रविवार, 13 मई 2012

शुक्रिया ब्लॉग जगत.....


लोग जो भी कहें, ब्लागजगत ने मेरी सोच ,अनुभव और ज्ञान को  जो नए आयाम दिए हैं उसके लिए मन में कृतज्ञता के भाव ही उठते हैं ....मानव व्यवहार के कई अबूझ पहलुओं को  नजदीक से जानने समझने का मौका दिया . कई मिथों को तोडा है और ऐसी सीखे दी हैं जो शेष जीवन के लिए बड़ी उपयोगी हैं .कितने ही नए चाहे दोस्त दिए हैं तो अनचाहे दुश्मन भी ...सहिष्णुता दी है ,सहने की क्षमता दी है ,अगले को सुनंने का धैर्य दिया है.नयी सीखे दी हैं और यह भी बताया है कि हमारी औकात की लक्ष्मण रेखाएं क्या हैं .

मैं २००७ के आस पास अंतर्जाल से सक्रिय रूप से जुड़ा...अब दिन तारीख समय याद करने का काम कोई दूसरा कर रहा है तो काहें मगजमारी की जाए ..बड़ा उत्साह था ,मगर एक विस्तृत परिक्षेत्र ,अभिरुचि ,संस्कृति ,भौगोलिकता के लोगों से जुड़ने का कोई ऐसा वृहद अनुभव तो  था नहीं लिहाजा जो अज्ञानता जनित  मूर्खतायें होनी थीं जम कर हुईं ..लोगों से लड़ भिड  गए ,खूब उपहास उडाये बिना उनके परिप्रेक्ष्य को समझे ....मैंने ही नहीं कितनों ने यह सब किया ....मगर फिर समझ भी बढ़ती गयी ...असहमतियों के प्रति भी एक सकारात्मक दृष्टि उभरी ...सहिष्णुता पनपी ..मगर अफ़सोस तब तक कुछ मित्र जिन्हें हम कितना चाहते थे हमसे दूर हो गए शायद सदा के लिए ....मैं आज नाम नहीं लेना चाहता ...

ब्लॉग जगत या अंतर्जाल ने मेरे ज्ञान की इतनी वृद्धि की कि अब मुझे अपनी पूर्व अल्पज्ञता का बोध हुआ है...मनुष्य ..पुरुष और नारी को समझने का एक व्यापक नजरिया भी मिला है मगर यह बोध भी कि अभी भी कितना समझा जाना बाकी है . नारी को तो जितना भी समझो और भी अबूझता बढ़ चलती है जैसे ईश्वर का सम्पूर्ण बोध असंभव है नारी का भी सम्पूर्ण बोध संभव नहीं ....जानहि तुमहि तुमहि होई जाई ....ईश्वर को जानने पर खुद ईश्वर हो जाना और नारी की सम्पूर्ण समझ पर खुद नारीत्व को समर्पित हो जाने की शर्ते हैं मानों! फिर नारी ...कुतो मनुष्यः ?? :)

ब्लॉग जगत में अनेक नारियों से जुड़ने का सौभाग्य /दुर्भाग्य मिला मगर उन्होंने प्रकृति के विभिन्नता नियम को ही सिद्ध किया है ....विशेषण एक, मगर संज्ञाएँ कितनी ही अलग  और भिन्न भिन्न ....मगर जैसे किसी सम्पूर्ण पुरुष का अवतरण नहीं हुआ है कोई सम्पूर्ण नारी भी नहीं दिखी है यहाँ ..कम से कम भारतीय परिप्रेक्ष्य में नारी बहुत ही अपूर्ण और प्रवंचित दिखी है मुझे ...मगर उनके परिप्रेक्ष्यों और परिवेश की समझ उनकी अपूर्णता के औचित्य को सिद्ध भी करती है .अंतर्जाल की व्यापकता ने आज भारत ही नहीं विश्व की विपुलता को सीमित कर दिया है ...मैंने विश्व के  दूसरे  छोरों से भी व्यक्तियों से जान पहचान की है -वे सभी ज्यादा पारदर्शी और साफ़ दिखते हैं मुझे ..कोई भाव दैन्यता नहीं ..मैं लाख कह कह कर थक जाऊं यहाँ लोग मुझे मेरे पहले नाम, बिना किसी अनावश्यक आदर सूचक शब्द के आज तक नहीं बुला पाए हैं मगर वहां संबोधन की शुरुआत ही यहीं से होती है ...हेलो कैसे हो अरविन्द? बहुत फर्क है संस्कृति का ...

