शुक्रवार, 18 मई 2012

शूर्पणखा:एक शोध!


अब कैसे कैसे शोध के विषय भी हिन्दी की प्राध्यापिकाएं चयनित करती हैं -इसका उदाहरण मुझे एक उच्च महिला विद्यालय में जाने पर दिखा -एक कथित रूप से माडर्न हिन्दी प्राध्यापिका ने अपनी पी एच डी में पंजीकृत छात्र को एक अद्भुत विषय दे रखा था ."शूर्पणखा के व्यवहार एवं उसके अधिकारों का एक समाजशास्त्रीय विवेचन " ...हद है ....मैंने सोचा अजीब खब्ती टीचर है ....अपनी स्टूडेंट का पूरा जीवन चौपट करने वाली है ..मैंने थोडा हस्तक्षेप करना चाहा ...यह कैसा विषय है? जवाब था कि जब कैकेयी पर काव्य लिखा जा सकता है तो शूर्पणखा पर क्यों नहीं? मैं बहस में नहीं पड़ना चाहता था ....मगर इतना कह ही गया कि एक घिनौनी, बदसूरत,बेडौल, बेहद हिंस्र प्रवृत्ति की राक्षसी पर हिन्दी शोध से अगर हिन्दी का कुछ भला होने वाला हो तो जरुर करिए ....
"मेरी माँ ने त्रिजटा पर शोध किया था" ..वे बेसाख्ता बोल पडीं -हूँ तो यह मामला खानदानी था ....तो हिन्दी की रोटी तोड़ने का काम यहाँ पुश्तैनी था ..कितनी भाग्यहीना है बिचारी हिन्दी कैसे कैसों को झेलती आयी है :( 


फिर वे तफसील से बताने लगीं ...देखिये शूर्पणखा एक आजाद ख्यालों वाली बम्बाट नारी थी ....अपने विचार बिंदास प्रगट कर सकती थी ....और चेहरे से क्या होता है ...माना वह बड़ी ही बदसूरत थी ,सच कहें तो घिनौनी थी, मगर दिल की स्वतंत्र और साफ़ थी .."ओहो तभी तो सीता जी को कच्चा चबाने को वह उद्यत हो गयी थी .. ?" मैंने हठात रोका ...मगर वे जारी रहीं ....अब क्या करती वह ,राम उसे बरगला क्यों रहे थे ..वह एक आजाद ख्याल वाली नारी थी ..लेकिन राम ने उसे रिजेक्ट कर दिया ...और फिर लक्ष्मण ने उसे रिजेक्ट कर दिया ..भाई साहब आप ही बताईये कुछ ही पलों में दो दो रिजेक्शन भला कोई कैसे बर्दाश्त कर सकता है ...."हूँ यह तो है" ..मैं अब मैदान छोड़ने की मनोदशा पर आ गया था ....वैसे भी इस तरह के उत्साही ऊर्जित नारीवादियों से मुझे डर लगती आयी है ..कब किसी को क्या न कह दे ..कब किसी का चरित्र चौराहे पर नीलाम कर दें -इनका क्या भरोसा -अब इन्हें तो रिजेक्शन की पीड़ा आजीवन सताए रहती है शूर्पणखा की भांति.. इन्हें तो सारी दुनिया ही वैसी दिखती है ...मैंने भी पीछा छुड़ाते हुए कहा कि आप रिसर्च विसर्च तो कराईये मगर एक बात अच्छी नहीं लगी आपने मुझे भाई साहब जो कहा ..मैं दुनिया के हर किसी का भाई बनने का माद्दा नहीं रखता और न ही ऐसी कोई सदाशयता पालता हूँ ..मित्रों का चयन बहुत ढूंढ ढाढ के करता हूँ लाखो में एक ....वे भले छोड़ जायं, मैं कभी किसी को नहीं छोड़ता ....वे हतप्रभ होकर मुझे देखने लगीं और मैं वापस चल पड़ा ..

