मंगलवार, 26 मार्च 2013

क्या खाली पीली होली ?

क्या खाली पीली होली ?
नहीं नहीं
खा ली और पी ली होली
क्या खा ली क्या पी ली
भांग खा ली और ठंडई पी ली
बस इत्ती सी होली?
नहीं नहीं
ली थोड़ी गुलाल
मुंह पर उनके मल ली
नेह के रंग भिगोली
कर तन मन रंग रंगीली
खुशियों से ली भर झोली
बस हो ली होली
 याद आयी
बहुत  घर की होली 

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

सहमति का सोलहवाँ साल?

मुझे साफ़ शफ्फाफ  याद है जब मैं हाईस्कूल में था मेरे एक सहपाठी ने मुझसे कुछ ऐसी बात फुसफुसाहट भरे लहजे में की थी जो तत्काल तो मेरी समझ में आई ही नहीं। मगर उसी ने  जब वही बात मुझे समझा समझा कर समझाई तो मैं असहज हो गया था और शायद ऐसी ही कुछ और छोटी बड़ी घटनाओं ने मिलकर मुझमें यौनिकता के समयगत विकास को आगे बढाया था . मैं उस समय यही कोई 15 वर्ष का था मगर दोस्त एक दो वर्ष ज्यादा उम्र का और समाज के कथित निचले तबके से आता था। वह मुझसे ज्यादा होशियार और परिपक्व था . उसे पता था कि मैं एक क्षेत्रीय ख्यातिलब्ध चिकित्सक परिवार से था , वह मुझसे वह "रामबाण' औषधि चुरा कर लाने की याचना कर रहा था जिससे गर्भ समापन होता था . 
मैं तब तक ऐसी किसी समस्या के बारे में ज्यादा नहीं जानता था . मैंने अपनी असमर्थता जता दी थी और उसके हाव भाव से ऐसा लगा था कि जो काम करने को मुझे वह कह रहा था वह किसी 'पाप' से कम न था . एक पापी सदृश लगा था वह और मुझे भी पाप की राह पर चलने को उकसा रहा था . उस समय यही सोचा था मैंने। कुछ महीने बाद मैंने उससे जाना कि वह शापित बिचारी भगवान को प्यारी हो गयी थी जिसके लिए उसे किसी रामबाण औषधि की तलाश थी .  उस घटना के कई वर्षों बाद जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध छात्र था तो वह मित्र बस यात्रा में अचानक  मिला - दोस्तों की नयी पुरानी बातें शुरू हुईं तो सारे परिप्रेक्ष्य का पता चला -जनाब कच्ची उम्र में ही अपने से भी कच्ची उम्र की ग्राम्या से प्रेम और यौन सम्बन्ध बना चुके थे -गर्भ का समापन झोला झाप डाक्टर ने किया और उस बिचारी की जान चली गयी थी . समय ज्यादा हो गया था -बदनामी के डर और यौन प्रतिबंधों ने एक मानव जीवन लील लिया था।  आज भी दूर सुदूर गाँवों में कमोबेस  ऐसी ही स्थिति है .
अब यौन कर्म के सहमति की नयी उम्र पुनर्निर्धारित हो गयी है -कम थी तो बड़ा हो हल्ला मचा . नैतिकतावादियों ने ग़दर मचा दिया . सेक्स  इतना बड़ा हौवा बस अपने महाद्वीप में हैं शायद -उसके सामाजिक -जैवीय, नैतिक  पक्ष तो हैं मगर आज तो विज्ञान की दुनिया है, हम कब अपनी सोच परिमार्जित करेगें? बच्चों को इस तरह के प्रतिबंधों से बांधने के बजाय उन्हें यौन शिक्षा देना ज्यादा जरुरी है -उनके मन से इनसे जुड़े अपराध बोध को दूर करना ज्यादा जरुरी है। किस उम्र में कोई सेक्स करे या न करे यह कतई प्रतिबन्ध का विषय नहीं होना चाहिए . यह कानून कितना प्रभावी होगा? समाज में और माँ बाप की चौबीसों पहर की चौकसी, समाज का सख्त पहरा -खाप वाले ऐसे ही बदनाम नहीं हैं . फिर भी क्या किशोर वयी सेक्स सम्बन्ध नहीं होंगें  ? भूले भटके कमसिन उम्र में अगर ऐसा हो गया तो बच्चों  क्या फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए?काल कोठारी में ढकेल देना चाहिए? यह ऐसा कौन सा अपराध हो गया ?आज भी सेक्स को पाप समझने की यह आदिम सोच कब बदलेगी?
 अब तो वयः संधि वाले किशोर अट्ठारह वर्ष से एक दिन भी छोटी हम उम्र किशोरी  को छू भर लिए तो अपराध हो जायेगा -यह कानूनी विकर्षण का आरोपित प्रयास जैवीय आकर्षण पर कितना कारगर होगा इसे साबित होने के  लिए इंतज़ार की कोई जरुरत नहीं है, जैवीय आकर्षण तो जान देने लेने तक का मामला हो जाता है। मैं कम उम्र के मासूम यौन सम्बन्ध की वकालत नहीं कर रहा हूँ बस यह कहना है कि इस तरह के प्रतिबन्ध कोई मायने नहीं रखते ,हाँ यौन शिक्षा ज्यादा जरुरी है . जो बच्चों को इस जैवीय आकर्षण के अनेकानेक सामाजिक और स्वास्थ्य के पहलुओं के  प्रति ज्यादा कारगर तरीके से सजग कर सकती  है ,यह बताने के बजाय कि यौन कर्म एक 'पाप कर्म' है यह बताना ज्यादा जरुरी है कि अपरिपक्व यौन सम्बन्धों से क्या समस्यायें हो सकती हैं? 
यह उनके लिए कतई किसी ग्लानि बोध का मामला  नहीं है और इसके कारण आत्महत्याएं तक करने की कोई जरुरत नहीं हैं,न ही खाप पंचायतों में मौत का फरमान सुनाने की  -ऐसे  मामले  घटित हो जाएँ भी तो आज एम टी पी का विकल्प तो है ही ? ऐसे मौकों पर बच्चों को मानसिक सपोर्ट की जरुरत होती है, मार्गदर्शन की जरुरत होती है, नहीं तो मेरे बाल मित्र के साथ घटी उक्त घटना की पुनरावृत्ति समाज में होती रहेगी . मासूम जानें जाती रहेगीं! अब तो अट्ठारह के पहले ऐसे कोई सम्बन्ध हो जाते हैं जिन्हें रोका जाना संभव नहीं दीखता तो ग्लानि बोध, पाप बोध के साथ ही अब अपराध  बोध भी बच्चों को आ ग्रसेगा? सेक्स सम्बन्ध को लेकर ऐसे प्रतिबन्ध मुझे तो बचकाने लगते हैं ,बेमानी लगते हैं जो मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीनते हैं!


