मंगलवार, 29 नवंबर 2011

कौए की निजी ज़िंदगी

बात यहाँ से शुरू हई यानि  रावेन मिथ  पर कौए पर संपन्न चर्चा से....  यह एक कनाडियन विदुषी और मेरी नयी नयी बनी फेसबुक मित्र  का ब्लॉग है ...उन्हें मिथकों में जीवन्तता दिखती है और मुझे भी ....समान रुचियों वाले और समान धर्मा लोगों के बीच मेल जोल सहज ही हो जाता है ...इसी ब्लॉग पोस्ट पर काक मिथक की सर्व व्यापकता को लेकर विस्तृत जानकारी के साथ ही टिप्पणियों में कौए के बारे में चाणक्य की एक उक्ति का उल्लेख  भी हुआ है ....चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य को तमाम पशु पक्षियों से कुछ न  कुछ सीखना चाहिए और कौए से यह सीखना चाहिए कि यौन संसर्ग सबकी नजरों से  अलग थलग बिलकुल एकांत में करना चाहिए - ...और यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि कौए की  प्रणय लीलाएं और संसर्ग आम नज़रों से ओझल रहती हैं ....यह एक विचित्र पक्षी व्यवहार है .
जंगली कौआ 

खुद ग्राम्य परिवेश का होने के बावजूद मैंने आज तक कौए की इस निजी जिन्दगी का अवलोकन नहीं किया जबकि पक्षी व्यवहार में मेरी रूचि भी रही है ...कहीं इधर उधर घूमते हुए भी मेरी नज़रे बरबस ही आस पास के पेड़ों और पक्षी बसाहटों की ओर उठती रहती हैं -मुझे अक्सर लोगों की यह टोका टोकी भी सुनने को मिलती है कि मैं चलते समय नीचे क्यों नहीं देख कर चलता ..मगर यह विहगावलोकन जैसे मेरा सीखा हुआ सहज बोध सा है . गरज यह कि अपने परिवेश के पक्षी और पक्षी व्यवहार पर पैनी नज़र के बावजूद भी मैंने आज तक कौए के नितांत निजी व्यवहार को देखने में सफलता नहीं पायी है ...मगर बड़े बुजुर्गों की राय में यह मेरा सौभाग्य है ..

अब मेरा सौभाग्य क्यों? इसलिए कि लोक जीवन में 'काक -संभोग'   देखना बहुत ही अशुभ माना गया है . अंतर्जाल पर भी कुछ चित्र और वीडियो हैं मगर मैथुन का दृश्य नहीं है ....एक तो कतई काक मैथुन नहीं लगता बल्कि काक युद्ध सरीखा है ... और मैं उन्हें यहाँ लगाकर मित्रों के लिए किसी भी प्रकार का अशुभ नहीं करना चाहता क्योकि   लोक मान्यता यह भी है कि ऐसा देखना मृत्यु सूचक है ..एक बड़ा अपशकुन है,दुर्भाग्य है . 

पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि कौए खुले में मैथुन नहीं करते ...और इसलिए उनका यह जैवीय कृत्य लोगों की आँखों से प्रायः ओझल रहता है ....मगर वे ऐसा क्यों करते हैं ..उन्हें किससे लज्जा आती है?  और क्या उनका दिमाग लज्जा जैसी अनुभूतियों तक विकसित हो चुका है -ऐसे प्रश्न आज भी पक्षी विशेषज्ञों के लिए पहेली बने हुए हैं -यह खुद की मेरी जिज्ञासा रही है इसलिए इस रोचक पक्षी व्यवहार को आज आपसे साझा कर रहा हूँ ....कौए बाकी पक्षियों से बहुत बुद्धिमान हैं ..एक प्यासे कौए का घड़े से पानी निकालने के लिए उसमें कंकड़ डालते रहने की काक कथा केवल कपोल कल्पित ही नहीं लगती -क्योंकि काक व्यवहार पर नए अनुसन्धान कई ऐसे दृष्टान्तों को सामने रखते हैं जिसमें कौए ने औजारों का प्रयोग किया और उन्हें मानों यह युक्ति कि  " बिना उल्टी उंगली घी  नहीं निकलता " भी मालूम है और वे जरुरत के मुताबिक़ औजारों का आकार प्रकार चोंच और पैरों की मदद से बदल देते हैं -तारों को मोड़ कर ,गोला बनाकर खाने का समान खींच लेते हैं ....वे कुछ गिनतियाँ भी कर लेते हैं ....जैसे अमुक घर में कितने लोग रहते हैं ये वो जान जाते हैं और सभी के बाहर जाने के बाद वहां आ धमकते हैं..पक्के चोर भी होते हैं ..घर से चमकीली चीजें उठा उठा कर ये अपने घोसले को अलंकृत करते रहते हैं ...मुम्बई में एक बार एक कौए के घोसले से कई सुनहली चेन वाली घड़ियाँ बरामद हुयी थीं ....
घरेलू कौआ (दोनों चित्र विकीपीडिया ) 
लोक कथाओं के रानी के नौ लखे हार को कौए ने चुराया था -यह भी कथा बिल्कुल निर्मूल नहीं लगती  ....मतलब यह कि काक महाशय बड़े शाणा किस्म के प्राणी हैं -अपने आस पास कोई काक दम्पति देखें तो भले ही आप उनसे बेखबर रह जायं वे आपको लेकर पूरा बाखबर और खबरदार रहते हैं ... :) और तो और पक्षी विज्ञानी बताते हैं कि इनका एकनिष्ठ दाम्पत्य होता है मतलब जीवन भर एक ही जोड़ा रहता है इनका .....अब इतनी खूबियों और कुशाग्रता के बाद हो न हो इन्हें खुले में यौनाचार करने में शर्मिन्दगी आती हो, कौन जाने? आश्चर्यजनक है अभी तक इस आश्चर्यजनक काक -व्यवहार की व्याख्या पर मैंने किसी भी पक्षी विज्ञानी को कुछ लिखते पढ़ते नहीं सुना है ...आखिर वे आड़ में मैथुन क्यों करते हैं? 

कौए के व्यवहार के और भी बड़े रोचक पहलू हैं ..राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'भारत के पक्षी " (प्रकाशन विभाग ) में लिखा है कि भारत में चित्रकूट और कोडैकैनाल (दक्षिण भारत ) में कौए नहीं पाए जाते ..मुझे यह बात पता नहीं थी ..नहीं तो चित्रकूट तो कई बार जाना हुआ है ..ध्यान से देखते !....अब चित्रकूट में वे क्यों नहीं मिलते इसकी एक मिथक -कथा है . वनवास के समय सीता की सुन्दरता से व्यामोहित इंद्र के बेटे जयंत ने कौए का रूप धर उनके वक्ष स्थल पर चोंच मारी थी.  कुपित राम ने उसे शापित किया था -लोग आज भी कहते हैं इसी कारण कौए चित्रकूट में नहीं मिलते --मगर इसका वैज्ञानिक कारण क्या हो सकता है समझ में नहीं आता क्योंकि चित्रकूट तो एक वनाच्छादित क्षेत्र रहा है ....वहां से भला कौए क्यों पलायित हो गए? 

कौए की कोई छः प्रजातियाँ भारत में मिलती हैं ..सालिम अली ने हैन्डबुक में दो का ही जिक्र किया है -एक जंगली कौआ(कोर्वस मैक्रोरिन्कोस ) तथा दूसरा घरेलू कौआ( कोर्वस स्प्लेन्ड़ेंस)...पहला तो पूरा काला कलूटा किस्म वाला है दूसरा गले में एक भूरी पट्टी लिए  होता है -शायद इसी को देखकर तुलसीदास ने काग भुशुंडि नामके अमर मानस पात्र की संकल्पना की हो ... जिसके गले में कंठी माला सी पडी है ....यह काक प्रसंग अनंत है -फिर कभी अगले अध्याय की चर्चा की जायेगी ....
पुनश्च:
गिरिजेश जी ने एक काग साहचर्य का अनुपम उदाहरण फोटू यहाँ दिया है ....

37 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे कमरे के बाहर कुछ कबूतर रहते हैं, दिन भर उछल कूद करते रहते हैं।

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  2. इस बात पर कभी ध्यान नहीं गया था. लाभान्वित हुए.

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  3. Shayad Aacharya Hazari Prasad Dwivedi ji dwara hi Shantiniketan mein kauvon ki kam sankhya pr dhyanakarhan kiya jana unki Sanvedansheelta mana gaya tha, aapne to aur bhi kai pahluon par manan kar liya hai.
    (Mobile se comment karne ki vajah se Hindi mein type nhin kar paya.)

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  4. Bada rochak hai ye aalekh! Kauvve ke niji jeewan ke baare me nahee pata tha...haan! "Panchhiyon me kauvva aur aadmiyon me nauva" sab se adhik buddhimaan hote hain ye pata tha!
    Kauvve apne ghonsale chamkeelee cheezon se sajate hain ye bhee nahee pata tha!
    Choree to kauvvon ne mere naak ke neeche se kee hai....doodh kee to kayee baar le uda hai!

