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रविवार, 2 फ़रवरी 2014

अथातो गुरुघंटाल जिज्ञासा......

एक दिन फेसबुक पर मैंने यह जुमला  क्या छेड़ा  कि गुरु तो गुरु ही होता है(आदि आदि ) तो इस पर काफी चर्चा हो गयी. संतोष  त्रिवेदी ने पलट वार किया की मगर चेला चेला ही नहीं रह सकता वह गुरु भी हो सकता है - अली सईद साहब इसी उत्तर की ही बाट जोह रहे थे -इस अपडेट पर लपक ही तो पड़े।  कहा, देखा न चेला पलटी  मार गया।  काफी चर्चा हुयी, गुजिश्ता टाईम के ब्लॉगर मित्र जिन्होंने अपने ब्लॉग की सुध बिसरा दी है  वहाँ आ जुटे और अपना अपना दर्शन झाड़ा और हमारा ज्ञान वर्धन किया। हमने भी ब्लॉगर तो ब्लॉगर ही होता है कि तर्ज पर सबकी फेसबुकीय टिप्पणियां झेलीं। 

मजे की बात यह हुयी कि इसी मुद्दे पर उस रात मैंने एक सपना देखा।  देखा कि उसमें अपने जमाने के कई धुरंधर ब्लॉगर्स एक ब्लॉगर मीट कर रहे हैं।  विषय था गुरुओं में गुरु और उनमें भी गुरु घंटाल की पहचान । विषय प्रवर्तन मैंने किया था।  मैंने कहा कि भारत के गुरुओं की महान परम्परा में ही आधुनिक गुरुओं की एक श्रेणी गुरु घटालों की होती है। और सम्भवतः बिगड़े शिष्य ही आगे चलकर गुरु घंटाल बन जाते हैं।  यहाँ भी अली भाई ने तुरंत  प्रतिक्रिया व्यक्त की -प्रत्यक्षं किम प्रमाणं।  मैंने उन्हें इशारे से आगे कुछ भी कहने से रोका।  संतोष त्रिवेदी भला कहाँ अपने को रोक पाने वाले थे -उन्होंने कहा कि मेरे निगाह में तो बस एक ही गुरु घंटाल है जो इन दिनों पहले की तुलना में कुछ कम सक्रिय है मगर अभी भी गुरु घंटाल नंबर वन है, अब ब्लॉगर लोगों की जिज्ञासा यह थी कि आखिर यह गुरु घंटाल होता क्या है  और यह किस तरह अन्य गुरुओं से अलग होता है।  सतीश सक्सेना जी ने कहा कि मुद्दा अहम है और इस पर वे जल्दी ही वे कुछ अपने गीत के माध्यम से लिखेगें। 

अपने समुदाय की अकेली नुमायन्दगी कर रही वाणी गीत शर्मा जी ने एक मासूमियत भरा सवाल पूछा कि क्या महिलाओं में भी गुरु घंटाल होती हैं? तभी किसी ओर  से आवाज आयी कि उन्हें तो गुरु घंटालिने कहना चाहिए। मगर आदरणीय दिनेश द्विवेदी जी ने कहा कि ये शब्द लिंग निरपेक्ष होते हैं अतः महिला वकील को वकीलाइन कहना जैसे गलत है वैसे घंटाल को घण्टालिन कहना गलत है।  इस पर कुछ आपत्तियां और आयीं और यह पक्ष प्रस्तुत किया गया कि वकील की पत्नी को वकीलाइन कहने का चलन समाज में तो है।  बहरहाल फिर से बात गुरु घंटाल पर आकर रुक गयी। किसी ने सहजता से पूछा गुरु घंटाल के लक्षण क्या क्या हैं।  अभी तक अनूप शुक्ल जी काफी चुप से बैठे थे।  उन्होंने कहा कि परसाई जी ने इस पर काफी लिखा है मगर अभी तो उन्हें याद नहीं, हाँ देखकर ही वे बता पायेगें।  तब तक एक कोने से गिरिजेश राव जी और बेचैन आत्मा गलबहियां डाले दिखे।  गिरिजेश राव ने कहा कि व्युत्पत्ति शास्त्र के मुताबिक़ गुरु घंटाल का कोई न कोई संबंध घंटे से होना चाहिए।  उनका आशय मंदिर में बजने वाले घंटे से था।  अब तक शिल्पा मेहता जी भी दिखाई दे गयीं थी, इससे वाणी गीत जी के चेहरे पर एक तसल्ली का भाव उभरा।  शिल्पा मेहता जी ने गिरिजेश जी की बात का अनुमोदन करते हुए कहा हाँ गुरु घंटाल शब्द में कुछ पण्डे और घंटे का भाव समाहित लगता है।  

तभी डॉ तारीफ़ दराल साहब और जनाब  महफूज अली भी मुझे साथ साथ बैठे दिखाई दे गए  . उन्होंने कहा कि जो भी महफूज जी का विचार होगा वही उनका भी मंतव्य समझा जाय। महफूज ने कहा कि दोनों लिंगों के गुरु घंटालों से उनका पाला तो कई बार पड़ा है मगर वे जो कुछ भी इस मुद्दे पर कहना चाहते हैं अंगरेजी में ही कहेगें। इस पर विवाद हो गया कि हिंदी ब्लागरों के बीच आंग्ल भाषा का क्या काम? महफूज जी ने चुप्पी साधना ही उचित समझा।  मुझे और कई ब्लागरों के चेहरे दिखाई पड़  रहे थे मगर वे सभी चुप चाप  इस बहस का बस श्रवण  लाभ कर रहे थे।  प्रवीण त्रयी को भी मैंने देखा और समीरलाल जी को भी मगर उनकी चुप्पी माहौल को असहज बनाये हुयी थी।  आचानक एक बड़ा शोर  सा होता लगा और मैंने देखा कि श्रीमती जी साक्षात सामने आग्नेय नेत्रों से मुझे घूर रही हैं -कब तक सोते रहेगें आज ,आफिस नहीं जाना क्या ? स्वप्न टूट गया था मगर मेरे जेहन में यही सवाल बार बार उमड़ घुमड़ रहा था कि गुरु घंटाल आखिर किसे कहते हैं और उसके लक्षण क्या क्या हैं और वह कैसे अन्य गुरुओं से अलग है? अब आप लोग ही मेरी यह जिज्ञासा दूर करिये न।  

द्वावा  त्याग : कृपया नए पुराने, भूतपूर्व और अभूतपूर्व ब्लॉगर इस स्वप्न चर्चा को अन्यथा न लें।  यह बस एक निर्मल हास्य है जिसका अभाव इन दिनों ब्लागिंग और जीवन में भी बहुत कम हो गया है। तथापि अगर कोई बंधु बांधवी अपना नाम यहाँ से हटाने को कहेगें तो ऐसा सहर्ष कर दिया जायेग!

रविवार, 15 दिसंबर 2013

अथ चापलूसी महात्म्य


मनुष्य की अनेक प्रतिभाओं में एक है चमचागीरी/चापलूसी। वैसे तो इस क्षमता में दक्ष लोगों में यह प्रकृति प्रदत्त यानी जन्मजात है मगर कुछ लोग इस कला को सीखकर भी पारंगत हो लेते हैं। चारण और चमचागीरी में बारीक फर्क है।चारण एक पेशागत कार्य रहा है जिसमें भांटगण मध्ययुगीन राजा महराजाओं की विरुदावली गाते रहते थे -उनका गुणगान करते रहना एक पेशा था। मगर मध्ययुगीन भांट लड़ाईयों में भी राजाओं के साथ साथ रणक्षेत्र में जाते थे और इसलिए भट्ट कहलाते थे -भट्ट अर्थात वीर! लगता है भट्ट से ही भांट शब्द वजूद में आया हो। आज भी जो ज्यादा भोजन उदरस्थ करने का प्रताप दिखाता है भोजन भट्ट कहा जाता है। 

अब वैसे तो चारण का  हुनर एक पेशागत कर्म नहीं रहा मगर आज भी  लोग बेमिसाल उदाहरण अपने स्वामी/ आका को खुश करने के लिए देते ही रहते हैं. ताजा उदाहरण एक राजनेता का है जिसमें उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को सारे राष्ट्र की माता का अयाचित, अनाहूत दर्जा दे दिया। लोगबाग़ विस्मित और उल्लसित भी हो गए चलो चिर प्रतीक्षित राष्ट्रपिता की कोई जोड़ी तो बनी।

चापलूसी थोडा अधिक बारीक काम है। यह प्रत्युत्पन्न बुद्धि, हाजिरजवाबी या वाग विदग्धता(एलोक्वेन्स )  की मांग करता है।वक्तृत्व क्षमता (रेटरिक )  के धनी ही बढियां चापलूस हो सकते हैं। परवर्ती भारत में बीरबल को इस विधा का पितामह कह सकते हैं। वे अपने इसी वक्तृता के बल पर बादशाह को खुश करते रहते थे। पूर्ववर्ती भारत में तो यह विधा सिखायी जाती थी। महाभारत में ऐसे संकेत हैं।आज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चापलूसी के उदाहरण मिलते ही रहते हैं मगर उनका स्तर घटिया सा हो चला है। 

बॉस को खुश करने के लिए ऐसे बेशर्मी से भरे खुले जुमले इस्तेमाल में आते हैं कि आस पास सुनने वाले को भी शर्मिदगी उठानी पड़ जाती है -अब चापलूसी में वक्तृता का पूरा अभाव हो गया है। और वैसे ही आज के  बॉस हैं, जो चाहे राजनीति में  हों या प्रशासनिक सेवा में बिना दिमाग के इस्तेमाल के कहे गए "सर आप बहुत बुद्धिमान हैं " जैसे वाक्य पर भी  लहालोट हो जाते हैं. मतलब गिरावट दोनों ओर है -चापलूसी करने वाले और चापलूसी सुनने वाले दोनों का स्तर काफी गिर गया है।


वैसे शायद ही कोई होगा जिसे अपनी प्रशंसा अच्छी न लगती हो। मगर वह सलीके से की तो जाय। बेशर्म होकर केवल चापलूसी के लिए चापलूसी तो कोई बात नहीं हुयी। यह एक कला है तो कला का कुछ स्तर तो बना रहना चाहिए। कभी कभी मुझे कुछ लोग कह बैठते हैं 'मिश्रा जी आप बहुत विद्वान् आदमी हैं' मैं तुरंत आगाह हो उठता हूँ कि ऐसी निर्लज्ज प्रशंसा का आखिर असली मकसद क्या है? कोई न कोई स्वार्थ जरुर छिपा होता है इस तरह की स्तरहीन चापलूसी में। मगर मैं हैरान हो रहता हूँ जब मैं पाता हूँ कि कई ऐसे सहकर्मी अधिकारी हैं जिन्हे अपने मातहत से  चापलूसी सुने बिना खाना ही हजम नहीं होता। उन्हें चापलूसी करवाते रहने की आदत सी पडी हुयी हैं। कुछ तो चापलूसी करने वाले स्टाफ को अपने साथ ही लगाए रहते हैं और उसे अवकाश पर भी जाने देने में हीला हवाली करते हैं। बिना चापलूसी के दो शब्द सुने उनका दिन ही नहीं कटता। 
चापलूसी सुनने का ऐसा व्यसन भी तो ठीक नहीं !

