बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

मानस के राजहंस :भाग -2

हंस विषयक पिछली पोस्ट में सुधी पाठकों /मित्रों की कई जिज्ञासाएं व्यक्त हुयी है ,सुझाव मिले हैं .पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि यह पोस्ट महज उस राजहंस की पहचान आपके सामने रखने के लिए है जिसका जिक्र अक्सर हमारे प्राचीन ग्रंथों और मिथकों में हुआ है ..वैज्ञानिक लिहाज से स्वान (swan ) और  गूज (goose )  अलग प्रजातियों के पक्षी हैं मगर हिन्दी में इन सभी को हंस कह दिया जाता है ....कामिल बुल्के के अंगरेजी हिन्दी कोश में भी अंगरेजी के इन दोनों शब्दों का अर्थ हंस बताया गया है.कामिल बुल्के ने स्वान का अर्थ बताया है -राजहंस ,हंस तथा गूज के लिए भी हंस, कलहंस ,हंसी ,हंसिनी शंब्दों का उल्लेख किया है ...

स्वान(Swan),जैसा कि पिछले पोस्ट में जिक्र हुआ है भारतीय मूल का पक्षी नहीं है किन्तु असली 'मानस का राजहंस'  वही लगता है ...और निश्चय ही  प्राचीन  बृहत्तर भारत के आखिरी छोरों से आज की भागोलिक सीमाओं में कभी   आ सिमटे हमारे अदि पूर्वजों के की स्मृति शेष में रचे बसे उसी स्वान -राजहंस की ही छवि -विवरण हम ऋग्वेद एवं कतिपय प्राचीन संस्कृत साहित्य के ग्रंथों में पाते हैं ....और परवर्ती साहित्य में हिमालय पार कर यहाँ आने वाले कई प्रवासी पक्षी (गूज आदि ) ,यहाँ तक कि बत्तखों को भी हंस माना जाने  लगा. विश्वमोहन तिवारी कहते हैं कि वैदिक काल  के ऋषि गणों  के भ्रमण का दायरा बड़ा विस्तृत था -वे कश्मीर ,कैलाश तथा मानसरोवर तक आते जाते रहते थे जहां प्रवासी स्वान प्रजाति भी शीत ऋतु में दिख जाती थी..मगर कालान्तर के कवि जन तराई तथा गंगा की कछार तक ही सीमित होते गए जहां उन्हें गूज दिखते रहे और उन्होंने इसी प्रजाति की पदोन्नति हंस में कर दी .. हिमालय की एक घाटी जिससे ऐसे प्रवासी 'हंस' मैदानी भागों में प्रवेश करते है को कालिदास ने मेघदूत में हंसद्वार कहा है जो आज भी कुमायूं जिले में नीतीघाटी  के नाम से जाना जाता है और इससे होकर तिब्बती यात्री आते जाते हैं ....


संस्कृत साहित्य के विद्वानों में भी असली राजहंस को लेकर मतभेद रहा है .कुछ विद्वानों ने इसे बिलकुल सफ़ेद न मानकर धूसर माना है .अमरकोश में राजहंस के बारे में बताया गया है कि इनका शरीर 'सित' आँखें और पैर लाल रंग के होते हैं ...राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैलोहितै: सितः ..सित का अर्थ बिलकुल सफ़ेद  न होकर धूसरता लिए सफेदी से है ..जाहिर है यह विवरण 'स्वान' से नहीं मिलता बल्कि फ्लमिंगो (The Greater Flamingo (Phoenicopterus roseus से काफी मिलता है और इसलिए यह पक्षी भी राजहंस पद का प्रबल दावेदार है -यह मूल भारतीय देशज पक्षी है और गुजरात के कच्छ जिले के 'ग्रेट  रन आफ कच्छ' में इनका विशाल नीड़-क्षेत्र है -जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है .इसे फ्लमिंगो सिटी के नाम से भी जाना जाता है .यह विश्व का सबसे बड़ा फ्लमिंगो प्रजनन स्थल है . यही पास में ही हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले हैं जो  पुरातत्व विशेषज्ञों के भी आकर्षण का केंद्र है -इस तरह कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के आदि काल  के  भी साक्षी  रहे हैं फ्लमिंगो! और कोई आश्चर्य नहीं यदि इस पक्षी को जन स्मृतियों में महत्वपूर्ण स्थान मिला है .सालिम अली ने अपनी पुस्तक 'द बुक आफ इंडियन बर्ड्स ' में इसे राजहंस की पदवी पर प्रतिष्ठित  किया है ...कामिल बुल्के ने इसे ही हंसावर कहा है .
राजहंस का एक और प्रबल दावेदार (विकीपीडिया ):फ्लमिंगो  

फ्लमिंगो गुजरात के कच्छ जिले ही नहीं देखा जा सकता बल्कि जैसा कि सालिम अली मानते हैं यह अपने घुमक्कड़ स्वभाव के कारण भारत में कहीं भी दिख सकता है,विश्व के तमाम और भागो में तो पाया ही जाता है ... मैंने आज तक फ्लमिंगो नहीं देखा मगर हो सकता है आपमें से कुछ ने देखा हो ...यह बहुत सुन्दर पड़ा पक्षी है और राजहंस कहलाने की पूरी काबिलियत रखता है ...
विकीपीडिया के नक़्शे में रन ऑफ़ कच्छ 
मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं कभी रन आफ कच्छ जरुर जाऊं और इन नयनाभिराम पक्षियों का दर्शन कर नेत्रों को लाभ दूं .यह वैसे तो पूरा मरुथल है मगर बरसात के दिनों में मीठे -खारे पानी का जमाव यहाँ होता है और फ्लमिंगो घोसले बनाते हैं जो मिटटी के तिकोने ढूहे से लगते हैं . रिफ्यूजी फिल्म की शूटिंग यही हुयी थी ...क्या कोई ब्लॉगर मीट यहाँ हो सकती है एक लाईफ टाईम नज़ारे को आँखों  में कैद करने के लिए? कोई गुजराती ब्लॉगर बंदा  क्या पढ़ रहा है यह?