ब्लॉग जगत के अब तक के प्रवास में जहां अपनी कमियों को चिह्नित करने का मौका मिला वहीं दूसरों की कमियों से सीख भी मिली ..यहाँ खेमों के बनने बिगड़ने को भी देखा ...लोगों को प्रासंगिक से प्रासंगिक और फिर विदा होते भी देखा ....अमर को मरते देखा और मृतक को पुनर्जीवित होते भी देखा ....मगर यह उलाहना  भी नहीं है कि यह सब देखने के पहले ही मैं क्यों नहीं यहाँ से खारिज हो गया :)

यहाँ  सज्जनों को पराभूत होते देखा तो दुर्जनों की अजेयता भी देख रहा हूँ ...मगर तसल्ली यह भी कि अभी भी यहाँ बना हुआ हूँ ....तटस्थ द्रष्टा के रूप में नहीं बल्कि सजगता /संलिप्तता के साथ ...आत्म प्रमोचन की उत्कट अभिलाषा तो खैर कभी भी नहीं रही इसलिए कोई गर्वोक्ति भी नहीं ...हाँ पहले की तुलना में अब ब्लॉग जगत उतना स्पंदित और जीवंत नहीं रहा ....हमने शायद समय के पहले ही इसका भरपूर उपयोग दुरूपयोग कर लिया है ....लोग वीतराग हो चले हैं .....विरत हो उठे हैं ....साहचर्य की अब वैसी ललक नहीं रही ....कई मित्र हैं जिनसे जुड़ने ,कुशल क्षेम जानने की भी  न जाने क्यों इच्छा अब नहीं होती तो वहीं कुछ दुश्मनों की खोज खबर हमेशा लेने को मन चंचल रहता है -उनके अनजाने ही ... :) 

युद्ध विराम की स्थति है ..मगर यह तात्कालिक या अल्प विराम की स्थति नहीं लगती ..सेनायें अब बहुत दूर जा चुकी हैं और गर्द के बादल भी काफी छट गए हैं .चेहरे साफ़ दिख रहे हैं और लोगों के, अनछिपे /छुपे अजेंडे भी ..कई लोग सहिष्णुता के साथ मैदान छोड़ चुके तो कई असहिष्णुता से अभी भी जमे हुए हैं -उनमें एक नाम तो मेरा ही है -वैसे अब यहाँ रखा ही क्या है ... मेरे सब प्रियजन तो एक एक कर चलते भये हैं ,बचों से भी ज्यादा उम्मीद नहीं लगती ..फिर यहाँ क्यों रुकना ? जीवन के पांच छः वर्ष तो यहाँ बीत गए अब कौन सी उम्मीद बची है ....मगर कहते हैं न उम्मीद पर दुनिया कायम है और हम इतने खुदगर्ज भी कैसे हो सकते हैं कि बस केवल अपने और अपने ही बारे में सोचें ..आईये तनिक उदार बनें और दूसरों के बारे में भी सोचें ....समाज को जो कुछ दे सकते हैं जरुर दें..... 

आज सुबह उठा.  ब्रह्म मूहूर्त में ,चार बजे ..और ये विचार सरणि उफनाती गयी है जो अब आप तक भी जा पहुँची है .....

41 टिप्‍पणियां:

  1. आज काफ़ी दिन बाद आप अपने रंग में आते दिखे हैं.चाहे ब्लॉग-जगत की दुनिया हो या हमारे आस-पास की दुनिया,लोगों की अनेक किस्में सब जगह मौजूद हैं.मुश्किल तभी होती है जब हम सहज भाव के कारण इन्हीं लोगों को अपना मित्र भी समझ लेते हैं,जबकि इसकी कसौटी बहुत लंबी है.
    आपने लिखने के दौरान अच्छे-बुरे अनुभव किये,यह सबके साथ होता है.दुःख का अनुभव तभी होता है जब हमारी अपेक्षाएं,चाहे मित्रों से या इस ब्लॉग-जगत से , ज़्यादा हो जाती हैं.
    हम तो इतना ही कह सकते हैं कि लिखने-पढ़ने का हमारा अपना स्टाइल या रूचि है पर इसमें जो सार-तत्व ,नशा या पैशन का टच है वह आपकी वज़ह से है.आपने हमें कई बार प्रोत्साहित किया और कई सारे अच्छे दोस्त दिए,जिनके बिना लगता है यह ब्लॉगिंग बेमज़ा होती.
    आप की कलम निरंतर यूँ ही चलती रहे,हम जैसों को आप प्रेरित करते रहें,यही कामना है !