बुधवार, 20 नवंबर 2013

सभी पुरुष एक जैसे ही होते हैं..... ललित निबंध

सभी पुरुष एक जैसे ही होते हैं..... यह एक ऐसी बात है जिससे  महिलायें ख़ास तौर पर नारीवादी सक्रियक  झट से सहमत हो लेती हैं। उनके लिए यह सार्वभौमिक सत्य है। वे फरेबी होते हैं, झूठे होते हैं वादा करके मुकर जाते हैं।  रूहानी लगाव के बजाय बस रूप सौंदर्य के दीवाने होते हैं।  उनकी चाहतें यकसाँ  ही होती हैं। हर मायनों में सभी समान होते हैं और उनमें भी कुछ और भी ज्यादा समान होते हैं।  यहाँ तक कि अलग से दिखने वाले (नारीवादी पुरुष) भी अंततः आखिर पुरुष ही साबित होते हैं।  मुझे भी यह वाक्य गाहे बगाहे सुनना ही पड़ता रहा है।  अब लाख समझाईये कि नहीं अपुन तो भीड़ से बिल्कुल अलग हैं.एक नायाब पुरुष पीस हैं मगर उनके चेहरे का अविश्वास इतना अटल रहता है कि कभी कभी और अब तो अक्सर ही खुद भी अपने बारे में शक होने लगता है कि कहीं हम भी वाकई 'सभी पुरुषों' की ही श्रेणी में तो नहीं आते -सोचते हैं खुद को कहीं आजमा के देख ही लिया जाय कि अपनी असलियत आखिर है क्या ? वालंटियर्स चाहिए।  

मैंने कभी ,मतलब अंतर्जाल में पहला कदम रखने के दरमियान ही एक मित्र से तब इस जुमले की हकीकत को गहराई से समझने का प्रयास किया था।  इसके पहले वे इस गूढ़ रहस्य को उजागर करतीं अंतर्जाल छोड़कर ही कहीं लुप्त हो गयीं और मेरा प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया।एक आधी दुनिया के मित्र ने जब फिर इस जुमले को उछाला तो मैं जैसे इसकी मीमांसा के लिए तैयार ही बैठा  था।  मैंने अनुनय किया कि कृपा कर इसे व्याख्यायित किया जाय और बिना व्याख्या अंतर्जाल न छोड़ा जाय।उन्होंने एक चिढाऊ स्माईली बनाकर कहा कि मैं सब जानता हूँ -मैंने जवाब दिया कि मैं क्या जानता हूँ यही बता दिया जाय ताकि सत्यापित कर सकूं कि वह  सही या गलत हैं। उन्होंने बात का एक आखिरी छोर पकड़ा दिया कि आप सभी पुरुष बड़े वो होते हैं। और एक शातिराना स्माईली छोड़कर चल दी हैं -लगता है अभी बात की तह तक पहुँचने में कई चैट सेशन बीत जायेगें।  

मैं तो विज्ञान और उसमें भी जैव विज्ञान  का एक अदना सा अध्येता रहा हूँ -चार्ल्स डार्विन को अपना ईश्वर पैगम्बर सब कुछ मानता हूँ -उनके अनुसार तो विभिन्नता प्रकृति का नियम है -तो पुरुष एक जैसे तभी हो सकते हैं जब वे जुड़वां हों और वह भी एक ही निषेचित अंड की उत्पत्ति हों।  तो सभी पुरुष एक जैसे कैसे हो सकते हैं। इसलिए मेरी तो वैज्ञानिक मान्यता यह है कि सभी  पुरुष और न ही नारी एक जैसे होते हैं।  नारियां तो बिल्कुल ही एक जैसी नहीं होतीं।  बहुत फर्क होता है उनमें, यह मेरा स्वयं का सुदीर्घ अनुसन्धान है।  एक अंग्रेजी कहावत के जनक ने भी यही कहा है कि नारी नारी में बहुत फर्क होता है -" सम वीमेन ब्लश व्हेन दे आर किस्ड ,सम स्वेयर , सम काल फार पोलिस बट वर्स्ट आर दोज हू लाफ " देखिये न यह कहावत यह सिद्ध कर देती है कि नारियां अलग अलग होती हैं। मेरी इस बात से आप निश्चय ही झट से सहमत हो जायेगें :-) 
मगर मेरे एक फेसबुकिये मित्र हैं जो इससे असहमत हैं।  वे कहते हैं कि सभी नारियां भी एक जैसी होती हैं , उन्होंने अपनी पीड़ा सरे आम फेसबुक पर साझा की थी , जो याद है उसके मुताबिक़ वे अपने पुरुष दोस्तों से घनिष्ठ होते होते सहसा ही पलट जाती हैं। 

 वे कहती हैं -
१ -मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ मगर मैंने कभी उस निग़ाह से आपको देखा ही नहीं। 
2 -आप मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं मगर उसके आगे नहीं 
३- मेरे लिए मित्रता से बढ़कर दुनिया में और कुछ नहीं है मगर मित्र से मैं शादी नहीं कर सकती।  
४-दोस्ती मित्रता अपनी जगह  विवाह शादी अपनी जगह 
5 -आपने तो कभी पहले बताया ही नहीं। मैं तो किसी और के हाथों महफूज हो गयी हूँ। .

मित्र का मानना है सभी एक सा ही सोचती हैं।  एक जैसी ही हैं। तो चलिए यह मानने में क्या गुरेज कि सभी पुरुष या नारी एक जैसे ही होते हैं :-) आपकी भी तो अपनी कोई राय होगी इस मुद्दे पर या निजी अनुभव होगा तो क्यों नहीं साझा करते यहाँ? मानवता का मार्ग दर्शन होगा! 

रविवार, 3 नवंबर 2013

देहाती औरत!

कहते हैं कुछ दिनों पहले नवाज शरीफ ने अपने प्रधान मंत्री को देहाती औरत कह दिया जो कथित तौर पर रोज रोज पाकिस्तान को लेकर ओबामा के पास जाकर रोना रोते रहते हैं। इस पर तरह तरह की समीक्षायें ,टीका टिप्प्णियां और भाष्य हुए . मोदी ने इस बात की निंदा की . बात आयी गयी हो गयी . मगर अभी कल ही एक बिहारी नेता ने अपने मुख्यमंत्री नितीश जी को भी देहाती औरत कह दिया जो मोदी को लेकर निंदा पुराण बाँचते रहते हैं . कहा गया कि नितीश मोदी से इर्ष्या रखते हैं . आखिर देहाती औरत से अभिप्राय क्या है ? बिहार से लेकर पाकिस्तान तक के एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में यदि देहाती औरत से कोई समान अभिप्राय निकलता हो तो यह एक महत्वपूर्ण विवेचन का विषय निश्चित ही है .

मेरा लालन पालन और एक उम्र तक निवास भी ग्रामीण परिवेश में ही हुआ है . अब भी छठे छमासे गाँव आना जाना होता रहता है और सेवा निवृत्ति के बाद गाँव में ही बस जाने का प्लान है . देहाती औरत का विशेषण मेरे भी समझ में बिल्कुल बेजा ही नहीं है . सभी नहीं मगर गाँव की ज्यादातर औरतों में मैंने सहजता का ज्यादा आग्रह देखा है .शहरों का मिथ्याचरण (सोफिस्टिकेशन) उनमें नहीं होता . सभी मानवीय आवेग -गुस्सा, प्रेम,घृणा और द्वेष और उनका प्रगटीकरण उनमें अपने मौलिक रूप में देखे जा सकते हैं . वे जबर्दस्त झगड़ालू ,स्नेहमयी ,प्रेममयी सब हैं . गालियां देने में भी उनकी कोई सानी नहीं है . बहुत सहज होकर वे 'सुभाषितम' का धड़ल्ले से आपसी विनिमय करती हैं . जैसे कोई अनुष्ठान का धाराप्रवाह मंत्रोंच्चार हो रहा हो . मैं तो आज भी इस अनुष्ठानिक कलरव से लज्जावश नेपथ्य में हो लेता हूँ . कहीं कोई यह न देख ले कि मैं इस नारी -निनाद का रससिक्त श्रवण कर रहा हूँ .

देहात की औरतों की इस सम्भाषण स्पर्धा में लैंगिक विशेषणों का धड़ल्ले से प्रयोग होता है जो कभी कभी मुझे उनकी यौन विषयक कुंठाओं का आभास सा देता है और बहुत सम्भव है कि उनके दैनिक सम्भाषण से उनकी कतिपय कुंठाओं का कुछ शमन भी हो जाता हो . इसके अलावा गाँव की ज़िंदगी अभावों की और काफी श्रम साध्य होती आयी है तो  उनसे मनोमुक्ति के लिए भी कोई मनोरंजन और टाईम पास चाहिए सो एक गाली गलौज के संवाद का सेशन भी क्यों न हो? मेरी एक अंतर्जालीय घनिष्ठ मित्र ने उत्कंठा वश मुझसे कभी उन लैंगिक विशिष्टियों युक्त गालियों को बताने को  कहा था जो प्रायः ग्राम्य वधुओं द्वारा इस्तेमाल में आती हैं -मैं उन्हें संकोचवश बता नहीं सका था . आपके मन में कौतुहल हो तो मुझे अलग से मेसेज कर सकते हैं -एक और कोशिश कर सकता हूँ . अब तो टेलीविजन आदि के बढ़ते प्रभाव में गाँव की औरतें भी मिथ्याचरण अपनाने लगी हैं -तथाकथित 'सभ्य' होने लग गयी हैं . और गालियों आदि के विनिमय के बजाय शिष्टाचरण से काम लेने लगी हैं . अब तो मुझे यह लगने लग गया है कि गाँव की औरतें 'तो शिष्ट' होने लग गयी हैं मगर शहर की औरतें अब आदिम होने लगी  हैं .

तो गावं की औरतों में लगाने बुझाने(झगड़ा ) ,चुगली करने , ईर्ष्या करने के आदिम मानवीय भावों के भी होने के आरोपण हैं -मंथरा आदि के चरित्र यूँ ही वजूद में नहीं आये। मगर मैं यह मानता आया हूँ कि गाँव की औरतें बहुत भोली होती हैं ,मुंहफट तो होती हैं मगर दिल की साफ़ होती हैं . जीभ भले कलुषित हो, ह्रदय निष्कपट होता है . निहायत भोली ऐसी कि कोई भी चंट आदमी उन्हें छल सकता है . चंटों के सामने वे कत्तई भी महफूज नहीं रह पातीं . यह ग्राम्य भोलापन मैंने कई शहरी नारियों में भी देखा है -भले वे शहरी हो गयी हों मगर मन उनका ग्राम्य बोध लिए ही होता है . कैलाश गौतम जी की एक कविता की पंक्ति अकस्मात याद हो आयी है जो गाँव की औरतों के भोलेपन को इंगित करता है -

उसको शायद पता नहीं वह गाँव की औरत है
इस रस्ते पर आगे चल के थाने पड़ते हैं .......

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

हाय रे हिंदी ब्लॉगर पट्टी!