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बलात्कारी सामूहिकता के दौर में सहमति की उम्र

बुधवार, 13 मार्च 2013

होली की उपाधियाँ ही उपाधियाँ: कोई भी चुन लें :-)

ब्लॉग जगत में होली की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है .नाम ले ले कर उपाधियाँ बांटी जा रही है . हम भी कभी इस तरह की कल्पनाशील सृजनात्मकता दिखा कर लोगों की वाहवाही तो कम गालियाँ ज्यादा बटोरते थे। कई मित्रों से जो मन मुटाव हुआ तो लम्बे  अरसे बाद काफी मान मनौवल के बाद ही मामला सुलट पाया . इसलिए हम अब इस जोखिम के काम को लेकर उदासीन हो चले हैं। मगर ब्लॉग जगत की इस नयी सुगबुगाहट के बाद सुषुप्त पड़ चली मसखरी फिर जोर मार रही है . 

मगर ना बाबा ना ..नाम के साथ तो मैं कोई उपाधि जोड़ना नहीं चाहता। मुझे याद है इंटर मीडिएट के दौरान मेरा एक मित्र उसे मिली उपाधि को लेकर अच्छा ख़ासा नाराज हो गया .उपाधि थी -देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर . अब वो गधा मेरे  पीछे ही पड़ गया कि वह कौन सा गंभीर घाव पैदा करता है .उसे लाख समझाता  कि यार यह तो मुहावरा भर है  मगर वो माने तब ना,उसे तो  तो बस यही सवाल करते रहने की जैसे सनक सी हो गयी थी . जब मैं इलाहाबाद युनिवर्सिटी के ताराचंद छात्रावास में था तो होली के अवसर पर एक मित्र के लिए जो टाईटल चुना गया वह था -"दमित इच्छाओं के मसीहा" ..इतना बुरा मान गया वह कि हमारी बोल चाल भी बंद हो गयी . अब ब्लॉग जगत में तो कितने मित्रों ने तो पहले से ही बोलचाल बंद कर दी है और अब अगरचे मैं कोई होली की उपाधि किसी के साथ चेंप या सटा  दी तो जुलुम ही हो जाएगा -तो भैया ऐसी रिस्क लेने को मेरी हिम्मत नहीं है .