क्रमशः ....

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

मानस के राजहंस (1)

विभिन्न सामाजिक अवसरों के इस वाक्य से भला शायद ही कोई अपरिचित हो -...."हे मानस के राजहंस तुम भूल  न जाना आने को ..." मतलब मेहमान को एक बड़ी पदवी देकर सम्मान सहित बुलाने का भाव इस अर्धपंक्ति में निहित है ..मगर मानस के राजहंस से क्या सचमुच हम भलीभांति परिचित हैं? ...यह आश्चर्यजनक है कि भारत में कई पक्षी विद्वान भी इस पक्षी की वास्तविक पहचान को लेकर भ्रमित रहे हैं .ऋग्वेद में जो राजहंस वर्णित है वह तो भारतीय महाद्वीप का पक्षी ही नहीं है ...पक्षी प्रेमी विश्वमोहन तिवारी अपनी पुस्तक "आनंद पक्षी निहारन का" (नेशनल बुक ट्रस्ट ) में कहते हैं कि 'हंस शब्द वैदिक काल में अधिकतर महाहंस (हूपर स्वान-Cygnus cygnus ? ) को इंगित करता था' मैं उनके कथन से सहमत हूँ मगर महाहंस जिसे मैं राजहंस भी कहूँगा यहाँ का पक्षी है ही नहीं ..
यही है वह हंस -महाहंस जिसका उल्लेख हमारे ग्रंथों में हुआ है -(Whooper स्वान) 

यह शुभ्र -श्वेत पक्षी  विभाजित  रूस के अधिकाँश भाग से लेकर फिनलैंड तक  अपना साम्राज्य आज भी बनाए हुए है और ये कई यूरोपीय देशों,कैस्पियन सागर,जापान ,चीन के कुछ क्षेत्रों और कभी कभार भूले भटके कश्मीर तक प्रवास करते देखे गए हैं .....आज भी इनकी संख्या १८0,000 है मगर अफ़सोस कि भारत में ये नहीं मिलते.. मगर जो बात आश्चर्य में डालती है वह यह कि आज के भारत में इनकी नामौजूदगी के बाद भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों ,वैदिक साहित्य और संस्कृत साहित्य में हंस की इसी प्रजाति का बहुलता से विवरण है ..ऐसा कैसे संभव है?

हंस ज्ञान की देवी सरस्वती का वाहन घोषित है -कवियों ने हंस को सरस्वती के वाहन के रूप में ही प्रतिष्ठित नहीं किया, नीर -क्षीर विवेक के गुण से भी युक्त किया -यह सरस्वती के साहचर्य के साथ सर्वथा उपयुक्त ही था -हेन्सैर्यथाक्षीरमिवाम्बुमध्यात  ....अर्थात यह हंस पानी का पानी और दूध का दूध  (अलग)   कर सकता है -कवि कल्पना ने यहीं विराम नहीं लिया वरन कैलाश पर्वत के सन्निकट मानसरोवर(अब चीन नियंत्रित तिब्बत में )  को इसका वास स्थान बताकर उस सरोवर से मोती चुग कर खाने की  विशिष्ट आहार प्रियता के गुण का भी बखान किया ...मगर फिर वही प्रश्न  उठता है कि जब महाहंस यहाँ था ही नहीं तो इसका इतना विपुल विवरण भारतीय साहित्य में कैसे है?
स्वान -हंस का मूल पर्यावास और प्रवास क्षेत्र :ध्यान दें भारत तक इनकी पहुँच नहीं है (विकीपीडिया ) 

निश्चय ही भारत की आज की भौगोलिक सीमा  हजारों वर्ष पहले इतनी सिमटी हुयी नहीं थी -या फिर इरान और कैस्पियन सागर तक रह रहे हमारे पूर्वज जो महाहंस से पहले से ही बखूबी परिचित रहे हों ,अपने रचना लोक .में इसका उल्लेख करते रहे हों.  जब प्रवास गमन के उपरान्त वे और नीचे मौजूदा भौगोलिक सीमाओं में आयें हों तो यह स्मृति भी स्मृति -वाचिक परम्परा में यहाँ अक्षुण बन गयी हो ...ध्यान रहे ईरानियों के ग्रन्थ अवेस्ता और ऋग्वेद में आश्चर्यजनक समानताएं हैं -अब यह पक्षी साक्ष्य भी इसी तथ्य की इन्गिति करता है कि हमारे पूर्वजों का साम्राज्य निश्चय ही इरान और वाह्य  यूरोपीय सीमाओं तक कभी न कभी अवश्य फैला था और वे कालांतर में दक्षिण पूर्व की और लौटे हैं ....जबकि प्रवासी पक्षी हजारो साल से एक निश्चित परिक्षेत्र में ही रहते आये हैं उनके प्रवास क्षेत्र /मार्ग में बड़े परिवर्तन नहीं हुए हैं ...यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने इस पक्षी को  भलीभांति देखा भाला था ,अपनी स्मृतियों-श्रुतियों  में अमर कर रखा था और बाद में उनकी आगामी पीढ़ियों की कृतियों में भी उनका उल्लेख बना रहा है -भले ही कभी भी महाहंस का यह पर्यावास  न रहा हो ....
राजा रवि वर्मा की एक अमर कृति : राजकुमारी दमयंती और राजहंस 