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया पर दो दिवसीय सेमिनार एवं कार्यशाला (20 और 21 सितंबर 2013 को ) का निमंत्रण  आज मिल गया . आपको मिला या नहीं? आपने अगर प्रस्ताव भेजा होगा तो आपको भी निमंत्रण मिल गया होगा .अपना मेल या स्पैम भी खंगाल लीजियेगा . निमंत्रण पत्र में कहा गया है कि "आपको अधिकतम 3-एसी में आने जाने का यात्रा भत्ता दिया जाएगा एवं आपके यहाँ ठहरने और भोजन आदि का भी प्रबंध हैं। आप आगमन की तिथि और स्टेशन की जानकारी हमें जल्दी दे देंगे तो इसमें सुविधा होगी। आप वर्धा या सेवाग्राम किस गाड़ी से किस समय उतरेंगे, इसका स्पष्ट उल्ले़ख प्रेषित करें। हम आपके मेल का इंतजार कर रहे हैं। " 
ज़ाहिर है आयोजन समिति बहुत ध्यानपूर्वक आयोजन के बारीक पहलुओं को भी देख रही है। अन्यथा कई आयोजक यह कहते हुए झेले गए हैं कि स्टेशन से उतर एक रिक्शा पकड़ कर पूछते पाछते चले आईयेगा -फला सिनेमा टाकीज के आगे से पतली सड़क पर मुड़ कर फिर बाएं चल कर गली से होते हुए नीम के पेड़ से दायें हाते के बाएं किनारे से अंदर की मस्जिद की दीवार से ही सटे संस्थान पर उतर जाईयेगा -पहली मंजिल  के बरामदे में पोस्टर दिख जाएगा ..... :-) मुझे उम्मीद है इस सेमीनार को एक सुखद और आत्मीय अकादमीय परिवेश में आयोजित करने में समिति आगे भी सचेष्ट रहेगी . मशरूम की तरह सरकारी धन पर उगने पलने और बढ़ने वाली तमाम समितियों जैसा आचरण -व्यवहार यहाँ देखने को नहीं मिलेगा!
मगर आयोजक ही नहीं हिन्दी के ब्लॉगर/ विद्वान भी कम नखरे नहीं दिखाते जबकि अंग्रेजी के ब्लॉगर बहुत संजीदे सुलझे और साफ़ दृष्टि वाले होते हैं -यह बात मैं कम से कम अपने तीन दशक के अनुभव पर कह रहा हूँ .कमोबेस स्थिति जैसे पहले थी अब भी वही है, हाँ ब्लॉगर भी अब इसी सूची में आ गए हैं . कई लोगों को आज भी इस सेमीनार की घोषणा का  पता ही नहीं है -मैंने एक से कहा कि क्या आप सत्यार्थ मित्र ब्लॉग नहीं पढ़ते तो उनका जवाब था पढता तो हूँ .फिर मेरा प्रश्न था वर्धा सेमीनार पर उनकी एक पोस्ट भी तो थी? -कुछ याद करते हुए वे बोले हाँ कुछ कुछ याद आ रहा है। "फिर तो आपको पूरी जानकारी हो गयी होगी? " इस सारे पूछताछ का रिजल्ट यह निकला कि इतनी फुर्सत कहाँ  है, पोस्ट की एक एक लाईन ध्यान से पढी जाय . जितने समय में एक पढ़ेगें उतने में तो दर्जन भर से ऊपर में जा टिपिया आयेगें? 
हद है! यह गंभीरता है हिन्दी ब्लॉगर पट्टी की . जबकि अंग्रेजी के ब्लागर पूरी जिम्मेदारी से पोस्ट पढ़ते हैं ,आवश्यक पृच्छायें करते हैं और आयोजनों में पूरे जोश खरोश के साथ शरीक होते हैं और अपने अकादमीय सरोकारों को पूरा कर एक किस्म का आत्मगौरव महसूस करते हैं . मैं यह सब इस आधार पर लिख रहा हूँ कि मैंने इन दोनों ही संस्कृतियों को करीब से देखा है .
हिन्दी के ब्लॉगर में एक तो आत्मविश्वास की भी कमी दिखती है . मैंने एक से इस सेमीनार में जाने का अनुरोध किया तो जवाब था अब मैं कहाँ इस योग्य हूँ सर कि ऐसे बड्डे बड्डे लोगों के बीच जाकर कुछ कह सकूं -मैं तो बस यहीं ठीक हूँ! अब यह सुनकर एक तरह की असहजता जो होती है (बड्डे बड्डे सुनकर ) सो अलग, एक किस्म  की बेबसी भी हो आती है कि अगले को कैसे समझाया जाय . एक ने ज्यादा चर्चा ही इस पर नहीं होने दी और छूटते ही जवाब आया "आई एम नाट इंट्रेस्टेड " लो जी ..डिजिटल मीडिया से  मन नहीं भरा तो मुद्रण माध्यम तक पहुँच कर छपास तो मिटायी जा रही है मगर सेमिनार के सरोकार पर टका सा जवाब .

एक और जवाब तो हतप्रभ करने वाला था -मुझे पता है इन सम्मेलनों सेमिनारों में क्या होता है? व्यभिचार के अड्डे हैं हैं ये ..लो जी कल्लो बात ... हा हा। और कोढ़ में खाज यह भी-  अब हम ठहरे खानदानी इज्जत आबरू वाले लोग -कैसे जा सकते हैं इन सेमीनार सम्मेलनों में? अरे उन्हें/ मेरे  उनको पता लग जाय बस! मेरा तो काम तमाम! अब घर में ब्लॉग लिख लेना ,अखबारों में छपने के लिए मेल से रचनाएं भेज देना, छपने पर फेसबुक पर टांक आना इज्जत के साथ यह सब बढियां है -ना बाबा ना मुझे सेमीनार में नहीं जाना! अब आप खुद ही फैसला ले लीजिये कि हिन्दी ब्लॉगर किस युग में जी रहे हैं?

लोगों के तरह तरह के आग्रह हैं . पूर्वाग्रह हैं . हाँ रचनात्मक प्रतिभायें  है मगर ऐसी प्रवृत्तियाँ ? अरे हम तो अब इसलिए वेबिनार की वकालत करते हैं कि उम्र अधिक हो रही है तो आने जाने में असुविधा होने लगी है . मगर नयी पीढी को ये क्या हो गया है? अकादमीय सरोकारों से यह कैसा मुंह मोड़ना या पलायन? मुझे तो इस प्रवृत्ति पर बहुत क्षोभ है! चलिए, जो वर्धा चल रहे हैं उनसे वहीं मुलाक़ात होगी . सिद्धार्थ जी कृपया आमंत्रित लोगों की एक सूची अपने ब्लॉग पर और वर्धा विश्वविद्यालय के वेबसाईट पर प्रकाशित करें ताकि हम सभी हिन्दी ब्लागिरी के ध्वजावाहकों को जान सकें और  सेमीनार पूर्व संवाद भी स्थापित कर सकें!

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

मार्च का महीना और वैशाख नंदन

कभी किसी ने कहीं लिखा था कि मार्च महीने में दफ्तरों और सरकारी कर्मियों के आवास के लगे गमलों में फूलों के रंग ज्यादा चटख हो जाते हैं -इशारा साफ़ था कि इन दिनों सरकारी खजाने का मुंह जो वैसे तो   साल भर तक  बंद सा रहता है मगर मार्च महीने के आते ही चौड़ा खुलने लगता है और आख़िरी दिनों में तो अपनी फुल सीमा पर खुल उठता है और करोड़ों अरबों का निस्तारण एक दो दिनों में ही हो जाता है , मगर मुझ जैसे रहीम शहीम और मोहकमाये मछलियान के आफीसर के लिए यह महीना जी का जंजाल बनकर आता है -खासकर महीने की अंतिम तारीख तक वित्तीय स्वीकृतियां मिलती रहती हैं जिनका आहरण 31 मार्च तक कराया जाना अनिवार्य होता है . अन्यथा अधिकारी का गला फंस जाने का  भयपूर्ण माहौल बनने लगता है। हम एक ऐसी ही जहालत में हलकान थे तभी मोबाईल पर फेसबुक में अनूप शुक्ल महराज का अपडेट देखा था तो वे ठीक 31 तारीख का और उस दिन पड़ने वाले इतवार का गुणगान पूरी फुरसत में किये जा रहे थे -अब यह पढ़कर कहीं कुछ जल- भुन (सुलग का प्रीतिकर शब्द ) ही तो गया -मैंने टिपियाया, महराज डी डी ओ होते तो जानते -अब मेरी जो आशंका  थी वह सच निकली कि वे कहीं यह न पूछ लें कि ये डी डी ओ क्या होता है -और लीजिये उन्होंने पूछ ही लिया -मैं जी. के.  की ऐसी अज्ञानता से बहुत चिढ़ता हूँ -तो उन्हें टका   सा जवाब दे टरका दिया कि इसके बारे में सिद्धार्थ शंकर  त्रिपाठी जी से पूछ लीजिये -अब यह उनके लिए हिंट साबित  हो गया -अब इतने समझदार तो हैं ही अपने फुरसतिया शुकुल -तुरंत कहे कि हम प्रोडक्शन वाले आफीसर हैं आहरण वितरण अधिकारी (डी डी ओ ) नहीं -काश यह आपको पता होता अनूप जी तो उस दिन हम जलने भुनने से बच गए होते ....

खैर मुझे पता नहीं कि सिद्धार्थ जी से अनूप जी ने इस बारे कुछ तहकीकात की या नहीं ,नहीं तो सिद्धार्थ जी उन्हें मेरे उस घबराए फोन का जिक्र भी जरुर किये होते जो  एक ट्रेजरी आहरण की समस्या में मैं उनसे मदद मांगी थी -मगर एक ब्लॉगर और एक बड़े खजाने के अधिकारी सिद्धार्थ जी में अंतर तो है ही  - ब्लॉगर धर्म का निर्वाह कर अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद भी वे बोले बतियाये मगर अंत में टका सा जवाब मिल गया कि मेरी समस्या मेरे ही खजाने का अधिकारी दूर करेगा और मैं उन्ही की शरण में जाऊँ -खैर कल रात 10 बजे मामले का निपटारा निरापद तरीके से हो गया .मैंने यहाँ के सिद्धार्थ जी के समकक्षीय सीनियर ट्रेजरी आफिसर श्री राकेश सिंह जो ब्लागरों के दुर्भाग्य से अभी तक ब्लॉगर नहीं हैं का  बहुत आभार व्यक्त किया -काश अधिक से अधिक ट्रेजरी के पदाधिकारी ब्लॉगर हो जाते -इस दिशा में सिद्धार्थ जी के सहयोग की अपेक्षा रहेगी .

ले देकर किसी तरह मार्च बीता तो आज मूर्ख दिवस आ धमका . मैंने उत्साह से फेसबुक खोला कि इस पुनीत अवसर पर अनूप जी कुछ आयोजन किये होंगें मगर वहां तो कुछ दिखा ही नहीं -मैंने तुरत यह अपडेट सटाया- इतना सन्नाटा है क्यों है भाई यहाँ ? तो लोग जैसे सोते  से जागे और सन्नाटे को तोड़ दिया और अभी भी तोड़ते ही जा रहे हैं . मगर आश्चर्य है व्यंगकार भाई आज रहस्यात्मक चुप्पी साधे हुए हैं या फिर आत्मावलोकन में लगे हैं -आपने भी नोटिस किया होगा कि आपके करीब कल तक मुखर रहने वाले कुछ लोग आज सहसा चुप हो गए हैं और कल तक चुप रहने वाले अकस्मात मुखर हो गए हैं -यह आज के पुनीत दिवस का महात्म्य है। वैसे अप्रैल फूल फिरंगियों की देन हैं मगर यह अपनी विरासत छोड़ गया है अन्यथा हमारे यहाँ का ऐसा ही पावन दिवस वैशाख नंदन जी को समर्पित है ,आप इस शख्सियत तो परिचित होंगें ही-न हों तो संतोष त्रिवेदी जी तफसील से बता देगें -हाँ वैशाख नंदन जी का जब समय आएगा तो अपने आप आपको पता चल जाएगा और उनके दिव्य दर्शन भी  हो जायेगें।   वैसे ब्लॉग जगत में एक और सन्नाम शख्स है अपने ताऊ जिनके पास वैशाख नंदनों की अच्छी जमात है। उनसे भी आज ही पूछ लीजिये -क्या आप पूछने जा रहे हैं?? 

