मंगलवार, 28 मई 2013

बात सम्मान और पुरस्कारों की ....

कभी कभी कुछ अजब गजब होने लगता है. जैसा कि पिछले दिनों मेरे साथ हुआ है. पुरस्कारों /सम्मानों के मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है .सर्प संसार को मिले डोयिचे बेले, जर्मनी के बाब्स पुरस्कार से हम अभी ठीक से उबर भी न पाए थे कि विज्ञान परिषद् प्रयाग ने छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल श्री शेखर दत्त जी के कर कमलों से संस्था के सौ साल होने के उपलक्ष्य में हमें शताब्दी सम्मान भी थमा दिया .हम अभी सम्मान जनित विनम्रता के दुहरे बोझ से दबे थे कि ज़ाकिर अली ' रजनीश' ने अभी अभी अन्तरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त तस्लीम संस्था की ओर से एक और सम्मान थमा दिया है . 
महामहिम के हाथों शताब्दी सम्मान

बहुत लोग ऐसा मानते हैं जिनमें मैं भी शामिल हूँ कि जब किसी को ज्यादा सम्मान पुरस्कार मिलने लग जायं तो यह माना जाने लगता है कि उसका सृजन काल अब अवसान तक आ पहुंचा . काश मेरे बारे में लोग ऐसी धारणा न बना लें -अभी मेरा सक्रिय सृजन काल चल ही रहा है . प्रत्यक्षम किम प्रमाणं . आज कल पुरस्कार सम्मान भी संदेह की निगाह से देखे जाते हैं और सेटिंग गेटिंग का फार्मूला यहाँ भी चलता है मगर मैं ईश्वर को हाज़िर नाज़िर मानकर यह कहना चाहता हूँ कि मुझे मिले इन पुरस्कारों की मुझे भनक तक न थी . अभी एक मजेदार वाकया हुआ -गोरखपुर में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित साईंस ब्लॉगर कार्यशिविर के उदघाटन सत्र के आख़िरी पलों में मेरे मोबाईल पर कोई महत्वपूर्ण काल आ गई और उसी वक्त ज़ाकिर अली जी ने कोई उद्घोषणा कर डाली जिसे मैंने सुना नहीं .जैसे ही काल खत्म हुयी मैंने पाया कि डायस के अतिथिगण उठ कर खड़े हैं और मैं अभी भी बैठा ही हूँ -यह तो अशिष्टता थी ..मैं भी किंचित हडबडी से उठकर माजरा भांपने लगा तब तक एक अतिथि डॉ मनोज पटैरिया जी ने और तदनन्तर डॉ रामदेव शुक्ल जी ने मुझे बधाई दे डाली . मैं सकपकाया ...पूछने की धृष्टता तक कर बैठा कि किस लिए ? तभी अतिथि द्वय मुझे एक सार्टिफिकेट और स्मृति चिह्न पकडाते हुए कहते भये कि मुझे तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान से नवाज़ा जा रहा है . मैं अप्रस्तुत असहज सा रह गया . बल्कि मुझे तब तक यह डाउट था कि यह पुरस्कार मेरे लिए नहीं संभवतः डॉ पटैरिया के लिए था . मैंने उनसे यह कहा भी कि नहीं नहीं यह आपके लिए है तो उन्होंने सार्टिफिकेट का मुखड़ा मेरे सामने कर दिया ....और इसके पहले कि मैं पूरा माजरा समझ पाता पुरस्कार मेरे हाथ में था और कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे…. जाकिर भाई ,कम से कम कह कर तो देते .....
 तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान

एक मजेदार बात तो रह ही गयी ..जिस वर्कशाप बैग में अभी अभी मिले इस तीसरे सम्मान -सार्टिफिकेट को रखा था उसे घर पहुँच कर खोल कर देखा तो सार्टिफिकेट नदारद था ....अरे यह क्या हुआ ? अचानक दिमाग में कौंधा कि मेरे और डॉ पटैरिया का बैग एक जैसा ही था और हम एक ही होटल में रुके थे तो कहीं बैग तो नहीं बदल गए ? यही हुआ होगा -डॉ पटैरिया जी मैं डायस पर कह नहीं रहा था कि यह सम्मान आपके लिए था सो वह आपके साथ गया :-)
लोग बाग़ पुरस्कार और सम्मान के लिए बहुधा कहने लगे हैं कि भैया पुरस्कार में अगर कुछ नगद नारायण हो तो दे दो सम्मान अपने पास रख लो  ..घर की गृहणियां भी अब सम्मान चिह्नों को हिकारत की नज़र से देखती हैं -बेफालतू घर के कोंने कोने को कब्जियाते जा रहे हैं -एक व्यंगकार की पत्नी ने (जैसा कि उसने बताया) कहा कि इससे बेहतर तो आंटे की एक छोटी बोरी ही मिली होती जो कम से कम इस्तेमाल में तो आ जाती ..... उधर सम्मानों को उचित ठहराने वाले कहते हैं कि आखिर पद्म सम्मानों में ही नगद राशि कहाँ मिलती है ? यह विवाद थमेगा नहीं -ऐसे में जो कुछ मिल जाय सम्मान सहित ग्रहण करते रहा जाय -अब सम्मान सहित तो विष भी स्वीकार कर लेने की अपनी सनातन संस्कृति रही है ! 
 मित्रों इस पोस्ट को पढ़ भर लीजिये -बधाई देने की कौनो जरुरत नहीं -उसका कोटा पूरा हो चुका है !

मंगलवार, 14 मई 2013

ग्रीष्मावकाश


A short time out from daily chores and of course from blogging too.Meeting you all shortly. Bye!

कलयुग के हनुमान


Visited Ashtbhuja (Godess with eight hands) temple located on outskirt of Mirzapur district.Nearby another site of a Kali temple is another attraction and the place is known as Kali khoh i.e.a deep crevices where diety rests.This man impersonating monkey God hanuman sits at entrance and enthralls public with his antics. I also bargained/haglled with him and got his blessings-touch of his 'gada' on my head in mere 10 rupees.

मंगलवार, 7 मई 2013

घर में घुस आया वह अनचाहा संगीतज्ञ!

वह संगीतज्ञ कब से हमारे घर में घुसा बैठा था मुझे पता ही नहीं चला . वो तो रात में पहली झपकी के दौरान ही एक ऐसे तेज संगीत से नीद उचट गयी जिसके आगे जाज और बीटल्स सब फेल थे ....नींद टूटने के बाद अपने को संयत करते हुए ध्यान संगीत के स्रोत की और फोकस किया ...ऐसा लगा कि कर्कश संगीत लहरियां मेरे स्टडी रूम से आ रही हैं। भारी मन से उठा और ताकि देख सकूं यह बिन बुलाया मेहमान कब से चुपके से आ गया था मेरे स्टडी कक्ष में -जयशंकर प्रसाद की एक कविता भी अनायास याद आयी -पथिक आ गया एक न मैंने पहचाना ,हुए नहीं पद शब्द न मैंने जाना ...कर्कश स्वर लहरी के बीच यह रोमांटिक कविता का यकायक स्मरण होना और नींद में खलल पड़ना -इस सिचुएशन पर एक बेबस मुस्कराहट भी होठों पर आ धमकी ...बहरहाल अब मैं अपने स्टडी कक्ष में था मगर ऐसा लगा आवाज कभी इधर तो कभी उधर से आ रही थी ....

रात के ११ बज रहे थे और मैं अपने स्टडी कक्ष  के दरो दीवार को निहार रहा था कि आखिर संगीत  लहरियां फूट कहाँ से रही हैं? मैं इधर उधर नजरे घुमाता उस संगीतज्ञ को ढूंढो ढूंढो रे की तर्ज पर ढूंढ रहा था .आखिर वह मिल ही गया .दरवाजे के कोने में संगीत की तान लेता वह पकड़ा गया .अब आपकी जिज्ञासा को और भटकाने के बजाय बता ही दूं कि ये एक झींगुर महराज थे जो मदमस्त हो गाये  जा रहे थे -मगर स्वर लहरी इतनी कर्कश कि सोता हुआ उठ के बैठ जाय और मुर्दा भी उठ के भाग जाय . जी हाँ ! मैंने उन्हें उनके पंखों से उठा कर बाहर फेंक दिया ...थोड़ी देर तो शान्ति रही मगर फिर वही संगीत बाहर से भी सुनायी पड़ने लगा. दरअसल झींगुर यानी 'क्रिकेट' अपने आगे के आरीनुमा पंखों को रगड़ कर यह आवाज पैदा करते हैं . यह खुद से दुश्मनों /रकीबों को दूर रखने का तरीका तो है ही, साथ ही मादाओं को प्रणय के लिए रिझाने की कवायद भी है .
 
