गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

पुस्तक लोकार्पण: मैंने किया,मेरी हुई!

यह तो आप जानते ही हैं और न जानते हों तो जान लीजिये, लखनऊ में भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन पर एक राष्ट्रीय कार्यशिविर अभी अभी आयोजित हुआ जिसमें इस बन्दे की भी भागीदारी हुई ....रुकिए रुकिए मैं यहाँ विज्ञान  पर आपका माथा नहीं चाटने जा रहा ...बल्कि लोकार्पण समारोह से जुड़े चंद जज्बात साझा कर लेना चाहता हूँ ...अंगरेजी के  पुस्तक 'रिलीज ' या 'अनवीलिंग' सेरेमनी  को हिन्दी जगत में विमोचन /लोकार्पण कहने का  प्रचलन है ....नेशनल बुक ट्रस्ट (एन बी टी )  दिल्ली ने मुझे 'इसरो की कहानी' पुस्तक के लोकार्पण सत्र में पुस्तक पर एक आलेख वाचन के दायित्व के साथ आमंत्रित किया था ..पुस्तक जाने माने प्रक्षेपक /प्रक्षेपास्त्र विज्ञानी वसंत गोवारीकर द्वारा मराठी में लिखी गयी है जिसका हिन्दी अनुवाद एन बी टी ने अभी अभी प्रकाशित किया है ..
साईंस फिक्शन इन इण्डिया का लोकार्पण : बाएं से मैं ,मुख्य अतिथि अनिल मेनन ,वरिष्ठ साहित्यकार हेमंत कुमार ,डॉ चन्द्र मोहन नौटियाल और सुप्रसिद्ध विज्ञान कथाकार देवेन्द्र मेवाड़ी 

इसके साथ ही दो और पुस्तकें लोकार्पित होनी थी -जीनोम यात्रा -लेखिका विनीता सिंघल और विज्ञान और आप -लेखक  डॉ. पी जे लवकरे....इस तरह तीन किताबें दुल्हनों की तरह सज धज के समारोह में लाईं गयीं थीं ..एन बी टी के सहायक सम्पादक पंकज चतुर्वेदी ने बच्चों को मंच पर बुलाकर पुस्तकों का विमोचन- घूंघट उठवाया और पुस्तकों का आमुख देखकर बच्चे दीवाने हो चले ..और दीवानगी का आलम यह कि प्रकाशक से बिना एक एक पुस्तकों का उपहार लिए वे मंच से नहीं उतरे ...

मगर एक दो पुस्तकें और भी थी जिसे विश्वप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक अनिल मेनन ने लोकार्पित किया ...एक तो साईंस फिक्शन इन इंडिया जिसका सम्पादन खुद मैंने और मित्रों ने किया है तथा दूसरी हास्य विज्ञान उपन्यासिका बुड्ढा फ्यूचर जिसे जीशान हैदर ज़ैदी ने लिखा है .....विज्ञान कथा की कार्यशाला में इन पुस्तकों के विमोचन की धूम मची रही ...बाकी एक से एक दिग्गज विज्ञान कथाकार इस आयोजन में जुटे जिसकी रिपोर्ट जाकिर अली 'रजनीश ने तस्लीम पर डाल दी है  सो दुहराव की जरुरत नहीं है ....
एन बी टी की पुस्तकों को बच्चों ने खुद लोकार्पित और आत्मार्पित किया: मंच पर बच्चों के साथ पुनः मैं ,लेखिका विनीता सिंघल और देवेन्द्र मेवाड़ी  

इस आयोजन में बहुत आनंन्द आया ..एक नागवार बात भी गुजरी ..जहाँ हम रुके थे ..सप्रू मार्ग पर, सरकारी देखरेख के होटल गोमती में ,वहां अतिथियों के कमरों में अंगरेजी अखबार देने का ही रिवाज है ..मैं जब रिसेप्शन पर गया और हिन्दी अखबार की मांग की तो मुझे अजीब नज़रों से देखा गया ..बताया गया  यहाँ हिन्दी अख़बार नहीं दिए जाते ...यह हाल हिन्दी प्रदेशों के ह्रदय स्थली की है ....बेहद आपत्तिजनक और अफसोसनाक ....कोई सुन रहा है जो इस मामले में हस्तक्षेप करने की कूवत रखता हो? हाय बेचारी हिन्दी अपने ही लोगों के बीच बेगानी हो गयी है ...! 

अब हम वापस तो आ गए है बनारस मगर विधान सभा सामान्य निर्वाचन का कार्यक्रम घोषित हो चुका है और अब अगले दो ढाई माहों के लिए मुझे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है ...इसे आप अर्ध टंक्यारोहण  भी कहना चाहें  तो सहर्ष कह सकते हैं ..जो लोग इस ब्लॉग लिंगो से परिचित नहीं हैं वे ब्लॉग निघंटु के ज्ञाता किसी भी टिप्पणीकार से पूछ सकते हैं .....ऐसे कुछ ब्लॉग भाषा शास्त्री यहाँ टिपियाने तो आयेगें ही ...... 

रविवार, 25 दिसंबर 2011

जलेबीबाई, किसी मिठाई का नाम लो!

बहुत दिनों से यह पोस्ट लिखने को सोच रहा था .आज लगा कि मिठाईयों की चर्चा कर पिछली पोस्ट की कड़वाहट थोड़ी मिटाई जाय .. मिठाई के प्रति प्रेम सर्वव्यापी है ..यहाँ तक कि ईश्वर के भोग में मिठाई ही प्रमुख है ..लोकमंगल के अधिष्ठाता अपने गणेश तो मोदक/लड्डू प्रेमी हैं ही और इसलिए बिचारे डायिबिटीज के निवारण के लिए कपित्थ जम्बू जैसे सुन्दर (चारू) फलों का भी नियमित सेवन करते हैं ..सुना है इनमें डायबिटीज निवारक गुण होते हैं ...कपित्थ यानीं कैंत और जम्बू यानी जामुन! पता नहीं कितनो ने  कैंत  देखी है ,मगर इस पर हम कभी फिर चर्चा कर लेगें ..आज तो सुबह सुबह कुछ मीठा वीठा हो जाय ....तो आप आज अपनी पसंद की कोई मिठाई बताएगें ...

मुझे याद पड़ता है कुछ दिनों पहले जर्मनी वाले राज भाटिया जी ने फेसबुक पर भारत की राष्ट्रीय मिठाई के नामांकन की बात छेड़ी थी मगर उन दिनों जलेबीबाई की धूम मची हुयी थी इसलिए बात बस जलेबी के लटको झटकों से आगे नहीं बढ़ पाई....मैंने उस परिचर्चा में भाग लेते हुए अपनी पसंद लड्डू ही बताई थी ....मेरी निगाह में तो यही भारत की राष्ट्रीय मिठाई बनने  लायक है ,कन्याकुमारी से कश्मीर तक लड्डू का ही जलवा है ....मगर यहाँ आपको राष्ट्रीय नहीं अपनी पसंद की मिठाई बतानी है ताकि हिन्दी ब्लागजगत की पसंदीदा मिठाई की पहचान हो सके.... वैसे अपनी  जलेबीबाई को मैंने मेल भेजकर उनकी भी पसंद पूछी है ..उनका जवाब आता ही होगा ..डर यही है कि नाम के साथ अगर फरमाईश भी हो गयी तो? :) 
किसिम किसिम की मिठाईयां मगर ब्लागजगत की पसंद कौन? 