हमारे लौकिक साहित्य में भी हंस को कई रूपों में जाना समझा गया है -दो हंसो का जोड़ा दाम्पत्य निष्ठा का प्रतीक है तो हंस आत्मा का भी प्रतीक है ..हंस विद्वता का प्रतीक है, परमहंस परम ज्ञानी का द्योतक है ....कालिदास ने  महाहंस (स्वान ) तथा अन्य हंस प्रजातियों में  विभेद किया है -विश्वमोहन तिवारी ने अपनी उक्त पुस्तक में महाहंस ,हंस तथा हंसक श्रेणियों का उल्लेख किया है और बताया है कि भारत में महाहंसों के चार  वंश ,हंसों के नौ वंश तथा हंसकों के छत्तीस   वंश हैं जिनमें गूज  'goose ' और बत्तखें तक सम्मलित है .इसी संदर्भ में उन्होंने कालिदास को उद्धृत किया है -जिन्होंने  रघुवंश में स्वयंबर के लिए राजाओं के सामने चलने वाली इंदुमती की चाल को महाहंस की चाल ,रानी बनने के बाद गरिमा और भव्यता को दर्शाती उनकी हंस की चाल का उल्लेख किया है -महाभारत के एक कथा दृश्य - राजकुमारी दमयन्ती और हंस संवाद को रवि वर्मा ने अपनी पेंटिंग के लिये  चुना है जहां हंस दरअसल 'स्वान' ही है ..जाहिर है हंसों की विभिन्न प्रजाति का ज्ञान पूर्व मनीषियों को था   .मगर सबसे बड़ा सवाल तो यह कि जिस महाहंस की बात आज हम यहाँ कर रहे हैं उसका प्रवास क्षेत्र तो कभी  यहाँ रहा ही नहीं! स्पष्ट है हमारे पूर्वज कवि निश्चय ही 'स्वान' के प्रवास क्षेत्र से ही इन स्मृति बिम्बों को पीढी दर पीढी अक्षुण बनाए रहे ...


जारी .... .

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

बहुत खराब है महिलाओं का समय प्रबन्ध

वैसे तो ऐसे  पुरुष भी कमतेरे नहीं हैं जिनका समय का प्रबंध बहुत लचीला रहता है -समय से आफिस नहीं पहुंचते,प्रायः बॉस की डांट खाते हैं मगर अमूमन महिलाओं का समय प्रबंध बहुत कमज़ोर होता है ऐसा मेरा अनुभव रहा है . आश्चर्य है इतने महत्वपूर्ण विषय पर आज तक कोई गंभीर अध्ययन नहीं हुआ है या कम से कम मेरी खोजबीन का नतीजा यही रहा है ...कई भारतीय महापुरुषों का समय प्रबन्ध बड़ा ही सटीक और शानदार रहा -गांधी जी समय के बड़े पाबन्द थे ...एक बार उन्होंने एक अध्यापक को मिलने का समय दिया था जो दस मिनट देर से पहुंचे तो गांधी जी ने उन्हें  बड़ी फटकार लगाई -कहा कि अगर यही आदत उनके छात्रों की होगी तो देश समय के कितने पीछे चला जायेगा ...विदेशों में समयबद्धता की कितनी मिसालें तो हम अक्सर सुनते ही रहते हैं ..मुझे विदेशी पुरुषों और महिलाओं के तुलनात्मक समय प्रबंध की कोई प्रमाणिक जानकारी तो नहीं है मगर कहे सुने की बात है कि सारी दुनिया में ही अमूमन समय प्रबंध के मामले में पुरुषों की तुलना में वे खासी फिसड्डी होती हैं ....

सबसे खस्ताहाल तो भारतीय महिलायें हैं -यहाँ तो लगता है कि उनसे  समय का विवेक ही छिन सा गया है...एक स्टीरियोटाईप तो वही है कि पतिदेव तैयार बैठे हैं ...किसी का बुलावा है शादी समारोह का और पत्नी जी तैयार हो रही हैं ....इस स्थिति से आपका भी दो चार हुआ ही होगा ..मिनट नहीं, घंटे बीत जाते हैं मगर श्रीमती जी का सजना बजना बदस्तूर बना रहता है ...पतिदेव कुढ़ रहे होते हैं ,झंखते झल्लाते हैं मगर अंततः असहाय हो चुप मार जाते हैं ,उन्हें भी पता है ही कि इस मामले  का कोई इलाज नहीं है ....मेरे एक संबंधी हैं बिचारे की पत्नी जी की तैयारियों में कई बार ट्रेन छूटी है ..एक बार तो ऐसा वाकया हुआ कि ट्रेन के चल पड़ने के साथ ही जब पत्नी जी पहुँची तो उन्हें तो ट्रेन पर चढ़ा कर वे खुद उतर गये और पत्नी को विदाई का गुड बाय कह दिया ..ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी थी ..खैर फोन कर यात्रांत के परिजनों को उन्हें रिसीव करने को आगाह कर दिया ...बात तो ख़त्म हो गयी लेकिन अभी भी समय प्रबंध को लेकर दंपत्ति  में जिच कायम रहती है . 