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  5. जहां तक कौवे द्वारा नौलखा हार उड़ा ले जाने की बात है यह अभी चंद महीनों पहले मुम्बई में घट चुका है। बाकायदा कौवे के खिलाफ एफ आई आर दर्ज हुई है जिसने कि एक महिला का सोने का चैन तब उड़ा लिया जब उस महिला ने स्नान करते समय चैन उतारकर बाथरूम की खिड़की पर रख दिया था।

    कागा को लेकर बड़ी रोचक बातें जानने मिलीं। मस्त।

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  6. @प्रवीण जी ,
    यह पोस्ट कौओं पर है कबूतरों पर नहीं !

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  7. भाई ग़ज़ब की दृष्टि रखते हो ।
    जो नहीं देखा उसपर भी लेख लिख डाला ।

    खैर , हमें तो लगता है , कौवे इस मामले में मनुष्य जैसे ही होते हैं । :)

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  8. काग कथा का रसास्‍वदन किया..हमारी दादी कई लोक कथा सुनाती थी..जिसमें कौये का एक आंख दि खाई नही देने का जिक्र होता था.....

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  9. बढ़िया ....
    कई नयी जानकारियाँ मिली ...
    कौए की बोली सुनाने को हम कान लगाये बैठे हैं ...

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  10. सर्वप्रथम तो आपको बधाई देना चाहता हूँ कि ब्लॉगिंग ने आप में गज़ब का दृष्टि बोध दिया है कि आप किसी भी विषय पर रोचक लेख लिख सकते हैं! अब इस मुहावरे को ऐसे कहना पढ़ेगा...
    ..जहां न पहुंचे कवि वहां पहुंचे ब्लॉगर!

    कौए लेखकों को आकर्षित करते रहे हैं। जिन्हें देखने का सौभाग्य ही नहीं मिला हो वे का करें! कबतूर की गुटर गूं से ही आनंदित होयेंगे न। कबूतर सार्वजनिक मगर कौए नितांत अकेले में ..कुटर कूँ.. करते हैं। इसका कारण कारण जब पक्षी वैज्ञानिक नहीं बता सके तो और का बतायेंगे।

    अब विज्ञान से परे शुभ-अशुभ की चर्चा ! एक तो देख न पाने का मलाल दूसरे मृत्यु का भय! श्राप का और बुद्धिमानी की चर्चा!

    मैने तो सुना है कि कौए से भी चालाक कोयल होती है। जो अपने अंडे कौए के घोंसले पर रख आती है। मादा कौए, कोयल के अंडों को अपना समझ कर सेती हैं। दोनो के अंडे एक समान होते हैं। बच्चे होने पर ये वापस कोयल के घोसले में आ जाते हैं।

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  11. कौओं के बारे में बचपन से एक सुखद स्मृति जुडी है कि जब भी छत की मुंडेर पर ये बोलें समझो उस दिन मामा आएंगे ! कई बार ऐसा होता भी था.
    कभी भी कौओं को आपकी नज़र से नहीं देखा,हाँ यह ज़रूर सही है कि अनजाने में कुछ पक्षी-जोड़ों को संतति-उत्पाद की क्रिया में रत ज़रूर देखा पर कौओं को नहीं !अब इस पर पक्षी-विज्ञानी ही शोध करें !

    साहित्य में ज़रूर कौवे के दो रूप दीखते हैं.जहाँ कोयल के मुकाबले उसकी बोली को कर्कश माना गया है (काकः कृष्णः पिकः कृष्णः....)वहीँ 'काग के भाग बड़े सजनी...' और कुछ नायिकाओं द्वारा कागा के माध्यम से संदेसा भिजवाने के प्रसंग हैं!

    काफी पहले इन पर एक कविता पढ़ी थी,जिससे यह पता चला था की मई के महीने में इनका प्रजनन-काल होता है !वैसे कौवे होशियारी में ज़रूर माने जाते हैं.यह भी पढ़ें,"काक-चेष्टा,बको-ध्यानं...'
    बाकी बातों के बारे में आप शोध करते रहें !

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  12. बड़ी शोधपरक पोस्ट है..... वैसे इंसानों में तो आजकल अपने निजी जीवन को अधिक से अधिक सार्वजनिक करने की होड़ लगी है....

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  13. रोचक ! इतना कॉमन पक्षी है कबूतर... सॉरी कौवा. और उसके बारे में ये असाधारण बातें...