वैसे मुझे मिठाई से ज्यादा चाट पसंद है और इस मामले में मेरी रसना बड़ी देशज है ..भारत के अलावा चाट के चाहने वाले दीगर देशों ,दुनिया जहान में बहुत कम हैं ...यहाँ तो चाट पर चर्चा शुरू हो जाय तो क्या कहने एक से एक बढ़कर आईटम हैं ..यम.. यम.. सी.. सी ..और यह मेरी कमजोरी भी है.. तो इस पर भी चर्चा आज स्थगित कर ही देते हैं ,वैसे सुना है बहुत सी कोमलान्गियों को भी चाट प्रिय है और जाहिर है वे मुझे भी प्रिय हैं बिना कहे ही ...मगर मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कतिपय देवियों को भी मिठाई पसंद है और मिठाई से उन्हें रिझाने का एक गौरवशाली इतिहास रहा है .. :) 


हमने बड़े बूढों के मुंह यह सुना है कि जब नागरी बसाहटें उतनी वजूद में नहीं थीं और मानव सभ्यता गाँव गिरावों में आँखें मुलमुला रही थी तब कुछ ख़ास गोत्रों के श्रेष्ठ जन अगल बगल की ईख या अरहर की घनी फसलों में एक ख़ास किस्म की तत्कालीन जलेबी जिसे आज भी "चोटहिया जलेबी"  के नाम से भारत के इस पूर्वांचल में जाना जाता है सरे शाम छोड़ आते थे..और घोर आश्चर्य यह कि सरे सुबह वह वहां से अछ्छन्न (अदृश्य) हो जाती थी ..यह किसी मानवेतर प्राणी का काम नहीं होता था ..बल्कि आधी दुनिया का कोई खूबसूरत नुमायिन्दा इस काम को अंजाम दे देता था और यह सिलसिला चल पड़ता था और फिर मडवे तले  तर्ज पर एक गुनगुनी सी प्रेम कहानी जन्म ले लेती थी जिस पर आगे चल के विदेशिया आदि फ़िल्में तक बनी ....ज्ञानी जन प्रसंग और सन्दर्भ समझ गएँ होगें और नहीं तो फिर ब्लागजगत के रसिक जनों (नाम जानबूझ कर नहीं ले रहे हैं ..,नाराज हो गए तो ? ) से पूछ पछोर सकते हैं ...

आज तो हम उस ज़माने की चोटहिया जलेबी ,गुड गट्टा ,खील बताशों के मीठे संसार से बहुत आगे आ गए हैं ..अब तो डिजाईनर मिठाईयों का क्रेज है और उनके अजीबो गरीब नाम हैं .मगर आपसे इन के तनिक पहले की पारम्परिक मिठाई का नाम पूछ रहे हैं ..जैसे रसगुल्ला ...पहली बार जब मैं  कलकत्ता (आज का कोलकाता ) गया तो देखा वहां  एक साथ कई कई रसगुल्लों को गड़प करने का रिवाज है ..हम बहुत अचम्भित हुए मगर एक साथ मैंने भी कई रसगुल्लों को उदरस्थ कर एक नया अनुभव हासिल किया ..तो समझिये मेरी भी पसंद यही है ...आपको अपने नाम बताने हैं .....आप बेशक कोई प्रतिक्रया  भी इस पोस्ट पर कर सकते हैं मगर अपनी पसंद की मिठाई का नाम जरुर लिख दें... ताकि यह रायशुमारी पूरी हो जाय और एक ब्लॉग जगत की मिष्ठान्न निर्देशिका तो बन ही जाय ..सर्व पसंद मिठाई का निर्धारण भी हो जाय ... तो तैयार हैं न आप ? तो बस शुरू हो जाईये !  

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

क्या समझे? नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :)

 ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती या उपलब्धि जो भी कहिये यही है कि यहाँ संवेदना और बुद्धि के विभिन्न स्तरों से साक्षात्कार का सुख मिल जाता है जो आज के वर्तमान में भी  वस्तुतः मनुष्य के बौद्धिक विकास की क्रमिकता/ऐतिहासिकता  का आश्चर्यजनक रूप से सिंहावलोकन करा देता है -मैं प्रत्येक ऐसे अवसर पर रोमांचित  और आह्लादित होता हूँ...क्या नहीं है यहाँ -साहित्य की ज्ञात और नवोन्मेषित कितनी ही विधाएं यहाँ अपनी ओर ललचाती सी हैं ..कहानी है ,कविता है ,व्यंग है ,हास परिहास है ,संस्मरण है, आशय कि सचमुच क्या नहीं है यहाँ ..मगर यहाँ केवल लेखक बने रहने और पाठकों की प्रतीक्षा करते रहने से काम नहीं चलने वाला है ...यहाँ तो सभी लेखक हैं ...और वही पाठक भी हैं ...हाँ चेतना ,बौद्धिकता के विभिन्न स्तर जरुर हैं ..मगर खुद एक लेखक बने रहने और अपने को पढ़ाते रहने की ही प्रवृत्ति या अपेक्षा यहाँ नहीं चलने वाली ....
जैसे अपनी कविता तो कवि जी ने पकड़ पकड़ के अनेक हिकमतों  से ,प्यार मनुहार और चाय तक पिला के सुनाई  मगर जब मेरी सुननी हुई तो जनाब भाग खड़े हुए ..यहाँ यह आत्मकेंद्रिकता  की मानसिकता नहीं चलने वाली ..ऐसे कितने ही स्वनामधन्य और स्वयंभू यहाँ आये और चलते बने ...शायद वे ज्यादा ही आत्म गौरव के बोध से  त्रस्त थे-ब्लॉग जगत ने उन्हें रास्ता दिखा दिया ..रास्ता नापो भैया....बड़े साहित्यकार हो तो अपने घर के, यहाँ दाल नहीं गलने वाली ...मैं देखता हूँ कि कई ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरणों के बाद भी अभी भी कुछ लोग अपनी अहमन्यता से बाज नहीं आ रहे हैं ....वे चाहते तो हैं कि उनका ब्लॉग हाथो हाथ ले लिए जायं  ,उनकी हर पोस्ट पर पाठकों की इतनी भीड़ आ जुटे कि शीशी चटखने वाला मुहावरा चरितार्थ हो जाय  मगर कभी खुद किसी के यहाँ  नहीं तशरीफ़ रखेगें ....हम भी आखिर कब तक वहां जाने की सदाशयता दिखाते रहेगें.. विनम्रता ,औदार्य ,शालीनता की आखिर कोई सीमा भी तो है या नहीं?
अब लोगों को कौन समझाए भैया ब्लॉग लेखन एक दुतरफा संवाद का माध्यम है ,यहाँ महज अपनी ढपली अपना राग नहीं चलने वाला ....यहाँ का सरोकार है दूसरे के कहे को भी सुनना,समझना और भागीदार बनना  ..उनके  यहाँ आते जाते रहना ...फिर अपनी भी कहना ...लेकिन मगरूर लोगों को कौन समझाए ....खुद को अर्श पर होने और बाकी को फर्श पर पड़े होने की समझ से भी ब्लॉगजगत जूझता रहा है ..अच्छी बात है कि ऐसे कई सारे तो किनारे को आ गए हैं..कुछ घोषित करके विनम्रता या बेहयाई से तो कुछ   अपनी औकात और सीमाओं को समझ बिना घोषित, बिना गीत गवनई के चुपचाप चलते बने  .....मतलब बिना बताये ही टंकी पर चढ़ अपने ब्लागीय जीवन का उत्सर्ग कर लिया ....इस अर्थ में ब्लॉग लेखन केवल "बड़कवा" लेखक बने रहने की आत्ममुग्धता नहीं है ,यह एक सामजिक  सरोकार का  संवाद मंच भी है ....डायरी लिखनी है तो तोप ढक के रखिये न यहाँ काहें उघारे फिरते हैं ?  सही है ब्लागजगत में कोई फन्ने खा नहीं है ....साधारण बनने और जुड़ने की तमन्ना हो तो ठहरिये वर्ना अपना बोरिया बिस्तर अच्छा हो खुद उठा के पतली गली से निकल लीजिये नहीं तो बाद में कहीं यह न कहना सुनना पड़े ..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले ...
एक जमाना हुआ करता था हमें भी अपने एक बड़े लेखक होने का गुमान था ..बिना दमड़ी लिए लिखते न थे....एक अजब सा गुमान,बेखुदी  और मदहोशी तारी थी ....लोग अब किताबें लिखने ,छपने की चर्चा करते हैं यहाँ तो मुझे उन पर दया आती है ..भैया इस गुमान में न रहियो यहाँ ....हमने तो यह रहस्य पहले ही भांप लिया था और तभी बिना दमड़ी की अपेक्षा के यहाँ झख मार रहे हैं .. जो चीज है यहाँ वो कहीं पे नहीं ....तो यहाँ रुकने लिखने आपके विचार जानने,यथा संभव लोगों के यहाँ पहुँचते रहने की ,संवाद बनाए रखने की मेरी कोशिश ही रहती है ....बाकी कुछ रूठे हुए लोग भी है उनके प्रति भी मन में कभी कभी प्यार सा उमड़ा आता है मगर वे खुद उस उमड़ते प्यार को रोपने कटोरा लेकर नहीं आते तो वह व्यर्थ ही बह जाता है .. :) 
 हमने लेखन से बहुत कमाया है रोजी रोटी चल सकने लायक नहीं (उसके लिए एक अदद नौकरी तो है ही) ..मगर बहुत कम भी नहीं ..इस अर्थ में कि जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान..इस ब्लॉग लेखन की अपार्च्यूनिटी कास्ट बताऊँ तो आप निरा बावरा समझेगें मुझे ....इस ब्लॉग जीवन में दो पुस्तकों को लिखने की पेशगी ठुकरा चुका हूँ ..अब ब्लॉग जीवन से फुरसत तो मिले.... है न यह पागलपन? मगर मुझे तो जो ब्रह्मानंद की प्राप्ति यहाँ होती है वह कहीं नहीं ...खुद को अभिव्यक्त करने की ही नहीं दूसरों को पढने और वहां उनके संवाद में भागीदार होने में ...यह घनानंद तो कभी कभी शब्दों में व्यक्त होने की सीमा के बहुत बाहर हो रहता है .....
तो जनाब लुब्बे लुआब यह कि यहाँ लेखक होने का मुगालता न पालिए ...यहाँ ब्लॉगर बने रहिये तो ठीक नहीं तो अपना कोई नया ठीहा तलाश कर लीजिये...हिमालय की खोह या किसी घने बचे जंगल की वीथिका .....क्या समझे?  नहीं समझे? बुद्धू कहीं के ... :) 
नोट: यह पोस्ट लिखी  जिस भी जेंडर में हो इसे कामन जेंडर में समझा जाय ! 

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

फेसबुकिया दोस्तों तुम्हे सलाम!

कल फेसबुक पर शाम को मैंने टिपियाया,"जब तक कि मेरे कल के जन्मदिन की बधाईयों का ताता एक मंद झोके  से बड़े बवंडर का रूप यहाँ ले ले ,आप सभी को अग्रिम धन्यवाद और शुभकामनाओं के साथ यहाँ से मैं फूटता हूँ मित्रों ...अपना ध्यान रखें और मस्त रहें ..... :)" ..फिर सचमुच वहां  से फूट लिया ..मगर तब तक वहां आंधी आ चुकी थी और बधाईयों की बौछार अब चक्रवात का रूप लेने वाली  थी ...अब तक सैकड़ों बधाईयाँ जन्मदिन की फेसबुक पर मिल चुकी हैं और मेरे लिए मुश्किल क्या एक चुनौती है उन सभी का अलग अलग जवाब दे पाना ...उनमें से ज्यादातर तो मेरे कहने भर के मित्र हैं -वे मगर मानवीय सौहार्द और भातृत्व का प्रदर्शन करने में जी जान से जुटे हुए हैं ...आज मनुष्य ऐसे ही पृथ्वी जेता नहीं बन बैठा है -कुछ तो है इस प्रजाति में -और यह वही प्रजाति -एकजुटता है,दूसरे का साथ निभाने की अकुलाहट है जिसे हम प्रेम ,आत्मोत्सर्ग (altruism ) जैसे कितने ही रूपों में जानते आये हैं ...न कोई ख़ास जान पहचान मगर शुभकामनाएं देनें को तत्पर... 

मेरी लम्बी उम्र और स्वास्थ्य को वेद की ऋचायें पढी जा रही हैं ....तरह तरह से मनुष्य की आप्त -कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति दी जा रही है ...और मैं सच में अभिभूत हूँ ..इसलिए भी कि भावनाओं का यह अंनत प्रवाह मुझमें ऊर्जा भर रहा है ..मुझे जीवंत बनाए रखने का भरोसा दे रहा है -जबकि आज की इस त्रासद दुनिया में कितने ही विश्वास टूट रहे हैं इतने धोखे मिल रहे हैं और जीने के मायने धुंधलाते जा रहे हैं ...मनुष्यता का यह उज्जवल पक्ष ही जीवन में भरोसा भरता है  ,आश्वस्त करता है  ....शुभचिंतकों की कमी नहीं है यहाँ ..यहीं ब्लॉग जगत में कल तक के कई बेहद अपने आज बेगाने हो गए मगर दुनिया कहाँ अपनत्व से खाली हुई? अनजाने अजाने लोगों की शुभकामनाएं तो साथ है ....यहाँ भी और वहां भी!