आखिर मिल ही गए महाशय !
झींगुरों द्वारा संगीत उत्पन्न करने की इस प्रक्रिया को स्ट्रिडुलेशन कहा जाता है . इन्हें एक और करामात आती है जिसे वेन्ट्रीलोक्विजम कहते हैं . यह भला वेन्ट्रीलोक्विजम क्या है ? यह एक ऐसी आश्चर्यजनक क्षमता है जिससे आवाज को उसके निकलने के मूल स्थान के बजाय किसी और स्थान से निकलने का आभास होता  है . यही कारण है कि जब भी कोई झींगुर आवाजें निकाल रहा हो आप उसे आसानी से ढूंढ नहीं सकते क्योकि आवाज कहीं और से निकलती सुनायी देती है . इस कला में कुछ पुतलेबाज भी माहिर होते हैं जो बोलते तो खुद है मगर उनकी आवाज पुतले के मुंह से निकलती हुयी लगती है .


प्राचीन काल के मंदिरों के पुजारी इस कला के माहिर हुआ करते थे और मंदिर में आये अपने जजमानों को सहसा 'आकाशवाणी' सुना कर चमत्कृत करते थे -मतलब वे बोलते तो खुद थे मगर ऐसा लगता था कि आवाज कहीं दूर से आ रही है -इसमें पेट की मांसपेशियों के सहारे फेफड़ों पर बल देकर आवाज को प्रोजेक्ट किया जाता था .....इसलिए इस कला का नाम पेट बोली भी है .  अब यह लुप्तप्राय है मगर झींगुरों में अभी भी यह क्षमता विद्यमान है -सच कहता हूँ उस रात इस कीट महराज ने मुझे काफी छकाया मगर मैं भी कुछ कम जीव नहीं ,जीव विज्ञान का खिलाड़ी हूँ सो साहबजादे को ढूंढ ही निकाला .


तनिक आप भी सुनें न यह संगीत!

अब अगली बार जब आपका पाला किसी संगीत रस में डूबे झींगुर मोशाय से पड़  जाय तो तनिक उन्हें ढूँढने का प्रयास करियेगा -अरे अरे उस दिशा में नहीं, जहाँ से आवाज आ रही हो बल्कि उससे  अलग कहीं भी :-) हमने कितने ही गुण इन कीट पतंगों और जीव जंतुओं से सीखे हैं और आज उसी पर एक नयी प्रौद्योगिकी ही आकार ले रही है जिसका नाम है बायो-मिमिक्री यानी जैव अनुहरण जिसके बारे में कभी विस्तार से साईब्लाग पर चर्चा होगी . अब बताईये कैसी लगी यह पोस्ट? :-)

शनिवार, 4 मई 2013

भरत, भौंरा और चम्पे का फूल

भरत त्यागी हैं ,वैरागी भी हैं . राम को वापस लेने के लिए जब वे प्रयाग पहुंचते हैं तो भारद्वाज ऋषि उनका  आवाभगत करते हैं . हो सकता है भरत  के उसी सेवा सत्कार से हिन्दी का यह आवाभगत शब्द महिमामंडित हुआ हो -आवाभगत अर्थात भगत आये जिसमें उनकी सेवा सुश्रुषा का भाव अंतर्निहित है . वैसे इस शब्द के उद्भव पर किसी वैयाकरण की व्याख्या अपेक्षित है . भारद्वाज जी जान ही  रहे थे कि भरत राम के वियोग में अत्यंत व्यथित हैं ,उद्विग्न हैं तो उनका मन बहलाने को वे बहुविध प्रयास करते हैं। छप्पन भोग  के उपरान्त आंनंद और आराम के तमाम साजो सामान और यहाँ तक कि गणिकाएं वनिताएँ भी उन्हें मुहैया होती हैं . मगर भरत पूरी तरह उदासीन ही रहते हैं .
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

दो0-संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।(अयोध्याकाण्ड ) 