होली की उपाधि देने की परम्परा बड़ी पुरानी  है, और यह  पढ़े लिखे लोगों का एक शगल है -होली के अवसर पर हंसी मजाक करने का बस -इसे दिल पर लेने की बात ही नहीं होनी चाहिए .मगर यह भी सही है कि प्रायः उपाधि देने वाले का निजी मूल्यांकन किसी के बारे में काफी भावनिष्ठ हो जाता है -उपाधि पाने वाले को चोट सी लगती  है कि अरे लोग मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं,जबकि मैं तो ऐसा नहीं , लोग कहें भले न कई बार उपाधियाँ लोगों को चुभ जाती हैं -मगर फिर भी उचित तो यही है कि इन्हें गंभीरता से न लिया जाय ,बस हल्के  फुल्के ही लिया जाय . अभी ब्लॉग जगत में कुछ और उपाधियाँ नामचीन ब्लागरों से और आने वाली हैं ऐसी अन्दर की खबर मुझे मिली है और मैं मानसिक रूप से खुद को उन्हें हंसी खुशी स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहा हूँ और आपसे भी यही  गुजारिश है .वैसे कभी कभी दूसरों की निगाहों से खुद का मूल्यांकन  जरुर करना चाहिए!

मेरे मन में भी कई उपाधियाँ तैर रही हैं -सुषुप्त सा  शरारती किशोर जाग सा गया है .  उपाधियाँ ही उपाधियाँ हैं आप लोग खुद अपने मन से स्वयंवर कर लें -चुन लें इनमें से-मुझे इनके साथ नाम नहीं देना है .
सनम बेवफा , फौलादी शख्सियत के नाम बड़े और दर्शन छोटे  , मेरे तो पिया परमेश्वर दूजो न कोई,दोस्त दोस्त ना रहा , इतने पास न आना अगर चाहते हो मुझे पाना ,मुझे  पता है औकात सभी की ,हमाम में मैं ही नहीं सभी नंगें हैं , हम तो दिल दे चुके सनम .दाल भात में मूसल चंद ,मैं हूँ इक  चिर विरही , परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर ,कोई मेरी भी तो सुनो , सलाह ले लो भाई सलाह ले लो , मुझे  छपास रोग लगा रे , मैं तो प्रेम दीवानी ,आजा मेरी प्यास बुझा जा ...जवानी बीती जाय रे ....अब अंत में क्या ख़ाक मुसल्मा होंगें?, मेरा जूता है जापानी पतलून लखनवीं ,घर में  तो पिया, मगर दिल किसी और को दिया, मैं हूँ परदेश  मगर दिलवर है उस देश , नादान बालमा, विरही सौतन आदि आदि .दोस्तों से गुजारिश है वे अपना भी योगदान कर सकते हैं ,उनका नाम गुप्त रखा जाएगा!    ......ये सभी  पर्सनालिटी  ट्रेट यही अपने ब्लॉग जगत में भी है -अपनी पसंद की आप खुद चुन लो और मुझे मत कोसिएगा ....
आप सभी को होली की ..नहीं नहीं अभी वक्त है -होली की शुभकामनाओं के लिए थोड़ा और इंतज़ार करिए-हाँ फागुन चकाचक बीते !

गुरुवार, 7 मार्च 2013

फागुनी अहसास को जगाता एक कविता संग्रह!