हम तो देहाती आदमी ठहरे ...जहां आज भी जन्मदिन मनाने का कोई रिवाज नहीं है और न ही इन अवसरों का कोई महत्त्व ही ...दिन आते जाते ऐसे ही सारा जीवन बीत जाता है ....मैं भी अपना बर्थ डे कहाँ याद कर पाता था इस रूप में, मगर अंतर्जाल और फेसबुक से जुड़कर तो  मानो यह एक उत्सव बन गया है -एक अनुभूति की हम तो अभी भी जिन्दा हैं ,याद किये जा रहे हैं ....नहीं तो हालत उस जुमले की तरह होती जा रही थी ..."मौत से आप नाहक परेशान हैं आप जिन्दा कहाँ हैं जो मर जायेगें :)" मगर फेसबुक पर उमड़ती शुभकामनाओं की लहरें मुझे मेरी जीवन्तता का अहसास दिला रही हैं -शुक्रिया फेसबुक और शुक्रिया मेरे फेसबुकिया दोस्तों ,आपने मुझे जीने का एक नया अहसास दिया है ....सलाम! 

जब से पाबला साहब ने  जन्मदिन के  ब्लॉग के समापन की घोषणा की है ..यह जिम्मेदारी भी तो खुद भी अपुन पर आ गयी है ..नहीं तो मेरे ब्लागीय मित्र कहते कि आपने तो बताया  ही नहीं कि आपका जन्मदिन है -जैसे बता देने पर मेरी सारी गुस्ताखियाँ माफ़ हो जायेगीं  और लोग मुझे गले लगाने दौड़ पड़ेगें :) मगर न बताना भी तो अब ठीक नहीं है जब एक और आंधियां चल पडी हों तो इधर तितलियाँ कुछ तो पंख फड़फडायें ( I mean butterfly effect) ....दोस्तों क्या अब कहना  भी पड़ेगा कि आज मेरा जन्मदिन है ? :)

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

भारतीय साड़ियों की दुशासन ब्रांड!

फैशन के नाम पर तन उघाडू संस्कृति के  पोषक पश्चिमी जगत का अगर कोई जाना माना डिजाईनर भारतीय साड़ी संस्करण लांच करे तो साड़ियों की उस खेप को मैं दुशासन ब्रांड ही कहूँगा या आपके पास कोई और मौलिक सुझाव है? टाईम पत्रिका से मुझे जानकारी मिली कि 174 वर्ष पुराने  पारसी फैशन हाउस हेर्मेस ने  भारतीय साड़ियों की पहली खेप जारी की है जो बेहतरीन फ्रेंच सिल्क और भारतीय पारंपरिक कला और शिल्पकारिता की अद्भुत मिसाल के रूप में प्रचारित की जा रही है . मगर यह पहली खेप तो भारतीय नारियों को ललचाने के लिए है जैसा कि हेर्मेस के भारतीय अध्यक्ष बेरट्रेंड मिचौड का कहना है ....मगर इन साड़ियों का मूल्य ६००० से ८००० डालर  के बीच है -मतलब तीन   से चार  लाख रुपये फी साड़ी....फिर तो इसे और भी दुशासन ब्रांड कहने का मन हो आया क्योंकि यह तो  अमूमन भारतीय नारी के तन को घेरने  वाली नहीं है ...बस फैशन शोज में दिखावे का आईटम बनके रह जायेगी जहां कपडे कम शरीर की नुमाईश ज्यादा होती है ..


इस ब्लॉग-पोस्ट के जरिये मैं हेर्मेस  को यह सलाह देना चाहता हूँ कि इन साड़ियों को वे दुशासन ब्रांड का नामकरण देकर यहाँ के परिवेश के एक ख़ास उपभोक्ता वर्ग में इन्हें ज्यादा लोकप्रिय बना सकते हैं ....कहते हैं इसी वर्ग ने इन दुशासन ब्रांड की पहली खेप को हाथोहाथ खरीद लिया ....भारतीय पहनावों और खासकर साड़ी के धंधे में भारतीय व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से मुकाबला आसान नहीं है ...यहाँ तक कि चीन ,ब्राज़ील और रूस के उपभोक्ता तक पश्चिमी फैशन डिजाईनरों /हाउसों के नए नए उत्पादों -फैशन पहनावों   को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं मगर भारतीय जनता इन्हें घास नहीं डालती -क्योकि आज भी यहाँ पारम्परिक परिधानों का ज्यादा बोलबाला है -देशी पसंद है .ऐसे परिवेश में हेर्मेस का यह साड़ी -उद्यम एक बड़े साहस का ही काम लगता है ...जो भी हो अभी तो इन 'दुशासनी'  साड़ियों की पहली खेप यहाँ बीते अक्टूबर में उतारी जा चुकी है और दावे हैं कि सभी की सभी बिक भी चुकी हैं ....
भारतीय नारी अपने पारम्परिक छवि में 
(फोटो पत्नी की पसंद है) 

फ्रेंच साड़ियों की इस खबर पर मेरी नज़र एक बनारसी होने के कारण भी पड़ी -अब बनारस की साड़ियों  की एक अपनी अलग क्रेज है और अपुष्ट आकड़ों पर अगर कुछ भी भरोसा किया जाय तो यहाँ बनारसी साड़ियों का सालाना कारोबार करोड़ से अरब तक जा पहुंचता है -जबकि धंधे के मंदी की बात हर साड़ी दुकानदार और व्यवसाय से जुड़े लोगों की जुबान पर रहता है ...बनारसी साड़ियों की मांग व्याह शादी के अवसरों पर कई गुना बढ़ जाती है क्योकि फैशन से दीगर इनका अपना एक सांस्कृतिक महत्व भी है ....बरात में वधू से लेकर आधी दुनिया की पूरी नुमायन्दगी जब इन लक दक बनारसी साड़ियों में सज धज के होती है तो लगता है इन्द्रपुरी ही धरा पर उतर आयी हो ...और यह शुभ -सगुन की प्रतीक तो है ही ....नारी मन इन साड़ियों के साथ ही कल्पना /फंतासी के कितने ही ताने बाने बुनती रहती है .अभी अभी देखी फिल्म द डर्टी पिक्चर के आख़िरी दृश्य में  बिस्तर पर लाल रेशमी साड़ी में आत्महत्या -मृत  हीरोईन का शरीर अरमानों की मौत का दर्शक के लिए न भूल पाने वाले  दर्दनाक मंजर को उभारता है.....

भारतीय साड़ी नारी के अरमानों और फंतासियों से जुडी है ...और भारतीय सौन्दर्य भी इस परिधान में सौन्दर्य का जो प्रगटन पाता है वह एक आम  भारतीय के लिए किसी विदेशी परिधान में मूर्त नहीं हो पाता ....वैसे उदात्त सौन्दर्य  परिधान का मुहताज हो भी क्यों यह रसिक जनों का एक अलग  विषय है ....बात  साड़ी की हो रही है तो यह भारतीय नारी परिधानों में निश्चय ही बेजोड़ है....तभी तो जब हेंडा सेल्मेरान वाराणसी आयीं तो यहाँ के साड़ी आवेष्टित नारी सौन्दर्य पर ऐसी फ़िदा हुईं कि खुद साड़ी पहनने का जिद कर बैठीं ....उनकी तमन्ना हमने शौक से पूरी कराई और उन्हें साड़ी का उपहार भी दिया ....