बुधवार, 13 मार्च 2013

होली की उपाधियाँ ही उपाधियाँ: कोई भी चुन लें :-)

ब्लॉग जगत में होली की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है .नाम ले ले कर उपाधियाँ बांटी जा रही है . हम भी कभी इस तरह की कल्पनाशील सृजनात्मकता दिखा कर लोगों की वाहवाही तो कम गालियाँ ज्यादा बटोरते थे। कई मित्रों से जो मन मुटाव हुआ तो लम्बे  अरसे बाद काफी मान मनौवल के बाद ही मामला सुलट पाया . इसलिए हम अब इस जोखिम के काम को लेकर उदासीन हो चले हैं। मगर ब्लॉग जगत की इस नयी सुगबुगाहट के बाद सुषुप्त पड़ चली मसखरी फिर जोर मार रही है . 

मगर ना बाबा ना ..नाम के साथ तो मैं कोई उपाधि जोड़ना नहीं चाहता। मुझे याद है इंटर मीडिएट के दौरान मेरा एक मित्र उसे मिली उपाधि को लेकर अच्छा ख़ासा नाराज हो गया .उपाधि थी -देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर . अब वो गधा मेरे  पीछे ही पड़ गया कि वह कौन सा गंभीर घाव पैदा करता है .उसे लाख समझाता  कि यार यह तो मुहावरा भर है  मगर वो माने तब ना,उसे तो  तो बस यही सवाल करते रहने की जैसे सनक सी हो गयी थी . जब मैं इलाहाबाद युनिवर्सिटी के ताराचंद छात्रावास में था तो होली के अवसर पर एक मित्र के लिए जो टाईटल चुना गया वह था -"दमित इच्छाओं के मसीहा" ..इतना बुरा मान गया वह कि हमारी बोल चाल भी बंद हो गयी . अब ब्लॉग जगत में तो कितने मित्रों ने तो पहले से ही बोलचाल बंद कर दी है और अब अगरचे मैं कोई होली की उपाधि किसी के साथ चेंप या सटा  दी तो जुलुम ही हो जाएगा -तो भैया ऐसी रिस्क लेने को मेरी हिम्मत नहीं है .

होली की उपाधि देने की परम्परा बड़ी पुरानी  है, और यह  पढ़े लिखे लोगों का एक शगल है -होली के अवसर पर हंसी मजाक करने का बस -इसे दिल पर लेने की बात ही नहीं होनी चाहिए .मगर यह भी सही है कि प्रायः उपाधि देने वाले का निजी मूल्यांकन किसी के बारे में काफी भावनिष्ठ हो जाता है -उपाधि पाने वाले को चोट सी लगती  है कि अरे लोग मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं,जबकि मैं तो ऐसा नहीं , लोग कहें भले न कई बार उपाधियाँ लोगों को चुभ जाती हैं -मगर फिर भी उचित तो यही है कि इन्हें गंभीरता से न लिया जाय ,बस हल्के  फुल्के ही लिया जाय . अभी ब्लॉग जगत में कुछ और उपाधियाँ नामचीन ब्लागरों से और आने वाली हैं ऐसी अन्दर की खबर मुझे मिली है और मैं मानसिक रूप से खुद को उन्हें हंसी खुशी स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहा हूँ और आपसे भी यही  गुजारिश है .वैसे कभी कभी दूसरों की निगाहों से खुद का मूल्यांकन  जरुर करना चाहिए!

मेरे मन में भी कई उपाधियाँ तैर रही हैं -सुषुप्त सा  शरारती किशोर जाग सा गया है .  उपाधियाँ ही उपाधियाँ हैं आप लोग खुद अपने मन से स्वयंवर कर लें -चुन लें इनमें से-मुझे इनके साथ नाम नहीं देना है .
सनम बेवफा , फौलादी शख्सियत के नाम बड़े और दर्शन छोटे  , मेरे तो पिया परमेश्वर दूजो न कोई,दोस्त दोस्त ना रहा , इतने पास न आना अगर चाहते हो मुझे पाना ,मुझे  पता है औकात सभी की ,हमाम में मैं ही नहीं सभी नंगें हैं , हम तो दिल दे चुके सनम .दाल भात में मूसल चंद ,मैं हूँ इक  चिर विरही , परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर ,कोई मेरी भी तो सुनो , सलाह ले लो भाई सलाह ले लो , मुझे  छपास रोग लगा रे , मैं तो प्रेम दीवानी ,आजा मेरी प्यास बुझा जा ...जवानी बीती जाय रे ....अब अंत में क्या ख़ाक मुसल्मा होंगें?, मेरा जूता है जापानी पतलून लखनवीं ,घर में  तो पिया, मगर दिल किसी और को दिया, मैं हूँ परदेश  मगर दिलवर है उस देश , नादान बालमा, विरही सौतन आदि आदि .दोस्तों से गुजारिश है वे अपना भी योगदान कर सकते हैं ,उनका नाम गुप्त रखा जाएगा!    ......ये सभी  पर्सनालिटी  ट्रेट यही अपने ब्लॉग जगत में भी है -अपनी पसंद की आप खुद चुन लो और मुझे मत कोसिएगा ....
आप सभी को होली की ..नहीं नहीं अभी वक्त है -होली की शुभकामनाओं के लिए थोड़ा और इंतज़ार करिए-हाँ फागुन चकाचक बीते !

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

बीमार का हाल अच्छा है!

दो तीन दिनों से तबीयत थोड़ी नासाज है .अब उर्दू जुबान और शिष्टाचार में कहें तो "मेरे दुश्मनों की तबीयत नासाज हुई है".. अब इसकी व्याख्या अपनी अपनी समझ से आप करते रहें मैं तो कहूँगा कि कितनी मीठी जुबान है उर्दू कि किसी जान पहचान के लोगों की तबीयत ख़राब होने की बात यहाँ जुबान पर नहीं आ सकती ....मरें भी तो आपके दुश्मन .....आप हर वक्त हर लम्हा सलामत रहें .मैंने फेसबुक पर लिखा "डाउन विथ एल बी पी" मतलब लोअर बैक पेन ...और मित्रों की शुभकामनाएं और चुहलबाजियाँ भी चालू हो गयीं .शेर वेर भी कहे गए .एक युवा मित्र ने चुटकी ली -सर आप तो बूढ़े हो गए -मैंने उसे छूटते ही जवाब पकड़ा दिया -वही जो अमिताभ बच्चन ने अपनी एक हालिया फिल्म में दिया था .अब यहाँ दुहराना नहीं चाहता .समझ लीजिये .

यह लोअर बैक पेन मुझे छ्ठे छमासे परेशान कर देता है।मुझे अच्छी तरह याद है इलाहाबाद में जब पहला ब्लॉगर सम्मलेन हुआ था तो भी मैं इसी नामुराद दर्द की वजह से दुहरा हो रहा था . जाना असंभव सा था मगर स्नेही सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी का ऐसा आग्रह हुआ कि मेरा इन्कार कर पाना संभव नहीं हो पाया -खीझा,चिल्लाया मगर गया और कमर में तीव्र दर्द के बावजूद भी अनूप शुक्ल जी से अंकवार भर मिला और यकीन कीजिये दर्द छू मन्तर हो गया -रहा सहा दर्द कविता वाचकनवी जी के विद्वता भरे व्याख्यान से दूर हो गया -सत्संग की और वह भी प्रयाग के सत्संग की महिमा तो वेद पुराणों तक ने गया है . अनूप जी अब दूर हैं नहीं तो जड़ तोड़ इलाज के लिए फिर फिर स्पर्श टोटका आजमाता -वो गाँव गिरांव में जब रीढ़ की हड्डी में हूक उठती है तो उस महिला के पैर से दर्द की जगहं का बार बार स्पर्श कराते हैं जिसका जन्म उलटी ओर से हुआ रहता है .
अब घर में ही लेटे बैठे कई पापी और विरिजिन विचार दिमाग में उमड़ घुमड़ रहे हैं . कई लोगों ने फेसबुक से लगाय फोन तक लगा के हाल चाल पूछा -तो वे भी हैं जो कभी दिन रात चौबीसों प्रहर समय असमय कुशल क्षेम पूछते थे अब बिल्कुल ही बेगाने हैं -दुनिया ऐसयिच ही है! कभी कभी टेम्पररी बीमारियों का कारण सायिकोलाजिकल भी हो सकता है-जैसे घनिष्ठता का अभाव या रिक्तता -कोई हालचाल तो पूछे? कोई अहसास तो दिलाये कि बीमार का भी वजूद है इस दुनिया में .......और जब यह भाव बड़ा प्रबल हो उठता है तो लोग बाग़ झट खटिया पकड़ लेते हैं -चाहने वालों से मिजाजपुरसी हुई नहीं कि ज़नाब फिर चंगे -व्यवहारविद कहते हैं कि बीमारियों का यह व्यवहार शास्त्र बीमारियों की जर्म थियरी से अलहदा है ........बेगम अख्तर ने एक वो बड़ी मशहूर ग़ज़ल गाई है न -
उल्टी पड़ गईं सब तदवीरें कुछ ना दवा ने काम किया
आखिर इस बीमारिए दिल ने मेरा काम तमाम किया :-).
......और वो मशहूर कौवाली के बोल तो याद होगें न आपको?
...जो दवा के नाम पे जहर दे उस चारागार की तलाश है :-)
और यह भी -
उन्हें देख के आ जाती है चेहरे पे रौनक
वे समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।।

मित्रों ने फेसबुक पर और भी बहुत कुछ शेयर किया किया है - एक बानगी देखिये -
हम मरे जाते हैं हाल उन का पूछने को, वो हैं कि न पूछते हैं न बताते हैं।
तुम मेरे पास होते हो ,(गोया )जब कोई दूसरा नहीं होता .
ऐ दिल-ए-नादां, तुझे हुआ क्या है !!!
आख़िर इस मर्ज की दवा क्या है???


बहरहाल दर्द अब कुछ कम है :-)

शनिवार, 29 सितंबर 2012

अथातो लंगोट जिज्ञासा!


पहली बार इस  लंगोट पोस्ट को फीड ने लिया ही नहीं -पडी रही है, फिर ट्राई करके देखता हूँ! 

नैतिक चेतावनी:यह एक निहायत फालतू और दिमागी फितूर की पोस्ट है, समय जाया करना हो तभी पढ़ें!
दीवानों मस्तानों की फरमाईश कि चड्ढी चर्चा पार्ट टू भी लिखी जाय.मैंने भी हंसी हंसी में हामी भर दी थी ..सोचा कभी लिख भी दी जायेगी .जब इतना प्रेम मनुहार से कहा जा रहा है तो ..फिर सोचा कि इन दिनों चूंकि तामस भाव का प्राबल्य है तो यह चर्चा भी निपटा ही ला जाय ..क्या पता कब मन सात्विक राजस हो उठे और यह चर्चा धरी की धरी रह जाय ..अब मूड का भी क्या भरोसा.पचपन में बचपन की अठखेलियाँ खेलने लगता है नालायक. अपने संतोष त्रिवेदी जी हैं न लंगोट के पड़े पक्के हैं.उन्होंने पिछली पोस्ट पर इस दिव्य परिधान का महात्म्य छेड़ ही तो दिया-अब यह उनका प्रधान वस्त्र रहा है तो जाहिर है  जिसका जो भी प्रधान होता है वह उसी को बार बार दिखाता फिरता है.जबकि मैंने कई ज्ञात और ओबियस कारणों से पिछली पोस्ट में लंगोट की चर्चा मुल्तवी कर दी थी.मगर संतोष जी की लंगोट निष्ठा से प्रभावित हुए बिना न रह पाए थे .