कई खयालात मन में उभर रहे हैं ....कैसे कैसे शोध के विषय लिए जा रहे हैं ..इसलिए ही तो शोध का स्तर दिन ब दिन गिरता जा रहा है .मैं यह भी मानता हूँ कि शूर्पणखा शायद कोई व्यक्ति भर ही नहीं प्रवृत्ति की परिचायक थी जो आज भी धड़ल्ले से सीना ताने समाज में घूम रही है ...लाख लाख रिजेक्ट हुयी ,अपमानित हुयी ,शील भंग हुआ मगर फिर भी वह नित नए राम की तलाश में दर दर भटक रही है .इस आस में शायद किसी युग में राम अथवा उनके सलोने गौरवर्णी भ्राता उसका उद्धार कर जायं ..मगर आप ही बताईये क्या राम कभी शूर्पणखा का उद्धार करने की सोच भी सकते हैं ..अहल्या तर गयीं ....मगर शूर्पणखा के पाप उसे कभी नहीं तरने देगें ........वह राम की त्याज्य है!

36 टिप्‍पणियां:

  1. ये तो ठीक है कि वो हिन्दी का खानदानी भाग्य या दुर्भाग्य हैं लेकिन इस कार्य के लिए समाजशास्त्रीय विवेचन :)

    दो दो नावों में सवारी का सुफल शायद मिले उन्हें :)

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  2. अजीब लोग हैं,कलियुग में सतयुग के शोध करवाए जा रहे हैं.मगर विषय चुनना यह तो हमारे वश में है नहीं सो जो विषय दिया गया है उसी पर बात भी करेंगे.

    शूर्पणखा से मुझे दिली सहानुभूति रही है.जिसकी शक्ल अच्छी नहीं क्या वो अपने से खूबसूरत की चाह नहीं रखता? हो तो यही रहा है हमेशा से,चाहे स्त्री हो या पुरुष ,सब अपने से सुदर्शन ही चाहते हैं,भले ही इसमें कामयाबी न मिले !
    हमें राम से जलन भी हो रही है.उनके पास सीता रहीं,पर शूर्पणखा के प्रस्ताव भी आये.उन्होंने और उनके भाई ने उसे रिजेक्ट किया,पर हमें ऐसा एक भी मौका नहीं मिला,किसी शूर्पणखा के द्वारा भी !
    ...हाँ,एक बात और ,इस मुद्दे को नारीवादियों को उठाना चाहिए ताकि ऐसे घृणित और समाज में भेदभाव पैदा करने वाले शोध-कार्यों पर रोक लग सके.शूर्पणखा के स्त्रीत्व और उसकी निजता का भी यहाँ सवाल है !

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  3. सादर नमन ||

    ...हाँ,एक बात और ,इस मुद्दे को नारीवादियों को उठाना चाहिए ताकि ऐसे घृणित और समाज में भेदभाव पैदा करने वाले शोध-कार्यों पर रोक लग सके.शूर्पणखा के स्त्रीत्व और उसकी निजता का भी यहाँ सवाल है !

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  4. आज की समस्या यह नहीं है
    कि कमी है विषयों की
    वरन उनका आधिक्य ही सताता है
    और शोधार्थी
    ठीक से चुनाव नहीं कर पाता है

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  5. आप को भी बड़ी दूर की कौड़ियाँ मिलती हैं।

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  6. ’शूर्पणखा’ या ’सूर्पणखा’?
    मानस के इस चरित्र की ज़रूरत है वहाँ बहुत। बात अलग है कि मर्यादा तथा भक्ति भावना से ओतप्रोत गोस्वामी जी के हाथों यह चरित्र उतना विनोद-स्वादु न हो सका जितना हो सकने की संभावना थी। पंचवटी में ज़रूर गुप्त जी ने बाबा के कठोर नियंत्रण से अलग जाकर स्वाभाविकता लाने का प्रयास किया है...पर शायद वह भी बहुत संतुलित नहीं।

    सूर्पणखा पर यह शोध साहित्यिक दृष्टि से होना चाहिए तो थोड़ा मज़ा आए!
    वैसे पश्चिमी Shaw..Ibsen के तर्क-विदग्ध नारी-पात्रों-से किसी पात्र पर भारत में शोध हो तो होने दीजिए न! कुछ बातें निकलेंगी ही!

