो आप किसी किताब की फोटोकापी स्कैन करके भेजियेगा जहां इस दोहे में फ़ूली-फ़ूली लिखा हो।

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  35. काफी ह्रदय विदारक और कारुणिक दृश्य का वर्णन किया है आपने. किताबों से अपने मोह के कारण समझ सकता हूँ. हाल ही में कार्यालय की लाइब्रेरी में जब पुरानी पत्रिकाओं को कम मूल्य पर निकालने की कोशिश हुई, तो मैंने भी काफी खरीद लिए. घर पर तो संग्रह है ही. अभी तक तो माता-पिता को ही झेलना पड़ा है मेरी इस आदत को, मगर लगता है कल यही हश्र मेरा भी न हो जाये! वैसी ऐसी किसी परिस्थिति से पूर्व अमृता जी की सलाह पर अमल करने का प्रयास तो जरुर करूँगा.

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  36. अरविदजी,

    यह हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली में यह पंक्ति इस प्रकार है:

    फ़ूले फ़ूले चुनि लिए, काल्हि हमारी बार।

    हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली भाग-4, पृष्ठ 475

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  37. @अनूप जी .
    दोनों पाठ मौजूद हैं फूली फूली और फूले फूले अब सही तो कबीर ही जाने -अन्यथा यह पिष्ट पेषण ही होता जाएगा -

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  38. आदरणीय महोदय
    मै आपकी यह पोस्ट बिलम्ब से पढ पाया हूँ ।
    मुझे दुख हुआ कि आपने सदियों से सहेज कर रखी पत्रिकाओं को इतनी बेदर्दी से रूखरत कैसे कर दिया।
    मेरे घर पर भी ऐसी पत्रिकाओं का अंबार है जब कभी मैं दौरे पर होता हूँ या किसी अन्य जनपद की पोस्टिंग में तो मेरी छोटी बहिन घर पर आकर कुछ पत्रिकायें इसी तरह रद्दी वाले को बेच देती है।

    एक दुखद किस्सा यह है कि मेरी अनेक पुरानी प्रकाशित रचनाओं वाली पत्रिकायें भी वह इसी तरह घर से बाहर कर चुकी है। तब से इधर अपनी कुछ पुरानी प्रकाशित रचनाओं को अपने लैपटाप में छिपा लिया है ।

    मेरी पत्नी तथा माँ में यह साहस नहीं है कि इस कृत्य के कारण मेरे परशुरामी प्रभाव का सामना कर सकें इस लिये मेरी छोटी बहिन का सहारा लेकर (क्या इसे सुपारी देना कहेंगे?) ऐसा अक्सर करती रहती हैं।

    जनता हूँ यह गलत है पर क्या करूँ ये किताबे और पत्रिकाऐं (मैने तो अपनी एम0एस.सी0 के नोट्स भी सक्सेस फाइन के नाम से बाइन्ड कराकर रख छोडे हैं ) मुझे अपना पहला प्यार जैस लगती हैं । क्या करूँ इनको दूर करने का खयाल भी नहीं ला पाता हूँ।

    कृपया मुझे भी आर्शिवाद दे ! आभारी रहूँगा !!

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  39. शुक्ल जी मैं समझ सकता हूँ ...यही मनोभाव मेरा अभी था अभी तक ..मगर मनुष्य को अतीतजीविता से मुक्त होना चाहिए ..किसी भी आसक्ति से मुक्त होना चाहिए -इस लिए मैंने खुद मोह से मुक्त किया ....मगर अभी भी मोहों का बवंडर घेरे हुए है -आभार ! आशीर्वाद तो अनुज के लिए सदैव रहता है ....

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  40. आह!
    फिर कई जख्मों को छेड़ दिया आपने
    इस दौर से मैं भी दो चार हो चुका हूं :)

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