उपर्युक्त लिंकित पोस्ट पर आप लंगोट के साक्षात दर्शन भी कर सकते हैं!बचपन से ही मैंने लंगोट को चड्ढी का जोडीदार देखा समझा मगर पहना नहीं.चड्ढी जहाँ कम उम्र तक ही अनुमन्य थी लंगोट बड़े बच्चों - किशोरों का स्वीकृत परिधान था.अन्तःवस्त्र की श्रेणी में होने के बाद भी इनका खुला प्रदर्शन एक शगल था मानों यह वह तत्कालीन टैग लाईन थी जो लोगों को प्रगटतः खुद के यानी पहनने वाले के निरापद चरित्र के बारे में आश्वस्त करती थी .. पहलवानों का तो यह एक विशिष्ट अंग वस्त्रं था ही और निश्चित ही नियंत्रित मर्दानगी के प्रदर्शन से जुड़ा था..मगर मुझे लंगोटधारियों का परोक्ष व्यवहार उनके प्रत्यक्ष आचरण से हमेशा चुगली खाते दिखा.लम्बी लंगोट और फिर उसका लाल रंग..मतलब डबल अलंकारिक विज्ञापन..राग दरबारी के कैरेक्टर पहलवान भी लंगोट प्रेमी है जो छत पर लंगोट अभ्यास में पकडे गए थे.मैंने आज तक जो लंगोटें देखीं सभी लाल रंग की ही रही हैं ..

पता नहीं लंगोट का लाल रंग से क्या रिश्ता है? शायद ब्रह्मचर्य का रंग ,निषेध का रंग लाल है इसलिए ही लंगोट भी लाल.लाल रंग से मेरी विरक्ति बचपन से ही इसी लंगोट के चलते शरू हुयी थी.उन्ही दिनों मास्टर साहब कक्षा सात में संस्कृत व्याकरण पढ़ाते हुए लंग लकार पढ़ाते थे और मुझे बरबस लंगोट की याद आ जाती थी ..अजब सा असहजता वाला संयोग आ जुड़ा था यह.पहनी हुयी लंगोट ,शरीर के एक सहज अंग को बुरी तरह कम्प्रेस करती हुयी लंगोट और सूखने के लिए छोडी गयी हवा में लहराती लंगोट..हर ओर बस लंगोट ही लंगोट. और कई लंगोट पहने लोगों की आपसी गहन यारी दोस्ती..गजब का जमाना था वह.मुझे इस परिधान से न जाने क्यों शायद इंस्टीनक्टइव विरक्ति थी इसलिए आह मैं कभी भी किसी का लंगोटिया यार नहीं बन पाया,वैसे कभी कभार कुछ पुराने साथी संगी मिलते ही जब कहते हैं कि यार हम तो कभी लंगोटिया यार हुआ करते थे तो मैं असहज हो उठता हूँ.
कभी लंगोट पहनी ही नहीं तब कैसे हुए लंगोटिया यार?बहरहाल एक बार एक लंगोटिया बाबा का गाँव में आगमन हुआ ..जैसा कि उन दिनों की कस्टमरी थी -बाबा की बड़ी आवाभगत हुयी और वे गाँव में ही ठहर गए ...बचपनकी यादें आश्चर्यजनक रूप से ताजा बनी हुयी हैं -एक दिन बड़ा कोलाहल हुआ.घर के बड़े बुजुर्ग बच्चों को उस कोलाहल से दूर कर रहे थे.किस्सा कोताह यह था कि बाबाकी लंगोट ढीली होने की शिकायत कुछ किशोरवयी लड़कों ने कर दी थी और बाबा फरार थे.उनकी लंगोट नीम की एक निचली टहनी पर लहराती उनकी याद लोगों को अब भी दिला रही थी.एक सज्जन ने इतने बड़े काण्ड के बाद भी उसे बाबा की यादगार मान सरमाथे लगाया.भागते भूत की लंगोट ही सही.
उन्हें पहलवानी का शौक भी था तो अगली बार के पचईयां(स्थानीय त्यौहार) के अखाड़े में वे वही लंगोट पहन के उतरे मगर प्रतिद्वंद्वी पहलवान के पहले दावं में ही चित्त हो गए.मैं भी उस मुठभेड़ का चश्मदीद बना था..कुछ बड़े बूढ़े ज्ञानी लोगों ने उन्हें लाख समझाया कि वह लंगोट उन्हें सही नहीं ( अनुकूल नहीं हुयी ) इसलिए उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होगा..मगर वे माने नहीं और बार बार हारते रहे कुश्तियों में. जीते तभी जब लंगोट बदली ...क्या पता बाबा की लंगोट के ढीली होने का ही असर रहा हो यह :) एक अभिशप्त लंगोट .....
मानव अंग विशेष,लंगोट और सांप इन सभी के आचार व्यवहार में साम्य है-अचानक फैलना सिकुड़ना इन सब में कामन है ..जाहिर है ऐसी गतिविधि भयोत्पादक भी है..यह जरुर कोई आदि (वासी) परिधान रहा होगा जो वस्तुतः एकलिंग -प्रतीक रहा होगा.आदिम अनुष्ठानों में संयोग,जोड़ी चयन की अभिलाषा प्रगट करने की एक प्रतीक पाताका! मगर कालांतर में किन्ही अज्ञात आश्चर्यजनक कारणों से इसे लिंग गतिविधियों का शमनकारी वस्त्र मान लिया गया .. जो भारतीय मनीषा की एक बड़ी चूक लगती है .और यही कारण है कि कई पीढियां लंगोट-ब्रह्मचर्य से जोड़कर किये गए प्रयोग परीक्षणों में बुरी तरह असफल होने के बाद भी संकोचवश असलियत को दीगर मानवता के सामने जाहिर नहीं कर पायीं .गांधी जीने जरुर कुछ साहस दिखाया और अपनी असफलता स्वीकारी -जाहिर है अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोगों में उन्होंने भी लंगोट उपकरण का प्रयोग किया ही होगा -मगर अपनी असफलता की ईमानदार स्वीकारोक्ति की .जबकि आपको आज भी कई ऐसे नर पुंगव मिल जायेगें जो लंगोट का महात्म्य बघारते नहीं अघायेगें.इनसे दूर रहिये..हाँ पहलवानों के लिए यह कसा हुआ परिधान उनकी सुविधा के हिसाब से और प्रतिद्वंद्वी की परिधान-पकड़ कमजोर बनने के लिए मुफीद है ..मगर ब्रह्मचर्य के लिए न बाबा न .... 


लगता है इस पोस्ट की भी लंगोट सीमा अब लंघ उठी है इसलिए इस लंगोट महात्म्य पर अभी तो विराम ..फिर कभी कुछ नए लंगोट तथ्य आपसे साझा किये जायेगें! एक लंगोट -यात्रा संस्मरण यहाँ भी

रविवार, 23 सितंबर 2012

कुत्ता दिवस!

गिनेज बुक आफ रिकार्ड्स का नया संस्करण आ गया है. संयोग से मैंने आज ही टाईम पत्रिका में उसके नए विश्व रिकार्ड्स पर एक नज़र डाली तो एक विशालकाय कुत्ते को देखकर दंग रह गया ...कुत्तों के भी कद इतने बड़े होने लग गए ..पहले तो मुझे भी यह शक हुआ कि यह कोई और जनावर तो नहीं है? अब जैसे अपने बेचैन आत्मा वाले देवेन्द्र जी लिखते भये तो गधे  पर मगर फोटू  चेप दी खच्चर की....अब तो हम यह नहीं मान सकते कि उन्हें  गधे और खच्चर का फर्क नहीं पता .....मगर मैं अगर ऐसी गलती कर दूं तो उल्टा लटका दिया जाऊंगा क्योकि अपुन की पढ़ाई लिखाई और सोहबत भी इन्ही जानवरों और जानवर प्रेमियों की रही है और फिर कुत्ते की स्वामिभक्ति की दूसरी कोई सानी जानवर जगत में नहीं है. फोटो में कुत्ता और उसकी स्वामिनी का यह पारस्परिक सम्बन्ध दिख भी रहा है. 



कहते हैं कुत्ते दरअसल भेड़ियों के ही वंशधर हैं -दोनों एक ही  गण(जीनस) के हैं -कुत्ता दरअसल एक पालतू भेड़िया है. मनुष्य के साथ इसका बड़ा आदिम सम्बन्ध है -तभी से यह मनुष्य के साथ है जब  शिकार की ताक में मनुष्य दर  दर भटकता रहता था . उसे शिकार को घेरने के लिए एक तीव्रगामी अनुचर  चाहिए था और तत्कालीन कुत्ते के पुरखे को भोजन की एक निश्चित व्यवस्था -तो यह सम्बन्ध तभी से स्थाई बनता गया -दरअसल दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.  एक दूजे के बिना अधूरे हैं. मगर आश्चर्य है कि फिर भी बहुत से लोग आज भी कुत्ता द्वेषी हैं ..न जाने क्यों? हो सकता है यह उनका कोई निजी मामला हो या फिर वे बचपन में कुत्ते के काट खाये लोग हों. बचपन का कुत्ता काटा आदमी जीवन भर इस जानवर से दहशत खाता है -बाद में काटे गए लोग इतना नहीं घबराते और इसलिए कई लोग बार बार काट खाए जाते हैं. वैसे अब कुत्ते से काट खाना उतना त्रासदपूर्ण नहीं है क्योकि अब पेट वाली चौदह सूईयों  का जमाना नहीं रहा! 
आज से आश्विन मॉस आरंभ  हो रहा है . यह कुत्तों का घोषित प्रणय काल है. इस समय कुत्ते बहुत कटखने और आक्रामक हो जाते हैं .इसलिए इनसे बच के रहना चाहिए ..दरअसल इसी अंदरुनी डर के चलते मैं  यह पोस्ट लगा रहा हूँ -इन दिनों रात बिरात सूदूर यात्राओं से जब लौटता हूँ अपनी गली में नए नए अजनबी कुत्तों को देखता हूँ...और वे भी मुझे संशय से देखते हैं और मैं नज़र बचा कर निकल आता हूँ -कौन फालतू में लफड़े में पड़े. उन्हें लगता होगा हम उनकी प्रेयसी के एक और दावेदार /प्रतिद्वंद्वी हैं ....उनकी टेरिटरी का दायरा अब और सीमित हो चला है ....और अब तो वे झुण्ड में भी हैं -एक से तो हम निबट भी लें मगर कुत्तों के पैक से बचना मुश्किल ही नहीं असंभव है . 
मैं उनकी गोल में शामिल होकर एक दब्बू कुत्ता सा बिहैव नहीं करना चाहता...मैं मनुष्य हूँ और मुझे अपनी अस्मिता अलग रखनी ही होगी....वे लाख मुझे अपना प्रतिद्वंद्वी माने मगर मैं मैं हूँ मनुष्य और वे कुत्ते....कुत्ते कहीं के .....मगर सावधान तो रहना ही है ..किसी ने कहा आपका  ये कुत्ता बहुत भौंकता है मुझे डर लगता है कहीं काट न ले ..कुत्ता स्वामी ने जवाब दिया कि बिलकुल मत डरिए जो कुत्ते भौंकते हैं काटते नहीं यह कहावत भी आप नहीं जानते? डर रहे सज्जन ने कहा मैं तो जानता हूँ मगर यह नामुराद कुत्ता तो यह कहावत नहीं जानता :-) 
मैं चाहता हूँ कि कुत्तों के सम्मान में कुत्ता दिवस घोषित किया जाय -अब इस प्रस्ताव से कम से कम वे कालोनी के नए कुत्ते तो मुझे बख्श देगें और यह मनुष्य और कुत्ते के प्रगाढ़ सम्बन्ध की एक कृतज्ञ भारतीय स्वीकृति भी होगी ...मुझे मालूम है श्वान प्रेमी मेरे इस प्रस्ताव पर खुश होंगें और मुझे बधाईयाँ देगें और श्वान विद्वेषी मुझ पर जल भुन जायेगें! ह्यूमर प्रेमी भी मुझे सारस्वत सम्मान अता करेगें! :-)
पुनश्च: फेसबुक पर चर्चा के दौरान कुत्ता दिवस (नामकरण ) की सूझ बैसवारी नरेश संतोष त्रिवेदी की थी तो यह आभार उनके प्रति बनता है ! 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

मैंने कब किसी को कहा ब्लागरा या ब्लॉग वालियां!?