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  2. पंक्ति दर पंक्ति पढ़ी |
    ब्लॉग जगत / नारी जगत / मित्र विछोह / उम्मीद
    बहुत अच्छा लेख |
    काफी कुछ एक लेख ने समझा दिया |
    आभार आपका ||

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  3. जैसे वास्तविक जीवन में हर रंग है वैसे ही ब्लॉग जगत में भी है.... हाँ, सीखने-सिखाने, पढने- गुनने को कुछ कमी नहीं दिखी मुझे भी ....

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  4. आप दूसरों से विशिष्ट इसलिए हैं कि आप आत्मालोचन कर सकते हैं ! प्रतिक्रियाओं की तिक्तता के चलते यदि कोई सम्बंध टूटते हों , तो उन्हें जरूर टूट जाना चाहिये क्योंकि अविकसित मन: मित्रों से संबंधों का औचित्य भी नहीं है ! वैचारिक धरातल पर हो रही संवादगत कटुताओं अथवा मृदुताओं से निपटने / प्रतिकार का कार्य वैचारिक धरातल पर ही किया जाना चाहिये ! अगर कोई बंदा / बंदी चिंतन और संबंधों में घालमेल का आदी हो तो फिर उससे दूरी ही भली !

    आपने ब्लाग जगत में निहित खेमेबंदियों , खुदगर्जियों , सहिष्णुताओं , असहिष्णुताओं और कई तरह की प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है तो इतना ही कहूँगा कि ब्लागर्स इसी दुनिया के निवासी हैं ! उन्हें अपनी विशिष्ट परवरिश के अनुकूल जीना है / अभिव्यक्त होना है ! इसमें असहजता क्या है ?
    दूसरों के बारे में सोचिये / उदार होइए किन्तु उनके बदलने / ना बदलने का हक़ उनके पास ही रहने दीजिए :)

    कहने का मतलब है कि खेले खाये / आदतशुद /अभ्यस्त / विचाररूढ़ हो चुके मित्रों से शिशुवत प्रतिक्रियाओं / व्यवहार की अपेक्षा मत कीजिये :)

    चटखने योग्य हड्डियां चटख ही सकती हैं उनमें रबड़ सा लचीलापन खोजना अव्यवहारिक :)

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  5. शुक्रिया ! इस एक शब्द में गज़ब की शक्ति है। आभार समस्त भार को क्षण में मिटा देता है। माता-पिता के प्रति, ईश्वर के प्रति, समाज के प्रति या फिर मित्र के प्रति शुक्रिया अदा करना तो हमारा फर्ज बनता ही है। सबसे अधिक सुख तो तब मिलता है जब यह शत्रु के प्रति हो। सच्चे मन से उसे उसकी गलतियों के लिए माफ कर दिया जाय। साथ बिताये लम्हों के लिए शुक्रिया अदा किया जाय।

    शु्क्रिया ब्लॉगजगत..वाह ! वह स्थान जहाँ हम सबसे ज्यादा अपना नीजी समय शेयर करते हैं, जहाँ हम खुलकर अपने विचार अभिव्यक्त करते हैं और सबसे अच्छी बात यह कि जहाँ हमारे विचारों की प्रतिक्रिया भी मिलती है। कमियों को भूलकर जो मिला उसके प्रति स्वस्थ मन से शुक्रिया अदा करना सबसे अच्छी प्रार्थना है। इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता। हम भी आपके स्वर से स्वर मिलाते हुए कहते हैं....
    शुक्रिया ब्लॉग जगत...I LOVE U.