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  14. बड़ा प्यारा जीव है।
    मेरे बालकनी में आकर जब तक मेरे हाथ से बिस्कुट नहीं खाएगा, जाता नहीं है। रोज़ की उनकी यह आदत हो गई है।

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  15. शकुन अपशकुन के परिचायक पक्षी सब ....

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  16. मैं याद कर रहा हूं बीसेक साल पहले अपने सरगुजा प्रवास के दिनों को, जब हम ग्राम कलचा-भदवाही के कागा पालक से रोज मिलते थे, पालतू कौआ अपने स्‍वामी की आवाज पहचान कर प्रत्‍युत्‍तर भी देता. मान्‍यता है कि कौआ ऐसी लकड़ी पहचानता है, जो छुलाने से लोहा कट जाता है और भी ढेरों बातें...(थोड़ा समय लगा कर याद करने पर कम से कम एक पोस्‍ट के लायक.)

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  17. @प्रवीण जी,
    निशाखातिर रहिये कबूतर संसर्ग देखना शकुन अपशकुन विधान में शुभ है ,मैं आपका संकेत देर से समझा !:)
    @ क्षमा, पंचम दा,
    कौए शातिर चोर हैं ..यह बात जग जाहिर है -ख़ास तौर पर चमकीली चीजों का -गहनों का भी ,दूध की तेल की कटोरियाँ तो झट से अछन्न होकर इनके घोसलों में जगहं पाती हैं ...
    @दराल साहब ,जो देखा उस पर तो सभी लिख लेते हैं बात तो तब बने जिस पर बिन देखे लिख दिया जाय ..यही तो ऋषि -प्रज्ञा है
    @राकेश जी ,
    कौए एक आंख से देखते हैं यह भी रामचन्द्र जी के द्वारा बाण संधान के पश्चात क्षमा के बावजूद एक आंख फोड़ देने का अल्प दंड दिया गया था -ऐसी किंवदंती है ....जबकि इनकी दोनों आंखे दुरुस्त होती हैं ....हाँ ये जानबूझकर काना बनकर देखते हैं ...
    @सतीश सक्सेना जी आपके यहाँ तो कागा बोल भी चुका !
    @राहुल जी,बड़ा मायावी पक्षी है कौवा ....यह आदमी और दूसरे पक्षी के बोल की नक़ल करता भी देखा गया है ....आपकी भी एक पोस्ट हो ही जाय :)

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  18. @ अरविन्द जी ,
    आश्चर्य...आप उनके यौन जीवन के गोपनीय रहने की बात करते हैं जबकि हमने उन्हें , खुले आकाश / मुंडेरों / वृक्षों आदि आदि अगोपनीय स्थानों में सीटी मारते , छेड़छाड़ करते , बलपूर्वक यौन इच्छाओं का प्रदर्शन करते तक , यानि कि कोई असामाजिक व्यवहार करते भी , नहीं देखा है ! संभव है कि वे इन सारी दुष्प्रवृत्तियों पे मानव के एकाधिकार को स्वीकार कर चुके हों !

    यौन वर्जनाओं पे उनका व्यवहार मनुष्यों जैसा लग तो रहा है पर हैरानी यह है कि मनुष्य के शयनागार में छल अथवा व्यावसायिकतावश जा पहुंचे कैमरों ने अब कौव्वों की सुध क्यों नहीं ली है ?

    खद्दरधारी कौव्वों की निजता पर डाका डाल चुके मीडिया कर्मी / शोधार्थी / पोर्न फिल्म निर्मातागण ओरिजनल कौव्वों की अनदेखी क्यों कर रहे हैं ?


    उनकी बौद्धिकता के मिथ भले ही मिथ मात्र हों पर उनकी सामूहिकता और साथियों के लिए फ़िक्र का प्रकटीकरण और उनकी सामाजिकता सर्वज्ञात तथ्य है !

    उन्हें एक शातिर /चालाक /बुद्धिमान परिंदा कहा जाता है पर एक बात समझ में नहीं आती कि कोयल के अण्डों को सेने के मामले में उनकी बौद्धिकता पर ग्रहण क्यों लग जाता है ? या फिर वे ममत्व / पितृत्व की लालसाओं से युक्त जीव हैं जो जानबूझकर दत्तक को भी पाल लेते हैं ?

    पिछले बरस कौव्वों पर एक पोस्ट गिरिजेश जी ने भी डाली थी पर वह स्वभाव से ज़रा नरम थी :)

    देवेन्द्र जी ने आपकी खूबियाँ बखूबी गिनाई हैं !