( बसंत  ऋतु  की त्रिविध समीर बह रही है .सभी प्रकार की सुख सुविधा - धर्म अर्थ काम मोक्ष के  चारो पदार्थ उपलब्ध है -माला चन्दन स्त्री आदि भोगों की उपलब्धता से लोग हर्षित विस्मित है , मगर भरत रूपी चकवे  के लिए इन  सभी चकई रूपी सामग्री से कोई लगाव नहीं है भले ही इन्हें मुनि ने एक पिंजरे में रात भर रखने का प्रयास किया और सुबह हो गयी .)
मगर आज की पोस्ट का मुख्य हेतु यह नहीं है . भारत वापस जब अयोध्या लौट आते हैं तब भी वीतराग ही रहते हैं . तुलसी प्रकृति के भी पारखी कवि हैं -उनका प्रकृति निरीक्षण अद्भुत हैं -वीतरागी भरत की तुलना वे भौरे से करते हैं और यही मेरी दुविधा का प्रश्न लम्बे समय से बना रहा -तुलसी कहते हैं -
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा चंचरीक जिमि चम्पक बागा ..अर्थात विरागी भरत राम विहीन अयोध्या में वैसे ही रहते हैं जैसे चंपा जैसे सुगन्धित पुष्प के बाग़ में भौरा .....बस यही बात मेरे मन में खटक जाती थी .....भौरा क्या चंपा के फूल से आकर्षित नहीं होता ? हिमांशु जी ने भी ऐसी ही व्याख्या अपने चंपा के फूल की पोस्ट पर की है -"खिलने वाला यह फूल भौंरे को मनमानी नहीं करने देता । झट से झिझक जाती है भ्रमर वृत्ति - अनोखा है यह पुष्प । यह अकेला ऐसा पुष्प होना चाहिये जिसकी उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते । बाबा तुलसी को भी यह बात रिझा गयी थी, और यही कारण है कि अयोध्या में राम के बिना भरत का अयोध्या के प्रति राग वैसा ही था - जैसे भौरा चंपक के बाग में हो । सर्वत्र बिखरा हुआ ऐश्वर्य (सुगंध), पर किसी काम का नहीं" .अब पता नहीं हिमांशु जी ने यह विचित्र भ्रमर व्यवहार खुद देखा है या नहीं -मैंने भी नहीं देखा मगर जिज्ञासा हमेशा बनी रही कि क्या सचमुच भौरे को चंपा के पुष्पों से परहेज है . वर्षों से मानस की इस अर्धाली ने मुझे व्यग्र कर रखा था .

 मदार पुष्प पर भौरा

अब यहाँ राबर्ट्सगंज में यह गुत्थी अचानक ही सुलझती नज़र आयी .एक दिन मैंने सुबह सुबह ही देखा कि मदार के   (Calotropis) समूहों पर भौरे झुण्ड के झुंड मंडरा रहे हैं -तो इन्हें चंपा नहीं मदार के पुष्प पसंद हैं . मगर क्यों ? क्या मदार के पुष्पों में परागण -निषेचन इन्ही भौरों से ही संभव हो पाता है? और यह मदार और भ्रमर सम्बन्ध इसलिए ही प्रगाढ़ बन गया हो ? कोई वनस्पति विज्ञानी क्या इस भ्रमर व्यवहार पर प्रकाश डालेगा ? एक साहित्यकार ने तो अपना प्रेक्षण पूरा किया मगर वैज्ञानिक विश्लेषण तो विज्ञानियों के जिम्मे है . इसी पोस्ट में तुलसी के ऊपर उद्धृत दोहे में चकवा चकई का उद्धरण दिया गया है . और यह साहित्यिक मान्यता है कि यह पक्षी युग्म -नर मादा रात में बिछड़ जाते हैं और इसलिए एक दूसरे  को ढूँढने की बोली लगाते रहते हैं। तुलसी ने भारद्वाज मुनि द्वारा भरत  के सेवा सत्कार में इसी साहित्यिक सत्य का उद्घाटन किया है कि संपत्ति सुख साधन रूपी चकई और भरत रूपी चकवे को भारद्वाज ऋषि द्वारा एक पिंजरे में बंद कर देने के बावजूद  भी उनमें संयोग नहीं हो पाया और सुबह हो गयी ... चकवे चकई के इस अभिशप्त  रात्रिकालीन वियोग का क्या कोई वैज्ञानिक विवेचन भी है ? इस पर कभी फिर चर्चा होगी .

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