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  6. ब्लॉगिंग एक आभासी दुनिया तो है ही । असल की दुनिया से काफी दूर है । यह बिलकुल वैसा है जैसे शादी से पहले प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को खूब लुभाते हैं , अच्छी अच्छी बातें करते हैं , और सिर्फ और सिर्फ अपना अच्छा रूप ही दिखाते हैं ।
    ब्लोग्स पर भी ऐसा ही देखने को मिलता है । यहाँ सभी अपना अच्छा रूप ही दिखाने की कोशिश करते हैं । कुछ अपवाद है जो अपना दूसरा रूप दिखाते हैं , हालाँकि ज़रूरी नहीं कि वो भी असली रूप ही हो ।

    हर काम में एक संतुलित सोच का होना ज़रूरी है । याद रखना चाहिए कि इस दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं है । सभी में कुछ न कुछ अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं । अच्छाई की कद्र करें और बुराई को नज़रअंदाज़ ।

    वैसे अति हर चीज़ की ख़राब होती है ।

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  7. गहन ...ब्रह्मा मुहूर्त में लिखा ...समग्र जीवन दर्शन ...जीवन चिंतन कर रहा है आपका आलेख ...!बिलकुल सत्य है शब्द शब्द ..!हर रंग है इसी दुनिया में ....किन्तु अंततः चुनाव हमारा ही ....!!
    सार्थक आलेख लिखते रहें ...!!
    शुभकामनायें ..!!

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  8. पंडित जी,
    अब अरविन्द कहने की धृष्टता तो हम कर भी नहीं सकते, भले ही आप इसे संस्कार और प्रगतिशील संस्कार के लक्षण बताएं.. हाँ, पंडित जी कहने वाले भी हम अकेले हैं.. आपके लाख मना करने के बावजूद भी.. हम नहीं सुधरेंगे और बकौल अली सा, "बदलने / ना बदलने का हक़ उनके पास ही रहने दीजिए :)"
    आपके विषय में आज पहली बार ईमानदारी से बस एक ही बात कहने को जी चाहता है कि जितनी शिद्दत से आपसे नफ़रत की है उतना ही टूटकर इज्ज़त भी की है आपकी.. आपका अंदाज़ और लेखन दोनों एन्जॉय किया है..
    बस आप लिखते रहें पंडित जी!!ये दुनिया उतनी आभासी नहीं है जितनी दिखती है..!!

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  9. @अनूप शुक्ल जी की एस एम एस से प्राप्त टिप्पणी -(पता नहीं यहाँ करे न करें )
    अगला दादा साहब फाल्के अवार्ड ब्लॉग जगत में शानदार
    अभिनय के लियर पंडित अरविन्द मिश्र को दिया जा सकता है
    मेरा एस एम एस जवाब -
    आप भी हद हैं ,मन की कहो तो अभिनय और बेमन की तो वाह वाह
    व्यंगकार दुनिया को ऐसयिच ही देखते हैं ....

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  10. @सलिल भाई,
    आप ही नहीं ये एक और शख्स हैं जो अपुन को पंडित कहते हैं ..
    अब बुरा नहीं लगता ...जब मैं दर्जा ७-८ में पढता था तो
    एक अहीर बालक मुझे पंडित कह कह कर चिढाता था ,,
    उसी ने इस संबोधन के प्रति मुझे इम्यूनटी दिला दी थी
    सो जब कोई पंडित कहता है उस आभीर बालक ही याद आती है
    बस .....
    आज पंडित तो केवल व्यंग स्वरुप ही कहा जाता है हम सरीखे
    निरीह जनों को !

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  11. A learner always learns. इतने समय से आप यहाँ हैं तो सीखना सिखाना स्वाभाविक ही है| हम सब यहाँ कुछ न कुछ सीख ही रहे हैं| जीवंत लोग हैं तो सहमति असहमति भी होगी ही, असहमतियों का सम्मान करना एक गुण है जिसका हमारे समाज में अभाव सा है सो यहाँ भी वही दिख जाता है| खुद की बात बताऊँ तो असहमतियों से मुझे कभी ऐतराज नहीं होता लेकिन नॉनसेन्स टाईप की तो सहमति को भी दूर से ही सलाम करना पसंद करता हूँ क्योंकि सचमुच की दुनिया की तरह स्टैंड लेने वाले यहाँ भी विरले ही हैं| और सम्पूर्णता पर अपना मत तो ये है की सम्पूर्ण कोई भी नहीं, नारी भी नहीं, कोइ नर भी नहीं, आप भी नहीं और मैं भी नहीं तो अपूर्णता को कमी ना मानकर विशेषता\लक्षण मान लेना चाहिए| अली साहब, देवेन्द्र भाई और सलिल जी के सुर में एक सुर हमारा भी समझा जाए|
    ब्लागजगत का एक अदना सा हिस्सा होने के चलते अपने हिस्से का शुक्रिया रखे ले रहे हैं,:)