मैंने ज्यादातर सरकारी कार्यालयों  में पाया है कि देवियाँ तनिक या फिर अधिक देरी से ही पहुँचती हैं ..कई बार बेबस बॉस भी कुछ कह नहीं पाता इस कारण से कि सख्ती का परिणाम कहीं उसे ही महिला शक्ति से टकराने के  के खामियाजे के रूप में न भोगना पड़ जाए -कुछ सख्त बॉस अपने ऊपर लांछन आदि भी झेल चुके हैं, इन कबाहतों के चलते ..मैं भी इस मामले में फूंक फूंक कर ही कदम उठाता आया हूँ -क्योकि मुझे पता है कि जिस तरह से मैं अपने पुरुष सह कर्मियों के ऊपर समय की लापरवाही को लेकर बिफर पड़ता हूँ अगर कहीं महिला कर्मी से यही बर्ताव हुआ तो शायद वह दिन भी न देखना पड़ जाय जिससे बच पाने  में मैं विगत तीस वर्षों से भाग्यशाली रहा हूँ ..मगर इसका रंच मात्र भी  गुमान नहीं है मुझे  ..बल्कि डर ही बना रहता है..शेष सरकारी सेवा बस कट जाय किसी तरह! 

जैवीय विज्ञान और व्यवहार शास्त्रों के अध्ययन ने मुझे इस मामले को भी सुलटाने को प्रेरित किया .काफी सोचने विचारने के बाद जो बात मन में कौंधी है वह यही है कि महिलायें इसकी दोषी नहीं हैं -दोष उनके वैकासिक अतीत का है ..उनकी जीनों में उनकी देर सवेरी का राज छुपा है -जब मनुष्य गुफावासी था तो पुरुषों का दल जहां  शिकार को निकल पड़ता था वहीं घरैतिनें घर पर मौज मस्ती काटती थीं ..एक दूसरे का सुखवा दुखवा सुनती सुनातीं थीं ..आराम से बच्चों को नहलाती धुलाती थीं ...चौका बासन के साथ ही खाना पानी का इंतजाम करती थीं मगर सभी कुछ आराम से,सलीके से ....कोई  जल्दीबाजी नहीं ....पतिदेव  तो शाम को ही आयेगें ....ढेर सारा फुर्सत भरा समय ..समय ही समय ..फिर समय प्रबंध की जरुरत ही कहाँ ? जबकि पुरुष टोलियों के लिए समय प्रबंध उनके लिए जीवन मृत्यु का प्रश्न था ..खिसकते सूरज के साथ उन्हें शिकार की टोह में दूर सुदूर भटकने के साथ ही समय से वापस लौटने की फ़िक्र होती थी ....कहीं रात हुयी तो धुप अँधेरे में शिकारी के  शिकार बन जाने की बड़ी आशंका थी ....हिंस्र पशुओं की भरमार थी तब ....दिन के उजाले में बचाव संभव था मगर रात में शिकारी असहाय था .....

 पुरुषों का समय प्रबंध महिलाओं से बेहतर तभी से हुआ ..चूंकि जीन प्रेरित व्यवहार हज़ार लाख वर्ष में ही बदलते हैं इसलिए समय का यह लोचा आज भी कायम है ....दृश्य भले ही बदल गएँ हैं जीन हमारे वही हैं! 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

शिव बारात सज रही है!

आज तो बम बम बोल रही है काशी....शिवरात्रि पर काशी  शिवमय हो जाती है ..शिव बारात सज रही है ...बरात क्या है चित्र विचित्र दृश्यों का संयोग है -एक बूढा बैल पकड़ा गया है,लोग उस पर भयावह से लग रहे बाल शिव को बैठाने के उपक्रम में हैं ...बैल बिदक रहा है ..लोग उसे संभाले हुए है ..दर्शक दूर से नमस्कार कर रहे हैं ..कहीं बैल बिदक गया तो किसी के थामें न थमेगा ..मेरे मन में भी दहशत है इसलिए एक सुरक्षित कोना ढूंढ लिया है ..बारात सज बज रही है ...यह भी कोई बरात है?


बैल तो बिदक गया अश्वारूढ़ हुए शिव बाबा -शिव बरात का एक दृश्य 

अजब गजब स्वांग भरे हैं बाराती -कोई नंगा ,कोई अधनंगा ,कोई लूला कोई लंगड़ा ,कोई अँधा कोई काना ...और भूत पिशाचों की तो एक अलग टोली है -खुद शिव मुंड माला पहने हैं ,अधनंगे हैं ,भभूत लपेटे हैं ,गले का जिन्दा फुफकारता नाग  है,विषदंत न भी टूटा  हो तो भी विषकंठी पर विष का प्रभाव कहाँ? अजब गजब बरात.. बस चलने को उद्यत है ...यह कैसा दृश्य है? ..कोई बरात ऐसी भी हो सकती है भला? हजारो हजार साल से शिव की बरात ऐसी ही निकलती आयी है -कहीं यह हजारो हजार विपन्न, अभाव ग्रस्त प्रवंचित भारतीयों का एक सांकेतिक चित्रण तो नहीं? क्या हुआ हम गरीब हैं ,बुभुक्षित हैं मगर उत्सवप्रेमी हम भी हैं -क्या हम मानव नहीं ? हमें क्या खुशियाँ मनाने का हक़ नहीं? हम जैसे हैं वैसे ही अपनी खुशियों का इज़हार करेगें! शिव की यह बरात मन में कई तरह के भावों को संचारित कर रही है -यह भी लग रहा है कि शिव  भी कुछ कम मौजी और किलोल -कौतुकी नहीं हैं -ऐसी बरात उनकी परिहास प्रियता का नमूना तो नहीं?