नाहक ही मुझ पर तोहमत पर तोहमत लगाई जा रही है ...मैंने तो किसी को नहीं कहा ब्लागरा या ब्लॉग वालियां ...हालांकि इन दोनों शब्दों का कापीराईट मेरे पास है मगर अब क्या शब्द -कौतुक भी कोई गुनाह है? वर्ड प्ले तो बच्चों तक का प्रिय शगल है ...और वो कहावत भी तो कितनी जग प्रसिद्ध हुयी है ना -सुवरण को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर ... तो मैंने भी ये दो शब्द गढ़ दिए ताकि ब्लॉग शब्द कोश में अपनी इंट्री बना लें और साहित्य कोश की शोभा बढायें -अब यह किसी के प्रति ,किसी को लक्षित करके तो ओरिजिनली कहा नहीं गया था ..शब्द तो कितने ही हवा में तैरते रहते हैं और तब तक किसी के साथ नहीं आ चिपकते जब तक उसका वैसा आचरण न हो जाय -भाषा और शब्द के धनी मेरी इस बात को समझेगें ....और फिर ब्लागरा भी ऐसा कौन सा एलर्जिक शब्द हो गया जो उसे सुनते ही भड़क या चिहुंक उठा जाय ....अरे जैसे शायरा वैसे ब्लागरा..अब कोई बताये क्या शायरा शब्द फूहड़ है? या सम्मान से नहीं लिया जाता? ..अरे मेरे जमाने में तो लोग बाग़ बिना किसी शायरा का नाम सुने मुशायरे में जाते तक नहीं थे ... हाँ अब जमाना जेंडर न्यूट्रल शब्दों का आ गया है ...शायर और एक्टर प्रचलन में है दोनों के लिए मगर तो क्या नए शब्द गढ़ने पर कोई पाबंदी है या फिर शब्दों को डिक्शनरी से निकाल  दिया जाय? हम कभी कभी इतना संकीर्ण क्यों हो उठते है? कहीं कोई अपनी कमी कसक तो नहीं है?  
अब आईये ब्लॉग वालियां पर ..पढ़ने लिखने वाले जानते हैं कि अमृत लाल नागर जैसे सारस्वत प्रतिभा के धनी विद्वान ने ये कोठेवालियां लिखी थी ..मगर मेरा संबोधन तो कतई इस लिहाज से नहीं था ...अभी उसी दिन कोई चर्चा कर रहा था ....कौन पाबला? जवाब आया अरे वही अपने ब्लॉग वाले पाबला जी ? तो जब ब्लॉग वाले पाबला जी हो सकते हैं तो ब्लॉग वाली फलानी क्यों नहीं हो सकती? आम बोल चाल की भाषा में कई संबोधन ऐसे ही दैनन्दिन जीवन में सहजता से चलते रहते हैं और कई कार्य व्यवहारों को अंजाम देते हैं ...उनका कोई अन्य व्यंजनात्मक अर्थ थोड़े ही होता है ..मगर वो क्या है कि चोर के दाढी में तिनका .. तो वह चिहुंक पड़ता है ..जैसे वज्रपात हो गया हो ....अब क्या इक्केवालियाँ ,ठेलेवालियाँ, नखरेवालियाँ कोई खराब शब्द हैं -भाई ये तो रोजमर्रा के शब्द हैं ....हाँ बहुबचन में हैं ..अब एक वचन और बहुवचन, जैसी जरुरत हो उसी के मुताबिक़ व्यवहृत हो उठते हैं ... इसमें कहाँ कौन सा आक्षेप अन्तर्निहित है? हाँ जब शब्दों का धुर विरोध होता है तो वे नए अर्थ और गाम्भीर्य ग्रहण करते चलते हैं... अब जितना ही विरोध इन नव सृजित शब्दों का होगा वे और भी प्रचलन  में आते जायेगें ....लोगों को तो मुझे इन दोनों नए शब्दों के गढ़ने पर शाबाशी देनी चाहिए मगर दे रहे हैं गालियाँ ....हाय रे हिन्दी ब्लागवर्ल्ड :-( ..यह किसी के लिए कहा ही नहीं गया ...अब लोग अपने आचरण से इन शब्दों को अपने से चिपका लें तो बात और है ..अब तक तो तीन चार ने तो चिपका ही लिया है ...अब उनकी अपनी मर्जी ...बेदर्दी तेरी मरजी ....जो चाहे कह लो आखिर पुरुष द्रोह भी कोई चीज है ..
दरअसल यह सब परिणाम है ब्लॉग जगत की उन गोल गिरोह वाले वालियों के  सुकर्मों के जिनके चलते यहाँ कई दुरभि संधियाँ चल रही हैं --अब उन मोहतरमा के ब्लाग पोस्ट पर टिप्पणी करिए तो फलानी नाराज़ हो जाती हैं कि मेरे यहाँ तो करते नहीं बार बार वहीं जाते हैं ....अब कोई क्या कहे अरे वे मोहतरमा आपसे लाख गुना अच्छा लिखती हैं आप भी वैसा लिखिए तो हम दौड़े चले आयेगें ..और आपके यहाँ भी पुरुष मित्रों की कोई कम भरमार तो रहती नहीं ...सब दाद खाज देने पहुंचे ही रहते हैं और आपको ब्लॉग विदुषी की खुशफहमी देते रहते हैं ..मगर मेरी दाद?  मो सो नको .....बढियां लिखिए आयेगें आपके यहाँ भी आयेगें ....वैसे भी यह अपनी अपनी पसंद की बात है और मैंने खैरात टिप्पणियाँ बंद कर दी है उन सभी के यहाँ जिनके अपने अघोषित एजेंडे हैं और जो दुरभि संधियों में मशगूल हैं ....इनमें मेरे कई पुरुष मित्र भी हैं  .....
मेरी नसीब ही अजीब है ..ब्लॉग जगत में आने के पहले नारीवाद शब्द तक मैंने नहीं सुना था मगर एक मुहिम चलाकर मुझे नारी विद्वेषी घोषित करने के प्रयास किये जाते रहे हैं ....और अब तो लगता है मैं हो भी गया हूँ पक्का मीसोजीनिस्ट ....बार बार सही को गलत कहो तो वह गलत ही हो जाता है ....एक देवि हैं जिन्होंने नाक में दम कर रखा है.. कितने अच्छे श्रेष्ठ ब्लागरों को वे पैवेलियन तक पहुंचा चुकी हैं ...गोलबंदी की है ..कितनी दुत्कारों का सामना किया है मगर अवसर की ताक में रहती हैं ....कुछ लोगों को फिर से खेमें में जोड़ रही हैं .....लोग हैं कि अब उनकी सुनते ही नहीं .... कब खतम होगा ये अरण्य विलाप? 
मित्रों, ब्लॉग ऐसा ही माध्यम है ...यहाँ कड़वी कड़वी थू और मीठी मीठी गप्प नहीं चलेगा ....दोनों कहने का और सुनने  का माद्दा रखिये ...तब यहाँ टिकिए..तनिक टफ माध्यम है यह ...यहाँ ठकुरसुहाती लम्बे दिनों तक नहीं चलती ..प्यारे बोल बोलने वालों को तो एक उन मोहतरमा ने ही चलता कर दिया ...तो डट के ब्लागिंग करिए और ठसक के रहिये ..मुंहदेखी आलाप प्रलाप की जरुरत नहीं है ब्लागिंग में ......अपनी कहिये और एलानियाँ कहिये .....आप अपनी सोशल नेट्वर्किंग के कारण नहीं अपनी लेखनी से ही जाने जायेगें ....टिप्पणी मोह छोडिये ..गणना काउंटर आपको बतायेगा कि आप पढ़े जा रहे हैं और खूब पढ़े जा रहे हैं ..
टिप्पणियों का भी अपना समाजशास्त्र है और राजनीति है -मेरे कई पुरुष मित्र इसलिए भी आपके यहाँ सहज टिप्पणी करने से बचते हैं कि कहीं उनकी वे फलानी नाराज न हो जायं!और वे फलानी आपके यहाँ नहीं आतीं तो मुंह क्या बिसोरना? उन्हें फलाने ने मना कर रखा होगा ....और फिर और  भी कितने अच्छे अच्छे ब्लॉग लिखे जा रहे हैं वहां जाईये न ...रोनी सूरत बनाकर मत बैठिये ....और हाँ बन्दर बंदरिया घुड़कियों से मत घबराईये ..आप अपनी पर आ जाईये तो पायेगें आप उनसे लाख गुना अच्छा लिखते हैं ... आप लिखते भी हैं ..मैंने देखा है ..और आगे भी देखते रहेगें बाबा, टिप्पणी भी करेगें ..अब खुश न :-) 