सुनीता शानू जी के नए कविता -संग्रह 'मन पखेरू उड़ चला फिर ' की मानार्थ प्रति मिली तो शीर्षक ने मन में बहुत उमड़ घुमड़ मचाया। अभी तक तो प्राण पखेरू का रूढ़ प्रयोग हिन्दी में दुखद संदर्भों में  आया है मगर यहाँ  मन पखेरू के उड़ने के सर्वथा नए प्रयोग ने चौका सा दिया . यहाँ मन का पखेरू शरीर के प्रतिबंधों से दूर उन्मुक्त विचरण के लिए उड़ चला है .बंधनों से चिर आजादी का यह भाव और इस नए बिम्ब प्रयोग को स्वीकार करने में कोई असहजता संग्रह को पढ़ने के  बाद  नहीं बची थी  . किताबों की समीक्षार्थ/ मानार्थ प्रतियाँ मिलने पर मैं उन्हें आदतन तुरंत नहीं पढता बल्कि अपनी स्टडी मेज या फिर ड्राईंग/लिविंग कक्ष की मेज (यहाँ राबर्ट्सगंज में टू इन वन या इन आल इन वन ही कहिये ) पर छोड़ कई दिन निहारता रहता हूँ . फिर बहुत ही अहतराम से उठा पढने में मुब्तिला हो उठता हूँ . अभी कल ही संग्रह की अंतिम कविता तक पहुंचा  हूँ .

कविता संग्रह बहुत ही मौके से मिला है मुझे -फागुनी बयारों के बीच फागुनी कविताओं ने कहर ही ढा दिया है समझिये :-) .मैंने अपने मन को गहरे स्पर्श कर गयी एक कविता को फेसबुक पर भी शेयर किया . देखिये मैं हिन्दी साहित्य का मनई तो हूँ नहीं तो मुझे समीक्षा कर्म वगैरह आता नहीं और उसके प्रतिमानों और अनुशासनों से सर्वथा अनभिज्ञ भी  हूँ इसलिए इसे कृति की समीक्षा न माना जाय .यह एक सुहृद के प्रति मेरी कृतज्ञता ज्ञापन का बस विनम्र उपक्रम भर है -सुनीता शानू जी से विगत वर्ष मेरी भेंट  लखनऊ के ब्लॉगर परिकल्पना दशक सम्मान में हुयी थी -उनकी विनम्रता, सहजता,सरलता ने क्षणों में ही अपरिचय की औपचारिकताओं को छू मंतर कर दिया था . तब मुझे यह बिल्कुल भान नहीं था कि मैं एक उदीयमान प्रतिभाशाली कवयित्री के चंद घंटों के सानिध्य में मैं हूँ-वे दिल्ली लौटीं और फिर उनकी स्मृति उनकी फागुनी कविताओं के साथ सहसा लौट आयी हैं .
मन पखेरू का मूल स्वर उन्मुक्तता/जड़ बंधनों से आज़ादी का तो हैं मगर डोर को पूरी तरह से स्वच्छंद छोड़ देने की हिमायती भी कवयित्री नहीं है। उनकी कविता डोर की अंतिम पंक्तियां यही तो कहती हैं - 'सच है डोर से बंधी होती तो पूरा न सही होता उसका भी अपना एक आकाश' ...संग्रह की आख़िरी कई कविताओं ने ख़ास प्रभावित किया जो  मेरी अपनी पसंद है -कवयित्री या प्रकाशक/सम्पादक ने कविताओं के चयन क्रम को अपने ढंग से रखा होगा . आनंद कृष्ण जी की इस पुस्तक से सम्बन्धित समीक्षा संग्रह के शुरू में ही है और यह इतनी सम्पूर्ण है कि उसके बाद किसी के लिए भी समीक्षा के लिए कुछ  बचता ही नहीं . उन्हें इस संग्रह  की कविताओं में एक संभावनाशील कवयित्री की पदचाप सुनायी दी है और मैं उनसे सहमत हुए बिना नहीं रह सकता . सुनीता जी ने प्रेम की सघन अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति नहीं की है बल्कि कई सामाजिक विडंबनाओं को भी सटीक उकेरा है -इस लिहाज से कन्यादान, ऐ कामवाली,माँ   रचनाएं बहुत सशक्त बन पडी है . संग्रह की सबसे बड़ी खासियत है कविताओं का अपने पाठकों से सहज संवाद -इन कविताओं में अमूर्तता नहीं है,निर्वैयक्तिकता नहीं है.  जीवन के पल प्रतिपल के अनुभवों से लबरेज हैं ये कवितायें!
 कृति 
हिन्द -युग्म ने बहुत सलीके से और एक स्लीक लुक के साथ इस कविता संग्रह को प्रकाशित किया है -प्रशंसा के मेरे दो शब्द प्रकाशक के लिए भी हैं। मुझे एक लम्बे समय बाद एक कविता संग्रह ऐसा मिला है जिसकी अधिकाँश कविताओं ने मुझसे सहज संवाद किया है। अंत में वो फेसबुक वाली कविता आपको पढ़ाना चाहता हूँ-