आप भी  जब कभी  बनारस  आयें हम अपनी बेगम से आपको साड़ी खरीद में मदद की सिफारिश कर देगें ...अब तो वे कुछ भन्नाती हैं मगर यहाँ आने वाले परिजन पर्यटकों के लिए यह समाज सेवा वे खुशी खुशी करती थीं यद्यपि सेवा शुल्क मुझे चुकाना पड़ता था हर बार  उनके खुद के किसी साड़ी के बिल को अदा करने के रूप में -उनके सामने तो मैं खुद को कितना  वस्त्र निर्धन समझता हूँ जब भी उनका साड़ी वार्डरोब मेरे सामने खुलता है तो आँखे भी चुधियाती हैं और दिल अपनी वस्त्र -निर्धनता की स्थति पर धक से कर जाता है -हम तो मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों तौर पर उनके वस्त्र भण्डार की बराबरी कई जन्मों तक भी न कर पायें ..ओह यह विषय विचलन .....हाँ तो यहाँ १००-१५० रूपये की साड़ी से साठ पैसठ हजार की साड़ियाँ मैंने खुद शो रूमों में सामने पसरते देखी हैं ..शादी सगुन पर हजार बारह सौ और एकाध बार दस हजार तक की खरीदनी पड़ी है ..मगर यहाँ साड़ी का असली दाम किसी को  भी शायद पता नहीं होता .गोदौलिया के साड़ी के अपरम्पार दुकानों में मोलभाव की आवाजें गूंजती रहती है -मगर समय और अनुभव के साथ हमने ऐसी दुकानों का चयन कर लिया है जहां मोलभाव बिलकुल नहीं है ...और इस तरह ज्यादा ठगे जाने का अहसास भी नहीं होता ....

बनारस के साड़ी प्रतिष्ठानों में अभी भी दुशासन ब्रैण्ड साड़ियों का इंतज़ार है . 


बुधवार, 14 दिसंबर 2011

एक काफी कथा......

अभी उसी दिन इस फिलम को देखने अपने एक हैण्ड इन ग्लव  मित्र एम एल गुप्ता जी के साथ जब टिकट विंडों पर पहुंचा तो सारी व्यग्रता धरी रह गयी ..कारण फिल्म साढ़े बारह के बजाय  डेढ़ बजे शुरू होनी थी ..पहले से हमें मालूम  समय बदल चुका था ....पूरा एक घंटा व्यग्रता के साथ काटना पहाड़ सरीखा लगा तो मैंने मित्रवर को काफी पीने का आमंत्रण दिया और जे एच वी मॉल के आधार तल पर अभी हाल ही में खुले कैफे काफी डे   तक हम जा पहुंचे ..यहाँ पूर्णतः सेल्फ सर्विस है ....हमने मीनू मंगवाया और मित्र से अपनी रूचि के मुताबिक़ आर्डर देने का अनुरोध किया ..उन्होंने  कहा बस एस्प्रेसो काफी पीते हैं ....मीनू /मेन्यू  कार्ड  में एस्प्रेसो काफी के साथ दिए चित्र में काफी फोम -झाग का दृश्य आमंत्रण भरा था .... मुझे याद है आर्डर  लेते समय काउंटर ब्वाय ने कुछ जिरह करने की भी हिमाकत की थी जिसे हमने कैफे काफी डे की सौजन्यता में एक माईनस प्वायंट के रूप में देखा था ....हमने एक न सुनी और निश्चयात्मक आवाज में जो आर्डर दिया गया है उसी को सर्व करने को कहा ...काश हमने उसकी बात  ध्यान से सुन ली होती ...मगर इसके बजाय  इन नए नए खुल रहे प्रतिष्ठानों  में प्रोफेसनलिज्म की कमी क्यों है इस मुद्दे पर हम बौद्धिक मंत्रणा करने लगे और इसी बीच काफी सर्व हो गयी ..कप में काफी की अत्यल्प मात्रा देख हम भौचक से रह गए .. लगभग ८० एम एल के काफी के मिनिएचर मगों में बस २५ एम एल काफी? एम एल गुप्ता मेरे मित्र भड़क उठे ....  बस इत्ती सी काफी और पूरा खाली पड़ा कप ... जैसे किसी कुएं में हम झुक कर देख रहे हों  की पानी कितना नीचे है :)  इत्ती तो लोग चाय के कपों में नफासत से छोड़ देते हैं ..और इतनी हमें सर्व हो रही थी ...यह हमारी तौहीन सी लग रही थी हमें! ..


यह क्या मजाक है मित्र बिफर पड़े ..कम से कम पूरे कप को भर कर काफी देनी थी ....कहीं इस तरह से खाली कप भी सर्व किया जाता है? यह तो अशिष्टता है मित्र ने कहा और मेरा भी उनसे इत्तिफाक था कि पांच सितारा होटेलों तक में इस तरह से तो काफी सर्व नहीं होती -क्या  कैफे काफी डे की  यह कोई नयी काफी संस्कृति  विकसित हुयी थी? ..मित्र कह रहें थे कि काफी की एस्प्रेसो मशीन पर भी झागदार काफी पीने को मिलती है और यह थी बिलकुल काली काफी और फिर हल्का सा सिप करके बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा ओहो यह तो बड़ी कडवी भी है ..हम तो न पी पायेगें उन्होंने काउंटर की ओर देखकर  किसी को आने का इशारा किया ..
काफी में पानी मिलाकर सिप करते करते मुझे अचानक   याद आयी की यह फोटो ले लूं ताकि बता सकूं  इत्ती सी ही काफी सर्व हुयी थी हमें ! 

मैं हालात को समझने और उस पर नियंत्रण का प्रयास कर रहा था ..कहीं कोई शिष्टाचार से जुडी सामाजिक असहजता (faux pas)  न उत्पन्न हो जाय ..एकाध अगल बगल बैठे लोग कनखियों से अब देखने लगे थे....बहरहाल उत्पन्न संवादहीनता को भांप काउंटर से एक जिम्मेदार कैफे काफी डे बंदा आया और पूरी विनम्रता से अपनी बात समझाने लगा ..उसकी बात का लुब्बे लुआब यह कि एस्प्रेसो काफी ऐसी ही नीट/ सान्द्र होती है ..इसमें दूध नहीं मिलाया  जाता ..मगर वह मेरे मित्र की इस बात का वह माकूल जवाब नहीं दे पा रहा था कि फिर  मीनू में एस्प्रेस्सो काफी के कप का काफी से भरे झागदार चित्र क्या  कस्टमर को बरगलाने  के लिए हैं  ....बहरहाल मैंने हस्तक्षेप किया और कहा कि थोडा गरम पानी लाओ ...अब इतना सीन क्रियेट हो जाने पर उसके पास भी कोई चारा नहीं था ..