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  19. @अरविन्द जी प्रवीण पाण्डेय जी का आशय मैं समझ चुका था,आपने भी समझा,ठीक किया.

    @अली साब कौवों की तुलना आज के नेताओं से करके उनकी (कौओं) की गरिमा क्यों गिरातें है ? कई सीडियां खुलेआम बंट रही हैं !

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  20. कथा यह भी है काक ने सीता जी के सुन्दर पैरों पर चौंच मारी थी भगवान् राम ने तीर से उसे काना कर दिया .राम जाने सत्य क्या है वक्ष को साधना या पैर को लक्षित करना जयंत का .

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  21. गिरिजेश जी की पोस्ट पर काक-पुराण जो पढ़ा था उसका विस्तार कौवों के "बेडरूम" तक जाकर आपकी नज़रों से देखा!! आभार पंडित जी!

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  22. कोवों के बारे में इतना सब तो पता न था...

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  23. मेरे ख्याल से कुछ और पक्षी हैं जिनकी एक विशेष प्रवृत्ति और पक्षियों से अलग होती है- जैसे कि कोयल का अपने अंडे कौवी के घोंसले में छिपाना, पेंग्विन जोड़े में नर द्वारा अंडे को सेना (शायद यह प्रवृत्ति कुछ और पक्षियों में भी है, इस दृष्टि से वे जेंडर सेंसिटिव होते हैं :))हंस का जीवन भर एक ही साथी के प्रति एकनिष्ठ होना आदि-आदि.
    तो मेरा निवेदन है कि इन विषयों पर भी कुछ प्रकाश डालें.
    और कुछ नहीं तो सारे पक्षियों की यौन-प्रवृत्तियों पर एक लेख डालें क्योंकि ये विषय भी आपको कुछ अधिक ही प्रिय है :)
    आपकी पोस्ट की ही तरह अली जी की टिप्पणी भी रोचक है.

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  24. @@मुक्ति,
    विषयाकर्षण के लिए आभार ,,
    आप सरीखे प्रिय सुधी पाठकों के लिए ही साईब्लाग पर दस पोस्टों की यह लेखमाला
    आयी थी ..मुझे अपने पाठक प्राणों से भी प्रिय हैं!
    पशु पक्षियों के प्रणय प्रसंग

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  25. पिछले बरस कौव्वों पर एक पोस्ट गिरिजेश जी ने भी डाली थी पर वह स्वभाव से ज़रा नरम थी :)

    :-)

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  26. chhat par kaala kauva baitha...kaav kaav karta rehta....sab se kehtaa aate jaate....jhooth bole kauva kaate

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  27. आश्चर्य, इतनी रोचक श्रृंखला कैसे छूट गयी हमसे. लिंक के लिए धन्यवाद!

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  28. ज्ञानवर्धक आलेख , अब ज्ञान की उपयोगिता पर भी रोचक पोस्ट मिले तो अच्छा लगेगा.

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  29. लिंक देखा। कमाल की श्रृंखला है।..आभार।

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  30. काक कथा अच्छी लगी । ठाणे में मेरे देवर देवरानियों ने कौवे पाल रखे हैं, पिंजरे में नही खुले हैं पर दिन में तीन बार वे उनकी खिडकी पर आते हैं नाश्ता, भोजन तथा शाम के स्नेक के लिये । देवर देवरानी अंडे का पीला भाग उन्हे खिलाते हैं । फरसाण (नमकीन ) के वे बहुत शौकीन है । लंच में जो भी बना हो । उनके इस अजीब शौक के हम सब कीयल हैं ।

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  31. बचपन में एक लोककथा सुनते थे... जिसकी यह पंक्तियां याद रह गईं-
    जुएं का पेट फुटा
    नदी लाल बही
    कौआ काना
    बनिया दिवाना

    अब पूरी कथा कोई जाने तो बताएं :)

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  32. कुछ और बातें हैं , जैसे कि ’झुलनियां--कागा लई के भागा--’
    झूठ बोले कौव्वा काटे ,आदि आदि ।

    रोचक जानकारी ,आभार ।

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  33. संभव है,काकचेष्टा शब्द इन अनुभवों से भी बना हो।

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  34. कौवा पर आपका लेखन, अध्ययन एवं संकलन रोमांचकारी है... एक निकृष्ट प्राणी को मानव कल्याण में सहभागिता देकर आपने बहुत ही प्रशंसनीय कार्य किया है......

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