खामोशी
आँखों ने आँखों से
कह दिया सब कुछ
मगर जुबां खामोश रही

जब दिल ने
दिल की सुनी आवाज
धड़कन खामोश रही
तुम्हारे प्यार की
खुशबू से तृप्त
उठती गिरती साँसे देख
पलकें खामोश रहीं
कृतिकार 
और वहां मेरा कमेन्ट था- सारे पहरेदार या तो मौकाए वारदात पर सोये रहे या गुनाह के खामोश भागीदार हुए। :-)  सुनीता शानू जी को उनके प्रथम कविता संग्रह के प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई!

रविवार, 3 मार्च 2013

कितना भटक गया इंसान :-(

धर्म के प्रवक्ताओं को वैज्ञानिकों से बहुत कुछ सीखना चाहिए जो कंधे से कंधा मिलाकर दुनियां और मानवता की बढ़ोत्तरी में दिन रात सहयोग की भावना से जुटे रहते हैं -जबकि धर्म कर्म के अनुयायी ज्यादातर समय एक दूसरे के धर्म की निंदा में बिताते हैं और उनके  अपमान में ही समय जाया करते रहते हैं!और नतीजा सामने हैं विज्ञान ने जहाँ मानव की सुख सुविधा में एक बड़ा योगदान दिया है वहीं धर्म अपने मार्ग से भटक गया है जबकि मूल उद्येश्य इसका भी बहुजन हिताय और बहुजन सुखाया ही था। 
धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं मगर बने हुए हैं विरोधी। क्योंकि दोनों की प्रकृति में कुछ मूलभूत अंतर रहा है। विज्ञान में असहमतियों को खुले दिमाग से देखा समझा जाता है और कमियों को निरंतर सुधारने की प्रवृत्ति होती है जबकि धर्म में इसका ठीक उलटा आचरण है .यहाँ विरोधों और असहमतियों को लेकर तुरंत तलवारे खिंच जाती हैं .कट्टर लोग कट्टे तक निकाल लेते हैं . यहाँ तुरंत फतवे जारी हो जाते हैं .मगर विज्ञान की दुनिया में फतवे जारी नहीं होते .अगर किसी ने किसी की त्रुटि की ओर  ध्यान दिलाया तो उसका संज्ञान लेकर कार्यवाही की जाती है,संशोधन होते हैं, आवश्यकतानुसार भूल सुधार होते हैं  . विज्ञान की अपनी एक पद्धति है जो  जिज्ञासा के अन्तःप्रेरण से आरम्भ होकर विभिन्न संभावनाओं /विकल्पों का सत्यापन सतत प्रयोग परीक्षण के जरिये कर सत्य के उदघाटन को प्रतिबद्ध होता है . धर्म के भटके स्वरुप में सत्य की घोषणा पहले ही की हुयी रहती है .यह घोषणा मुल्ला मौलवियों पंडितों ,पादरियों के मुखारविंद से होती है -जिसके विरोध का मतलब आपका बहिष्कार और कभी कभी तो सर तक कलम कर देने के फरमानों तक है . इसके विपरीत वैज्ञानिक कोई ऐसे परम पद पर आसीन नहीं है . अगर कोई वैज्ञानिक अनजाने की गयी त्रुटि के चलते गलत साबित होता है तो अपने समुदाय में उसे बिसरा भले दिया जाय कोई फतवा जारी नहीं होता .
                                                क्या सचमुच हुआ था नरसिंह अवतार?
धर्म या विज्ञान दोनों का उद्येश्य मानवता का कल्याण ही होना चाहिए यद्यपि विज्ञान की पद्धति में ऐसा कोई आवश्यक प्रतिबन्ध नहीं है . धर्म की नींव ही मानव कल्याण के सर्वतोभद्र कामना पर टिकी हैं . लेकिन आज धर्म इस अपने इस साध्य को साधने के बजाय मात्र पूजा पाठ के साधन तक सिमट गया है .मात्र पूजा पाठ ,अजान ,नमाज के साथ ही  मानव कल्याण के लिए उठाया गया एक छोटा कदम भी ईश्वर की एक बड़ी इबादत हो सकती है यह सच स्वीकार करने में हम पीछे रह जा रहे हैं . धर्म का अभ्युदय मानव कल्याण की सोच से ही हुआ मगर कालांतर में वह अपने मूल मार्ग से भटक गया है . हमारे कई समाज सुधारक पीर संतों ने समय समय पर हमें चेताया भी मगर धर्म और कट्टरता,धर्म  और कूप मंडूकता ,धर्म और अंधविश्वास का ऐसा सम्बन्ध स्थापित हो गया है जो टूटे नहीं टूट रहा है .