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  7. @हिमांशु:
    शूर्पणखा है वाल्मिकी रामायण में तो यह शुद्ध है -सूप जैसे नखों वाली है जो वही है शूर्पणखा !
    लीजिये आप भी अब इस विचार के हो गए हैं कि इन पात्रों पर शोध हो ..ठीक है :)
    मगर कोई प्रतिशोध करे तो ? :)

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. अरविन्द जी, मेरी असहमति नोट कीजिये| आप कह सकते हैं कि लोगों में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर नहीं है| मेरी राय में धार्मिक मान्यताओं\चरित्रों के बारे में लिखते समय हमें थोडा सावधान रहना चाहिए|
    यूं भी घिनौना, बदसूरत, बेडौल और हिंस्र होने से ही कोई शोध या विचार के लिए अपात्र नहीं हो सकता\सकती|
    शेष फिर..

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  10. ...मैंने सोचा अजीब खब्ती टीचर है ....
    मैं सोच रहा हूं कि अजीब खब्ती ब्लॉगर हैं। जब देखो तब शूर्पणखा का किस्सा सुनाने लगते हैं।

    ये हल्का-फ़ुल्का, हास-परिहास जब इतना भद्दा है तो भारी-भरकम कैसा होगा!

    वैसे हो सके तो यह बताने की कृपा करें कि किस विश्वविद्यालय में यह विषय पी.एच.डी. के लिये चुना गया? कौन है वह उच्च विध्यालय जहां इस विषय पर काम हो रहा है।

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  11. ये तो कोई बात नहीं हुई मिसिर जी, शोध के लिए तो किसी भी विषय का चयन किया जा सकता है। सूर्पनखा को सतजुग से लेकर कलजुग तक याद रखा जा रहा है। शोध का विषय बढिया है, विषय चयन कर्ता भी प्रणम्य हैं।

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  12. ये तो कोई बात नहीं हुई मिसिर जी, शोध के लिए तो किसी भी विषय का चयन किया जा सकता है। सूर्पनखा को सतजुग से लेकर कलजुग तक याद रखा जा रहा है। आज भी नाक कटाए फ़िर रही है जैसे अश्वत्थामा फ़िर रहा है श्राप ग्रस्त। शोध का विषय बढिया है, विषय चयन कर्ता भी प्रणम्य हैं।

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  13. मेरे विचार से इस विषय पर शोध तो अवश्य होना चाहिए..हमारे समाज में भी बहुत साड़ी शूर्पनखा मिल ही जायेंगी.....कम से कम उनकी पीड़ा तो सबके सामने आएगी...

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  14. गुरुवर प्रणाम,


    "एक घिनौनी, बदसूरत,बेडौल, बेहद हिंस्र प्रवृत्ति की राक्षसी "....... मगर दिए गए चित्र में दिख रही शूर्पणखा को देख कर तो ऐसा नहीं लगता.

    मुझे लगता है की कलयुगी राम तो ऐसी शूर्पणखा के लिए सीता को, ज्यादा नहीं तो कुछ समय के लिए ही सही,जरुर त्याग देंगे.

    सर, आप पोस्ट पर प्रदर्शित करने के लिए हमेशा ही शानदार चित्रों का चयन करते हैं. ऐसे में मुझे बार बार बेहद प्रतिभावान फ़िल्मकार राजकपूर की याद आती है.

    विषय कोई सा भी हो और उस पर वैचारिक विमर्श कुछ भी हो पर निगाह हमेशा वहीँ रहे जहाँ उसे ठंडक मिले.

    वैसे इस चित्र में दर्शाए गए सभी पात्रों को ध्यान से देखने के बाद मुझे लगता है की सूर्पनखा ही शोध के काबिल है.

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  15. @अनूप शुक्ल,
    शूर्पनखा के सामने फिर भी ब्लागर एक तुच्छ खब्ती है :)
    आप विध्यालय के बारे में पूछ रहे हैं या विद्यालय के बारे में ....?
    बनारस आईये न, विद्यालय भी दिखा देगें और मोहतरमा से भी मिलवा देगें ..
    आपसे मिलकर शायद वे और प्रेरित हो जायं .. :)
    बाकी तो शूर्पनखा कुरुक्षेत्र में पुनर्जन्म प्राप्त की हैं ,,कभी वहां का भी चक्कर लगेगा ही !

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  16. @विचार शून्य,
    अगर आप मेरा विश्वास करें तो लोगों की नज़रें जहाँ पहले जाती हैं अब वहां मेरी आखिर में जाती हैं ...और कभी कभी जाती भी नहीं हैं !