लोकमन के जितने करीब शिव हैं उतना  कृष्ण भी नहीं ...जन जन में रचे बसे हैं शिव ...न जाने कितने लोक गीत और लोक कथाएं भोले को लेकर प्रचलित हैं ..कहते हैं अपने नंदी पर ही पार्वती को भी बिठाए  हुए     (जबकि पार्वती का   वाहन अलग है ) भोले बाबा गाँव गिरावं घूमते रहते हैं- लोगों का दुखदर्द बांटते रहते हैं ...भला ऐसे दयालु दंपत्ति से लोगों का लगाव क्यों न हो ..भारत की नारियां तो शिव के प्रति पूरी समर्पित हैं ...शिव पूजा के प्रति उनमें विशेष उमंग और उछाह रहता है .....वर्षा ऋतु का एक पर्व है ललही छठ-यह औरतों का ही पर्व है जहां  वे इकट्ठी होकर शिव पार्वती के अन्तरंग पलों का भी चटखारे लेकर बयां करती हैं -इस शिव पार्टी में पुरुषों का जाना निषेधित है ..ऐसी पार्टी में एक बच्चे के रूप सम्मलित  मैंने जो कथायें सुनी है कि बस उनका स्मरण मात्र होठों पर मुस्कान बिखेर रहा है ...एक आम भारतीय नारी का शिव से इतना अपनापा है कि बस कुछ मत पूछिए ..शिव   खुद उनके स्वामी की प्रतीति हैं  ... शिव भोले भले हैं मगर  रसिक भी कम नहीं ..बस दिखने में ही बौरहे बकलंठ हैं, अन्दर से बड़े गहरे हैं ...उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है ....वे कड़े योगी हैं तो बड़े भोगी भी हैं ..
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आदि देव हैं शिव ....विद्वानों के बीच उनके आर्य अनार्य होने की बहस छिड़ जाती हैं ..मैं तो यही मानता हूँ की वे मानव की चेतना की अनुपम अभिव्यक्ति हैं -उनकी संकल्पना खुद हमारी अभिलाषाओं ,आकांक्षाओं ,दुर्बलताओं ,विपन्नताओं ,प्रवंचनाओं की ही देन है -इसलिए ही तो हम उन्हें अपने इतना करीब पाते हैं -हर किसी ने शिव को अपने अपने रंग में गढ़ा है -विद्वानों को  जहाँ वे 'नमामीशमीशान निर्वाण रूपं .....' लगते हैं तो एक तांत्रिक को वे भस्मावेष्ठित  कपाल कुंडल युक्त अघोरी दिखते हैं ..नर्तक -गायक उन्हें इस विद्या के अधिष्ठाता  मानते हैं तो किसी योद्धा को वे तांडव मुद्रा की प्रतीति कराते हैं ....कालांतर में सबने उन्हें अपना बनाया  है ,वे क्या सर्वहारा क्या समृद्धिवान सभी के चहेते देव हैं ....लोकमानस ने उनके साथ खुद को इतना जोड़ लिया है ,इतनी कथायें रच डाली हैं कि वे आम भारतीय में सदियों से ऐसे गुथे हुए हैं कि आगे भी कितनी सदियाँ क्यों न बीत जाएँ जनमानस शिवत्व से विलग नहीं हो सकता .....

योगी तो ऐसे कि उनके ध्यान भंग करने के लिए  कामदेव को अपनी जान की बाजी लगाने पडी ..मगर आसक्त भाव भी ऐसा की दक्ष यज्ञ के पश्चात मृत सती का शरीर लिए छः माह व्यथित विकल घूमते रहे ....मृत विगलित शरीर जगह जगह गिरता रहा -जो पुण्य स्थान बनते गए ...बनारस के एक घाट पर मणि कुंतल के साथ कान गिरा तो वह  मणिकर्णिका कहलाया -जो मोक्ष "श्रोतम श्रुतैनैव ' से नसीब था वह मणियुक्त पार्वती के कर्ण अवशेष अनुप्राणित स्थल के जीवित ही नहीं मृत्योपरांत भी  संस्पर्श मात्र से ही सर्व सुलभ है -आज  हिन्दुओं का अंतिम संस्कार के रूप में यहीं शव दाह की परम्परा है ---कामरूप कामाख्या में सती का एक कामांग  गिरा तो  जन श्रुति चल पडी कि पूरब की महिलाओं में जादू का आकर्षण है -यहाँ अकारण ही पूरब की बूढ़ी दादियाँ और स्त्रियाँ अपने बच्चों /पतियों को असम/बंगाल के सौन्दर्य से  बच के रहने की चेतावनी नहीं देतीं ....

बिना पार्वती के संस्पर्श -साथ के शिव भी शव रूप ही हैं ....वे शिव तो शिवा के संयोग से ही हैं ....एक भक्त ने वामांग में  पार्वती को बैठे देख हठ कर लिया कि वह केवल शिव रूप का ही अर्चन चाहता है तो शिव खुद अर्धनारीश्वर बन गए ...उस मूरख को कहाँ पता था कि वे अलग है ही कहाँ?  वे तो शब्द और अर्थ की भांति जुटे हुए हैं ....वागर्थाविव संपृक्तौ ...पार्वती परमेश्वरौ .....शिव की बारात नगर की गलियों को गुलजार कर रही है -बच्चे बूढों सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुयी है ....चारो और हंसी और ठिठोली का माहौल है .....भला ऐसी भी कोई बारात होती है ....जस दुलहा तस बनी बराता....