आज विद्वानों के बीच मान्य तथ्य है कि मनुष्य का निम्न श्रेणी के जीवों से विकास हुआ है -वह एक विकसित जीव है -न कि स्वर्ग से अधोपतित कोई देव -मगर फिर भी हम अवतारवाद को सच साबित करने में तुले हैं , हम आश्चर्यजनक रूप से इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाते कि चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के पूर्व अवतारवाद का जिक्र केवल हमें अपने पूर्वजों की उस दृष्टि को दर्शाता है जो विकास की एक आरम्भिक सोच को दर्शाती है .यहाँ भी मछली से कछुआ और अदि अवतारों से होते हुए पशु और मनुष्य के संयुक्त रूप की नरसिंह अवतार  में बड़ी सुन्दर कल्पना की  गयी है -अब हम अपने पूर्वजों के इस सुन्दर वैचारिक योगदान की स्वीकृति और सराहना के बजाय अवतारों को ही सच मानने की मूर्खता पर उतर आते हैं . और जब पढ़े लिखे लोग भी ऐसा करते हैं तो मुझे दुःख होता है . जाहिर है उनके ज्ञान अध्ययन और विवेक में कहीं घोर कमी रह गयी है -ऐसे लोग निरक्षर लोगों से भी ज्यादा अहितकारी है समूचे समाज के लिए  . अगर यही लोग यह बात करते कि विकासवाद के सोच का उद्गम हमारे धर्म चिंतन में भी है तो कितनी पते की बात होती . मगर वे तो अवतारों को ही सच मान बैठते हैं . यह अंधश्रद्धा मानवता के लिए खतरनाक है .
धर्मों की ठीक से न समझी गयी बातों से कट्टरता उपजती,फैलती है - हिन्दू धर्म में कट्टरता कहीं नहीं है -विश्व में भारत ही वह भाव भूमि है जहाँ अनीश्वरवादी चिंतन तक का पुष्पन पल्लवन हुआ -सनातन धर्म चिंतन/दर्शन से जैन, बुद्ध दर्शन और कालांतर में इस्लाम के भी विचार पनपे -कहीं पृथक से नहीं आये -वेदान्त के कर्मकांडों को उपनिषदीय चिंतन ने तिरोहित किया -आज हिन्दू वह भी है जो किसी ईश्वर के वजूद को नहीं मानता और वह भी जो चौबीसों घंटे पूजापाठ में रत रहता है . हिन्दू होना विनम्र होना है किसी की भी पूजा पद्धति की खिल्ली न उड़ाना एक श्रेष्ठ हिन्दू का गुण है -शराब पियें या न पियें आप हिन्दू हैं ,मंदिर जाएँ या न जाएँ आप हिन्दू हैं ,मांस खायें न खायें आप हिन्दू हैं ,भगवान् को गाली दें या स्तुति करें आप हिन्दू हैं -इतना सृजनशील और संभावनाओं से भरा और कोई धर्म विश्व में दूसरा नहीं है -आप सभी से अनुरोध है इसे कट्टरता का जामा न पहनाएं -कोई मेरा सम्मान करे या न करे मैं हिन्दू ही रहूँगा ! मुझे हिन्दू होने का फख्र है क्योंकि इस महान धर्म ने मुझे कई बंधनों से आजाद किया है ...मुझे दुःख होता अगर मैं हिन्दू न हुआ होता और तब मुझे ईश्वर को मानने पर विवश होना पड़ता :-)
सबसे विनम्र निवेदन है धर्मों के रगड़ों झगड़ों को अलविदा कहकर विज्ञान सम्मत चिंतन को अपनाएँ!मानवता पर रहम करें!

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