    बाकी सहमत हूँ, उन नराधमों के लिए यह भी भोग्य है !

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  17. शोध का भले ही न हो , लेकिन बहस का अच्छा मुद्दा है .
    वैसे सूर्पणखा को एक महिला न समझ , एक विचार समझना चाहिए . फिर इस पर जम कर शोध और बहस दोनों की जा सकती हैं .

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  18. शूर्पनखा राम-लक्ष्मण के सामने बदसूरत नहीं, बल्कि खूबसूरत चेहरे में आई थी, ऐसा पढा और सुना है।

    नाक कटना इज्जत खराब होने का परिचायक है। नाक काटना को इज्जत खराब करना भी कहा जा सकता है क्या???


    सतयुग और कलयुग के बारे में मुझे तो संदेह ही रहा है।

    प्रणाम स्वीकार करें

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  19. मेरी उपरोक्त टिप्पणी को किसी के पक्ष या विपक्ष के तौर पर हर्गिज ना लिया जाये।

    और नाक के मुहावरे वाला सवाल केवल सवाल ही है।

    प्रणाम

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  20. @जी हाँ अंतर सोहिल जी ,आयी तो अपने मन के माफिक सुन्दर रूप बना कर मगर वह बहुत बदसूरत थी ....पोल खुल गयी ....
    नाक कटने के प्रचलित मुहावरे का अर्थ ही है इज्जत चली जाना ...

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  21. हमें मोहतरमा से मिलने की कोई इच्छा नहीं है। आप जिस तरह बताने से सवाल के जबाब के लिये जिस तरह विध्यालय/विद्यालय वाला जबाब दिए हैं उससे यही लगता है कि ये सब बातें कथित/तथाकथित ही हैं।

    जहां तक शूर्पनखा के कहीं पुनर्जन्म लेने वाली बात आपने लिखी तो आपको पता ही होगा कि पुनर्जन्म/अवतार अपने पिछले हिसाब चुकता करने के लिये लिये जाते हैं। क्या पता शूर्पणखा का अवतार तथाकथित कलयुगी अवतारों से अपना हिसाब चुकता करने के लिये ही हुआ हो।

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  22. शूर्पनखा शोध का विषय बेशक हो सकती है मगर यदि वास्तव मे उस पर किया जाये ना कि नारी जाति का मखौल उडाने के इरादे से लिखा जाये क्योंकि जहाँ तक मुझे पता है उसके इरादे रावण को खत्म करने के थे उससे अपना प्रतिशोध लेना था क्योंकि उसने उसके पति की हत्या की थी और रावण शक्तिशाली था और वो ये ढूँढती फ़िरती थी कि कौन ऐसा है जो उसके बदले मे उसका सहायक बने मगर प्रगट मे जाहिर नही करती थी और जब उसने राम को जाना तो ऐसा विचार किया ताकि समस्त राक्षस जाती का खात्मा हो सके।

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  23. वंदना जी,
    आभार ,
    आपने कहना से संदर्भ लिया है बताईये !जहाना तक मैंने पढ़ा है ऐसा उल्लेख प्रामाणिक ग्रंथों वाल्मीकि रामायण या रामचरित मानस में नहीं है ..और यह पोस्ट दरअसल आज की शूर्पणखा पर है ...

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  24. @अनूप जी, लगता है आप अवतारी शूर्पनखा से मिल चुके हैं -कहीं नख दंश तो नहीं लगा है न :)तभी इतने विश्वास से बाकी शेष लीला पूरण की बात कर रहे हैं -आपकी बात दुरुस्त है -अब की अवतारी सूपनखा जरुर सीता पर ही अंततः घात करेगी ...राम का तो खैर वह क्या बिगाड़ पायेगी :)

    हम लोग दैहिक सत्यापन भी करेगें ऐसे नहीं मानेगें :) अब नंगाझोरी पर विवश न करें महराज!जो न समझ पाए हों उनके लिए राज ही रहने दें !