इस संसार में जो कुछ भी मनोरम है, सौष्ठव और सामंजस्य लिए है विभिन्न विरूपताओं में भी संतुलन बनाए हैं  वही शिव है -आप सभी का शिव पार्वती मंगल  करें-यही कामना है !  

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

परिणय बत्तीसी: सुहाना सफ़र और सलामत बत्तीसी!

वह प्रथम मिलन: संध्या -अरविन्द!  
देखते देखते दस बीस नहीं बत्तीस वर्ष बीत गए ....गनीमत यही कि खुदा के फज़ल से अभी बत्तीसी सलामत है..१८ फरवरी १९८१ की उस गुनगुनी शाम और गुलाबी निशा की यादें आज भी तरोताजा हैं, हाँ बारीक डिटेल्स यानी कोहबर और सोहबत की बातें  जरुर विस्मृत हुई  हैं ....यह पूरी तरह से एक अरेंज्ड मैरेज थी .....पिता पितामह चाचा आदि श्रेष्ठ जनों ने जो आज्ञां दी सर माथे ले ली थी ....उसके पहले के एकाध क्रश और क्रैश का गला घोटकर :)  ...मैंने विवाह पूर्व के कतिपय कैजुअल रागात्मक सम्बन्धों के  दरम्यान यह बात बहुत साफ़ करके रखी थी कि विवाह का स्वतंत्र निर्णय मैं नहीं ले पाऊंगा ..यद्यपि दूसरों को इसके लिए प्रोत्साहित करता था और अपने एक मित्र की कोर्ट मैरेज में मैंने भी बखूबी उत्प्रेरण का दायित्व निभाया था......
  परिणय के साक्षी मित्रगण 
मगर खुद अपने बारे में ऐसा निर्णय इस लिए नहीं ले पा  रहा था कि परिवार में कुछ वर्षों पहले ही बिना पारिवारिक सम्मति के  एक इंटर रेलिजन विवाह हो चुका था और परिवार के कई सदस्य इससे संतप्त थे -ख़ास कर मेरे पितामह जिन्हें मैं बेहद चाहता था ..फिर दुबारा कम से कम उन्हें दुखी करना नहीं चाहता था..उन्हें अपनी खोयी साध पोते की शादी में पूरी करनी थी सो उन्हें मैं इसका पूरा अवसर उन्हें देना चाहता था ..यह उनका हक़ था ....और किन तरीकों से पितामह ऋण से उरिण हुआ जा सकता है ...  साथ ही  एक पूर्व पारिवारिक घटना के संघात की भरपाई भी करना मेरा जैसे मकसद सा था -जैसे त्याग का एक जनून सा तारी हो गया था  मुझ पर ..और इसलिए  मां बाप नियोजित इस विवाह प्रस्ताव को शिरोधार्य कर लिया था मैंने ...

....पितामह और परिजनों ने सचमुच अपनी साध पूरी की और पूरी सज धज के साथ बारात निकली थी ..बरात में दो दो रियासतों के राजा -राजा जौनपुर और राजा सिंगारामउ गए थे जो की एक विरल घटना मानी गयी थी -कारण कि रियासतों के वैमनस्य के कारण वे कभी साथ साथ नहीं होते थे ....मित्रगण इसे एक सामंतवादी नजरिये का नाम देगें और शायद उनकी यह सोच सही भी है ..मैं भी उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था और बहुत सी बातें मुझे भी नागवार लगती थी मगर मैं तो त्याग की प्रतिमूर्ति बना बैठा था न ....सो चुप ही रहा हर समय... 

मगर मुझे आज भी लगता है कि बिना कोर्टशिप के विवाह कैसा? गनीमत यही थी कि प्रचलित रस्म के मुताबिक़ मेरा गौना(वधू की विदाई )  लगभग एक वर्ष बाद होना था सो मैंने एक जिम्मेवार पति के दायित्व को बखूबी निभाया ...उन दिनों गौने के पहले ससुराल आना जाना एक टैब्बू था सो मैंने पत्राचार का रास्ता निकाला..हर रोज श्रीमती जी को एक पत्र  लिखने लगा ..और निरंतर यह अनुरोध   कि वे भी मुझे निरंतर पत्र लिखें ...आखिर शुरुआती संकोच के बाद उनके पत्र  लेखन का सिलसिला नियमित हो चला था औंर गौने के दिन आते आते एक दूसरे के प्रति हमारे अपरिचय का फासला मिट चुका था ..प्राणी शास्त्र /व्यवहार विज्ञान के अध्ययन ने मुझे मनुष्य की मूलभूत जैवीय आवश्यकताओं के बारे में काफी कुछ समझा रखा था और एक बात जो जेहन में बराबर घूमती रहती थी वह यह थी कि मनुष्य के मामले में कोर्टशिप अवधि अमूमन एक वर्ष की होती है ....मतलब हमारे बीच यह अवधि सफलतापूर्वक बीत गयी थी भले ही गहन पत्राचार के जरिये ही ...और प्रत्यक्षे किम प्रमाणं? आज ३२ वर्ष बीत गए हैं और हमारे बीच की सहमति सामंजस्य के प्रति जन परिजन भी प्रायः ईर्ष्यालु हो उठते हैं ....
आज कुछ घंटों पहले का एनीवर्सरी  फोटो 