बुधवार, 4 जुलाई 2012

गुरु ,गुरुघंटाल और ब्लागजगत के अफ़साने


अभी कल ही की तो बात है .गुरु पूर्णिमा पर अपनी पोस्ट का लिंक जैसे ही मैंने फेसबुक पर डाला वे अवतरित हो गए ...भावुकता भरे शब्दों में अपना उदगार व्यक्त कर गए -मेरे तो गुरु आप ही हैं .मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई की ही तर्ज़ पर . वे अक्सर हमें यह अहसास दिलाते रहते हैं कि वे मेरे शिष्य है और यह हर बार मेरे लिए एक असमंजस भरी अनुभूति होती है ...कारण, मैं बराबर की मित्रता में बिलीव करता हूँ -उम्र का कोई झाम  आड़े हाथ नहीं आने देता ....और फिर खुद को गुरु मानने की मूर्खताभरी  अहमन्यता से भी दूर रहना चाहता हूँ ...वैसे भी आजकल काहो गुरु! का संबोधन व्यंगात्मक ज्यादा है .पता नहीं उनमें सचमुच का शिष्यत्व है या नहीं या फिर वे भी काहो गुरु वाली ही स्टाईल में यह उपाधि मेरी और उछालते हों -मैं भी सावधान रहता हूँ -और उनके ऐसे संबोधन को मजाकिया लहजे में ही लेता हूँ .....
एक बार मैंने थोडा गंभीर मगर पवित्र भाव से पूछ ही लिया कि अगर मैं गुरु हूँ तो वे फिर वे कौन हैं जिनकी चर्चा अक्सर उनके होठों पर रहती हैं तो वे तपाक से बोल उठे -"अरे वे तो गुरु घंटाल हैं .अब  गुरु घंटालों की चेल्हआई से राम बचाएं ....मेरे लिए तो गुरुवार आप ही ठीक हैं ."मगर मेरा मन हमेशा असमंजस में ही रहता है कि ये शिष्य कब कौन सी खुराफात न कर बैठे -चलो बच्चू ज्यादा खुरचाली कभी की तो गुरु द्रोणाचार्य की याद करके अंगूठा मांग लूँगा गुरु दक्षिणा में और उसी दिन असली नकली शिष्यत्व का फैसला भी हो जाएगा .. :-) मुला मेरे एकाध शुभाकांक्षी जो रह गए हैं ताकीद करते हैं कि भैया आधुनिक शिष्यों से सावधान रहा करियो नहीं तो वे गुरुओं का ही अंगूठा काट लेते हैं -मैं तुरत ग़मगीन होकर उन्हें बता दिखा देता हूँ कि अब कोई स्कोप नहीं है ...दोनों अंगूठे तो पहले से ही लिए जा चुके हैं अब तो और की गुंजायश ही नहीं है -गनीमत है डैशबोर्ड पर अंगूठों का इस्तेमाल नहीं होता -नहीं तो कलमों पर अभिव्यक्ति टिकी होती तो मैं तो गया था काम से ....आधुनिक तकनीकीविद कैसे युग द्रष्टा हैं उन्हें आभास है कि गुरुओं के अंगूठे गायब हो रहेगें ....शिष्यों का ऐसा ही कुछ जलवा है आज के युग में ....मेरे मित्र फिर कहते हैं कि वे दंडवत होकर आपके पैर का अंगूठा भी काट सकते हैं ....मैं दहल तो जाता हूँ मगर फिर कह पड़ता हूँ चलो कोई बात नहीं परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर ..मगर अपने डर की आशंका को हंसी में उड़ाते हुए यह भी जोड़ देता हूँ चलो ससुरे जो भी अंग वे चाहें काट ले जाएँ बस न ....अब इस उम्र में कई अंग वैसे ही अवशेषी अंग की उपाधि ग्रहण करने वाले हैं ......
बहरहाल मैंने अपने शिष्य से बातचीत आगे बढ़ायी-और भाई क्या हाल हैं गुरु घंटाल के? बोले हाल कुछ ठीक है चाल तो कभी सुधरेगी नहीं और वैसे भी बिचारे इन दिनों बड़ी मुसीबत में हैं .काहें? एक अद्भुत सुखानुभूति के साथ मैंने पूछ ही तो लिया .."अरे हालत पस्त और तबीयत खस्ता है इन दिनों उनकी ...." मैंने सलाह दी,.. तो फिर ज्ञानदत्त जी गंगा किनारे वाले ब्लॉगर से कुछ पिस्ता विस्ता क्यों नहीं दिलवा देते उन्हें ...अभी फेसबुक पर वे डिक्लेयर किये थे कि उनके पास मेवे का जखीरा है और गुरु पूर्णिमा के दिन उन्होंने खूब  मेवे डालकर खीर बनवाई है ..मगर इस हास्य बोध को न पकड़ कर मेरे शिष्य का मुंह अब भी गुरुघंटाल की हालत बयान करते हुए लटका हुआ था ..
मैंने अपनी आवाज में जानबूझ कर थोडा रहस्य का पुट देकर पूछा और कोई ऐसी वैसी बात तो नहीं है ...."वो तो मुझे पता नहीं मगर इन दिनों वे खोयी हुए शान शौकत को फिर से जमाने में लगे हैं" ...भला कैसे? मैंने पूछा और यह भी जोड़ा कि भाई वे तो बड़े आशावादी ब्लॉगर हैं."हाँ आशा तो उनकी बलवती है ही   -उसी तरह जैसे पांडवों और कौरवों के युद्ध में जब सारथी  शल्य को अंत में दुर्योधन ने अपना सेनापति बनाया  तो संजय धृतराष्ट्र से कह उठे कि राजन देखिये दुर्योधन कितना आशावादी है जो शल्य को पांडवों पर विजय के लिए भेज रहा है . यही हाल बिचारे गुरु घंटाल का है जिन्होंने एक नया चिटठा चर्चाकार चुना है जो चिट्ठाचर्चा का बेड़ा पर करेगा ...और उस नए चिट्ठा चर्चाकार ने अपनी गोल  जुटा कर सर संधान भी कर लिया है ....ओह चिट्ठाचर्चा को भला यह दिन भी देखना था ...? मेरा मन क्षुब्ध हो गया .....शिष्य ने मुझे चिंतन से उबारा -आप काहें चिंतित होते हैं ....जो हो सो हो आपसे क्या लेना देना ....मेरा मुंहबोला  शिष्य अब पूरे शिष्यत्व भाव से मेरे सहज होने के प्रयास में जुट गया था ..ब्लॉग जगत के कई दूसरे अफसानों  का जिक्र शुरू हो चला  था ......

शुक्रवार, 18 मई 2012

शूर्पणखा:एक शोध!


अब कैसे कैसे शोध के विषय भी हिन्दी की प्राध्यापिकाएं चयनित करती हैं -इसका उदाहरण मुझे एक उच्च महिला विद्यालय में जाने पर दिखा -एक कथित रूप से माडर्न हिन्दी प्राध्यापिका ने अपनी पी एच डी में पंजीकृत छात्र को एक अद्भुत विषय दे रखा था ."शूर्पणखा के व्यवहार एवं उसके अधिकारों का एक समाजशास्त्रीय विवेचन " ...हद है ....मैंने सोचा अजीब खब्ती टीचर है ....अपनी स्टूडेंट का पूरा जीवन चौपट करने वाली है ..मैंने थोडा हस्तक्षेप करना चाहा ...यह कैसा विषय है? जवाब था कि जब कैकेयी पर काव्य लिखा जा सकता है तो शूर्पणखा पर क्यों नहीं? मैं बहस में नहीं पड़ना चाहता था ....मगर इतना कह ही गया कि एक घिनौनी, बदसूरत,बेडौल, बेहद हिंस्र प्रवृत्ति की राक्षसी पर हिन्दी शोध से अगर हिन्दी का कुछ भला होने वाला हो तो जरुर करिए ....
"मेरी माँ ने त्रिजटा पर शोध किया था" ..वे बेसाख्ता बोल पडीं -हूँ तो यह मामला खानदानी था ....तो हिन्दी की रोटी तोड़ने का काम यहाँ पुश्तैनी था ..कितनी भाग्यहीना है बिचारी हिन्दी कैसे कैसों को झेलती आयी है :( 


फिर वे तफसील से बताने लगीं ...देखिये शूर्पणखा एक आजाद ख्यालों वाली बम्बाट नारी थी ....अपने विचार बिंदास प्रगट कर सकती थी ....और चेहरे से क्या होता है ...माना वह बड़ी ही बदसूरत थी ,सच कहें तो घिनौनी थी, मगर दिल की स्वतंत्र और साफ़ थी .."ओहो तभी तो सीता जी को कच्चा चबाने को वह उद्यत हो गयी थी .. ?" मैंने हठात रोका ...मगर वे जारी रहीं ....अब क्या करती वह ,राम उसे बरगला क्यों रहे थे ..वह एक आजाद ख्याल वाली नारी थी ..लेकिन राम ने उसे रिजेक्ट कर दिया ...और फिर लक्ष्मण ने उसे रिजेक्ट कर दिया ..भाई साहब आप ही बताईये कुछ ही पलों में दो दो रिजेक्शन भला कोई कैसे बर्दाश्त कर सकता है ...."हूँ यह तो है" ..मैं अब मैदान छोड़ने की मनोदशा पर आ गया था ....वैसे भी इस तरह के उत्साही ऊर्जित नारीवादियों से मुझे डर लगती आयी है ..कब किसी को क्या न कह दे ..कब किसी का चरित्र चौराहे पर नीलाम कर दें -इनका क्या भरोसा -अब इन्हें तो रिजेक्शन की पीड़ा आजीवन सताए रहती है शूर्पणखा की भांति.. इन्हें तो सारी दुनिया ही वैसी दिखती है ...मैंने भी पीछा छुड़ाते हुए कहा कि आप रिसर्च विसर्च तो कराईये मगर एक बात अच्छी नहीं लगी आपने मुझे भाई साहब जो कहा ..मैं दुनिया के हर किसी का भाई बनने का माद्दा नहीं रखता और न ही ऐसी कोई सदाशयता पालता हूँ ..मित्रों का चयन बहुत ढूंढ ढाढ के करता हूँ लाखो में एक ....वे भले छोड़ जायं, मैं कभी किसी को नहीं छोड़ता ....वे हतप्रभ होकर मुझे देखने लगीं और मैं वापस चल पड़ा ..

कई खयालात मन में उभर रहे हैं ....कैसे कैसे शोध के विषय लिए जा रहे हैं ..इसलिए ही तो शोध का स्तर दिन ब दिन गिरता जा रहा है .मैं यह भी मानता हूँ कि शूर्पणखा शायद कोई व्यक्ति भर ही नहीं प्रवृत्ति की परिचायक थी जो आज भी धड़ल्ले से सीना ताने समाज में घूम रही है ...लाख लाख रिजेक्ट हुयी ,अपमानित हुयी ,शील भंग हुआ मगर फिर भी वह नित नए राम की तलाश में दर दर भटक रही है .इस आस में शायद किसी युग में राम अथवा उनके सलोने गौरवर्णी भ्राता उसका उद्धार कर जायं ..मगर आप ही बताईये क्या राम कभी शूर्पणखा का उद्धार करने की सोच भी सकते हैं ..अहल्या तर गयीं ....मगर शूर्पणखा के पाप उसे कभी नहीं तरने देगें ........वह राम की त्याज्य है!

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

अथ नकलोपाख्यानम!