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  25. अरविंद जी सबसे पहली बात कि मेरी टिप्पणी दिख नही रही मगर आपकी दिख रही है दूसरी बात मैने ये सब संतो मे मुख से सुना है और शायद पक्का नही मगर सुना है कि वाल्मिकी रामायण मे भी ऐसा ही कुछ लिखा है तीसरी बात मै हलकान नही हो रही यहाँ बात ऐसी देखी तो कहा वरना मुझे इन बातो से फ़र्क नही पडता मगर इसे शोध का विषय जाना तो सोचा कुछ नया पढने को शायद मिल जाये मगर जब यहाँ देखा कि बात दूसरी है तो जो मुझे पता था वो कहने से खुद को रोक नही सकी।

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  26. @वंदना जी,
    वाल्मीकि रामायण में वह प्रसंग नहीं है जो आप कह रही हैं -हमारे यहाँ के संत लोगों की अपनी अपनी रामायण है और अपने पाने प्रवचन ! जैसा श्रोता देखते हैं वैसा शुरू हो जाते हैं !

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  27. हिंदी प्राध्यापिका का सूर्पनखा पर शोध दिया जाना तो समझ आता है , मगर उनसे खफ़ा विज्ञान लेखक ने इस पर शोध कर उनके विचार को आगे ही तो बढाया !

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  28. वाणी जी ,अगर ब्लॉग जगत में रावण की उपस्थति की निर्लज्ज घोषणा है तो उसकी बहिन सूपनखा भी तो यही होगी :)
    विज्ञान लेखक बस इसी सत्य का उद्घाटन करना चाहता था ..उसका काम पूरा हुआ :)

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  29. Mai to hairan hun ki aapko ye aalekh soojha kaise? Behtareen tareeqese ise prastut kiya hai aapne!

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  30. भाई साहब शूपर्णकहा के प्रति आप क्यों भ्रकुटी ताने हुएँ हैं क्या इस दौर में अपने असेस्ट्स का प्रदर्शन करने वाली महिलायें नहीं हैं .आपने ही गत एक पोस्ट में पीन्स्तनियों(घड़े के आकर के स्तनों वाली )महिलाओं पे तीर दागे थे .और शूपर्णखा को तो परम सुंदरी बतलाया गया था आजकी पेजेंट क्वींस की तरह .भाई साहब आप भी गज़ब ढातें हैं.
    साहित्य समाज का सी टी स्केन होता है जैसा समाज वैसा सी टी स्केन वैसे ही शोध विषय .आपसे सहमत होना संभव नहीं है .
    कृपया यहाँ भी दया दृष्टि डालें -
    ram ram bhai
    रविवार, 20 मई 2012
    'ये है बोम्बे मेरी जान (भाग -१ )
    'ये है बोम्बे मेरी जान (भाग -१ )

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  31. गंगा रूपी हिंदी में शुपर्णखा धुल रही है , नाक पर प्लास्टिक सर्जरी हो रहा है ..अब तो यकीकन राम-लक्ष्मण भी सम्मोहित होने लगे हैं... बस एक रियलिटी शो हो जाए वो स्वयंवर वाला..कल्याण तय है..सबका

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  32. shoorpnakha ek pravruti thi aur us par shodh karna itana bura bhi nahi hai.aakhir vibhinn pravattiyon par shodh se samajik vyavhar samjhne me madad hi milati hai .aur satyug se kalyug tak ye samajik vyavhar moujood hai .ha unki kami ya aadhikya ke sath.

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  33. iss baat par bhi charcha ho jaye ki ram ne surpnakha ko kyu bargalaya ki, uska chhota bhai kunwara hai, uske paas prastav lekar jao, kya ram kisi socalled badsurat nari se chhichori thitolibazi kar rahe the, ya apni kathith sundarta k guman mein madmast the?

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  34. सुरुपनखा अपने युग की बेहद खूबसूरत कन्या थी। सुरूपनखा का अर्थ ही यह ही कि नख से शिखा तक सुंदर ही सुंदर। सुरूपनखा का दूसरा नाम चंद्रनखा भी था। उसका नाक अर्ध चंद्र आकार का था। सुरूपनखा पिछड़े समाज की नहीं थी एक विकसित समाज की थी। उसने अपने तीनों भाइयों रावण,कुंभकरण और विभीषण के साथ जंगर में शस्त्र विद्या सीखी थी। विकसित समाज से संबंध होने के कारण प्रेम निवेदन करना उसके लिए एक सामान्य बात थी जोकि पिछड़े समाजों के लिए अजीब बात थी।
    सरूपनखा के चरित्र के कई पहलू है जिनपर यकीनन शोध कीजरूरत है।
    अजीत

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