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  12. शुक्रिया आपका भी !
    और फिर ब्लागजगत शुक्रिया का हकदार है ही. विविध रंग - बहुरंग मौजूद है यहा. ब्लागजगत ही वह स्थल है जहां के लिये कहा जा सकता है :
    "अमरता को मरते देखा और मृतक को पुनर्जीवित होते भी देखा ...."
    पुनर्जीवन पर भरोसा तो नहीं पर नवजीवन की अपेक्षा रखनी ही रखनी चाहिये

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  13. कुछ हम सुधरें कुछ वे सुधरें।

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  14. शोले मे कैदियों से जेलर असरानी...
    ​​
    ​"हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं, अबे... जब हम नहीं सुधरे तो तुम क्या सुधरोगे...हे...हे...हे...​"
    ​​
    ​जय हिंद...

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  15. निस्संदेह यहाँ से बहुत कुछ पाया है बहुत कुछ सीखा है...

    जहाँ एक और एक से एक घटिया लोग, बेवजह गालियाँ देते पाए जाते हैं वहीँ एक और वास्तविक तपस्वी जैसे गुरु, यहाँ शांत चित्त बैठे नज़र आते हैं ! पहचानना न पहचानना अपनी ही नज़रों में कमी माननी चाहिए !

    वैचारिक टकराव खासतौर पर दो अहंकारियों के मध्य स्वाभाविक है ...

    अहम् तुष्टि और अपने आपको विद्वान समझने की भूल अक्सर मनमुटाव का कारण बन जाती है !

    यहाँ अधिकतर लोग एक दूसरे को ध्यान से नहीं पढ़ते, केवल सरसरी निगाह से उसके बारे में अंदाज़ कर अपने ज्ञान को बढ़ा लेते हैं ! उद्देश्य अक्सर अपने आपको पढवाना होता है !

    यहाँ अधिकतर, सामने वाले को घटिया मानसिकता लिए इंसान माना जाता है !इस मानसिकता के साथ बाकी व्यवहार का रास्ता अपने आप प्रशस्त हो जाता है !

    जहां तक आपका सवाल है, स्पष्ट व्यक्तित्व और बड़े जीवट की हस्ती हो !

    नारियों के बारे में व्यक्तिगत ख़यालात बनाना और उन्हें जाहिर करना, चाहें वे सही ही क्यों न हों, मैं उचित नहीं समझता!

    उनकी अपनी विशिष्ट सामजिक स्थिति और व्यवहार के कारण भी यह अनुचित है ! मैं यह भी मानता हूँ कि नारियों की समाज में स्थिति, ख़राब होने की जिम्मेदारी, हमारी अधिक बनती है !

    हमें अर्धनारीश्वर पर और जानकारी लेनी होगी !

    हमें याद रखना होगा कि लेखन अमर है और आने वाले समय में हमारी पीढियां इसे पढ़ेंगी और हमारे बारे में अनुमान भी लगाएंगी !
    सादर

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  16. जीवन भर हम कुछ न कुछ सीखते रहते हैं , ब्लॉग यात्रा भी ऐसी ही है !
    साभार अली जी --दूसरों के बारे में सोचिये / उदार होइए किन्तु उनके बदलने / ना बदलने का हक़ उनके पास ही रहने दीजिए!

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  17. सुबह की गहन सोच यूँ लिखी गयी ..यह भी एक रंगमंच सी दुनिया लगती है डाक्टर साहब ..चलने दीजिये इस को यूँ ही :)

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  18. तुम्हारे स्पष्ट व्यक्तित्व से प्रभावित हूँ यार..

    आज के समय में, बिना जग की परवाह किये अपने विचार जाहिर करना, मूर्खों और संकुचित मन के लोगों में हलचल मचाकर, अपने खिलाफ गिरोह बनवाने जैसा प्रयास है !

    हमें इनकी कद्र करनी चाहिए अरविन्द :)

    दुनिया में अपनी कद्र करवाने के लिए, महत्वपूर्ण लोगों को भी, भीड़ का आदर करना पड़ा ...

    लोकतंत्र की कद्र करते हुए, शांत रहा करो दोस्त ...

    कई बार भीड़ की बातें सही मानी जाती है और चुनाव के समय वोट भी भीड़ को देना है :)

    मजबूत यार दोस्त भी, भीड़ से घिरे समय में बचाने नहीं आयेंगे ..

    सबको लोकलाज की चिंता है या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि हिजड़े हैं ....