काफी कैफे डे के एक कोने को सुशोभित करते मेरे मित्र 
कुछ पलों में छोटे छोटे से क्यूट से सर्विंग कपों में गरम पानी आ गया ..हमने उसे काफी में मिलाया ..मेरे मित्र ने चीनी का एक और शैसे  मंगाया ,मिलाया और किसी तरह रह रह कर काफी को हलक के नीचे उतार पाए ...और फिर कभी काफी कैफे डे की और रुख न करने की कसम खायी....यह एक संवादहीनता थी जो सी सी डे और उपभोक्ता /कस्टमर की बीच हुयी थी ... मगर इसका जिम्मेदार कौन था? ...क्या  विज्ञापन संस्कृति या हमारी अज्ञानता? मुझे लगता है दोनों!मगर आज के उपभोक्ता जागरूकता  के महौल में यह सी सी डे सरीखे नए नए उभर रहे प्रतिष्ठानों की भी जिम्मेदारी बनती है कि उनका कस्टमर ठगा सा न महसूस करे ..क्योकि इसमें तो नुक्सान उनका ही है ....

हमने वापस आकर काफी साहित्य पर  काफी शोध संधान किया जिसका एक विस्तृत व्योरा आप यहाँ देख सकते हैं मगर फिलवक्त इतना कह दूं कि एस्प्रेसो काफी वह नहीं है जैसा कि अक्सर जनता, हम और आप समझते हैं -यह दूध वाली झागदार /फेनवाली काफी तो बिलकुल नहीं है ....यह काफी के बारीक दानों में से बड़े दबाव पर उबलते पानी को गुजार कर बस कुछ औंस सर्व कर दी जाने वाली काफी कंसंट्रेट है ...और इसका    काफी कल्चर के दीवाने ही लुत्फ़ उठाते हैं ...हमारी सरीखी जनता जब सी सी डे सरीखे उपक्रम में जाय तो उसे एस्प्रेसो के बजाय कैप्यूचिनो या कैफे मोचा या फिर एस्प्रेस्सो मैकियाटो का आर्डर देना चाहिए जिनमें  दूध मिला होता है और वे इतनी कड़वी नहीं होतीं या फिर ब्लैक काफी का आनंद  उठा सकते हैं ....मगर भूलकर यहाँ एस्प्रेसो का आर्डर न दें या आर्डर देने के पहले खूब दरियाफ्त कर लें ....जिससे आप ठगा हुआ सा महसूस न करें .....

काश यह पोस्ट लहरे फेम की पूजा उपाध्याय जी पढ़तीं जो जैसा कि इसी काफी काण्ड के समापन/अध्ययन  पर ज्ञात हुआ  वे सी सी डे में ही बंगलूरु में सीनियर ईक्झेक्यूटिव हैं..क्या बात है :)....  तो ब्लॉगर उपभोक्ताओं की बात उन तक पहुँचती और हमारा भी ज्ञानार्जन,मार्गदर्शन  होता .....

बहरहाल शो  का वक्त  हो गया था और  हम ऊपरी  मंजिल की ओर बढ़ चले थे.....

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

आखिर कितनी गंदी है यह 'गंदी फिल्म"?

द डर्टी फिल्म* * * * 

आप परिवार वाले हैं तो ऐसी फिल्म देखने के लिए जिगरा चाहिए....वैसे कोई जिगरा वाला भी पूरे परिवार के साथ  इस फिल्म को नहीं देख सकता ...उम्र की अधेड़ता को उघाड़ता पहला ही हाट बेड सीन बहुत आपत्तिजनक है ..कहाँ आकर फंस गए ..यही कोफ़्त हुई..मगर इस नकारात्मक सीन का एक  अलग एंगल  था जैसे  वह गौण सा हो और अभी बहुत कुछ दिखना सुनाना बाकी हो ...और यही सच भी था... अभी तो पूरी फिल्म बाकी थी ..पूरी बात अभी बाकी थी ....

मैं कहानी नहीं सुनाने जा रहा हूँ -बस एक छोर पकड़ा दूं ...एक अति साधारण परिवेश की लेकिन महत्वाकांक्षी लडकी की कहानी है जिसका आदर्श वाक्य यही है कि अहम फैसलों के लिए जिन्दगी दुबारा नहीं मिलती ..वह अपने शरीर को ही अपनी सबसे बड़ी पूजी मानकर खुद को पुरुषों के वर्चस्व और दोहरे मानदंडों वाली चकाचौध की व्यावसायिक दुनिया को समर्पित कर देती है ....और सफलता की सीढियां चढ़ती जाती है ....उसे यह मुगालता रहता है कि वह  लोगों को जो वे चाहते हैं देकर अपना मुकाम पा लेगी ...मगर विडंबना यह कि शोषण तो खुद उसी का होता है...और अंत में उसके पास केवल गंदी (पोर्न ) फिल्मों का विकल्प बचा रहता है -दैहिक भूख का बाज़ार ही ऐसा है जहाँ  मनुष्य की मनुष्यता  उससे छीन ली जाती है,  उसकी चेतना को कुंद करती  है, खुद को  खुद से अलग कर देती  है ..मैरिलिन मोनरो के साथ यही हुआ,दक्षिण की उस अभिनेत्री सिल्क  के साथ भी यही हुआ (जिस पर इस फिल्म को आधारित कहा जा रहा है ) ..... इस फिल्म की हीरोइन के किरदार ने  अंत में जब आत्महत्या कर ली  तो  यह एक दुखान्त और मार्मिक फिल्म बन जाती है ..मन संजीदा हो उठता है ....सारा गंदापन, सारी काम लोलुपता ,कामोद्दीपकता की चाह काफूर हो उठती है ...बल्कि एक क्षोभ सा भाव  ,एक कसक सी तारी हो उठती है सारे तन मन पर,पूरे वजूद पर  ......

फिल्म के कितने ही दृश्य गंदे या आपत्तिजनक भले हैं   मगर वे फिल्म का मुख्य प्रतिपाद्य /सबब नहीं बने हैं जो निर्देशक की कुशलता को बयां करते हैं ..सच कहूं तो यह निर्देशक की फिल्म है जिसने फिल्म के कंटेंट और अभिनेताओं के अभिनय को पटरी से उतरने नहीं दिया  ..हाँ इंटरवल के बाद कहीं कहीं कुछ दृश्य उबाऊ से हैं मगर यह फिल्म  का उत्तरार्ध ही है जो फिल्म के मूल मकसद को सामने ला पाने में पूरी तरह सफल साबित होता  है. फिल्म का संदेश बिलकुल लाउड एंड क्लीयर है -प्रेम जैसी उदात्त भावना सर्वोपरि है  ... देह का उत्सव मन के राग के आगे फीका है ....मानवीयता के इसी  शाश्वत पहलू की पुरजोर  प्रस्तावना और पुनरूस्थापना  करती दिखती है फिल्म और इसलिए चिर स्थाई  छाप छोड़ जाने में सफल होती है .....देह का आकर्षण ,वासना की भूख, प्रेम की एक महीन अनुभूति के आगे कितनी बौनी पड़ जाती है फिल्म ने इस पहलू को बहुत ही भावभीने और कलात्मक ढंग से उभारा है ....
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फिल्म के संवाद द्विअर्थी भले हैं मगर उनकी मार सटीक है...चुटीले हैं और दर्शकों के मुंह से वाह की आवाज बरबस निकलती है या फिर ठहाके गूंजते हैं ....विद्या बालन ने फिल्म में जान लगा दी है ....शायद उन्हें इसी फिल्म का एक डायलाग शिद्दत से याद रहा हो कि अभिनेता को धनाढ्य बनने में कई फिल्मों का योगदान होता है मगर भिखारी बनाने के लिए बस एक ही फिल्म काफी है ....इस नग्न सत्य के बाद भी परिणीता की इस गरिमायुक्त अभिनेत्री ने ऐसा चुनौती भरा रोल और वह भी पूरी ठसक के साथ किया है -यह सचमुच प्रशंसनीय है ..मैं विद्या बालन `का फैन नहीं रहा मगर उनके अभिनय का लोहा मान गया हूँ .......