जी भ्रम न करें नकलोपाख्यानम ही है.... पुराणों का नलोपाख्यानम यानि नल दमयंती आख्यान नहीं..नकल का अख्यान. इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं तो सोचा आप सबसे कुछ इसी मामले पर बतियाया जाए। नक़ल और परीक्षाओं का तो बड़ा गाढ़ा रिश्ता है। नक़ल विहीन परीक्षा की सारी कवायद के बाद भी नक़ल रोके नहीं रुक रही है तो केवल इसलिए कि यह हमारी एक बड़ी पुरानी थाती हैकला है और भारतीयता की पहचान है। शिक्षा व्यवस्था में चाहे वह तोता रटंत विद्या हो या नक़ल विद्याइनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। वेदपाठी ब्राह्मण वेद की ऋचायें रट रट कर ही याद करते थे। बाबा तुलसी भी कहते भये हैं- 'दादुर धुन चहुं दिशा सुनाईवेद पढ़हिं जिमि बटु समुदाई'... मतलब वर्षा ऋतु में मेंढक ऐसे टर्रा रहे हैं जैसे वेदपाठी ब्राह्मणों के समूह वेदपाठ कर रहे हों। शिक्षाशास्त्री और भाषा विज्ञानी लाख कहें कि रटना मानव  बुद्धि की संभावनाओं को कमतर करता हैहम नहीं मानते। यदि ऐसा होता तो वैदिक वांगमय हजारो साल तक अक्षुण न रहते। हमने अपनी इसी नैसर्गिक क्षमता से ही तो अपने वेदों और स्मृतियों को हजारो साल तक बचाए रखा। लिखने की कला और छापे खाने तो कितने बाद में आए। अब नक़ल की बात कर लीजिए। आज नक़ल पूरे विश्व में भारतीयता की पहचान मानी जाती है। कोई भी उपकरण पश्चिमी देश आविष्कृत करें, यहां उसका तर्जुमा तुरत फुरत तैयार... और नक़ल में भी अकल की दखल ऐसी कि हमारी कितनी ही 'जुगाड़ीतकनीकों को दुनियां में इनोवेशन के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।

इसलिए यह सर्वथा उचित लगता है कि नक़ल के प्रति हम अपने नकारात्मक दृष्टिकोण को बदलें और अपनी इस पुरानी कला को परिमार्जित करें। इस कला को आगे बढ़ाने में हर पीढी के छात्रों का बड़ा योगदान रहा है। शायद ही कोई पढ़ा लिखा ऊंचे ओहदे पर बैठा मानुष यह दावे के साथ कह सके कि उसने जीवन में कभी नक़ल नहीं की। बड़े ओहदों के प्रशासकों  और राजनेताओं ने भी बिना रटंत विद्या या कभी कभार के नक़ल के जीवन में इतनी ऊंचाई शायद ही पाई होती। हां इनके नक़ल के तरीके जुदा जुदा भले ही रहे हों। मेरे एक मित्र हैं आज कल एक बड़े राजनेता हैं। हम साथ ही पढ़ते थे। उनका रटने या समझने में विश्वास जरा कम था इसलिए वे परीक्षा के समय पुर्जियां बनाते रहते थे और हम सब को हिकारत भरी नज़र से देखते थे। कहते, लगाओ घोटा ...जितनी देर में तुम लोग रट्टा मारकर एक दो सवाल याद करोगे, मैं पचीसों सवाल की पुर्जी बना चुका रहूंगा। बला की फुर्ती से वे महीन अक्षरों में नक़ल की पुर्जी बनाते थे और अंत में एक पुर्जी यह भी बनाते थे कि अमुक अमुक पुर्जी कहाँ कहाँ छुपाई जाएगी।

एक बार तो अपनी इसी सूझ के चलते वे भारी मुसीबत में पड़ गए। हिन्दी का साहित्य का प्रश्नपत्र था। उनका दुर्भाग्य की कक्ष निरीक्षक खुर्राट किस्म के निकल गए और उन्हें नक़ल करते धर दबोचा और दुर्भाग्य से वही पुर्जी उन्हें पहले ही दिख गयी जिसमें कुछ ऐसा मजमून बारीक अक्षरों में था। मीराबाई मोज़े में, तुलसीदास कांख में, कबीर दास लंगोट में, रसखान रीढ़ के नीचे... आदि आदि। जाहिर है कक्ष निरीक्षक के हाथ नक़ल साहित्य का खजाना ही मिल गया था। बेचारे अलग कक्ष में ले जाए गए जहां उनकी नंगाझोरी करनी पड़ी। अभी वे नक़ल शुरू नहीं कर पाए थे कि यह विपदा आन पड़ी थी। बहरहाल उनकी सारी नक़ल सामग्री जो जहां जहां से प्राप्त हुई जब्त कर ली गयी। गनीमत यही रही कि उन्हें परीक्षा देने की अनुमति दे दी गयी और ताज्जुब कि वे फिर भी पास हो गए थे। यह  राज तो उन्होंने बाद में उजागर किया कि वह पुर्जी तो उन्होंने जानबूझ कर निरीक्षक को थमा दी थी ताकि उनका ध्यान बंट जाए। असली वाली पुर्जी  तो कहीं और थी...

भला बताइए, ऐसी  तीक्ष्ण प्रतिभा वाले को नक़ल के नाम पर प्रताड़ित करना कहां तक उचित था और आज वे अपनी इसी प्रतिभा के बल पर राजनीति के  एक बड़े नाम हैं। उनसे ही जुड़े  एकाध और संस्मरण हैं। एक बार काला चश्मा लगाए एक कक्ष निरीक्षक जब पधारे तो हमारे प्रिय भावी राजनेता ने उन्हें इस बात पर कनविंस कर लिया कि वे बिना काले चश्मे के ही बला की पर्सनालिटी वाले लगते हैं। लिहाजा निरीक्षक साहब ने चश्मा निकाल कर सामने रख दिया। यह सब उन्होंने  इसलिए किया था कि उनके मुताबिक़ काले चश्मे  से यह पता नहीं लग पा रहा था कि वे देख किधर रहे हैं और नक़ल करने के लिहाज से यह एक असहज स्थति थी।
इनके कुछ क़िस्से  फिर कभी। आज का नक़ल आख्यान बस इतना ही।

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय जी की इन दिनों चल रहे नक़ल विमर्श से प्रेरित है अतः उनका आभार! 

गुरुवार, 31 मार्च 2011

लौंडों की दोस्ती ढेलों की सनसनाहट

यह एक सीख थी जो काफी पहले  एक बड़े बुजुर्ग से मिली थी.और यह इसलिए दी गयी थी कि कम उम्र वालों से ज्यादा मेल मिलाप घुलना मिलना एक सीमा तक ही ठीक है इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाय .मतलब  अपने समान वयी लोगों से घनिष्ठता तो ठीक है मगर ज्यादा उम्र के अंतर वालों से दोस्ती में थोड़ा विवेक जरुर बरतना चाहिए अन्यथा वही हो रहता है जो मेरे साथ तो कई बार हुआ है और अभी हाल में एक ट्यूशन पढ़ाने वाले गुरु जी के साथ हो गया ...पहले गुरु जी की बात ..

गुरु जी गाँव के एक रईस/खानदानी अभिजात्य  परिवार में बच्चों का ट्यूशन करते हैं .अब बच्चे रईस परिवार के हैं तो गाँव के बच्चों /स्ट्रीट अर्चिंस से उनका मेल जोल न के बराबर है .लेकिन उनका ट्यूशन कर रहे मास्टर साहब पहले तो गाँव के बच्चो से आते जाते हिल मिल गए मगर उनकी शरारतों से ऊब कर उनसे दूरी बढाने लगे या यूं कहिये थोड़ी अभिजात्यता उनमें भी आ गयी ....गवईं बच्चों ने यह भांप लिया और उनका आक्रोश इतना बढ़ा कि एक दिन ट्यूशन से वापस लौटते वक्त बच्चों ने हंसी हंसी में पहले तो उनका नजर का चश्मा उतारा और फिर उन्हें एक सड़क के किनारे गड्ढे में धकेल कर ढेलों की बौछार कर दी ....सड़क से गुजरते कुछ यात्रियों की नजर इस वाकये पर गयी तो मास्टर साहब की समझिये जान बची ...जैसे ही मैंने इस पूरे वाकये को सुना जी धक् से रह गया सो अलग, वो सीख भी याद हो आयी -लौंडों की दोस्ती ढेलों की सनसनाहट! 

बच्चे, नव युवा मुझे भी आकर्षित करते हैं -कारण स्पष्ट है वे अपेक्षया निश्छल होते हैं और भविष्य की अनन्त संभावनाओं की आहट  लिए होते हैं -उनका दिमाग दुनियादारी से कम प्रदूषित होता है ...सहज होते हैं ,मित्रवत भी ....मगर उनका जो सबसे नकारात्मक पहलू होता है वह है उनकी नादानी -कहते भी हैं नादान दोस्त से दानेदार दुश्मन अच्छे होते हैं ....मुझे यह पता है बल्कि शिद्दत से इस मर्म से गुजरा भी हूँ . मगर उनकी मासूमियत ,आखों में भविष्य की चमक मुझे खींचती है ...ब्लागजगत में मेरे कितने ही युवा मित्र हैं मगर उनकी नादानी मुझे गाहे बगाहे दुखी करती रहती है ....एक मेरे नादान मित्र ने मेरे पिछले पच्चीस सालों के श्रमपूर्वक लिखे डार्विन के मेरे आलेखों को नेशनल बुक ट्रस्ट से अपने नाम  से छपवा लिया ....एक दूसरे कम वयी मित्र मुझे एक उस संस्था के अध्यक्ष पद से बेदखल करने की धमकी दे चुके हैं जो मैंने ही उन्हें प्रेरित कर और उनके ही इमेज बूस्टिंग के लिए वजूद में लाई है  ....ये घटनाएं बड़े बुजुर्गों के सुदीर्घ अनुभव से दी गयी सीखों पर ही मुहर लगाती  हैं-कम उम्र वालों से दोस्ती तो करें मगर विवेक के साथ और एक दूरी बनाकर ही ....एक जगह मेरे अनवरत  रचनात्मक योगदान को ही परे धकेलते हुए जनहित के एक बहुत ही महत्वपूर्ण ब्लॉग को हमेशा के लिए डिलीट कर दिया गया ....शायद उम्र के इस बेमेल मित्रवत सम्बन्ध के बारे में यह अंगरेजी की कहावत ज्यादा मौजू है -फैमेलियारिटी ब्रीड्स कन्टेम्प्ट!...ज्यादा घुलना मिलना भी अपमान की स्थितियों को बढ़ावा दे सकता है ..इसलिए ही अनुभवी लोग रिश्तों में एक मर्यादित दूरी बनाए रखने की वकालत करते हैं ..

अब छोटों को केवल यह मानकर कि वे उम्र में छोटे हैं नजरअंदाज भी तो नहीं किया जा सकता -कई तो बड़ों के कान काटने में खूब अभ्यस्त होते हैं -बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्लाह..और यह भी कि 'देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर .." मगर एक समन्वयवादी दृष्टि अपनानी ही पड़ जाती है  क्योंकि यह भी आगाह किया  जा चुका है कि 'रहिमन देख बडेंन को लघु न दीजिये  डार जहाँ काम सुई करे कहाँ करे तलवार!

मगर जब आप किसी को ज्यादा प्रोत्साहित करते हैं और अगर वह पर्याप्त विवेक वाला नहीं हुआ  जैसा कि अक्सर होता ही है तो आपके दिए सम्मान/संपत्ति  को वह 'टेक फार ग्रांटेड' ले लेता है ...और आपके किन्ही कारणों से दूरी बनाते ही वह आक्रामक और डिमांडिंग होने लगता है -बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ जाय ,घटत घटत पुनि न घटे बरु समूह कुम्हलाय वाली स्थति  प्रगट हो उठती है ..नव युवाओं में अमूमन बहुत सी सकारामक बातें तो होती हैं मगर उनका बहुत जल्दी नेम फेम पा जाने ,जल्दी ही धनाढ्य और पूज्यनीय होने की प्रवृत्ति जो इन दिनों उफान पर है ,उन्हें काफी धक्के भी देती है -स्थायी सफलता का कोई शार्ट कट रास्ता नहीं होता ...इसे बार बार कहने की जरुरत नहीं है ...मुझे तो लगता है अपने लक्ष्य के प्रति  निरंतर प्रयासरत रहना ,अपने से योग्य बड़ों का बिना संशय सम्मान ,विनम्रता और  कार्य आचरण की इमानदारी आज के युग में भी सफलता के सूत्र हैं ...

ये विचार कई दिनों से मन में उमड़ घुमड़ रहे थे मगर आज ज्यादा प्रबल होकर आपके सामने प्रस्तुत हो गए ..निश्चय ही आपका मंतव्य पहले की ही तरह मुझे इस मुद्दे पर लाभान्वित करेगा..

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