    शुभ कामनाएं !

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  19. आत्मालोचना के लिए बधाई! यह तो नित्यकर्म होना चाहिए। व्यक्ति कभी संपूर्ण नहीं होता लेकिन उस ओर गति तो कर ही सकता है।

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  20. रविकर चर्चा मंच पर, गाफिल भटकत जाय |
    विदुषी किंवा विदुष गण, कोई तो समझाय ||

    सोमवारीय चर्चा मंच / गाफिल का स्थानापन्न

    charchamanch.blogspot.in

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  21. सुबह के चार बजे :o ..तभी इतनी सीरियस और खतरनाक पोस्ट लिखी है :p

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  22. अभी टिप्पणी करना बाकी है। करेंगे आराम से। ये पोस्ट कौनौ लंगोट पुराण वाली पोस्ट की तरह भागी हटने नहीं जा रही है न!

    आपके एस.एम.एस. के जबाब में अनूप ने लिखा था- व्यंग्यकार दुनिया की विसंगतियां (भी) देखता है।

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  23. 'दुनियाँ' नहीं 'दुनिया'.

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  24. ये दुनिया भी एक दुनिया ही है जहाँ हर तरह के रंग हैं.

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  25. स्व :से मुक्ति का एहम विसर्जन का ज़रिया बने ब्लॉग तो बात बने .बढ़िया चिंतन .खुद के गिरेबान में झांकना अच्छा है .हम तो खुद पकड़ भी लेते हैं हाथ भी ड़ाल देते हैं .बढ़िया विषय मंथन .बधाई .टिके रहो बने रहो .

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  26. आपकी रचना बेहतरीन है। अच्छी रचनाओं को ज़्यादा से ज़्यादा नेट यूज़र्स तक पहुंचाने के लिए उन का ज़िक्र यहां भी किया जाता है-
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/05/arvind-mishra.html

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  27. @दुनियाँ' नहीं 'दुनिया'.

    ऐसे तो बहुत सारी गलतियाँ हैं,भावनाओं को समझो !

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  28. बेवजह की बातों से परे यहाँ एक निष्कर्ष मिला .... बहुत अच्छा लगा

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  29. aapke atm-avlolkan se iqtaphaq rakhte
    hue itna hi kahna chahoonga ke "sukriya blog-jagat" ...... jo tumne
    itne vaividhyapoorn vicharik sansar
    ke "sapt-dhruv" se sat-sang karaya..


    aapka swikar hamare dil ko karar deta
    hai....


    pranam.

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  30. 'आईये तनिक उदार बनें और दूसरों के बारे में भी सोचें ....समाज को जो कुछ दे सकते हैं जरुर दें..... '
    .. '
    मन कितना भी असमंजस में हो बस यही तो निष्कर्ष है.
    शुक्रिया.

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  31. बढ़िया चिंतनपरक निष्कर्ष देखने को मिला..आभार

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  32. कुछ लोग बिना बोले ही छाप छोडते हैं , बस कपड़े बोलते हैंकपड़े पहनना और उनका महत्व समझना सीख ले दस शीश दशानन

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  33. उम्मीद पर दुनिया टिकी है. यह आपके आज के चिट्ठे का स्वर्णवाक्य है.

    आपका पूरा आलेख पढा. अच्छा लगा. विश्लेषण सही है.

    चिट्ठाकारी में लगे रहें. आपके पाठकों में एक पुराना पाठाक आज से वापस आ गया है.

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  34. बहुत विचारणीय सूत्र...

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  35. स्वयंभू चेले श्री,
    दुनियाँ तो हो ठीक,आगे और गलतियां बताएं तो ठीक कर ली जायं !
    बलि जाऊं इन अखियन को जो इतना बारीक भी देख लेती हैं !

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  36. ब्लाग-जगत के आपके अनुभव जानना अच्छा लगा .

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  37. बहुत ही सुंदर भाव...सुन्दर प्रस्तुति...हार्दिक बधाई...

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  38. आपमें ही देखा वो गीता का सार-सूत्र -कर्म करते जाओ वाली..और पूर्णता की सतत खोज भी..हाँ , कभी रुक कर मन आकलन करने से बाज़ तो आता नहीं है .उसी में कई छुपे माणिक भी दिख जाते है जो फिर से अपने चकाचौंध से सम्मोहित किये लिए चलते है..ये कुछ वैसा ही है..देरी से आने के लिए..

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