हम तब तक जिम्मेदारियों के बोझ का साझा निर्वहन भलीभांति नहीं कर सकते हैं  जबतक जोड़ बंध मजबूत न हों और वे कैसे मजबूत हो सकते हैं मुझे लगता है कि उसे एक प्राणिविद से बेहतर शायद ही कोई समझ सकता हो .... :) भले ही हमारे  अली भाई अपने  समाजविज्ञान की अपनी विद्वता बघारें और सुश्री प्रिय आराधना चतुर्वेदी अपना पांडित्य ..जैवीयता के बंध गहरे होते हैं यह मैं आपसे पूरी ईमानदारी के साथ शेयर करना चाहता हूँ -यह  बेसिक/आधारशिला है  और बाद में समाज विज्ञान और मनुजता की दीगर विशिष्टताएं भी आ जुड़ती  हैं ....आज हम मिया बीबी, हमारे  बच्चे एक गहरे बंधन से जुड़े हैं और अपने जीवन से सर्वथा संतुष्ट और तमाम आपा धापी, विरोधाभास   और जीवन की अपरिहार्य ,समस्याओं के बावजूद भी हम एक इकाई हैं .....
आज शाम हम पुष्प प्रदर्शनी देखने गए तो जामियास  वू सा लगा !

संध्या  धुर आस्तिक हैं तो मैं नास्तिक हूँ ..मगर हाँ मैं एक दूसरे तरीके का नास्तिक हूँ ..मुझे अपनी संस्कृति ,संस्कारों पर गर्व है और ईश्वर के अस्तित्व को लेकर मैं अपने उपनिषदों के नेति नेति की विचारधारा का समर्थक हूँ ...ईश्वर को न तो प्रकल्पित किया जा सकता है और  न ही रूपायित ही ....यहाँ मैं इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा के करीब हूँ मगर इस्लाम के परवर्ती विचारों और कूपमंडूकता से मुझे  सख्त नफरत है, उसी तरह से जैसे हिन्दू धर्म के पौरोहित्यवाद और पंडावाद का मैं विरोध करता हूँ -मगर क्या करियेगा ..कबीलाई समूहों की प्रवृत्ति हमारे जीनों में रची बसी है और इसलिए अपने को अलग थलग दिखाते रहने की जैवीय प्रतिबद्धता ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँट  के रखा है और यह मनुष्य प्रजाति के खात्में के साथ ही शायद  ख़त्म होगा.... अरे अरे यह कैसा लेक्चर देने लगा मैं ..आज तो हमारी परिणय बत्तीसी है ....

आप महानुभावों की शुभकामनाओं,आशीर्वाद और कुछ प्रियजनों की मीठी ईर्ष्या की भी दरकार है आज तो, ...और आप सभी हम दोनों को इनसे धन्य और परिपूर्ण  करेगें ऐसी आशा है ...... 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

मुर्रा भैंसों का कैटवाक:स्पर्धा में बेशर्म चयनित ,शर्मीली बाहर!

यह अभिनव आयोजन हरियाणा के जींद शहर में होना तय है .इसके पहले सोनपुर के प्रसिद्ध पशु मेले में भी ऐसे आयोजन को जनता का भरपूर समर्थन मिला था ...माडल्स का कैटवाक तो फैशन की दुनिया का एक जानामाना आयोजन है -बिल्लौरी आँखों के चुम्बक और मदमाती "फेलायिन " चाल से लोगों के कलेजों  पर बिजलियाँ गिरातीं माड्लें...निश्चित ही नए आयोजन की प्रेरणा स्रोत भी यही माड्लें ही हैं ..वैसे भैंसों की तुलना भी बेहतर सेक्स से चोरी छुपे और दबी जुबान में पुरुष जन करते ही रहते हैं ....अब यह आयोजन एक दमित इच्छा का उत्सवी प्रगटीकरण  ही लगता है ...

सौन्दर्य की  नयी श्यामा :) कैसी लगी ? 
सौन्दर्य के इन नयी कृष्णा -माडलों के लिए अलग ढंग और डिजाईन के रैम्प बनाए जा रहे हैं....और आयोजन के पहले चयन की स्पर्धा में बेशर्म भैंसों को ही चयनित किया गया है और शर्मीलियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है -आयोजक बिलकुल वही मोड्यूल अपना रहे हैं जो माडलों के कैटवाक का है ...बेशर्म इसलिए कि हजार जोड़ी घूरती गृद्ध दृष्टियाँ कहीं भैंसों को भी नर्वस न बना दें ....इसलिए शर्मीली  पहले से ही बाहर कर दी गयीं -यहाँ तो भीड़ के सामने उद्धत और बेपरवाह ,बिंदास या बम्बास्ट ही बने रहना पड़ता  है ..शर्मीली  बिचारियों के लिजलिज संस्कार उनके आड़े जो आ जाते हैं ...सो वे कहीं आयोजन के रंग में भंग न डाल दें इसलिए जजों की पारखी दृष्टि ने उन्हें पहले ही पहचान कर घर का रास्ता दिखा दिया है ....