फिल्म के इंटरवल तक इसे दो या ढाई स्टार देने को सोच रहा था मगर फिल्म के आधे उत्तरार्ध के बाद यह तीन में आ गयी और तेरे वास्ते मेरा इश्क सूफियाना के फिल्मांकन के साथ ही यह फिल्म चार स्टार तक जा पहुंची ..पांचवा स्टार पाने से यह फिल्म कुछ बेहद गलीज नागवार दृश्यों के चलते रह गयी जिनके बिना भी यह एक सफल व्यावसायिक फिल्म बनी रहती .....मगर फिल्म निर्माता कुछ ऐसे दर्शकों का मोह नहीं छोड़ पाए .......कुछ भी हों, फ़िल्में पैसा बनाने/कमाने  के लिए  बनायी जाती हैं केवल आदर्श ही बघारने को नहीं -फिल्म में  इस विवाद को भी लिया गया है.  मगर इस आड़ में ही आपत्तिजनक दृश्यों को परोसने की चलाकी भी दिखाई गयी  हैं ....फिल्मों में गलीज और गंदे दृश्य हो या न हों इसी विवाद को एक पात्र इमरान हाशिमी ,जो फिल्म में एक आदर्शवादी निर्देशक की भूमिका में है और फिल्म की अभिनेत्री के जरिये दिखाया गया है ...और फिल्म का यही निर्देशक फिल्म को फ्लैशबैक में सुनाता रहता है ......यह निर्देशक लगभग पूरे फिल्म में अभिनेत्री से घृणा करता है मगर आख़िरी दृश्यों में उसकी सारी घृणा प्रेम की उदात्तता से भर उठती है ..मगर तब तक अभिनेत्री सिल्क साड़ी के पारंपरिक परिधान में एक  गरिमाभरी  मौत (आत्महत्या) को अंगीकार कर उठी होती है ..कुछ अतृप्त इच्छाओं का यह सांकेतिक प्रगटन था ......आखिरी सीन में यही निर्देशक और अभिनेत्री की माँ उसकी चिता को अग्नि का स्पर्श देते दीखते हैं ..फिल्म हमारे  संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के जयघोष के साथ समाप्त होती है ......सिफारिश ही सिफारिश है ..मगर फिर आगाह करना है -यह पारिवारिक फिल्म नहीं है ....

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

वी आई पी ब्लागों का बी पी आई(ब्लॉग पापुलरिटी इंडेक्स यानि चिठ्ठा लोकप्रियता सूचकांक )

 आप सोच रहें होंगे कि कहीं मेरा माथा तो सनक नहीं गया है अलाय बलाय लिख मारा है ..आप सच सोच रहे हैं ...मगर पहले बी पी आई के बारे में बता दूं ...बी पी आई बोले तो ब्लॉग पापुलैरिटी इंडेक्स ...अब इसकी कौन जरुरत आन पडी? हुआ दरअसल यह कि विज्ञान पर लिखने वाले अपने दर्शन लाल जी मेरे साथ एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मलेन में  पर्चा पढने के लिए आमंत्रित हुए हैं मगर पर्चा मूल्यांकन कमेटी ने पर्चे का सारांश स्वीकार करने के बाद भी यह नुक्स निकाल दिया कि पेपर में कोई सांख्यिकीय मूल्यांकन नहीं है....पेपर विज्ञान के ब्लागों द्वारा वैज्ञानिक मनोवृत्ति के संचार पर आधारित है ....वैज्ञानिक शोध पत्रों में सांख्यिकीय गणनाएं और तदनुसार निष्कर्ष एक तरह से अनिवार्य होने प्रचलन है ....अब हम मुसीबत में थे....तीस नवम्बर तक पूरा पर्चा भेजना था ...अब कौन सी सांख्यिकी भिड़ाई जाय ....मुझे  गणित और सांख्यिकी कभी भी पल्ले नहीं पडी और उन लोगों को पूज्य समझता हूँ जिनकी इस विधा में अच्छी गति रहती है .....सवाल यह था  कैसे यह मान लें कि अमुक ब्लॉग फला ब्लॉग से ज्यादा पापुलर है ....मतलब अगर हम सीधे सीधे यह कहें कि समीर लाल जी ,ज्ञानदत्त जी से ज्यादा पापुलर हैं तो वे कहेंगें कि हम ऐसे ही थोड़े ही मान लेगें -आपके इस निष्कर्ष का आधार क्या है ..हम लाख कहें कि हिन्दी का सारा ब्लॉग जगत यही बात डंके की चोट पर कह रहा है तो पर्चा कमेटी कहती है माई फुट ..हमें तो इस बात का सांख्यिकीय आधार चाहिए.

 ...लो कर लो बात, जो बात जग ज़ाहिर है अब उसके लिए भी सांख्यिकीय प्रमाण?  ..सूरज पूर्व में उगता है भला इसके लिए भी सांख्यिकीय प्रमाण चाहिए ... ? मगर वे तो ऐसे ही सनकी हैं ..बात जब बहस पर जा पहुंची तो पर्चा कमेटी ने आख़िरी हथियार उठा लिया -कोई सांख्यिकीय आधार दीजिये वरना ये पर्चा हम अस्वीकृत कर देगें ..मरता क्या न करता ..अब हमें तो यह हुनर आता नहीं मैंने अनुज गिरिजेश भैया को एस ओ एस किया मगर उन्होंने भी टका सा जवाब दे दिया,  कहा अभिषेक ओझा जी की शरण में जाईये वही कल्याण करेगें ..अभिषेक जी भी अपुन के पुराने पहचानी हैं ,उनसे मदद की गुहार करते तो वे मदद करते भी मुला वक्त निहायत कम था ....अब क्या हो? दर्शन जी ने कहा ई सब लफड़ा आप ही झेलिये हम बच्चों  की पढाई में व्यस्त हैं ...
सांख्यिकी: बाप रे :)  

अपुन को तो ये विद्या कुछ आती जाती नहीं ..इसलिए मैंने एक ले मैन स्टैटिस्टिक्स का ईजाद किया और फार्मूला बनाया ....अध्ययन में लिए गए पोस्टों में से प्रत्येक के १२ पोस्ट बटे उन सभी बारहों पोस्टों पर आई कुल टिप्पणियों की संख्या गुणे सौ और परिणाम को नाम दिया ब्लॉग पापुलैरिटी इंडेक्स ....इस तरह कुल चुने गए ब्लॉगों का तुलनात्मक अध्ययन के लिए हमारे पास कुछ सांख्यिकीय संख्याएं मिल गयी थीं और हमने अपना पेपर फाईनल कर भेज दिया  और फिर से पर्चा अनुश्रवण कमेटी के निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं .जी धुकधुका रहा है कि नामालूम यह तीर तुक्का स्वीकार भी होगा या नहीं? 