अगर हम माडलों के कैट वाक्  के अल्पकालीन इतिहास पर गौर करें तो इसकी शुरुआत फैशन डिजाईनरों ने अपनी दुकान चलाने को किया था -हाँ इससे माडलों को और भी  मौके मिले और विश्व सुन्दरियों तक का चयन भी ऐसे ही आयोजनों से मूर्त रूप लेने लगा  -प्रयोगधर्मियों ने बाद में गृहणियों को भी रैम्प पर रम पम   कराने की मुहिम चलाई और यह कतई असंगत नहीं कि अब रैम्प पर सौन्दर्य की नयी कृष्णाओं की धमक होने को है ...कैटवाक पर निश्चित ही पुरुष माडल सफल नहीं हुए और यही कारण है कि भैसे  इस प्रतियोगिता से अभी भी बाहर हैं -युगल कैटवाक का भी यहाँ सवाल नहीं है क्योकि कहीं यम दूत और दूतियाँ रैम्प पर कैटवाक करते करते सहसा कुछ और अप्रत्याशित  गुल न खिला दें -यह एक बड़ा रिस्क है!आयोजक यह रिस्क लेने को तैयार नहीं हैं खास तौर पर इस बासंती मदमाते मौसम में!

वैसे हरियाणा सरकार का जाहिरा तौर पर यह दावा है कि पूरा आयोजन मुर्रा भैंसों की नस्ल  को जनप्रिय बनाए जाने का है -जो अधिक दूध देती हैं .और हरियाणा में इन्हें पालने वालों को समाज में ऊँची नज़रों से देखा जाता है -जितनी मुर्रा  भैंसे दरवाजे पर उतनी ही बड़ी हैसियत और रुतबा -अब इसके बारे में डॉ .दराल साहब और दीगर हरियाणवीं ब्लॉगर बन्धु ज्यादा जानकारी दे सकते हैं ....

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

काश तुम मेरी वैलेंटाईन होती...!

तुम्हे पता है इन दिनों मैं कितना व्यस्त हूँ ..बावजूद इसके अपने प्रेम का इज़हार करने का कुछ समय चुरा ही लिया  -धरती के भूगोल के इस हिस्से में प्रेम के  नए महापर्व के पूर्व दिवस पर....यह पत्र  मैं गोपन भेज सकता था मगर न जाने क्यों यह मन हो आया कि इसे सार्वजनिक दृश्य पटल पर रखूँ ...प्यार कोई गुनाह नहीं फिर डरना भी क्यों ....कभी कभी ऐसा भी होता है जो बात अकेले में कहने में संकोच  होता है उसे सार्वजनिक करने में उतनी मशक्कत नहीं होती .... यह सहानुभूति और जन सहमतियाँ बटोरने का कारगर नुस्खा भी रहा है ...टंकी रोहण का धर्मेन्द्र का शोले दृश्य भला किसी को भूल सकता है .....

अब लोगों को शायद  गुमान हो या न भी हो मगर यह पत्र केवल तुम्हारे लिए है ......तुम कौन? कभी मैंने इसका उत्तर दिया था -तुम जो मात्र शरीर ही नहीं एक शाश्वत कामना हो .....अब उम्र के इस पड़ाव पर सहसा ही यह अहसास हो चला है कि प्यार केवल और केवल सूफियाना ही होता है ....और जो सूफियाना हो वही दरअसल सच्चा प्यार है ....देह की हिस्सेदारी तो महज कुदरत की चालबाजी है जो केवल अपनी लीला का विस्तार चाहती है और कितनों को ही बसंत के फसंत में फंसाती है -बड़ी ठगिनी है रे यह कुदरत......मगर इस देह फांस के बाद भी जो बच रहता है वही तो है न प्यार!  

मैंने सोचा कल पता नहीं हो या न हो यह इज़हार आज ही कर संतुष्ट हो लूं ....वैसे भी कल परसों यू पी के इलेक्शन में मरने की भी फुरसत नहीं रहेगी ...लोग कयास लगायेगें कि यह बासंती सन्देश किसके लिए है मगर तुम्हे तो किंचित भी डाउट नहीं होना चाहिए ...जानेमन यह तुम्हारे और केवल तुम्हारे लिए है ....मुझे उन लोगों की अस्मिता और स्टीरियो टाईप सोच पर तरस आता है जो प्यार के मनोभावों को महज इसलिए जगजाहिर नहीं करते कि आखिर लोग क्या कहेगें ..दुनिया क्या सोचेगी ..इमेज का क्या होगा ? उनसे केवल यही सवाल है कि प्यार में भला कौन सी भद्दगी है या गन्दगी छुपी है? और वैलेंटाईन दिवस से बेहतर कौन सा दिन हो सकता है ऐसी अभिव्यक्ति का -वैसे भी वैलेंटाईन दिवस और बसंत का आह्वान साथ होने में महज कोई संयोग नहीं दीखता ....हमारे कुछ साथी न जाने क्यों इस अवसर पर आक्रामक हो उठते हैं ..प्यार मनुहार पर आक्रोशित हो उठते हैं ....मुझे नहीं लगता कि मानवीयता और मानवता का इतना उत्कृष्ट प्रदर्शन कोई और होता हो ....कहीं  यह  कुछ दिशाहीन मित्रों की कोई अपनी ही संकीर्णता तो नहीं जो अवसर पर मुखरित हो उठती हो ? कहीं  वे प्यार के चिर प्रवंचित तो नहीं  ..सहानुभूति है उनसे ....मुझे लगता है उन्हें भी रेड रोजेज चाहिए ..ढेर सारे रेड रोजेज... काश वे प्यार के अहसास से लबरेज हो पाते....

मैंने अपने मन की बात कह दी है ..मुझे तुम्हारे जवाब की अधीरता से प्रतीक्षा रहेगी .यहीं या मेरे मेल पर .....
तुम्हे और मेरे सभी मित्रों और दुश्मनों को भी वैलेंटाईन दिवस की अनेक अशेष शुभकामनाएं! 

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