अभिषेक भैया आप क्या कहते हैं तनिक फरियायिये न ....अब अपनी ही तरह के गणित में कमजोर ब्लॉगर साथियों को हम उदाहरण देने के वास्ते  समय बर्बादी का एक ठो  काम किये हैं ..हिन्दी के कुछ  नामचीन ब्लागरों को भी इसी फार्मूले पर तौल दिया है  ..यह मेरा दुस्साहस ही कहा जाएगा कि जो ब्लॉग जगत की अतुलनीय शख्सियतें हैं उन्हें भी मैंने तौलने की हिमाकत कर डाली -वे मुझे क्षमा करेगें इसलिए डरते डरते विशाल ह्रदय /हृदया ब्लागरों को केवल इस अध्ययन का  उदाहरण देने के लिए चुना है ..कोई और छुपी बात नहीं है ....वे इसे हलके फुल्के में लेगें और बाकी लोग भी यह देखेगें कि सांख्यकीय परिणाम कितने हास्यास्पद हो सकते हैं ....भला इस आधार पर ब्लागों की गुणवत्ता कैसे व्यक्त  हो सकती है? 

बहरहाल यह बताता चलूँ कि यहाँ जो परिणाम आगे दिए जा रहे हैं उनमें जिनका मान कम है वे ज्यादा पापुलर ब्लॉग हैं ....अर्थात ज्यादा मान वाले अपेक्षाकृत कम पापुलर ....अब इत्ती से बात कहने के लिए बी पी आई जैसी कवायद की क्या जरुरत है ?:) इन नामचीन हिन्दी ब्लागरों के मौजूदा वर्ष के १२ ब्लाग पोस्टें रैंडम आधार पर चुनी गयीं और आरोही क्रम में उनकी बी पी आई  (यहाँ ब्लागरों के नाम दिए जा रहे हैं जो अपने किसी एक ब्लाग के कारण प्रमुखता से जाने जाते हैं  ) यह रही  .....डॉ. मोनिका शर्मा जी  को १.१ ,समीरलाल जी उर्फ़ उड़नतश्तरी को १.३५,प्रवीण पाण्डेय जी को १.४७,  शिखा वार्ष्णेय जी को १.५, अनूप शुक्ल जी फुरसतिया  को २.८३, ज्ञानदत्त जी को ३.१२ का  बी पी आई मान मिला है ....अब इनके निहितार्थों पर चर्चा की जा सकती है ....डॉ. मोनिका शर्मा जी को लगे हाथ बधाई दे दूं ..औपचारिकता है भाई !

इस अध्ययन विधि और परिणाम पर चर्चा आमंत्रित की जाती है .... :) 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मटर की घुघुरी कैसे बनी?

इधर  दो चार दिनों से तबीयत नासाज हो जाने से घर पर ही हूँ और मन की करने की आजादी मिली हुयी है ....ब्लॉग से दीगर कुछ पठन पाठन चल रहा है और खाने पीने के आईटमों को भी खुद ट्राई किया जा रहा है ..इन दिनों यहाँ मटर की बहार है मटर की ताज़ी ताज़ी फलियाँ ठेलों और सब्जी की दुकानों में सजी हैं ....इधर मटर की खेत से तुड़ी ताजी फलियाँ छिम्मी कहलाती हैं ....मुझे मटर की घुघुरी (घुघुनी ) बहुत पसंद है -आज खुद बनायी और खाई -अपनी लिखी कविता और अपना बनाया व्यंजन आखिर किसे अच्छा नहीं लगता -सो आज की घुघुरी उदरस्थ तो हुयी ही उसकी एक फोटो फेसबुक पर भी जा पहुँची जहाँ लोगों के मुंह में पानी आता जा रहा है ..लोगों ने पूछा कि कैसे बनेगी तो मैंने वादा भी किया कि आज की पोस्ट का यही विषय रहेगा ...अपने विवेक रस्तोगी जी भी सुबह से ही इस पूर्वांचली नाश्ता विधि का इंतज़ार कर रहे हैं ..उन्हें और तरसाना ठीक नहीं है ...

मैं कोई प्रोफेशनल पाक शास्त्री तो हूँ नहीं ..अपने तरीके से बनाता हूँ और वैसे ही आपको बता भी देता हूँ -आप घर में किसी को  परेशान हैरान न करे, खुद हाथ आजमायें ....एक किलो हरी मटर की फली की इकाई रखते हैं ...कम बेसी मात्रा होने पर उसी हिसाब/अनुपात  से आप अन्य सामग्री घटा बढ़ा सकते हैं -वैसे कोई बड़ी फेहरिस्त नहीं है -एक किलो फली को छील कर दाने अलग कर लें ,एक पाव नया आलू भी लेकर छील कर उसे काट ले ...यहाँ लगे  चित्र की साईज के हिसाब से या थोडा और पतला ....कडाही में बस दो चम्मच सरसों का तेल डालकर गरमाएं और उसमें कटे हुए हरे लहसुन और हरे मिर्च का तड़का देकर मटर के दाने और कटे आलू को डाल कर बस हलके आंच में पकाएं -एक दो बार चलायें ताकि नीचे न लगने पाए ...मुश्किल से दस मिनट में तैयार ...पानी नहीं डालना है ....यह खुद में  जज्ब पानी में पकता है ...   स्वाद के मुताबिक़ नमक डालना मत भूल जाईयेगा ...हरी धनिया की कटी पत्तियों से सजावट भी कर सकते हैं ....लीजिये तैयार है गरमागरम घुघुरी ...घरवाली और बच्चों के साथ मिल बाँट कर  खाईये और आनंद उठाईये .....धर्मपत्नी को भी अपनी पाक विद्या में पारंगत होने पर इम्प्रेस कीजिये..वैसे मेरे पास एक पक्की खबर है कि  कैसे एक पूर्वी भैये ने एक खूबसूरत दिल्ली की माडर्न पंजाबन को यही घुघुरी  खिला खिला कर पटा लिया था और आज पंजाबन उसी पूर्वी भैये के बच्चों की मां है .....मगर बच्चे इस घुघुरी को तरस गए हैं ..अमरीका में बसे हैं जो बिचारे ... 
घुघरी जो मैंने बनायी 

मुझे भी जरुर बताईयेगा कि आपकी घुघुरी कैसी बनी? बल्कि टिप्पणी तब तक के लिए मुल्तवी कर सकते हैं ....आज ही शाम की खरीददारी में लाईये न हरी मटर ......

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